प्रकरण ७- धार्मिक कार्य तथा मासवार तीज त्यौहार गर्भवती स्त्री एवं धार्मिक कर्म
प्रकरण ७ - धार्मिक कार्य तथा मासवार तीज त्यौहार गर्भवती स्त्री एवं धार्मिक कर्म
१) गर्भावस्था में गर्भ हेतु किए जानेवाले धार्मिक संस्कार विधियों में, यदि गर्भवती का
स्वास्थ्य अच्छा हो तो वह ९ वें मास तक अपना सहभाग दे सकती है।
२) वटपूर्णिमा, चातुर्मास के व्रत, हरितालिका पूजन, श्रावण मास में मंगलागौरी पूजन,
एकादशी, प्रदोष, करवा चौथ, इ. विविध अनुष्ठानों में यदि गर्भवती का स्वास्थ्य ठीक हो तो वह
९ वें मास तक सक्रिय सहभाग ले सकती है। गणपति विसर्जन एवं दुर्गा/काली विसर्जन घर में
गर्भवती स्त्री होनेपर भी करना चाहिए।
३) उपनयन, वास्तुशांति (गृहप्रवेश) आदि मंगलकार्यों में (नान्दिश्राद्ध होने से) गर्भवती ६ वें
महीने तक सहभाग ले सकती हैं।
४) सास-श्वसुर, मां-पिताजी आदि के श्राद्ध में यदि गर्भवती का स्वास्थ्य अच्छा हो तो वह ९ वें
मास तक सहभाग ले सकती हैं, परंतु अन्य सपिंडों के श्राद्ध में ६ वें मास तक सहभागी हो सकती हैं।
अविवाहित कन्या / विधवा स्त्री और धार्मिक कर्म पुरातन काल में एकत्र कुटुंब व्यवस्था में घर में अनेक महिलाएँ एकसाथ रहा करती थी।
ऐसे समय विधवा स्त्री को क्वचित् धार्मिक कर्मों में सहभाग देने की आवश्यकता निर्मित होती थी। अतः पूजाअर्चा, उत्सव मनाने का विधवा स्त्री को कोई अधिकार ही नहीं है, ऐसी लोगों की धारणा हो गई है। जब उसका पति जीवित था तब वही स्त्री अनेक वर्षों तक घर में लक्ष्मी पूजन, गणेशोत्सव, नवरात्रि आदि धार्मिक कर्मों में बड़े उत्साह से सहभाग देती थी। केवल वैधव्य के कारण(जब उसके लड़के, बहु साथ में नहीं रहते या बच्चे अभी छोटे होने के कारण) वह पूजाअर्चा, गणेशोत्सव, नवरात्रि आदि कर सकती हैं या नही? कैसे करें? क्या भगवान मेरी पूजा कोस्वीकार करेंगे? ऐसी शंकाएँ मन में उत्पन्न होती हैं। लेकिन पूजन तो भक्ति का ही एक अंग हैं और भक्ति करने का अधिकार तो सभी को हैं। अतः विधवा स्त्री भी नित्य, नैमित्तिक पूजन, नैवेद्य आदि स्वयं कर सकती हैं तथा श्राद्धादि स्वयं या प्रतिनिधि के द्वारा करा सकती हैं। उसी प्रकार अपने लड़के की, बहु की, अपने पोते-पोतियों की आरती भी उतार सकती है।
इसी प्रकार से अविवाहित कन्या भी सभी प्रकार की पूजा-अर्चना, नैवेद्य, प्रसाद, उत्सव,
व्रत स्वयं कर सकती है तथा उनमें सक्रिय सहभाग दे सकती हैं और अपने भाईयों की आरती उतार सकती है।
मासवार त्यौहार-व्रतों का विवरण
चैत्र, वैशाख आदि मास से लेकर १२ महिनों में आनेवाले मुख्य तीज-त्यौहारों के सामान्य
नियम, कुछ त्यौहारों की सामान्य जानकारी तथा वर्तमान समय में उनके अनुपालन के संदर्भ में संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास किया है।
(तीज-त्यौहारों के विशेष नियम तथा अधिक जानकारी हेतु धर्मसिंधु, व्रतपर्व विवेक, व्रतराज आदि ग्रंथों का अवलोकन जिज्ञासु व्यक्ति कर सकते हैं।)
चैत्रादि १२ मास के नित्य व्रत
विनायक चतुर्थी - हर मास के शुक्ल चतुर्थी को "विनायक चतुर्थी" कहते हैं। भगवान
श्रीगणेश की उपासना करने का यह व्रत है। इस हेतु मध्याह्न समय में (तृतीयायुक्त) होनेवाली चतुर्थी व्रत हेतु ली जाए ऐसा सामान्य नियम है। यह व्रत पूरे दिन उपवास रखकर दूसरे दिन समाप्त करना चाहिए। यदि विनायक चतुर्थी मंगलवार को हो तो उसे अंगारक योग कहते हैं।
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दुर्गाष्टमी - हर मास के सूर्योदयव्यापिनी शुक्ल अष्टमी को "दुर्गाष्टमी" कहते हैं। दुर्गाष्टमी के
पर्वपर दुर्गादेवी की उपासना की जाती है।
एकादशी - प्रत्येक महीने के शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष में एकादशी का व्रत किया जाता है।
भगवान श्रीविष्णु की उपासना करने हेतु यह व्रत किया जाता है। एकादशी के दिन पूर्ण दिवस उपवास रखकर दूसरे दिन पारणा किया जाता है। सामान्यतः एकादशी के दो प्रकार हैं, एक स्मार्त तथा दूसरा वैष्णव (भागवत)।
स्मार्त एवं वैष्णव (भागवत) एकादशी - कुल मिलाकर एक वर्ष में २४ एकादशी के व्रत
होते हैं। उसमें ४/५ बार स्मार्त एकादशी तथा वैष्णव (भागवत) एकादशी ऐसी दो प्रकार की एकादशी होती हैं। कभी-कभी सूर्योदय के बाद एक मिनट भी एकादशी की तिथि नहीं होने के बावजूद द्वादशी के दिन वैष्णव (भागवत) एकादशी का व्रत कैसे रखा जाता है, ऐसा प्रश्न जिज्ञासुओं के मन में निश्चित रूप से उभरता है। वर्तमान समय में स्मार्त / वैष्णव (भागवत) ऐसे दो संप्रदाय हैं। एकादशी का व्रत स्मार्त संप्रदायियों के हेतु "पारणा" प्रधान है तथा वैष्णवों के लिए यह व्रत उपवास प्रधान है। पारणा हेतु सूर्योदय के समय यदि द्वादशी हो तो उसके पूर्व के दिन में अर्थात् एकादशी के दिन स्मार्त संप्रदायी को उपवास करना चाहिए। वैष्णवों के लिए उपवास के दिन दशमी का वेध नहीं होना चाहिए। दशमी वेध अर्थात् एकादशी के सूर्योदय के पूर्व अरुणोदय के समय (१ घंटा ३६ मिनट) दशमी हो तो दशमी विद्ध एकादशी का दिन छोड़कर द्वादशी के दिन वैष्णव (भागवत) संप्रदाय के लोगों को एकादशी व्रत करना चाहिए। ऐसे समय में उनका पारणा त्रयोदशी के दिन होगा।
(अ) एकादशी तिथि का क्षय हो तो दशमी के दिन स्मार्त एकादशी तथा द्वादशी के दिन
वैष्णव (भागवत) एकादशी का व्रत रखना चाहिए।
(ब) द्वादशी का क्षय हो तो दशमी के दिन स्मार्त एकादशी और एकादशी के दिन वैष्णव
(भागवत) एकादशी का व्रत रखना चाहिए।
(क) द्वादशी की वृद्धि हो तो एकादशी के दिन स्मार्त एकादशी और अहोरात्र द्वादशी के दिन
वैष्णव (भागवत) एकादशी का व्रत रखना चाहिए।
(ड) एकादशी की वृद्धि हो तो स्मार्त तथा वैष्णव (भागवत) दोनों का व्रत उर्वरित एकादशी के दिन (अहोरात्र के दूसरे दिन) रखना चाहिए।
एकादशी के दिन "कर्ता" को उपवास (व्रत) ना हो तो भगवान सत्यनारायण महाराज की
पूजा/कथा कर सकते हैं, भगवान उपवास नहीं करते। भगवान की उपासना अच्छे ढंग से कर सकें इस हेतु भक्त को उपवास (व्रत) रखना चाहिए, यदि अन्य सहभागियों का व्रत हो तो वें "तीर्थ" ले सकते हैं, तथा दूसरे दिन प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।
प्रदोष - इस दिन भगवान शिव की उपासना की जाती है। सूर्यास्त के बाद ६ घटी (२ घंटे
२४ मि.) तक प्रदोषकाल होता है। प्रदोषकाल में दोनों दिन कम या अधिक त्रयोदशी हो अथवा दोनों ही दिन न होनेपर त्रयोदशी के दिन प्रदोष का व्रत रखना चाहिए। मात्र द्वादशी के दिन प्रदोषकाल में त्रयोदशी हो तथा त्रयोदशी के दिन ना हो तो द्वादशी के दिन ही प्रदोष व्रत रखना चाहिए। प्रदोष व्रत शुक्ल व कृष्ण दोनों ही पक्ष में होता हैं। अर्थात् महीने में दो बार प्रदोष होता हैं। संपूर्ण वर्ष तक प्रदोष व्रत रखना संभव ना हो, वे लोग विशेष रूप से शनिप्रदोष, सोमप्रदोष अथवा भौमप्रदोष इसमें से किसी एक प्रदोष का व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत करते समय दिनभर निराहार रहकर सूर्यास्त के बाद स्नान कर महादेव का पूजन करना चाहिए। दहीयुक्त चावल (भात) का नैवेद्य अर्पण कर तत्पश्चात् भोजन करना चाहिए। प्रदोष व्रत करने से शिव की उपासना का फल प्राप्त होता है।
संकष्ट चतुर्थी - संकटनाशन हेतु संकष्ट चतुर्थी को भगवान श्रीगणेश की उपासना की जाती हैं। संकष्ट चतुर्थी के दिन निराहार रहकर रात को चंद्रोदय होनेपर भोजन किया जाता है। सामान्यतः चंद्रोदयपर चतुर्थी होने के दिन संकष्ट चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यदि संकष्ट चतुर्थी मंगलवार को हो तो उसे अंगारक योग कहते हैं।
कालाष्टमी - प्रत्येक मास में प्रदोषकाल में रहनेवाली कृष्ण अष्टमी को कालाष्टमी कहते हैं। कालाष्टमी के दिन भैरव स्वरूप शिवजी की उपासना की जाती है।
शिवरात्रि - प्रत्येक मास के कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है।
निशीथकाल में अर्थात् मध्यरात्रि में कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि का व्रत किया जाता है। माघ मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं।
दर्श अमावस्या - अपराह्नकाल में सामान्यतः दोपहर के डेढ़ से चार बजे तक यदि अमावस्या हो तो उसे दर्श अमावस्या कहते हैं। सामान्यतः अपराह्नकाल में ज्यादा समय तक अमावस्या जिस दिन होती है, उस दिन दर्श अमावस्या होती हैं। इस दिन पिता हेतु श्राद्ध किया जाता हैं। यदि अमावस्या सोमवार को हो तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। सोमव अमावस्या के दिन स्नान, दानादि का विशेष महत्त्व हैं।
चैत्र मास (पूर्णिमांत)
चैत्र मास से शालिवाहन शक का प्रारंभ होता है तथा वसंत ऋतु भी प्रारंभ हो जाता है। अतः इस मास को विशेष महत्त्व प्राप्त है। इस चांद्र मास में पूर्णिमा के दिन चंद्र चित्रा नक्षत्र के समीप होने के कारण इसका चैत्र नाम सार्थक है। प्राचीन समय में इसे "मधुमास" भी कहते थे।
धूलिवंदन - होलिका प्रदीपन के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को धूलिवंदन कर होली का उत्सव मनाते है।
गुड़ीपड़वा / संवत्सरारंभ- इस दिन अभ्यंगस्नान, नीम के पत्तों का चूर्ण खाना, वत्सराधिपति (ग्रह) पूजन, पंचांगस्थ गणपति पूजन, वासंतिक देवी नवरात्रि का प्रारंभ, श्रीराम नवरात्रि का प्रारंभ आदि करने हेतु सूर्योदयव्यापिनी प्रतिपदा चाहिए। संवत्सरारंभ का दिन होनेसे यह दिन
शुभ माना जाता है।
अ) अहोरात्र प्रतिपदा हो तो, अहोरात्र के दिन संवत्सरारंभ, गुड़ीपड़वा आदि।
ब) प्रतिपदा का क्षय हो तो, चैत्र अमावस्या (अमांत फाल्गुन) के समाप्ति के बाद गुड़ीपड़वा, नवरात्रि आदि का प्रारंभ करना चाहिए।
अधिक चैत्रमास हो तो - गुड़ीपड़वा, संवत्सरारंभ आदि अधिक चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन करना चाहिए। परंतु श्रीराम नवरात्रि का प्रारंभ, वासंतिक देवी नवरात्रि का आरंभ, गौरी तृतीया (तीज), श्रीराम नवमी, महावीर जयंती, अनंगव्रत, हनुमान जयंती, वैशाख स्नानारंभ आदि निज चैत्र मास में करने चाहिए। चैत्र प्रतिपदा साढ़ेतीन मुहूतों में से एक शुभ दिन है, परंतु मुहूर्तशास्त्रानुसार इस दिन उपनयन, विवाह, वास्तुशांति नहीं कर सकते। अपितु लौकिक गृहप्रवेश, विवाह निश्चय, प्रथम केशखंडन, खरीददारी या बिक्री तथा व्यवसाय आदि का शुभारंभ कर सकते हैं।
गौरी तृतीया - गणगौर (तीज) - इस व्रत हेतु चैत्र शुक्ल तृतीया सूर्योदयव्यापिनी होनी
चाहिए। तृतीया क्षयतिथि हो तो, द्वितीया के दिन तथा अहोरात्र हो तो, अहोरात्र तृतीया के दिन तीज पूजन करना चाहिए। इस दिन गौरी तथा भगवान शंकर का दोलोत्सव करते हैं। गौरी तथा भगवान शंकर को एक माह तक पालने में रखते है, परंतु स्नान, अभिषेक, पूजा हेतु पालने के बाहर निकाल सकते है। किसी कारणवश इस दिन गौरी तथा भगवान शंकर की पूजा करना
संभव नहीं हुआ तो, वैशाख कृष्ण तृतीया अर्थात् दूसरी तीज के दिन से करना चाहिए। इस मास में अक्षय तृतीया तक कभी भी सुहागन महिलाओं को निमंत्रित कर उनका सत्कार करना चाहिए। अक्षय तृतीया के दूसरे दिन गौरी तथा भगवान शंकर को पालने से बाहर निकालकर पूजा घर में रखना चाहिए।
मत्स्यजयंती तृतीया तिथि दोनों ही दिन अपराह्नकाल में कम अधिक हो तो तृतीया के
दिन अथवा दोनों ही दिन अपराह्न में न होनेपर तृतीया के दिन मत्स्यजयंती करनी चाहिए।
हयव्रत यह व्रत पंचमी के दिन होता है। पंचमी ६ घटी से कम हो और चतुर्थी ६ घटी से कम हो तो चतुर्थी के दिन हयव्रत करना चाहिए। परंतु यदि पंचमी ६ घटी से कम हो और चतुर्थी ६ घटी से अधिक हो तो पंचमी के दिन हयव्रत करना चाहिए।
श्री पंचमी चतुर्थी विद्धा चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन श्री पंचमी व्रत करते है।
अशोक कलिका प्राशन - चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा पुनर्वसु नक्षत्र इनका एकत्रित योग हो तो
अशोक कलिका का प्राशन करना चाहिए।
भवानी देवी की उत्पत्ति - नवमी युक्त अष्टमी के दिन तथा अहोरात्र अष्टमी हो तो उर्वरित
अष्टमी के दिन भवानी देवी की पूजा करनी चाहिए।
श्रीराम नवमी - इस दिन प्रभु रामचंद्रजी की जयंती मनाई जाती है। इसके लिए नवमी
मध्याह्नव्यापिनी होनी चाहिए। अगर दोनों ही दिन नवमी मध्याह्नव्यापिनी हो अथवा न हो तो नवमी के दिन ही श्रीराम नवमी मनानी चाहिए। अष्टमीयुक्त नवमी का निषेध है, परंतु यदि नवमीका क्षय हो तो अष्टमी के दिन ही श्रीराम नवमी मनानी चाहिए।
अनंगव्रत- चैत्र शुक्ल द्वादशीयुक्त त्रयोदशी के दिन यह व्रत करना चाहिए। इस हेतु द्वादशी
के दिन सूर्यास्त के पूर्व ६ घटी (२ घंटा २४ मिनट) त्रयोदशी होनी चाहिए। यदि इससे कम समय हो तो त्रयोदशी के दिन अनंगव्रत करना चाहिए।
महावीर जयंती - सूर्योदयव्यापिनी त्रयोदशी के दिन महावीर जयंती मनानी चाहिए। अहोरात्र त्रयोदशी हो तो, उसी दिन मनानी चाहिए परंतु त्रयोदशी का क्षय हो तो, द्वादशी के दिन महावीर जयंती मनानी चाहिए।
वैशाख स्नानारंभ - सूर्योदयव्यापिनी पूर्णिमा लेनी चाहिए। पूर्णिमा अहोरात्र हो तो दूसरे
दिन तथा पूर्णिमा तिथि का क्षय हो तो चतुर्दशी के दिन वैशाख स्नान प्रारंभ करना चाहिए।
हनुमान जयंती - सूर्योदयव्यापिनी पूर्णिमा होनी चाहिए। पूर्णिमा अहोरात्र हो तो उसी दिन तथा यदि पूर्णिमा का क्षय हो तो चतुर्दशी के दिन हनुमान जयंती मनानी चाहिए।
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वैशाख मास (पूर्णिमांत )
इस चांद्र मास में पूर्णिमा के दिन चंद्र विशाखा नक्षत्र के समीप होने के कारण इसे वैशाख यह नाम प्राप्त हुआ है। इस मास को प्राचीन समय में माधव भी कहा जाता था।
दूसरी तीज - वैशाख कृष्ण तृतीया के दिन होती है। गौरी तीज के अनुसार इसका निर्णय करना चाहिए।
श्री चंद्रलादेवी उत्सव - वैशाख कृष्ण पंचमी उदयव्यापिनी होनी चाहिए। अहोरात्र हो तो उसी तिथि को परंतु यदि पंचमी तिथि का क्षय हो तो चतुर्थी के दिन चंद्रलादेवी का उत्सव मनाना चाहिए।
अक्षय तृतीया - युगादि तिथि के अनुसार १३, १४, १५ घटी में तृतीया होनी चाहिए। यदि दोनों ही दिन हो अथवा नहीं हो तब भी तृतीया के दिन अक्षय तृतीया मनानी चाहिए। साढ़ेतीन मुहूर्त में से यह एक शुभ दिन है। इस दिन देव, पितर इनके हेतु की गई पूजा व दान का पुण्यफल अक्षय स्वरूप होता है।
श्रीपरशुराम जयंती- प्रदोष के समय तृतीया होनी चाहिए। दोनों ही दिन प्रदोषकाल में कम या अधिक हो अथवा दोनों ही दिन प्रदोषकाल में तृतीया नहीं हो तब तृतीया के दिन मनानी चाहिए। मात्र केवल द्वितीया के दिन ही प्रदोषकाल में तृतीया हो तो द्वितीया के दिन श्रीपरशुराम जयंती मनानी चाहिए।
तीसरी तीज - गौरी तीज के अनुसार ही इसका निर्णय करना चाहिए। इस दिन गौरी तथा भगवान शंकर की पूजा कर सुहागनों को आमंत्रित कर उनका आदर सत्कार करना चाहिए। सूतक आदि के कारण यदि यह संभव न हो सका तो सूतक समाप्त होनेपर यह कार्य करना चाहिए।
श्रीबसवेश्वर जयंती - अक्षय तृतीया के दिन मनानी चाहिए। (कर्नाटक राज्य में रोहिणी नक्षत्र को प्राधान्य दिया गया है।)
श्री आदिशंकराचार्य जयंती- पंचमी सूर्योदयव्यापिनी होनी चाहिए। अहोरात्र होनेपर अहोरात्र के दिन अथवा पंचमी का क्षय होनेपर चतुर्थी के दिन जयंती मनानी चाहिए।
गंगोत्पत्ति-गंगापूजन (गंगा सप्तमी) - सप्तमी मध्याह्नव्यापिनी होनी चाहिए। दोनों ही दिन मध्याह्नव्यापिनी कम / अधिक हो अथवा दोनों ही दिन मध्याह्नव्यापिनी नहीं हो तब षष्ठी के दिन गंगापूजन संपन्न करना चाहिए। एकदेश व्याप्ति हो तब सप्तमी के दिन गंगापूजन करना चाहिए।
श्रीनृसिंह जयंती - सूर्यास्त के समय चतुर्दशी होनी चाहिए। सूर्यास्त के समय दोनों ही दिन हो अथवा नहीं हो तो चतुर्दशी के दिन नृसिंह जयंती सूर्यास्त के समय ही मनानी चाहिए।
वैशाखस्नान समाप्ति - सूर्योदयव्यापिनी पूर्णिमा के दिन वैशाखस्नान समाप्ति करनी चाहिए। अहोरात्र हो तो उर्वरित पूर्णिमा के दिन (दूसरे दिन) समाप्ति करनी चाहिए। (यदि • वैशाख पुरुषोत्तम मास हो तो निज वैशाख में समाप्ति करनी चाहिए।)
बुद्ध पूर्णिमा- सूर्योदयव्यापिनी पूर्णिमा के दिन बुद्ध पूर्णिमा मनानी चाहिए। यदि पूर्णिमाअहोरात्र हो तो अहोरात्र के दिन तथा पूर्णिमा तिथि का क्षय हो तो चतुर्दशी के दिन बुद्ध पूर्णिमामनानी चाहिए।
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ज्येष्ठ मास (पूर्णिमांत)
ग्रीष्मऋतु का यह प्रथम मास है। इस मास में पूर्णिमा के दिन चंद्र ज्येष्ठा नक्षत्र के समीपहोने के कारण इस मास को ज्येष्ठ यह नाम प्राप्त हुआ है। प्राचीन काल में इसे शुक्र मास नामसे भी जाना जाता था।
शनैश्चर जयंती -ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या मध्याह्रव्यापिनी होनी चाहिए। दोनों ही दिनमध्याह्नव्यापिनी कम या अधिक हो तो अमावस्या के दिन तथा दोनों ही दिन मध्याह्वव्यापिनीनहीं हो तो चतुर्दशी के दिन शनैश्चर जयंती मनानी चाहिए।
वटसावित्री व्रत (अमावस्या पक्ष) - अधिक जानकारी के लिए वटपूर्णिमा व्रत देखें।
भावुका अमावस्या-ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या त्रिमुहूर्तव्यापिनी होनी चाहिए। (परविद्धा होनीचाहिए) अहोरात्र हो तो उसी दिन मनानी चाहिए। प्रतिपदा का क्षय हो तो दर्श के दिन भावुकाअमावस्या का पूजन करना चाहिए।
करिदिन -भावुका अमावस्या से दूसरा दिन करिदिन होता है।
दशहरारंभ - सूर्योदयव्यापिनी प्रतिपदा के दिन, प्रतिपदा अहोरात्र हो तो अहोरात्र के दिनदशहरारंभ, प्रतिपदा का क्षय हो तो अमावस्या के दिन दशहरारंभ करना चाहिए। यदि ज्येष्ठ मासपुरुषोत्तम मास हो तो पुरुषोत्तम मास में ही दशहरारंभ करना चाहिए।
गंगा - दशहरा समाप्ति - पूर्वाह्व्यापिनी दशमी के दिन समाप्ति करनी चाहिए। दोनों हीदिन कम या अधिक पूर्वाह्व्यापिनी हो तो निम्न योगों में से अधिक योग जिस दिन मिलते हैं,उसी दिन दशहरा समाप्ति, गंगावतार, गंगापूजन करना चाहिए। दशयोग १) ज्येष्ठ मास २)शुक्ल पक्ष ३) दशमी ४) बुधवार ५) हस्त नक्षत्र ६) व्यतीपात योग ७) गरज करण ८) कन्याराशिस्थ चंद्र ९) आनंद योग = बुधवार + हस्त नक्षत्र १०) वृषभ राशि में सूर्य होना चाहिए। यदिदोनों ही दिन यह योग समान संख्या में हो तब दशमी का पूर्वार्थ (पूर्वाह्) में होना इसे प्रधानतादी है। इन योगों में दशमी तथा व्यतीपात की प्रधानता हैं।
वटपूर्णिमा / वटसावित्री व्रत - सूर्यास्त के पूर्व ६ घटिका चतुर्दशी से विद्ध होनेवालीपूर्णिमा के दिन वटपूजन करना चाहिए। सूर्यास्त के पूर्व ६ घटिका से चतुर्दशी कम हो तो दूसरेदिन की पूर्णिमा के दिन वटपूजन करना चाहिए। पूजा के समय पूर्णिमा होना आवश्यक नहींहै। चतुर्दशी के दिन वटपूजन करते समय उसी दिन सूर्योदय से मध्याह्न तक अर्थात् सामान्यतःदोपहर डेढ बजे तक किसी भी समय वटपूजन कर सकते है। चतुर्दशी समाप्त होनेपर वटपूजन
करना चाहिए ऐसा नहीं है। तथा यह सुहाग का व्रत होते हुए भी यही पति सात जन्मों तक मिले ऐसा संकल्प नहीं है। सुहाग (सौभाग्य) का अर्थ पति, धन-धान्य, ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्र, आरोग्य इ.ऐसा हैं। वटवृक्ष की पूजा करनी चाहिए इसका अर्थ उस वृक्ष की शाखाएँ तोड़कर उन की पूजानहीं करनी है। वटवृक्ष का चित्र बनाकर अथवा रोली से चित्र बनाकर पूजा की जा सकती है। (पूर्णिमांत ज्येष्ठ अमावस्या के दिन भी वटसावित्री व्रत करते है।) यदि गर्भवती का स्वास्थ्य ठीक हो तब ९वें मास तक वह वटपूजन, मंगलागौरी पूजन, हरितालिका पूजन कर सकती है।
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आषाढ़ मास (पूर्णिमांत)
इस चांद्रमास में पूर्णिमा के समीप चंद्र पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में होता है। इसलिए इस मास को आषाढ़ नाम प्राप्त हुआ है। आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी से चातुर्मास शुरु होता है। इस कारण इस मास का विशेष महत्त्व है। प्राचीन समय में यह शुचि नाम से जाना जाता था।
गुप्त नवरात्र - आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक गुप्त नवरात्र मनाया जाता है।
चातुर्मास का आरंभ - आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार मास की कालावधि को चातुर्मास कहा जाता है। इस में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन इन महिनों में कोई पुरुषोत्तम मास हो तो यह ५ महिनों का हो जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन सेचातुर्मास का प्रारंभ हो जाता है। आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहतेहै। इस दिन से भगवान का शयन शुरु हो जाता है और कार्तिक मास की प्रबोधिनी एकादशीके दिन शयन त्यागकर भगवान जाग जाते है, ऐसी मान्यता है। इस कालावधि में असुर प्रबलहो जाते है, अतः इस कालावधि में व्रत करने चाहिए ऐसा शास्त्र कहता है। यदि धार्मिक भावसे न भी देखें तो प्रकृति के नियमानुसार चारों ही महिनों में वर्षा की प्रबलता रहती है, अतःविविध रोग - बिमारियाँ होने की संभावना अधिक होती है। उन दिनों में पाचनशक्ति भी कमहो जाती है। अतः उपवास व अन्य व्रत करने चाहिए ऐसा धर्मशास्त्र कहता है। असुर का अर्थ रोग अनारोग्य भी होता है । धर्म शास्त्र में आरोग्य और श्रेय की प्राप्ति को ध्यान रखा गया है
इसपर भी ध्यान देना आवश्यक है।
गुरुपूर्णिमा/ व्यासपूजन - सूर्योदय से ६ घटिका पूर्णिमा हो तो उस दिन व्यासपूजन करना चाहिए। ६घटिका से पूर्णिमा कम हो तो चतुर्दशी के दिन गुरुपूर्णिमा / व्यासपूजन करना चाहिए।
कोकिला व्रत का आरंभ - आषाढ़ मास पुरुषोत्तम मास हो तब निज आषाढ़ मास मेंपूर्णिमा के दिन यह व्रत प्रारंभ करना चाहिए तथा श्रावण पूर्णिमा को इस व्रत की समाप्ति करनीचाहिए। बहुत से विद्वानों का मत हैं कि यह व्रत हर वर्ष करना चाहिए। परंतु पुरुषोत्तम आषाढ़मास आनेपर यह व्रत करना शिष्टाचार है। आषाढ़ मास में नवविवाहिता को ससुराल में नहीं रहना चाहिए। क्योंकि वह सासू माँ के लिए अशुभ होता है, लेकीन अब यह विचार कालबाह्म हो गया है। (अधिक विवेचन "विवाहप्रकरण" में देखें)
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श्रावण मास (पूर्णिमांत)
इस मास में पूर्णिमा के समीप चंद्र श्रवण नक्षत्र में होने के कारण इसे श्रावण मास कहते है। इस मास से वर्षा ऋतु का प्रारंभ होता है तथा प्रत्येक दिन कोई ना कोई व्रत तथा त्यौहार होते हैं। अतः इस मास को पवित्र माना जाता है। प्राचीन समय में इसे नभस् कहा जाता था।
दीपपूजन - श्रावण मास की दर्श अमावस्या को दीपपूजन करना चाहिए। इस दिन घरके सभी दीपकों की पूजा करनी चाहिए। दीपक की प्रार्थना कर उसे नमस्कार करना चाहिए।
प्रकाश देनेवाले दीपक के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु यह दीपपूजन है। वर्तमान समय
में हमारे घरपर बिजली से प्रकाशित होनेवाले उपकरणों की भी सफाई करनी चाहिए।
नक्त व्रतारंभ- सूर्यास्त के बाद जिस दिन प्रतिपदा होगी उस दिन इस व्रत का प्रारंभ करनाचाहिए।
स्वर्णगौरीव्रत / हरियालि तीज / मधुश्रवा तीज- श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन यहउत्सव मनाते है। इस दिन झूले झूलने की परंपरा है।
नागपंचमी - श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि तीन मुहूर्तव्यापिनी (६ घटिका) षष्ठी से युक्त होनी
चाहिए, ऐसा सामान्य नियम है। इस दिन नाग को देवतास्वरूप मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए।
नारियेली (श्रावण) पूर्णिमा - पूर्णिमा सायाह्रव्यापिनी होनी चाहिए। दोनों ही दिन
सायाह्नव्यापिनी हो या दोनों ही दिन न हो तब पूर्णिमा के दिन पूजन करना चाहिए।
श्रावणी (उपाकर्म)-श्रावण मास में श्रवण नक्षत्र के दिन किए जानेवाले वैदिक विधि
को श्रावणी अथवा उपाकर्म कहते हैं। श्रवण नक्षत्र लगभग श्रावण पूर्णिमा के दिन आता है।
इस दिन, पंचमी के दिन अथवा हस्त नक्षत्र के दिन ऋग्वेदि उपाकर्म करना चाहिए। श्रावणपूर्णिमा यजर्वेदियों का मुख्यकाल है परंतु पंचमी के दिन भी उपाकर्म कर सकते है। हिरण्यकेशीउपाकर्म हेतु हस्त नक्षत्र और पूर्णिमा यह मुख्यकाल हैं। भाद्रपद मास के हस्त नक्षत्र में सामवेदीउपाकर्म करना चाहिए, यह सर्वसाधारण नियम है। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष नियम भी हैं,उसका धर्मशास्त्र के अनुसार निर्णय करना पड़ता है। उपरोक्त काल रवि संक्रमण, पुण्यकालतथा ग्रहण से दूषित नहीं होना चाहिए।
रक्षाबंधन - पूर्णिमा सूर्योदय से ६ घटि से अधिक हो तो, पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन कात्यौहार मनाना चाहिए। ६ घटी से कम पूर्णिमा हो तो चतुर्दशी के दिन रक्षाबंधन करना चाहिए।(पूर्णिमा भद्रारहित होनी चाहिए।)
मास में दिन के अनुसार व्रत
रविवार - श्रावण मास में प्त्येक रविवार को मौन रहकर गभस्ति नामक सूर्य का पूजनकरना चाहिए।
सोमवार-श्रावण मास में प्त्येक सोमवार को शिवजी का पूजन कर एकभुक्त (एकाष्णा)
रहकर रात्रि को भोजन करना चाहिए। नवविवाहित स्त्री ५ वर्ष तक श्रावण मास के हर
सोमवार को ५ मुठ्ठी भरकर धान्य शिवजी के पिंडीपर अर्पण करें। क्रमशः १) चावल २)
तिल ३) मूँग ४) अलसी तथा पाँचवा सोमवार हो तो सत्तू से शिवमुष्टि भगवान शिव केलिए अर्पण करें।
मंगलवार - श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को ५ वर्ष तक नवविवाहित स्त्री कोमंगलागौरी का व्रत करना चाहिए। श्रावण मास के पहले मंगलवार से व्रत का आरंभकरना चाहिए। पहले मंगलवार के दिन व्यतीपात योग, भद्रा, क्षयदिन, करिदिनआदि कुयोग होनेपर तथा गुरु / शुक्रास्त होनेपर भी मंगलागौरी व्रतारंभ कर सकतेहै। ५ वर्ष पूर्ण होने के पश्चात् व्रत का उद्यापन करना चाहिए। पुराने समय में इसप्रकार व्रत रखना संभव था परंतु वर्तमान समय में नौकरी करनेवाली महिलाओं कीसंख्या में वृद्धि हुई है। अतः इस तरह ५ वर्ष तक व्रत रखना अधिकतर महिलाओं कोसंभव नहीं हो पाता। विवाह के उपरांत पहले वर्ष के श्रावण मास में अपनी सुविधाके अनुसार पूजन, भोजन आदि समारोह किया जाता है। पूजा के समय पंडितजीपंचवर्षात्मक संकल्प करते है, परंतु संकल्प के अनुसार अगले ४ वर्ष तक व्रत करनासंभव नहीं होता है। हर वर्ष प्रत्येक मंगलवार के दिन पूजन करना असंभव होतो, प्रति वर्ष कम से कम एक मंगलवार के दिन अन्नपूर्णदेवी की पूजा करेंतथा पांच वर्षों के उपरांत उद्यापन (उजावणा) हो सकता है। गुरु / शुक्र काअस्त होनेपर उस वर्ष उद्यापन न करें। किसी कारणवश यदि किसी श्रावण मास मेंएक भी मंगलवार के दिन पूजन करना संभव न हुआ हो तो उस वर्ष की गिनती पांचवर्षों में न करे, ऐसी स्थिति में छटे वर्ष पूजन करने के पश्चात् उद्यापन करें। गर्भवतीका स्वास्थ्य ठीक हो तो वह ९वें मास तक मंगलागौरी की पूजा आदि कर सकती है।मंगलागौरी पूजन के दिन यदि एकादशी अथवा संकष्ट चतुर्थी जैसे उपवास व्रत हो तोप्रसाद में उपवास योग्य कोई नैवेद्य बनाकर उसे प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए।बुधवार - श्रावण मास में हर बुधवार के दिन बुध/बृहस्पति का पूजन करना चाहिए।
गुरुवार - श्रावण मास में हर गुरुवार के दिन बुध/बृहस्पति का पूजन करना चाहिए।सदबुद्धि हेतु यह पूजन किया जाता हैं।
शुक्रवार- श्रावण मास में हर शुक्रवार को जिवंतिका माता का पूजन करना चाहिए। यहबाल संरक्षक देवता हैं। मिष्टान्न बनाकर सुहागन को भोजन कराके उनका सत्कार करनाचाहिए। वर्तमान में प्रत्येक शुक्रवार को यह संभव नहीं होता है, अतः किसी एक शुक्रवारको सुहागन को भोजन हेतु आमंत्रितकर तथा उनका आदर-सत्कार कर सकते हैं। यदिकिसी कारण से दूसरे गाँव जाना पड़े तो जिबंतिका माता की फोटो साथ लेकर जानाचाहिए तथा जहाँ निवास हो वहीं पूजन कर सकते हैं और विसर्जन भी हो सकता हैं।वरदलक्ष्मी ब्रत - श्रावण मास में शुक्लपक्ष के आखरी शुक्रवार के दिन यह व्रत कियाजाता हैं।
शनिवार- श्रावण मास में प्रत्येक शनिवार को अपनी कुल परंपरा के अनुसार शनिदेव,हनुमानजी तथा नरसिंह का पूजन किया जाता है।
भाद्रपद मास (पूर्णिमांत)
इस मास में पूर्णिमा के समीप चंद्र पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र में होता है, इस कारण इसे भाद्रपदमास कहते है। इसी मास में गौरी तथा गणेशजी का उत्सव मनाया जाता हैं। प्राचीन समय में इसमास को नभस्य भी कहा जाता था।
श्रीकृष्ण जयंती - भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी मध्यरात्रि में हो तो, उस दिनश्रीकृष्ण जयंती मनाई जाती है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव संपूर्ण भारतवर्ष में धूमधाम से मनायाजाता है। (वैष्णव संप्रदाय में सूर्योदयव्यापिनी अष्टमी के दिन श्रीकृष्ण जयंती मनाते है।)
गोपालकाला (नंदोत्सव)-श्रीकृष्ण जयंती के दूसरे दिन, श्रीकृष्ण को प्रिय दही-माखनयुक्तव्यंजन बनाया जाता है। उसे मटकी में रखा जाता है और उस मटकी को फोड़कर प्रसाद वितरितकिया जाता है। इसी दिन गोगा नवमी मनाते है।
पिठोरी अमावस्या - भाद्रपद अमावस्या प्रदोषकालव्यापिनी होनी चाहिए। उस दिन पिठोरीका व्रत किया जाता है।
वृषभ पूजन - भाद्रपद अमावस्या के दिन बैलों की पूजा की जाती है। उनके प्रति कृतज्ञतादर्शाई जाती है तथा बैलों को पंच पक्वान खिलाये जाते हैं। कहीं-कहीं इस दिन बैलों कीशोभायात्रा भी निकाली जाती है।
हरितालिका तृतीया - भाद्रपद शुक्ल तृतीया उदयव्यापिनी होनी चाहिए। अहोरात्र हो तोउर्वरित तृतीया के दिन हरितालिका व्रत करना चाहिए। इस दिन सखी सहित पार्वती (उमा) औरभगवान शिव का पूजन करना चाहिए। 'अच्छा पति मिले' ऐसी कामना से यह व्रत किया जाताहै। यह सौभाग्यव्रत होने के कारण विवाहित स्त्री को भी यह व्रत रखना चाहिए। सूर्योदय से
मध्याह्नकाल तक अर्थात् सामान्यतः डेढ़ बजे तक किसी भी समय पूजन कर सकते है। पूजन
के समय तृतीया तिथि होने की आवश्यकता नहीं है।
श्रीगणेश चतुर्थी - चतुर्थी तिथि मध्याह्वव्यापिनी होनी चाहिए (विनायक चतुर्थी की तरह)।
इस मास में पार्थिव गणेश स्थापना और पूजन करने हेतु विशिष्ट मुहूर्त की आवश्यकता नहीं
है। इस हेतु विशेष नक्षत्र, योग, विष्टि करण आदि वर्ज्य नहीं हैं, अतः उसे देखने की भी
आवश्यकता नहीं है। प्रातःकाल से मध्याह्न समाप्ति तक अर्थात् सामान्यतः दोपहर डेढ़ बजे
तक गणेशजी की स्थापना की जा सकती है।
घर में पूजा के हेतु मूर्ति आसनस्थ तथा ऊंचाई में ज्यादा से ज्यादा ६ से ८ इंच तक होनी
चाहिए। दाहिनी ओर शुण्डवाले गणेशजी तेज (कड़क) तथा बाई ओर वाले सीधे-साधे ऐसाकुछ भी नहीं है। पार्थिव गणेश स्थापना करने के लिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी यह एक ही दिन
है। अतः उस दिन स्थापना करना संभव नहीं हुआ तो बाद में किसी भी दिन स्थापना नहीं करनी
चाहिए। मानो एक वर्ष स्थापना नहीं कर पाए तो अगले वर्ष से पुनः कर सकते है। दुकान से
मूर्ति कभी-भी अर्थात् सामान्यतः ८/१५ दिन पहले भी लाकर घर में रख सकते है। एक दिन
पूर्व अथवा पूजा के दिन ही लाना आवश्यक नहीं है। हरितालिका व्रत और श्रीगणेश स्थापना
एक ही दिन होनेपर उनमें से कोई भी पूजन पहले या बाद में कर सकते है। तृतीया समाप्त होनेके बाद ही गणपति की पूजा करनी चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है, तृतीया समाप्त होने के
पूर्व हरितालिका पूजन करना चाहिए ऐसा भी कोई नियम नहीं है। यदि गणपति पूजन दस दिनतक करना संभव नहीं हो तो पूजन के दिनों में कमी की जा सकती हैं। जैसे डेढ़ दिन, पांच दिन
या सात दिनों तक गणपति पूजनकर विसर्जन कर सकते है। गौरी विसर्जन के साथ गणपति
विसर्जन की परंपरा यदि किसी परिवार में हो तो गणेश विसर्जन हेतु दिनों की संख्या कम या
अधिक भी हो सकती हैं। तथा किसी भी दिन विसर्जन कर सकते हैं अर्थात् कोई भी वार वर्जित
नहीं है। घर में गर्भवती हो तो भी गणपति विसर्जन कर सकते है। ऐसे समय विसर्जन नकरना यह गलत धारणा समाज में है।
प्रवाहित जल में विसर्जन करना चाहिए ऐसा कोई भी नियम नहीं है, मात्र विसर्जन होनामहत्त्वपूर्ण है। इस कारण तालाब में अथवा टैंक में अथवा घर में बड़ी बाल्टी में पानी भरकरविसर्जन कर सकते है। विसर्जन के पश्चात् वह मूर्ति पानी में डूबकर घुल जानी चाहिए, अतःमिट्टी की मूर्ति होना आवश्यक है। प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति पानी में नहीं घुलती है। जोपदार्थ पानी में नहीं घुलता, उस पदार्थ की मूर्ति नहीं होनी चाहिए। उत्सव मनाते समय किसी भीधातू की बड़ी मूर्ति को उत्सव मूर्ति के रूप में रखना चाहते है, तो मिट्टी की छोटी मूर्ति भी लाकरउसकी प्राणप्रतिष्ठा कर उसका पूजन करना चाहिए। मिट्टी की मूर्ति का ही पानी में विसर्जनकरना चाहिए तथा धातू की मूर्ति गणेश विसर्जन के पश्चात् वापस घर में रख देनी चाहिए।
गणेश चतुर्थी के पूर्व सूतक या वृद्धि समाप्ति न हो रही हो, तो उस वर्ष गणपति की स्थापनानहीं करनी चाहिए। परंतु यदि गणेश स्थापना के बाद ऐसी घटना घटती हैं तब त्वरित दूसरे व्यक्तिसे गणेश विसर्जन करवाना चाहिए। ऐसे समय उत्सव के दिन कम भी हो जाए तो दोष नहीं होताहै। उत्सव के दिनों में यदि किसी कारणवश गणेशजी की मूर्ति खंडित अथवा भंग होती है तो
उसका तुरंत ही विसर्जन कर देना चाहिए। उसके पश्चात् नई मूर्ति लाकर पूजन नहीं करना चाहिए।
ऋषिपंचमी - पंचमी तिथि मध्याह्व्यापिनी होनी चाहिए। दोनों ही दिन मध्याह्रव्यापिनी हो यान हो तो पूर्व के दिन ऋषिपंचमी का व्रत रखना चाहिए। पूर्ण व्याप्ति हो तो उसी दिन व्रत करनाचाहिए। रजस्वला स्त्री के स्पृशास्पृश दोष के निवारण हेतु महिलाएँ यह व्रत रखती हैं, तथा अन्यदोषों के परिहारार्थ स्त्री तथा पुरुष दोनों भी व्रत रखते हैं। इस व्रत में सप्तर्षि तथा अरुथति का
पूजन किया जाता हैं। इस दिन व्रत रखनेवालों को हल चलाकर बोए हुए थान्य नहीं खाने चाहिए।
जैन संवत्सरी-मध्याह्नकालव्यापिनी भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन जैनसंवत्सरी मनाई
जाती है। इस में चतुर्थी पक्ष तथा पंचमी पक्ष ऐसे दो प्रकार हैं।
राधाष्टमी-मध्याह्नकालव्यापिनी अष्टमी के दिन राधाष्टमी मनायी जाती है।
गौरी (महालक्ष्मी) पूजन -भाद्रपद मास में अनुराधा नक्षत्र में गौरी का आवाहन किया जाता
है। ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन किया जाता है और मूल नक्षत्र में विसर्जन किया जाता है। कुछ प्रदेशों मेंसप्तमी के दिन आवाहन, अष्टमी के दिन गौरी पूजन तथा नवमी के दिन विसर्जन किया जाता है।शाडू नामक मिट्टी अथवा पीतल से बने हुए देवी के दो मुखौटे मटकी अथवा कलश के ऊपर रखकर उनका पूजन किया जाता हैं। कहीं कहीं पांच कंकड़ कटोरी में रखकर भी पूजन करते हैं।श्रावण मास के शुक्रवार को अधिकांश घरों में महालक्ष्मी देवी की स्थापना की जाती है। वहींलक्ष्मी व भाद्रपद मास में अनुराधा नक्षत्र के दिन स्थापित गौरी इन्ही को ज्येष्ठा एवं कनिष्ठा नामसे संबोधित किया जाता हैं। कहीं-कहीं भाद्रपद मास में ज्येष्ठा और कनिष्ठा लक्ष्मी को भगिनीस्वरूप मानकर देवीयों की पूजा की जाती है। वह १६ दिनों तक करनी होती हैं तथा रोज पूजाके समय मौली का एक धागा पूजा में लिया जाता है। परंतु वर्तमान समय में ज्येष्ठा नक्षत्रपर १६दिनों का प्रतीक मानकर मौली के धागे को १६ गांठे लगाई जाती हैं तथा अंतिम दिन कलाई में
बांधते है। इस देवी की पूजा-अर्चना, कुलधर्म, कुलाचार इसमें विविधता पाई जाती है।परिवार में किसी की मृत्यु हो गई हो तथा प्रथम वर्ष श्राद्ध नहीं हुआ हो, तो भी भाद्रपद मास में गणेशजी तथा महालक्ष्मी का पूजन परंपरा के अनुसार कर सकते है, परंतु साज-सज्जा, बहुत से पकवान न बनाते हुए सादगीपूर्ण तरीके से मनाना चाहिए।
वर्तमान में एकल परिवार होने से तथा वृद्धावस्था के कारण बड़े पैमानेपर उत्सव मनाना संभव नहीं होता है अतः देवी के मुखौटे कलशपर रखकर पूजन करना चाहिए। ऐसे में अधिक प रापा मासवार ताज त्योहार
मिष्टान्न बनाने की आवश्यकता नहीं है। भोग चढ़ाने हेतु सीमित मात्रा में प्रसाद बनाना चाहिए।
नूतनविवाह होनेपर नववधु के मायके से देवी का मुखौटा या उनके हाथ लाना अनिवार्य नहीं
है, घर के मुखिया को ही यह सब व्यवस्था करनी चाहिए।
सूतक/ वृद्धि के कारण यदि भाद्रपद मास में देवी का पूजन नहीं कर सके, तो आश्विन मास
के नवरात्रि में करना चाहिए ऐसा शास्त्र में कोई विधान नहीं है। अतः यह पूजन आश्विन मास मेंनहीं करना चाहिए।
गौरीपूजन के दिन सूतक/वृद्धि समाप्त हो रही हो तो किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा गौरी काआवाहन करना चाहिए, क्योंकि गौरीपूजन महत्त्वपूर्ण है, आवाहन के पश्चात् पूजन व विसर्जनस्वयं कर सकते है। गौरी के आगमन के उपरांत यदि सूतक/ वृद्धि आती है तो पूजन, विसर्जनदूसरों के द्वारा संपन्न कराना चाहिए। ऐसे समय घर की पूजा सामग्री उपयोग में नहीं लेनीचाहिए। गौरी विसर्जन मूल नक्षत्रपर करना आवश्यक होने के कारण उस दिन की तिथि तथावार का विचार अनावश्यक हैं। कुछ परिवारों में मंगलवार, बुधवार तथा शुक्रवार को गौरीजी काविसर्जन नहीं करते है, परंतु इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं है।
गौरी माता को लगाया गया भोग दिनभर उसके सामने रखकर दूसरे दिन उसे ग्रहण करनाउचित नहीं है। क्योंकि भगवान को भोग चढ़ाते ही वे उसे ग्रहण करते है, ऐसी मान्यता है। अतःशीघ्र ही भोग का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। गौरी विसर्जन की कालावधि अतिशीघ्र अर्थात्प्रातःकाल में हो तो विसर्जन मंत्र से उपरोक्त कालावधि में ही विसर्जन करें तथा समयावकाशया परंपरानुसार सायंकाल में जलाशय में विसर्जन करें, यह शास्त्र सम्मत है।
अनंत चतुर्दशी - उदयव्यापिनी दो मुहूर्ताधिक चतुर्दशी के दिन यह व्रत करना चाहिए।चतुर्दशी दो मुहूर्त से कम हो तो त्रयोदशी के दिन तथा अहोरात्र चतुर्दशी हो तो अहोरात्र के दिनही यह व्रत करना चाहिए।
यह काम्यव्रत है। अपना गत वैभव पुनः प्राप्त हो इस हेतु यह व्रत १४ वर्षों तक करते है। कुछलोग १४ वर्ष पश्चात् इसका उद्यापन करते है तथा कहीं-कहीं इसे कुलाचार मानकर अखंडता सेकरते है। इस व्रत में अनंत, शेष और यमुना आदि का पूजन किया जाता हैं तथा गले में मौलीधारण करते है। यह व्रत भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था।
लोकमान्य टिळकजी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व अनंत चतुर्दशी तक गणेश उत्सव कोसार्वजनिक रूप से मनाना प्रारंभ किया था। जिसके माध्यम से लोकजागरण होना निहित थापरंतु वर्तमान में इसे उत्सव का स्वरूप आ गया है। वास्तव में अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत पूजा/व्रत किया जाता है।
आश्चिन मास (पूर्णिमांत)
शरद ऋतु का यह प्रथम मास है। इस मास के पूर्णिमा के समीप चंद्र अश्विनी नक्षत्र में ोने के
कारण इसे आश्विन मास कहते है। कृष्ण पक्ष में पितरों का श्राद्ध होता है, इस कारण इस पक्ष
को पितृपक्ष कहा जाता है। इसी मास में देवी का नवरात्र, दशहरा, शरद पूर्णिमा आदि होने से
इस मास का विशेष महत्त्व है। प्राचीन समय में इस मास को ईष भी कहा जाता था।
पितृपक्ष /महालय श्राद्ध
प्रति सांवत्सरिक श्राद्ध अर्थात् प्रति वर्ष किया जानेवाला श्राद्ध। एक मृत व्यक्ति के त्रयी कोउद्देश्य से यह श्राद्ध किया जाता है। यह श्राद्ध माता के लिए (श्राद्ध तिथि को) मातृत्रयी लेकरस्वतंत्र रूप से किया जाता हैं तथा पिता के लिए (श्राद्ध तिथि को) पितृत्रयी लेकर स्वतंत्न रूप सेकिया जाता है। परंतु आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में किया जानेवाला महालय श्राद्ध यह पिताजीका प्रथम वर्षश्राद्ध होने के पश्चात् अपने मृत सगे संबंधीयों के हेतु किया जाता है। अतः अपनेसंबंधित पितरों के नाम, गोत्र इनकी एक सूची बनाकर रखनी चाहिए। वह इस तरह है...
१) पितृत्रयी (पिता, दादा, परदादा) २) मातृत्रयी (माँ, दादी, परदादी) ३) सौतेली माँ (सगीमाँ जीवित हो तो सौतेली माँ का एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिए, मातृत्रयी नहीं लेनी चाहिए।) ४)मातामह त्रयी (माँ के पिता, माँ के दादा व माँ के परदादा) ५) मातामही त्रयी (माँ की माँ, माँ कीदादी तथा माँ की परदादी) ६) पत्नी ७) विवाहित कन्या ८) ताऊ / चाचा ९) मामा १०) भाई
११) पुत्र १२) बुआ १३) मौसी १४) बहन १५) श्वसुर १६) गुरु १७) शिष्य १८) आप्त / अन्यसंबंधी (उपरोक्त रिश्तेदारों को छोड़कर सपिंड के अन्य, मित्र, उपकारकर्ता आदि मृत व्यक्तिइन्हें आप्त में समाविष्ट किया जाता है।)
इन सब के हेतु पिंडदान करना होता है। इसमें मृतक की पत्नी की मृत्यु हो चुकी है ऐसेपुरुष के नाम के साथ सपत्निक ऐसा बोलना चाहिए तथा जिस मृत स्त्री के पति की मृत्यु हुईहो उस स्त्री के नाम के साथ सभर्तृक कहना चाहिए। बुवा, मौसी तथा बहन जीवित होनेपर यदिउनके पति की मृत्यु हुई हो, तो उनका महालय श्राद्ध में नामोल्लेख नहीं करना चाहिए तथाचाचा, मामा, भाई, पुत्र जीवित है परंतु उनके पत्नी की मृत्यु हो गई हो तो भी उनका नामोल्लेखमहालय श्राद्ध में नहीं करना चाहिए।
पितृपक्ष में किया जानेवाला महालय श्राद्ध प्रतिपदा से अमावस्या तक हर दिन करना होताहै, परंतु यह संभव न हो तो पिता की तिथिपर करना चाहिए। यह भी संभव न हो सका तोचतुर्दशी को छोड़कर अन्य किसी भी तिथिपर कर सकते है। संपूर्ण पितृपक्ष में महालय श्राद्धकरना संभव न हो सका तो सूर्य तुला राशि में हो ऐसे कालावधि में (वर्तमान में १६/१७ नवम्बरतक) किसी भी दिन कर सकते है, परंतु पुरुषोत्तम आश्विन मास वर्ज्यकर उर्वरित गौणकाल मेंयह महालय श्राद्ध कर सकते है।
इस महालय श्राद्ध में अपने सगे-संबंधीयों के सभी मृत व्यक्तियों का स्मरण तथा कृतंज्ञता
व्यक्त की जाती है। जिससे कर्ता को लौकिक व पारलीकिक फल प्राप्त होता है।
सुहागन की मृत्युहुई हो तो नवमी के दिन अविधवा नवमी (सौभाग्यवती) श्राद्ध करना चाहिए।
पिता जीवित हो तब तक पुत्रको (पुत्र ना हो तब पति) अविधवा नवमी का श्राद्ध करना चाहिए,परंतु पिता की मृत्यु के बाद उनका वर्षश्राद्ध होने के पश्चात् अविधवा नवमी का श्राद्ध बंद करनाचाहिए। (पिता का महालय श्राद्ध प्रारंभ होने के कारण माता का महालय स्वतंत्ररूप से करने कीआवश्यकता नहीं है, पिता के महालय में माता का भी समावेश होता है।) पूर्णिमा का महालयपितृपक्ष में भरणीश्राद्ध, व्यतीपात योग, अष्टमी श्राद्ध, द्वादशी श्राद्ध अथवा सर्वपित्रि श्राद्धइनमें से किसी एक दिन करना चाहिए। पूर्णिमा का महालय पूर्णिमा के दिन नहीं करना चाहिए।अविधवा नवमी, शस्त्रादिहत पितृ श्राद्ध, मातामह श्राद्ध, संन्यासियों का महालय पितृपक्ष में नहींहो पाया तो गौणकाल में महालय समाप्ति तक (वर्तमान में १६/१७ नवम्बर तक) कर सकते है।
शस्त्र अथवा दुर्घटना के कारण मृत्यु हुई हो तो महालय श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए।
एक वर्ष समाप्त होनेपर अर्थात् वर्षश्राद्ध होने के उपरांत आनेवाले पितृपक्ष में महालय,अविधवा नवमी करनी चाहिए। पितृपक्ष में पितरों हेतु श्राद्धकर्म करना चाहिए ऐसा धर्मशास्त्रकहता है, परंतु इसका अर्थ कदापि यह नहीं हैं कि अन्य कार्य, नए व्यवहार, वाहन खरीदना,खेती के काम आदि नहीं करने चाहिए। श्राद्ध कर्म करना अशुभ काम है ऐसा मानना गलतहै। हर वर्ष का सावंत्सरिक श्राद्ध व पितृपक्ष का महालय श्राद्ध एक ही दिन करना हो तोसांवत्सरिक श्राद्ध करने के पश्चात् महालय श्राद्ध सपिंडक करना चाहिए अथवा महालय श्राद्धबाद में गौणकाल में भी कर सकते है। परिवार में किसी की मृत्यु के पश्चात् भी परिवार के
अन्य व्यक्तियों का प्रतिवर्ष किया जानेवाला प्रतिसांवत्सरिक तथा महालय श्राद्ध करना चाहिए।
अधिक/ पुरुषोत्तम मास में महालय श्राद्ध नहीं करना चाहिए।
भरणी श्रद्ध - पितृपक्ष में भरणी नक्षत्र में किए गए श्राद्ध का पुण्यफल मिले इस उद्देश्यसे माँ/पिताजी हेतु भरणी श्राद्ध किया जाता है। वस्तुतः प्रथम वार्षिक श्राद्ध के उपरांत भरणीश्राद्ध करना उचित है, परंतु प्रथम वर्ष में भी भरणी श्राद्ध कर सकते है ऐसे वचन होने के कारणभरणीश्राद्ध प्रथमवर्ष में भी किया जाता है। पितृपक्ष में उस दिन भरणी श्राद्ध नहीं कर पाए तो
आगामी वर्ष में करना चाहिए। (भरणी श्राद्ध के लिए गौणकाल वर्ज्य है।)
शस्त्रादिहत पितृश्राद्ध - महालय पक्ष में चतुर्दशी श्राद्ध के दिन शस्त्रादिहत पितृश्राद्ध
किया जाता है। (उस दिन चतुर्दशी का महालय श्राद्ध न करें।) शस्त्रादिहत अर्थात् शस्त्राघात से
मृत, अपघात के कारण, आत्मघात अथवा किसी भी अनैसर्गिक कारण से मृत हुए स्त्री अथवा
पुरुष का चतुर्दशी के दिन शस्त्रादिहत एकोद्दष्ट महालय श्राद्ध करें। उनकी मृत्यु तिथि के दिन
महालय श्राद्ध भी पार्वण सहित करना चाहिए। सुहागन की मृत्यु हुई हो तो अविधवा नवमी(सीभाग्यवती) श्राद्ध करना चाहिए, परंतु पति की मृत्यु के बाद उनका वर्षश्राद्ध होने के पश्चात्अविधवा नवमी का श्राद्ध बंद करना चाहिए, मात्र शस्त्रादिहत श्राद्ध करें।
नवरात्रारंभ/घटस्थापना - आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को देवी का शारदीय नवरात्रि उत्सवप्रारंभ होता है। सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो तो नवरात्रि का प्रारंभ करना चाहिए। प्रतिपदा काक्षय हो तो अमावस्या समाप्ति के बाद नवरात्र का प्रारंभ करना चाहिए, यह साधारण नियम है।
सामान्यतः नवरात्रि के ९ दिन होते हैं, परंतु तिथि के क्षय अथवा वृद्धि के कारण कभी८-१० दिन हो जाते हैं। नवरात्रि में देवी को रोज एक माला अर्पण करनी चाहिए। जितने दिन
की नवरात्रि हो उतनी मालाएँ अर्पण करनी चाहिए, परंतु तिथि का क्षय हो तो एक ही दिन दोमालाएँ अर्पण नहीं करनी चाहिए।
नवरात्रि प्रारंभ होने के पूर्व सूतक / वृद्धि आ जाए तथा नवरात्रि के दिन स्थापना करनासंभव न हो, तो सूतक/वृद्धि समाप्त होने के उपरांत सप्तरात्रोत्सवारंभ, पंचरात्रोत्सवारंभ,त्रिरात्रोत्सवारंभ या एकरात्रोत्सवारंभ ऐसा पंचांग में दिए अनुसार निर्दिष्ट दिन से उर्वरित दिनोंका नवरात्र करना चाहिए।
नवरात्र प्रारंभ होने के बाद यदि सूतक / वृद्धि आ जाए तो किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा पूजा
करवानी चाहिए, यदि रोज पूजा करने हेतु कोई नहीं मिले तो केवल अंतिम दिन पूजा कर
नवरात्र का उत्थापन कर सकते है। नवरात्रि में देवी की मूर्ति की स्थापना कर अलग से पूजा की
जाती है। कहीं-कहीं देवी की पूजा तो की जाती है परंतु घर के मंदिर में विराजित अन्य
देवताओं / विग्रहों की पूजा नहीं की जाती, ऐसा करना ठीक नहीं है। ऐसे समय सभीविग्रहों की हर दिन पूजा करनी चाहिए।
ललिता पंचमी - अपराह्न समय में आश्विन शुक्ल पंचमी हो तब ललिता देवी की पूजा की
जाती है। इस पूजा में गंध-अक्षतयुक्त ४८ दूर्वा देवी को अर्पण करते हैं।
श्रीसरस्वती पूजन - नवरात्रि में श्रीसरस्वती देवी का आवाहन, पूजन, विसर्जन का विधानभी है। इसमें पुस्तक, ग्रंथ आदि की पूजा की जाती हैं।
महालक्ष्मी पूजन - मध्यरात्रि में अष्ट्मी हो तब महालक्ष्मी का पूजनकर रात्रि में देवी के
सामने घड़ा लेकर उसमें फूंकते है। यह रात्रि में जागरण प्रधान पूजन है।
चित्त्पावन ब्राह्मण समुदाय में यह पूजन नववधु पांच वर्ष तक करती है। सुबह में देवी का
पूजन किया जाता है तथा प्रदोष समय में चावल के आटे को उबालकर गाढ़ा किया जाता है।
उससे देवी माँ का मुखौटा बनाकर उसकी पूजा की जाती है और देर रात में उसका विसर्जनकिया जाता है।
महाष्ट्मी उपवास- सूर्योदय के पश्चात् १ घटी से अधिक होनेवाली अष्टमी के दिन महाष्ट्मीका उपवास करना चाहिए।
विजया दशमी-अपराह्रकाल में होनेवाली दशमी के दिन विजयादशमी निमित्त पूजा कीजाती है। अपराह्नकाल में दशमी तथा श्रवण नक्षत्र का होना विशेष माना जाता है। यह साढ़ेतीनमहूर्त में से एक शुभ दिन है। इस मुहूर्तपर नूतनकार्य आरंभ करना, वाहन, जमीन आदि कीखरीददारी की जाती हैं। इस दिन के ग्यारहवें मुहूर्त को विजय मुहूर्त की संज्ञा दी गई है।
कोजागरी पूर्णिमा / शरद पूर्णिमा-आश्विन मास में मध्यरात्रि में पूर्णिमा हो तो उसेकोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। कुछ प्रदेशों में प्रदोषकाल में पूर्णिमा के दिन कोजागरी पूर्णिमामनाई जाती है। इस दिन रात्रि के समय भगवान इन्द्र और लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है। चंद्रमाको दूध का भोग लगाया जाता है और वह केशरयुक्त दूध प्राशन किया जाता है। ऐसी मान्यताहै कि उस दिन मध्यरात्रि में देवी लक्ष्मीजी व भगवान इन्द्र चंद्रलोक से पृथ्वीपर पधारते हैं तथाउनकी पूजाकर जागरण करनेवालों को वे धनधान्य, संपत्ति आदि प्रदान करते हैं।
सूर्योदय के समय पूर्णिमा होनेपर उस दिन ज्येष्ठ पुत्र / कन्या की आरती उतारी जाती है तथाउन्हें दीर्घायु व स्वास्थ्य प्राप्त हो ऐसी कामना की जाती है। वर्तमान में ज्येष्ठ पुत्र / कन्या के साथअन्य बालकों की भी आरती उतारी जाती है।
कार्तिकस्नान आरंभ - सूर्योदय के समय पूर्णिमा हो तब कार्तिकस्नान का आरंभ करतेहै, परंतु दोनों दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि हो तो, अहोरात्र के दूसरे दिन कार्तिकस्नानप्रारंभ करना चाहिए।
कार्तिक मास (पूर्णिमांत)
इस मास में पूर्णिमा के समीप चंद्र कृत्तिका नक्षत्र में होने के कारण इस मास को कार्तिकमास कहते है। इस मास की शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत् का प्रारंभ होता है। इसी मास मेंदिवाली का पड़वा, भाईदूज, चातुर्मास समाप्ति के कारण इस मास को विशेष महत्त्व प्राप्त है।प्राचीन समय में इसी को उर्ज नाम से भी जाना जाता था।
गुरुद्वादशी - उदयव्यापिनी कार्तिक कृष्ण द्वादशी को गुरुद्वादशी कहा जाता है। इस दिनभगवान दत्तात्रेय के अवतार श्रीपाद श्रीवल्लभ का पुण्यस्मरण किया जाता है।
गोवत्सद्वादशी (वसुबारस) - प्रदोषव्यापिनी कार्तिक कृष्ण द्वादशी को वसुबारस पर्वमनाया जाता है। प्राचीन समय में घर-घर में गोधन होता था, गोधन ऐश्वर्य का प्रतीक था। इसगोधन रूपी लक्ष्मीजी की पूजा सायंकाल में संपन्न करते है। महिलाएँ इस दिन उपवास रखतीहै तथा संध्याकाल में सवत्स धेनू की पूजा करती है।
थनतेरस / धनत्रयोदशी-प्रदोषकाल रहते हुए कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन सुवर्ण,अलंकार, गहनों की पूजा की जाती है। इस दिन सायंकाल में दीपक लगाकर उसकी ज्योतिदक्षिण की ओर रखनी चाहिए तथा अकालमृत्यु ना आए इस हेतु दीपक को प्रणामकर निम्नलिखित मंत्र पढकर प्रार्थना करनी चाहिए।
मृत्यूना पाशदंडाभ्यां कालेनः श्यामयासह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम।
इसी दिन आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वंतरी की जयंती मनाई जाती है। दीर्घायु तथाआरोग्य प्राप्त हो इसलिए धन्वंतरी की पूजा तथा प्रार्थना की जाती हैं।
नरकचतुर्दशी - इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वधकर हजारों महिलाओं कोउसके बंदिवास से मुक्त किया था। नरकासुर ने भगवान से वर प्राप्त किया कि, जो व्यक्ति इसदिन प्रातःकाल में अर्थात् चंद्रोदय के समय अभ्यंगस्नान करेगा उसे नरक की पीड़ा नहीं होगी।इस कारण नरक चतुर्दशी के दिन चंद्रोदय के समय स्नान करने का विशेष महत्त्व है। अकालमृत्युना हो इसलिए यमराज के १४ नामों से पानी में तिल मिलाकर तर्पण करना चाहिए। यदि पिताजीवित हो तो पानी में चावल मिलाने चाहिए। निम्नलिखित नामों से यमतर्पण करना चाहिए।
१) यमं तर्पयामि ૨) धर्मराजं ३) मृत्युं ૪) अंतकं ५) वैवस्वतं ६) कालं ७) सर्वभूत क्षयकरं ૮)औदुंबरं ९) दध्नं १०) नीलं ११) परमेष्ठीनं १२) वृकोदर १३) चित्र १४) चित्रगुप्तं तर्पयामि। इननामों से तर्पण करने के पश्चात् दक्षिण दिशा की ओर मुखकर निम्न श्लोक का दस बार जप करयमराज की प्रार्थना करनी चाहिए।
यमोनिहंता पितृधर्मराजो वैवस्वतो दंडधरश्च कालः।भूताथिपोऽदत्त कृतानुसारि कृतांत एतत् दशभिर्जपंति।।
दीपावली / लक्ष्मीपूजन - कार्तिक मास की अमावस्या को सायंकाल में घर-घर में लक्ष्मीजीव कुबेर की पूजा की जाती है। इस पूजन में सिक्के, लक्ष्मीजी की प्रतिमा और कुबेर के रूपमें सुपारी का मुख्य रूप से पूजन किया जाता है। इसी तरह व्यापारी वर्ग भी अपनी दुकान मेंलक्ष्मीपूजन करते है तथा व्यवसाय में वृद्धि हेतु श्रीलक्ष्मीजी से प्रार्थना करते है।
बलिप्रतिपदा - कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा उदयव्यापिनी होनी चाहिए। प्रतिपदा का क्षय होतो अमावस्या के दिन तथा अहोरात्र होनेपर अहोरात्र के दिन यह त्यौहार मनाया जाता है।साढेतीन मुहूतों में से यह एक मुहूर्त माना जाता है। इसी दिन विक्रम संवत् प्रारंभ हुआ था। इसदिन व्यापारी वर्ग अपने दुकान तथा वही-खातों की पूजा करते है। इस दिन गोवर्धन पूजा तथाअन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इस दिन पत्नी अपने पति की आरती उतारती है, यहपरंपरा अनेक प्रदेशों में है।
तीज लौहार
भाईदूज (धमद्वितीया) • अपराह्न समय में कार्तिक शुक्ल द्वितीया हो तब भाईदूज का सोहार मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि, इस दिन यमराज अपनी बहन के घर भोजन हेतु थे अतः इसे यमद्वितीया भी कहते है। इस दिन बहन के हाथों से बनाया भोजन खाकर • उसका आदर सत्कार करते है। अकालमृत्यु न हो इसलिए इस दिन भी यमतर्पण किया जाता है। (इस संबंध में विशेष जानकारी नरक चतुर्दशी में दी गई है।)
पांडव पंचमी / कड़ पंचमी / ज्ञान पंचमी - सूर्योदय के समय शुक्ल पंचमी हो तो उस दिन पांडव पंचमी मनानी चाहिए। पंचमी दोनों दिन सूर्योदय के समय हो तो अहोरात्र के दिन पांडव पंचमी मनानी चाहिए।
सूर्यषष्ठी (छठ) - कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्यषडी मनायी जाती है। इसी दिन बिहार में छठ पूजा की जाती है।
कूष्मांड / अक्षय नवमी - पूर्वाह्नव्यापिनी नवमी के दिन कूष्मांड यानि कोहड़ा (कुम्हड़ा, भतुआ) दान करना चाहिए। इस ऋतु में कुम्हड़े की बर्फी (पेठा) खाना आरोग्यदायी रहता है।
चातुर्मास समाप्ति - आषाढ़ शुक्ल एकादशी को प्रारंभ हुए चातुर्मास की समाप्ति कार्तिक शुक्ल एकादशी को हो जाती है। चातुर्मास में किए हुए व्रतों का उद्यापन चातुर्मास समाप्ति के बाद करना चाहिए।
तुलसी विवाह - प्रबोधिनी एकादशी को भगवान शयन त्यागकर जाग जाते है। अतः इस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते है। इस एकादशी के बाद पूर्णिमा तक किसी एक दिन तुलसी विवाह संपन्न किया जाता है। श्रीभगवान विष्णु का विवाह तुलसीजी से किया जाता है, इसके पश्चात् घर में विवाह करने की परंपरा है।
वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को भगवान विष्णु एवं शिवजी का पूजन किया जाता है। निशीथकाल में अर्थात् मध्यरात्रि को चतुर्दशी हो तब विष्णु पूजनकर अरुणोदय के समय शिवपूजन करना चाहिए।
त्रिपुरारि पूर्णिमा- इस दिन भगवान शिवजी ने त्रिपुर नामक असुर का वध किया था, अतः इस पूर्णिमा को त्रिपुरारि पूर्णिमा कहते है। इस दिन सायंकाल त्रिपुरज्योत जलाकर दीपोत्सव मनाया जाता है। पूर्णिमा और कृत्तिका नक्षत्र साथ हो तब कार्तिक स्वामीजी का दर्शन करना चाहिए।
गुरुनानक जयंती - कार्तिक मास में पूर्णिमा के दिन गुरुनानक जयंती मनाई जाती है। | गुरुनानक साहेब ने सिक्ख धर्म की स्थापना की थी। इस कारण सिक्ख समुदाय में यह पर्व बड़े | उत्साह से मनाया जाता है।
कार्तिकस्नान समाप्ति - सूर्योदय में कार्तिक पूर्णिमा हो तब कार्तिकस्नान समाप्ति होती है। पूर्णिमा सूर्योदय के समय दो दिन हो तो दूसरे दिन कार्तिकस्नान समाप्ति करनी चाहिए। उत्तर
भारत में इस दिन देवदीपावली मनाई जाती है।
मार्गशीर्ष मास (पूर्णिमांत )
इस मास के पूर्णिमा के समीप चंद्र मृगशीर्ष (मृग नक्षत्र में होने के कारण इसे मार्गशीर्ष यह नाम प्राप्त हुआ है। यह हेमंत ऋतु का प्रथम महीना है। प्राचीनकाल में यह सहस् नाम से जाना
जाता था।
कालभैरव जयंती - मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी प्रदोषकाल में होनेपर कालभैरव का जन्म हुआ। यह शैव परिवार की एक देवता है। भैरव - भगवान शंकरजी के अवतार है और इन्हें ग्राम देवता माना गया है।
मार्तण्ड भैरव उत्सव - मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से षष्ठी तक मार्तण्ड भैरव (खंडोबा) का उत्सव होता है। इस नवरात्रि को खंडोबा की नवरात्रि भी कहा जाता है। प्रतिपदा उदयव्यापिनी होनी चाहिए, यदि प्रतिपदा अहोरात्र हो तो उसी दिन, परंतु प्रतिपदा तिथि का क्षय हो तो अमावस्या समाप्ति के पश्चात् मार्तण्ड भैरव उत्सव का आरंभ हो जाता है।
देवदीपावली - मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा के दिन दक्षिण भारत में देवदीपावली मनाई जाती है। अपने कुलदेवता को अभिषेक कर भोग चढ़ाया जाता है। किसी कारणवश प्रतिपदा को न कर पाये तो मार्गशीर्ष मास में किसी भी दिन कर सकते है।
नागपूजन - मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को नागपूजा करनी चाहिए। इस दिन स्नान-दानादि करने से नागदेवता की कृपा प्राप्त होती है। नागपूजन हेतु पंचमी तिथि सूर्योदय के बाद कम से कम ६ घटि (२ घंटे २४ मि.) होनी चाहिए, यह सर्वसाधारण नियम है।
चंपाषष्ठी / स्कंदषष्ठी - सूर्योदय के पश्चात् षष्ठी ६ घटिका से अधिक तथा अन्य योगों से युक्त होनी चाहिए। प्रतिपदा से प्रारंभ हुए मार्तण्ड भैरव के उत्सव का समापन इस दिन होता है। भगवान शिवजी ने मार्तण्ड भैरव का रूप लेकर मणि एवं मल्ल इन दो राक्षसों का वधकर जनता को अत्याचारों से मुक्त किया था। इस कारण यह उत्सव मनाया जाता है।
गीता जयंती - मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश किया था, ऐसी मान्यता है। अतः इस दिन गीता जयंती मनाई जाती है। इस दिन गीतापर प्रवचन तथा गीतापठन किया जाता है।
श्रीदत्त जयंती - मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन अत्रिऋषि के आश्रम में ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन देवताओं का एकत्रित दत्तात्रेय अवतार हुआ था। इस कारण इसे दत्तात्रेय जयंती कहा जाता है।
पूर्णिमा के दिन प्रदोषकाल में दत्त जयंती मनाई जाती है। इस अवसरपर गुरुचरित्र का पाठ / एक सप्ताहभर करके श्रीदत्तात्रेय की उपासना की जाती है।
पौष मास (पूर्णिमांत)
इस मास में पूर्णिमा के समीप चंद्र पुष्य नक्षत्र में होने के कारण इस मास को पौष नाम प्राप्त हुआ है। प्राचीन समय में इसे सहस्य नाम से संबोधित किया जाता था। इसी मास में मकर संक्रांति होने के कारण संपूर्ण देश में इस मास का विशेष महत्त्व है।
वेला अमावस्या - पौष दर्श अमावस्या के दिन वेला अमावस्या दर्शाई जाती है। इस दिन किसान अपने खेती से प्राप्त धान्यलक्ष्मी का पूजन करते है। दक्षिण प्रदेशों में यह उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।
शाकंभरी पूर्णिमा - शाकंभरी देवी का यह उत्सव पौष शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इस उत्सव की समाप्ति पौष मास के उदयव्यापिनी पूर्णिमा के दिन की जाती है। इस दिन भिन्न - भिन्न प्रकार की सब्जियों का भोग लगाया जाता है, इसलिए इस पूर्णिमा को शाकंभरी पूर्णिमा कहते है।
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माघस्नान आरंभ - सूर्योदय के समय यदि पूर्णिमा हो तो, माघस्नान आरंभ होता है। दोनों ही दिन सूर्योदयकाल में पूर्णिमा हो तो, अहोरात्र के दूसरे दिन स्नानारंभ करना चाहिए।
भोगी - मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व भोगी का उत्सव मनाया जाता है।
मकर संक्रांति - इस मास में सूर्य भगवान का मकर राशि में प्रवेश होनेपर पुण्यकाल के दिन मकर संक्रांति उत्सव मनाया जाता है। इस दिन तिल और गुड़ खाते हैं तथा उसे दान करने की परंपरा है।
मकर संक्रांति एवं अंग्रेजी दिनांक - मकर संक्रांति सूर्य के निरयन मकर राशि में प्रवेश करनेपर निर्भर है, वह १४ जनवरी के दिन आती है, ऐसा बिलकुल नहीं है। सूर्य एकबार मकर राशि में प्रवेश करने के पश्चात् पुनः मकर राशि में प्रवेश के लिए ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट १० सेकंड इतना समय लगता है। इसका अर्थ यह हुआ कि हर वर्ष मकर राशि में प्रवेश करने का समय ६ घंटे से बढ़ जाता है। ४ वर्ष में एक दिन (२४ घंटे) की बढ़ोत्तरी हो जानी चाहिए परंतु अंग्रेजी कॅलेंडर के अनुसार जिस इसवी सन् को ४ से भाग देनेपर शेष शून्य आता है, उस वर्ष को लीप (प्लुत) वर्ष कहते है। लीप वर्ष में फरवरी माह में २९ दिन होते है तथा उस वर्ष के कुल ३६६ दिन होते हैं। इस २९ फरवरी के कारण संक्रांति अनेक वर्षों तक एक ही दिनांक को आती है। जो शतक वर्ष चार से पूर्ण भाज्य है परंतु चार सौ से भाज्य नहीं है, उस वर्ष फरवरी में २८ दिन ही होते है। इस कारण शतक वर्ष से संक्रांति एक दिन से बढ़ जाती है। परंतु ६ घंटे ९ मिनट १० सेकंड से संक्रमण समय अधिक होने के कारण यह बढ़ती हुई कालावधि इकठ्ठा
होकर एकत्रित १५७ वर्ष उपरांत संक्रांति एक दिन से आगे बढ़ जाती है। यह परिवर्तन अचानक
नहीं होता है, वह क्रमशः होता है। (पहले ४ वर्ष में एक दिन, दूसरे कालांश में ३ वर्ष के उपरांत एक दिन, तीसरे कालांश में २ वर्ष के उपरांत एक दिन तथा चौथे कालांश में एक ही दिनांक वर्षों तक रहता है।) इसवी सन् २०० में निरयन मकर संक्रांति २२ दिसंबर को होती थी। सन् १८९९ में निरयन मकर संक्रांति ९३ जनवरी को होती थी। सन् १९७२ तक मकर संक्रांति १४ जनवरी को होती थी। १९७२ से २०८५ तक निरयन मकर संक्रांति कभी १४ जनवरी, तो कभी १५ जनवरी को होगी। इसवी सन् २०८५ के उपरांत प्रति वर्ष संक्रांति १५ जनवरी को होगी। परंतु सन् २१०० को ४०० से भाग न जाने के कारण सन् २१०० से निरयन मकर संक्रांति १६ जनवरी को होगी इस तरह से दिनों में बढ़ोत्तरी होने के कारण सन् ३२४६ में मकर संक्रांति १ फरवरी को आनेवाली है।
माघ मास (पूर्णिमांत)
इस मास की पूर्णिमा के समीप चंद्र मघा नक्षत्र में होने के कारण इस मास को माघ यह नाम प्राप्त हुआ है। शिशिर ऋतु का यह पहला मास है। इस मास में श्रीगणेश जयंती, रथसप्तमी जैसे प्रमुख उत्सव/पर्व आते है। प्राचीनकाल में इसे तपस् नाम से जाना जाता था।
गुप्त नवरात्र माघ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक गुप्त नवरात्र मनाया जाता है।
श्रीगणेश जयंती - माघ शुक्ल चतुर्थी को श्रीगणेशजी का विनायक स्वरूप में कश्यप ऋषि से जन्म हुआ, इस कारण इस दिन गणेश जयंती मनाई जाती है। इस दिन गणेशजी को तिल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है।
तिलकुंद चतुर्थी माघ शुक्ल चतुर्थी तिथि प्रदोषकाल में हो तो उसे तिलकुंद चतुर्थी कहतेहै। इस दिन शाम को कुंद पुष्पों से शिवजी का पूजन करना चाहिए।
बसंत पंचमी (श्री पंचमी) - पूर्वाह्नव्यापिनी पंचमी के दिन रति व कामदेव का पूजन करते है। इसी दिन लक्ष्मी एवं सरस्वती का भी पूजन किया जाता है।
रथसप्तमी / आरोग्य सप्तमी - माघ मास में सूर्योदयव्यापिनी सप्तमी के दिन रथसप्तमी
मनाई जाती है। इस दिन चंदन (गंध) से सूर्य भगवान का चित्र बनाकर अथवा सूर्यप्रतिमा का पूजन किया जाता है। इस दिन कंडों को जलाकर उसपर मिट्टी के छोटे कलश में दूध रखकर वह सूर्य भगवान को अर्पित किया जाता है। भगवान सूर्य की उपासना से आरोग्य प्राप्ति होती है, इसलिए इसे आरोग्य सप्तमी भी कहा जाता है।
भीष्माष्टमी - अपराह्न के समय शुक्ल अष्टमी हो तो उस दिन भीष्माचार्य के लिए तर्पण
किया जाता है, अतः इसे भीष्माष्टमी कहते है। इसी दिन भीष्माचार्य ने प्राणत्याग किया था, इसलिए इस दिन तर्पणकर उनका स्मरण किया जाता है।
माघस्नान समाप्ति - सूर्योदय में माघ पूर्णिमा हो तब माघस्नान समाप्ति होती है। पूर्णिमा
सूर्योदय के समय दो दिन हो तो दूसरे दिन माघस्नान समाप्ति करनी चाहिए।
फाल्गुन मास (पूर्णिमांत )
इस मास के पूर्णिमा के समीप चंद्र पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में होने के कारण इस मास को फाल्गुन मास कहते है। इस मास में महाशिवरात्रि, होली जैसे प्रमुख उत्सव मनाए जाते है। प्राचीनकाल में इस मास को तपस्य नाम से जाना जाता था।
महाशिवरात्रि - हर मास में कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि का व्रत होता है। पौराणिक कथाओं में फाल्गुन मास के शिवरात्रि को महत्त्वपूर्ण बताया है, अतः इस शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है। प्रत्येक मास के शिवरात्रि को व्रत न रखनेवाले भी महाशिवरात्रि का व्रत रखते है।
संपूर्ण भारतवर्ष में भगवान शंकर के मंदिरों में बहुत ही धूमधाम से इस उत्सव का आयोजन किया जाता है। मध्यरात्रि में चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। ईशान संहिता के ‘शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।' इस वचन के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को
ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव होने से इस शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है।
हुताशनी (होली) पूर्णिमा - फाल्गुन पूर्णिमा प्रदोषकाल में होने के दिन हुताशनी पूर्णिमा
मनाई जाती है। इस दिन सूर्यास्त के उपरांत रात्रि के समय होलिका प्रदीपन करते है। हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका को अग्नि जला नहीं सकता ऐसा वर प्राप्त था, इस कारण हिरण्यकश्यपु ने अपनी बहन से कहा कि तुम प्रहलाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ जाओ ताकि प्रहलाद मर जाएगा और तुम नहीं जलोगी। उसके कहनेपर होलिका ने ऐसा ही किया, परंतु प्रहलाद ने भगवान नारायण का स्मरण किया और वह बच गए और होलिका जलकर राख हो गई। इस
खुशी के उपलक्ष में होलिका दहन किया जाता है तथा इस समय दुष्टशक्तियों का नाश हो इस हेतु प्रार्थना की जाती है।