बगलामुखी साधना

बगलामुखी साधना 

तंत्र की सबसे बड़ी देवी हैं मां बगलामुखी, कठिन समय में देती हैं संबल, पढ़ें पूजा की सावधानियां

प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। 1. काली 2. तारा 3. षोड़षी 4. भुवनेश्वरी 5. छिन्नमस्ता 6. त्रिपुर भैरवी 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातंगी 10. कमला। मां भगवती श्री बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। 

पीताम्बरा नाम से प्रसिद्ध, पीले रंग से सम्बंधित, पूर्ण स्तंभन शक्ति से युक्त, देवी बगलामुखी।बगलामुखी, दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'बगला' तथा दूसरा 'मुखी'। बगला से अभिप्राय हैं 'विरूपण का कारण' और वक या वगुला पक्षी, जिस की क्षमता एक जगह पर अचल खड़े हो शिकार करना है, मुखी से तात्पर्य हैं मुख। देवी का सम्बन्ध मुख्यतः स्तम्भन कार्य से हैं, फिर वो मनुष्य या शत्रु हो या कोई प्राकृतिक आपदा। देवी महाप्रलय जैसे महाविनाश को भी स्तंभित करने की क्षमता रखती हैं। देवी स्तंभन कार्य की अधिष्ठात्री हैं। स्तंभन कार्य के अनुरूप देवी ही ब्रह्म अस्त्र का स्वरूप धारण कर, तीनो लोको में किसी को भी स्तंभित कर सकती हैं। देवी, पीताम्बरा नाम से भी त्रि-भुवन में प्रसिद्ध है, पीताम्बरा शब्द भी दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'पीत' तथा दूसरा 'अम्बरा', अभिप्राय हैं पीले रंग का अम्बर धारण करने वाली। देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिया है, देवी पीले रंग के वस्त्र इत्यादि धारण करती है तथा देवी को पीले वस्त्र ही प्रिय है, पीले फूलों की माला धारण करती है, पीले रंग से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। पञ्च तत्वों द्वारा संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ हैं, जिन में से पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध पीले रंग से होने के कारण देवी को पिला रंग अत्यंत प्रिय हैं। देवी की साधना दक्षिणाम्नायात्मक तथा ऊर्ध्वाम्नाय दो पद्धतिओं से कि जाती है, उर्ध्वमना स्वरुप में देवी दो भुजाओ से युक्त तथा दक्षिणाम्नायात्मक में चार भुजाये हैं।
देवी बगलामुखी का सम्बन्ध अलौकिक तथा पारलौकिक शक्तियों से हैं।
देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध अलौकिक, पारलौकिक जादुई शक्तिओ से भी हैं, जिसे इंद्रजाल काहा जाता हैं। उच्चाटन, स्तम्भन, मारन जैसे घोर कृत्यों तथा इंद्रजाल विद्या, देवी की कृपा के बिना संपूर्ण नहीं हो पाते हैं। देवी ही समस्त प्रकार के ऋद्धि तथा सिद्धि प्रदान करने वाली है, विशेषकर, तीनो लोको में किसी को भी आकर्षित करने की शक्ति, वाक् शक्ति, स्तंभन शक्ति। देवी के भक्त अपने शत्रुओ को ही नहीं बल्कि तीनो लोको को वश करने में समर्थ होते हैं, विशेषकर झूठे अभियोग प्रकरणो में अपने आप को निर्दोष प्रतिपादित करने हेतु देवी की अराधना उत्तम मानी जाती हैं। किसी भी प्रकार के झूठे अभियोग (मुकदमा) में अपनी रक्षा हेतु देवी के शरणागत होना सबसे अच्छा साधन हैं। देवी ग्रह गोचर से उपस्थित समस्याओं का भी विनाश करने में समर्थ हैं। देवी का सम्बन्ध आकर्षण से भी हैं, काम वासनाओ से युक्त कार्यो में भी देवी आकर्षित करने हेतु विशेष बल प्रदान करती हैं।
व्यष्टि रूप में शत्रुओ को नष्ट करने वाली तथा समष्टि रूप में परमात्मा की संहार करने वाली देवी हैं बगलामुखी। देवी बगलामुखी के भैरव महा मृत्युंजय हैं। देवी शत्रुओ को पथ तथा बुद्धि भ्रष्ट कर, उन्हें हर प्रकार से स्तंभित करती हैं।

देवी का भौतिक स्वरुप वर्णन
देवी बगलामुखी, समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय द्वीप में अमूल्य रत्नो से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान हैं। देवी त्रिनेत्रा हैं, मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती है, पीले शारीरिक वर्ण की है, देवी ने पिला वस्त्र तथा पीले फूलो की माला धारण की हुई है, देवी के अन्य आभूषण भी पीले रंग के ही हैं तथा अमूल्य रत्नो से जड़ित हैं। देवी, विशेषकर चंपा फूलों, हल्दी के गाठों इत्यादि पीले रंग से सम्बंधित तत्वों की माला धारण करती हैं। देवी ने अपने बायें हाथ से शत्रु या दैत्य के जिव्हा को पकड़ कर खींच रखा है तथा दये हाथ से गदा उठाये हुए हैं, जो शत्रु को भय भीत कर रहे हैं। कई स्थानों में देवी ने मृत शरीर या शव को अपना आसन बना रखा हैं तथा शव पर ही आरूढ़ हैं तथा दैत्य या शत्रु के जिव्हा को पकड़ रखा हैं। देवी वचन या बोल-चाल से गलतियों तथा अशुद्धियों को निकल कर सही करती हैं।
देवी पीताम्बरा या बगलामुखी मुखी के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा।
स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, सत्य युग में इस चराचर संपूर्ण जगत को नष्ट करने वाला भयानक वातक्षोम (तूफान, घोर अंधी) आया। समस्त प्राणिओ तथा स्थूल वस्तुओं के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा था तथा सब काल का ग्रास बनने जा रहे थे। संपूर्ण जगत पर संकट को ए हुआ देख, जगत के पालन कर्ता भगवान विष्णु अत्यंत चिंतित हो गए। तदनंतर, भगवान विष्णु सौराष्ट्र प्रान्त में गए तथा हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर, अपनी सहायतार्थ देवी श्री विद्या महा त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न करने हेतु तप करने लगे। उस समय देवी श्री विद्या, सौराष्ट्र के एक हरिद्रा सरोवर में वास करती थी। भगवान विष्णु के तप से संतुष्ट हो देवी आद्या शक्ति, बगलामुखी स्वरूप में, भगवान विष्णु के सन्मुख अवतरित हुई तथा उनसे तप करने का कारण ज्ञात किया। तुरंत ही अपनी शक्तिओ का प्रयोग कर, देवी बगलामुखी ने विनाशकारी तूफान को शांत किया तथा इस सम्पूर्ण चराचर जगत की रक्षा की। मंगलवार युक्त चतुर्दशी, मकार, कुल नक्षत्रों से युक्त वीर रात्रि कही जाती हैं इसी की अर्धरात्रि में श्री बगलामुखी देवी का आविर्भाव हुआ।
देवी बगलामुखी के प्रादुर्भाव की दूसरी कथा, देवी धूमावती के प्रादुर्भाव के समय से सम्बंधित हैं। क्रोध में आ देवी पार्वती ने अपने पति शिव का ही भक्षण किया था। देवी पार्वती का वो उग्र स्वरूप जिसने अपने पति का भक्षण किया, वो बगलामुखी नाम की ही शक्ति थी तथा भक्षण पश्चात् देवी, धूमावती नाम से विख्यात हुई।
देवी बगलामुखी से सम्बंधित अन्य तथ्य।
कुब्जिका तंत्र के अनुसार, बगला नाम तीन अक्षरो से निर्मित है व, ग, ला। व अक्षर देवी वारुणी, ग अक्षर सिद्धिदा तथा ला अक्षर पृथ्वी को सम्बोधित करता हैं। देवी का प्रादुर्भाव भगवान विष्णु से सम्बंधित हैं परिणामस्वरूप देवी सत्व गुण से सम्पन्न तथा वैष्णव संप्रदाय से सम्बंधित हैं तथा इनकी साधन में पवित्रता का विशेष महत्व हैं। परन्तु कुछ अन्य परिस्थितिओं में देवी तामसी गुण से भी सम्बंधित है, आकर्षण, मारन तथा स्तंभन कर्म तामसी प्रवृति से सम्बंधित हैं क्योंकि इस तरह के कार्य दुसरो को हानि पहुँचने हेतु ही की जाती हैं। सर्वप्रथम देवी की आराधना भगवान ब्रह्मा ने की, पश्चात् ब्रह्मा जी ने बगला साधना का उपदेश सनकादिक मुनिओ को किया, सनत कुमार से प्रेरित हो देवर्षि नारद ने भी बगला देवी की साधना की। देवी के दूसरे उपासक स्वयं जगत पालन कर्ता भगवान विष्णु हुए तथा तीसरे भगवान परशुराम। देवी का सम्बन्ध शव साधना, श्मशान इत्यादि से भी हैं। दैवीय प्रकोप शांत करने हेतु शांति कर्म में, धन-धान्य के लिये पौष्टिक कर्म में, वाद-विवाद में विजय प्राप्त करने हेतु तथा शत्रु नाश के लिये आभिचारिक कर्म में देवी की शक्तिओ का प्रयोग किया जाता हैं। देवी का साधक भोग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त कर लेते हैं।
बगलामुखी स्तोत्र के अनुसार देवी समस्त प्रकार के स्तंभन कार्यों हेतु प्रयोग में लायी जाती हैं जैसे, अगर शत्रु वादी हो तो गुंगा, छत्रपति हो तो रंक, दावानल या भीषण अग्नि कांड शांत करने हेतु, क्रोधी का क्रोध शांत करवाने हेतु, धावक को लंगड़ा बनाने हेतु, सर्व ज्ञाता को जड़ बनाने हेतु, गर्व युक्त के गर्व भंजन करने हेतु। सादहरण तौर पर व्यक्ति अच्छा या बुरा कैसा भी कर्म करे और अगर व्यक्ति विशेष की सु या कु ख्याति हो, निंदा चर्चा करने वाले या अहित कहने वाले उस के बनेंगे ही, ऐसे परिस्थिति में देवी बगलामुखी की कृपा ही समस्त निंदको, अहित कहने वालों के मुख या कार्य का स्तंभन करती हैं। कही तीव्र वर्षा हो रही हो या भीषण अग्नि कांड हो गया हो, देवी का साधक बड़ी ही सरलता से समस्त प्रकार के कांडो का स्तंभन कर सकता हैं। बामा ख्यपा ने अपने माता के श्राद्ध कर्म में इसी प्रकार तीव्र वृष्टि का स्तंभन किया था। साथ ही, उग्र विघ्नों को शांत करने वाली, दरिद्रता का नाश करने वाली, भूपतियों के गर्व का दमन, मृग जैसे चंचल चित्तवन वालो के चित्त का भी आकर्षण करने वाली, मृत्यु का भी मरण करने में समर्थ हैं देवी बगलामुखी।
संक्षेप में देवी बगलामुखी से सम्बंधित मुख्य तथ्य।
मुख्य नाम : बगलामुखी।
अन्य नाम : पीताम्बरा (सर्वाधिक जनमानस में प्रचलित नाम), श्री वगला।
भैरव : मृत्युंजय।
भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : कूर्म अवतार।
तिथि : वैशाख शुक्ल अष्टमी।
कुल : श्री कुल।
दिशा : उत्तर।
स्वभाव : उग्र, राजसी गुण सम्पन्न।
कार्य : स्तम्भन विद्या के रूप हैं देवी का प्रयोग किया जाता हैं।
शारीरिक वर्ण : पीला।

 
मां बगलामुखी यंत्र चमत्कारी सफलता तथा सभी प्रकार की उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कहते हैं इस यंत्र में इतनी क्षमता है कि यह भयंकर तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है। 
 
माहात्म्य- सतयुग में एक समय भीषण तूफान उठा। इसके परिणामों से चिंतित हो भगवान विष्णु ने तप करने की ठानी। उन्होंने सौराष्‍ट्र प्रदेश में हरिद्रा नामक सरोवर के किनारे कठोर तप किया। इसी तप के फलस्वरूप सरोवर में से भगवती बगलामुखी का अवतरण हुआ। हरिद्रा यानी हल्दी होता है। अत: माँ बगलामुखी के वस्त्र एवं पूजन सामग्री सभी पीले रंग के होते हैं। बगलामुखी मंत्र के जप के लिए भी हल्दी की माला का प्रयोग होता है। 
 
साधनाकाल की सावधानियां 
 
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- पीले वस्त्र धारण करें। 
- एक समय भोजन करें। 
- बाल नहीं कटवाएं। 

- मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें। 
- दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें। 
- साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्‍ठ फलदायी होता है।
- साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए। 
 
मंत्र- सिद्ध करने की विधि
- साधना में जरूरी श्री बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है। 
- अगर सक्षम हो तो ताम्रपत्र या चांदी के पत्र पर इसे अंकित करवाए। 
- बगलामुखी यंत्र एवं इसकी संपूर्ण साधना यहां देना संभव नहीं है। किंतु आवश्‍यक मंत्र को संक्षिप्त में दिया जा रहा है ताकि जब साधक मंत्र संपन्न करें तब उसे सुविधा रहे।

प्रभावशाली मंत्र मां बगलामुखी 
विनियोग - 
अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि। 
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये। 
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:। 
ॐ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:। 
 
आवाहन
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।

ध्यान 
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम् 
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै 
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्। 
 
मंत्र 
ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां 
वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय 
बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा। 
“ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:”

अथ बगलामुखी कवचं प्रारभ्यते

श्रुत्वा च बगला पूजां स्तोत्रं चापि महेश्वर। इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं वद मे प्रभो।।

वैरिनाशकरं दिव्यं सर्वाऽशुभविनाशकम्। शुभदं स्मरणात्पुण्यं त्राहि मां दु:ख-नाशनम्।।

श्री भैरव उवाच  

कवच श्रृणु वक्ष्यामि भैरवि । प्राणवल्लभम् । पठित्वा धारयित्वा तु त्रैलोक्ये विजयी भवेत्।।

विनियोग 

ॐ अस्य श्री बगलामुखीकवचस्य नारद ऋषि: अनुष्टुप्छन्द: श्रीबगलामुखी देवता। ह्रीं बीजम्। ऐं कीलकम्। पुरुषार्थचतुष्टयसिद्धये जपे विनियोग:।।

अथ कवचम् 

शिरो मे बागला पातु ह्रदयैकक्षरी परा ।ॐ ह्रीं ॐ मे ललाटे च बगला वैरिनाशिनी।।

गदाहस्ता सदा पातु मुखं मे मोक्षदायिनी। वैरि जिह्राधरा पातु कण्ठं मे बगलामुखी।।

उदरं नाभिदेंश च पातु नित्यं परात्परा। परात्परतरा पातु मम गुह्रं सुरेश्वरी।।

हस्तौ चैव तथा पादौ पार्वती परिपातु मे। विवादे विषमे घोरे संग्रामे रिपुसंकटे।।

पीताम्बरधरा पातु सर्वांगं शिवंनर्तकी। श्रीविद्या समयं पातु मातंगी पूरिता शिवा।।

पातु पुत्रीं सूतञचैव कलत्रं कलिका मम। पातु नित्यं भ्रातरं मे पितरं शूलिनी सदा।।

रंध्रं हि बगलादेव्या: कवचं सन्मुखोदितम्। न वै देयममुख्याय सर्वसिद्धि प्रदायकम्।।

पठनाद्धारणादस्य पूजनादवांछितं लभेत्। इंद कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीय।।

पिबन्ति शोणितं तस्य योगिन्य: प्राप्य सादरा: । वश्ये चाकर्षणे चैव मारणे मोहने तथा।।

महाभये विपतौ च पठेद्वरा पाठयेतु य:। तस्य सर्वार्थसिद्धि:। स्याद् भक्तियुक्तस्य पार्वति।।

 
इन छत्तीस अक्षरों वाले मंत्र में अद्‍भुत प्रभाव है। इसको एक लाख जाप द्वारा सिद्ध किया जाता है। अधिक सिद्धि हेतु 5 लाख जप भी किए जा सकते हैं। जप की संपूर्णता के पश्चात् दशांश यज्ञ एवं दशांश तर्पण भी आवश्यक है।

बगलामुखी महाविद्या
वाकसिद्धी के लिए बगलामुखी महाविद्या से बढ़कर अन्य कोई साधना नहीं है। इनकी आराधना से प्रबल से प्रबल शत्रु भी जड़ सहित नष्ट हो जाता है। इन्हें ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है और यह भगवान विष्णु की संहारक शक्ति है। इनकी आराधना कोर्ट कचहरी में विजय, शत्रु का नाश, सरकारी अधिकारियों को अनुकूल बनाने तथा अन्य कहीं भी सफलता पाने के लिए की जाती है। इनके वरदान से व्यक्ति जो भी कह दें, वहीं सच होने लगता है। इन्हें प्रसन्न करने के लिए हल्दी की माला से निम्न मंत्र का कम से कम 16 या 21 माला मंत्र का जप करना चाहिए।




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