मूल नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

 मूल नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

मूल नक्षत्र राशि चक्र मे 24000 से विस्तार का क्षेत्र मूल नक्षत्र कहलाता है।  अरब मंजिल मे इसे अल शोलह अर्थात बिच्छू का डंक, ग्रीक मे स्कॉरपी। और चीन सियु  मे उई कहते है।  मूल अर्थात जड़ को कहते है।  शाक्य के अनुसार यह

  शेर की पूंछ की आकर में नौ तारो का समूह है।  खण्कातक केवल दो तारे का समूह कहते है।  मूल को    विच्रतो  भी कहते है। जिसका अर्थ दो छोड़ने वाले है।  अथर्वेद भी दो तारो का होना मानता है।  इसमे वर्णित है की जब मूल का उदय हो, तब इसमे चिरकालिक बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

     मूल नक्षत्र-यह उन्नीसवां नक्षत्र है। ज्येष्ठा से अगले 13-20’ के क्षेत्र में यह नक्षत्र सम्पूर्ण धनु राशि क्षेत्र में पड़ता है। इस नक्षत्र के 11 तारे मिल-जुलकर एक सिंह की आकृति बनाते हैं, जिनमें 6 सिंह की पूंछ के सिरे के समान प्रतीत होते हैं। इस नक्षत्र के देवता निर्ऋति राक्षस हैं (जैसे यम मृत्यु के देवता हैं, ऐसे निर्ऋति पाप आदि अशुभत्व के देवता कहे गए हैं)। इसका स्वामी केतु है।

     मूल नक्षत्र में उत्पन्न पुरुष जातक माता-पिता को दुखदाई व हानि पहुंचाने वाला कुलनाशक होता है (किन्तु शांति उपायों से शुभ हो जाने पर धनी, प्रसिद्ध तथा दीर्घायु भी हो सकता है)।

     मूल नक्षत्र में जन्मी स्त्री जातक दरिद्रा, रोगिणी, विधवा, अल्पसुख वाली, अनेक शत्रुओं से युक्त व बांधवों से हीन, पीड़ित तथा निम्न स्तरीय स्त्रियों से संगति करने वाली होती है।

बेन्टली का कथन है कि मूल की आरम्भिक गिनती प्रथम तारापुंज मे होती है।  इसलिए इसे मूल अथवा जड़ का नाम दिया गया है।  इस प्रकार मूल का अर्थ प्रथम या शुरू करना या आदि भी हो सकता है।मूल नक्षत्र-यह उन्नीसवां नक्षत्र है। ज्येष्ठा से अगले 13-20’ के क्षेत्र में यह नक्षत्र सम्पूर्ण धनु राशि क्षेत्र में पड़ता है। इस नक्षत्र के 11 तारे मिल-जुलकर एक सिंह की आकृति बनाते हैं, जिनमें 6 सिंह की पूंछ के सिरे के समान प्रतीत होते हैं। इस नक्षत्र के देवता निर्ऋति राक्षस हैं (जैसे यम मृत्यु के देवता हैं, ऐसे निर्ऋति पाप आदि अशुभत्व के देवता कहे गए हैं)। इसका स्वामी केतु है।

मूल नक्षत्र में उत्पन्न पुरुष जातक माता-पिता को दुखदाई व हानि पहुंचाने वाला कुलनाशक होता है (किन्तु शांति उपायों से शुभ हो जाने पर धनी, प्रसिद्ध तथा दीर्घायु भी हो सकता है)।

मूल नक्षत्र में जन्मी स्त्री जातक दरिद्रा, रोगिणी, विधवा, अल्पसुख वाली, अनेक शत्रुओं से युक्त व बांधवों से हीन, पीड़ित तथा निम्न स्तरीय स्त्रियों से संगति करने वाली होती है।

देवता निऋति, स्वामी ग्रह केतु, राशि धनु 0000 से 1320 अंश। भारतीय खगोल का यह 19 वा नक्षत्र गण्ड, तीक्ष्ण संज्ञक है। इसके ग्यारह तारे है। मूल का अर्थ जड़ है। इसके देवता देवी निऋति है। संस्कृत निऋतः (निर+ऋ+वितन) का अर्थ है 1 क्षय, नाश, विधटन। 2 संकट, अनिष्ट, विपदा, 3 अभिशाप, आक्रोश। 4 मृत्यु, मूर्तिमान, विनाश , मृत्यु या विनाश की देवी, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) दिशा की अधिष्ठात्री देवी - मनुस्मृति

प्रतीकवाद - निऋति या काली मृत्यु, भ्र्रष्टाचार, विनाश, विघटन, कलह की देवी है। इसे ऋग्वेद मे मृत्यु, भ्र्रष्टाचार, विनाश, विघटन, कलह की देवी, अथर्वेद में सुनहरे बाल वाली, तैत्तरीय ब्राम्हण मे अंधकार और काले वस्त्र मे बलि का हिस्सा लेने वाली, शतपथ ब्राम्हण मे दर्द और नैऋत्य की देवी, महाभारत मे अधर्म की पत्नी कहते है। यह निराश्रित, भिखारी, रोगी, कोढ़ी मे प्रगट होती है। यह पृथ्वी की दरार, रेगिस्तान, खंडहर में रहती है। यह भूखे, प्यासे, विधुर, सुबह मे दुबकी रहती है। इसका रंग काला और वस्त्र भी काळा है।  यह मृतको के जगत में निवास करती है और बुराई का प्रतिनिधित्व करती है।  यही कारण  है की हर अनुष्ठान के पूर्व इसे दूर रखने के लिए पूजा अथवा प्रार्थना की जाती है।

विशेषताएँ - यह एक गण्डांत नक्षत्र है। मूल नक्षत्र अतिगण्ड नक्षत्र कहलाता है। यह सौभाग्य सूचक नही है। इसमे उत्पन्न जातक आर्थिक रूप से सफल, और आराम दायक जीवन व्यतीत करता है। जातक गहन  दार्शनिक  स्वभाव वाला, जिज्ञाशु मन, बुद्धि और ज्ञान कड़ी मेहनत से प्राप्त करने वाला, परिवार विनाशक, शांति प्रिय अनेक कौशल वाला, महत्वाकांक्षी, ढुलमुल, अनेक कला कुशल, बातूनी, घमंडी, विषय की जड़ तक खोजी   होता है। इसमें लोक वक्ता, दार्शनिक, अभिभाषक, डॉक्टर, राजनीतिज्ञ, आध्यत्मिक अध्यापक जन्म लेते है।

  दलाई लामा (निष्कासित बोध धर्म गुरु) का यह जन्म नक्षत्र है।

मूल नक्षत्र फलादेश

जातक अपने अधिकारों के लिए बेहिचक झगड़ा करने वाला, बहु युक्ति वाला, हमेशा व्यवसाय बदलने वाला, फिजूल खर्ची, माता-पिता से मतभेद वाला, अनिश्चित, लेखक, यात्री, हिंसक, धनवान, स्थिर कार्य करने वाला, जड़, शत्रुहंता, वक्त के साथ अच्छा या बुरा, अविश्वनीय, विचलित होता है।

पुरुष जातक - यह अति आकर्षक, असरकारक, सुगठित देह, सुन्दर पैर, चमकीली आंखे, व्यक्तित्व प्रसन्नता दायक होता है।  जातक जीवन का भरपूर आनंद लेने वाला, स्नेह पूर्ण व्यवहारी, शरीफ, वर्तमान  मे विश्वास करने वाला, भविष्य की चिंता रहित होता है। मूल जातक नियम का पक्का चरित्रवान, मन दुविधा युक्त होने से अनिश्चित, कुछ परिस्थितियो  मे प्रतिकूल, ईश्वर मे सशक्त  विश्वासी, जरुरत को गंभीरता से नही लेने वाला होता है। इसे विकास के लिए परिश्रम करना पड़ता है। विभिन्न क्षेत्र मे अच्छा कार्य करने वाला होता है।

ये आर्थिक विपन्न और अपरिमित खर्च करने वाले होते है।  व्यापार व्यवसाय के लिए विदेश मे रहते है। जातक को छोटी उम्र से प्रौढ़ावस्था तक कठिनाइया आती है। किसी से भी सहायता नही मिलने के कारण आत्म निर्भर होता है। दाम्पत्य जीवन सुखद होता है।  उम्र वर्ष 27, 31, 44, 48, 56, 60 वे वर्ष में रोग और कष्ट होते है।  इन्हे दवा और शराब के नशे से बचना चाहिये  क्योकि इनमे नशे को सहन करने की शक्ति नही होती है।

स्त्री जातक - यह प्राकृतिक आकर्षण वाली, चित्ताकर्षित होती है।  मध्यम वर्णी और मौसम के परिवर्तन से इसमे कोई बदलाव नही होता है।  स्त्री जातक पवित्र हृदयी, जीवन के प्रत्येक क्षण को जीने वाली, प्रफुल्ल, हठ रहित होती है। ईश्वर के भरोसे पर रहती है।  यह दगाबाजो के साथ कोपाकुल, निर्दयी, चरित्रवान, नियंम वादी  होती है।

व्यवसायिक जीवन पुरुष जैसा ही होता है। शिक्षा मध्यम होती है। यदि गुरु भी इस नक्षत्र में हो तो उच्च शिक्षा मे रूचि वाली विशेषकर चिकित्सा  मे रूचि होती है।  दाम्पत्य जीवन दुःखद, बाधा व परेशानी युक्त होता है। पति से तलाक या पति से मृत्यु के कारण अलग रहना पड़ता है। यदि ग्रह अनुकूल हो, तो मूल के दुष्प्रभाव कम हो जाते है फिर भी विवाह मे विलम्ब होता है।

टिप्पणी :-  मूल स्त्री जातक के लिए निम्न शोध आवश्यक है।

1 यदि जन्मांग मे मंगल 1, 4, 7, 8, 12 मे से किसी स्थान मे हो, यानि स्त्री जातक मांगलिक हो।

2 यदि ऊपर की पंक्ति मे दो दांत अधिक छिदे हो।

3 यदि पैर की छोटी ऊंगली जमीन पर न टिकती हो।

क्योकि ये लक्षण स्त्री जातक के  विधवा होने के प्रतीक है।  यदि मूल नक्षत्र दुष्प्रभाव में हो, तो स्त्री जातक को  पुट्टे व  जांघ में रोग, रक्त रोग, सन्धिवात, कमर और भुजा में दर्द रहता है।

आचार्यो मतानुसार नक्षत्र फल ;

इसमे हिंसक स्वभाव और आक्रामकता बनी रहती है।  ये लोग बहुत दिखावा करते है। दूसरो की बातो को जल्द ही प्रकट कर देते है। किसी तथ्य को गोपनीय नही रख सकते है। स्त्री लोलुपता इनके स्वभाव की अनिवार्य शर्त होती है।  - नारद

ये जातक जीवन मे अच्छा धन-धान्य अर्जित कर लेते है।  दूसरो का धन हड़पने में माहिर होते है।  कलहप्रिय होते है।  ये मूल वस्तुओ से अर्थात वृक्ष, जीव, भूगर्भ से प्राप्त वस्तुओ से आजीविका करते है।  - पाराशर

वराह मिहिर ने कहा है कि ये लोग हिंसक नही होते है परन्तु अन्य आचार्यो ने इनके विषय में क्रूरता, कलह प्रियता, हिंसकता को रेखांकित किया है।  मतान्तर से इन्हे आक्रामक माना जा सकता है।  इनके द्वारा प्रायः स्थाई महत्व के कार्य किये जाते है।   

चन्द्र : चन्द्र मूल नक्षत्र में हो, तो जातक आकर्षक, घमंडी, आध्यात्मिक सलाहकार, स्थिर दिमाग, शांति प्रिय, विदेश मे सफल, अमीर, दयालु, विलासी होता है।

जातक तीव्र सत्याभिलाषी, अन्वेषक, उत्साही, महत्वाकांक्षी, परस्थितियो से बंधा महसूस करने वाला, विश्वासघात पीड़ित, दुर्भाग्यशाली  होता है।

जातक स्वास्थ्य  के प्रति लापरवाह होता है।  जीवन में लगातार दुर्घटना होती रहती है लेकिन जातक बच जाता है, चाहे वह मृतयुक्त ही क्यों न हो।  प्रत्येक बचाव के बाद जातक स्वविनाश की प्रक्रिया मे लग जाता है जो अगली दुर्घटना को जन्म देती है।

वराहमिहिर अनुसार चंद्र प्रभाव से जातक अहंकारी, कृपालु, खुश, सौभाग्यशाली होता है।

सूर्य : जातक प्रसिद्ध, धनी, सफल, अधिकार युक्र्त, ताकतवर, तानाशाह, रहस्यात्मक, साहसी आध्यात्मिक नायक, वहमी,  मानवतावादी होता है।

लग्न : यदि लग्न मूल मे हो, तो जातक संदिग्ध, आत्मनिर्भर, महत्वाकांक्षी, विद्वान, चतुर, रोगी, पति-पत्नी सम्बंधित उपद्रव, क्रोध युक्त होता है।

मूल चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे गुरु, केतु, मंगल का प्रभाव है। धनु 24000 से 24320 अंश। नवमांश मेष। यह जिज्ञासा, सकारात्मकता, आध्यात्म का द्योतक है।

जातक सुन्दर दांत व नेत्र, गौरवर्ण, स्पष्ट भाषी, बुद्धिमानो मे प्रधान, कपटी. खरी-खरी कहने वाला, साहसी होता है। इस पाद मे जातक भौतिकवादी, अहंवादी, भौतिक विकासशील, समाज मे आदर चाहने वाला होता है।  इसके अंडकोष छोटे होते है।

पुरुष जातक आत्म निर्भर, पूर्णतया स्वतत्न्त्र, महत्वाकांक्षी, मध्य जीवन में  आदरणीय, योग्यता से व्यापार    मे विभूति होता है। सहायक बनकर अधिक समय नही रहता है।  उम्र 6 या 7 वर्ष मे जलना या झुलसना, 36 या 37 मे आग से दुर्घटना या हड्डी टूटना होता है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है। इसमे गुरु, केतु, शुक्र का प्रभाव है। धनु 24320 से 24640 अंश। नवमांश वृषभ। यह दीर्घ प्रयत्न, कलह, सृजन का द्योतक है। यह सामान्य कद, चौड़ा कद, घुटनो के ऊपर भारी पैर, चौड़ी टुड्डी से पहचाना जाता है। इस पाद का जातक अच्छा ज्योतिषी, नरम और  कठोर कार्यकारी, भौतिक विकास मे विशिष्ट होता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे गुरु, केतु, बुध  का प्रभाव है। धनु 24640 से 25000 अंश। नवमांश मिथुन। यह शब्द, खेल, संचार, सम्बन्ध का द्योतक है।

जातक सुन्दर नयन, शिक्षाशास्री, साहसी, गंभीर, नीतिज्ञ, स्री प्रिय, हास्य कलाकार, संतुलित, आध्यात्म और सांसारिक गतिविधियो मे सामान समय देने वाला, प्रवीण, परिपक्व, विनोदी, सिद्धांतो पर अडिग होता है।  इस पाद में भौतिक उन्नति नही होती है।

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी चन्द्र है। इसमे गुरु, केतु, चंद्र  का प्रभाव है। धनु 25000 से 25320 अंश। नवमांश कर्क। यह भावना, अनुकूल प्रभाव मे बाधा का द्योतक है।

जातक मादक व गोल नेत्र, गौर वर्ण, बड़ा पेट, सुन्दर बाल, सुन्दर मूर्ति, पीड़ित, बुद्धिमान, भ्रमण शील होता है। इस पाद मे जातक भावुक, प्रसन्नचित्त, विद्वान, कठोर निर्णय लेने मे असक्षम, लक्ष निश्चित करने मे असक्षम, मूल नक्षत्र का सबसे असंतुलित होता है।  इससे घर मे अप्रसन्नता और बहार प्रशसा तथा आदर विशेषकर कार्यालयीन कार्यो मे होती है। जातक को अपने सहायक और संगी-साथी से सावधान रहना चाहिये क्योकि इनसे विश्वासघात की सम्भावना रहती है।

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है परन्तु उसमे अंतर बहुत है। 

यवनाचार्य : मूल के पहले पाद मे भोगवान, दूसरे में त्यागी, तीसरे मे अच्छा मित्र, चौथे मे राजा होता है।

मानसागराचार्य : मूल के प्रथम चरण मे ज्ञानी, द्वितीय मे नीच, निर्धन, तृतीय मे नीच कर्म करने वाला, चौथे मे राजमान्य होता है।

मूल नक्षत्र विभूतियां

दलाई लामा (बौद्ध धर्म गुरु)

रोनाल्ड रीगन (40 वे अमरीकन राष्टपति)

बेनजीर भुट्टो (प्रधान मंत्री, पाकिस्तान)

हिरोहितो ( सम्राट, जापान)

भारतीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की आपसी पूर्ण या पाद दृष्टि नही होती क्योकि बुध सूर्य से 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है। 

मूल नक्षत्र ग्रह चरण फल

सूर्य :

मूल सूर्य पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक प्रभावी वक्ता होता है।

मूल सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक सुरक्षा परिषद् का सदस्य और परिवार से विमुख होता है।

मूल सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक आध्यात्मिक गुरु, राज्य शासन मे मंत्री, परिवार मे प्रमुख होता है।

मूल सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक वहमी तानाशाह होता है।

मूल सूर्य चरण फल

प्रथम चरण - जातक ताकतवर, धनवान, अधिकार युक्त, मानवतावादी होता है। भूगर्भ की वस्तुओ से आजीविका करेगा। ईश्वर सामान विद्वान् पिता होगा।

द्वितीय चरण - जातक तानाशाह, हर बात में शंका करने वाला, रहस्यात्मक किन्तु एक दूसरे से एक दूसरे की बात कहने वाला, सफल, अधिकार युक्त, छोटा मोटा व्यापारी होता है।

तृतीय चरण - जातक आध्यात्मिक गुरु, साहसी, सुख सुविधा युक्त, अधिकार युक्त, पुत्री से स्नेह रखने वाला, तेल व्यवसायी, मजाकिया, कल्पनाशील होता है।

चतुर्थ चरण - जातक अस्वस्थ, कार्य करने मे दक्ष, दिखावा करने वाला, धन-धन्य से परिपूर्ण, स्वभाव से कलह प्रिय होता है।

चंद्र :

मूल चन्द्र पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक प्रसिद्ध व्यक्ति, वैभव शाली होता है।

मूल चंद्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक घमण्डी, स्थिर दिमाग होता है।

मूल चंद्र पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक ज्योतिषी, शिल्पकार, सेवको से युक्त होता है।

मूल चंद्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक आध्यात्मिक सलाहकार विदेश वासी होता है।

मूल चंद्र पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक विलासी, विश्वासघात से पीड़ित होता है।

मूल चंद्र पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक उलझा हुआ और परिस्थियों से बाध्य होता है।

मूल चंद्र चरण फल

प्रथम चरण - जातक आकर्षक, स्थिर दिमाग, घमंडी, वात-पित्त रोगी, विदेशी भूमि पर सफल, अमीर विलासी; महत्वाकांक्षी, आक्रामक, होता है। यदि आर्द्रा नक्षत्र लग्न हो तथा मंगल व शुक्र की युति हो, तो पत्नी पति की अनुपस्थति मे वैश्यावृति करेगी।

द्वितीय चरण - जातक अन्वेषक, महत्वाकांक्षी, उलझा और परस्थितियो मे बंधा महसूस करने वाला, विश्वासघात से पीड़ित, काम मे बईमान मगर वाकपटु होता है।

तृतीय चरण - जातक प्रसन्नचित, दिखावा करने वाला, अच्छा धन धान्य कमाने वाला, दूसरो का  धन हड़पने वाला होता है। सूर्य या मंगल या शनि की दृष्टि हो, तो वकील या अधिवक्ता होता है।

चतुर्थ चरण - जातक सत्याभिलाषी और सत्यभाषी, उत्साही, दिखावटी, वृक्ष प्रेमी होता है। जातक स्वास्थ्य  के प्रति लापरवाह और दुर्घटना का शिकार होता रहता है।

यदि मूलगत चन्द्रमा से गुरु केंद्र मे हो, तो ये लोग प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित व धनी होते है तभी ये स्थाई कार्य कर सकते है। इस परिस्थिति में साम्यर्थ अर्जित कर मान सम्मान प्राप्त कर पाते है।

मंगल :

मूल मंगल पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक विश्व सम्मानित, भाग्यशाली, क्रूर  होता है।

मूल मंगल पर चंद्र  की दृष्टि हो, तो जातक दुर्बल, अपंग, अभियुक्त होता है।

मूल मंगल पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक अनेक विषयो मे योग्यता वाला; बुद्धिमान होता है।

मूल मंगल पर गुरु  की दृष्टि हो, तो जातक विलासी परन्तु परिवार सुख से हीन होगा।

मूल मंगल पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक  मुक्तहस्त और स्त्रियो का अनुरागी होगा।

मूल मंगल पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक उद्देश्य विहीन धुमक्कड़ होगा।

मूल मंगल चरण फल

प्रथम चरण - जातक अपने अधिकारो के लिए बेहिचक झगड़ा करने वाला, बहुयुक्ति वाला, हिंसक, पर बातो पर चुप नही रहने वाला, स्थिर कार्य करने वाला शत्रुहंता होता है। विवाह के प्रारम्भिक वर्ष समस्या से भरे होते  है।

द्वितीय चरण - जातक महा धूर्त, परिवार का विघटनकारी, या वंश की परंपरा को बदलने वाला, वात पीड़ित,   मोटापा युक्त, संघर्षशील, हिंसक, क्रूर, दिखावटी होता है।  40 वर्ष बाद ही परिपक्वता आती है।

वराहमिहिर इन जातको को हिंसक नही मानते लेकिन विदजनो ने इन्हे क्रूर, हिंसक, कलहप्रिय रेखांकित किया है।  ऐसे मे इन्हे आक्रामक कहा जा सकता है। 

तृतीय चरण - जातक हिंसक स्वभाव का आक्रामक,  विघटनकारी, वंश परम्परा बदलने वाला, दिखावटी, स्थाई काम करने वाला, किसी की बात को  दूसरो को बता कर ही शांत होने वाला होता है।

चतुर्थ चरण - जातक सुखी सम्मानित, परिवार पोषक, धन धान्य युक्त, दूसरो का धन हड़पने वाला या गढ़ा धन प्राप्त करने वाला, तंत्र विद्या मे रुचिवान होता है।

बुध :

मूल बुध पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक विश्वासपात्र, मिलनसार, मिश्र प्रकति वाला होता है।

मूल बुध पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक लेखक किन्तु लेखन अमान्य होगा।

मूल बुध पर गुरु  की दृष्टि हो, तो जातक कुलीन, राजनीतिज्ञ, प्रसिद्ध होगा।

मूल बुध  पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक अभागा, धूर्त, क्रूर होगा।

मूल बुध चरण फल

प्रथम चरण - जातक व्यर्थ की बकभक करने वाला, परिवार का विघटनकारी, अनिश्चित, संदिग्घ, अधिकारो के वास्ते झगड़ालू, शासक या मंत्री का कृपा पात्र होता है।

द्वितीय चरण - जातक धन वैभव युक्त, बहुत युक्ति करने वाला, व्यवसाय करने वाला, परिवार से मतभेदी होता है।  यदि शुक्र राहु की युति हो, तो इंजीनियर और बाद मे उत्पादक होता है।

तृतीय चरण -  जातक कर्मठता से ज्ञान और पाण्डित्य प्राप्त करने वाला, विषय की जड़ तक खोजी, दार्शनिक, शांतिप्रिय, स्वतंत्र व्यवसायी, माता पिता से मतभेद वाला होता है।

चतुर्थ चरण - जातक बारम्बार व्यवसाय बदलने वाला, शत्रुओ पर विजय पाने वाला, विद्वान, कलह व अशांति प्रिय, महत्वाकांक्षी, पर्यटनी होता है।

गुरु :

मूल गुरु पर सूर्य  की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन और सबके द्वारा पसंद नही किया जावेगा। 

मूल गुरु पर चंद्र  की दृष्टि हो, तो जातक भाग्यशाली, प्रचुर धनी, ऐशो-आरामी होगा। 

मूल गुरु पर मंगल  की दृष्टि हो, तो जातक समस्या उत्पन्न करने वाला, क्रूर होगा।

मूल गुरु पर बुध  की दृष्टि हो, तो जातक प्रभावी, मंत्री या मंत्री के समकक्ष होगा।

मूल गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक सुखी दीर्घायु हर प्रकार भाग्यशाली होगा।

मूल गुरु पर शनि  की दृष्टि हो, तो जातक चीजे चुराने की आदत वाला, समाज से त्यक्त होगा।

मूल गुरु चरण फल

प्राथन चरण - जातक भौतिकता वादी, दिखावटी, व्यसनी, व्याख्याता या प्राध्यापक, फिजूल खर्च करने वाला, नेक, स्थिर कार्य करने वाला, अनिश्चित होता है।

द्वितीय चरण - जातक सुख भोगने वाला, पर बात को हजम नही कर सबको बताने वाला, वक्त के अनुसार अच्छा या बुरा, नृपतुल्य होता है।

तृतीय चरण - जातक विद्वान, विषय की गहराई तक शोध करने वाला, व्यवसाय में परिवर्तन करने वाला, वाचाल, सांसारिक कार्य मे समय देने वाला होता है।  बुध से युति होने पर विद्वान, ज्ञानी, मंगल से युति होने पर बड़े समुदाय का धर्म गुरु होता है।

चतुर्थ चरण - जातक धन-धान्य से भरपूर,  भावुक, भावुकतावश कठोर निर्णय लेने में असमर्थ, विद्वान, ज्ञानवान, सबसे ज्यादा असंतुलित, धार्मिक या वैज्ञानिक संस्था का प्रधान होता है।

शुक्र :

मूल शुक्र  पर चंद्र  की दृष्टि हो, तो जातक विलासी और राजसी वैभव युक्त होगा।

मूल शुक्र पर मंगल  की दृष्टि हो, तो जातक धनवान, वाहन भवन का स्वामी होगा।

मूल शुक्र  पर गुरु  की दृष्टि हो, तो जातक का एक से अधिक विवाह होगा, बड़ा परिवार होगा।

मूल शुक्र पर शनि  की दृष्टि हो, तो जातक धन-सम्पत्ति व सौभाग्य के साथ सब सुख प्राप्त करेगा।

मूल शुक्र चरण फल

प्रथम चरण - जातक क्रूर, कलहप्रिय, साहसी और निडर, हिंसा करने वाला, एक की बात दूसरे को बता कर झगड़ा कराने वाला होता है।  यदि सूर्य गुरु की युति हो, तो  मुखर, बुद्धिमान, मंत्री या मंत्री के समकक्ष होता है।

द्वितीय चरण - जातक व्यवसाय बदल कर उन्नति करने वाला, महत्वाकांक्षी, कर्मठता से ज्ञान प्राप्त करने वाला, शांतिप्रिय, स्थूल शरीर वाला, वात पीड़ित, अपने अधिकारों के लिए संघर्धशील होता है।

जातक धर्म पिता, स्त्रियों का उद्धारक, नारी उद्धार गृह या नारी अनाथालय से सम्बन्धित  होता है।

तृतीय चरण - जातक उत्कृष्ट विद्वान, धर्म को मूल से जानने वाला, धन-वाहनादि युक्त, जिज्ञासु, अन्वेषक,  किसी की बात को सबको बता कर शांत होने वाला होता है। यदि अकेला शुक्र हो, तो निर्धन व सुख हीन होगा।

चतुर्थ चरण - जातक धन वैभव सम्पदा प्राप्त करने वाला, परिवार से मतभेद किन्तु मनभेद नही करने वाला, बहु युक्ति वाला होता है।  सूर्य शनि की युति हो, तो अनेक धर्मग्रंथो का विद्वान लेकिन निम्न स्तरीय होगा।

शनि :

मूल शनि  पर सूर्य  की दृष्टि हो, तो जातक नामी, प्रसिद्ध, ईश्वर पदत्त सभी सुख भोगेगा।

मूल शनि  पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक विज्ञानं के क्षेत्र मे अन्वेषक, माता को खतरा व स्वयं का परिवार अच्छा होता है।

मूल शनि  पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक चालाकी के कारण जेल यात्री, सभी के द्वारा नापसंद किये जाने वाला, निर्दयी होता है।

मूल शनि  पर बुध  की दृष्टि हो, तो जातक प्रतिष्ठित मंत्री या मंत्री के समकक्ष होगा।

मूल शनि पर गुरु  की दृष्टि हो, तो जातक सुखी व धनी, शिक्षक अथवा शोध छात्र होता है।

मूल शनि  पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक स्थाई कार्य करने वाला, जिम्मेदार किन्तु माता के अलावा दूसरो से पालित (विमाता या घाय) होता है।

मूल शनि चरण फल

प्रथम चरण - जातक धनी, धन-सम्पत्ति से गौरान्वित, परिवार मे सबसे उदार व्यक्ति होगा।

द्वितीय चरण - जातक विद्वान, संयम से रहने वाला, किसी की बात को अपने तक सीमित नही रखने वाला, प्रदर्शनकारी, सहयता और सलाहकारी मित्रो से घिरा होता है।

तृतीय चरण - जातक विद्वान, अपनी कर्मठता से ज्ञान और पाण्डित्य प्राप्त करने वाला, अधिकारों के लिये संघर्ष करने वाला, व्यापार व्यवसाय मे बार-बार परिवर्तन करने वाला होता है।

चतुर्थ चरण - जातक  किसी की बात को गुप्त नही रखने वाला, परिवार से मतभेद वाला, विज्ञानं के क्षेत्र मे खोज करने वाला, गांव या शहर या किसी संस्था का अघ्यक्ष होगा। भूगर्भ की वस्तुऐ, खनिजादि, वृक्षादि से प्राप्त वस्तु, कला आदि से आजीविका करता है।

मूल राहु चरण फल

प्रथम चरण - यदि पुष्य नक्षत्र मे शनि, चंद्र, हो तो पुरुष जातक अपनी संतान के कारण मानसिक तनाव मे रहेगा, स्त्री जातक गर्भाशय के विकार से पीड़ित होगी तथा पुत्र के कारण मानसिक व्यथा सहन करेगी।

द्वितीय चरण - यदि मृगशीर्ष नक्षत्र लग्न हो, तो स्त्री जातक अपने परिवार के विनाश का कारण बनेगी और सुख से वंचित रहेगी।

तृतीय चरण - जातक वेदो में अति विद्वान, जमीन जायदाद से सम्पन्न होगा जिसे वह पांचवे दशक मे स्त्री को दे देगा।  यदि चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र मे हो तो ये परिणाम अवश्य होगे।

चतुर्थ चरण - जातक सक्षम अधिकारी व विदेश यात्रा करेगा, लेकिन बेशर्म चरित्र का होगा।  विशाखा प्रथम या द्वितीय चरण लग्न हो, तो ये परिणाम अवश्य होगे।

मूल केतु चरण फल

पहला पाद - जातक भव्य भवनो का स्वामी होगा जिसे वह 31 वर्ष मे खो कर 35 वे वर्ष मे पुनः प्राप्त कर लेगा।

दूसरा पाद - पहले  पाद जैसे ही परिणाम होंगे। यदि मंगल की युति हो, तो मंत्री होगा।

तृतीय चरण - पहले  व दूसरे पाद जैसे ही परिणाम होगे, लेकिन चर्म रोग, रक्त विकार, हृदय रोग होगे।

चतुर्थ चरण - जातक अधिकतम नौकरी करेगा, वही परिवार मे गतिरोध होगे, परिवार जन शत्रु बन जायगे।

जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।

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