प्रकरण १० वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अशीच पालन एवं निवृत्ति ।

प्रकरण १० वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अशौच पालन एवं निवृत्ति ।

(सूतक को "आशौच" भी कहते है, ऐसा प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। कुछ ग्रंथों में "अशौच" शब्द का भी उल्लेख है। इन दोनों ही शब्दों का प्रयोग प्राचीन शब्द कोशों में मिलता है। परंतु आजकल प्रचलन में "अशौच" शब्द ही है, अतः इसी शब्द का प्रयोग इस ग्रंथ में किया गया है।)
कलियुग में अशौच संकोच आवश्यक है !
पिछले युग में मानव का आयुर्मान १०००/५००/३०० वर्ष का था। कलियुग में मानव के आयुर्मान का संकोच होकर १०० वर्ष आयुर्मान रह गया, इसलिए 'जीवेत् शरदः शतम्' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार एकत्र कुटुंबपद्धति एवं कुटुंब के सदस्यों का संकोच होकर विभक्त परिवार होने से कुटुंब का भी संकोच हुआ है। कर्मकाण्ड का विचार करने पर यज्ञयागादि कर्म, सस्वर मंत्रोच्चार करते हुए स्तोत्र, सूक्त ये उच्चारण कर कर्म करते हुए उपासना करने जितना ही महत्त्व कलियुग में नामस्मरण/नामजप को है, ऐसा कहा गया है। अर्थात् उपासना के कर्मों का
भी संकोच हुआ है। कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के लिए, कुछ अनिवार्य प्रसंग पर, कुछ रिश्ते-संबंधी में तथा कुछ प्रसंगों में रक्त संबंध, रिश्तेदारी, प्रादेशिक दूरी आदि घटनाओं का विचार करते हुए प्राचीन अशौच पालन के नियमों में भी संकोच किया हुआ है। परगोत्र में पुत्र दत्तक देने पर रक्त संबंध, जनुक संबंध होने पर भी जनक माता- पिता का (जन्म देनेवाले माता - पिता का) अशौच केवल ३ दिन होता है। इसी प्रकार मानव के आयुर्मान का संकोच, कुटुंब संकोच, नामस्मरण से उपासना कर्मों का संकोच जिसप्रकार कलियुग में हुआ है, उसी प्रकार आज के काल में जीवनपद्धति, रिश्तेदारी आदि निभाते हुए तथा श्राद्ध करते हुए बहुत से लोगों को अपने पड़दादा का नाम भी मालूम नहीं होता । इन सब बातों का विचार करते हुए ७ पीढ़ि के अशौच पालन का संकोच करना कलियुग में अयोग्य नहीं माना जा सकता। बांधवों का सूतक - अनेक गावों में एक ही अंतिम नाम / कुलनाम के एवं एक ही गोत्र अनेक परिवार रहते हैं। उनमें से किसी भी परिवार में मृत्यु होने पर बांधवों का सूतक मानकर लोग १० दिन का सूतक पालन करते हुए दिखाई देते हैं। कुछ प्रसंग में एक के पीछे एक अथवा बार-बार ऐसा सूतक आने से १५-२५ दिन का सूतक भी पालन करना पड़ता हैं। इस कारण से धार्मिक कृत्य एवं मंगलकार्य करने में कई बार संकट निर्माण होता है। ऐसे समय में निक
रिश्तेदारी एवं अति दूर की रिश्तेदारी अर्थात् बांधवों के सूतक पालन के विषय में कालसुसंगत आचारधर्म ग्रंथ में दिये अनुसार ३ पीढ़ियों का अशौच पालन करने पर गांव-गांव के बांधवों का सुतक पालन का संकट कम हो सकता हैं

उपर्युक्त सभी बिंदुओं का विचार करते हुए जिन्हें यह कालसुसंगत विचार योग्य लगते हो
उन्हे मृताशौच विषय में दिए हुए (अ)(आ)(इ)(ई) के अनुसार रिश्ते संबंधों का विचार करते हु अशौच नियमों का पालन करना चाहिए।

अशौच का पहला दिवस कौनसा मानना चाहिए ?

प्रातःकाल तीन बजे तक जन्म / मृत्यु होनेपर उसके पूर्व का दिवस प्रथम दिन मानना

चाहिए। तीन बजे के बाद जन्म / मृत्य् होनेपर उदित होनेवाला दिन प्रथम दिन मानना चाहिए।

मृत्यु होने के पश्चात् ही सूतक प्रारंभ होता है, दहन विथि के बाद से नहीं।

एक, तीन आथवा दस दिन का जिन्हें सूतक हो तथा उन्हें तीसरे अथवा दसवें दिन तक सनत

ज्ञात होनेपर उवीरित दिनों के पश्चात् शुद्धि हो जाती है। उदाहरण - जिन्हे दस दिन तक

सुतक है तथा मृत्यु का समाचार छरठे दिन मिलता है, तब बचे हुए चार दिन का ही सतक पालना चाहिए। सूतक (अशौच) समाप्ति के बाद यदि मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ हो तब केवल स्नान करने से ही शुুद्धि होती है।

सूतक प्राप्त होनेपर सात पीढ़ियों तक / स्गे-संबंधीयों ने १० दिन का सूतक पालन करते समय

१) जिन्हें सूतक नहीं है, ऐसे रिश्तेदारों से अथवा रसोईये से खाना बनवाए एवं उनसे प्राप्त होनेपर ही भोजन करना चाहिए। 

२) घर में पानी भी उनके द्वारा भरवाना चाहिए एवं उनसे ही लेना चाहिए 

३) जिन लोगों को सूतक हैं, उन्हें जमीनपर कंबल अथवा दरी बिछाकर सोना चाहिए 

४) १० दिनों तक अन्य काम हेतु बाहर नहीं जाना चाहिए। ५) विशेषतः इन दस दिनों में

घर में भगवान की पूजा अन्य व्यक्तिसे करवानी चाहिए। इस प्रकार सूतक के नियमों का पालनकरना चाहिए। वर्तमान समय में चेरे तथा चचेरे चचेरे परिवार में यदि किसी की मृत्यु होनेपर

২৭% लोग भी उपर्युक्त पद्धती के अनुसार सूतक पालन नहीं करते हैं। केवल घर में देवपूजा(विग्रह की पूजा) न करना तथा अन्य कोई धार्मिककार्य न करना यही अशौच पालन है, ऐसा ही आचार-विचार दिखाई देता है।

अ) वर्तमान समय में तीन पीढ़ियों तक के रिश्तेदार मालूम होना असंभव सा प्रतीत होता है।

इस कारण एक से लेकर पांच तक के नियमों का पालन ९५% लोग कर नहीं पाते। पुराने दिनोंमें जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे तब सुतक पालन करना संभव होता था, परंतु आज की विभक्त परिवार की परिस्थिति में तथा महिला और पुरुष दोनों ही काम करने के लिए बाहर जाते है, इस कारण पूर्ण सूतक पालन करना संभव नहीं हो पाता।

ब) घर में कोई मांगलिक कार्य, वास्तुशांति (गृहप्रवेश) आदि कार्य बड़े धूमधाम से मनाने की मानस बना हुआ हो तब ऐसे समय चचेरे, चचेरे-चचेरे रिश्तेदारों का सूतक या वृद्धि आनेपर बड़ा ही धर्मसंकट खड़ा हो जाता है। समारोह की पूरी तैयारी हो जाने के कारण उनके परिवार में यह कार्य संपन्न करने की ही मानसिकता होती है। बालक का जन्म यह आनंद का अवसर होने पर भी चचेरे, चचेरे-चचेरे परिवार में बालक का जन्म होनेपर गौरी-गणपति, नवरात्रि, दशहरा,दीपावली आदि मांगलिक कार्य नहीं कर पाते।

वर्तमान समय में (अ) तथा (ब) इन दोनों बिंदुओंपर विचार कर सूतक तथा वृद्धि रिश्तेदारी में  कितने दिनों तक होनी चाहिए इस विषय में नियमों का संकोच कर कुछ सुधारित नियम यहाँपर प्रस्तुत कर रहे हैं। यह विचार सर्वप्रथम १९४२ में कर्मकांड के यथोचित पालनकाल में पण्डीत पं. महादेवशास्त्री दिवेकर, पं. नारायणशास्त्री मराठे, महामहोपाध्याय पं. पां. वा. काणे, तर्कतीर्थ लक्ष्मणशास्त्री जोशी, श्रौताचार्य धुण्डिराज दीक्षित-बापट आदि विद्वान पंडितों ने २१वर्ष तक चिंतन कर "नया हिंदुधर्म" नामक ग्रंथ में अशौच के सुधारित नियम लिखे हैं। उस समय की जीवनशैली तथा आचरण को देखते हुए लोगों ने उन नियमों को स्वीकार नहीं किया।परंतु २१वीं सदी की वर्तमान जीवनशैली तथा आचरण देखते हुए अशौच नियमों में सुधार की आवश्यकता अब लोगों के मन में उत्पन्न होने लगी है। अशौच एवं पवित्रता का एक दूसरे से भावनिक संबंध है। धार्मिक कार्य करते समय हमें पवित्र रहना चाहिए, इसलिए अशौच समाप्तिके बाद स्नानकर तथा गोमूत्र प्राशनकर हम शुद्ध तथा पवित्र होने की भावना रखते है। हमारे स्मृतिग्रंथों के कुछ वचनों को देखनेपर अशौच के संबंध में, कुछ प्रसंगोंपर एवं कुछ व्यक्तियों के संबंध में अशौच पालन करना आवश्यक नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है।

कुछ प्रसंग -

१) एक अशौच में दूसरा अशौच आनेपर पहले अशौच के समाप्ति के साथ दूसरे अशौच का भी काल समाप्त होता है। वस्तुतः बाद में आये हुए अशौच की अपवित्र कालावधि समाप्त न होनेपर भी पहले व्यक्ति की ग्यारहवीं, बारहवीं तथा तेरहवीं कर सके इसलिए यह व्यवस्था की गई है इस में पावित्र्य की भावना बनी रहे इसलिए स्नान एवं गोमूत्र प्राशन किया जाता है।

उद्यतो निधने दाने आर्तो विप्रा निमंत्रितः ।

तदर्षिभिदृष्टं यथाकालेन शुद्धयति ।। (पराशर ३ । २२)

२) यज्ञ, श्राद्ध इत्यादि कार्य हेतु यदि ब्राह्मण पुरोहितने वह कर्म करने का वचन दिया हो तब उस ब्राह्मण को सपिंडों में से किसी का अशौच आनेपर पवित्र भावना से (अशौच को न मानतेहुए) कार्य संपन्न कर सकता है।

३) जनेऊ, विवाह आदि कार्यों का आरंभ अर्थात् गणेश पूजन, देवताओं की स्थापना हुई हो तब सपिंड में से किसी का यदि अशौच आता है तब मंगलकार्य संपन्न कर सकते है। उसे अशौच के नियम लागू नहीं होते। (निर्णयसिंधु, तृतीय परिच्छेद, विवाह मंडप निर्णयः)

४) कुछ प्रसंगों में कूष्मांड मंत्र से होम विधि कर अशौच निवृत्ति कर मंगलकार्य संपन्न करने केवचन हैं। (निर्णयसिंधु तृतीय परिच्छेद - 'मंगले अशौच निर्णयः)

    4) समारोह, उत्सव, यात्रा, विवाह आदि समय में स्पर्शास्पर्श का अशौच नहीं मानना चाहिए ऐसेवचन है।


    लंबकाछठे शिलापृष्ठे नौकायां शकटे हटे।विवाहेषु च यात्रायां स्पर्श दोषो न विद्यते।

    ६) कुछ व्यक्तियों को उनके नियत कर्म हेतु अशीच नहीं होता है, ऐसे वचन पाराशर आदि स्मृतिग्रंथों में दिए गये है।

    शिल्पिनः कारुका वैद्या दासीदासाश्च नापिताः।राजानः श्रोत्रियाश्चेव सद्यःशौचा प्रकीर्तिताः।। (पाराशर स्मृति, ३।२०)

    शिल्पकार, चित्रकार, कारीगर, कारुका अर्थात् रसोईया (महाराजा), वैद्य (डॉक्टर), दास-दासी (नौकर-चाकर), राजा तथा श्रोत्रिय आदि को अशौच होनेपर भी अपना नियत कर्म करतेसमय तथा दूसरों के यहाँ कर्म करते समय अशौच का दोष नहीं होता है। इसका अर्थ यह हुआकि अशौच में भी यह व्यक्ति नियतकर्म कर सकते है, क्यों की वह सद्यःशुचि हैं।


    इसी आशय के वचन स्मृतिग्ंथों में पाये जाते है। इन वचनों का वर्तमान परिस्थिति में विचारकर अशीच पालन के नियमों में संकोच कर सुधारित नियम दे रहे है। वर्तमान जीवनशैली मेंव्यक्तिगत आचार, व्यवहार, समाजव्यवस्था तथा धर्माचरण, मांगलिककार्य करने के संबंध मेंजो सुधारित नियम दिए गये है, उनका पालन करना अनुचित नहीं है।

    (जिन्हें सपिंड का दस दिन तक अशौच का पालन करना है, उन्हें प्रारंभ में दिए गये १ से ५नियमों का जितना संभव हो उतना पालन करना चाहिए। परंतु जिन्हे इस प्रकार से अशौच कापालन करना संभव न हो, वे सद्यस्थिति में आगे दिए हुए प्रकार से अशौच पालन कर सकते है।)यह विचार विशिष्ट जाती तथा उपजातियों के लिए नहीं हैं, अपितु कालानुरुप विचार मान्यकरनेवाले तथा हिंदुधर्म के अनुसार आचरण करनेवाले लोगों के लिए हैं।

 जननाशौच

सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोऽस्तु सूतकम्। (मनुस्मृति ५.६२, पराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति)

    किसी का जन्म होना यह आनंददायक घटना होने के कारण क्या सपिंडों को दस दिन तकअशौच पालन करने की आवश्यकता हैं? ऐसा ९९% लोग सोचते हैं। अतः मनुस्मृति व अन्यस्मृतियों के वचनों का आधार लेकर उसपर मंथन कर वर्तमान समय के लिए यह जननाशौचनिर्णय।

    जननाशीच (वृद्धि)- शिशु के जन्म के पश्चात् केवल माता-पिता को दस दिनतक जननाशौचकिंतु अन्य लोगों को अर्थात् सगे रिश्तेदार एवं सपिंडों को जननाशौच नहीं होता है, स्नान करनेसे शुद्धि हो जाती है। यदि बालक मृत पैदा हो अथवा दस दिन के अंदर वह मृत्यु को प्राप्त हुआहो तब केवल माता-पिता को जननाशौच, इसका मृताशौच (सूतक) नहीं होता है। गर्भस्रावअथवा गर्भपात होनेपर किसी को भी वृद्धि/ सूतक नहीं है।

    वर्तमान में सरोगसी पद्धति से (दूसरी स्त्री के द्वारा) बच्चे का जन्म किया जाता है। ऐसे समयप्रसूता को दस दिन तक अशौच का पालन करना चाहिए। उसके पति एवं उसके परिवार कोप्रालन करने की आवश्यकता नहीं है, परंतु जिनका बच्चा है उस माता-पिता को दस दिन तकजननाशैच का पालन करना चाहिए, क्योंकि उनके वंश की वृद्धि हुई है। अन्य सपिंडों कोअशौच पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

    मृताशौच

    मृताशोच का संकोच करके अशौच पालन हेतु उसके चार विभाग किए है। (अ) जिनकेमाता-पिता एक हैं ऐसे सगेसंबंधी/रिश्तेदार तथा एक ही घर में साथ रहनेवाले सभी व्यक्ति१० दिनों तक सूतक पालन करें। (आ) जिनके दादाजी एक है ऐसे चचेरे सगेसंबंधी ३ दिनोंतक सूतक का पालन करें। (इ) जिनके पड़दादा व पड़दादा के पिताजी एक हैं ऐसे चचेरे-चचेरेरिश्तेदार और उनके अगली पीढ़ि के रिश्तेदार १ दिन का सूतक पालन करें। (ई) सास-ससुर,मातुल, बुआ आदि रिश्तेदारी में १ दिन का सूतक पालन करें, ऐसे संबंधों के साथ आयु का भीविचार किया गया है। उपनीत, अनुपनीत, अविवाहित कन्या आदि के संदर्भ में पहले जमाने मेंआयु को ध्यान में रखते हुए जो अशौच के नियम बताए गये थे, उस संदर्भ में आज के परिप्रेक्ष्यमें समाजमन का विचारकर उपनीत, अनुपनीत, अविवाहित कन्या आदि का कालवाचक अर्थलेकर उनके संदर्भ में आज जो रिश्तेदारी या भावसंबंध निर्माण हुए है उसका विचार करते हुएअशौच के संबंध में नियम दिए है।

    अंत्यकर्म संपन्न करनेवाला व्यक्ति (पुरुष या स्त्री) १ अथवा ३ दिन का सूतक रखनेवालाहो तो भी वह कर्ता होने के कारण उसे १० दिन का कर्माग सूतक (अशौच) रखना चाहिए।

    बाल - १६ वर्ष तक की आयु के पुत्र / कन्या के लिए अशौच पालन हेतु "बाल" नामक संज्ञा काउपयोग किया है।

प्रौढ़ - १६ वर्ष की आयु से अधिक आयु के अविवाहित पुत्र / कन्या के अशौचपालन हेतु "प्रौढ़  "नामक संज्ञा का उपयोग किया है।

    अ) सगे रिश्तेदार-माता-पिता, पुत्र, कन्या, भाई, बहन, बहू, पति-पत्नी तथा संयुक्त परिवारहो तब पोता-पोती, पौत्रवधु आदि व्यक्तियों को दस दिन का सूतक होता है। एक ही घर/इमारतमें रहनेवाले सभी रिश्तेदारों को स्पर्शास्पर्श (छुआछुत) का दोष होने के कारण १० दिन तकसूतक रखें।


    1. माता - पिता का -उपनीत, अनुपनीत, बाल अथवा प्रौढ़ आयु का पुत्र / कन्या, अविवाहितपुत्र, अविवाहित कन्या, विवाहित पुत्र, बहू आदि को १० दिन का सूतक रखना चाहिए।संयुक्त परिवार में (एक ही घर में अथवा एक ही भवन में रहते हो तब छुआछुत का दोषआने के कारण) पौत्र, पौत्रवधु को १० दिन का सूतक होता है। विवाहित कन्या को ३ दिनका सूतक होता है।


    2. पति-पत्नी- परस्पर को १० दिन तक सूतक होता है। घटस्फोटित होनेपर निवृत्त संबंध होने केकारण एक दूसरे का तथा एक दूसरे के सगे संबंधियों का सूतक पालने की आवश्यकता नही हैं।


    3. पुत्र का - जन्म के पश्चात् ग्यारहवें दिन से जनेऊ तक अथवा बाल आयु का पुत्र मृत्यु कोप्राप्त हुआ हो तब माता-पिता को ३ दिन तक सूतक रखें। उपनयन के पश्चात् तथा प्रौ़आयु का पुत्र मृत होनेपर माता-पिता को १० दिन तक सूतक रखना चाहिए।


    4. बहू का -सास-श्वसुर को १० दिन तक सूतक होता है।


    5. कन्या का - जन्म के पश्चात् ११ वें दिन से बाल आयु की कन्या मृत होनेपर माता-पितातीन दिन का सूतक रखें। प्रौढ़ आयु की अविवाहित कन्या मृत होनेपर माता-पिता को १०दिन तक सूतक रखना चाहिए। विवाहित कन्या का ३ दिन का सूतक होता है। घटस्फोटिताअथवा विधवा कन्या अपने माता-पिता के साथ रहती हो तो माता-पिता तथा उस घर मेंरहनेवाले सभी रिश्तेदार १० दिन का सूतक रखें।


    6. सहोदर (भाई का भाई को) - अनुपनीत/बाल आयु के सगे भाई का प्रौढ़ आयु के सगेभाई को, विवाहित सगा भाई तथा उसकी पत्नी को ३ दिन का सूतक होता है। अनुपनीतभाई एवं बाल आयु के भाई को सूतक नहीं है। उपनीत / प्रौढ़ आयु के अविवाहित भाईका, विवाहित भाई तथा उसके पत्नी का प्रौढ़ आयु के अविवाहित भाई को, विवाहित भाईतथा उसके पत्नी को १० दिन का सूतक रखना चाहिए। अनुपनीत एवं बाल आयु के भाईको सूतक नहीं है।

    7. सगे भाई का बहन को - अनुपनीत अथवा बाल आयु के भाई का सूतक नहीं रखना है।प्रौढ़ आयु का भाई मृत होनेपर विवाहित बहन को ३ दिन का तथा प्रौढ़ आयु की अविवाहितबहन अपने भाई के घर रहती है, तब उसे १० दिन का सूतक और वह अन्य जगह रहती हैतब ३ दिन का सूतक रखें। बाल आयु की बहन को सूतक नहीं है।

    8. सगी विवाहित बहन का - प्रौढ़ आयु के भाई को ३ दिन तक सूतक, प्रौढ़ आयु केअविवाहित बहन को तथा विवाहित बहन को ३ दिन का सूतक होता है। बाल आयु के भाईऔर बहन को सूतक नहीं होता है।

    9. सगी अविवाहित बहन का - प्रौढ़ आयु की बहन का उसके प्रौढ़ / विवाहित भाई तथाउसकी पत्नी को १० दिन का सूतक रखें। प्रौढ़ आयु की अविवाहित बहन / विवाहित बहनसाथ में रहती हो तब १० दिन का सूतक रखना चाहिए और यदि अलग रहती हो तथा अन्य गांवमें रहती हो तब ३ दिन सूतक होता है। बाल आयु के भाई-बहन को सूतक नहीं रखना चाहिए।

    10.सगे दादा-दादी (पिता के माता-पिता) एवं पौत्री, पौत्र तथा पौत्रवधु साथ रहते हो तोपरस्पर के लिए १० दिन का सूतक रखें। अलग रहते हो तब ३ दिन का सूतक रखें। विवाहितपौत्री की स्नान से शुद्धी होती है।

    बाल - १६ वर्ष तक की आयु के पुत्र / कन्या के लिए अशौच पालन हेतु "बाल" नामक संज्ञा काउपयोग किया है।

    प्रौढ़ - १६ वर्ष की आयु से अधिक आयु के अविवाहित पुत्र / कन्या के अशौचपालन हेतु "प्रौढ़"नामक संज्ञा का उपयोग किया है।

    आ) दूसरी पीढि के अर्थात् चचेरे रिश्तेदार

    1. ताऊ-ताईजी, चाचा-चाची का - प्रौढ़ आयु के भतीजे को, विवाहित भतीजा एवं उसकेपत्नी को ३ दिन का सूतक होता है। अन्य लोगों को स्नान से शुद्धि होती है।

    2. भतीजे का-प्रौढ़ आयु का भतीजा/ विवाहित भतीजा या उसकी पत्नी मृत होनेपर ताऊताईजी, चाचा-चाची को ३ दिन का सूतक होता है। बाल आयु का भतीजा मृत होनेपर १।दिन का सूतक रखें।

    3. भतीजी का - प्रौढ़ आयु की अविवाहित भतिजी का ताऊ-ताईजी, चाचा-चाची को ३दिन का सूतक रखना चाहिए। विवाहित भतिजी का १ दिन का सूतक रखें। बाल आयु कीभतीजी का सूतक नहीं रखना चाहिए।

    4. चचेरे भाई का - प्रौढ़ आयु का अविवाहित / विवाहित चचेरा भाई तथा उसके पत्नी का३ दिन का सूतक होता है। अनुपनीत तथा बाल आयु के भाई को सूतक नहीं है। प्रौढ़अविवाहित तथा विवाहित बहन को १ दिन का सूतक रखें। बाल आयु के चचेरे भाई कासूतक नहीं रखना चाहिए।


    5. चचेरी बहन का- प्रौढ़ आयु की अविवाहित बहन का विवाहित भाई तथा उसकी पत्नी को १दिन का सूतक रखना चाहिए। अविवाहित तथा विवाहित बहन को सूतक नहीं रखना चाहिए।

    6. चचेरे दादा-दादी का-पोता-पोती को सूतक नहीं रखना चाहिए

    बाल - १६ वर्ष तक की आयु के पुत्र / कन्या के लिए अशौच पालन हेतु "बाल" नामक सज्ञा काउपयोग किया है।

    प्रौढ़ - १६ वर्ष की आयु से अधिक आयु के अविवाहित पुत्र / कन्या के अशौचपालन हेतु "प्रौढ़"नामक संज्ञा का उपयोग किया है

    इ) तीसरी पीढ़ि अर्थात् चचेरे-चचेरे तथा अगले पीढ़ि के रिश्लेदार

    1. तीसरी पीढ़़ि के ताऊ-ताईजी, चाचा-चाची का-प्रौढ़ आयु के भतीजे को, विवाहितभतीजा एवं उसके पत्नी को १ दिन का सूतक रखें। अन्य संबंधीयों को स्नान से शुद्धि होती है।

    2. तीसरी पीढ़ि के भतीजे का - प्रौढ़ आयु का भतीजा/ विवाहित भतीजा अथवा उसकीपत्नी मृत होनेपर ताऊ-ताईजी, चाचा-चाची को १ दिन का सूतक रखना चाहिए। बाल आयुके भतीजे का अशौच नही है।

    3. तीसर पीढ़ी के भतीजी का -प्रौढ़ आयु विवाहीत भतीजी का ताऊ -ताईजी, चाचा-चाची को १ दिन का सूतक रहेगा। विवाहित / बाल आयु के भतीजी का सूतक नहीं रहता है।

    4. तीसरी पीढ़ि के भाई का -प्रौढ़ आयु का अविवाहित / विवाहित भाई या उसकी पत्नीका १ दिन का सूतक रखें। अनुपनीत / बाल आयु के भाई को सूतक नहीं रहता है। प्रौढ़अविवाहित / विवाहित बहन को सूतक नहीं होता है। अनुपनीत / बाल आयु के भाई कासूतंक नहीं रहता है।

    5. तीसरी पीढ़ि की बहन का - प्रौढ़ आयु की अविवाहित / विवाहित बहन का विवाहितभाई तथा उसके पत्नी को सूतक नहीं होता है। अविवाहित तथा विवाहित बहन को सूतकनहीं होता है।

    6. तीसरी पीढ़ि के दादा-दादी का एवंपौत्र-पौत्री का परस्पर को सूतक नहीं रखना चाहिए।

    ई) अन्य सपिंडों का - १ दिन का सूतक।

    1. नाना-नानी का - प्रौढ़ आयु के अविवाहित / विवाहित पोते को और प्रौढ़ आयु कीअविवाहित/विवाहित पोती को १ दिन का सूतक होता है। इसके अतिरिक्त अन्य संबंधियोंको सूतक नहीं होता है।

    2. दोहिता (कन्या का पुत्र) का-उपनीत, प्रौढ़ आयु के दोहिते का उसके नाना-नानी को 1दिन का सूतक रखें। अनुपनीत तथा बाल आयु के दोहिते का सूतक नहीं होता है।

    3. दोहिती (कन्या की कन्या) का-प्रौढ़ आयु की अविवाहित दोहिती का नाना-नानी को १दिन का सूतक होता है। विवाहित दोहिती तथा बाल आयु की दोहिती का सूतक नहीं होता है।

    4. सास-ससुर का - दामाद को १ दिन का सूतक रखें।

    5. पत्नी के भाई का-उपनीत, अनुपनीत, प्रीढ़ आयु का अविवाहित / विवाहित मृत होनेपरस्नान से शुद्धि हो जाती है।

    6. पत्नी की बहन का - सूतक नहीं होता है।

    7. मामा-मामी का-प्रौढ़ आयु के अविवाहित / विवाहित भांजे को तथा प्रौढ़ आयु केअविवाहित / विवाहित भांजी को १ दिन का सूतक होता है।

    8. मौसी का - मामा-मामी की तरह सूतक रखें।

    9. बुआ का - मामा-मामी की तरह सूतक रखें।

    10.भांजे का - उपनीत / प्रौढ़ आयु का अविवाहित / विवाहित भांजे का मामा-मामी, मौसी,बुआ को १ दिन का सूतक रखें।

    11.भांजी का - प्रौढ़ आयु की अविवाहित / विवाहित भांजी का मामा-मामी, मौसी, बुआ कोस्नान से शुद्धि हो जाती हैं।

    12.फुफेरा, ममेरा, मौसेरा भाई का - प्रौढ़ आयु का अविवाहित / विवाहित मृत होनेपरविवाहित / प्रौढ़ आयु के भाई को और प्रौढ़ आयु की अविवाहित बहन को १ दिन का सूतकरखें। विवाहित बहन, अनुपनीत / बाल आयु को सूतक नहीं होता है।


    13.फुफेरी, ममेरी, मौसेरी बहन का - प्रौढ़ आयु की अविवाहित / विवाहित मृत होनेपर प्रौढ़आयु के भाई तथा बहन को १ दिन का सूतक रखना चाहिए। विवाहित बहन, अनुपनीत एवंबाल आयु को सूतक नहीं होता है।

    14.दत्तक पुत्र का - जिन्होंने गोद लिया है उन्हे १० दिन का सूतक, जनक माता-पिता को ३दिन का सूतक रखें। अन्य संबंधियों को सूतक नहीं होता है।

    15.दत्तक पुत्र को - पालन करनेवाले माता-पिता का १० दिन का सूतक तथा जनक माता-पिता का ३ दिन का सूतक रखें।

    16.गुरू का - ३ दिन सूतक रखें। अन्य गांव में मृत होनेपर १ दिन का सूतक होता है।

    (जिन रिश्तेदारों का उपर्युक्त सूचि में उल्लेख नहीं है, उनका सूतक नहीं होता है केवलस्नान से शुद्धि हो जाती है।)

    अशौच संपात

    १० दिन के सूतक में दूसरा १० दिन का सूतक आनेपर पहले के ग्यारहवें दिन ही दूसरे सूतक कीनिवृत्ति होती है। पहले का क्रियाकर्म उसके १०, ११, १२, १३ वें दिन करना चाहिए तथा दूसरेका क्रियाकर्म उसके १०, ११, १२, १३ वें दिन करना चाहिए। ऐसी स्थिति में अन्य रिश्तेदारों कासूतक समाप्त होनेपर भी दूसरे के कर्ता को १० दिनों का कर्मांग सूतक रहता है। उसे छुआछुत(स्पर्शास्पर्श) का दोष नहीं रहता, किंतु वह क्रिया पूर्ण होने के बाद भगवान की पूजा-अर्चनाआदि कर्म कर सकता है।

    कम दिन का अर्थात् ३ या १ दिन के सूतक में दूसरा १० दिन का सूतक आनेपर १० दिन कासूतक समाप्त होनेपर ही सूतक (अशैच) की निवृत्ति होगी।

    मृताशौच में (सूतक) जननाशौच (वृद्धि) आनेपर मृताशौच के साथ जननाशौच भी समाप्त होजाता है, परंतु जननाशौच में मृताशौच आनेपर मृताशौच समाप्ति के बाद ही सूतक (अशौच)समाप्त होता है।

    अशौच में कौनसे कर्म करें ?

    सूतक अथवा वृद्धि होनेपर अर्ध्यदान तक ही संध्या करनी चाहिए। गायत्री मंत्र का १०, १०८संख्यात्मक जप नहीं करना चाहिए। ३ दिन से अधिक अशौच हो तब किसी दूसरे के द्वारा पूजासंपन्न करवानी चाहिए, स्वयं नहीं करें। परंतु भगवत् गीता, रामरक्षा तथा अन्य स्तोत्र एवं धार्मिकग्रंथों का पठन-पाठन कर सकते है। वृद्धि हो तब मंदिर में जाकर दर्शन ले सकते हैं परंतु मंदिरके गर्भगृह में नहीं जाना चाहिए। किंतु मृताशौच में मंदिर में जाकर दर्शन नहीं करें, तथा वैदिकमंत्र पठन, वैश्वदेव, ब्रह्मयज्ञ, वेदाभ्यास तथा श्राद्ध आदि भी नहीं करने चाहिए। अशौच समाप्तिके बाद बचा हुआ श्राद्ध कर सकते है। अशौचकाल में ग्रहण निमित्त स्नान, श्राद्ध, जप तथा दानकर सकते है। व्रतकाल में अशौच आनेपर वह व्रत ब्राह्मण के द्वारा संपन्न करा सकते है।

    अशौच निवृत्ति हेतु शुद्धि प्रक्रिया!

    अपने धर्म में २-४ प्रकार का अशुचित्व माना जाता है (१) जननाशौच (वृद्धि) (२) मृताशौच(सूतक) (३) रजस्वला की अशुचि (४) तात्कालिक अशुचि (स्पर्शास्पर्श, अंत्य यात्रा में सहभाग,ग्रहण निमित्त अशौच आदि)

    वर्तमान समय में अशौच के नियमों का पालन पूर्णतः नहीं किया जाता। अशौच पालनअर्थात् केवल पूजा ना करना ऐसा अर्थ लेकर बाकी सब व्यवहार किये जाते हैं, यह अशुचित्व

    विषेशतः प्रासंगिक, धार्मिक कर्म करने के संदर्भ में पालन किया जाता हैं। अशौच निवृत्ति के     लिए पवित्र (शुचि) होने हेतु स्नान एवं कुछ विधियां बताई गई हैं तथा कुछ पदार्थ पावित्र्यप्राप्तिहेतु उपयुक्त माने गये हैं। उसमें प्रमुखता से गोमूत्र, पंचगव्य, दर्भ आदि का समावेश हैं।

    प्राचीनकाल में अशौच निवृत्ति हेतु तथा ग्रहण के बाद स्नान के लिए कुएं से पानी खींचाजाता था अथवा नदी से पानी लाकर स्नान किया जाता था। घर में रखा हुआ पानी विसर्जितकिया जाता था। वर्तमान में पानी नल से आने लगा है। आजकल अपार्टमेंट में निवास रहताहै। उसकी छतपर टंकी बनाकर उसमें पानी भरा रहता है तथा वही पानी स्नान के लिए उपयोगमें लाया जाता है। बहुत से गांवो में पानी ४ से ८-१० दिन के अंतराल में एकबार पानी आने केकारण वह बड़ी मात्रा में भरकर रखा जाता है। ऐसे भरकर रखें हुए पानी से ही स्नानकर अशौचनिवृत्ति की जाती है। ऐसे समय में जिस दिन अशौच निवृत्ति करनी हो उस समय स्नान के पानीमें थोड़ासा गोमूत्र मिलाकर स्नान करना चाहिए।

    वर्तमान समय में महानगरों तथा गावों में अशौच निवृत्ति हेतु ताजा गोमूत्र उपलब्ध नहीं होपाता है। ऐसे समय में बाजार से गोमूत्र अर्क की एक बोतल लाकर अपने घर में रखनी चाहिए।उसकी कुछ बूंदे नहाने के पानी में डालकर स्नान करना चाहिए तथा कुछ बूंदे प्राशन करनीचाहिए। किसी कारणवश गोमूत्र का अर्क उपलब्ध न होनेपर तुलसी के पत्ते पानी में डालकरस्नान करना चाहिए। बाद में तुलसी के पत्ते खाकर पवित्र हो सकते है। गोमूत्र, गोमूत्र अर्कअथवा तुलसी के पत्तों के अभाव में सोनें को (सुवर्ण) पानी में ५ मिनट तक उबालना चाहिए।उस सुवर्णसिद्ध जल में से एक-दो चम्मच नहाने के पानी में डालकर स्नान करना चाहिए तथाउस सुवर्णसिद्ध जल के दो-तीन चम्मच प्राशन कर पवित्र हो सकते है। ऐसे उत्तरोत्तर पर्यायअशौच निवृत्ति हेतु ले सकते है।

    विवाह, मांगलिक कार्य, तीज-त्यौहार आदि समयपर रजस्वला की शुद्धि करनी आवश्यकहो तब ऐसे धर्मसंकट प्रसंग में उपरोक्त उपायकर वह पवित्र हो सकती है। (अधिक जानकारीहेतु "धर्मसंकट के समय रजस्वला की शुद्धि" यह अध्याय देखें।)

    तात्कालिक अशौच एवं शुद्धि

    अंत्ययात्रा में शामील होनेपर तात्कालिक अशौच आ जाता है। ऐसे समय में मृत व्यक्ति केसगे रिश्तेदार तथा जिन्होंने कंधा दिया हो उन्हें स्नान करना चाहिए। अन्य व्यक्ति जो केवलअंत्ययात्रा में शामील हुए थे उन्हें मृत व्यक्ति के घर जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने घरजाकर स्नान करने की परंपरा है तथा केवल हाथ-पैर धोकर तथा आँख और मस्तक को पानीलगाने से भी स्पर्शस्पर्श की शुद्धि होती है। इसी तरह से सूतक रखनेवाले व्यक्ति के स्पर्श केकारण आए हुए अशौच की भी हाथ-पांव धोकर तथा मस्तक एवं आँखोंपर पानी लगाकर शुद्धिहो जाती है।

    सूर्य तथा चंद्रग्रहण के समय उसके पर्वकाल में जप तथा कुछ मंत्रों का पुरश्चरण करनेवालोंको ग्रहणस्पर्श का तथा ग्रहणमोक्ष का स्नान करना चाहिए। पानी की उपलब्धता ध्यान में लेकरअन्य लोगों को हाथ-पांव धोकर, मस्तक तथा आँखोंपर पानी लगाकर शुद्धि कर लेनी चाहिए।

    रजस्वला का अशौच

 महिलाओं का मासिकधर्म सामान्यतः २७/ २८ दिन होनेपर आता है, परंतु अन्य कई कारणों सेमासिकधर्म जल्दी भी आता है। मासिकधर्म प्रारंभ होने के पश्चात् १७ दिन तक पुनः मासिकधर्मआनेपर स्नान करने से शुद्धि हो जाती है। १८ वें दिन मासिकधर्म आनेपर १ दिन का अशौचरखना चाहिए। १९ वे दिन आनेपर २ दिन तथा २० दिन के पश्चात् कभी भी आनेपर ३ दिन कारजोदोष पालन करना चाहिए।

  प्रथम दिन निर्णय - मध्यममान से प्रातःकाल ३ बजे तक रजस्वला होनेपर पूर्वदिन प्रथम दिनमाना जाए। प्रातःकाल ३ बजे के बाद रजस्वला होनेपर सुबहवाला दिन प्रथम दिन मानना चाहिए।

    धर्मसंकट के समय रजस्वला की शुद्धि

    आर्तव समय में रजस्वला स्त्री ने चार दिन तक आराम करना चाहिए, इस उद्देश्य से उसे‘अपवित्र’ माना गया है। इस प्रकार अपवित्र रह कर उन तीन दिनों में मंजन करना, बालसंवारना, नहाना आदि ना करते हुए केवल ICU जैसा आराम करें और किसी भी व्यावहारिकएवं धार्मिककार्य में वह सहभाग नहीं ले सकती। केवल आराम करके इस नियम का पालनकरना उचित है ऐसा हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है। परंतु वर्तमान समय में इस प्रकार से मासिकधर्मका पालन करना सर्वथा असंभव है। पाठशाला तथा महाविद्यालयों में पढ़नेवाली लड़कियाँ,नौकरी, व्यवसाय करनेवाली महिलाएँ तथा विभक्त परिवार का विचार करते हुए अधिकांशपरिवारों में मासिकधर्म का पालन असंभव सा प्रतीत होता है। उस समय ४ दिन तक सिर्फभगवान की पूजा नहीं की जाती (यह भी एक प्रकार से सही ही है) बाकी सब गतीविधियाँ जारीरहती है। परंतु मासिकर्धर्म का पालन करनेवाले और न करनेवाले घरों में कोई भी मांगलिककार्य, गणेशपूजन, तीज-त्योहार, दशहरा तथा दिवाली ऐसे उत्सव प्रसंगपर विभक्त परिवार मेंघर में दूसरी कोई स्त्री न होने के कारण बड़ी समस्या उत्पन्न होती है। विभक्त परिवार में दो युवालड़कियाँ हो तब भी मासिकधर्म का पालन करना असंभव सा प्रतीत होता है, यह वास्तविकताहै। उपनयन, विवाह आदि मांगलिक कारयों में यदि स्त्री रजस्वला हो गई तो श्रीपूजनादि जैसेकुछ विधि संपन्न करके मांगलिक कार्य करने की व्यवस्था हमारे प्राचीन ग्रंथों में दी गई है।वर्तमान समय में उसी व्यवस्था को स्वीकारकर धर्मसंकट प्रसंग में मांगलिक कार्य, शुभकार्य,त्यौहार-उत्सव संपन्न कराने हेतु तथा पावित्र्य रखने हेतु कुछ सुझाव दिए है, उसे स्वीकारना प्रसंगानुरूप आवश्यक है।

    देवकस्थापना - गणेशपूजन होने के बाद उपनयन अथवा विवाह के दिन ही यदि माता याकल्या रजस्वला हुई तो उसे सिरसे - सचैल स्नान करना चाहिए। पश्चात् श्रीपूजनादि शांति करमांगलिक कार्य संपन्न कर सकती है, ऐसा प्राचीन धर्मग्रंथों में दिया है।

    देवकस्थापना - गणेशपूजन नहीं हुआ हो तब वह कार्य ५ दिन के बाद करना चाहिएऐसा धर्मग्रंथों में दिया है। परंतु तुरंत अगला मुहूर्त नहीं मिलता हो तब ऐसी आपात् स्थितिमें श्रीपूजनादी शांति कर मांगलिक कार्य संपन्न कर सकते है, ऐसा वाक्यसार ग्रंथ में लिखाहै। (संदर्भ - उपयुक्त धर्मशास्त्र संग्रह) वर्तमान समय में अगला मुहूर्त, मंगल कार्यालय कीउपलब्धता एवं होनेवाले आर्थिक नुकसान को देखते हुए देवकस्थापना - गणेशपूजन नहीं हुआहो तब भी मांगलिक कार्य के पूर्व ४-५ दिन तक माता / कन्या रजस्वला हुई हो तब श्रीपूजनादीशांति करनी चाहिए तथा मांगलिक कार्य तक प्रतिदिन पानी में गोमूत्र डालकर स्नान करना तथाप्रतिदिन थोड़ासा गोमूत्र प्राशनकर मांगलिक कार्य हेतु पावित्र्य रखना चाहिए। (मांगलिक कार्यके पूर्व दवाई लेकर मासिकधर्म को तत्कालिक रुकवाना और उस दवाई से भविष्य में होनेवालेदुष्परिणाम को भुगतने के बजाय इस तरह से पावित्र्य रखनेवाले उपाय करना श्रेयस्कर है।)

    इसी प्रकार मांगलिक कार्य के अलावा अन्य तीज-त्यौहार, नवरात्रि, दीपावली आदि त्यौहारोंमें मासिकधर्म का संकट आनेपर और घर में दूसरी कोई स्त्री न हो तब रजस्वला स्त्री को पानीमें प्रतिदिन गोमूत्र डालकर स्नान करना चाहिए तथा रोज थोड़ासा गोमूत्र प्राशन करना चाहिए।ऐसे तीज-त्यौहारों में पूजा करनेवाले पुरुष को भी प्रातःकाल में चाय आदि न पीकर तथा अन्यजगह स्पर्श न करते हुए सबसे पहले पानी में गोमूत्र अथवा तुलसीपत्र डालकर स्नान करने केबाद नित्यपूजा, उत्सवमूर्ति की पूजा आदि करनी चाहिए। ऐसे पूजन के समय फल, शक्करमिश्रित दूध का नैवेद्य अर्पण करें। उसके पश्चात् अपने नियमित कार्य करें। इस तरह से संकटकी घड़ी में पवित्रता बनाई रखनी चाहिए (परंतु मदद करनेवाली दूसरी कोई व्यक्ती हो तबमासिकधर्म का पालनकर, उस व्यक्ती द्वारा कार्य संपन्न कराने को प्रधानता देनी चाहिए।)

    वर्तमान में महिलाएँ विविध प्रकार के सामाजिक कार्य, सम्मेलन, अधिवेशन में हिस्सा लेतीहै। कभी-कभी दीप प्रज्ज्वलन, प्रतिमा पूजन भी करना पड़ता है। ऐसे समय में गोमूत्र आदिका उपयोगकर मन में पवित्रता की भावना रखकर सहभागिता निभानी चाहिए। ऐसे उत्सवों केप्रसंग बहुत बार आते रहते है। ऐसे समय में दवाई लेकर मासिकधर्म को तत्कालिक रुकवानाऔर उस दवाई से भविष्य में होनेवाले दुष्परिणाम को भुगतने के बजाय इस तरह से पावित्र्यरखनेवाले उपाय करना श्रेयस्कर है।

    पावित्र्य रखने हेतु हम गोमूत्र का उपयोग करते हैं, परंतु ताजा गोमूत्र हमेशा उपलब्ध नहींहो पाता इसलिए बाजार से गोमूत्र अर्क की बोतल घर में लाकर रखनी चाहिए और प्रसंगोत्पातउसका प्रयोग करना चाहिए। अगर गोमूत्र अर्क भी उपलब्ध नहीं हुआ तो तुलसी के पत्ते नहाने   के पानी में डालकर नहाना चाहिए तथा कुछ पत्ते खाने चाहिए अथवा सोनें को (सुवर्ण) पानी में ५ मिनट तक उबालना चाहिए। उस सुवर्णसिद्ध जल में से एक-दो चम्मच नहाने के पानी में डालकर स्नान करना चाहिए तथा उस सुवर्ण सिद्ध जल के दो-तीन चम्मच प्राशन कर पवित्र हो सकते है। ऐसे उत्तरोत्तर पर्याय अशौच निवृत्ति हेतु ले सकते है। पुरोहित-पंडितों की केवल कर्म करने के लिए अशौच निवृत्ति 


वर्तमान समय में विविध प्रकार के धार्मिक कार्य एवं मांगलिक कार्य अधिक संख्या में होने लगे हैं। यजमान को यदि (माता-पिता तथा सगे रिश्तेदारों का छोड़कर) अन्य स्पिंडों का सूतक (अशौच) प्राप्त होता है तब मांगलिक कार्य एवं धार्मिक कार्य हेतु तात्कालिक समय यजमान की अशौच निवृत्ति कराकर कार्य संपन्न कराया जाता है। और इससे कार्यक्रम हेतु लिया गया सामान, हॉल आदि का खर्चा व्यर्थ नहीं जाता। परंतु यदि पुरोहित को ही सूतक आ जाए तब बड़ी समस्या निर्माण होती है। ऐसे आपत्काल में दूसरा पुरोहित उपलब्ध होना बहुत बार असंभव सा होता है। धर्मकार्य सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए धर्मशास्त्र के नियम यह एक उत्तकृष्ट व्यवस्था है। जैसे वैद्य को सूतक लगनेपर भी समाजस्वास्थ्य हेतु वह अपना नियत कर्म कर सकता है ऐसी व्यवस्था अपने धर्मशास्त्र में है। इसी प्रकार से पुरोहित भी प्रायश्चित्तात्मक विधि वचन लेकर कर्म करने हेतु अशौच निवृत्तिकर समाज में धार्मिक कार्यों की सुविधा बनी रहे ऐसी उचित व्यवस्था करना आवश्यक है। अशौच संदर्भ में (माता-पिता एवं सगे संबंधीयों को छोड़कर) अन्य सपिंड का अशौच आनेपर पुरोहित ने भी कार्यपूर्ति हेतु अशौच निवृत्ति के लिए गोमूत्र से शुद्धिकर यज्ञोपवीत बदलकर, प्रायश्ित्तात्मक गायत्री मंत्र का १००८ बार जपकर स्वीकृत कर्म करना चाहिए और यह कार्य संपन्न होने के बाद अशौच नियमों का पालन करना चाहिए। 


१) पुरोहित की केवल कर्म करने हेतु अशौच निवृत्ति यह विचार दूसरे पुरोहित की व्यवस्था न होनेपर संकटकाल के लिए है। 


२) मंगलकार्य के दिन यदि पुरोहित को सपिंडोंका अशौच आनेपर और दूसरे पुरोहित की व्यवस्था होना असंभव हो तब, पुरोहित को यजमान से इस संकट की चर्चाकर दूसरे पुरोहित की व्यवस्था करने हेतु सूचित करना चाहिए। 


३) यदि यजमान दूसरे पुरोहित की व्यवस्था करने में असमर्थ हो तब जिम्मेदारी लिए हुई पुरोहित को यजमान का नुकसान न हो इसलिए उपर्युक्त व्यवस्था के अनुसार शुद्धि और प्रायश्रवितात्मक जपकर नियतकार्य संपन्न करना चाहिए। परंतु ऐसी परिस्थिति में कर्म करने के पश्चात्‌ नाममात्र दक्षिणा लेना उचित होगा जिससे वह कर्म निःस्वार्थ भावना से करने की समाधान मिलेगा। यह स्वीकृत कर्म पूर्ण करने के बाद उसे पुन: अशौच के नियमों का पालन करना चाहिए। 

संकट के समय में कर्म करने हेतु अशौच निवृत्तिकर जिस तरह यजमान कार्य संपन्न करा सकता है और वह कार्य संपन्न कराने हेतु पुरोहित यजमान के घर जाकर वह कार्य संपन्न कराता है उसी प्रकार यदि पुरोहित को अशौच आता है तब कार्य निष्पादित करने हेतु अशौच निवृत्ति कर सके तथा यजमान के घर का कार्य संपन्‍न हो सके इस हेतु यह विचार रखा गया है। 


“शिल्पिनः कारुका बैद्या दासीदासास्च नापिता:। राजान: भ्रोत्रियाश्वैव सद्य:शौचा प्रकीर्तिता:।।” (पाराशर स्मृति ३1२०) 


शिल्पकार, चित्रकार, कारीगर, कारुका अर्थात्‌ रसोईया (महाराज), वैद्य (डॉक्टर), दासदासी (नौकर-चाकर), राजा तथा श्रोत्रिय आदि को अशौच होनेपर भी अपना नियत कर्म करते समय तथा दूसरों के यहाँ कर्म करते समय अशौच का दोष नहीं होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि, अशौच में भी यह व्यक्ति नियतकर्म कर सकते है, क्‍यों की वह सद्य:शुचि हैं। 


वर्तमान समय में बड़े शहरों में पुरोहितों की संख्या पर्याप्त है, परंतु छोटे गांवो में पौरोहित्य करनेवालों की संख्या बहुत कम है और कहीं-कहीं तो ३-४ गावों में एक ही पुरोहित है। उपरोक्त वचन का आधार लेकर पुरोहित ने जो कर्म स्वीकृत किया है वह कर्म अशौच आने के बाद दूसरी व्यवस्था न होनेपर उस कर्म को संपन्न करने हेतु अशौच निवृत्तिकर (श्राद्ध, प्रासंगिक एवं नैमित्तक पूजा) यजमान की, समाज की, गांव की अनिवार्य तथा आपद्धर्म व्यवस्था मानकर वह कर्म करना चाहिए। वह कार्य संपन्न होने के पश्चात्‌ शेष समय अशौच पालन करना चाहिए। पुरोहित ने यदि किसी विशिष्ट कालावधि हेतु यज्ञ-यागादि कर्म करने हेतु निमंत्रण लिया हो तब उस समय यदि अशौच आता है तथा दूसरी व्यवस्था न होनेपर उपर्युक्त प्रायश्चित्तात्मक विधि के अनुसार अशौच निवृत्तिकर यागादि कर्म करना चाहिए (शुद्धि प्रक्रिया अध्याय देखें) उपर्युक्त कर्म करते वक्त यदि पुन:पुन: स्पर्शास्पर्श का दोष आ रहा हो तो कर्म करने तक प्रतिदिन अशौच निवृत्ति करनी चाहिए परंतु यदि ऐसा दोष न आ रहा हो तब प्रतिदिन अशौच निवृत्ति करने की आवश्यकता नहीं है। प्रवचनकार, कीर्तनकार आदि भी आपत्काल में अशौच निवृत्तिकर, स्वीकृत कर्म कर सकते है। 


अशौच होते हुए भी बहुतसे कार्य करने हेतु अशौच मानने की आवश्यकता नहीं है, ऐसा 

शास्त्र वचन है। उदाहरण - वैद्य को अशौच नहीं होता है। एक अशौच में दूसरे अशौच की निवृत्ति होती है। मंगलकार्य निश्चित करने के बाद कर्ता को सपिंड का अशौच नहीं लगता है। अशौच निवृत्ति हेतु कृष्मांड मंत्र से होम, रजस्वला दोष परिहार हेतु श्रीपूजनादी शांति करना ऐसे परिहार बताए हैं। इसी प्रकार पुरोहितों को कर्मपूर्ति हेतु अशौच निवृत्ति यह समय की मांग है। इसका गंभीरता से विचारकर जिन्हें यह विचार मान्य हो वह इसे स्वीकार करें। 


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