सम्पूर्ण नवरात्री नवदुर्गा उपासना

  
माँ दुर्गा साक्षात शक्ति स्वरूपा हैं।माँ दुर्गा ही सम्पूर्ण सष्टि को शक्ति प्रदान करती है,वही सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। सम्पूर्ण सृष्टिउन्हीं से उत्पन्न होती है औरफिर अन्त में उन्हीं में लीन हो जाती है। इनकी शक्ति से ही ब्रह्मा आदि देवता बनते है जोसृष्टि की उत्पत्ति के प्रमुख कारक बन जाते हैं। इनकी शक्ति से ही विष्णु एवं शिव प्रकटहोते हैं जो सृष्टि का पालन तथा संहार करते हैं। निद्रा, स्फूर्ति, तृष्णा, दया, क्षमा, शुधा,भक्ति, धृति, मति, तुष्टि, पुष्टि, शांति, कांति, लज्जा आदि इन्हीं महाशक्ति की शक्तियां हैं।यही शक्तियां गोलोक में राधाजी, साकेत में सीताजी, क्षीरोद सागर में लक्ष्मीजी, दक्षकन्यासती, दुर्गविनाशिन मेनका पुत्री दुर्गाजी हैं। यही वाणी, विद्या, सरस्वती, सावित्री एवं गायत्रीहैं। पंच महाशक्ति, दश महाविद्या तथा नवदुर्गा हैं। यही अन्नपूर्णा है, यह जगतदात्री,कात्यायनी, ललिताम्बा है। यही शक्तिमान है और यही शक्ति है।दुर्गाजी का प्राकट्य

    शक्ति स्वरूपिणी दुर्गा के बारे में जानने के लिये कुछ और आगे बढ़ा जये, इससेपहले उनके प्राकट्य के बारे में भी जान लेना चाहिये- बहुत काल पहले की यह कथा है,तब दुर्गम नामक एक महाबली तथा अत्याचारी असुर उत्पन्न हुआ। उसने ब्रह्माजी को प्सत्रकरने के लिये कठोर तपस्या की। ब्रह्माजी उसकी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उसेदर्शन देकर वर मांगने को कहा। उसने ब्रह्माजी से मनचाहा अद्भुत वर प्राप्त कर लिया।इसवरदान के प्रभाव से उसने चारों वेदों का अपहरण कर छिपा दिया। ब्रह्माजी द्वारा प्राततवरदान की शक्ति ने उसे अत्याचारी बना दिया। पृथ्वी पर ऋषि-मुनियों के धार्मिक कायों मेंवह विष्न पहुँचाने लगा। उसके द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों के बारे में जानकर देवगणभी भय का अनुभव कर रहे थे। वेदों के लुस हो जाने के कारण समस्त धार्मिक क्रियायेंअस्त-व्यस्त हो गई थी। इसी समय दुर्गम ने अपनी आसुरी शक्ति बल से जल के खोतों कसुखा डाला। नदी, नाले सब सूख गये। जल के अभाव में कृषि कार्य बाधित हो गया।परिणामस्वरूप अकाल की स्थिति बन गई। चारों तरफ परिस्थितियां इतनी भयानक लगनेलगी थी जिससे ऐसा लगने लगा मानो सृष्टि का अन्त आ गया हो। ऐसे में सब देवता तथाऋषि-मुनि ब्रह्माजी के पास गये और दुर्गम से बचाने की पुकार लगाई। ब्रह्माजी ने अपनीविवशता प्रकट कर दी कि उस असुर ने उनसे ही वर प्राप्त किया है। इसलिये आप सभीशक्तिस्वरूपा भगवतीजी के पास जाओ, वही तुम्हें इस संकट से मुक्त कर सकेंगी। सभी माँभगवती के पास आये और उन्हें अपने दुःखों के बारे में बताया। उनसे प्रार्थना की कि माँ,आपने जैसे शुम्भ-निशुम्भ, धूम्राक्ष, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज, मधु कैटभ तथा महिष आदिअसुरों का वध किया है, उसी प्रकार से दुर्गम असुर का वध करके हमारी रक्षा करें। माँभगवती उन सबकी बातें सुनकर करुणा से भर गई। अन्न-जल के लिये छटपटाते लोगों परदया एवं करुणा हो आयी। उनके अनन्त नेत्रों से अश्रूजल की सहस्त्रों धारायें प्रवाहित हो     وउठी। नदियों एवं समुद्र में अथाह जल भर गया। देवी भगवती ने गायों के लिये हरी एवंबाटे। उनके इस स्नेहपूर्ण व्यवहार से सभी सन्तुष्ट हो गये।

    मधुर घास की व्यवस्था करने के साथ-साथ दूसरे समस्त प्राणियों के लिये भी यथायोग्य भोजन की व्यवस्था कर दी। देवताओं एवं महात्माओं को उन्होंने अपने हाथों से मीठे फल तब सभी ने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि माता जैसे आपने समस्त जगत को मरने से बचा कर हमारा उपकार किया, उसी प्रकार दुर्गमासुर का वध करके हमारा कल्याण करें।हमारी भी रक्षा करें। सबकी बातें सुनकर देवी भगवती ने कहा कि आपको मेरे से जो भी

    अपेक्षायें हैं, मैं उन सबको पूरा करूंगी। आप सभी पूरी तरह से निश्ित होकर अपने-अपनेलोकों को लौट जायें। समस्त देवताओं और ऋषि-मुनियों ने देवी को प्रणाम किया और अपने-अपने स्थानों को लौट गये। रक्षा का आश्वासन प्राप्त करके सभी लोकों में आनन्द छा गया।इस बारे में जब दुर्गमासुर को पता चला तो वह आध्चर्य से भर उठा। उसने सोचा किमेरे क्रूर व्यवहार से तीनों लोकों में तराहि-त्राहि मची हुई थी, देवता भी उससे घबराते थे, अब एकाएक यह क्या हो गया कि भय से मुक्त हो सभी आनन्द से भर रहे हैं। असुर दुर्गमने इस बारे में और अधिक जानकारी ली तो सारी स्थिति स्पष्ट हो गयी। इससे निपटाने केलिये उसने अपनी विशाल सेना से तत्काल देवलोक को घेर लिया। यह सब देखकर देवीभगवती ने देवताओं तथा समस्त सृष्टि को बचाने के लिये अपने दिव्य तेज बल से देवलोक

    के चारों तरफ एक अभेद दीवार खड़ी कर दी और स्वयं दुर्गमासुर का विनाश करने के लियेइस दीवार से बाहर आ गयी। देवी भगवती को देखते ही असुर सेना ने उन पर आक्रमणबोल दिया। तभी देवी के शरीर से सुन्दर एवं तेजबल से युक्त काली, तारा, छिन्नमस्ता,निकरली। यही दसमहाविद्यायें कहलायी। ये दस महाविद्यायें अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुये

    श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमा, त्रिपुर सुन्दरी तथा मातंगी सहित दस देवियांथी। तभी असंख्य मात्रिकायें भी प्रकट हो गयी। सभी के सिर पर चन्द्रमा का मुकुट था।सभी बिजली के समान चमकवान दिखाई दे रही थीं। इन सभी शक्तियों ने देखते ही देखतेदुर्गमासुर की विशाल सेना को काट डाला। बाद में देवी ने अपने तीक्ष्ण नोक वाले त्रिशूल सेदुर्गमासुर का वध कर दिया। इस प्रकार से देवी भगवती ने अति बलशाली और भयंकरअसुर दुर्गम का वध किया था, इस कारण से उन्हें दर्गा कहा जाता है। असुर दुर्गम का वध करने के पश्चात देवी दुर्गा ने वेदों का उद्धार करके उन्हें पुनः देवताओं को लौटा दिया। चारोंतरफ देवताओं एवं मनुष्यों के द्वारा देवी दुर्गा की जय-जयकार होने लगी।
महातम्य कथा 

एक समय बृहस्पति जी ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन श्रेष्ठ! चैत्र व आश्विन मास के शुक्लपक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? इस व्रत का क्या फल है, इसे किस प्रकार करना उचित है? पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहिये।

बृहस्पतिजी का ऐसा प्रश्न सुन ब्रह्माजी ने कहा- हे बृहस्पते! प्राणियों के हित की इच्छा से तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेव, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। यह नवरात्र व्रत संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र की कामना वाले को पुत्र, धन की लालसा वाले को धन, विद्या की चाहना वाले को विद्या और सुख की इच्छा वाले को सुख मिलता है। 

इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है। मनुष्य की संपूर्ण विपत्तियां दूर हो जाती हैं और घर में समृद्धि की वृद्धि होती है, बन्ध्या को पुत्र प्राप्त होता है। समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है और मन का मनोरथ सिद्ध हो जाता है। 

जो मनुष्य इस नवरात्र व्रत को नहीं करता वह अनेक दुखों को भोगता है और कष्ट व रोग से पीड़ित हो अंगहीनता को प्राप्त होता है, उसके संतान नहीं होती और वह धन-धान्य से रहित हो, भूख और प्यास से व्याकूल घूमता-फिरता है तथा संज्ञाहीन हो जाता है। 

जो सधवा स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह पति सुख से वंचित हो नाना दुखों को भोगती है। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और दस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा का श्रवण करे।

हे बृहस्पते! जिसने पहले इस महाव्रत को किया है वह कथा मैं तुम्हें सुनाता हूं तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्माण मनुष्यों का कल्याम करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो।

ब्रह्माजी बोले- प्राचीन काल में मनोहर नगर में पीठत नाम का एक अनाथ ब्राह्मण रहता था, वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके संपूर्ण सद्गुणों से युक्त सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। 

वह कन्या सुमति अपने पिता के घर बाल्यकाल में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन जब दुर्गा की पूजा करके होम किया करता, वह उस समय नियम से वहां उपस्थित रहती। एक दिन सुमति अपनी सखियों के साथ खेल में लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। 

उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और वह पुत्री से कहने लगा अरी दुष्ट पुत्री! आज तूने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ट रोगी या दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।

पिता का ऐसा वचन सुन सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी- हे पिता! मैं आपकी कन्या हूं तथा सब तरह आपके आधीन हूं जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा से, कुष्टी से, दरिद्र से अथवा जिसके साथ चाहो मेरा विवाह कर दो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है, मेरा तो अटल विश्वास है जो जैसा कर्म करता है उसको कर्मों के अनुसार वैसा ही फल प्राप्त होता है क्योंकि कर्म करना मनुष्य के आधीन है पर फल देना ईश्वर के आधीन है।

जैसे अग्नि में पड़ने से तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं। इस प्रकार कन्या के निर्भयता से कहे हुए वचन सुन उस ब्राह्मण ने क्रोधित हो अपनी कन्या का विवाह एक कुष्टी के साथ कर दिया और अत्यन्त क्रोधित हो पुत्री से कहने लगा-हे पुत्री! 

अपने कर्म का फल भोगो, देखें भाग्य के भरोसे रहकर क्या करती हो? पिता के ऐसे कटु वचनों को सुन सुमति मन में विचार करने लगी- अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह कन्या अपने पति के साथ वन में चली गई और डरावने कुशायुक्त उस निर्जन वन में उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।

उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देख देवी भगवती ने पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रगट हो सुमति से कहा- हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुझसे प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो सो वरदान मांग सकती हो। भगवती दुर्गा का यह वचन सुन ब्राह्मणी ने कहा- आप कौन हैं वह सब मुझसे कहो? 

ब्राह्मणी का ऐसा वचन सुन देवी ने कहा कि मैं आदि शक्ति भगवती हूं और मैं ही ब्रह्मविद्या व सरस्वती हूं। प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।

तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतांत सुनाती हूं सुनो! तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। 

उन लोगों ने तुझको और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न जल ही पिया इस प्रकार नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ, इस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर मैं तुझे मनोवांछित वर देती हूं, तुम्हारी जो इच्छा हो सो मांगो।

इस प्रकार दुर्गा के वचन सुन ब्राह्मणी बोली अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे। मैं आपको प्रणाम करती हूं कृपा करके मेरे पति का कोढ़ दूर करो। देवी ने कहा- उन दिनों तुमने जो व्रत किया था उस व्रत का एक दिन का पुण्य पति का कोढ़ दूर करने के लिए अर्पण करो, उस पुण्य के प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से मुक्त हो जाएगा।

ब्रह्मा जी बोले- इस प्रकार देवी के वचन सुन वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से जब उसने तथास्तु (ठीक है) ऐसा वचन कहा, तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ट रोग से रहित हो अति कान्तिवान हो गया। 

वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देख देवी की स्तुति करने लगी- हे दुर्गे! आप दुर्गति को दूर करने वाली, तीनों लोकों का सन्ताप हरने वाली, समस्त दु:खों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न हो मनोवांछित वर देने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली जगत की माता हो। 

हे अम्बे! मुझ निरपराध अबला को मेरे पिता ने कुष्टी मनुष्य के साथ विवाह कर घर से निकाल दिया। पिता से तिरस्कृत निर्जन वन में विचर रही हूं, आपने मेरा इस विपदा से उद्धार किया है, हे देवी। आपको प्रणाम करती हूं। मेरी रक्षा करो।

ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! उस ब्राह्मणी की ऐसी स्तुति सुन देवी बहुत प्रसन्न हुई और ब्राह्मणी से कहा- हे ब्राह्मणी! तेरे उदालय नामक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीध्र उत्पन्न होगा। 

ऐसा वर प्रदान कर देवी ने ब्राह्मणी से फिर कहा कि हे ब्राह्मणी! और जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मांग ले। भगवती दुर्गा का ऐसा वचन सुन सुमति ने कहा कि हे भगवती दुर्गे! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्र व्रत की विधि और उसके फल का विस्तार से वर्णन करें।

महातम्य- इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुन दुर्गा ने कहा- हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हें संपूर्ण पापों को दूर करने वाले नवरात्र व्रत की विधि बतलाती हूं जिसको सुनने से मोक्ष की प्राप्ति होती है- आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करें।

विद्वान ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापन करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचें। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवी की मूर्तियां स्थापित कर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधिपूर्वक अर्घ्य दें। 

बिजौरा के फल से अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से अर्घ्य देने से कीर्ति, दाख से अर्घ्य देने से कार्य की सिद्धि होती है, आंवले से अर्घ्य देने से सुख की प्राप्ति और केले से अर्घ्य देने से आभूषणों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार पुष्पों व फलों से अर्घ्य देकर व्रत समाप्त होने पर नवें दिन यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, बिल्व (बेल), नारियल, दाख और कदम्ब आदि से हवन करें। 

गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, खीर एवं चम्पा के पुष्पों से धन की और बेल पत्तों से तेज व सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति की और केले से पुत्र की, कमल से राज सम्मान की और दाखों से संपदा की प्राप्ति होती है। खांड, घी, नारियल, शहद, जौ और तिल तथा फलों से होम करने से मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। 

व्रत करने वाला मनुष्य इस विधि विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस प्रकार बताई हुई विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। 

इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना फल मिलता है। इस नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मंदिर अथवा घर में विधि के अनुसार करें।

ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अर्न्तध्यान हो गई। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूवर्क करता है वह इस लोक में सुख प्राप्त कर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता है।

हे बृहस्पते! यह इस दुर्लभ व्रत का महात्म्य है जो मैंने तुम्हें बतलाया है। यह सुन बृहस्पति जी आनन्द से प्रफुल्लित हो ब्राह्माजी से कहने लगे कि हे ब्रह्मन! आपने मुझ पर अति कृपा की जो मुझे इस नवरात्र व्रत का महात्6य सुनाया। 

ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! यह देवी भगवती शरक्ति संपूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है? बोलो देवी भगवती की जय।

व्रत की विधि प्रात: नित्यकर्म से निवृत हो, स्नान कर, मंदिर में या घर पर ही नवरात्र में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा करनी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष लाभदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विध्न दूर हो जाते हैं तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।

*********
प्रार्थना

हे परमेश्वरी! मेरे द्वारा रात दिन सहस्त्रों अपराध होत हैं 'यह मेरा दास है' समझ कर मेरे अपराधों को क्षमा करो। हे परमेश्वरी! मैं आह्वान, विसर्जन और पूजन करना नहीं जानता, मुझे क्षमा करो। हे सुरेश्वरी! मैंने जो मंत्रहीन, क्रियाहीन, भक्तयुक्त पूजन किया है वह स्वीकार करो। हे परमेश्वरी! अज्ञान से, भूल से अथवा बुद्धि भ्रान्ति से जो न्यूनता अथवा अधिकता हो गई है उसे क्षमा करिये तथा प्रसन्न होईये।

जाप मंत्र- ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नम:। मनोकामना सिद्धि के लिए इस मंत्र को 108 बार या सुविधा अनुसार जाप करें।

    देवी दुर्गा का विराट स्वरूप

    देवी दुर्गा का स्वरूप अत्यन्त विराट है। उनके दर्शन करने मात्र से मनुष्यों एवं देवों का  उद्धार हो जाता है वहीं असुर, दानव आदि भय से भर जाते हैं। उन्हें देवी दुर्गा के रूप मे अपना काल दिखाई देता है। देवी के मस्तक पर विराजित चन्द्रमा अत्यधिक शोभायमान     होता है। देवी दुर्गा अपने हाथों में शंख, चक्र, तलवार एवंत्रिशूल धारण किये रहती हैं।उनके तीननेत्र हैं। वे सिंह के ऊपर सवार रहती हैं और अपने दिव्य तेज से तीनों लोकों कोआलोकित करती रहती हैं। देवी दुर्गा कहती हैं-अहं ब्रह्मस्वरूपिणी, मतः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् अर्थात् मैं ब्रहमस्वरूपिणी हूँ। मुझसे ही प्रकृति-पुरुषात्मक जगत उत्पन्नहोता है। इन देवी दुर्गा की पूजा-उपासना का फल अतिशीष्र प्रास हो जाता है। चारों तरफ सेसंकट एवं समस्याओं से घिरा त्रस्त मनुष्य अगर देवी दुर्गा का ध्यान करता है, अपने उद्वारकी प्रार्थना करता है तो देवी दुर्गा की कृपा से उसके भीतर शक्ति का संचार होने लगता हैऔर इसी शक्ति से वह संकट एवं समस्याओं को संघर्ष करके समातत कर देता है। देवी दुर्गासाक्षात शक्ति का स्वरूप हैं। दुर्गाजी का समस्त मनुष्यों को यह वरदान है कि अगर वे किसीभी प्रकार के संकट में आते हैं, अनेक प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होकर जीवन को आक्रांतकर रही हों, चारों तरफ निराशा का घोर अंधकार जीवन को निगलने के लिये आतुर दिखेतब शांतचित्त से शक्तिस्वरूपिणी देवी दुर्गा का ध्यान-जाप करना चाहिये। इसका शीघ्र हीप्रभाव दिखाई देने लगता है अन्धेरा दूर होकर प्रकाश की किरणें फूट पड़ती हैं, देवी दुर्गा सेप्राप्त शक्ति से मनुष्य अपने संकट, समस्याओं तथा दुःखों से पार पाने में सफल हो जाता है।देवी दुर्गा की महिमा

    देवी दुर्गा की महिमा के बारे में बात कर पाना किसी के लिये भी सम्भव नहीं है। वेइतनी विराट स्वरूपिणी हैं कि उनके किसी एक स्वरूप के बारे में जानने में सहस्त्रों वर्ष लगजाते हैं फिर भी ऐसा लगता है अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। उनकी शति के आगे अन्यकोई शक्ति दिखाई नहीं देती है। इसे स्वयं परमेश्वर ने स्वीकार किया है। वे कहते हैं कि-ईश्वरोउहं महादेवि केवलं शक्ति योगतः।शक्ति बिना महेशानि सदाहं शव रूपक॥शक्ति युक्तों देवि शिवोऽहं सर्वकामदः॥

    अर्थात् हे महादेवी, केवल शक्ति के योग से ही मैं ईश्वर हूँ। शक्ति के बिना मैं शव केसमान हूँ। जब शक्ति से सम्पन्न होता हूँ तभी मैं सर्वकामप्रद कल्याणकार शिव होता हूँ।

    सृष्टि क्रम में आद्य एवं प्रधान होने के कारण ही देवी दुर्गा को प्रकृति कहा गया है।प्रकृति के तीन शब्द प्र कृ ति के तीन गुणों सत्व, रज एवं तम के घोतक हैं। यह सभीपरिणाम स्वरूपा हैं। इसी कारण से दुर्गा को दुर्जेया माना गया है, इसी कारण प्रकृति को दुर्गाकहा गया है। जिस प्रकार प्रकृति सभी मनुष्यों का कल्याण करने वाली है, उसी प्रकार सेदेवी दुर्गा भी मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाली आसुरी प्रवृत्तियों को समास कर उन्हेंमनुष्यत्व प्रदान कर देवत्व की ओर अग्रसर करती है। दुर्गा शब्द की व्याख्या करने से हीयह स्पष्ट हो जाता है। दुर्गा शब्द में द अक्षर दुःख, दरिद्रता, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन तथा दुष्टों एवंदैत्यों के विनाश का सूचक है, र अक्षर रोग का नाशक है तथा ग पापग्र, अधर्म, अन्याय,     आलस्य तथा असुरों का नाश करता है। दुर्गा शब्द की संक्षिस व्याख्या दुःख, दरिद्रता, रोग,पाप, आलस्य एवं शत्रुओं का नाश करने के रूप में की जा सकती है। देवी दुर्गा ही वाक्,बुद्धि,विद्या, ज्ञानरूपिणी प्रकृति सरस्वती है। देवी दुर्गा के किसी भी रूप की पूजा-उपासना कर कामनाओं से भी अधिक लाभ की प्राति हो सकती है।

    शक्ति एवं शक्त का महत्त्व

    सम्पूर्ण सृष्टि को चलायमान और गतिशील बनाये रखने में शक्ति की अहम् भूमिका हैकिन्तु इसमें शक्त अर्थात् मनुष्य की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। दूसरे शब्दों में शक्ति नहीं तोकुछ भी नहीं, इसके उपरांत भी सभी कुछ शक्ति पर ही अवलम्बित नहीं है। एक व्यक्तिकुछ दिनों से रोग से ग्रस्त है। उपचार के पश्चात् भी रोग ने मनुष्य को अशक्त एवं क्षीण बनादिया है। वह अपने पलंग पर ही लेटा रहता है, उठकर चल-फिर भी नहीं सकती। तभीएक दिन उसका एक मित्र किसी कार्यवश उसके पास आया और द्वार पर खड़े होकर उसेआवाज लगायी कि मित्र, तुमसे एक आवश्यक कार्य है, एक बार बाहर तो आओ। भीतरसे रोगी व्यक्ति क्षीण स्वर में उत्तर देता है कि मित्र, रोग ने मुझे अशक्त बना दिया है। मेरे मेंइतनी शक्ति नहीं है कि मैं उठकर बाहर आ सकूं। इसलिये तुम ही भीतर आ जाओ। रोगीव्यक्ति के कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि शक्ति एक ऐसी वस्तु है जिसके अभाव मेंव्यक्ति चल-फिर भी नहीं सकता है। रोगी मनुष्य की शक्ति क्षीण हो गयी है किन्तु वहअभी जीवित है लेकिन जीवित होते हुये भी शक्ति के बिना कोई कार्य नहीं कर पा रहा है।इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि शक्त (मनुष्य) के अभाव में शक्ति का ठीक सेउपयोग नहीं हो सकता अथवा यह भी कह सकते हैं कि शक्ति के द्वारा ही शक्त की क्रियायेंनिश्चित होती हैं। इस प्रकार यहाँ भी शक्ति की ही श्रेष्ठता सिद्ध होती है। उपरोक् स्थिति कोकुछ और आगे बढ़ाते हैं। उपरोक्त घटना को चार मास व्यतीत हो जाते हैं, जो व्यक्ति रोगीथा, वह स्वस्थ हो चुका है, उसमें शक्ति आ गयी है। उस व्यक्ति से मिलने के लिये फिर सेएक मित्र आया। उसने भी द्वार पर खड़े होकर आवाज लगाई और बाहर आने को कहा।उस व्यक्ति ने भीतर से ही उत्तर दिया कि आज शक्ति होते हुये भी बाहर आने की इच्छानहीं है, इसलिये तुम ही भीतर आ जाओ। इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि अब शक्त मेंशक्ति तो है किन्तु इच्छा नहीं है अर्थात् शक्ति को भी शक्त के अनुसार चलना पड़ता है।अकेले में शक्ति स्वत्र नहीं है और शक्ति के बिना शक्त कोई काम नहीं कर सकता है।तात्पर्य यह हो सकता है कि शक्त एवं शक्ति के सम्बन्ध से ही समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।इसलिये कोई भी मनुष्य शक्ति के अभाव में अपना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं कर सकता है।शक्ति प्रात्ति के लिये अन्य किसी प्रकार के प्रयोजन करने की अपेक्षा शक्ति अर्थात् देवी दुर्गाकी पूजा-उपासना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाये ताकि दुःख, क्लेश, दरिद्रताआदि से मुक्त होकर आनन्दपूर्वक जीवन जीया जाये।

    माँ भगवती के नौ रूप

    हिन्दू धर्म में नवरात्रि को एक बहुत बड़े पर्व के रूप में मानाया जाता है। इसमें शायदही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नवरात्रों में भगवती दुर्गा की पूजा-साधना करते हुये 9 दिन केव्रत न रखता हो। यहां तक कि यदि कोई अस्वस्थ होता है और वह पूरे १ दिन व्त नहीं रखपाता है तो वह भी प्रथम दिन व नवमी को तो व्रत अवश्य ही रखता है। नवरात्रि वर्ष में दोबार, आती है। प्रथम चैत्र मास में अर्थात् अप्रेल में और द्वितीय आश्विन मास अर्थात् अक्टूबरमें जिसे हम शस्द्ीय नवरात्र भी कहते हैं। यद्यपि जुलाई मास में गुप नवरात्र होते हैं लेकिनइसका मत्व सिर्फ तंत्र में विश्वास रखने वालों के लिये होता है अर्ात् इस नरात् में तांत्रिकविशिष्ट सिद्धियों की प्राति के लिये साधना-अनुष्ठान करते हैं। भगवती दुर्गा के नौ स्वरूपोकी पूजा इन नवरात्र में की जाती है। इस अध्याय में नवरात्र में १ देवियों के प्रत्येक रूप केबारे में जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है। नवरात्र के नौ दिनों में भगवती देवी दुर्गाके किस-किस रूप की पूजा की जाती है, उसके अधिष्ठात्री देवी कौन है, उन्हें भोग में क्याप्रिय है तथा सामान्य प्रकार से इनका पूजन किस प्रकार से किया जा सकता है जिससे माँप्रसत्न होकर त्वरित फल प्रदान करें, यह सब इस अध्याय में बताने का प्रयास किया गयाहै। इसके साथ ही आपको दुर्गसिसशती के पाठ के बारे में जानकारी भी दी जायेगी। दुर्गाससशती के पाठ करने का विधि-विधान होता है, किन्तु इसमें 700 श्लोक होने के कारणसामान्य गृहस्थ अथवा महिला एक दिन में पाठ समास नहीं कर सकता है। इस अध्याय केद्वारा आप जान पायेंगे कि विधान अनुसार १ दिन में सतशती का पाठ किस प्रकार कियाजाये जिससे आपको पूर्ण फल प्राप्त हो।

    प्रथम माँ शैलपुत्री

    मां भगवती का यह प्रथम रूप है। प्रथमा तिथि को इनका ही पूजन किया जाता है।हिमालय राजा के यहां जन्म लेने से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इनका वाहन वृषभ है। उनकेदाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का पुष्प है। भोग के रूप में इन्हें गाय का चीप्रिय है। इनके पूजन से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। इससे मनुष्य के तपबल, सदाचार

    और संयम की वृद्धि होती है।

    ध्यानम् :-

    वन्दे वांच्छितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
    वृषारूढां शैलपुत्री यशस्विनीम्॥
    पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधारस्थितां प्रथम दुर्गाँ त्रिनेत्रा।
    पटाम्बर परिधानां रत्नकिरीटां नानालंकारभूषिता।
    प्रफुल्ल वदनां प्वार्छरा कातंकपोलां तुग कुचाम्।
    कमनीयां लावण्यां स्मेरमुर्खी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्।

    स्तोत्रम् :-

    प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर तारीणीम्।
    धन ऐश्वर्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥
    त्रिलोकजननी त्वंहि परमानन्द प्रदीविनीम्।
    सौभाग्यारोग्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्।
    चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह विनाशिन।
    भुक्ति मुक्ति दायनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥

    कवचम् :-

    ॐकार: मे शिरः पातु मूलाधार निवासिनी।
    हॉकारः पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
    श्रीकारः पातु वदने लजारूपा महेश्वरी।
    हुँकारः पातु हृदये तारिणी शक्ति स्वधृत॥
    फट्कारः पातु सर्वाँगे सर्व सिद्धि फलप्रदा।
===========================
    द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी

    दधाना करपदमाभ्यामक्षमालाकमण्डलम्।
    देवी प्रसीदतु मयि ब्रहमचारिण्यमुत्तमा॥

    मां भगवती का द्वितीय रूप माँ ब्रह्मचारिणी का है। वेदतस्वयं तपो बहम वेद अर्थाततत्व और ताप ब्रह्म का अर्थ है और ब्रह्म का अर्थ तपस्या होता है। तप का आचरण करनेवाली माँ भगवती को ब्रह्मचारिणी कहा जाता है।ब्रह्मचारयितु शीलं यस्याः सा ब्रहांचारिणीअर्थात् सच्चिदाननदमय ब्रह्मस्वरूप की प्रात्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ब्रहमचारिणी हैं।मां ब्रहाचारिणी का स्वरूप ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इनके दाहिने हाथ में तप कीमाला और बायें हाथ में कमण्डल है। इन्हें भोग में शकर प्रिय है। इनकी सेवा से स्वाधिष्ठानचक्र जाग्रत होता है।

    ध्यानम् :-

    वन्दे वांच्छित लाभाय चन्द्रार्थकृत शेखराम्।जपमाला कमण्डलुर्धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥गौरवरणा सवाधिष्ठाननसथित दवतीय दुरगा त्रनेत्राम।
    धवल परिधानां ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
    कमनीयां लावण्यां स्मेरमुखी निम्न नारभि नितम्बनीम्॥
    स्तोत्रम् :-
    तपश्चारिणी त्वहि तापत्रय निवारणीम्।
    ब्रहमरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

    धनदा सुखदा ब्रहमचारिणी प्रणमाम्याहम्।शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायनीll
    शान्तिदा मानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

    कवचम् :-

    त्रिपुरा मे हृदये पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।अर्पणा सदापातु नेत्रो अधरो च कपोलो॥पंचदशी कणठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी।षोडशी सदापातु नाभौ गृहो च पादयो॥अंग प्रत्यंग सततं पातु ब्रह्मचारिणी

=======================================
तृतीया माँ चन्द्रघण्टा

    पिण्डजप्रवारूढा चण्डकोपास्त्ैकुर्युता।प्रसादं तनुते महं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥तृतीया तिथि को माँ भगवती के चन्द्रघण्टा रूप का पूजन किया जाता है। माँ चंद्रघण्टारूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। माँ के मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्रइसलिये इनका नाम चन्द्रघण्टा है। चन्द्रः घण्टायां यस्याः सा अर्थात् आल्हादकारीद्रमा जिनकी घण्टा में स्थित हो उन देवी का नाम चन्द्रघण्टा है। इनके शरीर का रंग स्वर्णआन चमकीला है। इनके दस हाथ हैं जिनमें खड्ग, बाण आदि शस्त्र विभूषित हैं। इनकाइन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिये उद्यत रहने को रहती है। इनके घण्टे की टंकारती चण्डध्वनि से दानव-दैत्य आदि सदैव कम्पित रहते हैं। मां चन्द्रघण्टा की उपासनाने से मणिपूर चक्र जाग्रत होता है।

 माँ चन्द्रघण्टा को भोग के रूप में दूध प्रिय है।ध्यानम् :-वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।

    सिंहारूढ़ां दशभुजां चन्द्रघण्टेति यशस्वनीम्॥कंचनाभां मणिपूर स्थितां तृतीया दुर्गा त्रिनेत्राम्।

    खड्ग गदा त्रिशूल चापशंर पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्यां नानालंकार भूषिताम्।मंजीर हार केयूर किंकिणि रत्रकुण्डल मण्डिताम्॥प्रफुल्ल बन्दना विवाधारा कांत कपोलां तुग कुचाम्।कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटिं नितंबनीम्॥

स्तोत्रम् :-

    आपडुद्धारिणी त्वंहि आधा शक्तिः शुभा पराम्।अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणामाम्याहम्॥
    चन्द्रमुखी इए्टदात्री इष्ट मंत्र स्वरूपणीम्।

    धनदात्री आनंददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्याहम्॥सौभाग्यारोग्यादायनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्याहम्॥

    नानारूपधारिणी, इच्छामयी, ऐश्वर्यप्रदायनीम्।

    कवचम् :-

    रहस्यं श्रृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।

    श्री चन्द्रघण्टास्य कवच सर्वंसिद्धि प्रदायकम्॥बिना न्यास बिना विनियोर्ग विना शापोद्धार बिना हो्म।स्नान शौचकादिकं नास्ति श्रद्धाभात्ररण सिद्धिदम्॥कुशिष्याय कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च।न दातव्य दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥
===========================
    चतुर्थ माँ कूष्मांडा

 सुरासम्पूर्णकलश रूधिरात्प्लूमेव च। 
दधानां हस्तपदमाभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

    चतुर्थी तिथि को माँ भगवती के कूष्माडा स्वरूप का पूजन किया जाता है। कुत्सितःऊष्मा कूष्मा-त्रिविध तापयुक्त संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः साकूष्मांडा अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है, वे भगवती कूष्मांडाकहलाती हैं। अपनी मंद हंसी द्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें माँकृष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि का कोई स्वरूप नहीं था, ब्रह्ाण्ड काअस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार व्यास्त था, तब माँ कूष्माण्डा देवी ने अपने ईषत हास्यसे ब्रह्माण्ड की रचना की थी। इसलिये यही सृष्टि की आदि स्वरूपा आदिशक्कि हैं। माँकृष्मंडा की आठ भुजायें हैं। अतः ये अष्टभुजा के नाम से भी जानी जाती हैं। संस्कृत मेंकुम्हड़े को कूष्माण्डा भी कहते हैं और माँ को कुम्हड़े की बली सर्वाधिक प्रिय है, इसलियेभी इन्हें कृष्मांडा कहते हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प,अमृतपूर्ण कलश, चक्र व गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियां और निधियों को देने वालीजपमाला है। माँ को भोग में मालपुआ प्रिय है। माँ कूष्माण्डा का जप व पूजा-अर्चना करनेसे अनाहत चक्र जाग्रत होता है, जिससे समस्त रोग व शोक समास होते हैं।

    ध्यानम् :-
    बन्दे वांछित कामर्थें चन्द्राधृकृत शेखराम्।
 सिंहारूड़ा अष्टभुजां कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥भास्वर भानु निभा अनाहत स्थिता चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।कमण्डलु चाप, बाण, पदममूर्धाकलशं, चक्र, गदा जपवटीधराम्॥
    पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्यां नानालंकार भूषिताम्।
    मंजीर हा केयूर किंकिणि रत्कुण्डल मण्डताम्॥
    प्रफुल वन्दना चारू चिबुकां कांत कपोलां तुग कुचाम्।
    कोमलांगी स्मेरमुखी क्षीणकटि निम्ननार्भि निरतबनीम्॥

    स्तोत्रम् :-

    दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशनीम्।
    जयदा धनदां, कूष्माण्डे प्रणमाम्याहम्॥
    जगन्माता जगत्कत्री जगदाधार रूपणीम्।
    चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्याहम्॥
    त्रैलोक्येसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।
    परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्याहम्॥

    कवचम् :-

    हसरे में शिरः पातु कू्माण्डे भयनाशिनीम्।
    हललकरी नेत्रच हसरौश्च ललाटकम्॥
    कौमारी पातु सर्वगात्रे वाराही उत्तरे तथा।
    पूर्व पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम॥
    दिग्विदिक्ष सर्वत्रेवं कूं बीजं सर्वदावतु॥

    पंचम माँ स्कन्दमाता

    सिंहासनगता नित्यं पदमाश्रितकरद्वया।
    शुभदासतु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

    पंचमी तिथि को माँ भगवती के स्कन्दमाता स्वरूप का पूजन किया जाता है। स्कन्दकुमार अर्थात् कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कन्दमाता हुआ है। छान्दोग्यश्रुतिके अनुसार माँ भगवती की शक्ति से उत्पत्न हुये सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, इसलिये इनकानाम स्कन्दमाता हुआ। स्कन्दमाता का वाहन मयूर है। इनके विग्रह चक्र में भगवान स्कन्दबालरूप में इनकी गोद में बैठे हैं। स्कन्द माता के जप-स्तोत्र व पूजा अर्चना से विशुद्धचक्र जाग्रत होता है जिससे मनुष्य की समस्त इच्छा पूर्ति के साथ वह शांति और सुख काअनुभव करता है। स्कन्द माता की चार भुजायें हैं जिसमें वे दाहिनी ओर की भुजा मेंभगवान स्कन्द कुमार को गोद में ऊपर उठाये हैं। दाहिनी ओर की नीचे वाली भुजा ऊपरकी ओर उठी हुई है। उसमें कमल पुष्प है। बायीं ओर की ऊपर वाली भुजा वर मुद्रा मेंतथा नीचे वाली भुजा ऊपर उठी हुई है। उसमें भी कमल पुष्प है। माता कमल के आसनपर विराजमान हैं। इनका वर्ण पूर्ण शुध्र है। इसलिये इनको पद्मासनादेवी भी कहते हैं।इनका भी वाहन सिंह है। भोग के रूप में माता को केला प्रिय है।
    ध्यानम् :-वन्दे वांछित कामार्थे चन्दाधृकृत शेखेराम्।सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्धमाता यशस्वनीम्॥धवलवर्णा विशुद्ध चक्रस्थितां पंचम दुर्गा त्रिनेत्राम्।अभय पदम युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधरामभजेम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।मंजीर हार केयूर किंकिणि रत्न कुण्डल धारिणीम्॥

    प्रफुल वन्दना वलवाधरां कान्त कपोलां पीन पयोधराम्।कमनीयां लावण्यां चारू त्रिवलीं नितंबनीम्॥

स्तोत्रम् :-

    नमामि स्कन्धमाता, स्कन्धधारिणीं।समग्रत्वसागरमपारपार गहराम्॥

    शिवाप्रभां समुजजवलां स्फुरच्छशागंशेखरम्।ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्िभास्कराम्॥महेन्द्रकश्यपपार्चिता सनत्कुमारसंस्तुताम्।सुरासुरेन्द्रवन्दितां यथार्थीनिर्मलादभुताम्॥अन्तक्यरोचिरूर्जिताम् विकारदोषवर्जिताम्।मुमुक्षभिविचिन्तिताम् विशेषत्वमूचिताम्॥नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।

    सुशुद्धतत्वतोषणां त्रिवेदमारभूषणाम्॥सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रवैरिघातिनीम्।शुभा पुष्पमालिनी सुवर्णकल्पशंखिनीम्॥तमोअन्धकार यामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।सहस्त्रसूर्यराजिकाम् धनंजययोग्रकारिकाम्॥सुशुद्ध काल कन्दलाम सुभृडवृन्दंजजुलाम।प्रजायिनी प्रजावती नमामि मातरं सताम्।स्वकर्म कारिणे गतिं हरिप्रयाच्च पार्वतीम्।अनन्त शक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्ति मुक्तिदाम्॥पुनः पुनर्जगद्धिताम् नमाम्यहम् सुरार्चिताम्।जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवि पाहिमाम्।

    कवचम् :-

    ऐं बीजालिका देवी पदयुग्मधरापरा।हदय पातु सा देवी कार्तिकेय युता॥

    श्री ह्रीं हुं एँ देवी पूर्वास्यां पातु सवैदा।सवाँग में सदा पातु स्कन्थमाता पुत्रप्रदा॥वण वाणा मृते हुं फद् बीज समन्विता।उत्तरस्या तथाग्नेच वारूणे नेत्र ते अवतु॥इन्द्राणि भैरवि चैवासितानगी च संहारिणी।सर्वंदा पातु माँ देवी चान्यान्यासु हि दिक्षुवै॥

 

    पष्ठमी माँ कात्यायनी

    चन्द्रहासोञ्वलकरा शार्दुलवरवाहना।
    कात्यायनी शुभ दधादेवी दानव घातिनी॥षष्ठमी तिथि को माँ भगवती के कात्यायनी स्वरूप का पूजन किया जाता है। देवताओं के कार्यसिद्धि करने के लिये महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट होने पर महर्षि ने उन्हें

    अपनी पुत्री माना इसलिये इनका नाम कात्यायनी पड़ा। अश्चिन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को  प्रकट होकर शुक्लपक्ष ससमी, अष्ट्मी व नवमी तक महर्षि कात्यायन की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत ही भव्य व दिव्य है। वर्ण स्वर्ण समान चमकीला है, जिसमें सूर्य का तेज समाहित है। माँ की चार भुजायें हैं।

    दाहिनी और की ऊपर वाली भुजा अभय मुद्रा में तथा नीचे की भुजा वर मुद्रा में है। बायींऔर की ऊपर वाली भुजा में तलवार तथा नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प सुशोभित है। माँकाल्यायनी का वाहन सिंह है। भोग के रूप में मधु अर्थात् शहद प्रिय है। अविवाहितकन्याओं को माँ कात्यायनी की सेवा अवश्य करनी चाहिये, क्योंकि माता सेवा से प्रसत्रहोकर अतिशीघ्र विवाह योग निर्मित करती है। माँ कात्यायनी की आराधना से आज्ञा चक्रजाग्रत होता है जिससे रोग, शोक, संताप व भय से मुक्ति मिलती है तथा अवरोधित कार्यसंपत्र होते हैं। इसके साथ ही शत्रुओं द्वारा की जाने वाली तांत्रिक क्रियाओं की समस्याओं सेबचा रहता है।

    ध्यानम्:-बन्दे वांच्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृत शेखराम्।सिंहारूढां चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थितां षष्टम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।वराभीत करा षगपदधरां कात्यायनसुता भजामि॥पटाम्बर परिधाना स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।मंजीर हार केयूर किंकिणि रत्र कुण्डली मण्डिताम्॥प्रसनवन्दना पंचवाधराम् कान्तंकपोलां तुग कचाम्।कामनीयां 
लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्ननाभिम्॥
    स्तोत्रम् :-

    कंचनाभा वारभयं पद्मधरा मुकुटोग्चलाम्।स्मेरमुखी शिवपत्री कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषिताम्।

    सिंहस्थित पदमहस्ता कात्यायनसुत नमो ऽस्तुतपरमानन्दमयी देवि परब्रहा परमात्मा।परमशक्ति, परमभक्ति कात्यायनसुते नमोउस्तुते॥विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।विश्वार्चिता, विश्वार्तीता कात्यायनसुते नमोउस्तुते॥का बीजा, कां जपानन्दा, का बीज जपतोषिते।को का बीज जपदासक्ता, का कां संतुष्टा॥काकार, हर्षिणी कां धनदा धन मासना।का बीज जपकारिणी, कां बीज तपमानसा॥का कारिणी कां मन्त्रपूजितां कां बीज धारिणी।का कीं कं कै क्राः ठः ठः स्वाहा रूपिणी॥

    कवचम् :-

    कात्यायनी मुख पातु कां का स्वाहा स्वरूपिणी।ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

    सप्तमी माँ कालरात्रि

    एकवेणी जपाकर्णपूरा नाना खरास्थिता।वामदोलसझोहलतांकटकभूषणा।
लम्बोष्ठी कार्णिकाकरणीतैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिरभयगिरि॥

    मां भगवती की सातर्वी शक्ति के रूप में कालरात्रि का पूजन किया जाता है। सबराक्षसों को मारने वाले काल की रात्रि (विनाशिका) होने से इनका नाम कालरात्रि है। माँका स्वरूप अत्यंत भयंकर है परन्तु माँ सदैव शुभ फल देती हैं, इसीलिये इनका एक नामशुभंकरी भी है। इनका स्वरूप भी नाम के समान भयंकर काला है। सिर के बाल बिखरे हुयेहैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है तथा तीन नेत्र एकदम गोल हैं जिसमें सेविधुत जैसी चमकीली किरणें निःसूत रहती हैं। नासिका से श्वास-प्रश्वास से अग्नि कीभयंकर ज्वालायें निकलती हैं। इनकी चार भुजायें है जिसमें दाहिनी ओर की ऊपर वालीभुजा अभय मुद्रा में तथा नीचे की भुजा खाली है। बायीं ओर की ऊपर की भुजा में लोहे का     पूजा कैसे करें..काटा तथा नीचे की भुजा में खड्ग है। माँ का बाहन गदर्भ अर्थात् गथा है। माँ कालरात्रि केपूजन से भानू चक्र जाग्रत होता है जिनसे हर प्रकार का भय दूर होता है। माँ के स्मरण मात्रसे भूत, प्रेत, पिशाच, ऊपरी हवा, अग्नि भय तथा अन्य प्रकार के भय तुरन्त समास होते हैं।माँ को गुड़़ का भोग प्रिय है।

    ध्यानम् :-

    करालवदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम् ।कालरात्रि करालिका दिव्यां विद्युत्माला विभूषिताम्।दिव्य लौहवज्न खड्ग वामाधो्ध्व कराम्युजानम्।

    अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाध पाणिकाम्॥महामेध प्रभा श्यामां तथा चैव गदर्भारूढाम्।घोरदृष्ठा कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥सुख प्रसन्न वदनां स्मेरान्न सरोरूहाम्।

    एवं संचियन्तयेत्र कालरात्रिं सर्वकास समृद्धिदाम्।स्तोत्रम् :-

    हीं कालरात्रि श्रीं काली व क्लीं कल्याणी कलावती।कालमाता कलिदर्षघ्नि कर्मरदीश्यां कृपान्विता।कामबीजजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।

    किमातिष्नी कुनार्तिनाशिनी कुल कामिनी॥क्लीं हीं श्री मंत्रवर्णेन कालकण्टकघातिनी।कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागामा॥

    कवचम् :-ॐ क्लीं मे हृदयं पातु पसदौ श्री कालरात्रि।ललाटे सततं पातु दुष्टग्रह निवारणी॥रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्मम।कटी पृष्ठ महेशानी, कर्णी शंकरभामिनी॥वर्जितानि तु स्थानामि यानि च कवचेन हि। तानि सर्वाणि मे देवी सतर्त पातु स्तम्भिनी।
    ॐ नमो भगवती महागौरि वृषारूढ़े।
    अष्टमी माँ महागौरीश्री हीं क्ली हैँ फटूं स्वाहाll अष्टमी तिथि को माँ भगवती के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा-अर्चना क जाती है। जब वे काली (मां काली रूप) हो गई थी तब माँ ने महान तपस्या से पुनः गौर     वर्ण प्राप्त किया था। तभी माँ का नाम महागौरी हुआ। माँ भगवती महागौरी के मस्तक पबन्द्र का मुकुट है। मणिकान्त मणि समान कान्ति वाली चार भुजायें हैं जिनमें शंख, चत्रधनुषबाण व वर मुद्रा है। कानों में रत्जड़ित कुण्डल झिलमिल करते हैं। माँ का वाहन बैद

    है। माँ को भोग में हलवा प्रिय है। माँ के जप, कवच, स्तोत्र आदि के पाठ से सोम चत्र

    जाग्रत होता है जिससे जीवन में आने वाले संकटों से मुक्ति मिलने के साथ मनुष्य अपन

    जिम्मेदारी निभाने में सक्षम होता है तथा आर्थिक लाभ भी प्रास होता है।

    ध्यानम् :-

    बन्दे वांच्छित कामार्थे चन्द्र्थकृत शेखराम्।

    सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥

    पूरणेन्दुनिभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।

    वराभीतकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

    पटाम्बर परिधाना मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

    मंजीर केयूर किंकिणि रत्न कुण्डल मण्डिताम्॥

    प्रफुलवदनां पलवाधरां कांत कपोलां त्ैलोक्यमोहनीम्।

    कमनीयां लावण्यां मृणाला चंदनगंध लिप्ताम्॥

    स्तोत्रम् :-

    सर्वसंकट हत्री त्वंही धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।

    ज्ञानदा चतुर्वेदमयी, महागौरी प्रणमाम्याहम्॥

    सुख-शान्तिदात्री धन-धान्य प्रदायनीम्।

    डमरूवाध प्रिया अधा महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

    त्रेलोक्योमंगला त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।

    वरदा चैतन्यमयी, महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

    कवचम् :-

    उकार पातु, शीर्षों, मां, हीं, बीज माँ हदये।

    कलीं, कणो, हू, नमो गुहो च पाद्यो॥

    नवमी माँ सिद्धिदात्री

    नवमी तिथि को माँ आदिशक्ति भगवती के नवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री के रूप का

    पूजन किया जाता है। अपने भक्तों को सर्वसिद्धि देने वाली होने से इनका नाम माँ सिद्धिदात्री

    है। माँ सिद्धिदात्री की चार भुजायें हैं जिसमें दाहिनी ओर की नीचे वाली भुजा में चक्र व

    ऊपर वाली भुजा में गदा है तथा बायीं और की नीचे वाली भुजा में शंख व ऊपर वालीभुजा में कमल पुष्प है। माँ सिद्धिदात्री का आसन कमल पुष्प है तथा माँ को भोग के रूप में

    खीर अत्यधिक प्रिय है। माँ सिद्धिदात्री की नियमित सेवा से निर्वाण चक्र जाग्रत होता है
    ة

    जिससे हर प्रकार की ऋद्धि-सिद्धि की प्रात्ति होती है तथा आने वाले अवरोध समास होते हैं।ध्यानम् :-

    वन्दे वांच्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्थत शेखराम्।

    कमलस्थिता चतुर्भुजा सिद्धिदात्रीयशस्वीनम्॥

    स्वर्णवर्णा निर्वाणचक्रस्थिता नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।

    शंख, चक्र, गदा पद्म धरा सिद्धिदात्री भजेम्॥

    पटाम्बर परिधाना सुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

    मंजीर हार केयूर किंकिणिं रत्कुण्डल मण्डिताम्॥

    प्रफुल्लवदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।

    कमनीया लावण्यां क्षीणकटि निम्ननाभिनितम्बनीम्॥

    स्तोत्रम् :-

    कंचनाभा शंखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्जवलां।स्मेरमुखी शिवपलि सिद्धिदात्री नमो ऽस्तुते॥पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।

    नलिनस्थितां नलिनाक्षिं सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥

    परमानंदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा परमशंक्ति।परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोउस्तुते॥

    धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।

    मोक्षदायिनी सिद्धिदायिनी सिद्धिदात्री नमोउस्तुते॥

    कवचम् :-

    ॐंकार पातु शीर्षों माँ ऐं बीजं माँ हृदयो।हीं बीजं सदापातु नभो गुहये च पादयो॥ललाटकर्णो श्रीं बीजं पातु क्ली बीजं माँ नेत्र प्राणो।कपोल चिबुको हसौ:पातु जगतप्रसूत्ये माँ सर्वसदनो॥

पूजन विधि

    अब आपको घट स्थापना के साथ दैनिक पूजा की बहुत ही सरल विधि के बारे मेंबताया जा रहा है। इस विधि में किसी श्लोक की आवश्यकता नहीं है क्योंकि बहुत कीकम लोग हैं जो किसी ब्राह्मण को बुला कर घट स्थापना करवाते हैं। आप स्वच्छ हृदय सेमाता को पुकारेंगे तो वह अवश्य आयेगी। सर्वप्रथम आप जिस स्थान पर घट स्थापना कररह हैं वह स्थान ऐसा हो जहां लोगों का अधिक आना-जाना न हो। ऐसे स्थान का चयनकर गोबर से लीप कर अथवा गंगाजल से अथवा शुद्ध जल में थोड़ा गोमूत्र मिलाकर स्थानको शुद्ध करें, फिर अष्टदल बनायें। उसके ऊपर एक बाजोट अर्थात् लकड़ी का पाटा रखें।

    ल विधि के बारे नेम्योंके बहत कआप स्वच्छ हदय हैर घट स्थापना कासे स्थान का चयामिलाकर स्थानपदा रखें।

    बाजोट के ऊपर एक अलग से पाटा बिछाकर उसके ऊपर नया लाल रंग का वस्त्र विछायें।लाल वस्त्र के ऊपर अग्रांकित चित्र की तरह पांच स्थान पर थोड़े-थोड़े चावल रखें जिनपर क्रमश गणेश, मातृका, लोकपाल, नवग्रह तथा वरुण देव को स्थान दिया जायेगा।अब सर्वप्रथम 2 क्रमांक पर थोड़़े चावल रखकर श्री गणेशजी का स्मरण करते हुयेमानसिक अथवा वाचिक रूप से स्थान ग्रहण करने का निवेदन करें। इसी प्रकार क्रमश 3,4, 5 व 6 नंबर पर सुपारी के रूप में क्रमशः मातृका, लोकपाल, नवग्र व वहण देव कोस्थापित करें और स्थान लेने का आह्नान करें। त्पश्चात् एक बूंद गंगाजल से सभी को ख्रानकरायें। ध्यान रहे, इसमें सभी कार्य अनामिका से होंगे। स्नान के बाद अनामिका पर तीन बारकलावा पलेट कर एक-एक बार प्रत्येक देव को वस्त्र अर्पित करे। तत्पश्वात् रोली से, फिरपीले चंदन से तिलक-बिन्दी करें। अक्षत अर्पित करें व शहद से भोग लगाये। इसी प्रकारजल अर्पित करें, त्पश्चात् अगरबत्ती अर्पित करें। यहां पर ध्यान रहे कि सुपारी बहुत छोटीहोती है इसलिये सारे कार्य उसके स्वरूप के अनुसार करें जैसे स्रान कराना है तो अनामिकापर एक बूंद जल लें और मानसिक रूप से सोचते हुये सुपारी पर जल की बूंद से विलकजैसा कर दें। यहां पर सारी बात भावना व श्रद्धा की होती है। यदि आपने पूर्ण श्रद्धा से इसप्रकार आह्वान किया तो अवश्य ही देव गण उपस्थित होंगे। साथ ही सभी को एक साथ हीस्ञानादि कराना है। वस्त्र धारण कराना है तो पहले कलावा अनामिका पर लपेट कर गोलरूप दे दें जिससे वह सुपारी पर अच्छी तरह से व्यवस्थित हो जाये और फिर इसे गणेशजीको अर्पित करें। इसी प्रकार मातृका को अर्पित करें। इस प्रकार सभी को अर्पित करें। इसप्रकार आपके यहां देवों ने स्थान ग्रहण कर लिया। अब आप अपने घट अर्थात् कलश केअनुसार इतनी मिट्टी में जौ मिलाये जितनी मिट्टी पर आसानी से घट आ जाये। घट का वजनमिट्टी पर इस प्रकार रहे कि घट हिले नहीं। अब इस मिट्टी को 7 नंबर स्थान पर बिछा दें।घट में शुद्ध जल भरें। इसमें ध्यान रहे कि घट को धोना नहीं है और न उसके अन्दर हाथडालना है। जल में थोड़ा सा गंगाजल, थोड़ा सा साबुत हरा धनिया, थोड़ी सी साबुत हल्दीअवश्य डालें। अब पांच आम के पत्तों को आपस में कलावे से बांधकर घट के ऊपर इसप्रकार रखें जिससे बंधा वाला आधा हिस्सा अन्दर रहे और आधे पत्ते बाहर रहें। इसकेकपर मिट्टी का चौड़ा पात्र रखकर उसमें ऊपर तक जौ मिश्रित मिट्टी डालकर इसे जल सेसींच दें। अब घट की गर्दन पर सात बार कलावा लपेटें। सामने की ओर रोली से स्वस्तिकबनायें। एक नारियल पर सात बार कलावा लपेट कर घट के आगे रख दें। नारियल व घटके स्वस्तिक पर रोली से तिलक कर उस पर एक साबुत बताशा लगा दें अर्थात् रोली कीमदद से चिपका दें।

    आपकी घट स्थापना हो गई। अब आप माता को स्थान दे सकते हैं। इसके लिये आपमाता भगवती की मूर्ति अथवा तस्वीर को स्थान दें। अब आप 1 नंबर के स्थान पर थोड़े सेचावल डालें। अपने जीवनसाथी का हाथ लगाते हुये माता की तस्वीर को उस स्थान पर ले     اआयें। उपरोक्त विधि से ही (जिस विधि से गणेश आदि का पूजन किया था) जल से खानआदि कराते हुये वस्त्र अर्पित कर दोनों प्रकार से भोग लगायें। अब यदि आप सामान्य दीपअर्पित करना चाहते हैं तो दीपक अर्पित कर दें। यदि आप अखण्ड दीप अर्पित करनाचाहते हैं तो दीपक को ऐसे खुले स्थान पर लायें जहां से सूर्य की किरणें दीपक पर आयें।सूर्यदेव से अखण्ड जोत का गवाह रहने का निवेदन करते हुये जोत को प्रजवलित के।फिर माता को अर्पित करें। इसके बार आप यदि सप्तशती का पाठ करते हैं तो संकल्प लेकरशुद्धि आदि का शापोद्धार करें, फिर पाठ आरंभ करें। यदि सिर्फ कवच आदि का पाठ करव्रत रखना चाहते हैं तो लेख के आरम्भ में दिवसवार दिये माता के स्वरूपों का ध्यान आदिकर कवच पाठ व स्तोत्र आदि का पाठ करें। तत्पश्चात् आरती करें। यदि आप १ दिन केव्रत करते हैं तो माता के सामने ही भूमि शयन करें। यदि आप श्री दुर्गा ससशती का पाठकरना चाहते हैं परन्तु एक दिन में पूर्ण पाठ समास नहीं कर सकते हैं तो इसके लिये एकआसान और वैधानिक रास्ता भी है जिसके द्वारा आप पूर्ण नवरात्रि में एक बार पूर्ण ससशती

    का पाठ कर माता भगवती का अनुग्रह प्रात्त कर संकते हैं। आप कैसी भी पूजा करें,नियमित रूप से दुर्ग सशती में दिया गया श्री दुर्गा सश्लोकी का 11 बार पाठ कें।अन्तिम दिन 108 आहुति देकर नवरात्रि में श्री नवचण्डी जप कर माता का पूर्ण आशीवाद

    प्राप्त करें। इस प्रकार 11 बार पाठ कर हवन करने से नवचण्डी जप का फल प्राप्त होता है।

    आप पूर्ण नवरात्रि में श्री दुगा ससशती का पाठ किस प्रकार से करें, यह जानें। इसमेंआपको श्री ससश्लोकी, श्रीदुर्गा्टेत्तर-शतनामस्तोऋम, श्री देव्या कवच, अर्गला स्तोत्, कीलकम्,वेदोक्त व तन्त्रोक्त रात्रिसूक्तम्, श्रीदेव्यथर्वशीर्षम, क्षमा प्रार्थना, दुर्गाद्वत्रिंश्ममाला,देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम व सिद्धकुजिका स्तोत्र का पाठ तो नियमित करना है परन्तु ससशतीके 13 अध्यायों को निम्न प्रकार से करना है- आपको सत्तशती का पुस्तक पूजन व संकल्पतो प्रथम दिन ही लेना है परन्तु शापोद्धार नियमित करना है। इसके बाद आप प्रथमा तिथिको प्रथम अध्याय, द्वितीया तिथि को द्वितीय व तृतीय अध्याय, तृतीया तिथि को चतुर्थअध्याय, चतुर्थी, तिथि को पंचम, षष्टम, सततम व अष्टम अध्याय, पंचमी तिथि को नवम वदशम अध्याय, षष्ठी तिथि को एकादश अध्याय, समनो तिथि को द्वादश व त्रयोदश अध्याय
    का पाठ करने से आपको वही फल मिलेगा जो एक दिन में सम्पूर्ण पाठ करने से प्राप्तहोता है।

    माँ दुर्गाजी की कृपा प्राप्ति के उपाय

    माँ दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं। वे मनुष्य को संकट, कष्, विपत्ति का सामना करने कीशक्ति देती हैं। स्वयं माँ दुर्गा ने अनेक दैत्य-दानवों का संहार करके मनुष्यों, ऋषियो-मुनियोंकी रक्षा की है। यहाँ देवी दुर्गा की कृपा प्रात्ति के कुछ अनुभूत एवं उपयोगी ठपायों के बारेमें बताया जा रहा है जिनका प्रयोग करके आप भी लाभ ले सकते हैं:-

    >मैं आपको माँ दुर्गा को शीत्र प्रसन्न करने के लिये बहुत ही उपयोगी एवं शीष्रप्रभाव देने वाला उपाय बता रहा हूँ। आपके द्वारा यह उपाय करने पर माँ दुर्गा आपकी हरप्रकार से सहायता करेंगी तथा शत्रु आदि भी आपको कोई हानि नहीं दे सकेंगे। इस उपायको आप नवरात्रि, दीपावली, होली, ग्रहणकाल, शुक्लपक्ष की अष्टमी एवं नवमी तिथि कोअथवा प्रथम बुधवार को कर सकते हैं। शुभ समय का चयन अपनी सुविधा अनुसार करसकते हैं। आप जिस दिन उपाय आरम्भ करना चाहते हैं उस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छवस्त्र धारण कर निवास के पूजास्थल में माँ दुर्गा की तस्वीर को रोली से तिलक करें। लालचुनरी अर्पित करें। शुद्ध घी का दीपक, चंदन की पाँच अगरबत्ती, धूपबत्ती, मिष्ठान रूपीभोग अर्पित करें। अब पूजास्थल में माँ की तस्वीर के निकट ही एक लाल वस्त्र बिछाकरउसके ऊपर पाँच अभिमंत्रित गोमती चक्र, पाँच अभिमंत्रित धनकारक कौड़ियां, पाँचजायफल, एक चाँदी का सिक्का रखें। पूजास्थल के निकट अथवा किसी एकांत कमरे मेंगंगाजल अथवा शुद्ध जल में गोमूत्र मिलाकर स्थान को शुद्ध करें। त्पश्थात् एक बाजोटरखें। बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर एक जटा नारियल व कुछ नकद धनराशि रखें। जटानारियल पर रोली से तिलक करके माँ दुर्गा का मानसिक स्मरण करें। शुद्ध धी का दीपक,चंदन की पाँच अगरबत्ती, धूपबत्ती एवं मिष्ठान रूपी भोग अर्पित करें। उपाय में सफलताप्रदान करने का निवेदन करें। अब आप एक बार श्रीसिद्ध कुंजिका स्तोत्र के साथ श्रीदुर्गा कवच का पाठ करें। पाठ के बाद रुद्राक्ष की माला से एक माला ॐ हीं हुं दुर्गायैनमः का जाप करें। इसके बाद प्रणाम कर उठ जायें। जब दीपक ठण्डा हो जाये तो लालवस्त्र में माँ को अर्षित गोमती चक्र आदि रखकर एक पोटली का रूप देकर रोली से तिलककर सुरक्षित स्थान पर रख दें। बाजोट पर रखी सामग्री से मिष्ठान एवं जटा नारियल केअतिरिक्त समस्त सामग्री को बांध कर किसी सुहागिन महिला को दान कर दें। मिष्ठानपरिवार के सदस्यों में वितरित कर दें। जटा नारियल को जल में प्रवाहित कर दें। इस उपायके कुछ समय बाद ही आप चमत्कार महसूस करेंगे। आपके कार्य में आने वाली बाधायें

    स्वतः ही दूर होने लगेगी तथा शत्रु भी आपके समक्ष नतमस्तक होंगे।
,
    माँ दुर्गा को प्रसत्न करने के लिये समय-समय पर आप कम आयु की कन्याओं 

    को कोई भी उपहार देते रहें।

    >यदि आपके कार्य में कोई बाधा आ रही है तो यह उपाय प्रथम बुधवार सेआरम्भ कर लगातार ग्यारह बुधवार को करें। प्रातः स्नान कर निकट के किसी भी माँ दुर्गाके मंदिर में जाकर माँ दुर्गा को तिलक-बिन्दी के लिये सामग्री अर्पित करें। शुद्ध घी कादीपक, चंदन की अगरबत्ती, धूपबत्ती एवं मिष्ठान रूपी भोग अर्पित करें। माता को एकचुनरी अर्पित करें तथा एक जटा नारियल चढ़ा कर एक बार श्रीदुर्गा कवच का पाठ करें।तत्पश्षात् प्रणाम कर मंदिर से बाहर आ जायें। इस उपाय के पूर्ण होने तक आपके कायों मेंआने वाली समस्त बाधायें समाप होने लगेंगी।

    > अब मैं आपको जो उपाय बता रहा हूँ इसे करने से अनेक प्रकार से लाभ प्रास्तहोंगे तथा आप पर माँ दुर्गा की सदैव कृपा भी बनी रहेगी। इस उपाय को नवरात्रि,दीपावली, होली, ग्रहणकाल, शुक्लपक्ष की अष्टमी एवं नवमी तिथि को अथवा प्रथमबुधवार को कर सकते है। जिस दिन उपाय करना चाहते हैं उस दिन स्नान कर स्वच्छ वस्त्रधारण करें। निवास के पूजास्थल में माँ दुर्गा की तस्वीर को एक लाल रेशमी चुनरी अर्पितकर रोली से तिलक करें। शुद्ध घी का दीपक, चंदन की अगरबत्ती-धूपबत्ती के साथ मिश्रीव मक्खन का भोग लगायें। तस्वीर के निकट ही एक लाल वस्त्र बिछाकर उस पर एक जटानारियल, पाँच अभिमंत्रित गोमती चक्र, पाँच अभिमंत्रित धनकारक कौड़िया, तीन जायफल,पाँच सूखे छुआरे, 21 लौँग, 21 हरी इलायची, एक चाँदी का सिका तथा कुछ नकदधनराशि रखें। पूजास्थल के निकट ही एक थाली में सवा किलो गेहूँ व चार सौ ग्राम गुड़रखें। अब आप एक बार श्री दुर्गा चालीसा का पाठ करें। एक बार श्री दुर्गा सप्तश्लोकी,श्री दुर्गा कवच एवं सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें। पाठ के बाद प्रणाम कर उठजायें। जब दीपक ठण्डा हो जाये तो गेहूँ व गुड़ किसी गाय को खिला दें। माँ की तस्वीर केनिकट लाल वस्त्र पर रखी नकद धनराशि से कोई मिष्ठान लेकर कम आयु की कन्याओं मेंवितरित कर दें। अर्पित मिष्ठान को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों सहित स्वयं भीग्रहण करें। लाल वस्त्र की अन्य सामग्री तथा जटा नारियल को लाल वस्त्र में बांध करकिसी सुरक्षित स्थान पर रख दें। इस उपाय को करने से माँ दुर्गा की कृपा से कुछ ही समयमें आपको अपने कार्यों में सफलता प्रास् होगी तथा आपके समस्त कार्य सिद्ध होने लगेंगे।आप नित्य ही उन्नति प्राप्त करेंगे।

    > किसी भी कार्य सिद्धि के लिये श्री दुर्गा सस्शती का पाठ अत्यन्त लाभ देता है।अतः मैं आपको कुछ विशष कार्य सिद्ध करने के लिये कितने पाठ किये जायें, यह बतारहा हूँ:-
    -परिवार में प्रेम एवं सुख-शांति के लिये 9 बार श्री दुर्गसमशती का पाठ अत्यन्तलाभ प्रदान करता है।
    - यदि किसी के जीवनसाथी का स्वभाव क्रोधयुक्त है अथवा ठच्छुंखल स्वभाव है तोश्री दुर्गासमशती का 14 बार पाठ अत्यन्त लाभ प्रदान करता है।
    - ग्रह आदि दोष के कारण आने वाली समस्या में तीन बार श्री दुर्गासमशती का
    लाभ प्रदान करता है।
- सुख-समृद्धि, आर्थिक लाभ एवं संतान प्रात्ति के लिये श्री दुर्गासशती का 14  बार पाठ लाभ प्रदान करता है।
    - यदि किसी जातक को कोई शत्रु अधिक समस्या देता है अधवा कोई मुकदमा चलरहा है अथवा कोई गुत्त समस्या है तो इन सबमें विजय प्रात्ति के लिये श्री दुर्गासमशती का12 बार पाठ करने से त्वरित लाभ प्राप्त होता है।
    - यदि किसी जातक के जीवन में अचानक ही कोई सामान्य विपत्ति आये अथवाकिसी प्रकार कोई भय हो तो श्री दुर्गासम्शती का 7 बार पाठ लाभ प्रदान करता है।
    - यदि कोई जातक किसी बड़े ऋण के कारण समस्या में हो तो उस जातक को श्री
    दुर्गासमशती का 25 बार पाठ लाभ प्रदान करता है।- यदि किसी के जीवन में शत्रुओं की वृद्धि हो रही हो तो श्री दुर्गसम्शती का 108 बार पाठ त्वरित लाभ प्रदान करता है।
    - यदि किसी राजनेता अथवा उच्च पदाधिकारी के पद जाने की आशंका हो तो उस जातक को श्री दुर्गासशती का 25 बार पाठ करने से त्वरित लाभ प्रा होता है।
    - यदि कोई जातक किसी प्रतियोगिता में सफल होना चाहता है तो श्री दुर्गासप्तशती
का 12 बार पाठ करने से लाभ प्रातत होता है।
    - यदि कोई जातक अपने किसी शत्रु का उच्चाटन करना चाहता है तो उस जातक को
    श्री दुर्गाससशती का 18 बार पाठ करना चाहिये। इससे लाभ की प्रातत अवश्य होगी।
    - समस्त प्रकार की अभिष्ट सिद्धि प्रात्त के लिये श्री दुर्गासप्शती का 108 बार पाठकरना चाहिये।

    यंत्र उपाय 
अब मैं आपको माँ श्री दुर्गा को शीष्र प्रसन्न करने का एक अत्यन्त सरल यंत्र उपायबता रहा हूँ। इस यंत्र उपाय के द्वारा आप माँ दुर्गा को अतिशीष्र प्रसत्न कर उनकी कृपा सेअनेक कार्य सिद्ध कर सकते हैं। इस यंत्र उपाय को करने का शुभ समय भी अन्य उपाय केसमान ही है, अत: शुभ समय का चयन आप अपनी सुविधा अनुसार कर सकते हैं। आपजिस दिन उपाय आरम्भ करना चाहते हैं, उस दिन ख्ान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। निकटके किसी भी माँ दुर्गा मंदिर में जाकर विधि-विधान से माँ की प्रतिमा को रोली से तिलककरें। शुद्ध घी का दीपक, चंदन की अगरबत्ती-धूपबत्ती एक जटा नारियल एवं मिष्ठानरूपीभोग अर्पित करें। श्री दुर्गा चालीसा अथवा माँ दुर्गा का कोई अन्य पाठ करें। पाठ के बाद     प्रणाम कर मंदिर से बाहर आ जायें। अब आप निवास के पूजास्थल में माँ दुर्गा की तस्वीरको भी रोली से तिलक करें। शुद्ध घी का दीपक, चंदन की अगरबत्ती-धूपबत्ती के साथकोई भी मिष्ठानरूपी भोग अर्पित करें। आवास के किसी एकांत एवं स्वच्छ कमरे के फ्शको गंगाजल अथवा स्वच्छ जल में गोमूत्र मिलाकर स्थान शुद्धि करें। सूती अथवा ऊनीआसन पर पूर्व अथवा उत्तर की मुख करके बैठें। अपने सामने एक बाजोट रखें। बाजोट परलाल वस्त्र बिछायें। अब किसी पात्र में अष्टरांध में गंगाजल मिश्रित कर स्याही का निर्माणकर अनार की कलम से भोजपत्र पर अपनी सुविधा अनुसार निम्न यंत्र का लेखन करें। यदिआप यंत्र को पूजास्थल में स्थान देना चाहते हैं तो एक स्थान पर लेखन करें और यदि यंत्रको पूजास्थल में स्थान देने के साथ धारण करना चाहें तो दो स्थान पर यंत्र का लेखन करें।यंत्र लेखन करने के पश्चात् अपने पास ही स्वच्छता से रख लें।

    हीं ऐं दुर्गायै नमः

    नमस्ते शरण्ये शिव सानुकम्पेनमस्ते जगद्धयापिके विश्वरूपेनमस्ते जगद्धन्द्यपादारविन्देनमस्ते जगत्तारिणी त्राहि दुर्गे

    साधक का नाम

    अब बाजोट पर सवा किलो गेहूँ की परत बिछाकर पाँच कितने भी मूल्य के सिकेदबाकर उनके ऊपर एक जटा नारियल पर सात बार कलावा लपेट कर रख दें। नारियलपर रोली से तिलक करें और उसके सहारे से भोजपत्र पर लिखित यंत्र को रखकर केशर सेतिलक करें। सवा किलो चावल, सवा किलो गुड़, 900 ग्राम लाल मसूर, 800 ग्राम कालीउड़द की दाल, एक अभिमंत्रित गोमती चक्र, एक जायफल, 11 सूखे छुआरे, एकलग्नमण्डप सुपारी, चंदन, इत्र की शीशी, 1 ग्राम केशर, 21 लाँग, 21 हरी इलायची एवंनकद दक्षिणा आदि को बाजोट पर रख दें। अब शुद्ध घी का दीपक, चंदन की अगरबत्ती वधूपबत्ती के साथ मिश्री व खीर का नैवेद् अर्पित करें। माँ दुर्गा का मानसिक स्मरण करें तथाइस यंत्र उपाय में सफलता प्रदान करने का निवेदन करें। तत्पश्चात् एक बार श्री सिद्धकुंजिका स्तोत्र के साथ श्री दुर्गा कवच का पाठ करें। पाठ के बाद रुद्राक्ष की माला सेएक माला ॐ ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मंत्र का जाप करें। जाप के बाद प्रणाम करउठ जायें। जब दीपक ठण्डा हो जाये तो एक यंत्र को फोटो फ्रेम में लाल वस्त्र के आधार पर      लगाकर पूजास्थल में लाल वस्त्र पर स्थान दें। दूसरे यंत्र को एक चाँदी के ताबीज में रखकरधारण करें। अब लकड़ी अथवा चाँदी की डिब्बी में पीले सिन्दूर के साथ गोमती चक्र,धनकारक कौड़ी, लग्नमण्डप सुपारी रखकर उस डिब्बी को एक लाल रेशमी वस्त्र कीथैली में रखकर उसमें जायफल, सूखे छुआरे, नागकेशर, लौँग, हरी इलायची रखकर कपरसे इत्र छिड़क दें। थैली का मुख बंद कर सुरक्षित एवं शुद्ध स्थान पर रख दें। बाजोट केलाल वस्त्र पर रखी अन्य समस्त सामग्री के साथ नकद दक्षिणा रखकर किसी गरीब कोदान कर दें। इस उपाय के कुछ समय बाद ही आप लाभ महसूस करेंगे। आप जब भी

    निवास से बाहर जायें तो यंत्र के दर्शन करके ही जायें। माँ दुर्गा की कृषा से आपके समस्त कार्य सिद्ध होंगे।

    श्री दुर्गा चालीसा

दुर्गा दुर्गति दूर कर, मंगल कर सब काज।
मन मंदिर उज्ञ्वल करो, मात भवानी आजll

नमो नमो दुर्गे सुख करनी, नमो नमो अम्बे दुःखहरनीll
निरंकार है ज्योति तुम्हारी, तिहूँ लोक फैली उजियारी।शशि ललाट मुख महा बिशाला, नेत्र लाल भृकुटी विकराला॥रूप माता को अधिक सुहावै, दरश करत जन अति सुख पावै।तुम संसार शक्ति लय कीन्हा, पालन हेतु अन्न धन दीन्हा।अन्नपूर्णा हुई जगपाला, तुमहीं आदि सुन्दरी बाला।प्रलयकाल सब नाशन हारी, तुम गौरी शिव शंकर प्यारी।शिव जोगी तुम्हारे गुन गार्वैं, ब्रह्मा बिष्णु तुम्हें नित ध्यावें।रूप सरस्वती को तुम धारा, दे सुबुद्ध ऋषि मुनिन्ह उबारा।धरयो रूप नरसिंह को अम्बा, परगट भई फाड़ कर खम्भा।रक्षा करि प्रहलाद बचायो, हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो।लक्ष्मी रूप धरयो जग मांहीं, श्री नारायन अंग समाहीं।क्षीरसिन्धु में करत विलासा, दया सिन्धु दीजै मन आशा।हिङ्गलाज में तुम्हीं भवानी, महिमा अमित न जाय बखानी॥मातंगी धूमावति माता, भुवनेश्वरि बगला सुखदाता॥श्री भैरवि तारा जग तारिनी, छित्नभाल भव दुःख निवारिनि॥केहरि वाहन सोहे भवानी, लांगुर वीर चलत अगवानी।कर में खप्पर खड्ग बिराजै, जाको देख काल डर भाजै।सोहै अस्त्र और त्रिशूला, जाते उठत शत्रु हियशूला॥नागकोट में तुम्हीं बिराजत, तिहूँ लोक में डंका बाजत।     शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे, रक्त बीज शंखन संहारे॥महिषासुर नृप अति अभिमानी, जेहि अघ भार मही अकुलानी॥रूप कराल काली को धारा, सेन सहित तुम तेहि संहारा॥परी पीर सन्तन पर जब जब, भई सहाय मातु तब तब॥अमरपुरी और सब लोका, तब महिला सब रहे अशोका॥ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी, तुम्हें सदा पूजे नर-नारी॥प्रेम भक्ति से जो जस गावै, दुःख दारिद्र निकट नहीं आवै॥ध्यावें तुम्हें जो नर मन लाई, जन्म मरण ताको छुटि जाई॥योगी सुर मुनि कहत पुकारी, योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥शंकराचार्य जब तप अति कीहो, काम क्रोध षड़रिपु वश कीन्हों॥निशिदिन ध्यान धरो शंकर को, काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥शक्ति रूप को मरम न पायो, शक्ति गई तब मन पछितायो॥शरणागत होई कीर्ति बखानी, जय जय जय जगदम्ब भवानी॥भई प्रसत्न आदि जगदम्बा, दई शक्ति नाहिं कीन्ह विलम्बा॥मोको मातु कष्ट अति घेरो, तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो॥आशा तृष्णा निपंट सतावै, रिपु मुरख मोहि अति डरपावै॥शत्रु नाश कीजै महारानी, सुमिरौं एकचित तुमहि भवानी॥करौ कृपा हे मातु दयाला, ऋद्धि सिद्धि दै करहु निहाला॥जब लगि जियों दया फल पाऊँ, तुम्हरौ जस मैं सदा सुनाऊँ॥दुर्गा चालीसा जो कोई गावै, सब सुख भोग परमपद पावै॥देवीदास शरण निज जानी, करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥जगतमात मातेश्वरी, जग की पालनहार।कृपा राखियो दास पर, करियो भव से पार॥

    श्री दुर्गा जी की आरती

    जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री॥1॥माँग सिन्दूर विराजत टीको मृगमदको। उज्ज्वल से दोऊ नैना, चंद्रवन नीको॥2॥कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै। रक्त-पुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥3॥केहरि वाहन राजत, खडग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनि-जन सेवत, जिनके दुःखहारी॥4॥कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥5॥शुम्भ निशुम्भ विदारे, महिषासुर-घाती। धूम्रविलोचन नैना निशिदिन मदमाती॥6॥चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु कैटभ दोउं मारे, सुर भयहीन करे॥7॥ब्रह्माणी, रुद्राणी तुम कमलारानी। आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥8॥चौँसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैरूँ। बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू॥9॥तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुःख हर्ता सुख सम्पत्ति करता॥ 10॥भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥ 11॥कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती। श्रीमाल केतु में राजत कोटि रतन ज्योति॥ 12 ॥श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै। कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै॥ 13 ॥

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नवरात्री में देवी के दिव्य पाठ एवं 7 शक्तिशाली रक्षक पाठ

समपूर्ण नरसिंह आराधना जयंती विशेष

सम्पूर्ण गणेश उपासना स्तोत्र मन्त्र सहित