Astro-Ready-recunner
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स्वयं अपनी कुंडली देखे इस रेडी रेकनर को फॉलो करके
पंचांग
तिथि,वार, नक्षत्र,योग और करण
फलित-ज्योतिष के ज्ञान के लिए तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार के सम्बन्ध मेंआवश्यक जानकारी प्रप्त कर लेनी चाहिए। अतएव जातक अंग पर लिखने के पूर्व उपर्युदतपाँचों के संक्षिप्त परिचय के साथ आवश्यक परिभाषाएँ दी जाती हैं--
तिथि
चन्द्रमा की एक कला को तिथि माना गया है। इसका चन्द्र और सूर्य के अन्तर्शोंपर से मान निकाला जाता है। प्रतिदिन १२ अंशों का अन्तर सूर्य और चन्द्रमा के भ्रमगमें होता है, यही अन्तराश का मध्यम मान है। अमावस्या के बाद प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमातक की तिथियाँ शुक्लपक्ष की और पूर्णिमा के बाद प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक कीतिथियाँ कृष्णपक्ष की होती हैं। ज्योतिषशास्त्र में तिथियों की गणना शुक्लपक्ष की प्रतिपदासे आरम्भ होती है।
तिथियों के स्वामी-प्रतिपदा का स्वामी अग्नि, द्वितीया का ब्रह्या, तृतीया की गौरी,चतुर्थी का गणेश, पंधमी का शेषनाग, षष्ठी का कार्तकेय, सप्तमी का सूर्य, अष्टमी का शिव, नवमी की दुर्गा, दशमी का काल, एकादशी के विश्वदेव, द्वादशी का विष्णु, त्रयोदशीका काम, चतुर्दशी का शिव, पीर्णमासी का चन्द्रमा और अमावस्या के पितर हैं। तिथियाके शुभाशुभत्व के अवसर पर स्वामियीं का विधार किया जीता है।
अमावस्या के तीन भेद हैं-सिनीवाली, दर्श और कुदू। प्रात.काल से लैकर रात्रितक रहनेवाली अमावस्या को सिनीवाली, चतुर्दशी से विद्ध को दर्श एव प्रतिपदा से युक्तअमावस्या को कुहू कहते हैं।
तिथियों की संज्ञाएँ-१।६।११ नन्दा, २।७।१२ भद्रा, ३।८।१३ जया, ४९1१४ रिक्ताऔर ५।१०1१५ पूर्णा तथा ४६्ा८९।१२1१४ तिथियाँ पक्षरन्ध संज्ञक हैं।
मासशून्य तिथियाँ-चैत्र में दोनों पक्षों की अष्टमी और नवमी, वैशाख में दोनों पक्षोंकी द्वादशी, जेष्ठ में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी और शुक्लपक्ष की त्रयोदशी, आषाढ़ में कृष्णपक्षकी षष्ठी और शुक्लपक्ष की सप्तमी, श्रावण में दोनों पक्षों की द्वितीया और तृतीया, भाद्रपदमें दोनों पक्षों की प्रतिपदा और द्वितीया, आश्विन में दोनों पक्षों की दशमी और एकादशी,कार्तिक में कृष्णपक्ष की पंचमी और शुक्लपक्ष की चतुर्दशी, मार्गशीर्ष में दोनों पक्षों की सप्तमीऔर अष्टमी, पौष में दोनों पक्षों की चतुर्थी और पंचमी, माघ में कृष्णपक्ष की पंचमा औरशुक्ल पक्ष की षष्ठी एवं फाल्गुन में कृष्णपक्ष की चतुर्थी और शुक्लपक्ष की तृत्तीया मासशून्यसंज्ञक हैं। मासशून्य तिथियों में कार्य करने से सफलता प्राप्त नहीं-होती।
सिद्धा तिथियाँ-मंगलवार को ३।८।१३ बुधवार को २ा७।१२, बृहस्पतिवार को५।१०।१५, शुक्रवार को १।६।११ एवं शनिवार को ४।९।१४ तिथियाँ सिद्धि देनेवालीसिद्धासंज्ञक हैं। इन तिथियों में किया गया कार्य सिद्धिप्रदायक होता है।
. दग्धा, विष और हुताशन संज्ञक तिथियाँ-रविवार को द्वादशी, सोमवार कोएकादशी, मंगलवार को पंचमी, बुधवार को तृतीया, बृहस्पतिवार को षष्ठी, शुक्रवार कोअष्टमी और शनिवार को नवमी दग्धा संज्ञक; रविवार को चतुर्थी, सोमवार को षष्ठी,मंगलबार को सप्तमी, बुधवार को द्वितीया, बृहस्पतिवार को अष्टमी, शुक्रवार को नवभी औरशनिवार को सप्तमी विष संज्ञक एवं रविवार को द्वादशी, सोमवार को षष्ठी, मंगलवार कोसप्तर्म, बुधवार को अष्टमी, बृहस्पतिवार को नवमी, शुक्रवार को दशमी और शनिवार कोएकादी हुताशन संज्ञक हैं। नामानुसार इन तिथियों में काम करने से विष्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
तिथि - सूर्य एवं चन्द्र का अन्तर
अमावस्या/मावस-12º-0°
प्रथमा/पड़वा/प्रतिपदा-0°-12°
द्वितीया/दूज-12°-24°
तृतीया / तीज-24°-36°
चतुर्थी/चौथ-36°-48°
पंचमी/पांचे-48°-60°
षष्ठी/छठ/छठी-60°-72°
सप्तमी/साते-72º-84°
अष्टमी/आठे-84°-96°
नवमी/नौमी-96°-108°
दशमी / दसवीं-108°-120°
एकादशी /ग्यारस-120°-132°
द्वादशी/बारस-132°-144°
त्रयोदशी/तेरस-144°-156°
चतुर्दशी / चौदसं-156-168°
पूर्णिमा / पूनम-168°-180°
ज्योतिष में तिथि गणना शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से शुरू की जाती है। कृष्ण पक्ष में तिथियों का अंशमान उलटा हो जाता है। यानी कृष्णपक्ष की प्रथमा 180°-163° होगी। द्वितीया 168°-156° तथा तृतीया 156°-144° होगी। इसी प्रकार घटते
हुए क्रमशः अमावस तक 12°-0° पर आ जाएगी। इस अन्तर को ध्यान में रखते हुए जन्मकुंडली में सूर्यचन्द्र की स्थिति देखकर तिथि को जाना जाता है।
कैसे जानें तिथि ? - चन्द्रमा के रेखांश से सूर्य के रेखांश को घटा लें। जो
आए उसे 12 से भाग दे दें। यदि 1 से 15 के बीच परिणाम आए तो शुक्लपक्ष, 16 से 30 तक हो तो कृष्ण पक्ष समझें ।
सूत्र - चन्द्र°-सूर्य° ÷12 तिथि अथवा
={M°-S°}÷12= तिथि
विशेष- यहां ध्यान रखें कि 12° का अन्तर बढ़ने पर तिथि परिवर्तित होती
है। किन्तु 12° का यह अन्तर सदा एक निश्चित अवधि में ही बढ़ेगा/घटेगा, ऐसा कोई सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि चन्द्र की गति (आकाशीया एक जैसी नहीं रहती। ह घटती-बढ़ती रहती है। यहां तक कि 12° का यह अन्तर कभी चन्द्र 19 घंटे 59 मिनट में काटता है तो कभी यह अन्तर काटने में उसे 26 घंटे 49 मिनट का समय भी लग जाता है। इस अन्तर के कारण एक दिवस में एक ही तिथि नहीं रह पाती। कभी एक दिवस में दो या डेढ़ तिथि बढ़ जाती है तो कभी घट भी जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय पंचांग शास्त्र उस तिथि को दिवस की तिथि मानता है, जो सूर्योदय के समय चल रही हो। भले ही वह सूर्योदय के तुरन्त बाद ही समाप्त हो जाए।
तिथि क्षय एवं तिथि वृद्धि -:
अतः यदि आज सूर्योदय के समय द्वितीया चल रही है तो द्वितीया ही आज की तिथि मानी जाएगी। यदि सूर्योदय के बाद तृतीया शुरू हो गई है तो भी आज द्वितीया ही मानेंगे और यदि यही द्वितीया कल सूर्योदय के समय भी रहे तो कल भी द्वितीया ही मानेंगे। इसके विपरीत यदि आज सूर्योदय के समय द्वितीया है और सूर्योदय के बाद द्वितीया खत्म होकर तृतीया आ गई जो कि कल सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त भी हो गई और कल के सूर्योदय के समय चतुर्थी तिथि चलती हुई हो तो आज द्वितीया और कल चतुर्थी मानी जाएगी।
तृतीया का क्षय मान लिया जाएगा।
तिथि के प्रकार
नंदा - भद्रा - जया - रिक्ता - पूर्णा
1. 2. 3. 4. 5.
6. 7. 8. 9. 10.
11. 12. 13. 14. 15.
√ × √ √ √
शुक्रवार को नंदा,
मंगलवार को जया,
गुरुवार को पूर्णा,
शनिवार को रिक्ता तिथियां शुभ सिद्धि दायक रहती है
Lagn 60 % चंद्र 30% 10%सूर्य
360°/12=30° भाव और राशि
Zodiac/ भचक्र
Vastu /
भाव /दिशा/degree
लग्न East horizon 0°/360°सूर्य यन्त्र
2nd East North 30° विष्णु यन्त्र गुरुयंत्र
3rd North-East 60° केतु यंत्र, नवदुर्गा यंत्र,
4th. North 90° बुद्ध यन्त्र/कुबेर यंत्र
5th North-West 120° चंद्र यंत्र
6th West-North 150° वरुण यंत्र
7th West 180° शनि यंत्र, काली यंत्र
8th West South 210° यम यंत्र
भैरव यंत्र
9th South-West 240° राहु यंत्र पितृदोष, वास्तु, प्रेतबाधा निवारक यंत्र
10th South 270° मंगल यंत्र
11th South-East 300° शुक्र यंत्र, श्री यंत्र, लक्ष्मी यन्त्र, कमला यंत्र
12th East-South 330° अरुण/इंद्र यंत्र
राशियों का परिचय
आकाश में स्थित भचक्र के ३६० अंश अथवा १०८ भाग होते हैं। समस्त भचक१२ राशियों में चिभक्त है, अतः ३० अंश अथवा ९ भाग की एक राशि होती है।
मेष-पुरुष जाति, चरसंज्ञक अग्नितत्त्व, पूर्व दिशा की मालिक, मस्तक का बोधकरानेवाली, पृष्ठोदय, उग्र प्रकृति, लाल-पीले वर्णवाली, कान्तिहीन, क्षत्रियवर्ण, सभी समान अंगवाली और अल्पसप्तति है। यह पित्त प्रकृतिकारक है, इसका प्राकृतिक स्वभाव साहसी,अभिमानी और मित्रों पर कृपा रखनेवाला है।
वृष-स्त्री राशि, स्थिरसंज्ञक, भूमित्त्व, शीतल स्वभाव, कान्ति रहित, दक्षिण दिशा
की स्वामिनी, वातप्रकृति, रात्रिबली, चार चरणवाली, श्वेत वर्ण, महाशब्दकारी, विषमोदयी,
मध्यम सन्तति, शुभकारक, वैश्यवर्ण और शिधिल शरीर है। यह अर्द्धजल राशि कहलाती
है। इसका प्राकृतिक स्वभाव स्वार्थी, समझ-बूझकर काम करनेवाली और सांसारिक कार्यों
में दक्ष होती है। इससे कण्ठ, मुख और कपोलों का विचार किया जाता है।
मिथून-पश्चिम दिशा की स्वामिनी,वायुतत्च, तोते के समान हरित वर्णवालीं, पुरुष,राशि, द्वस्वभाव, विषमोदयी, उष्ण, शूद्रवर्ण, महाशब्दकारी, चिकनी, दिनबली, मध्यम सन्ततिऔर शिथिल शरीर है। इसको प्राकृतिक स्वभाव विद्याध्ययनी और शिल्पी है। इससे हाथ,शरीर के कन्धों और बाहुओं का विचार किया जाता है।
कर्क-चर, स्त्री जाति, सौम्य और कफ प्रकृति, जलचारी, समोदयी, रात्रिबली, उत्तर
दिशा की स्वामिनी, रक्त-धवल मिश्रितवर्ण, बहुचरण एवं सन्तानवाली है। इसका प्राकृतिकस्वभाव सांसारिक उन्नति में प्रयल्शीलता, लज्जा, कार्यस्थैर्य और समयानुयायिता का सूचकहै। इससे पेट, वक्षःस्थल और गुर्दे का विचार किया जाता है।
सिंह-पुरुष जाति, स्थिरसंज्ञक, अग्नित्त्व, दिनबली, पित्त प्रकृति, पीत वर्ण, उष्णस्वभाव, पूर्व दिशा की स्वामिनी, पुष्ट शरीर, क्षत्रिय वर्ण, अल्पसन्तति, भ्रमणप्रिय और निर्जलराशि है। इसका प्राकृतिक स्वरूप मेषराशि जैसा है, पर तो भी इसमें स्वातन्त्रय प्रेम औरउदारता विशेष रूप से वर्तमान है। इससे हृदय का विचार किया जाता है।
कन्या-पिंगल वर्ण, स्त्री जाति, द्विस्वभाव, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, रात्रिबली, वायुऔर शीत प्रकृति, पृथ्वीत्व और अल्प सन्तानवाली है। इसका प्राकृतिक स्वभाव मिथुन-जैसाहै, पर विशेषता इतनी है कि अपनी उन्नति और मोन पर पूर्ण ध्यान रखने की यह कोशिशकरती है। इससे पेट का विचार किया जाता है।
तुला-पुरुष जाति, चरसंज्ञक, वायुत्त्व, पश्चिमी दिशा की स्वामिनी, अल्पसन्तानवाली,श्यामदर्ण, शीर्षोदयी, शूद्रसंज्ञक, दिनबली, क्रूर स्वभाव और पाद जल राशि है। इसकाप्राकृतिक स्वभाव विचारशील; ज्ञानप्रिय, कार्य-सम्पादक और राजनीतिज्ञ है। इससे नाभि केनीचे के अंगों का विचार किया जाता है।
वृश्चिक-स्थिरसंज्ञक, शुभ्रवर्ण स्त्री जाति, जलतत्त्व, उत्तर दिशा की स्वामिनी,रात्रिबली, कफ प्रकृति, बहुसन्तति, ब्राह्मण वर्ण और अर्द्ध जल राशि है। इसका प्राकृतिकस्वभाव दम्भी, हठी, दृढप्रतिज्ञ, स्पष्टवादी और निर्मल है। इससे शरीर के क़द एवं जननेन्द्रियका विचार किया जाता है।
धनु-पुरुंष जाति, कांचन वर्ण, द्विस्वभाव, क्रूरसंज्ञक, पित्त प्रकृति, दिनवली, पूर्व दिशाकी स्वामिनी, दृढ़ शरोर, अग्नित्त्व, क्षत्रिय वर्ण, अल्प सन्तति एवं अर्द्धजल राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव अधिकारप्रिय, करुणामय और मर्यादा का इच्छुक है। इससे पैरों की सन्धितथा जंघाओं का विचार किया जाता है।
मकर-चरसंज्ञक, स्त्री जाति, पृथ्वीत्त्व, वात प्रकृति पिंगल वर्ण, रात्रिवली, वैश्यवर्ण,शिधिल शरीर और दक्षिण दिशा की स्वामिनी है। इसका प्राकृतिक स्वभाव उच्च दशाभिलाषीहै। इससे घुटनों का विचार किया जाता है।
कुम्भ-पुरुंष जाति, स्थिरसंज्ञक, वायुतत्त्व, विचित्र वर्ण, शीर्षोदय, अर्द्धजल, त्रिदोषप्रकृति, दिनबली, पश्चिम दिशा की स्वामिनी, उष्ण स्वभाव, शूद्ध वर्ण, क्रूर एवं मध्यमसन्तानवाली है। इसका प्राकृतिक स्वभाव विचारशील, शान्तचित्त, धर्मवीर और नवीन बातों
का आविष्कारक है। इससे पेट के भीतरी भागों का विचार किया जाता है।
मीन-द्विस्वभाव, स्त्री जाति, कफ प्रकृति, जलतत्त्व, रात्रिबली, विप्रवर्ण, उत्तर दिशकी स्वामिनी और पिंगल रंग है। इसका प्राकृतिक स्वभाव उत्तम, दयालु और दानशील है।यह सम्पूर्ण जलराशि है। इससे पैरों का विचार किया जाता है।
अक्षरानुसार राशिज्ञान
१ मेष
= चू चे चो ला ली लू ले लो आ
आ ला
8
वृष
= ई उ ए ओ वा वी वू वे वो
उ वा
मिथुन
= का की कू घ ङ छ के को हा
का छा
कर्क
= ही हू हे हो डा डी डू डे डो
डा हा
सिंह
= मा मी मू मे मो टा टी टू टे
कन्या
= टो पा पी पू षण ठ पे पो
माटापा ठा
तुला
= रा री रू रे रो ता ती तू ते
रा ता
वृश्चिक
= तो ना नी नू ने नो या यी यू
नो या
९
धनु
= ये यो भा भी भू धा फा ढा भे
भू धा फा ढा
१० मंकर
= भो जा जी खी खू खे खो गा गी
खा जा
११ कुम्भ
= गू गे गो सा सी सू से सो दा
गो सा
१२ मीन
= दी दू थ झ ञ दे दो चा ची
दा चा
(राशिज्ञान करने की संक्षिप्त अक्षरविधि उपर्युक्त है)
राशि स्वरूप का प्रयोजन-उपर्युक्त बारह राशियों का जैसा स्वरूप बतलाया है, इनराशियों में उत्पन्न पुरुष और स्त्रियों का स्वभाव भी प्रायः वैसा ही होता है। जन्मंकुण्डलीमें राशि और ग्रहों के स्वरूप के समन्वय पर से ही फलाफल का विचार किया जाता है।दो व्यक्तियों की या वर-कन्या की शत्रुता और मित्रता अथवा पारस्परिक स्वभाव मेल केलिए भी राशि स्वरूप उपयोगी है।
शत्रुता और मित्रता की विधि-पृथ्वीत्त्व और जलत्वाली राशियों के व्यक्तियोंमें तथा अग्नित्त्व और वायत्त्ववाली राशियों के व्यक्तियों में परस्पर मित्रता रहती है। पृथ्वी
और अग्नितत्व, जल और अग्नित्व एवं जल और वायुतत्व वाली राशियों के व्यक्तियोंमें शश्रुता रहती है।
राशियों के स्वामी-भेष और वृश्चिक का मंगल, वृष और तुला का शुक्र, कन्याऔर मिशुन का बुध, कर्क का चन्द्रमा, सिंह का सूर्य, मीन और धनु का बृहस्पति, मगरऔर कुम्भ का शनि, कन्या का राहु एवं मिधुन का केतु है।
शुन्यसंज्ञक राशियाँ-चैत्र में कुम्भ, वैशाख में मीन, ज्येष्ठ में वृष, आषाढ़ में मिधुन,श्राषण में मेष, भाद्रपद में कन्या आश्विन में वृश्चिक, कार्तिक में तुला, मार्गशीर्ष में धनु,पीष में कर्क, माघ में मकर एवं फालुन में सिंह शून्यसंज्ञक हैं।
राशियों का अंग-विभाग-द्वादश राशियाँ काल-पुरुष का अंग मानी गयी हैं। मेषको सिर में, वृष को मुख में, मिथुन को स्तनमध्य में, कर्क को हदय में, सिंह को उदर में,कन्या को कमर में, तुला को पेड़ में, वृश्चिक को लिंग में, धनु को जंघा में, मकर को दोनोंयुटनों में, कुम्भ को दोनों जाँधों में एवं मीन को दोनों पैरों में माना है।
हर एक rashi त्रिकोण में अपने से 120° स्थित पांच तत्व 12 रशिया सत रज तम त्रिगुण सृस्टि तत्त्व ∆
मेष, सिंह, धनु
1,5,7 अग्नि∆सूर्य-गायत्री,क्षत्रिय,
वृषभ, कन्या,मकर
2,6,10 पृथ्वी ∆ शिव-गौरीवैश्य,
मिथुन ,तुला,कुम्भ
3,7,11 ” ∆शूद्र,विष्णु-लक्ष्मी
कर्क,वृश्चिक,मीन
4,8,12 water∆ब्राह्मण,गणेश-दुर्गा
राशि स्वामी रत्न रुद्राक्ष
1 मेष मंगल रेड मैजंटा मूंगा∆, मानक O एकमुखी 3मुखी
2 वृषभ शुक्र क्रीम, वाइट ट्रांसपेरेंट क्रिस्टल हीरा आपल सफ़ेद मूंगा
6मुखी
3 मिथुन बुध, बुध ग्रीन, ब्राउन , पन्ना, गोमेद , पेरिडॉट 4 मुखी, 8 मुखी
4 कर्क चंवाइट, क्रीम, क्रिस्टल मोती , मूनस्टोन सफ़ेद मूंगा 2मुखी
5 सूर्य माणिक्य मूंगा∆ एकमुखी
6 कन्या बुध ग्रीन, बाउन , पन्ना, गोमेद , पेरिडॉट 4 मुखी, 8 मुखी
7 तुला शुक्र वाइट हीरा,ओपल, 6मुखी
8 वृश्चिक मंगल रेड मैजंटा माणिक्य मूंगा 3 मुखी
9 धन येलो, सैफरन, पुखराज, जेड, सुनहला, पीला सिट्रीन, सफ़ेदपुखराज 5 मुखी
10 मकर शनि ब्लैक नेवी ब्लू ब्राउन बरगंडी गोमेद नीलम, लाजवर्त
7 मुखी
11 कुम्भ शनि, प्रजापति स्काई लाइट ब्लू फ़िरोज़ा, अक्वामरिन,
लाजवर्त 7मुखी
12 मीन गुरु वरुण केतु
लाइट वाइट येलो सैफरन, पुखराज, जेड, सुनहला, पीला सिट्रीन, सफ़ेदपुखराज, टाइगर 5 मुखी 9 मुखी
लिंग/अपूर्ण-पूर्ण/क्रुर-सौम्य
पुरुष राशि 1,3,5,7,9,11
स्त्री राशि 2,4,6,8,10,12
जाती/तत्त्व/दिशाए
1,5,7 fire ∆ सुर्य-गायत्री/ क्षत्रिय /पूर्व
2,6,10 earth∆ शिव-गौरी/वैश्य/दक्षिण
3,7,11ether/air∆विष्णुलक्ष्मी/शूद्र/उत्तर
4,8,12 ब्राह्मण गणेश/दुर्गा पश्चिम
प्रकृति/सज्ञा (धातु,मूल,जीव)
कफ : 1,4,7,10
पित्त : 2,5,8,11
वात: 3,6,9,12
स्वाभाव
प्रकृति
चर : 1,4,7,10
स्थिर : 2,5,8,11
द्विस्वभाव : 3,6,9,12
साध्यता
प्रकृति
साध्य : 1,4,7,10
असाध्य : 2,5,8,11
कष्टसाध्य : 3,6,9,12
राशियों का उदय
प्रस्टोदयी:1,2,4,9,10
इसमें बैठे पाप गृह अधिक अशुभ और शुभ गृह माध्यम हो जाते है
शीर्षोदयी:3,5,6,7,8,11
शुभ गृह अधिक शुभ और पापग्रह माध्यम होजाते है
उभयोदयी:12 अपने स्वाभाव अनुसार फल
HOUSES
I V IX DHARM SELF ∆
II VI X ARTH CARERR ∆
III VII XI KAM DESIRE∆
IV VIII XII MOKSH∆ LIBERATION
गृह राशि स्वामी नो.
सूर्य 5 सिह
चंद्र 4 कर्क
मंगल 1,8 मेष वृश्चिक
बुध 3,6 मिथुन,कन्या
गुरु 9,12 धनु, मीन
शुक्र 2,7 वृषभ , तुला
शनि 10,11मकर कुम्भ
=============
गृह -उच्चराशि,स्वग्रहीराशि,नीचराशि
सूर्य - 1,5,7
चंद्र - 2,4,8
मंगल - 10,1,4
बुध - 6,6,12
गुरु - 4शुक्र - 12,7,6
शनि - 7,11,1ाहु - 2-3, 6, 8-9
केतु - 8-9, 12, 2-3
यूरेनस 8,11,5
नेप्तुने 4, 12, 10
प्लूटो 5,8,11
गृह दो या भावो पर
जो गृह जहा बैठा है वह से काउंट करके 7 th घर भाव पर दृस्टि डालेगा भाव कॉमन फॉर प्लैनेट्स
But
सूर्य 7th
चंद्र 7th
मंगल 4th,7th,8th
बुद्ध 7 th
गुरु 5th,7th,9th
शुक्र 7th
शनि 3,th,7th,10th
राहु 5th,7th,9th,12th
केतु 5th,7th,9th,12th
यूरेनस 3,th,7th,10th
नेपटूने 5th,7th,9th
प्लूटो 4th,7th,8th
नक्षत्र:
नक्षत्र
कई ताराओं के समुदाय को नक्षत्र कहते हैं। आकाश-मण्डल में जो असंख्याततारिकाओं से कहीं अश्व, शकट, सर्प, हाथ,आदि के आकार बन-जाते हैं, वे ही नक्षत्रकहलाते हैं। जिस प्रकार लोक-व्यवहार में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी मीलों या कोसोंमें नापी जाती है, उसी प्रकार आकाश-मण्डल की दूरी नक्षत्रों से ज्ञात की जाती है। तातपर्ययह है कि जैसे कोई पूछे कि अमुक घटना सड़क पर कहाँ घटी, तो यही उत्तर दिया जायेगाकि अमुक स्थान से इतने कोस या मील चलने पर, उसी प्रकार अमुक ग्रह आकाश में कहाँहै, तो इस प्रश्न का भी वही उत्तर दिया जायेगा कि अमुक नक्षत्र में। समस्त आकाश-मण्डलको ज्योतिषशास्त्र ने २७ भागों में विभक्त कर प्रत्येक भाग का नाम एक-एक नक्षत्र रखाहै। सूक्ष्मता से समझाने के लिए प्रत्येक नक्षत्र के भी चार भाग किये गये हैं, जो चरणकहलाते हैं। २७ नक्षत्रों के' नाम निम्न हैं-१. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी,५. मृगशिरा, ६. आर्दा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. आश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वाफाल्लुनी१२. उत्तराफाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाति, १६. विशाखा, १७. अनुराधा१८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढा, २१. उत्तराषाढा, २२. श्रवण, २३. धनिष्ठ,२४. शतभिषा, २५. पूर्वाभाद्रपद, २६. उत्तराभाद्रपद, २७. रेवती।
अभिजित् को भी २८वाँ नक्षत्र माना गया है। ज्योतिर्विदों का अभिमत है किउत्तराषाढ़ा की आखिरी १५ घटियाँ और श्रवण के प्रारम्भ की चार घटियाँ, इस प्रकार १९घटियों के मानवाला अभिजित् नक्षत्र होता है। यह समस्त कार्यों में शुभ माना गया है।नक्षत्रों के स्वामी-अश्विनी का अश्विनीकुमार, भरणी का काल, कृत्तिका का अम्नि,रोहिणी का ब्रह्मा, मृगशिरा का चन्द्रमा, आ्द्ा का रुद्र, पुनर्वसु का अदिति, पुष्य का बृहस्पतिं,आश्लेषा का सर्प, मघा का पितर, पूर्वाफाल्गुनी का भग, उत्तराफालुनी का अर्यमा, हस्त.कासूर्य, चित्रा का विश्वकर्मा, स्वाति का पवन, विशाखा का शुक्राग्नि, अनुराधा का मित्र, ज्ेष्ठाका इन्द्र, मूल का नि्ऋति, पूर्वाषाढ़ा का जल, उत्तराषाढ़ा का विश्वेदेव, श्रवण का विष्णु,धनिष्ठा का वसु, शतभिषा का वरुण, पूर्वाभाद्रपद का अजैकपाद, उत्तराभाद्रपद काअहिर्बुज्य, रेवती का पूषा एवं अभिजित् का ब्रह्मा स्वामी है। नक्षत्रों का फलादेश भी स्वामियोंके स्वभाव-गुण के अनुसार जानना चाहिए।
पंचक संज्ञक-धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती-इन नक्षत्रोंमें पंचक दोष माना जाता है।
मूल संज्ञक-ज्येष्ठा, आश्लेषा, रेवती, मूल, मधा और अश्विनी-ये नक्षत्र मूलसंजकहैं। इनमें यदि बालक उत्पन्न होता है तो २७ दिन के पश्चात् जब वही नक्षत्र आ जाता है तब शान्ति करायी जाती है। इन नक्षत्रों में ज्येष्ठा और मूल गण्डान्त पमूलसजक तथाआश्लेषा सर्पमूलसंज्ञक हैं।
घरुव संजञक'-उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद व रोहिणी घ्रुवसंज्ञक हैं।चर संजञक'-स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा चर या वलसज्ञक हैं।उग्र संज्ञक-पूर्वाषाढ़ा, पूर्वोभाद्रपद, पूर्वाफालुनी, मधा व भरणी उग्र संज्ञक हैं।मिश्र संज्ञक-विशाखा और कृत्तिका मिश्रसंज्ञक है।
लघु संझक-हस्त, अश्विनी, पुष्य और अभिजितू क्षिप्र या लयुसंज्क हैं।मूदु संज्ञक-मृगशिरा, रेवती, चित्रा और अनुराधा मृदु या मैत्रसंजक हैं।तीक्ष्ण संज्ञक"-मूल, ज्येष्ठा, आर्द्ा और, आश्लेषा तीक्षण या दारुणसंजञक हैं।अघोमुख संज्ञक-मूल, आश्लेषा, विशाखा, कृत्तिका, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा,पूर्वाभाद्रपद, भरणी और मघा अधोमुखसंज्ञक हैं। इनमें कुआँ या नींव खोदना शुभ मानाजाता है।
ऊर्ध्वमुख संज्ञक-आर्दा, पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा ऊर्ध्वमुखसंज्ञक हैं।तिर्वङमुख संज्ञक-अनुराधा, हस्त, स्वाति, पुनर्वसु, ज्येष्ठा और अश्विनी तिरी तिर्यंमुखसंज्ञक
हैं।
दग्ध संज्ञक-रविवार को भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगलवार को उत्तराषाढ़ा, बुधवारको धनिष्ठा, बृहस्पतिवार को उत्तराफाल्गुनी, शुक्रवार को ज्येष्ठा एवं शनिवार को रेवतीदग्धसंज्ञक हैं। इन नक्षत्रों में शुभ कार्य करना वर्जित है।
मासशून्य संज्ञक-चैत्र में रोहिणी और अश्विनी; वैशाख में चित्रा और स्वाति; ज्येष्ठमें उत्तराषाढ़ा. और पुष्य; आषाढ में पूर्वाफाल्गुनी और धनिष्ठा; श्रावण में उत्तराषाढ़ा और श्रवण; भाद्रपद में शतभिषा और रेवती; आश्विन में पूर्वाभाद्रपद; कार्तिक में कृत्तिका औरमघा; मार्गशीर्ष में चित्रा और विशाखा; पीष में आर्दा, अश्विनी और हस्त; माघ में श्रवणऔर मूल एवं फाल्गुन में भरणी और ज्येष्ठा मास शून्य नक्षत्र हैं।
कार्य की सिद्धि में नक्षत्रों की संज्ञाओं का फल प्राप्त होता है।
नक्षत्रों के चरणाक्षर-चू चे चो ला=अश्विनी, ली लू ले लो=भरणी, आ ई उए=कृत्तिका, ओ वा वी वू-रोहिणी, वे वो का की=मृगशिर, कू घ ङ छ=आद्दा, के को हाही=पुनर्वसु, हू हे हो डा=पुष्य, डी डू डे डो=आश्लेषा, मा मी मू मे=मचा, मो टा टीटू=पूर्वाफाल्गुनी, टे टो पा पी=उत्तराफाल्गुनी, पू ष ण ठ=हस्त, पे पो रा री=चित्रा, रू रेरो ता=स्वाति, ती तू ते तो=विशाखा, ना नी नू ने=अनुराधा, नो या यी यू=ज्येष्ठा, ये योभा भी=मूल, भू धा फा ढ़ा=पूर्वाषाढ़ा. भे भो जा जी=उत्तराषाढ़ा, खी खू खे खो=श्रवण,गा गी गू गे=धनिष्ठा, गो सा सी सू=शतमभिषा, से सो दा दी=पूर्वाभाद्रपद, दू थ झअ=उत्तराभाद्रपद, दे दो चा ची-रेवती।
नक्षत्र गणित
360°÷27= 13.33° =1 नक्षत्र
13.33°÷4 = 3.33° 1 पद/चरण
1नक्षत्र=13.33°= 4 पद (4x3.33)
=(3.33+3.33+3.33+3.33) पद
=(1पद + 1पद + 1पद + 1पद)
नक्षत्र - देवता - वस्तु
अश्विनी - अश्विनीकुमार
भरणी-यम
कृतिका-अग्नि
रोहिणी-ब्रम्हा
मृगशिरा-चंद्र
आर्द्रा-रूद्रशिव
पुनर्वसु-अदिति
पुष्य- गुरु
अश्लेषा-सर्प
मघा-पितर
पू.फाल्गुनी-भग
उ.फाल्गुनी-अर्यमा
हस्त-सविता
चित्रा- विश्वकर्मा
स्वाति-वायु
विशाखा- इन्द्राग्नि
अनुराधा-मित्र
ज्येठा- इन्द्र
मूला- राक्षस
पू.आषाढ़ा-जल
उ.आषाढ़ा- विश्वेदेवा
श्रवण- विष्णु
घनिष्ठा- वसव
शतभिषा- वरुण
पू.भाद्रपद-अजैकपाद
उ.भाद्रपद-अहिर्बुधन्य
रेवती- पूषा
======================
गृहस्वामी = नक्षत्र
केतु=अश्विनी/मघा/मूला
शुक्र=भरणी/पू.फाल्गुनी/पू.आषाढ़ा
सूर्य=कृतिका/उ.फाल्गुनी/उ.आषाढ़ा
चंद्र=रोहिणी/हस्त/श्रवण
मंगल=मृगशिरा/चित्रा/घनिष्ठा
राहु=आर्द्र/स्वाति/शतभिषा
गुरु=पुनर्वसु/विशाखा/पू.भाद्रपद
शनि=पुष्य/अनुराधा/उ.भाद्रपद
बुद्ध=अश्लेषा/ज्येठा/रेवती
राशि-नक्षत्र भचक्र
1 राशि = [2.25 नक्षत्र]=(2+1/4)
={1 नक्षत्र + 1 नक्षत्र + 1पद}
=( 4 पद + 4 पद + 1 पद )
= (9 पद)
12 राशि x 9 पद = 108 पद भचक्र माला
मेष=30°
(अश्विनी+भरणी+ कृतिका1पद)
(13.33°+13.33°+3.33°)
वृषभ=30°(कृतिका3प+रोहिणी+2पदमृगशिरा)
=(9.99°+13.33°+6.66°)
मिथुन=30°
(2पदमृगशिरा+आद्रा+3पदपुनर्वसु)
(6.66°+13.33°+9.99°)
कर्क=30°
(1पदपुनर्वसु + पुष्य+ अश्लेषा)
(3.33°+13.33°+13.33°)
सिंह
(मघा+पूफाल्गुनी+1पद.उफाल्गुनी )
(13.33°+13.33°+3.33°)
कन्या=30°
(3पदउफाल्गुनी+हस्त+2पदचित्रा)
=(9.99°+13.33°+6.66°)
तुला =30°
(2पदचित्रा+स्वाति+3पदविशाखा)
(6.66°+13.33°+9.99°)
वृश्चिक =30°
(1पदविशाखा+अनुराधा+ज्येठा)
(3.33°+13.33°+13.33°)
धनु=30°
(मूला+पू.आषाडा+1पद.उआषाडा)
(13.33°+13.33°+3.33°)
मकर=30°
(3पदउआषाडा+श्रवण+2पदघनिष्ठ)
=(9.99°+13.33°+6.66°)
कुम्भ=30°
(2पदघनिष्ठ+शतभिषा+3पदपू.भाद्र)
(6.66°+13.33°+9.99°)
मीन=30°
(1पदपू.भाद्र+उ.भाद्र+रेवती)
(3.33°+13.33°+13.33°)
योग
सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट स्थानों को जोड़़कर तथा कलाएँ बनाकर ८०० का भागदेने पर गत योगों की संख्या निकल आती है। शेष से यह अवगत किया जाता है कि वर्तमानयोग की कितनी कलाएँ बीत गयी हैं। शेष को ८०० में से घटाने पर वर्तमान योग कीगम्य कलाएँ आती हैं। इन गत या गम्य कलाओं को ६० से गुणा कर सूर्य और चन्द्रमाकी स्पष्ट दैनिक गति के योग से भाग देने पर वर्तमान योग की गत और गम्य घटिकाएँआती हैं। अभिप्राय यह है कि जब अश्विनी नक्षत्र के आरम्भ से सूर्य और चन्द्रमा दोनोंमिलकर ८०० कलाएँ आगे चल चुकते हैं तब एक योग बीतता है, जब १६०० कलाएँ आगेचलते हैं तब दो; इसी प्रकार जब दोनों १२ राशियाँ-२१६०० कलाएँ अश्विनी से आगे चलचुकते हैं तबं २७ योग बीतते हैं।
२७ योगों के' नाम ये हैं-१. विष्कम्भ, २. प्रीति, ३. आयुषमान्, ४. सौभाग्य, ५. शोभन,६. अतिगण्ड, ७. सुकर्मा, ८. धृति, ९. शूल, १०. गण्ड, ११. वृद्धि, १२. धरुव, १३. व्याघात, १४. हर्षण, १५. वजञ, १६ सिद्धि, १७. व्यतीपात, १८. वरीयान्, १९, परिघ, २०, शिव,
२१. सिद्ध, २२. साध्य, २३. शुभ, २४. शुक्ल, २५. ब्रह्ा, २६. ऐन्द्र, २७. वैधृति ।
योगों के स्वामी-विष्कम्भ का स्यामी यम, प्रीति का विंष्णु, आयुष्ान् का चन्द्रमा,सौभाग्य का ब्रह्मा, शोभन का बृहस्पति, अतिगण्ड का चन्द्रमा, सुकर्मा का इन्द्र, धृति काजल, शूल का सर्प, गण्ड का अग्नि, वृद्धि का सूर्य, ध्रुव का भूमि, व्याघात का वायु, हर्षणका भग, वज्ञ का वरुण, सिद्धि का गणेश, व्यतीपात का रुद्र, वरीयान् का कुबेर, परिष काविश्वकर्मा, शिव का मित्र, सिद्ध का कार्तिकेय, साध्य की सावित्री; शुभ की लक्ष्ी, शुक्तकी पार्वती, ब्रह्मा का अश्विनीकुमार, ऐन्द्र का पितर एवं वैधृत्ति की दिति है।
करण
तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं अर्थात् एक तिथि में दो करण होते हैं। ११करणों के नाम ये हैं-१. बव, २. बालव, ३. कौलव, ४. तैतिल, ५. गर,६. वणिज, ७. विष्टि, ८. शकुनि, ९. चतुष्पद, १० नाग, ११. किंस्तुघन। इन करणों में पहलेके ७ करण चरसंज्ञक और अन्तिम ४ करण स्थिरसंज्ञक हैं।
करणों के स्वामी-बव का इन्द्र, बालव का ब्रह्मा, कौलव का सूर्य, तैतिल का सूर्य,गर का पृथ्वी, वणिज का लक्ष्मी, विष्टि का यम, शकुनि का कलियुग, चतुष्पद का रुद्र, नागका सर्प एवं किंस्तुष्न का वायु है।
विष्टि करण का नाम भद्रा है, प्रत्येक पंचांग में भद्रा के आरम्भ और अन्त का समयदिया रहता है। भद्रा में प्रत्येक शुभकर्म करना वर्जित है।
वार
जिस दिन की प्रथम होरा का जो ग्रह स्वामी होता है, उस दिन उसी ग्रह के नामका वार रहता है। अभिप्राय यह है कि ज्योतिषशास्त्र में शनि, बृहस्पति, मंगल, रवि, शुक्,बुध और चन्द्रमा-ये ग्रह एक-दूसरे से नीचे-नीचे माने गये हैं। अर्थात् सबसे ऊपर शनि,उससे नीचे बृहस्पति, उससे नीचे मंगल, मंगल के नीचे रवि इत्यादि क्रम से ग्रहों की क्षणएँहैं। एक दिन में २४ होराएँ, होती हैं-एक-एक घण्टे की एक-एक होरा होती है। दूसरे शब्दोंमें यह कहा जा सकता है कि घण्टे का दूसरा नाम होरा है। प्रत्येक होरा का स्वामीअधःक्षाक्रम से एक-एक ग्रह होता है। सृष्टि आरम्भ में सबसे पहले सूर्य दिखलाई पड़ताहै, इसलिए १ली होरा का स्वामी माना जाता है। अतएव पले वार का नाम आदित्यवार यारविवार है। इसके अनन्तर उस दिन की ररी होरा का स्वामी उसके पासवाला शुक्र, इरीका बुध, ४थी का चन्द्रमा, प्र्वीं का शनि, ६ठी का बृहस्पति, ७वीं का मंगल, ८वीं का रवि,९वीं का शुक्र, १०वीं का बुध, ११वीं का चन्द्रमा; १२वीं का शनि, १३वीं का बृहस्पति, १४वींका मंगल, १५वीं का रवि, १६वीं का शुक्र, १७वीं का बुध, १८वीं का चन्द्रमा, १९वीं काशनि, २०वीं का बृहस्पति, २१वीं का मंगल, २२वीं का रवि, २३वीं का शुक्र और २४वीं काबुध स्वामी होता है। पश्चात् २रे दिन की पली होरा का स्वामी चन्द्रमा पड़ता है, अतः दूसरावार सोमवार या चन्द्रवार माना जाता है। इसी प्रकार इरे दिन की १्ली होरा का स्वामी मंगल,४थे दिन की १ली होरा का स्वामी बुध, पर्वें दिन की १ली होरा का स्वामी•बृहस्पति, छठेदिन की पली होरा का स्वामीं शुक्र, एवं ७वें दिन की पली होरा का स्वामी शनि होता है।इसलिए क्रमशः रवि, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि-ये वार माने जाते हैं।वार संज्ञाएँ-बृहस्पति, चन्द्र, बुध, और शुक्र-ये वार सौम्यसंज्ञक एवं मंगल, रविऔर शनि-ये वार क्रूर-संज्ञक माने गये हैं। सौम्यसंज्ञक वारों में शुभ कार्य करना अच्छामाना जाता है।
रविवार स्थिर, सोमवार चर,
मंगलवार उग्र, बुधवार सम,
गुरुवार लघु, शुक्रवार मूदु एवं शनिवार तीक्ष्णसंज्ञक हैं।
शिल्पक्रिया के लिए शनिवार उत्तम माना गया है।
विधारम्भ के लिए गुरुवार और वाणिज्यारम्भ के लिए बुधवार प्रशस्त माना गया है।
विशोंतरी दशा नक्षत्रो में चलती है
महादशा/अंतरदशा/प्रत्यंतरदशा/
सूक्ष्मदशा/प्राणदशा
के-7वर्ष,शू-20,सू-6,च-10,मं-7
रा-18, गु-16,श-19,बु-17
कुंडली देखने का आसान तरीका
धर्म त्रिकोण: I V IX DHARM सेल्फ ⭐
राशि:
राशीस्वामी गृह:
भावस्थित राशि/नक्षत्र/
मित्रता/शत्रुता
दृस्टि भावो ग्रहो पर
नीच/उच्च/वक्री/अस्त
षड्बल
भावबल
रत्न
अनाज
💓✅, ✅, ✅
अर्थ त्रिकोण II VI X ARTH CARERR
राशि:
राशीस्वामी गृह:
भावस्थित राशि/नक्षत्र/
मित्रता/शत्रुता
दृस्टि भावो ग्रहो पर
नीच/उच्च/वक्री/अस्त
षड्बल
भावबल
रत्न
अनाज
✅, ❌, ✅
कामत्रिकोण : III VII XI DESIRE
राशि त्रिकोण :
राशीस्वामी गृह:
भावस्थित राशि/नक्षत्र/
मित्रता/शत्रुता
दृस्टि भावो ग्रहो पर
नीच/उच्च/वक्री/अस्त
षड्बल
भावबल
रत्न
अनाज
❌, ✅, ✅
मोक्षत्रिकोण:IV,VIII,XIISALVATE
राशि:
राशीस्वामी गृह:
भावस्थित राशि/नक्षत्र/
मित्रता/शत्रुता
दृस्टि भावो ग्रहो पर
नीच/उच्च/वक्री/अस्त
षड्बल
रत्न
अनाज
✅ , ❌, ❌
गृह : अनाज/रत्न /अंक
सूर्य: गेहू /माणिक्य/1
चंद्र: चावल/ मोती /2
गुरु: चनादाल/ मक्का ,पुखराज/3
मंगल: मसूर /मसूर/9
केतु/नेप्टून:बाजरा/लसुनिया/7/टाइगर
शुक्र: ज्वार,हीरा/6
शनि: काली उड़द/नीलम/8
बुद्ध : हरे मुंग दाल/पन्ना/5
राहु/यूरेनस : जौ/गोमेद/4/फ़िरोज़ा
:
❌❌❌❌
सूर्य: गेहू
चंद्र: चावल
गुरु: चनेकीदाल मक्का
मंगल: मसूर
बुद्ध : हरे मुंग दाल
केतु : बाजरा/चवला
राहू: जौ/मोठ
Mixtursw donate गौशाला
OR
50gm डिब्बी में रात को सिरहाने रेक या सुबह 27 बार एंटीक्लॉक वाइज उवार कर पक्षियों में डाले
गणेश मंदिर : बुद्धवार
लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की दोनों चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE
में लगावे
देवी दुर्गा मंदिर
/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच
सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे
सूर्य मंदिर : रविवार, सप्तमी का व्रत
रोली चावल जल से नित्य अर्घ दे
आस्तोत्र, अष्टक, कवच का पाठ सूर्य यन्त्र स्थापित करे पूर्व दिशा में
काली मंदिर : शनिवार चढ़ावे :
कटार,त्रिशूल, मालपुआ, इमरदाल कचौड़ी, दही बडामोगरे इत्र,धुप, बेसन की चिश्री गूंजा , कसेव, अनार, पान, कटार, सरसो के तेल का दिया लगावे 108 बार मंत्र बोले
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः
काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में
भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ इमरती कचौड़ी दही बड़े, दाल के बड़े, पापड, उड़द की दाल, शराब और सिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः
भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे
हनुमान मंदिर : मंगल शनि
गदा की भेट, चमेली आवला का दिया 5 इमरती 5 गुलाब पुष्प,सिन्दूर चमेली तेल गुड़ चनाान चढ़ावे
llॐ हं फ़्रौं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट ll दक्षिण में मंगल यन्त्र पांच मुखी हनुमान यन्त्र
शिव मंदिर :
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र, व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार), पान, गन्ने का रास दीप
मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च
ह्रौं नमः शिवाय
पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में मृत्युंजय यन्त्र NE में
विष्णु मंदिर:
राम (कृष्ण) नरसिह मंदिर (काली मूर्ति ) बेसन चक्की और दूध की बर्फी ॐ श्रीं दं नमः पूर्णिमा, एकादशी, द्वादशी का व्रत रखे
सूर्य यन्त्र विष्णु यन्त्र बुद्ध यन्त्र उत्तर में
पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे
अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे
रामायण, भागवत का पाठ करावे
गौशाला ब्राह्मण को दान करे
पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00 से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे
llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3
2. त्रिपिंडी
3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच
ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः
पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे
1 सूर्य--ओम ह्राँ हीं सः सूर्याय नमः-सूर्योदय 7000
2 चंद्र--ओम श्राँ श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः-संध्या-11000
3 मंगल--ओम क्राँ क्रीं क्रों सः भौमाय नमः- -10000
4बुध--ओम ब्राँ ब्रीं ब्रों सः बुधाय नमः--9000
5 गुरु--ओम ग्राँ ग्रीं ग्रों सः गुरुवै नमः-संध्या-19000
6 शुक्र--ओम द्राँ द्रीं द्रों सः शुक्राय नमः-सूर्योदय-16000
7 शनि--ओम प्राँ प्रीं प्रों सः शनैश्चराय नमः-संध्या-23000
8 राहु--ओम भ्राँ भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः-रात्रि-18000
9 केतु--ओम स्राँ स्रीं स्रों सः केतवे नमः-रात्रि-17000
कौनसा ग्रहः आपको परेशान कर रहा ह ?
किसी ग्रहः की दशा अन्तर्दशा में आपको कष्ट मिल रहा ह ?
नोकरी ,धन, लाभ , विवाह, स्वस्थाय , कर्ज किस चीज से परेशान ह आप कौनसा ग्रहः आपको ये सब दे सकता ह पहचान करे उसकी ।
कुंडली मे कोई ग्रहः नीच राशि मे ह ?
कोई दोष बन रहा ह ?
कोई ग्रहः 6 8व12 जाकर पीड़ित हो गया जिसके आपको फल चाहिए ?
कोई ग्रहः राहु के साथ बैठकर पीड़ित हो गया ह आपका ?
1महीने तक जाप करें