अथ गण्ड मूल नक्षत्र विवेचना
★★★अथ गण्ड नक्षत्राणि★★★
√● गण्ड नक्षत्र संख्या में ६ हैं। गण्ड मात्र ३ हैं।
√★१. अश्विनी (मेष राशि का प्रारंभ विन्दु)।
√★ २. रेवती (मीन राशि का अंतिम भाग)।
√★ ३. आश्लेषा (कर्क राशि का अंतिम छोर ।
√★४. मघा (सिंह राशि का आरंभ विन्दु) ।
√★ ५. ज्येष्ठा (वृश्चिक राशि का अंतिम खण्ड)।
√★ ६. मूल (धनु राशि का आद्य विन्दु)।
√●● गण्ड का अर्थ है- दोष, छिद्र, धब्बा, दरार, द्वार, संधि, ग्रंथि, गाँठ, व्यथ, फोड़ा, पिटकी, गड्ढा, मडार, अन्धकूप ।
√● जीवन में ३ गण्ड हैं-युवान, प्रौढ और जीर्ण। जब युवावस्था का आगमन होता है तो कुमार के मुख पर दाढ़ी और मूंछ के कोमल रोम खिलने लगते हैं। गुह्यास्थान में भी ऐसा होता है। शिश्न में उत्तेजना विकसित होती है। इस परिवर्तन से कुमार का चित्त क्षुब्ध हो उठता है। कुमारी में भी ऐसा होता है। उसमें वक्षांकुर फूटते हैं, आर्तव का होना देखा जाता है, लज्जा और संकोच आता है। कुमारी का मन डाँवाडोल होता है। ऐसी दशा में कुमार/कुमारी का सम्हलना वा सम्हालना कठिन होता है। यह प्रथमगंड है। ज युवावस्था का अन्त होता है, प्रौढ़वस्था का आगमन होता है तो केश कृष्ण से श्वेत होना प्रारंभ होते हैं। पुरुष की भोग क्षमता शिथिल होती है। स्त्री के कुच लटकने लगते हैं। इसमें स्त्री पुरुष दोनों चिंतित होते. हैं। यह दूसरा गण्ड है। जब प्रौढ़ावस्था का अन्त तथा जरा का आगम होता है तो चेहरे पर झुर्रियाँ प्रकट होती हैं। सौन्दर्य नष्ट होता है। यह तीसरा गण्ड है।
√●मैं दो गण्ड देख चुका हूँ। तीसरा झेलना बाकी है। प्रथम की अपेक्षा दूसरा और दूसरे की अपेक्षा तीसरा अधिक कष्टकारी होता है। यह शारीरिक परिवर्तन देहासक्त व्यक्ति को व्यथित करता है। ऐसा कौन है जिसकी देह में आसक्ति न हो ? किसी को बहुत, किसी को कम, दैहिक लगाव होता है। पर, होता है।
√◆अश्विनी और रेवती का स्पर्श प्रथम गण्ड है। यह कम कष्टकारी है। आश्लेषा और मघा का स्पर्श द्वितीय गण्ड है। यह पूर्वापेक्षा अधिक कष्टद है। ज्येष्ठा और मूल का संस्पर्श तृतीय गण्ड है। यह सर्वाधिक कष्टप्रद है। युवा, प्रौढ तथा जरा- यही तीन गण्ड हैं। चन्द्रमा जब इनमें होता है तो मन को पीडा पहुँचती है। चन्द्रमा तो मन ही है। मन सूक्ष्म है। देह स्थूल है। मन का कष्ट देह के कष्ट से अधिक घातक होता है। देह का घाव ठीक हो जाता है पर, मन का घाव नहीं (कठिनता से) ठीक होता। इसलिये जातक के जन्म समय गण्ड का विचार लग्न से न करके चन्द्र से किये जाने की आर्य परम्परा है। मैं इसका पोषक हूँ।
√●●इस काया में भी ३ गण्ड हैं।
√★१. कण्ठ मीव क्षेत्र ।
√★२. कटिश्रोणि क्षेत्र।
√★३. घुटना।
√●गर्दन की पीड़ा की अपेक्षा कमर की पीड़ा अधिक खलती है। कटि पीडा की अपेक्षा घुटने का दर्द बहुत कष्ट देता है। गर्दन के दर्द में विशेष कष्ट नहीं होता। कमर दर्द में उठना बैठना कठिन होता है। किन्तु घुटने के दर्द में न चलने फिरने से सारी क्रियाएं ठप्प पड़ जाती हैं। यहाँ भी तीसरा गण्ड अतिकष्टकारक है। सब से अधिक कष्ट तीसरे गण्ड में होता है, इसलिये इसे गण्डमूल कहते हैं। इस कड़ी में पड़ने वाले अंतिम नक्षत्र का नाम 'मूल' इसी लिये पड़ा है। यह कष्ट का घर है।
√●वैसे तो गण्ड कई प्रकार के होते हैं...
√●१. रात्रि और दिन का गण्ड-संध्या (सायं वा प्रातः) । प्रातः की अपेक्षा सायं का गण्ड कष्ट प्रद होता है। इसकी संख्या २ है ।
√●२. तिथि गण्ड-जब एक तिथि का अंत और दूसरी तिथि का प्रारंभ होता है तो यह होता है। इसकी कुल संख्या १५ है।
√●३. राशि गण्ड- जब एक राशि का अंत एवं दूसरी का प्रारंभ होता है तो यह गण्ड होता है। यह संख्या में १२ है।
√●४. नक्षत्र गण्ड- जब एक नक्षत्र का चौथा चरण दूसरे नक्षत्र के प्रथम चरण के साथ होता है तो यह गण्ड माना जाता है। यह संख्या में २७ है।
√●इन चार प्रकार के गण्डों में राशि एवं नक्षत्र के समवेत गण्ड को प्रमुखता दी गई है। राशि के १२ गण्डों तथा नक्षत्र के २७ गण्डों का समवेत मेल केवल तीन स्थानों पर होता है। इसमें राशि के साथ-साथ नक्षत्र का आद्यन्त आवश्यक है। केवल एकोत्पन्न गण्ड नगण्य है। अधिक स्पष्टता के साथ,
√● १. अश्विनी का प्रथम चरण + रेवती का चतुर्थ चरण ।
[मेष राशि ०° में से ३° २०' तक + मीन राशि में २६° ४०' के बाद ३०° तक]
√● २. आश्लेषा का चतुर्थ चरण + मघा का प्रथम चरण ।
【 कर्कराशि में २६° ४० के बाद ३०° तक + सिंह राशि ०° में से ३०° २०' तक]
√●३. ज्येष्ठाका चतुर्थ चरण + मूल का प्रथम चरण ।
[ वृश्चिक में २६° ४०' के बाद ३०° तक + धनु राशि में ०° से ३°२०' तक]
√● उपर्युक्त इन अंशों में चन्द्रमा के रहने पर मनोघात / मनस्ताप / व्याधि/काय क्लेश/ शरीर क्षति/ देह नाश का संकट उपस्थित होता है।
√●मूल धातु भ्वादिगण उभयपदी मूलति-ते: जड़ जमना, दृढ़ होना, स्थिर होना, चुरादिगण उभयपदी मूलयति-ते: पौधा लगाना, उगाना, पालना अर्थ वाली है। मूल + क= मूल का अर्थ है-जड़, किसी वस्तु का सबसे नीचे का छोर, आधार, किसी भी वस्तु का किनारा जिसके सहारे वह किसी दूसरी वस्तु से जड़ी हो, आरंभ, नींव, स्रोत, उत्पत्ति स्थान, किसी वस्तु का तल या पैर, उद्गम बिन्दु वा स्रोत ।
√●इस प्रकार, गण्ड मूल= दुःखद विन्दु, पीडा स्थान, क्लेशद्वार, व्याधिजड़, आधिस्थल, संकट क्षेत्र, कष्टस्थली, तापछिद्र, भयदेश, विपत्ति पाद, विषाधार, उपप्लवारंभ।
√●गण्डमूल को तरह अभुक्त मूल शब्द का प्रयोग भूषियों ने किया है भुक्त (भुज् + क्त) = खाया हुआ प्रयुक्त, अधिकृत अधिकार में लिया गया, नियंत्रित । अतः, अभुक्त जिस पर अनियंत्रण हो, अधिकार वा वश न हो न चले। भूषियों ने कहा है अभुक्त मूल में पैदा होने वाला जातक अनिष्टकर होता है।
√●गण्डमूल पद के स्थान पर पूर्वपद गण्ड का लोप कर केवल मूल कहा जाता है। अतः जहाँ मूल शब्द इस सन्दर्भ मे आये, वहाँ उसे गण्ड मूल समझा जाये। अषियों ने मूल के विषय में जो कहा है, उन्हीं के वाक्यों से आगे बढ़ता हूँ।
√●१. वशिष्ठ मुनि कहते हैं...
"भुजङ्गपौरन्दरपौष्णमानां तदप्रभानां च यदन्तरालम् ।
अभुक्तमूलं प्रहरप्रमाणं त्यजेत्सुतं तत्र भवां सुताञ्च ॥"
[ श्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्र का अंतिम भाग तथा इनसे आगे वाले नक्षत्र मघा, मूल, अश्विनी) का आदि का भाग- ये आदि और अन्त के दोनों भाग मिल कर एक प्रहर (साढ़े सात घटी वा ३ घंटे) का काल अभुक्त मूल होता है। इसमें पैदा होने वाले बालक का त्याग करना चाहिये ।]
√● २. शौनक मुनि कहते हैं...
"भुजङ्गपित्र्योरथ चेन्द्रमूलपौष्णाश्वयोश्चापि यदन्तरालम् ।
अभुक्तमूलं प्रहरप्रमाणं तदुत्थवालं न विलोकयेत् पिता ॥"
[ श्लेषा ममा, ज्येष्ठा-मूल, रेवती- अश्विनी नक्षत्रों के बीच का एक प्रहर (३ घंटे) का समय अभुक्तमूल संज्ञा वाला होता है। इसमें पैदा हुए बालक का मुख पिता को नहीं देखना चाहिये।]
√●३. पितामह ब्रह्मा जी कहते हैं...
"सार्पेन्द्रपोष्णधिष्ण्यान्ते षोडशांशा भसन्धयः ।
तदग्रिमेष्वादिमाश्च पापा गण्डान्त संज्ञकाः ॥"
[ श्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्रों के अन्तिम सोलहवें भाग तथा मघा, मूल, अश्विनी नक्षत्रों के आदि के सोलहवें भाग की संज्ञा गण्डान्त है। इस गण्डान्त संज्ञक भाग में उत्पन्न जातक शुभकारी नहीं होता ।]
१/१६ भाग = ४ घटी।
√●बालक को त्याग देने का अर्थ है, उसमें आसक्ति का सर्वथा अभाव होना। शाब्दिक अर्थ पाठा नहीं है।
√● ४. श्रीपति कहते हैं ...
"पौष्णाश्विन्यो: सार्पपित्रर्क्षयोश्च यवच्च मूलज्येष्ठयोरस्तरालम् ।
उभं गण्डस्याच्चतुर्नाहिक हि यात्रा जन्मदाह कालेष्वनिष्ठम् ॥"
(रत्नमाला)
【 रेवती और अश्विनी के बीच की ४ घटी (रेवती के अन्त की २ घटी तथा अश्विनी के आदि की २ घटी) की गण्डान्त संज्ञा होती है। इसी प्रकार, आश्लेष के अन्त की दो घटी व मघा के आदि की दो घटी तथा ज्येष्ठा के अन्त को २ घटी व मूल के आदि की २ घटी अर्थात् उक्त नक्षत्रों के मध्य की ४ घटी की गण्डान्त संज्ञा होती है। यह गण्डान्त काल यात्रा, जन्म और विवाह में अशुभफल देने वाला होता है। 】
√●५. नारद जी कहते हैं...
"कुलीरसिंहयोः कौत्येचापयोमनमेषयोः । गण्डान्तमन्तरालं स्याद्घटिकार्धं मृतिप्रदम् ॥"
[ कर्क राशि की अन्तिम आधी घटी व सिंह राशि के प्रारंभ की आधी घटी की तथा वृश्चिक के अन्त की आधी घटी व धनु के प्रारंभ की आधी घटी को एवं मीन के अन्त की आधी घटी व मेष के प्रारंभ की आधी घटी को गणडान्त संज्ञा होती है। यह समय जन्मादि में मृत्युदेने वाला होता है ।
√●६. कश्यप जी भी यही कहते हैं...
"सिंह कर्कटयोश्वापकीयोमनमेषयोः । गण्डान्तमन्तरालं तन्नाडिका निधनप्रदा ।।"
[सिंह-कर्कट, धनु-वृश्चिक, मीन-मेष के मध्य की एक घटी (प्रत्येक के अन्त आदि को आधी घटी) की गण्डान्त संज्ञा होती है। यह काल मृत्युद है।
√●●गण्डान्त के फल के विषय में नारद जी का वचन है...
"दिवाजातस्तु पितरं रात्री च जननी तथा।
सन्ध्ययोर्निहन्यात्मानं नास्ति गण्डे निरामयः।।"
यदि दिन में गण्डान्त हो तो पिता का, रात्रि में हो तो माता का और दोनों सन्ध्याओं में हो तो अपना स्वयं का नाश होता है। गण्ड में निरोगता नहीं रहती (यदि जीवित बचा तो)।
√●पुनः नारद जी कहते हैं ...
"वत्सरात् पितरं हन्ति मातरं तु त्रिवर्षतः ।"
इस गण्डान्त में उत्पन्न बालक वर्ष के भीतर पिता का नाश करता है तथा तीन वर्ष के अन्दर माता का।
√● जैसे राशि नक्षत्र का गण्ड चन्द्रमा की स्थिति से विचारा जाता है, उसी प्रकार तिथि गण्ड का विचार भी नारद वाक्य से करना चाहिये।
"पूर्णानन्दाख्ययोस्तिथ्योः सन्धिर्नाडीद्वयं सदा ।
गण्डान्तं मृत्युदं जन्मयात्रोद्वाहवतादिषु।।"
( नारद )
पूर्णातिथियों (५ पंचमी, १० दशमी, १५ पूर्णिमा / अमावस्या ३०) की अन्त वाली १ घटी तथा नन्दा तिथियों (१ प्रतिपदा, ६ षष्ठी, ११ एकादशी) की आदि की १ घटी की गण्डान्त संज्ञा होती है। इसको तिथि गण्डान्त कहते हैं। यह तिथि संज्ञक गण्डान्त जन्म, यात्रा, विवाह, व्रतबन्ध, उपनयनादि में मृत्युप्रद होता है।
√●तिथि गण्ड
नन्दातिथि....६....११...की अंतिम १
घटी
√●पूर्णातिथि....(३०)१५...५....१०....की आरंभिक १ घटी।
√●वशिष्ठ के मत से लग्न गण्डान्त का भी विचार करना चाहिये ...
"लग्नान्तरालं घटिकार्धमेतत् कुलीरहयोरलिचापयोश्च ।
मीनाजयोः सर्वगुणान्निहन्ति लोभो तथा सर्वगुणान्तरस्य ॥"
कर्क- सिंह, वृश्चिक- धनु, मीन-मेष लग्नों के बीच की आधी-आधी घटी व्यक्ति के समस्त गुणों का नाश करती है।
√●●लग्नगण्ड.....
कर्क.... वृश्चिक.... मीन....लग्नों की अंतिम १/२ घटि।
√●●सिंह....धनु....मेष लग्नों की आद्य १/२ घटि।
√●इसी प्रकार, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का १ घटी काल दिवारात्रि गण्ड कहा जाता है। इसे समय गण्ड वा होरा गण्ड भी कहते हैं।
√●सान्ध्यगण्ड ...
सूर्योदय (प्रात), सूर्यास्त (सायं) के पूर्व की १ घटी सूर्योदय प्रात) सूर्यास्त (सायं) के पश्चात् को १ घटी इस गण्ड में भगवत् भजन / गायत्री जप/ नाम जप प्रशस्त है। इसके करने से विवाहादि शुभकमों में यह काल अमृततुल्य शुभ हो जाता है। गोधूलि (सायंकाल) विवाह में वरेण्य है।
√●जहाँ पर ये चारों गण्ड एक साथ उपस्थित हों, वहीं अनिष्ट के सिवा और कुछ नहीं है। इसमें जन्मने वाला यदि मरा नहीं तो जीवन भर आधिव्याधि से मस्त रहेगा। इसमें यात्रा करने वाले को चोरों से भय होता है। इसमें व्रतबन्ध करने वाले का श्रेयपथ भ्रष्ट होता है। इसमें विवाह करने वाले का दाम्पत्य ध्वस्त हो जाता है। गण्डान्त दोष की शांति के अनेक उपाय आचार्यों ने बताये हैं। ये उपाय समय सापेक्ष होने से सम्प्रति अयुक्त हैं। दान, जप, हवन, ब्राह्मण भोजन से लाभ होता है। गण्ड क्या है ?
"अश्विनीमघमूलानां तित्रो गण्डाद्यनाडिकाः ।
अन्त्ये पौष्णोरगेन्द्राणां पञ्चैव यवना जगुः ॥"
(दीपिका ६/५)
अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र के प्रथम ३ दण्ड गण्ड कहे गये हैं। रेवती, आश्लेषा, ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतिम ५ दण्ड गण्ड कहे गये हैं। इस कथन से स्पष्ट है-राश्यन्त का गण्ड, राश्यारंभ के गण्ड की तुलना में अधिक बड़ा है। एक ५ दण्ड/ घटी का है तो दूसरा मात्र ३ घटी का गण्ड तीन हैं। मूल और ज्येष्ठा नक्षत्र में जो गण्ड होता है, उसको दिवा गण्ड कहते हैं। मघा और आश्लेषण नक्षत्र के गण्ड को निशागण्ड कहते हैं। रेवती और अश्विनी नक्षत्र के गण्ड को सन्ध्या गण्ड कहते हैं। ऐसा कहा गया है...
"मूलेन्द्रयोर्दिवागण्डो निशायां पितृसर्पयोः।
सन्ध्याद्वये तु विज्ञेयो रेवती तुरमर्षयोः।।"
(दीपिका ६/६ )
√●●अथगण्डरिष्ट फलम्...
"संध्यारात्रिदिवा भागे गण्डयोगोद्भवः शिशुः ।
आत्मानं मातरं तातं विनिहन्ति यथाक्रमम् ॥"
(दीपिका ६/७ )
√● १. सन्ध्यागण्ड (रेवती + अश्विनी) में स्वयं का नाश होता है।
√●२. निशा गण्ड (मघा + आश्लेषा) में शिशु की माता का नाश होता है।
√●३. दिवा गण्ड (मूल + ज्येष्ठा) में शिशु के पिता का नाश होता है।
√●●आगे गण्ड शांति का उपाय कहते हैं...
१. "कांस्य पात्रं धृतैः पूर्ण गण्डदोषोपशान्तये ।
दद्यात्धेनुं सुवर्ण च ग्रहांश्चापि प्रपूजयेत् ॥"
(शुद्धदीपिका ६/१० )
घी से भरा हुआ काँसे का पात्र, दूध देने वाली सवत्सा गाय, स्वर्ण (धन दक्षिणादि) का दान गण्डशांति के लिये (सुपात्र को) करना चाहिये। इसके अतिरिक्त, नवग्रहों का पूजन यथविधि करना चाहिये।
√● २. "गोमूत्र गोमयं क्षीरं दधिसर्फि कुशोदकम्।
पञ्चगव्यमिदं कुंभे क्षिपेद् मन्त्रवितम्॥
धूप दीप नैवेद्यं कुंभोपरिप्रस्थापयेत् ।
विष्णु सहस्रनाममंत्रेण बालकं स्नापयेत्ततः ॥
पितृयुक्तं दिवाजात मातृयुक्तं च रात्रिजम् ।
स्नापयेत् पितृमातृम्यां सन्ध्ययोरुभयोरपि ॥"
(शौनक श्रीवासः)
पञ्चगव्य (गाय का गोबर, मूत्र, दूध, दही, घी) को कुशयुक्त जल के साथ मन्त्रोच्चारपूर्वक कुंभ में रखना चाहिये। धूप दीप नैवेद्य को कुंभ पर रख कर विष्णु सहस्रनाम मंत्र के द्वारा जातक को नहलाना चाहिये। दिवागण्ड में उत्पन्न शिशु को पिता के साथ निशागण्ड में उत्पन्न हुए शिशु को माता के साथ तथा सान्ध्यगण्ड में जन्मे शिशु को माता पिता दोनों के साथ स्नान कराना चाहिये।
√•३. सूतक निवृत्ति वा आगामी जन्म नक्षत्र की प्रतीक्षा किये बिना आगे लिखे मंत्रों से गण्डशांति करना चाहिये...
√●● अथदेवास्तुतिः ....
"योऽसौ वज्रधरो देवो महेन्द्रो गजवाहनः।
मूलजात शिशोर्दोष मातापित्रोर्व्यपोहतु ।।१ ॥
योऽसौ शक्तिधरो देवो हुतभुमेषवाहनः ।
यः सप्तजिह्वदेवोग्निमूलदोषं व्यपोहतु ॥ २ ॥
योऽसौ दण्डधरो देवो धर्मो महिषवाहनः । मूलजात शिशोर्दोषं व्यपोहतु यमो मम ॥ ३ ॥
योऽसौ खड्गधरो देवो निरृतिर्राक्षसाधिपतिः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोषं गण्डान्तसम्भवम् ॥ ४ ॥
योऽसौ पाशधरो देवो वरुणश्च जलेश्वरः । नक्रवाहः प्रचेताहो मूलोत्थाघं व्यपोहतु ॥ ५ ॥
योऽसौ देवो जगत्प्राणो मारुतो मृगवाहनः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोषं बालस्य शांतिदः ॥ ६ ॥
योऽसौ निधिपतिर्देवो खड्गभृन्नरवाहनः । मातापित्रोः शिशोश्चैव मूलदोषं व्यपोहतु ॥ ७ ॥
योऽसौ पशुपतिर्देवः पिनाकी वृषवाहनः । आश्लेषामूलगण्डान्तं दोषमाशु
व्यपोहतु ॥ ८ ॥
विध्नेशः क्षेत्रपो दुर्गा लोकपाला नवग्रहाः । सर्वदोष प्रशमनं सर्वे कुर्वन्ति शान्तिदाः ॥ ९ ॥
त्रैलोक्ये यानि भूतानि चराणि स्थावराणि च । ब्रह्मार्क विष्णु युक्तानि तानि दोषं दहन्तु मे (ते) ॥ १० ॥"
( वशिष्ठ संहिता।)
√●●●अथगण्डान्तदोषापवादः
√★१. यदि जन्म के समय चन्द्रमापूर्ण बली हो तो नक्षत्र व तिथि गण्डान्तदोष नहीं होता। यदि गुरु बलवान होतो भी गण्डान्तदोष नहीं होता।
"नक्षत्रतिथिगण्डानां नास्तीन्दौ बलभाजिनि ।
तथैव लग्नगण्डान्तं नास्तिजीवे बलान्विते ॥"
( पितामह ब्रह्मा)
√●२. यदि जातक का जन्म अभिजित मुहूर्त में हो तो समस्त गण्डान्तों के दोष का विनाश उसी प्रकार होता है जैसे बहेलिया पक्षियों के समुदाय की तरह समस्त हिरनों का नाश करता है।
"गण्डान्तदोषमखिलं मुहूर्तोऽभिजिताह्वयः । हन्ति तद्वन्मृगव्याधः पक्षिसङ्घमिवाखिलम् ॥"
( वशिष्ठ )
√●●अथ सर्वगण्डान्तफलम् ...
√★१. जब जन्म में चारों गण्डान्त (लग्न गण्ड, राशि गण्ड, तिथि गण्ड, सान्ध्य गण्ड) हों तो जातक तुरन्तमरे/ कुटुम्ब की हानि करे। यदि किसी प्रकार जीवे तो नीच की सेवा करे और अनेक दुःख भोगे ।
√★२. लग्नगण्डान्त में पिता को अरिष्ट, राशिगण्डान्त में स्वयं को अरिष्ट, तिथि गण्डान्त में ज्येष्ठभ्राता को अरिष्ट, सान्ध्य गण्डान्त में माता को अरिष्ट होता है।
√★गण्डान्त दोष की निवृत्ति हेतु शांति उपाय करना शास्त्र का निर्देश है। लाभ होता है। मन्द प्रारब्ध तीव्र प्रयत्न से, तीव्र प्रारब्ध तीव्रतर प्रयत्न से तीव्रतर प्रारब्ध तीव्रतम प्रयत्न से कटता है। पर, तीव्रतम प्रारब्ध अकाट्य है। इसे भोगना ही है।