उत्तराषाढ़ा नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

 उत्तराषाढ़ा नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

 अगस्त्य और समुद्र : पौराणिक आख्यान अनुसार ऋषि अगस्त्य ने समुद्र को चुल्लु मे भरकर पी लिया था। वास्तव मे अगस्त्य के उदय होने पर जलशोष या वर्षा ऋतु समाप्त हो जाती है। यह दक्षिणी आकाश में सबसे चमकीला तारा है। होली के आस-पास इस तारे को दक्षिणी आकाश मे स्पष्ट देखा जा सकता है। यह 53 अंश दक्षिण की ओर स्थति के कारण है।

दक्षिण भारत, श्रीलंका मे अगस्त्य को पूजा जाता है। प्रसिद्ध दक्षिण भारत मंदिरो के मुख्यद्वार (गोपुरम) या दीवारो पर इसकी मूर्ति देकने मे आती है। वास्तव में दक्षिणी सागर मे इसकी स्थति होने के कारण इनका दक्षिणी यात्रा का आख्यान और वर्षा समाप्ति कारक अर्थात जल शोषक होने से इन्हे समुद्र सुखा देने वाला आख्यान गड़ा गया होगा। इस तारे की पूजा का प्रचलन यूनान मे भी था। वराहमिहिर ने इसके उदय समय पर पूजा की विधि बताई है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र-यह इक्कीसवां नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र से अगले 1320’ में स्थित है। इसका प्रथम चरण धनु राशि में ही पड़ता है किन्तु शेष तीन चरण मकर राशि में स्थित हैं। इस नक्षत्र के 3 तारे मिलकर हाथी/मंच जैसी आकृति बनाते हैं (दरअसल बड़े नक्षत्रों को पूर्व तथा उत्तर दो भागों में बांटा जाता है। अतः पूर्ण आकृति तो दोनों भागों के सभी तारों को मिलाकर देखी जाती है। जैसे पूर्वाषाढ़ा के तारों की आकृति हाथी के दांत की तरह मानें तो उसके पिछले भाग उत्तराषाढ़ा को हाथी की भांति मानेंगे अन्यथा पहले को शय्या की भांति मानें तो दूसरे को मंच की भांति मानना होगा)।

     उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के देवता विश्वेदेवा नामक वैदिक देवता हैं और इस नक्षत्र के स्वामी सूर्य हैं। (अनेक स्थानों पर विश्वेदेवा को सूर्य का ही एक रूप माना गया है।)

     उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जन्मा पुरुष जातक शरीर से पुष्ट, धर्मात्मा, धनी, अधिक मित्रों व परिजनों से युक्त, श्रेष्ठकर्मा तथा संतान एवं गृहस्थी के सम्पन्न होता है।

     उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जन्मी स्त्री जातक बहुत सुन्दर, अग्रणी, धन-धान्य सम्पन्न, संतुष्ट चित्त वाली, पति की प्यारी तथा समाज/कुल में प्रधान होती है।

उत्तराषाढ़ा

राशि चक्र मे 26640 से 28000 अंश के विस्तार का क्षेत्र उत्तराषाढ़ा नक्षत्र कहलाता है। अरब मंजिल मे यह अल बल्दाह अर्थात शहर, ग्रीक मे सजिटारी, चीनी सियु मे यह तोउ कहलाता है। उत्तर का अर्थ बाद मे और अषाढा का अर्थ अविजित या अशांत है। उत्तर अषाढ़ नक्षत्र मे चार तारे पलंग के आकार मे है। इसके देवता विश्वदेव अर्थात देव समूह है। मष्तिष्क की कोशिकाऐं आकाश के तारे की भांति होती है जिन्हे विश्वदेव कहा जाता है। दूसरे शब्दों मे विश्वदेव मस्तिष्क की कोशिकाओ पर नियंत्रण करते है।

देवता विश्वेदेवा या विश्वदेव, स्वामी ग्रह सूर्य, राशि धनु 2640 से मकर 1000 अंश। यह भारतीय खगोल का 21 वा ध्रुव संज्ञक नक्षत्र है। यह शुभ, वृद्धिकारक, राजसिक, स्त्री नक्षत्र है। इसकी जाति क्षत्रिय, योनि नकुल, योनि वैर सर्प, गण मनुष्य, नाड़ी मध्य है। यह दक्षिण दिशा का स्वामी है। इसके दो तारे है। यह भी अपराजित नक्षत्र कहलाता है। इसके दो तारे है जो देखने मे ऐसे प्रतीत होते है मानो चारपाई के चौड़े वाले भाग से हम चारपाई को देख रहे हो। एक स्थान पर इसे श्रृंगारी व्यक्ति के रूप में पहचाना गया है।

प्रतीकवाद : इसके देवता विश्वेदेवा या विश्वदेव एक देवता नही है परन्तु देवता का समूह है। ऋग्वेद की लगभग 40 ऋचाओ मे इस देवता का वर्णन है। ऋग्वेद 3 54 17 मे सभी देवताओ काे इन्द्र मे समाविष्ट माना है। वैदिक युग 1500 - 900 ई. पू. सुर और असुरो का कोई विरोधाभास नही था और सभी देव माने जाते थे। जैसे मित्र (सुर) और वरुण (असुर) इनमे अग्नि, इन्द्र, विश्वदेव, मरुत, मित्र, अश्विन और वरुण प्रमुख है, अन्य उषा, सविता, अप्रिस, पृथ्वी, प्राजन्य, सूर्य और अत्रि है।

कालान्तर मे हिन्दुत्व (हिन्दू युग 900 - 500 ई. पू.) मे नौ गण देवता (आदित्य, विश्वदेव, वसुनिल, आभासुर, तुषिता, महाराजिक, साध्य और रूद्र) को मानते थे। विष्णु पुराण अनुसार ये विश्वदेव विश्वा (यक्ष की पुत्री) के पुत्र थे। ये क्रमशः 1 वसु, 2 सत्य, 3 क्रतु, 4 दक्ष, 5 काल, 6 काम, 7 धृति, 8 कुरु, 9 पुरुस्वास, 10 भद्रवास मूलतः 10 और दो जोड़े गये 11 रोदक या लोदन, 12 ध्वनि या धुरी है।

विश्वदेव प्रतीक

यह संशय है कि विश्वदेव ऋग्वेद मे वर्णित सभी देवताओ को माना जाय या पुराणों मे वर्णित अलग-अलग देवता को माना जाय। इनका प्रतीक ॐ माना जाता है।

विशेषताएँ : इस नक्षत्रोपन्न जातक अत्यंत धर्म परायण, निर्दोष, सदाचारी, अध्यधिक ताकतवर, धैर्यशाली, टिकाऊ होता है। इन्ही गुणों के कारण यह पूर्वाषाढ़ा लोगो से भिन्न होता है। यह अंतिम विजय यानि मुक्ति का द्योतक है। पारिवारिक जीवन में 28 से 31 तक परिवर्तन होते है। जीवन का उत्तरार्ध सुखी होता है।

उत्तराषाढ़ा विभूतियाँ

महेश योगी (भारत) का उत्तराषाढ़ा प्रथम चरण जन्म नक्षत्र था।

रजनीश - ओशो (दार्शनिक, भारत) का उत्तराषाढ़ा चतुर्थ चरण जन्म नक्षत्र था।

बराक ओमाबा (पूर्व राष्टपति अमेरिका) का उत्त्तराषाढ़ा चतुर्थ चरण जन्म नक्षत्र है।

स्वामी विवेकानंद (भारत) का लग्न और सूर्य उत्तराषाढ़ा नक्षत्र मे था।

उत्तराषाढ़ा फलादेश

उत्तराषाढ़ा भी एक अजेय नक्षत्र है, हलाकि इसकी श्रेणी भी षाढ़ा है लेकिन परिणाम बिलकुल भिन्न होते है। यह समय पर सफलता का सूचक है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसका चिन्ह हाथी दांत (छोटा पलंग या पलना) है। जो कुशाग्र बुद्धि का कारक है। जातक विषयो को गंभीर गहनता से समझने वाला, प्रबल नेता और सभासद होता है। सूर्य इस कक्षत्र का स्वामी इन गुणों मे विशेषता का कारक है।

वैदिक विचार धारा में लिंग भेद और आध्यात्म दोनों साथ-साथ रहते है। अतः स्त्री-पुरुष दोनों जातक को प्रचुर लैंगिक सुख मिलता है, जीवन सुखद और सुव्यवस्थित होता है और विवाह से इसकी चमक-दमक बढ़ जाती है।

जातक शक्तिशाली नैसर्गिक पथ प्रदर्षक, सदगुणो के कारण सम्मानीय, कठोर आदर्शवादी, आध्यात्मिक शक्तियुक्त, (यदा-कदा यह शक्ति सुप्तावस्था मे रहती है) अधिक मित्र वाला, स्थूल व लम्बी देह, विजयी, सुखी, विनयी और वीर होता है।

जातक सही मार्ग पर चलने वाला, आध्यत्मिक मार्गदर्शक, धार्मिक सिद्धांतो का पालन करने वाला, परोपकारी, गुस्से मे भी स्थिर रहने वाला किन्तु रूचि हटने पर आलसी और अंतर्मुखी होता है।

पुरुष जातक - जातक मोहक, सुगठित शरीर, गौर वर्ण, प्रतिभा युक्त होता है। इसकी पीठ या चेहरे पर मस्सा होता है। जातक निष्कपट, मृदुभाषी, सद व्यवहारी, भला करने वाला, बुरा नही सोचने वाला, किसी के आगे नही झुकने वाला और न ही किसी पर पूरा यकीन करने वाला, स्व निर्णयी, जल्दबाजी मे बात तय नही करने वाला, स्त्रियो को सम्मान देने वाला होता है।

जातक स्पष्ट वक्ता, विरोधात्मक विचारो को मृदुता से प्रकट करने वाला, अज्ञानता में हुई गलती पर क्षमा मांगने वाला होता है। इस कारण जबाबदारियो को पूरा करने के लिए अड़चन का सामना करना पड़ता है। जातक स्व प्रयास कर्मठता यथार्थता से चरम उन्नति करने वाला, बाधाओ का सामना करने वाला, चिकित्सा, विज्ञान, कला के क्षेत्र मे सफल होता है। 28 से 31 वर्ष मे आवश्यक परिवर्तन होते है। 38 वर्ष पश्चात व्यवसायिक उन्नति और विकास होता है। वैवाहिक जीवन सुखद, शांत होता है। स्वास्थ्य अस्थिर रहता है।

स्त्री जातक जीवन

1 यह सुन्दर, आकर्षक, प्रभावी होती है। इसका छोड़ा ललाट, सुन्दर नाक व आँख होती है।

2 यह पवित्र आत्मा, सबका भला चाहने वाली, जीवन के प्रत्येक मुद्दे पर ईमानदार, मधुर भाषी होती है।

3 इसका पारिवारिक जीवन बचपन से ही बाधा युक्त, पति से विरोध के कारण वैवाहिक जीवन भी दुःखद होता है।

आचार्यो अनुसार नक्षत्र फलादेश

इस नक्षत्रोपन्न जातक मे कृतज्ञता की भावना रहती है। ये लोग धार्मिक और धर्मभीरु होते है। इन्हे पुत्र सुख प्राप्त होता है तथा विद्या विनय से सम्पन्न होते है। इनकी पत्नी सुन्दर तथा सुयोग्य होती है और स्वयं भी आकर्षक होते है। - नारद

ये लोग अपनी वेश-भूषा के लिए अतिरिक्त सावधान होते है। बोलने मे मधुरता इनका अतिरिक्त गुण होता है। ये लोग प्रायः प्रवास पर रहते है। इनमे यात्रा, पहाड़ी स्थान, रमणीय स्थल पर इनकी विशेष रूचि होती है। अतः तीर्थस्थान, ऐतिहासिक, रमणीय स्थलो की खूब यात्रा करते है। - पराशर .

इन्हे शिल्पकला, उद्योग से सम्बंधित कला का प्रचुर ज्ञान होता है। अतः ये लोग वास्तुकार, इंजीनियर, नक्शानवीस, मिस्त्री, भवन निर्माता आदि होते है। साधुजनो की सेवा भी यदा-कदा करते है और दान-पुण्य मे भी पीछे नही हटते है। - वराहमिहिर

चन्द्र : चंद्र इस नक्षत्र मे हो तो जातक नम्र, आज्ञाकारी, विनीत, सौम्य, धार्मिक, बहु मित्र वाला, प्रसिद्द होता है।

वरःमिहिर अनुसार चंद्र प्रभाव प्रसन्न, सामान्य, रुचिकर मुद्रा का कारक है।

सूर्य : सूर्य उत्तराषाढ़ा धनु राशि मे हो तो आस्तिक, विवेकी, प्रचुर लैंगिक सुख वाला लेकिन कलंकी, परिजनो पर क्रोधी, बुद्धिमान, कुल मे वरिष्ठ, जरूरत पर आक्रामक, अच्छे बुरे की समझ वाला, कोई-कोई त्वचा रोगी होता है।

लग्न : जातक सुन्दर, बलवान, मुक्ति की ओर प्रशस्त, ब्रम्हत्व का ज्ञाता, स्व धर्म मे विश्वाशी, कुल श्रेष्ट होता है।

उत्तराषाढ़ा चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे गुरु, सूर्य, गुरु का प्रभाव है। धनु 26600 से 27000 अंश। नवमांश धनु। यह संचार, विश्वास, खर्चीलेपन का द्योतक है। जातक सौम्य, गौर वर्ण, अश्व मुखी, लम्बे असित नेत्र, टेडी जांघ वाला, अल्प भाषी, स्त्री से दुःखी होता है।

इस पाद में जातक ईमानदार, सत्यवादी, मायावादी, समाज की धरोहर, सद्चरित्र, निम्न स्तर के लोगो को नही चाहने वाला, ब्रम्हवादी, बहुत ज्यादा कठोर या अभेद्य होता है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे शनि, सूर्य, शनि का प्रभाव है। मकर 27000 से 27300 अंश। नवमांश मकर। यह भौतिकवाद, व्यक्तित्वता, सांसारिकता का द्योतक है। जातक छिंदे दांत वाला, श्याम वर्ण, मोटी-फटी आवाज वाला, घने केश, ख़राब नख, गीतकार, विनोदी, शक्तिशाली होता है।

जातक दिल से मजबूत होता है इस कारण इसे ठण्डे खून वाला कहते है। यह लक्ष को पूरा करने वाला, ईश्वर मे विश्वास करने वाला किन्तु अन्य पादो की अपेक्षा आंशिक आध्यात्मिक होता है। यह गहन विचार के बाद बोलने वाला, प्रबल संचार वाहक, शक्तिवान होता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे शनि, सूर्य, शनि का प्रभाव है। मकर 27320 से 27640 अंश। नवमांश कुम्भ। यह परिवार, संचय, एकीकृत का द्योतक है। जातक टेडी नाक, विशाल देह, आलसी, धूर्त, बहुत सी स्त्रियों से प्रेम करने वाला, गीत मे रत, बकवादी, दृढ़ प्रतिज्ञा वाला होता है।

इस पाद मे जातक कठिन कार्य करने वाला, उदार हृदयी, समाज को समय देने वाला, दल के सम्मानीय व्यक्तियो से आदर पाने वाला, आवश्यकता की शीघ्र पूर्ति का इच्छावान, घटना होने तक धैर्य पूर्वक इन्जार करने वाला, विवाह के पश्चात मस्का मारने वाली स्त्रियो का तिरस्कार करने वाला होता है।

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे गुरु, सूर्य, गुरु का प्रभाव है। मकर 27640 से 28000 अंश। नवमांश मीन। यह शारीरिक बल, भौतिकता, आध्यात्मिकता प्रचुर ऊर्जा का द्योतक है। जातक सुन्दर अंग, भूरे नेत्र, सुन्दर नाक, बहु मित्र व बन्धु वाला, गायक, कलाकार, इष्ट कर्म करने वाला होता है।

इस पाद में जातक आदर्शवादी, भावुक, कार्य के लिए ऊर्जावान, आध्यात्मिक, सलाहकार, दर्शन व्याख्याता, ईश्वर भक्त, गृह नगर से लाभी, संगीत प्रेमी, साथी-मित्र वाला होता है।

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है पर अंतर बहुत है।

यवनाचार्य : उत्तराषाढ़ा के प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय चरण मे मित्रो का विरोधी, तृतीय चरण मे स्वाभिमानी, चतुर्थ चरण मे धार्मिक होता है।

मानसागराचार्य : पहले मे रक्त विकारी, दूसरे में अंगहीन, तीसरे में गुरुभक्त, चौथे मे शुभ लक्षण युक्त होता है।

भारतीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की आपस मे पूर्ण या पाद दृष्टि नहीं होती क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश, और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नहीं हो सकते है।

उत्तराषाढ़ा ग्रह चरण फल

सूर्य :

सूर्य पर चंद्र की दृष्टि होने पर जातक सुन्दर पुत्रवान होगा, पुत्र मे आकर्षक भाषण कला होगी।

सूर्य पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक साहसी और नामी होगा।

सूर्य पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक सोने, चांदी, हीरे का संग्रहक, राज्य मंत्री होगा।

सूर्य पर शनि की दृष्टि होने पर जातक बुरे लोगो की संगती मे रहेगा।

उत्तराषाढ़ा सूर्य चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक आस्तिक, धार्मिक, धर्मभीरु, विद्या विनय से सम्पन्न, प्रचुर रूप से लैंगिक सुखोपभोगी लेकिन कलंकित, परिजनों से क्रोधित, कुल मे वरिष्ठ, बुद्धिमान, जनप्रिय होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक आवश्यकता पर आक्रामक, अच्छा-बुरा समझने वाला, वेश भूषा के लिए अतिरिक्त सावधान, प्रवास या पर्यटन प्रेमी, तीर्थयात्री होता है। कोई-कोई त्वचा, अस्थमा य क्षय रोगी होता है।

चन्द्र :

चंद्र पर सूर्य की दृष्टि होने पर जातक प्रसिद्ध राजसी वैभव युक्त होगा।

चंद्र पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक साहसी और मांसल देह होगा।

चंद्र पर बुध की दृष्टि होने पर जातक शिल्पकार व बुद्धिमान होगा।

चंद्र पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक सुन्दर व्यक्तित्व वाला, प्रज्ञ होगा।

चंद्र पर शुक्र की दृष्टि होने पर जातक ललनाप्रिय, यानि स्त्रियो मे आसक्त, धार्मिक होगा।

चंद्र पर शनि की दृष्टि होने पर जातक धार्मिक मामलो मे विद्वान, मगर क्रूर होगा।

उत्तराषाढ़ा चन्द्र चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर नम्र, बड़े दांत वाला, आज्ञाकारी, संगीत शौकीन, बहु मित्र वाला, प्रसिद्ध, कृतज्ञा की भावना वाला, सुन्दर और सुयोग्य पत्नी वाला होता है। इनका पारवारिक जीवन शांत, सुखी होता है।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक धार्मिक और धर्म भीरु, कठोर, आदर्शवादी, आध्यात्मिक, और असंसारिक, गुणवान होता है। किसी किसी जातक मे आध्यात्मिक शक्ति सुप्तावस्था में रहती है।

द्वितीय चरण में जातक अपने को दानशील प्रकट करेगा मगर वास्तव मे वह कंजूश और धूर्त होगा।

तृतीय चरण में शरीर का ऊपरी भाग मोटा और निचला भाग पतला होगा। वह सर्दी से डरने वाला होगा।

मंगल :

मंगल पर सूर्य की दृष्टि होने पर जातक सम्मानित, भाग्यशाली, निष्ठूर होगा।

मंगल पर चंद्र की दृष्टि होने पर जातक अपंग, आपराधिक मनोवृत्ति वाला होगा।

मंगल पर बुध की दृष्टि होने पर जातक कलाविद, विषयो का जानकार होगा।

मंगल पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक साधन संम्पन्न, मगर वैवाहिक जीवन असंतोषमय होगा।

मंगल पर शुक्र की दृष्टि होने पर जातक दयालु, स्त्रियो के प्रति दानशील होगा।

मंगल पर शनि की दृष्टि होने पर जातक आवारा, निर्दय कठोर होगा।

उत्तराषाढ़ा मंगल चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, पैतृक व्यवसाय करने वाला, मशीनो से सम्बंधित रोजगार, नक्शानवीस, अभियंता, वन या पहाड़ो के प्रति आकर्षित, प्रवासी होगा। शिक्षा अधूरी होती है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक वेशभूषा के प्रति विशेष सतर्क, कटुभाषी, कृतज्ञ, वन-पर्वत धूमने वाला, अशांत, पारिवारिक जीवन नृपतुल्य, धनवान होगा।

बुध :

बुध पर चन्द्र की दृष्टि होने पर जातक विश्वासपात्र, लेखक, मिलनसार होगा।

बुध पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक लेखक के रूप में अर्थ अर्जित करेगा लेकिन उसका लेखन समाज मे ग्राह्य नही होगा।

बुध पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक बुद्धिमान, कुलीन, राजनीतिज्ञ होगा।

बुध पर शनि की दृष्टि होने पर जातक निष्ठूर, क्रोधी, दुःखी अस्तित्व होगा।

उत्तराषाढ़ा बुध चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक ऊँचा संगठित शरीर वाला, बोलने मे मधुरता के अतिरिक्त गुण वाला, उच्च शिक्षित, वेशभूषा के लिए अतिरिक्त सतर्क, रमणीय स्थानों का पर्यटनी होता है। ये लोग नक्शानवीस, भवन निर्माता, वास्तुकार होते है।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक धर्म से डरने वाला, शिल्पकला अर्थात उद्योग से सम्बंधित कलाओ का ज्ञाता, इंजीनियर, कटुभाषी या स्पष्ट बात कहने वाला होता है।

द्वितीय चरण में जातक कार्य और व्यवहार मे अविवेकी व उतावला और धूर्त होने से शत्रुता उपन्न करेगा। आव्यशकता पर उसकी कोई मदद नही करेगा। नौकरी मे निम्न श्रेणी होगी और व्यवसाय मे प्रगति नहीं होगी।

गुरु :

गुरु पर सूर्य की दृष्टि होने पर जातक निर्धन, लोगो द्वारा नापसंद किया जावेगा।

गुरु पर चंद्र की दृष्टि होने पर जातक भाग्यवान, ऐसो-आराम से युक्त होगा।

गुरु पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक दयाहीन, समस्या कारक होगा।

गुरु पर बुध की दृष्टि होने पर जातक मंत्री या किसी निगम आदि का अध्यक्ष होगा।

गुरु पर शुक्र की दृष्टि होने पर जातक भाग्यशाली दीर्घायु होगा।

गुरु पर शनि की दृष्टि होने पर जातक चीजे चुराने की आदत वाला होगा।

उत्तराषाढ़ा गुरु चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर आकर्षक, धार्मिक, धर्म परायण, कृतज्ञता की भावना वाला, पुत्रवान, विनय व विद्या से संपन्न, सुन्दर व सुयोग्य भार्या वाला, वेशभूषा के लिए विशेष सतर्क, प्रवासी होता है।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक कठोर, विशेष आध्यत्मिक शक्तिवान, वन-उद्यान, पहाड़-पहाड़ी, सरोवर, विश्व धरोहर, अभ्यारण आदि रमणीय स्थलो के प्रति विशेष आकर्षित व पर्यटन प्रिय, यांत्रकी, वास्तुकार होता है।

शुक्र :

शुक्र पर चन्द्र की दृष्टि होने पर जातक राजसी वैभव प्राप्त करेगा।

शुक्र पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक वाहन, सुख-सुविधा सम्पन्न होगा।

शुक्र पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक का परिवार बड़ा होगा, पुनर्विवाह होगा।

शुक्र पर शनि की दृष्टि होने पर जातक प्रचुर धन-सम्पत्ति सहित होगा।

उत्तराषाढ़ा शुक्र चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर, आकर्षक, धर्म परायण, धर्म ग्रंथों पर विशेष शोध करने वाला, विवेकशील, वस्त्राभूषण के प्रति संवेदनशील, वाणी से मधुर, रमणीक स्थल प्रेमी, साधुजनो की सेवा और दान पुण्य करने वाला होता है। विवाह विलम्ब से होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक कृतध्न, धर्म का उपहास करने वाला, मलीन, वेश भूषा के प्रति असावधान, शत्रु युक्त, मेकेनिक, भौतिकवादी, घरेलू जानवरो से लगाव रखने वाला, परिवार से अल्प सुखी, मधुमेह रोगी होता है।

शनि :

शनि पर सूर्य की दृष्टि होने पर जातक सुखी, धनी, नामी, प्रसिद्ध होगा।

शनि पर चन्द्र की दृष्टि होने पर जातक माता को कष्ट दायक होगा।

शनि पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक क़ानूनी सजायाप्ता, धूर्त, नाकारा होगा।

शनि पर बुध की दृष्टि होने पर जातक प्रतिष्ठित, राजनीतिज्ञ होगा।

शनि पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक अध्यापक, अन्वेषक, विद्वान होगा।

शनि पर शुक्र की दृष्टि होने पर जातक जिम्मेदार, परिवार पालक, विमाता से पालित होता है।

उत्तराषाढ़ा शनि चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक विवेकशील, धार्मिक और धर्माचरणी, सदाचारी, वेशभूषा के प्रति सावधान, शिल्पकला व उद्योग से सम्बंधित कला का जानकर, पारिवारिक जीवन शांत और सुखी, सुन्दर और सुयोग्य पत्नी वाला, पुत्रवान प्रवासी होता है।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक कृष्ण वर्णी, आकर्षक, दूसरो का एहशान मानने वाला, वेशभूषा के प्रति संवेदनशील, साधारण वस्त्र को पसंद करने वाला, पुत्रवान प्रवासी होता है।

अन्यत्र - दूसरे चरण में जातक माध्यमिक शिक्षा प्राप्त, बार-बार अपना व्यवसाय बदलने वाला, पत्नी रोगिणी, मानसिक रूप से व्याकुल और अशांत, आर्थिक हानि सहने वाला होता है।

अन्यत्र - तीसरे चरण मे जातक शासक से लाभान्वित, संस्था या विभाग का अध्यक्ष होगा। अपनी उन्नति के बजाय दूसरो की उन्नति चाहने वाला होता है।

उत्तराषाढ़ा राहु चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक ख्यात अर्थात किसी विषय में प्रसिद्ध, विनय और उच्च शिक्षा का लाभी, कृतज्ञता की भावना से युक्त, दूरदेश या विदेश यात्री, शेखीबाज और गैर सैद्धांतिक होता है।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक काला गठीला शरीर वाला, कृतध्न, धर्म से विमुख, दुःखी, तेल या स्टील उद्योग का ज्ञाता, परिवार या मित्रो से कलह, धन नाश होता है। वह स्वयं के लिये धन खर्च और परिवार के लिए एक पैसा भी खर्च नही करेगा।

उत्तराषाढ़ा केतु चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - अल्प लाभ,. धर्म मे सामान्य रूचि वाला, परिवार से सामान्य सुख, उध्यम से लाभ होता है। यदि अशुभ स्थानो मे हो, तो रोग, कलह, धननाश, राजकोप होता है। एक स्तर पर शीर्ष और दूसरे पर अधो स्थान पर होगा।

द्वितीय और तृतीय चरण - स्थान भ्रंश, कलह, धननाश, शारीरिक पीड़ा होती है। जातक को पिता से कोई सहायता या लाभ नही मिलता है ।

जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।

 

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