गुप्त नवरात्री रहस्य विवरण

ऊँ नमः चण्डिकायै 
विशेषांक:-गुप्त नवरात्र, आषाढ़ मास,
(6 जुलाई प्रतिपदा से 15 जुलाई नवमी तक)
महाकाल संहिता के अनुसार वर्ष में चार नवरात्र आते हैं। अलग-अलग युग में अलग-अलग मास की महिमा रही है। 
सत्ययुग में चैत्र शुक्लपक्ष 
त्रैतायुग में आषाढ़ शुक्लपक्ष
द्वापर में माघ शुक्लपक्ष
कलियुग में आश्विन शुक्लपक्ष की नवरात्र पूजा प्रधान है।

देवी भगवती की उपासना का पर्व नवरात्र कहलाता है। इसमे आदिशक्ति के नौ रूपों की नौ दिनो मे अलग-२ पूजा की जाती है, जिससे मां प्रसन्न होकर भक्तो के मनोरथो को पूर्ण करती है ।

देवी भागवत् मे एक वर्ष मे चार नवरात्रों को कहा गया है ।

1.चैत्र-वासन्तीय नवरात्र-"प्रकट नवरात्रे"(मार्च -अप्रैल ) 
2. अश्विन-शारदीय नवरात्र-"प्रकट नवरात्रे (अक्तूबर )  

1. आषाढ़ नवरात्र - "गुप्त नवरात्रे" (जून-जुलाई ) 
2. माघ नवरात्र- "गुप्त नवरात्रे (जनवरी-फरवरी )

इन चार नवरात्रों मे से दो, चैत्र तथा अश्विन मास (मार्च तथा अक्तूबर ) के नवरात्र, प्रकट नवरात्र है, जोकि भारत वर्ष मे धूमधाम से मनाये जाते है, जिसमे देवी के नौ रूपो की पूजा की जाती है।

नवरात्रो की नौ देवियां क्रमशः इस प्रकार से है । 
(प्रथम शैलपुत्री , दूसरी  ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्माण्डा, पांचवीं स्कंदमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी, नवी सिद्धिदात्री)

इसी प्रकार से वर्ष मे दो गुप्त नवरात्रे आषाढ़ मास, (जून-जुलाई) तथा माघ मास (जनवरी-फरवरी) मे होते है, यह दोनो नवरात्र अधिक प्रचलित नही थे, परंतु अब कुछ वर्षों से एक बार फिर समाज मे आध्यात्मिक जागृति आने की वजह से इन दो नवरात्रो को फिर से मनाया जाने लगा है।

गुप्त नवरात्रो मे विशेषतः शक्ति साधना, तंत्र साधना, महाकाल साधना, तथा तांत्रिक सिद्धियो के लिए श्रेष्ठ है। आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि में जहां वामाचार उपासना की जाती है। वहीं माघ मास की गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति को अधिक मान्यता नहीं दी गई है । हिन्दु ग्रंथों के अनुसार, "आषाढ़ मास तथा माघ मास" के नवरात्रों मे से माघ मास नवरात्रो का विशेष महत्व है। 

*आषाढ़ मास गुप्त नवरात्र:-*
आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि का तंत्र-मंत्र और सिद्धि-साधना के लिए विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि तंत्र मंत्र की सिद्धि के लिए इस समय की गई साधना शीघ्र फलदायी होती है। आषाढ़ मास गुप्त नवरात्रि का यह पर्व  तांत्रिकों और अघोरियों के लिए बहुत अनुकूल होता है। इस दौरान देवी भगवती के साधकों को बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करनी होती हैं। इस कठोर साधना से साधकों को दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति होती हैं।

इन दस शक्तियों के प्रसन्न होने पर जातक को दुर्लभ और अतुल्य शक्ति प्राप्त होती है। इन दस शक्तियों की पूजा को दस महाविद्या अनुष्ठान कहते हैं, यह दस शक्तियां इस प्रकार से है-
1. काली 2. तारा 3. षोडशी 4. भुवनेश्वरी 5. भैरवी 6. छिन्नमस्ता 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातङ्गी 10. कमला।

*आषाढ़ शुक्ल पक्ष की सप्तमी यानि सातवें नवरात्र वाले दिन को "वैवस्वत सप्तमी" का पर्व मनाया जाता है, अर्थात इस दिन सूर्य भगवान की पूजा होनी चाहिए, जो पूर्वाषाढ़ को प्रकट हुए थे*

गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली माता की आराधना का प्रचार, प्रसार नहीं किया जाता है। पूजा, मंत्र, पाठ और प्रसाद सभी चीजों को गोपनीय रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गुप्त नवरात्रों में माता की पूजा को जितना गोपनीय रखा जाता है, फल उतना ही बेहतर प्राप्त होता है। गुप्त नवरात्रि का ज्ञान कम ही लोगों को होता है इसलिए भी इसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। इस नवरात्रि में विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है।

इसी विषय मे ऋषि श्रृंग जी कहते हैं कि इन गुप्त नवरात्रो मे कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा- साधना करता है, तो मां उसके जीवन को सफल कर देती हैं, यहाँ तक की लोभी, कामी, व्यसनी सहित यदि मांसाहारी अथवा पूजा-पाठ न करने वाला नास्तिक व्यक्ति भी यदि इन दिनों मां की उपासना कर ले तो उसके जीवन से हर प्रकार के कष्टों तथा पापो का नाश हो जाता है, उसके जीवन में परिवर्तन आने लगता है, वह सभी व्यसनो को त्याग कर सद्मार्ग की ओर अग्रसर होने लगता है, तथा उसके जीवन में कभी भी कोई कमी नहीं रहती।

*गुप्त नवरात्रि के विषय में प्रचलित कथा:-*
गुप्त नवरात्रों से एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है एक समय ऋषि श्रृंगी भक्त जनों को दर्शन दे रहे थे अचानक भीड़ से एक स्त्री निकल कर आई और करबद्ध होकर ऋषि श्रृंगी से बोली कि मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं । जिस कारण मैं कोई पूजा-पाठ नहीं कर पाती धर्म और भक्ति से जुड़े पवित्र कार्यों का संपादन भी नहीं कर पाती । यहां तक कि ऋषियों को उनके हिस्से का अन्न भी समर्पित नहीं कर पाती मेरा पति मांसाहारी हैं, जुआरी है । लेकिन मैं मां दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूं । उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूं । ऋषि श्रृंगी महिला के भक्तिभाव से बहुत प्रभावित हुए । ऋषि ने उस स्त्री को आदरपूर्वक उपाय बताते हुए कहा कि वासंतिक और शारदीय नवरात्रों से तो आम जनमानस परिचित है लेकिन इसके अतिरिक्त दो नवरात्र और भी होते हैं । जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है प्रकट नवरात्रों में नौ देवियों की उपासना होती है और गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है । इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है । 

धार्मिक दृष्टि नवरात्र देवी की भक्ति तथा शक्ति साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ समय है । परंतु इस शक्ति साधना के पीछे लोक-कल्याण का पक्ष भी समाहित है, दरअसल नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। 

 सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम, अनुशासन व्रत तथा उपवास, तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं जिससे इंसान निरोगी होकर स्वास्थ्य तथा दीर्घायु को प्राप्त करता है। 

धर्म ग्रंथों के अनुसार गुप्त नवरात्र में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है । इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान साधक लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों अथवा सिद्धियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।

यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो मां उसके जीवन को सफल कर देती हैं । लोभी, कामी, व्यसनी, मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि गुप्त नवरात्रों में माता की पूजा करता है तो उसे जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती । 

गुप्त नवरात्रो विशेषतः आषाढ़ मास के गुप्त नवरात्रो के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने तथा सिद्धियां पाने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते हैं। तंत्र साधना आदि के लिए गुप्त नवरात्र बेहद विशेष माने जाते हैं। 

गुप्त नवरात्र की गोपनीयता का रहस्य स्पष्ट है कि यह समय शक्त और शौण उपासकों के लिये पैशाचिक, वामाचारी, क्रियाओं के लिये अधिक शुभ एवं उपयुक्त होते है। इन नवरात्रो मे साधक गुप्त साधनाएं करने श्मशान व गुप्त स्थान पर जाते हैं ।

*माता दुर्गा का स्वरूप:-*
हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है (शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है)। वेदों में तो दुर्गा का व्यापक उल्लेख है, किन्तु उपनिषद में देवी "उमा हैमवती" (उमा, हिमालय की पुत्री) का वर्णन है। पुराण में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। दुर्गा असल में शिव की पत्नी आदिशक्ति का एक रूप हैं, शिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है। 
एकांकी (केंद्रित) होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवश अनेक हो जाती है। उस आदि शक्ति देवी ने ही सावित्री(ब्रह्मा जी की पहली पत्नी), लक्ष्मी, और पार्वती(सती) के रूप में जन्म लिया और उसने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से विवाह किया था। तीन रूप होकर भी दुर्गा (आदि शक्ति) एक ही है।

देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं (सावित्री, लक्ष्मी एव पार्वती से अलग)। मुख्य रूप उनका "गौरी" है, अर्थात शान्तमय, सुन्दर और गोरा रूप। उनका सबसे भयानक रूप काली है, अर्थात काला रूप। भगवती दुर्गा की सवारी शेर है।

देवी दुर्गा की पूजा सिंह पर सवार एक निर्भय स्त्री के रूप में की जाती है। दुर्गा देवी को कही-२ चार भुजाओं तथा कही पर आठ भुजाओं से युक्त दर्शाया गया हैं, सभी हाथो में कोई न कोई शस्त्रास्त्र होते है।
हर हर महादेव।

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