मेष राशि का स्वभाव जीवन और आचरण उपाय विवेचन
मेष राशि का स्वभाव जीवन और आचरण उपाय विवेचन
★★★मेष राशि★★★
वेद मन्त्र है -
【ऋषिः - अथर्वा,देवता - वाक्, छन्दः - निचृत विराट् गायत्री, सूक्तम् - दुःख मोचन सूक्त】
"ऋषी॑णांप्रस्त॒रोऽसि॒ नमो॑ऽस्तु॒ दैवा॑य प्रस्त॒राय॑ ॥"
√●स्वर सहित पद पाठ
【ऋषी॑णाम् । प्र॒ऽस्त॒र: । अ॒सि॒ । नम॑: । अ॒स्तु॒ । दैवा॑य । प्रऽस्त॒राय॑ ॥】
(अथर्ववेद (१६ । २।६)
√●१. ऋ गति प्रापणयोः ऋच्छति। अ गतौ इयर्ति । अ हिंसायाम् अणोति । जितने भी गति शील पदार्थ हैं, वे सब ऋषि हैं। बहता हुआ पानी ऋषि है। बहता हुआ पवन ऋषि है। धू-धू जलता हुआ अग्नि ऋषि है। चलनशील पृथ्वी ऋषि है। चलते हुए आकाशीय पिण्ड ऋषि हैं। सतत गतिशील होने से मन ऋषि है, बुद्धि ऋषि है, चित्त ऋषि है। भ्रमणरत साधु संन्यासी यति मुनि आदि सभी ऋषि हैं। जहाँ गति है, वहाँ ऋषित्व है। जहाँ ऋषित्व है, वहाँ गति निश्चय है। गति शब्द विष्णु का पर्याय है। 'गति' विष्णु सहस्रनाम ।
√●२. प्रस् भ्वादि दिवादि आत्मनेपद प्रसते, प्रस्यते का अर्थ जन्म देना, विस्तार करना फैलाना है। तू ध्वादि परस्मै प्लवन संतरणयोः तरति पार जाना, तैर कर पार करना, जीतना (संसार सागर को इसका अर्थ है। प्रस् + तृ + अप्= प्रस्तरः ।
√●जो पैदा करता है, जनता है, उत्पन्न करता है और इस सृष्टि को फैलाता है, इसका विस्तार करता है। तथा पैदा करके, विस्तार करके भी इसमें फँसता नहीं, उलझता नहीं, आसक्त होता नहीं उसका नाम है, प्रस्तर। प्रस्तरः का यह अर्थ लेने पर ऋषीणाम् का अर्थ होगा, ऋषिभ्यः । ऋषि ज्ञानी/ बुद्ध ऋषियों के लिये वह प्रस्तर है। ऋषियों का वह पत्थर है। प्रस्तर का परम्परागत अर्थ पत्थर, चट्टान, रत्न (बहुमूल्य पदार्थ) है। पत्थर स्थूल होता है, गति अवरोधक होता है। पत्थर चट्टान पहाड़ के आगे पड़ने पर गतिशीलों की गति समाप्त हो जाती है। पत्थर चट्टान के आ जाने पर अथवा प्राप्त होने पर गतिशील उसमें समा जाता है, लीन हो जाता है। प्रस्तर सब की गति को खा जाता है। साधक/उपासक अपने ध्येय पथ पर बढ़ता हुआ जब आत्म तत्व को पा लेता है तो उसकी साधन क्रिया संबंधी गति की इति हो जाती है। इसलिये प्रस्तर परमेश्वर का वाचक है। जैसे समस्त यान पहाड़ से टकराकर चूर चूर हो कर पहाड़ का अंगभूत हो जाते हैं, वैसे ही साधक योगी ईश्वर की प्राप्ति कर तद्रूप हो जाता है।
√●एक अन्य अर्थ भी प्रस्तर का है और वह है-विस्तार/खटिया / चारपाई / पर्णशय्या/पुष्पशय्या/तोषक शय्या वह राम अषियों की शय्या है। ऋषिगण उसमें विश्राम पाते हैं। अपने चित्त को राम में लगा कर मानो सोते हैं।
√●जितनी भी कठोर वस्तुएँ हैं, उनको प्रस्तर/ पत्थर/ उपल कहते हैं। जहाँ कठोरता है, वहाँ आकार है। जहाँ कठोरता नहीं है, वहाँ आकार नहीं, निराकार ही नराकार है। प्रस्तर निश्चित आकार का कारक है। प्रस्तर नहीं आकार नहीं। शरीर अस्थिमय है। यदि अस्थि न हो तो शरीर का यह आकार न हो। अस्थि प्रस्तर का रूप है। शरीर में सर्वत्र पत्थर ही पत्थर है। यकृत में पत्थर होता है। वृक्क में पत्थर होता है। हृदय में भी पत्थर होता है। हृदय की पथरी श्री पं. जी स्वयं देख चुके हैं। कान में भी पत्थर होता है। [कान की पथरी में स्वयं देख चुका हूँ ।। आँख में पत्थर होता है। [ आँख की पथरी से मोतिया बिन्द होता है ] नाखून और बाल भी पत्थर हैं। मुँह में ये जो दाँत हैं, वे भी पत्थर हैं। नाक में भी पत्थर होता है। तात्पर्य यह है कि शरीर में ऐसा कौन सा अंग है, जहाँ पत्थर नहीं होता है इस प्रकार पत्थर व्यापक है। व्यापक होने से वह विष्णु है। संसार में जो कुछ भी आकार है, वह पत्थर के कारण है। पत्थर है, कठोर शुष्क, अनाई, अलोच्य स्थाणु। यह शिव का पर्याय है। इस लिये पत्थर को परमात्मा का प्रतीक मान कर उसमें भगवद्भाव की दृष्टि रखी जाती है, उस की पूजा अर्चा की जाती है।
√● हर प्रकार से प्रस्तर परमात्मा का पर्याय है, विभु होने से विष्णु है। यह भीतर है, बाहर है। यह दृश्य है, अदृश्य है। परन्तु है। इसमें कोई सन्देह नहीं। यही कारण है कि लोग इस शरीर की पूजा करते हैं। मर जाने पर इसका चित्र बना कर रखते हैं। इसकी प्रस्तर की मूर्ति गढ़ कर रखते हैं। गुरु की मूर्ति बनवा कर अथवा उसका चित्र रख कर उसके प्रति आदर भाव पूज्य भाव रखना अनादि काल से चला आ रहा है। यह वेद विहित है। यह वेद प्रतिपाद्य है। यह वेद का तुमुल घोष है। प्रस्तर पूजा मूर्ति पूजा।
√●जिसके पास ऋषि दृष्टि है, उसके लिये प्रस्तर परमात्मा है। जिसमें यह दृष्टि नहीं है, उसके लिये परमात्मा पत्थर है। संसार में दोनों प्रकार के लोग हैं। पत्थर की मूर्ति में महाकाली आद्या शक्ति का दर्शन रामकृष्ण परमहंस ने किया था। अन्धे सूरदास को प्रस्तर की कृष्ण प्रतिमा में साक्षात् कृष्ण दिखते थे। गौरांग महाप्रभु चैतन्य का तथा भक्त मीरा का पार्थिव शरीर कृष्ण की प्रस्तर मूर्ति में लीन हो गया। यह प्रज्ज्वलित सत्य है। जब तक अद्वैत दृष्टि का विकास नहीं होता, तब तक यह सत्य नहीं लगता है। जिसमें यह दृष्टि है, वह पाण्डित है। भगवान् कृष्ण कहते हैं...
"विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥"
( गीता ५। १८ )
√●पण्डित के लिये पत्थर जड़ नहीं है, मूर्ख के लिये जड़ है। पण्डित पत्थर की पूजा करता है, मूर्ख उसकी उपेक्षा करता है। एक बार एक महात्मा योगी चाङ्गदेव बाघ पर सवार हो कर संत ज्ञानेश्वर से मिलने आ रहे थे। संत ज्ञानेश्वर जी महाराज अपने भाई बहन सहित एक दीवार (मृद्भत्ति) पर बैठे थे। योगी चांगदेव का गर्व हरण करने के उद्देश्य से उन्होंने दीवार से चलने के लिये कहा। दीवार चलने लगी। यह देख कर चांगदेव जी बहुत लज्जित हुए। चेतन के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं ऐसी दृष्टि संत ज्ञानेश्वर में थी। वे पण्डित हैं जिनकी आज्ञा का पालन जड़ प्रकृति करती है। धन्य हैं ऐसे लोग ऐसों के प्रति मैं सतत नत मस्तक हूँ।
√● ३. देव + अण् = दैव। जो देव से संबंधित है, वह दैव है। देव का अर्थ परमात्मा है। जो पर (श्रेष्ठ) है, वह दैव है, दिव्य है, सुन्दर है। यहाँ मंत्र के दूसरे भाग में (नमोऽस्तु दैवाय प्रस्तराय) दैव, प्रस्तर का विशेषण है। पत्थर को नमस्कार है। पत्थर में व्याप्त दिव्य तत्व वा दैव को नमस्कार है। भाव ही भगवान् है। भाव नहीं है तो पत्थर भगवान् नहीं। भाव है तो पत्थर भगवान् है। इस लिये मंत्र कहता है- नमोऽस्तु प्रस्तराय । जिसमें पाण्डित्य दृष्टि आ जाती है, उसके लिये नमोऽस्तु दैवाय प्रस्तराय । यह बुद्धि सतत होनी चाहिये। समदृष्टि का कभी-कभी होना वा किसी क्षण विशेष में होना पर्याप्त नहीं है। ऐसा तो लगभग सबको होता है। इस दिव्यता को पाना कठिन है।
√● संसार में सभी लोग मूर्ति पूजक हैं। कोई अपना छाया चित्र रखता है, कोई अपने गुरु का कोई अपने पिता पुत्र पति पत्नी प्रिया वा मित्रों का जितने भी चित्र हैं, आकार वाले पदार्थ हैं, वे सब मूर्ति हैं। हैं मर्ति सुन्दर है अथवा नहीं, भाव सुन्दर होते हैं। सुन्दर भाव होने पर पूजा अर्चना, सत्कार किया जाता है। जितने भी आकार हैं, उनका कोई न कोई नाम है। जहाँ आकार है, वहाँ नाम है। यह संसार नाम रूपात्मक है। संसार विष्णु है। संसारः = विष्णु: [ सहस्रनाम] । इस आकार की उत्पत्ति निराकार से हुई है। निराकार का अर्थ है-नीराकार। इस लिये जल वा जलाशय पूज्य हैं। जल निराकार, जलाशय साकार। दोनों अभिन्न हैं।
√●आदि तत्व निराकार है, शून्य मात्र है। उसी से आकार की उत्पत्ति हुई है। आकार कुल १२ हैं। इन्हीं १२ से नारारूप चराचर विश्व है। इन १२ आकारों के १२ नाम हैं। ये १२ नाम अनाम से उद्भूत हैं जो अनाम है, उसे प्रणव कहते हैं। प्रणव निराकार है। सभी मंत्र साकार हैं। साकार जड़ है। इसे चेतन बनाने के लिये इनका प्रणव से योग किया जाता है। इसीलिये हर मंत्र के पूर्व प्रणव शब्द ओम् का उच्चारण हम करते हैं। ओम का उच्चारण करते ही इससे जुड़ा मंत्र जड़ न रह कर चेतन हो जाता है। जो ओम् युक्त है, ओम् मय है, वह जड़ नहीं रह सकता। राम केवल शब्द वा पद नहीं, अपने आप में यह प्रणव है। नाम का अर्थ ही राम है। अन्य सभी नामों को लेने से जीव संसार सागर से पार हो जाता है। परन्तु राम नाम से से यह संसार समुद्र ही सूख जाता है। फिर इसे पार करने की बात ही नहीं आती। संत तुलसी दास कहते हैं...
"नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं।"
( रा.च. मा. )
√●यह राम अगुण सगुण दोनों है। जो सगुण है, वह पत्थर है। जो अगुण है वह पत्थर नहीं है। १२ राशियाँ इस राम में हैं। इन राशियों का १२ आकार इस राम से है। ये राशियाँ राम रूप हैं जो राम को जानता है, वह इन्हें जानता है। राम की कृपा के बिना इन राशियों के गुणशीलादि का वर्णन शक्य नहीं है।
√●मेष राशि ज्योति चक्र की प्रथम राशि है। इस के गुण धर्म का आकलन प्रस्तुत करने के पूर्व एकानंशा देवी (अखण्ड राशि चक्र) को प्रणाम करता हूँ।
√★१. मेष = मा + इष् + अच् । 【इष् धातु (तुदादि परस्मै) इच्छति, इष्ट 】
= मा + इष [इप = बलशाली, शक्तिसम्पन्न, आश्विन मास 】
मा = प्रकृति, आधा शक्ति, माया।
इस प्रकार, मेष = प्रकृतितः बलवान्, इच्छाशक्ति सम्पन्न, संकल्पवान् ।
√★२. मेष : मा + ईष् + क। [ईष् (भ्वादि उभयगणी) ईषति-ते, ईषित]
= मा + ईष । [ ईष = उड़नशील, दानशील, दर्शन, हिंसन, मारण ]
√●जो स्वभावतः गतिशील, उदारतापूर्वक देने वाला, लक्ष्य पर दृष्टि रखने वाला, हिंसालु, मारक वा क्रूर कर्मा हो, उसको मेष कहते हैं।
√● मेष राशि का स्वामी मंगल है। मंगल के समस्त गुण इसमें हैं अथवा इसके गुण मंगल में आरोपित होते हैं। राशि चक्र में यह०° से लेकर ३०° तक विद्यमान है। यह आद्य राशि है। कहा गया है।
"आय: स्मृतो मे समानमूर्ति
कालस्य मूर्धा गदितः पुराणैः।
सो ऽ जाविकासकन्दरादिः स्तेनाग्निधात्वाकररत्नभूमिः ॥"
√●प्रथम मेष राशि है। इसकी आकृति बकरे के समान होती है। काल पुरुष की देह में यह पौराणिकों द्वारा शिर रूप कही गई है। इसका निवास स्थान भेड़ बकरी के चरने की भूमि, गुफा, पर्वत, घोर स्थान, अग्नि व धातुओं की खान और रत्न की भूमि हैं।
√●मेष के १०° अंश पर सूर्य परमोच्च होता है।
√●मेष के २०° अंश पर शनि परमनीच होता है।
√●मेष के १२° अंश तक मंगल मूलत्रिकोण होता है।
√●मेष के शेष अंश मंगल के स्वगृहांश हैं।
√●यह राशि साहसी, अभिमानी, मित्रों पर कृपा करने वाली है। यह पहले नवांश में अपने स्वभाव को विशेष रूप से प्रकट करती है। यह चर, विषम, क्रूर पुरुष राशि है। क्षत्रिय वर्ण, अग्नि तत्व, पूर्वदिशा, रक्ताभा वाली राशि है। इसका स्वामी मंगल है। यह पृष्ठोदय राशि है। हस्व आकार, उपवन निवास, रुक्षकांति, शुष्क स्वभाव राशि है। रात्रि बली, पित्त प्रकृति, महाशब्द कारक, दशम स्थान बली राशि है। चतुष्पद, दक्षिण ओर प्लवत्व (नीचोन्मुख), दिनांध, पावजल राशि है सुदृढ पुष्टता, सकारात्मक सत्ता, अल्पसन्तान, धातु कारक राशि है। स्वदेश संबंध, मातामह उपसंबंध, खनिज पदार्थ तथा द्वार राशि है। प्रश्न लग्न में मेष राशि होने पर मनश्चिता । पञ्चम में अल्पसंतति । मेष राशि में मृत्युप्रद चन्द्रांश =२० ।
√●मेष का उदयमान = १ घण्टा ,३८ मिनट।
√● मेष राशि शिर अवयव की प्रतीक है। शिर में मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क में विचार होते। हैं। विचारों में गति होती है। मस्तिष्क की उर्वरता, विचारों की बहुलता एवं गतिशीलता का प्रतिनिधित्व इसी राशि से होता है। मेष राशि अशुभ प्रभाव में होगी तो सिर में चोट लगेगी, विचार कुण्ठित होंगे, मस्तिष्क अल्पविकसित होगा। शुभ प्रभाव होने पर इसके विपरीत शुभफल होगा। इस राशि की गूढता को प्रकट करने वाली एक कथा श्रीमद्भागवत में उर्वसी एवं पुरूरवा के संबंधों से कही गई है।
√●श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध में चौदहवें अध्याय की कथा का संबंध चन्द्रवंश से है। सहस्रशीर्षा विराट् पुरुष के नाभिसरोवर के कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र हुए अत्रि । अत्रि के नेत्रों से चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। इससे चन्द्रमा का घमण्ड बहुत बढ़ गया। 'प्रभुता पाइ काह मद नाही'। उन्होंने देव पत्नी तारा को हर लिया। इस बात को लेकर बृहस्पति और चन्द्रमा में झगड़ा हुआ। असुर गुरु शुक्राचार्य ने बृहस्पति के द्वेष से चन्द्रमा का पक्ष लिया। इस प्रकार तारा के निमित्त देवासुर संग्राम हुआ। अंगिरा ऋषि के कहने से ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को डाटा फटकारा। तारा को बृहस्पति पा गये। तारा के गर्भ से चन्द्रमा द्वारा स्थापित स्वर्ण के समान एक पुत्र हुआ। इसका नाम बुध हुआ। बुध द्वारा इला के गर्भ से पुरूरवा का जन्म हुआ। उर्वशी नाम की अप्सरा मित्रावरुण के शाप से मृत्यु लोक में आयी। देवांगना उर्वशी को देख कर राजा पुरुरवा के नेत्र हर्ष से खिल उठे। राजा पुरुखा के साथ काम क्रौड़ा करने के लिये उर्वशी ने एक शर्त रखी। राजा ने वह शर्त स्वीकार कर ली। उर्वशी ने राजा को धरोहर के रूप में भेंड़ के दो बच्चे दिया। यत्नपूर्वक इन की रक्षा करने का दायित्व राजा को सौंपा। केवल घी खाने की बात कही तथा मैथुन के अतिरिक्त अन्य किसी भी समय में राजा को वस्त्रहीन न देखने की शर्त रखी। राजा पुरुरवा ने बहुत वर्षों तक उर्वशी के साथ आनन्द विहार किया। उर्वशी के बिना इन्द्र की सभा का रंग उतर चुका था। इन्द्र ने फिर से उर्वशी को लाने के लिये दो गन्धवों को भेजा। दोनों गन्धर्व आधी रात के समय निविड अन्धकार में राजा के शयन कक्ष से भेडों को चुरा कर ले भागे। उर्वशी ने भेड़ों को चुराते हुए गन्धवों को देखा। वह चिल्लायी। उसने राजा को भेंड़ो की रक्षा न करने के लिये बहुत फटकारा। राजा उस समय वस्त्रहीन अवस्था में गन्धर्वो का पीछा तलवार ले कर किये। यह देख कर गन्धर्व भेड़ों को छोड़ कर भाग गये तथा बिजली बन कर रात्रि के गहन अन्धकार में चमकने लगे। उर्वसी ने राजा को नग्न अवस्था में देख लिया। वह भाग गई। राजा विरह व्याकुल हो कर तड़पने लगे। यह कथा प्रतीकात्मक है और ज्योतिषीय तथ्यों से भरपूर है। भेंड़ के दो बच्चे इहलौकिक एवं पारलौकिक विचारों के प्रतीक हैं। संसार में रहते हुए इन दोनों विचारों को यत्नपूर्वक अपने पास रखना चाहिये। मैथुन क्रिया में संलग्न होते समय इन दोनों विचारों को अपने से अलग रखना चाहिये। इससे विचार शून्यता आती है। यह मैथुनानन्द ब्रह्मानन्द की कारक है। यहाँ चन्द्रमा मन है, बुध ही व्यावसायिक बुद्धि है। इला (इडा) सौम्य बुद्धि है। उर्वशी उर (हृदय) में बसी हुई रागात्मिका वृत्ति है। पुरुरवा ही पुरुष के भीतर का पुरुषार्थ है। बृहस्पति गहन ज्ञान है। शुक्र छिछला/सांसारिक भोग परक ज्ञान है। तारा प्रकाशमान नक्षत्र है। देने वाला ही देव है। जो देता नहीं वह अदेव वा असुर है। असुर केवल लेता ही लेता है। यह देवासुर संग्राम सतत मनुष्य के भीतर चलता रहता है।
√●मेष राशि की प्रतीक संख्या १ है। ब्रह्मा एक है। विश्व एक है। माया एक है। तत्व एक है। आत्मा एक है। सत्य एक है। अत एक है। पुरुष एक है। ज्ञान एक है। क्रिया एक है। धर्म एक है। गति एक है। यह एक अनेक होकर भास रहा है। एक ही अनेक है, अनेक ही एक है-ऐसा जो जानता है, वह ज्ञानी है, भक्त है, मुक्त है, युक्त है।
√●इस एक का वर्णन करते हुए वेद कहता है...
"तमि॒दं निग॑तं॒ सहः॒ स ए॒ष एक॑ एक॒वृदेक॑ ए॒व ॥"
√●●स्वर सहित पद पाठ
【तम् । इ॒दम् । निऽग॑तम् । सह॑: । स: । ए॒ष: । एक॑: । ए॒क॒ऽवृत् । एक॑: । ए॒व】
(अथर्व १३ । ४ ।२०)
"एते अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति ।"
(अथर्व १३ । ४। १३ )
"य ए॒तं दे॒वमे॑क॒वृतं॒ वेद॑ ॥"
√●●स्वर सहित पद पाठ
【य: । ए॒तम् । दे॒वम् । ए॒क॒ऽवृत॑म् । वेद॑ ॥】
( अथर्व १३ । ४।२४ )
√●एक है शिर (मस्तिष्क)। एक से सब कुछ जाना जाता है। किन्तु एक को नहीं जाना जा सकता। अषियों ने एक का कथन अनेक प्रकार से किया है।
"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।
अग्नि यमं मातरिश्वानमाहुः ।।"
(अथर्व ९ । १० । २८)
√●जगत् के प्रारंभ में प्रणव रूप वेद एक था। उसी से सम्पूर्ण वाड्मय उद्भूत हुआ। एक वर्ण था। एक अग्नि था। एक नारायण था अन्य कुछ भी नहीं था।
"एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाम देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च ॥"
(श्रीमद् भागवत ९ । १४ । ४८ )
√●पुरवा से ही प्रेतायुग के प्रारंभ में वेदत्रयी तथा अग्नि आविर्भूत हुई।
"पुरुरवसः एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप।।"
(भागवत ९ । १४ । ४९)
√★★इस एक १ की संख्या का द्वादश भावों में क्या फल होता है, उसका वर्णन करता हूँ।
√★लग्न में १ ...
लालिमामय देह, अधिक क्रोधी, कृतघ्न, तीक्ष्णचिन्तन, उग्रविचार, चपल, दबैला/ पराजित ।
√★धन में १... चतुष्पद पालन से धन एक अच्छा पुत्र, पण्डित, वाचाल, भीरु, धनार्जन हेतु घूमने फिरने वाला।
√★सहज में १...
विद्वान्, परोपकारी, राजपूज्य, कथा श्रवण में रुचि, ब्राह्मणों का मित्र, अनुजसुख ।
√★सुख में १ ...
दुग्धादि का सुख, अन्नादि का प्राचुर्य, विचित्र भोगों से युक्त, सेवकादि का सुख, द्रुतवाहन का लाभ ।
√★सुत मे १ ...
तीव्र बुद्धि, प्रखर चिन्तन, उपकमों में स्वाभाविक गति, पुत्र से सम्मति, अल्पसन्तान ।
√★शत्रु में १...
स्थायी शत्रुओं का अभाव, कटि में पीडा, चलने से व्रण वा चोट की प्राप्ति ।
√★जाया में १...
स्त्री दुष्ट स्वभाव की, क्रूर पापिनी नृशंस धन प्रिया तथा अत्यन्त चपल, क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा ।
√★आयु में १ ...
विदेश प्रवास, लम्बी यात्रा, धनी अनेक दुःखों से युक्त, अकेला, चिंतन करते करते संज्ञाशून्य होना।
√★धर्म में १ ...
चौपायों का पोषण, दया विवेक द्वारा पशुपालन, दान क्रिया से धर्माचरण ।
√★ कर्म में १... विनय रहित, लोक में साधुजनों द्वारा निन्दित, अधर्मकर्मा, असूयावान् दुष्ट राजपुरुष।
√★लाभ में १....
चतुष्पदों के व्यापार से राज सेवा से, तथा देशदेशान्तर में भ्रमण से लाभ ।
√★व्यय में १ ...
दूसरों को नीचा दिखाने एवं धौंस दिखाने में धन का व्ययन, पुरुषार्थ से धन वृद्धि के - लिये खर्च ।
√◆◆◆ मेष मे विभिन्न ग्रहों के रहने का फल इस प्रकार है...
√● सूर्य १ में...
बुद्धिमान, साहसी, विख्यात रुधिर व पित्त विकार, सर्वत्र विचरण करने वाला, राजमान्य ।
√●चन्द्र १ में ...
कामी, भ्रमणशील, शूर स्त्रीप्रिय, अतिचपल, सेवानिपुण, स्त्री से पराजित पुत्र युक्त ।
√●भौम १ में...
धन मान सम्पन्न सुन्दर वाणी, तेजस्वी, साहसी, अपराजित, अडिग, धैर्यशील, धर्माभिमुख, राजपुरुष ।
√●बुध १ में...
खल बुद्धि, चञ्चलमन, बहुभोजी, कलह कारक, निर्दय, झूठा, घमण्डी, चोर, कुत्सित ।
√●गुरु १ में ...
अति उदार, उत्तमकर्मा, अति वैभव युक्त, विशाल बुद्धि, शत्रुवान् प्रारब्धवान्, क्षमावान्, यशस्वी ।
√●शुक्र १ में....
परदेश में रुचि, परस्त्री में आसक्ति, आदणीय कवि पर वाहन का सुख भोगवान्।
√●शनि १ में...
धनहीन, दुर्बलदेह, दरिद्री, शांति रहित, मित्रों से वैर, मूर्ख, कपटी, घुमक्कड़, नेत्ररोगी, १ मनोरथ हत ।
√● राहु १ में ...
मतिभ्रम, अनादर, चिन्ता, दुःख ।
√●केतु १ में...
उच्च विचार, गहन चरित्र शोधकार्य में रुचि, श्रेष्ठ, आविष्कारक, अद्भुत चिन्तन।
फलित का एक निश्चित आधार जातक की जन्मराशि भी है। यहां पाठकों
को स्मरण दिला दें कि नामराशि की नहीं, जन्मराशि की बात हो रही है। जातक का नाम जिस अक्षर से शुरू होता है, वह उसकी नामराशि का आधार होता है। किन्त । जन्मकण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में होता है वह जातक की जन्मराशि होती है। उसी के आधार पर जन्म का नाम निकाला जाता है। परन्तु यदि नाम जन्म की राशि के आधार पर नहीं रखा जाए तो बाद में नामराशि भिन्न हो सकती है।
चन्द्रमा मनसो जातः सूत्र के अनुसार चन्द्रमा ही जातक का मन है। अतः।
चन्द्रमा को जन्मकुंडली का बीज माना जाता है। इसलिए जन्मराशि का महत्त्व सहज ही समझा जा सकता है। यहां हम जन्मराशियों का संक्षिप्त फल कहेंगे और फिर नक्षत्रों के आधार पर फलित के सिद्धांतों की चर्चा भी करेंगे। मेष राशि भचक्र का प्रथम खण्ड है (360 के भचक्र को 12 राशियों में बांटा गया है, अतः 30 की एक राशि होती है। यह पाठकों को याद ही होगा। अतः जातक की मेष जन्मराशि होने का अर्थ हुआ कि जातक के जन्म के समय चन्द्रमा भचक्र (आकाश में ग्रहों का परिक्रमा पथ) के प्रथम खण्ड यानी 0-30 के हिस्से में था)।
यद्यपि पाश्चात्य ज्योतिष में यदि जातकों का जन्म 21 मार्च से 20 अप्रैल के मध्य हुआ हो तो उनकी राशि मेष होती है। दरअसल वहां राशि का आधार सूर्य है (मेष राशि का अर्थ सूर्य का भचक्र के प्रथम खण्ड/0-30 के बीच होता है) और क्योंकि सूर्य एक मास (30 दिन) तक एक ही राशि में रहता हैं, अतः उस एक मास में जन्मे सभी जातक तत्सम्बन्धी राशि के ही होते हैं। मगर भारतीय ज्योतिष में जन्मराशि का आधार चन्द्रमा है जो सवा दो दिन में राशि परिवर्तन कर लेता है। अतरू उन सवा दो दिनों में जन्मे जातकों की राशि एक ही होती है। अतः भारतीय पद्धति पाश्चात्य ज्योतिष की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म व सटीक है। शेष कसर लग्न द्वारा पूर्ण हो जाती है। क्योंकि सवा दो दिन तक जन्मे जातकों की राशि भले ही एक हो, उनका लग्न जन्म समय के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। जो फलकथन की दृष्टि से और भी सटीक होता है। बहरहाल-हम यहां भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्मराशि के आधार पर फलकथन कहेंगे।
मेष राशि के जातक आक्रामक स्वभाव के, उत्साही, कर्मठ तथा संघर्षशील होते हैं। कठिनाइयों से जूझकर सफलता प्राप्त करते हैं। ये लोग अपने शौकों को लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते। इनका सिर/माथा बड़ा व मजबूत होता है। इनके चेहरे/माथे सिर पर प्रायः मस्से या चोट का निशान भी होता है। ये जीवट वाले लोग होते हैं। इनको इनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ये लोग कपट से दूर रहते हैं व कपटियों से नफरत भी करते हैं। स्पष्टवादी व साहसी भी होते हैं और कूटनीति से दूर रहते हैं। ये इतने स्पष्टवादी होते हैं कि प्रायः अपने मित्रों/रिश्तेदारों तक को रुष्ट कर लेते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय तथा हुक्म चलाने वाली प्रवृत्ति के होते हैं। अपने जीवनसाथी से भी ये यही आशा करते हैं कि वो उनकी मर्जी/आदेशानुसार चले, ऐसा न हो पाए तो वे जीवनसाथी के प्रति उदासीन हो जाते हैं (चन्द्रमा या सप्तम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो ये जीवनसाथी से तलाक भी ले लेते हैं)।
मेष राशि वाले खर्चीले, महत्वाकांक्षी तथा अति स्वाभिमानी, निडर होते हैं। सामान्यतः छोटे-मोटे रोगों से दूर ये लोग स्वस्थ रहते हैं। मेष राशि की स्त्रियां प्रेम सम्बन्धों में स्वयं पहल करने वाली होती हैं। मेष राशि के जातकों को अपने जीवन में कोई न कोई लक्ष्य सदैव सम्मुख रखना चाहिए इससे उनमें सकारात्मकता, उत्साह व प्रसन्नता बनी रहती है। दूसरों के लिए ये जितना निरूस्वार्थ कार्य करेंगे व सोचेंगे, उतना ही स्वयं इनका सौभाग्य व सुख बढ़ता है। इनका राशीश मंगल होता है।
मेष (1) यह बारह राशियों में पहलो राशि है। इसका अंक । है। जन्मकुंडली में राशियों के नाम लिखकर उनके निर्देशांक लिखने को ही परिपाटी है। अश्विनी नक्षत्र के चार, भरणी नक्षत्र के चार तथा कृतिका नक्षत्र का पहला चरण मिलकर मेष राशि बनती है।मेष राशि भचक्र का प्रथम खण्ड है (360° के भचक्र की 12 राशियों में बांटागया है, अत: 30° की एक राशि होती है। यह पाठकों को याद ही होगा। अतः जातक की मेष जन्मराशि होने का अर्थ हुआ कि जातक के जन्म के समय चन्द्रमा भचक्र (आकाश में ग्रहों का परिक्रमा पथ) के प्रथम खण्ड यानी 0-30° के हिस्से में था)। यद्यपि पाश्चात्य(वेस्टर्न)ज्योतिष में यदि जातकों का जन्म 21 मार्च से 20 अप्रैल के मध्य हुआ हो तो उनकी राशि मेष होती है। दरअसल वहां राशि का आधार सूर्य है (मेष राशि का अर्थ सूर्य का भचक्र के प्रथम खण्ड/0°-30° के बीच होता है) और क्योंकि सूर्य एक मास (30 दिन) तक एक ही राशि में रहता है, अत: उस एक मास में जन्मे सभी जातक तत्सम्बन्धी राशि के ही होते हैं। मगर भारतीय ज्योतिष में जन्मराशि का आधार चन्द्रमा है जो सवा दो दिन में राशि परिवर्तन कर लेता है। अत: उन सवा दो दिनों में जन्मे जातकों की राशि एक ही होती है। अत: भारतीय पद्धति पाश्चात्य ज्योतिष की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म व सटीक है। शेष कसर लग्न द्वारा पूर्ण हो जाती है। क्योंकि सवा दो दिन तक जन्मे जातकों की राशि भले ही एक हो, उनका लग्न जन्म समय के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। जो फलकथन कीदृष्टि से और भी सटीक होता है। बहरहाल-हम यहां भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्मराशि के आधार पर फलकथन कहेंगे।
विशेषताएं
इसे अंग्रेजी में Aries (एरिज) कहते हैं। प्रवासी, धातु संज्ञक यह राशि जहां घातु या रत्न उत्पन्न होते हैं, उस जगह पूर्व दिशा में निवास करती है। यह क्रूर एवं चंचल स्वभावी, चर, युवा, रक्तवर्णी, अग्नितत्त्व युक्त, रात्रिबली, क्षत्रिय जाति की, पृष्ठोदयी, विषम राशि है। यह चतुष्पाद, पर्वताचारी, रजोगुणी, पित्त प्रकृति की है। राशिका निवास पाटल देश है। राशिस्वामी मंगल एवं अंक 1 है। शरीर की हड्डियां, चेहरा, मस्तिष्क एवं स्नायु पर इस राशि का प्रभाव रहता है। मुख्य रूप से वस्त्र एवं अनाज मेष राशि की चीजें हैं। इसके अलावा मेढ़ी, मेढ़ी के ऊन से बने कपड़े या अन्य वस्तु, लाल रंग के धान्य—राई, मसूर दाल, रक्तचंदन, लाल गेहूं एवं भूनिर्मित औषधियां, तांबा, सोना, लोहा एवं मशीनरी ये भी मेष राशि की वस्तुएं हैं। वन, पर्वत, जंगल, बांध आदि से जुड़ी योजनाओं का आधिपत्य इस राशि के अधीन है।मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में इंग्लैंड, डेनमार्क, जर्मनी, स्विटजरलैंड, सीरिया, फ्रांस, पेरु आदि देशों की यह प्रतिनिधि राशि है।
मेष राशि के जातक आक्रामक स्वभाव के, उत्साही, कर्मठ तथा संघर्षशील होते हैं। कठिनाइयों से जूझकर सफलता प्राप्त करते हैं। ये लोग अपने शौकों को लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते। इनका सिर/माथा बड़ा व मजबूत होता है। इनके चेहरे/माथे/सिर पर प्रायः मस्से या चोट का निशान भी होता है। ये स्वेछचारी लोग होते हैं। इनको इनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ये लोग कपट से दूर रहते हैं व कपटियों से नफरत भी करते हैं। स्पष्टवादी व साहसी भी होते हैं और कूटनीति से दूर रहते हैं। ये इतने स्पष्टवादी होते हैं कि प्रायः अपने मित्रों/रिश्तेदारों तक को रुष्ट कर लेते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय तथा हुक्म चलाने वाली प्रवृत्ति के होते हैं। अपने जीवनसाथी से भी ये यही आशा करते हैं कि वो उनकी मर्जी/आदेशानुसार चले, ऐसा न हो पाए तो वे जीवनसाथी के प्रति उदासीन हो जाते हैं (चन्द्रमा या सप्तम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो ये जीवनसाथी से तलाक भी ले लेते हैं)। मेष राशि वाले खर्चीले, महत्वाकांक्षी तथा अति स्वाभिमानी, निडर होते हैं। सामान्यतः छोटे-मोटे रोगों से दूर ये लोग स्वस्थ रहते हैं। मेष राशि की स्त्रियां प्रेम सम्बन्धों में स्वयं पहल करने वाली होती हैं । मेष राशि के जातकों को अपने जीवन में कोई न कोई लक्ष्य सदैव सम्मुख रखना चाहिए इससे उनमें सकारात्मकता, उत्साह व प्रसन्नता बनी रहती है। दूसरों के लिए ये जितना नि:स्वार्थ कार्य करेंगे १ साचग, उतना ही स्वयं इनका सौभाग्य व सुख बढ़ता है। इनका राशीश मंगल होता है। मेष चर एवं अग्नि तत्त्व राशि है। यह पिछले भाग से उदित होने वाली राशि है। दिशा पूर्व, रंग लाल, स्वभाव उग्र तथा प्रभाव गर्म शुष्क है। यह विषम व पुरुष तथा जाति क्षत्रिय है। यह दिन वली और इसका वास पर्वत, वन है। मंगल इसका स्वामी, सूर्य इसमें उच्च का तथा शनि नीच होता है। कद मंझला, शरीर पतला किन्तु सुगठित, रंग गेहुंआ व साफ परन्तु रंगरूप अधिक चिकना चुपड़ा नहीं होता । गला एवं मुंह कुछ लम्बा, भवों पर घने बाल, सिर के बाल कुछ रूखे-रूखे होते हैं। अच्छे दबदबे वाले और दृष्टि तेज़ एवं तीक्ष्ण होती है। यह तेज़ मिजाज, फुर्तीले व क्रोधी होते हैं । यह बहुत महत्त्वकांक्षी होते हैं। इनमें साहस कूट-कूट कर भरा होता है। हिम्मत तथा शक्ति कमाल की होती है। इनका मन अग्रणी होकर काम करने पर प्रसन्न रहता है। यह बड़े निर्माता होते हैं तथा किसी के अधीन रहकर काम करना पसन्द नहीं करते। यह निडर एवं निर्भय भी होते हैं तथा जोखिम के काम बड़ी कुशलता से करते हैं। इन्हें झगड़े, लड़ाई आदि सम्बन्धी पूरा ज्ञान होता है। इनका हृदय विशाल व चित्त उदार होता है। उदारता, निष्काम सेवा इनका आभूषण होता है। क्योंकि चर राशि है, यह परिवर्तनशील होते हैं। यह अपनी बात मनवा कर छोड़ते हैं। यह समझते हैं कि बुद्धि एवं ज्ञान में यह सबसे आगे हैं। यदि मेष राशि वाला क्रोध में आ जाए तो धीरे-धीरे और मुश्किल से ही शांत होता है । इच्छाशक्ति बड़ी प्रबल होती है। जिस कार्य के पीछे पड़ जाएं, पूरा करके ही छोड़ते हैं। स्वतंत्र रूप से कार्य करना ही ठीक समझते हैं। खुशामद इन्हें खूब भाती है तथा आलोचना का बहुत बुरा मानते हैं। हर काम में जल्दबाजी करते हैं और इसीलिए कई बार काम में सफलता भी नहीं होती। कार्य आरम्भ करने में पूरी दिलचस्पी होती है परन्तु अन्त तक पहले जैसी दिलचस्पी नहीं रहती कुल मिलाकर इनमें चतुराई, कुशलता, न्यायिक कुशलता, दृढ़ता एवं दूसरों की -सामना करने का पूर्ण साहस होता है। हिम्मत, उदारता व स्वाभिमान भी कमाल का होता है। धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ कलाकृतियों, सौन्दर्य की परख, राग-रंग, चित्रकारी, सिनेमा आदि से भी प्रेम होता है मेष राशि वाले की खुशामद करके काम निकलवा लेना सरल ही होता है। प्रेम, मित्रता जल्दी करते हैं पर यह स्थाई नहीं होती। मित्र की सहायता तो ये करते हैं किन्तु मित्र इनसे इर्ष्या ही करते रहते है। यही कारण हैं कि वे शत्रु बन जाते हैं परन्तु इनको हानि नहीं होती। विवाह 28 वर्ष से पहले हो जाता है। यदि मंगल व शुक्र की स्थिति ठीक न हो तो 29 वर्ष में विवाह होता है। पारिवारिक एवं सन्तान का दुख कम ही होता है। सन्तान भी कम होती है। पर एक लड़का तो अवश्य होता है। मेष चर राशि है। सैर सपाटा करना पसंद करते है । यात्राएं करनी पड़ती है। दूर- दराज एवं अच्छे-अच्छे स्थानों पर घूमने-फिरने के शौकीन होते है। साहस के कामों में, जैसे सैनिक, पुलिस, हकूमत करना, शासन करना, सर्जन, डाक्टर, मशीन, भट्ठी, लोहा व अन्य धातुएं जलना तथा इंजीनियरिंग में सफलता प्राप्त करते है। ये साधारणतया डाक्टर, पुलिस, व सेना में अधिक ख्याति अर्जित करते हैं। 22-28 वर्ष की आयु तक यह व्यवसाय में लग जाते है। आर्थिक स्थिति परिवर्तनशील होती है। जमीन-जायदाद भी होती है और स्वयं मकान भी बनाते हैं। व्यापार एवं भागीदारी लाभप्रद होती है। खर्चीले भी होते हैं तथा कई बार फिजूल खर्च भी करते हैं। यदि मंगल के साथ बुध हो तो बुद्धि तीक्ष्ण होती है। और कई बार-झूठ भी बोलने लगते हैं। बचपन में प्रगति के कार्यों में रुकावटें तथा कठिनाइयां आती हैं, जिससे बचपन में सुख कुछ कम ही होता है। पढ़ाई में तेज़ होते हैं और खेलों में पूरा भाग लेते हैं । साईंस-तकनीकी-शिक्षा, डाक्टरी एवं फाइन आटर्स में रुचि अधिक होती है। भाई-बहनों का सुख कम ही होता है परन्तु ये इन्हें पूरा सुख देते हैं । मेष अग्रिम, नंबर एक राशि है तथा इसका स्वामी मंगल भाईयों का कारक भी है। इस प्रकार यदि मंगल लग्न में या इसके आस-पास अथवा घर 12 या 2 में होता है तो ये भाईयों में बड़े होते हैं। साधारणतया शरीर-पतला व मजबूत होता है। अतएव इनमें रोग प्रतिरोध सार्थ्य स्वाभाविक होती है। सिर दर्द, बुखार, धस्सल, सिर में चोट, गले के ऊपरी भाग में घाव का निशान, मिरगी, नक्सीर-फूटना, पेट दोष, पैर में सूजन व गैस, ब्लड प्रैशर, शास्त्र तथा अग्नि से भय रहता है। पहले सोचना और फिर काम में हाथ डालने से कई संकट चल जाते हैं। आयु से तीसरे, छठे, नवें, बारहवें, पन्द्रहवें, सोलहवें, अठारहवें, उन्नीसवें, इक्कीसवें, बाइसवें, चौबीसवें, सत्ताइसवें, अट्ठाइसवें, तीसवें, तैंतीसवें, पैंतीसवें, छत्तीसवें, बयालीसवें, पैंतालीसवें आदि वर्ष महत्त्वपूर्ण होते हैं। पढ़ाई, नौकरी, विवाह, सन्तान, उन्नति आदि सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटती रहती हैं। मंगलवार का दिन, लाल रंग तथा 9 की संख्या विशेष शुभ होती है। संख्या 3- 6 ही अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। यदि जन्म तिथि में 3-6-9 अधिक हों तो फिर विवाह में गड़बड़ और गृहस्थ जीवन असुखद भी कई बार हो जाता है।
जातकों का भविष्य
मेष राशि के जातकों के जीवन में धन का अभाव बना रहता है। ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों से इन्हें सहयोग प्राप्त नहीं होता। पुत्रसुख एवं स्त्री समाज के ऊपर रहे इनके प्रभाव के कारण इनकी प्रसिद्धि बढ़ती है। मेष व्यक्ति की आंखें गोल एवं घुटने कमजोर रहते हैं। पानी से हमेशा डर बना रहता है। स्वभाव चंचल एवं प्रवास का शौक रहता है। शरीर के किसी-न-किसी अंग पर, विशेष रूप से आंख पर व्रण पाया जाता है। अल्पाहारी होने पर भी कामपिपासु होते हैं। सच-झूठ बोलने के बारे में बेफिक्री रहती है। कुशल वक्ता एवं अपना काम निकालने में माहिर होते हैं। लाभ-हानि का विचार न करते हुए शीघ्र दूसरों का अनुकरण करने की प्रवृत्ति इनमें रहती है। जातकाभरण के अनुसार मेष राशि का चंद्र जन्मकुंडली में होने पर जातक धनवान, पुत्रवान, कठोर एवं परोपकारी रहते हैं। हर बात कुशलता से संपन्न करने की वृत्ति रहती है। सुशील स्वभावी, श्रेष्ठीजन एवं शासनाधिकारियों से स्नेह भाव रखनेवाले, सद्गुणी, देवी-देवताओं में श्रद्धा रखनेवाले एवं ब्राह्मणों के भक्त रहते हैं। ताम्रवर्णी एवं आंखें बड़ी रहती हैं। कामवासना तीव्र रहती है। घुटने एवं उसके नीचे का हिस्सा दुर्बल रहता है। सिर पर व्रण पाया जाता है। दान-पुण्य में रुचि रहती है। नौकर-चाकर एवं इन पर अवलंबित व्यक्तियों के प्रति सुहृदय रहता है। दो स्त्रियों का सुख या दो विवाह करनेवाले होते हैं। वाद-विवाद, लड़ाई-झगड़ा, मुकदमेबाजी से डरनेवाले होते हैं। जन्म से आयु के 1,7, 13वें वर्षों में ज्वरादि का कष्ट रहता है। आयु के 16वें या 17वें वर्ष में प्लीहा या हैजे की बीमारी होती है, आयु के तीसरे या 12वें वर्ष में पानी से डर रहता है। 25वें वर्ष में संतान का जन्म होता है किंतु नेत्रविकार या रतौंधी का भय रहता है। आयु के 32वें वर्ष में शस्त्र-अस्त्र या किसी दुर्घटना के कारण जख्म होने का भय रहता है। अपने कामों की स्वयं प्रशंसा करने की आदत रहती है। देश-विदेश में घूमने की इच्छा होती है। तेजी से चलने की आदत होती है। मेष राशि के चंद्र पर बुध, शुक्र या बृहस्पति की दृष्टि होने पर 90 वर्ष तक की आयु इन्हें प्राप्त होती है।लोककल्याण की भावना मेष राशि के व्यक्तियों में निहित रहती है। निम्न श्रेणी के मकानों में निवास होता है। उष्ण प्रकृति, ज्वर एवं रक्तपित्त विकारों से पीड़ित, तामसी आहार लेनेवाले, दुर्बल काया, मध्यम ऊंचाई, सिर पर अल्प बाल, उग्र दृष्टि, विद्याध्ययन में श्रेष्ठ, एकांतप्रिय, कामकला प्रवीण, सेवासुश्रुषा करने में चतुर, संतान का अल्प सुख, हर काम को गोपनीय रखने की आदत, कमजोर घुटने, सिर या चेहरे पर व्रण, देव, धर्म उपासना में सामान्य रुचि, अल्पाहारी एवं शाकाहारप्रिय, पिता एवं बंधुओं से पृथक तथा जन्मभूमि से दूर रहनेवाले इस तरह के फलित मेष राशि के व्यक्तियों के बारे मिलते हैं। विशेष परिश्रम करके सुखद जीवन जीने की अभिलाषा मेष राशि के व्यक्तियों में पाई जाती है। मेष राशि के व्यक्तियों के विषय में एक खास बात है कि भविष्य संकेत इन्हें अपने आप मिल जाते हैं। जिससे वे शुभ-अशुभ घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करके सावधान रहते हैं। मेष राशि के व्यक्तियों को यह परमात्मा से मिली भेंट है। दूरदर्शिता, ढाढस एवं समर्थता राशि स्वामी मंगल के कारण इन्हें प्राप्त रहती है। मंगल में गजब की ताकत एवं अद्भुत जादू है। इसके संकेत मात्र से मेष राशि के व्यक्ति मरणावस्था में भी जीने की तमन्ना रखते हैं। पारिवारिक सुख में न्यूनता, व्यर्थ अभिमान, बुलंद आवाज में भाषण देने की कला में प्रवीण, जीवन में कई बार आर्थिक चढ़ाव-उतार एवं धनहानि देखनी पड़ती है। व्यापार-व्यवसाय में असफल होने पर बार-बार व्यवसाय बदलने की प्रवृत्ति भी मेष राशि के व्यक्तियों में पाई जाती है। इन्हें वाहनसुख अच्छा प्राप्त होता है। मेष राशि के व्यक्तियों की कल्पनाशक्ति गजब की रहती है। किंतु किसी-न-किसी चिंता के कारण उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। मेष व्यक्ति के चेहरे, पैरों या बगल में बड़ा तिल या जख्म का चिह्न रहता है। जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएं जीवन के 1,7, 13,21,30,38, 46,52,55,59, 63, 67, 69 वर्षों में कोई-न-कोई विचित्र घटना घटती है। जन्म से 5 वर्षों तक का समय पूरे परिवार के लिए कष्टकारक, 14 से 21 या 23 से 29 वर्ष में विवाह संपन्न होता है। 6 से 13, 17 से 40, 56 से 61 वर्ष प्रगतिकारक रहते हैं। इस कालावधि में व्यवसाय में उन्नति, अच्छा धनलाभ, नौकरी में पदोन्नति, पारस्परिक सद्भावना, पत्नी के साथ सुखी वैवाहिक जीवन, हर प्रकार का वैभवसुख, संपत्ति, स्ववास्तु, वाहन, विदेश प्रवास आदि का सुख प्राप्त होता है। 14 से 22, 42 से 55 एवं 62 से 66 वर्ष अत्यंत दुखदायी एवं कष्टकारक रहते हैं। इस समयावधि में परिवार के महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु, कोर्ट-कचहरी के झगड़े, झूठे लांछन, व्यर्थ खर्च, संपत्तिनाश एवं सिर, पेट, पैर, कान से संबंधित बीमारियां तथा ऑपरेशन जैसी कष्टकारक घटनाओं का क्रम रहता है। 23 से 26 एवं 67 से 69 वर्ष का समय भाग्यवर्धक तथा मन की मुरादें पूरी करनेवाला होता है। परिवार में आनंद, विवाह, भाइयों से मेलमिलाप, मकान की खरीद या मकान बनवाना, व्यापार नौकरी में धनलाभ, स्त्री-पुत्र सुख मिलता है। अनेक स्त्रियों से संबंध, दान पुण्य भी होता है। स्त्री की मृत्यु पति से पहले हो जाती
प्रतिकूलता • हर महीने का शुक्रवार। • हर महीने की 1,6,11,21 तारीखें। • हर साल का अक्तूबर मास। • कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशि के स्त्री-पुरुष। • काले, नीले रंग के वस्त्र एवं अन्य वस्तुएं।
विशेष उपासना
संकट एवं कष्ट के निवारण के लिए मंगल स्वरूप श्री हनुमानजी एवं मंगला गौरी की उपासना श्रेयस्कर रहेगी। अनुष्ठान विधि से 'मंगलागौरी मूलाधार कवच' तैयार करके धारण करें। मूंगा व अन्य लाल रंग के रत्न धारण करना ठीक होता है। अपने पास रत्ता-रंग जैसा लाल रुमाल रखना, मूंगा धारण करने जितना ही फल देता है। मूंगा जो कि 6 रत्ती भर से कम न हो, सोने की अंगूठी में जड़वाकर अनामिका उंगली में (दाएं अथवा बाएं हाथ की) मंगलवार को धारण करना चाहिए। इन मंगलरत्न को मध्यमा उंगली में धारण करें। प्रतिदिन निम्न मंत्र का कम-से- -कम 108 बार जाप करें:
ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।
सर्वस्याति हरे देवि नारायणी नमोस्तुते ॐ॥
मेष राशि या मेष लग्न के व्यक्तियों को पितृदोष के कारण विषमज्वर, अन्य ज्वर, सिरदर्द जैसी शारीरिक पीड़ाएं हों एवं साथ ही भौतिक कष्ट भी हों तो इस करुणाजनक स्थिति से मुक्ति पाने के लिए पितृजनों का श्राद्ध या त्रिपिंडी गया (बिहार) या पुष्कर (अजमेर, राजस्थान) में करें। तीर्थादिक एवं काले तिलों से तर्पण करें। अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष को प्रदक्षिणा दें। घृतचूर्ण-घट का दान करें। ब्राह्मण पूजन करके उन्हें भोजन कराएं। भगवान श्रीनृसिंह की आराधना करें। गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करें।
जन्मराशि की दृष्टि से फलित
फलित का एक निश्चित आधार जातक की जन्मराशि भी है। यहां पाठकों
को स्मरण दिला दें कि नामराशि की नहीं, जन्मराशि की बात हो रही है। जातक का नाम जिस अक्षर से शुरू होता है, वह उसकी नामराशि का आधार होता है। किन्त । जन्मकण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में होता है वह जातक की जन्मराशि होती है। उसी के आधार पर जन्म का नाम निकाला जाता है। परन्तु यदि नाम जन्म की राशि
के आधार पर नहीं रखा जाए तो बाद में नामराशि भिन्न हो सकती है।
___ चन्द्रमा मनसो जातः सूत्र के अनुसार चन्द्रमा ही जातक का मन है। अतः।
चन्द्रमा को जन्मकुंडली का बीज माना जाता है। इसलिए जन्मराशि का महत्त्व
सहज ही समझा जा सकता है। यहां हम जन्मराशियों का संक्षिप्त फल कहेंगे और
फिर नक्षत्रों के आधार पर फलित के सिद्धांतों की चर्चा भी करेंगे।
मेष राशि मेष राशि भचक्र का प्रथम खण्ड है (360° के भचक्र की 12 राशियों में बांटा गया है, अत: 30° की एक राशि होती है। यह पाठकों को याद ही होगा। अतः` जातक की मेष जन्मराशि होने का अर्थ हुआ कि जातक के जन्म के समय चन्द्रमा भचक्र (आकाश में ग्रहों का परिक्रमा पथ) के प्रथम खण्ड यानी 0-30° के हिस्से में था)। यद्यपि पाश्चात्य ज्योतिष में यदि जातकों का जन्म 21 मार्च से 20 अप्रैल के मध्य हुआ हो तो उनकी राशि मेष होती है। दरअसल वहां राशि का आधार सूर्य है (मेष राशि का अर्थ सूर्य का भचक्र के प्रथम खण्ड/0°-30° के बीच होता है) और क्योंकि सूर्य एक मास (30 दिन) तक एक ही राशि में रहता है, अत: उस एक मास में जन्मे सभी जातक तत्सम्बन्धी राशि के ही होते हैं। मगर भारतीय ज्योतिष में जन्मराशि का आधार चन्द्रमा है जो सवा दो दिन में राशि परिवर्तन कर लेता है। अत: उन सवा दो दिनों में जन्मे जातकों की राशि एक ही होती है। अत: भारतीय पद्धति पाश्चात्य ज्योतिष की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म व सटीक है। शेष कसर लग्न द्वारा पूर्ण हो जाती है। क्योंकि सवा दो दिन तक जन्मे जातकों की राशि भले ही एक हो, उनका लग्न जन्म समय के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। जो फलकथन की दृष्टि से और भी सटीक होता है। बहरहाल-हम यहां भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्मराशि के आधार पर फलकथन कहेंगे।
मेष राशि के जातक आक्रामक स्वभाव के, उत्साही, कर्मठ तथा संघर्षशील होते हैं। कठिनाइयों से जूझकर सफलता प्राप्त करते हैं। ये लोग अपने शौकों को लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते। इनका सिर/माथा बड़ा व मजबूत होता है। इनके चेहरे/माथे/सिर पर प्रायः मस्से या चोट का निशान भी होता है। ये जीवट वाले लोग होते हैं। इनको इनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ये लोग कपट से दूर रहते हैं व कपटियों से नफरत भी करते हैं। स्पष्टवादी व साहसी भी होते हैं और कूटनीति से दूर रहते हैं। ये इतने स्पष्टवादी होते हैं कि प्रायः अपने मित्रों/रिश्तेदारों तक को रुष्ट कर लेते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय तथा हुक्म चलाने वाली प्रवृत्ति के होते हैं। अपने जीवनसाथी से भी ये यही आशा करते हैं कि वो उनकी मर्जी/आदेशानुसार चले, ऐसा न हो पाए तो वे जीवनसाथी के प्रति उदासीन हो जाते हैं (चन्द्रमा या सप्तम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो ये जीवनसाथी से तलाक भी ले लेते हैं)।
मेष राशि वाले खर्चीले, महत्वाकांक्षी तथा अति स्वाभिमानी, निडर होते हैं।
सामान्यतः छोटे-मोटे रोगों से दूर ये लोग स्वस्थ रहते हैं। मेष राशि की स्त्रियां प्रेम सम्बन्धों में स्वयं पहल करने वाली होती हैं । मेष राशि के जातकों को अपने जीवन में कोई न कोई लक्ष्य सदैव सम्मुख रखना चाहिए इससे उनमें सकारात्मकता, उत्साह व प्रसन्नता बनी रहती है। दूसरों के लिए ये जितना नि:स्वार्थ कार्य करेंगे १ साचग, उतना ही स्वयं इनका सौभाग्य व सुख बढ़ता है। इनका राशीश मंगल होता है।
मेष- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ
अंक नौ के प्रभाव से आपका निजी जीवन | Number 9 and Your Personal Life
अंत में हम अंक नौ के निजी जीवन के बारे में जानने का प्रयास करते हैं. आप खुशमिजाज व्यक्तित्व के स्वामी होते है और आप रोमांटिक मिजाज के व्यक्ति भी होते हैं. आप भरोसेमंद और विश्वसनीय होते हैं इसलिए लोग आप पर आंख मूदकर भी विश्वास कर लेते हैं.
आप अपने साथी से प्रेम व स्नेह पाने के लिए सदा लालायित रह सकते हैं और अपने साथी को खुश रखने के लिए आप कुछ भी करने को तैयार रह सकते हैं.
आप एक अच्छे साथी सिद्ध होते हैं, लोगो द्वारा आपको पसंद किया जाता है और आपको जिन्दगी में मौज - मस्ती करना अच्छा लगता है हालांकि आपका निजी जीवन ज्यादा अच्छा नहीं होता है. फिर भी आप जिन्दगी को जिन्दादिली से जीना चाहते हैं.
आपके जीवन का आरंभिक समय परेशानियों से घिरा रहता है और आप खुद भी एक हद तक इसके लिए जिम्मेवार होते हैं. बढ़ती उम्र के साथ धीरे - धीरे आपका अवैयक्तिक (impersonal) रुप निखरने लगता है और आपका व्यक्तित्व पहले से सुंदर हो जाता है.
आपके प्रेम संबंध विफल ही रहते हैं लेकिन आप अपनी घरेलू जिन्दगी में एक आदर्श व्यक्ति के रुप में पहचाने जाते हैं. शादी, घर - परिवार व मित्रो के लिए आप आदर्श ही होते हैं. आपके जीवन में कोई भी रिश्ता तभी कामयाब हो सकता है जब आप उसके साथ अपना गहरा लगाव न रखें.
ईश्वर की कृपा से आपको जीवन में स्वत: ही बहुत सारे अवसर मिलते हैं और लोगो का सहयोग मिलता है जो आपको आगे बढ़ने के लिए सहायक होते हैं. आप अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्य से प्रभावित रहते हैं विशेषतौर से अपने पिता से. आप उनके गुण तथा अवगुण दोनो से ही प्रभावित होते हैं.
