रेवती नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

 रेवती नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

राशि चक्र मे 34640 से 36000 के विस्तार का क्षेत्र रेवती नक्षत्र कहलाता है। अरब मंजिल मे इसे अल बत्न अल हुत अर्थात मछली का पेट, ग्रीक मे पिसियम, चीनी सियु मे गोई कहते है। रेवती का अर्थ धनवान या प्रचुर होता है। इसके देवता पूषा या पूसवन  आकाश मे आरम्भ से अंत तक हमेशा चलायमान रहते है।  रेवती नक्षत्र में जन्मे जातक मे जातक सर्वगुणसंपन्न,सुंदर एवं प्रियभाषी होते हैं। उनका मन उदार एवं विवेक उत्तम रहता है। जीवन में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। हमेशा नए-नए कामों में रुचि लेने की प्रवृत्ति रहती है। मनोत्साह एवं उत्साह वृद्धि भगवान की देन है। ये धनवान, जितेंद्रिय, तीव्र बुद्धि के एवं नित्य नई बात की शोध में रहते हैं। रेवती नक्षत्र गंडमूलक नक्षत्र है। रेवती नक्षत्र-भचक्र पर अन्तिम/सत्ताईसवां नक्षत्र रेवती है (अभिजित् की गणना करना वाले इसे 28वां नक्षत्रं कहेंगे)। यह नक्षत्र सम्पूर्ण रूप से मीन राशि क्षेत्र में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र से अगले 13-20’ क्षेत्र में स्थित है। इस नक्षत्र के तारों की संख्या 32 है जो एक मछली या मृदंग की आकृति बनाते हैं (इसीलिए इस नक्षत्र के अंतर्गत आने वाली राशि को ’मीन’ कहते हैं)। इन तारों में 3 प्रमुख कहे गए हैं। इस नक्षत्र के देवता ’पूषा’ नामक वैदिक देवता हैं, जिन्हें सूर्य का ही एक रूप विशेष भी माना जाता है। इस नक्षत्र के स्वामी बुध हैं।

     (भचक्र 360 का है। इसे 12 राशियों में 30 की प्रति राशि के गणित से तथा 27 नक्षत्रों में 13-20’ प्रति नक्षत्र के गणित से बांटा गया है। अतः रेवती नक्षत्र के साथ ही भचक्र के 360 पूर्ण हो जाते हैं। पाठकों की सुविधा के लिए पूर्ववर्णित इस तथ्य को पुनः संक्षेप में दोहरा दिया है।)

     रेवती नक्षत्र में उत्पन्न होने वाला पुरुष जातक साधु प्रवृत्ति का, विद्वान, सात्विक तथा सज्जन होता है। यह स्वस्थ, पवित्र मानसिकता वाला, धन-संपत्ति से युक्त होता है।

     रेवती नक्षत्र में जन्मी महिला जातक समाज द्वारा पूजित, शुद्ध स्वभाव की, व्रत उपासना में लगी रहने वाली, तेजपूर्ण, शत्रुहीन, सुंदर तथा नौकर एवं वाहनों से युक्त होती है। परन्तु इसे अनेक प्रकार के रोग सम्भावित होते हैं।रेवती नक्षत्र का पहला चरण सुख एवं राज सम्मान दिलाता है। दूसरा चरण मंत्रीपद दिलाता है। तीसरा चरण धन सुख में वृद्धि करता है तो चौथा चरण विविध दृष्टि से कष्टप्रद, चिंताकारक एवं अरिष्टप्रद रहता है। रेवती नक्षत्र में जन्मे जातकों को अपने जीवन में कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। वैवाहिक जीवन में विलंब से यश मिलता है किंतु वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। संतान सुख उत्तम रहता है। इनकी वजह से ससुराल पक्ष को कष्ट पहुंचता है एवं उनसे अच्छा मेल-मिलाप नहीं रहता। प्रकाशक, संपादक, धार्मिक कार्य करनेवाले तथा वकील, शेयर विक्रेता, सलाहकार, प्राध्यापक, उद्घोषक, कुलपति, पंडित, व्यंग्य लेखक, बैंक अधिकारी, ज्योतिषी, हस्तरेखा विशेषज्ञ के रूप में ख्याति और यश प्राप्त करते हैं। स्त्री: रेवती नक्षत्र में जन्मी महिलाएं सुंदर, अनेकों से मैत्री रखनेवाली, मधुर स्वभाव की, पतिव्रता, ईश्वर में निष्ठा रखनेवाली, पूर्ण विचार के बाद कार्य करनेवाली तथा लोकप्रिय होती हैं।

देवता पूषा या पूषन, स्वामी गृह बुध, राशि मीन 1640 से 3000 अंश। भारतीय खगोल में यह 27 वा अंतिम नक्षत्र मृदु गण्ड संज्ञक नक्षत्र है।  यह एक धनाढ्य नक्षत्र है। इसके 12 तारे है। घनिष्ठा की भाति और वराहमिहिर बृहत्संहिता अनुसार  इसके 32 तारे मृदंग के आकार मे है। इसी से इसे मुरज सदृश्य कहा है। तारो की संख्या से उसके आकार कोई फर्क नही होता है। यह शुभ, सात्विक, स्त्री नक्षत्र है। इसकी जाति शूद्र, योनि गज, योनि वैर सिंह, देव गण, नाड़ी आदि है। यह पूर्व दिशा का स्वामी है।

प्रतीकवाद - इसके देवता पूषा या पूषन (सूर्य) 11 वे आदित्य है। ये समागम के देवता यात्रा, मार्ग, विवाह, पशुओ के भोजन के जिम्मेदार, यात्रिओ की डाकुओ और जंगली जानवरो से सुरक्षा और मनुष्य को शोषण से मुक्ति के देवता माने जाते है। पूषा गतिविधि के प्रतीक, मनुष्य के फलने-फूलने के कारक है। ऋग्वेद की 8 ऋचाओ मे इनका वर्णन है, कुछ मे इन्हे पशुओ का संरक्षक माना है। इनके महर्षि गौतम, यश सुरुचि, गन्धर्व सुसेना, अप्सरा धर्ताची, नाग धनञ्जय है।

तैत्तिरीय सन्हिता, रामायण, महाभारत और अन्य पुराणो अनुसार शिव यज्ञ से वंचित किये गये, इस कारण वे क्रोधित होकर यज्ञ स्थल पर गये और यज्ञ की आहुति लेने वाले पूषा को लात मार कर खट-खटया जिससे उनके दांत टूट गए और पूषा को शिव के कोप का भाजन होना पड़ा पर पूषा शांत रहे।

विशेषताएं - यह पोषक व रक्षक नक्षत्र माना जाता है। मुहूर्त ज्योतिष अनुसार यह एक मीठा और नाजुक होने से संगीत, आभूषण का नक्षत्र है। यह यात्रा और पुनर्जन्म का कारक है।  जातक का प्रारम्भिक जीवन निराश और कष्टमय होता है इसलिये वे धैर्यवान होते है।  बाल्यावस्था के रोग होते है। जातक जल प्रिय, जलीय वस्तुओ से लाभी, अटूट ईश्वर भक्त होता है।

रेवती नक्षत्र विभूतियाँ

भारत रत्न नोबल पुरस्कृत रविंद्रनाथ टैगोर का रेवती द्वितीय चरण जन्म नक्षत्र था।

रेवती नक्षत्र फलादेश

नक्षत्रावली का अंतिम 27 वा रेवती नक्षत्र अंतिम यात्रा या इस जीवन से नए जीवन या पुनर्जन्म का द्योतक है। इसके देवता पूषा विपुल उपज, पोषण के कारक है।  सन 572 तक वसंत सम्पात का प्रारम्भ रेवती नक्षत्र से होता था। यह उस समय तक वसंत सम्पात से केवल 10' पश्चिम में था।

जातक देखभाल प्रिय जबाबदार प्यारा मित्र होता है। यह सगा की तरह दूसरो, बच्चो और पशुओ का फिक्रमंद, पशुओ का स्नेही, मानवता और समाज प्रिय, ईर्ष्या या तुच्छ भावना हीन, ललित कला प्रेमी, परस्पर निर्भर, बचपन मे निराश लेकिन बाद मे धैर्यवान और क्षमावान, जलप्रिय, जलीय वस्तुओ से लाभी, ईश्वर भक्त, सर्व अंग पूर्ण, पवित्र, कार्य समर्थ, साधु, धन-धान्य युक्त होता है।

पुरुष जातक - यह सुगठित शरीर, थोड़ा लम्बा, समतीय अववय वाला होता है। रेवती उत्पन्न जातक व्यवहारी, चतुर, साफ दिल वाला, मृदुभाषी, दूसरो पर अनावश्यक ध्यान नही देने वाला, स्वाधीन, रूकावट आने पर घायल, बात को अधिक गुप्त नही रखने वाला, आसानी से विश्वास नही करने वाला, विश्वास कर लेने पर आसानी से नही छोड़ने वाला होता है।

जातक महाक्रोधी, योजना को तनिक असफल होने पर परेशान,  भीरु, ईश्वर धार्मिक, ईश्वर कृपा पात्र होता है।  अपनी अंतरंग की आवाज अनुसार कार्यशील, अपने सिद्धान्तो का अनुशरणी, अंधविश्वासी, रूढ़िवादी सिद्धांतो और संस्कृति का पालक होता है।

जातक वैज्ञानिक हल व  ऐतिहासिक शोध और प्राचीन संस्कृति मे रुचिवान, चिकित्सक, ज्योतिषी, शासकीय सेवा में शीघ्र सफल, विदेशवासी, स्व प्रयन्त से उन्नत, व्यवसाय मे परिवर्तनशील होता है। इसके 23 वा 26 वा वर्ष शुभ होते है।  26 से 42 वर्ष तक मानसिक परेशानी, आर्थिक चिंता, सामाजिक बाधा रहती है।  50 उम्र वर्ष पश्चात जीवन स्थिर होता है। इसे निकटस्थ या पिता या रिश्तेदार से किसी प्रकार की मदद नही मिलती है। दाम्पत्य जीवन विशेष सुखद नही होता है।

स्त्री जातक - स्त्री जातक मे पुरुष जातक से निम्न अंतर होते है।

1 यह अत्यंत सुन्दर होती है।  हजारो मे चुंबकीय आकर्षण के कारण आसानी से पहचानी जाती है।

2 यह कुछ दुराग्रही, दूसरो पर हुक्म चलाने वाली, अत्यधिक अंध विश्वासी होती है।

3 इसकी शिक्षा साहित्य, कला, गणित मे होती है। यह दूरभाष चालक, टंकणकर्ता, अध्यापिका, शुभ ग्रहो के प्रभाव से राजदूत, राजनैतिक या सांस्कृतिक राष्ट्र प्रतिनिधि होती है। दाम्पत्य जीवन सुसंगत होता है।

आचार्यो अनुसार रेवती नक्षत्र फलादेश

रेवती नक्षत्र मे जातक सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व वाला, कलह प्रिय होता है। यह बात-बात पर लड़ पड़ने वाला होता है। ऐसे लोगो को दुगर्वित कहते है, अर्थात वृथा गर्व करने की इनकी आदत होती है। इनमे कामुकता प्राय अमर्यादित होती है। यदि रेवती नक्षत्र का चन्द्रमा पंचम स्थान मे हो, तो इनकी पुत्रो की चाह केवल चाह ही रह जाती है। ये निष्फल प्रयन्त करने वाले सांसारिक व्यवहार  मे अनाड़ी ही होते है। ये जीवन भर प्रयास करते रहते है और असफलता का दोष किस्मत को देते रहते है। - नारद

उपरोक्त तथ्यो के अलावा पराशर मतानुसार आमदनी से ज्यादा खर्च करना इनकी आदत होती है।  ये घूमने-फिरने के शौकीन होते है। ये अच्छे खानदान से सम्बन्ध रखते है परन्तु ये भी वैसे ही हो यह जरुरी नही है। पंचम स्थान के अलावा अन्यत्र चन्द्रमा हो, तो पुत्र संतति होती है। जीवन मे सम्पत्ति भी जूटा लेते है। - पराशर

मीन अंतिम नवमांश का चन्द्रमा होने पर गण्डान्त प्रभाव उत्कट होता है। गण्डान्त प्रभाव इतना प्रबल होता है कि वह वर्गोत्तमी होने पर भी जीवन असफल और जीवन संशय देखा जाता है। शास्त्रो में रेवती का जो शुभ फल कहा है वह गण्डान्त के अतिरिक्त समझना चाहिये।

चंद्र : चंद्र यदि रेवती मे हो, तो जातक नम्र, देखभाल करने वाला, फिक्रमंद, सामाजिक, मानवता और समूह प्रेमी, पोषक, एक से प्रेम करने वाला, आध्यात्मिक, बचपन मे निराश बाद मे धैर्यवान होता है। इस जन्म के कर्म से पुनर्जन्म मे सबकी देखभाल करने वाला होता है।

जातक स्वतंत्र, महत्वाकांक्षी, प्राचीन संस्कृति मे रुचिवान, पालतू जानवर और पशु प्रेमी, साहसिक, विदेशी जमीन पर सफल, सुखी दाम्पत्य जीवन, सुगठित शरीर होता है।

वरःमिहिर अनुसार चंद्र प्रभाव सुखद मुखड़ा, धन, सौभाग्य, नायकवाद का कारक है।

सूर्य : रेवती नक्षत्र मे सूर्य हो, तो जातक कलाकार, संवेदनशील, शंकालु, विनोदी, अप्रत्याशित प्रसिद्ध, राजनीति विज्ञान प्रेमी, यात्रा प्रेमी, परिवर्तनशील, दार्शनिक होता है।

लग्न : यदि लग्न रेवती मे हो, तो जातक अमीर, हिम्मतवाला, अहंकारी, नेतृत्त्व योग्य, आकर्षक और स्वच्छ, सामाजिक, मित्रवान, अच्छा मेजबान, दीर्घायु, अच्छा प्रेमी होता है।

रेवती चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है।  इसमे गुरु, बुध गुरु का प्रभाव है। मीन 34640 से 35000 अंश। नवमांश धनु। यह आशावाद, मानववाद, विश्वप्रेम, शासक स्वाभाव का द्योतक है। जातक अंग मे दोष, छोटी नासिका, टेड़ा मुख, कोमल, साहसी, गुणवान, प्रसिद्ध, अभिमानी निपुण होता है।

इस पाद मे जातक  व्यावसायिक विकास का प्रदर्शनकारी, आध्यात्मिक, राह छोड़कर दूसरो की मदद करने से गलत समझा जाने वाला होता है, इसे यह आदत छोड़ना चाहिये।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे गुरु, बुध शनि  का प्रभाव है। मीन 35000 से 35320 अंश। नवमांश मकर। यह आधुनिक विज्ञान, युक्ति, संस्था या संगठन, अति महत्वाकांक्षा का द्योतक है। जातक अभिमानी, हठी, श्रेष्ठ, नास्तिक, सचिव या सलाहकार, मंत्री, बलवान, दुःखी, धूर्त, दुविधाग्रस्त होता है।

जातक प्रायोगिक, लक्ष्य उन्मुख, जीवन को चरम सीमा तक जीने वाला, ईच्छा को पूरी करने वाला, संतुलित स्वभाव वाला, पराधीन कार्य करने के बजाय स्वतंत्र काम करने की अधूरी इच्छा रखने वाला होता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे गुरु, बुध शनि    का प्रभाव है। मीन 35320 से 35640 अंश। नवमांश कुम्भ। यह मानववाद, बोहेमिया का द्योतक है।  जातक लम्बा, बड़ा सिर, दुबला व सुस्त, रूखे नेत्र व केश, आलसी, पुत्र सुख से हीन,  लड़ाई-झगड़ा पसंद होता है।

इस पाद मे जातक सीमा से पार जाकर मदद करने वाला होता है, इस कारण लोग इसका दुर्पयोग करते है तथा सहायता जारी रखने से दाम्पत्य जीवन मे कलह होता है।

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे गुरु, बुध गुरु का प्रभाव है। मीन 35640 से 36000 अंश। नवमांश मीन। यह स्वप्न और संचार का द्योतक है। यह ठिगना, दीर्घ वक्ष, कान, नाक वाला, कोमल, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, गुणवान, यशस्वी होता है।

जातक दिन मे स्वप्न देखने वाला, जीवन मे असफल, अस्थिर, शीघ्र भ्रमित होने वाला होता है। यह चरण किसी भी अर्थो मे शुभ नही होता है।

आचार्यो ने नक्षत्र चरण फल सूत्र रूप मे कहा है लेकिन अंतर बहुत है।

यवनाचार्य : रेवती के पहले  चरण मे जातक ज्ञानी, दूसरे चरण मे तस्कर, तीसरे चरण मे युद्ध विजयी, चौथे चरण मे क्लेशभागी होता है।

मानसागराचार्य :  रेवती के प्रथम चरण मे कपटी, द्वितीय चरण मे निर्धन, तृतीय चरण मे भाग्यवान, चतुर्थ चरण मे क्लेशहीन होता है।

भारतीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की आपसी कोई दृष्टि नही होती है क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नहीं हो सकते है।

रेवती ग्रह चरण फल

सूर्य :

रेवती सूर्य पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक सुन्दर और आकर्षक होता है।

रेवती सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक सुरक्षा अधिकारी, सेना या पुलिस मे होता है।

रेवती सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक प्रशासक, सचिव होता है।

रेवती सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक निष्ठुर, दयाहीन, कुसंगति मे होगा।

रेवती सूर्य चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व वाला, घूमने-फिरने का शौकीन, अप्रत्याशित प्रसिद्ध, राजनीति विज्ञान प्रेमी, विनोदी लेकिन शंकालु, दार्शनिक, दूसरो का धन हड़पने वाला, स्त्री लोलुप नही होता है।

द्वितीय व चतुर्थ चरण - जातक सांसारिक व्यव्हार मे अनाड़ी, दुगर्वित अर्थात वृथा गर्व करने वाला, यात्रा प्रेमी, संवेदनशील, बात-बात पर शंका करने वाला और झगडे पर आमादा होने वाला होता है।

तृतीय चरण लग्न हो और चित्रा नक्षत्र मे चंद्र  तथा रोहिणी मे शुक्र हो, तो जातक अपने ही घर मे पत्नी द्वारा मारा जाता है।

चन्द्र :

रेवती चन्द्र पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक राजसी थाट - बाट युक्त, प्रसिद्ध होगा।

रेवती चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक साहसी, सुरक्षा संस्थान मे नियुक्त होगा।

रेवती चन्द्र पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक शिल्पकार कुशल ज्योतिषी होगा।

रेवती चन्द्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक सुन्दर व्यक्तित्व, उच्च स्थति वाला होगा।

रेवती चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक धार्मिक, नेक, संतति युक्त होगा।

रेवती चन्द्र पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक क्रूर लेकिन धर्म शास्त्रो का विद्वान् होगा।

रेवती चंद्र चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक सुगठित देह वाला, देखभाल करने वाला, फिक्रमंद, बचपन मे निराश किन्तु उम्र अनुसार धैर्यवान, एक से प्रेम करने वाला, पूर्व कर्मानुसार इस जन्म मे देखभाल करने वाला होता है।  यदि पंचम स्थान मे चन्द्रमा हो, तो पुत्र की चाह केवल चाह बनकर रह जाती है, बुद्धि भ्रमित हो जाती है जिससे जातक संसारिक व्यवहार मे अनाड़ी बन जाता है।

द्वितीय और चतुर्थ चरण - जातक महत्वाकांक्षी, पालतू जानवर और पशु प्रेमी, विदेशी जमीन पर सफल, प्राचीन संस्कृति मे रुचिवान, स्वतंत्र होता है।  कोई-कोई जातक रंज, रुदन, हाय-कलाप, संताप करने वाला होता है।

मंगल :

रेवती मंगल पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक दुनिया द्वारा सम्मानी, भाग्यशाली मगर क्रूर व्यवहारी होता है।

रेवती मंगल पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक अपंग, विद्वान, बुद्धिमान होता है।

रेवती मंगल पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक कलाविद, कई विषयो मे पारन्गत होता है।

रेवती मंगल पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक सुखी, संपन्न, दयावान होगा।

रेवती मंगल पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक वासना युक्त, कामी, दानी होगा।

रेवती मंगल पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक आवारा और दूसरो पर आश्रित होगा।

रेवती मंगल चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक बात-बात पर लड़ पड़ने वाला, वृथा गर्व करने वाला, कलह प्रिय, भूमि से लाभी, स्वस्थ, चालक चुस्त होता है।  कोई-कोई जातक पुत्र या संतान विहीन होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक तीव्र कलहगारी, लड़ने पर आतुर, पर स्त्री या नगरवधू से सम्बन्ध रखने वाला, पुत्र विहीन, खर्चीला, घुमक्कड़, तुच्छ भावना रखने वाला होता है।

बुध :

रेवती बुध पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक विख्यात लेखक, मिलनसार, विश्वासपात्र होता है।

रेवती बुध पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक कठोर वाणी वाला, अप्रसिद्ध लेखक होता है।

रेवती बुध पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक कुलीन, उच्च स्तरीय राजनीतिज्ञ, बुद्धिमान होता है।

रेवती बुध पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक धूर्त, निर्दयी पुरुषत्व हीन होगा।

रेवती बुध चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, सुरुचि पूर्ण वक्तित्व वाला, गर्वित, देखभाल करने वाला, जबाबदार, पालन करने वाला, जलप्रिय और जलीय वस्तुओ से लाभ प्राप्त करने वाला, बचपन मे निराश होता है।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक सर्वांग पूर्ण, वृथा गर्व करने वाला, फिक्रमंद, उम्र अनुसार धैर्यवान और क्षमावान, साधु स्वभाव वाला,  कार्य समर्थ होता है।

गुरु :

रेवती गुरु पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक सबके द्वारा नापसंद किया जायगा और निर्धन होगा।

रेवती गुरु पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक भाग्यवान, ऐशो-आराम युक्त सुखी जीवन जीने वाला होता है।

रेवती गुरु पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक समस्या उत्पन्न करने वाला, शत्रुओ से घायल होता है।

रेवती गुरु पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक योग्य मंत्री या मंत्री के समकक्ष होगा।

रेवती गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक दीर्घायु, भाग्यशाली, वैभव शाली होगा।

रेवती गुरु पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक चीजे चुराने वाला, त्यागा हुआ होगा।

 रेवती गुरु चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, अकारण अपने पर गर्व करने वाला, राजा सरीखा, जलप्रिय, जलीय वस्तुओ से लाभ प्राप्त करने वाला, परस्थिति अनुसार व्यवहार कुशल, विश्वास कर लेने पर हमेशा विश्वास बनाये रखने काबिल, साफ दिल वाला, बात को अधिक समय गुप्त नही रखने वाला होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक अनावश्यक घमंड करने वाला, अपने मे फुला नही सामने वाला, अविश्वासी, रूकावट आने पर घायल, महाक्रोधी, महत्वाकांक्षी, विचारो या योजना को असफल होने पर परेशान, सिद्धान्तो  का अनुशरणी होता है।

अन्यत्र - तृतीय चरण मे जातक धार्मिक और सामाजिक होगा, लम्बी यात्राए करेगा, साहित्य का लेखक होगा, गुप्तोपासना प्रेमी होगा, विदेश मे जीवन व्यापन करने वाला होता है।

शुक्र :

रेवती शुक्र पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक वैभवशाली होगा।

रेवती शुक्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक वाहनादि युक्त होगा।

रेवती शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक एक से अधिक विवाह करेगा।

रेवती शुक्र पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक हर प्रकार सुखी होगा।

रेवती शुक्र चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व वाला, जबाबदार, प्यारा मित्र, गर्वीला, मानवतावादी, परस्पर निर्भर, ललित कला प्रेमी, विदेशवासी, ईश्वर भीरु होता है। जातक वैज्ञानिक हल, ऐतिहासिक शोध, प्राचीन संस्कृति ज्योतिष और खगोल मे रुचिवान और इन तीनो मे विशिष्ट होता है।

प्रथम चरण मे चित्रा लग्न हो, तो स्त्री जातक अत्यंत सुन्दर, पति की प्यारी, सुसराल मे नगीना होती है।

चतुर्थ चरण मे गुरु की युति हो और कृतिका द्वितीय चरण मे चन्द्र हो, तो जातक उच्चतम राजनैतिक पद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, या विपक्षी दल का नेता होता है। यह कहा जाता है कि उसकी चलती सेना की धूल सूर्य  को ढक कर सूर्यास्त होने का भ्रम पैदा कर देगी जिससे कमल भी अपनी पंखुडिया समेट लेगा।

द्वितीय और तृतीय चरण चरण - जातक प्रायः अमर्यादित कामुकता वाला, सांसारिक व्यवहार से पराङमुख होने के कारण साधु स्वभाव वाला, पुत्र विहीन, जीवन भर फूटे बर्तन मे पानी भरते रहने वाला और किस्मत को कोसने वाला होता है।

द्वितीय चरण मे हस्त नक्षत्र लग्न हो, तो स्त्री जातक मनमोहक चेहरे के साथ अत्यंत सुन्दर, धन-सम्पति और आभूषणाे से संपन्न, ललित कलाओ मे रुचिवान, पति बहुत प्रसिद्ध होता है।

शनि :

रेवती शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक ईश्वर पदत्त सभी सुखो से युक्त होगा।  

रेवती शनि पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक परिवार से सुखी, मातृ प्रेमी होगा।

रेवती शनि पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक निर्दयी, निष्ठुर, सजा प्राप्त होगा।

रेवती शनि पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक प्रतिष्ठित मन्त्री या उच्च पद पर होगा।

रेवती शनि पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक प्रज्ञ, अन्वेषक, नीतिज्ञ होगा।

रेवती शनि पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक जिम्मेदार, धनवान होगा।

रेवती शनि चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, अपनी बातो पर गर्व करने वाला, संतान या पुत्र विहीन, निष्फल प्रयत्न करने वाला, भाग्य पर निर्भर होता है।

अन्यत्र - प्रथम चरण मे हस्त लग्न होने पर विवाह विलम्ब से होगा पुरुष अथवा स्त्री जातक का जीवन साथी अधिक उम्र का होगा, दोनों निराशावादी होने से आपस मे सामंजस्य नही होगा।

अन्यत्र - चतुर्थ चरण मे जातक सौन्दर्य प्रसाधन, संगीत, इलेक्ट्रोनिक माध्यम, चित्रकारी अथवा आभूषणो के माध्यम से आजीविका करेगा, उसकी स्मृति अच्छी और कार्य सुव्यवस्थित होगा।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक कलह प्रिय, पुत्र की चाह करने वाला, व्यवधानो या अड़चनो से शीघ्र परेशान होने वाला, पशु प्रेमी तथा पशुओ को पालने वाला, आसानी से विश्वास नही करने वाला और विश्वास कर लेने पर आसानी से नही छोड़ने वाला होता है।

अन्यत्र - जातक भूगर्भशास्त्री, खनिज विज्ञानी, गणितज्ञ, गणक या सांख्यकी, व्यवहारी और ओजस्वी वक्ता  होता है। यह नौवहन, पर्यटन, मनोरंजन या सिनेमा घरो से कमायेगा।

रेवती राहु चरण फल - जातक कलह प्रिय, धन नाशक, व्यर्थ खर्च करने वाला, संसारिक व्यवहार से विमुख, सन्यासी प्रवृत्ति वाला, विदेश यात्रा करने वाला या विदेश वासी, फटेहाल रहकर किस्मत पर रोने वाला होगा।

रेवती केतु फल - जातक बात-बात पर झगड़े पर आमादा, जल जनित रोगो से ग्रस्त, कफ-वायु व्याधि से पीड़ित, संतान विहीन, अधिक समय बात को गुप्त नहीं रख सकने वाला, जीवन मे अड़चनो से व्यथित, निराश होगा।

जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।

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