कन्या राशि

 कन्या राशि का स्वभाव व्यवहार और चरित्र विवेचन विश्लेषण व्याख्या


जन्मकुण्डली में चन्द्रमा छठी/कन्या राशि में हो, यानी जातक के जन्म के समय भचक्र के छठे खण्ड (150-180°) में हो तो जातक की राशि कन्या मानी जाती है। इस राशि का राशीश बुध है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 24 अगस्त से 23 सितम्बर के बीच उत्पन्न होने वाले सभी जातक कन्या राशि के होते हैं। कन्या राशि के जातक अस्थिर बुद्धि वाले, चंचल स्वभाव के तथा शंकालु प्रवृत्ति के होते हैं। किन्तु दुनियादार, व्यावहारिक व चतुर होते हैं। जीवन में कहीं घाटे में न रह जाएं यह ख्याल इन्हें सदा जागरूक बनाए रखता है। इस राशि के लोग कभी फक्कड़ स्वभाव के नहीं होते। इनके जीवन की प्रत्येक गतिविधि पूर्णत: सोची-विचारी होती है। किन्तु ये सोच-विचार समस्त पहलुओं पर होता है, विषय की सम्पूर्ण गहनता पर नहीं। क्योंकि ये किसी भी विषय की प्रारम्भिक जानकारी को सूक्ष्म स्तर तक प्राप्त करने में रुचि रखते हैं। लेकिन उस विषय में व्यापक स्तर तक गहनता में नहीं जाते। यह इनके स्वभाव में शामिल नहीं होता। ये लोग भावुक तो होते हैं किन्तु बौद्धिक रूप से परिपक्व भी होते हैं। एक बालक का भोलापन और एक बुजुर्ग की गम्भीरता दोनों इनमें विद्यमान रहती है। अक्सर ये चिन्ता करने वाले होते हैं तथा काम बहुत योजनाबद्ध ढंग से करते हैं। ये लोग पेट के रोगों अथवा स्नायु सम्बन्धी रोगों से प्रायः पीड़ित होते हैं। ये लोग जोखिम उठाने वाले नहीं होते तथा लड़ाई से दूर रहते हैं। व्यापार, व्यवसाय या कर्मक्षेत्र में भी जोखिम नहीं उठाते। अत: उन्नति के शिखर पर प्रायः नहीं पहुंच पाते। कई बार तो सोच-विचार ही करते रह जाते हैं और अवसर निकल जाता है। कन्या राशि के जातक उग्र स्वभाव के नहीं होते। ये शृंगार व सौंदर्यप्रेमी, भीड़ से दूर रहने वाले तथा संकोची होते हैं। किन्तु सजधज के प्रति जागरूक रहते हैं। ये लोग सांसारिक बुद्धि वाले होते हैं। ज्ञान व अध्यात्म के सम्बन्ध में रुचि यदि हो भी तो गहरी नहीं होती। अपने व्यवसायों में भी प्रायः ये परिवर्तन करते रहते हैं और जीवनसाथी से भी असंतुष्ट रहते हैं। प्रेम सम्बन्धों में प्रायः असफल रहते हैं। लेखन/पुस्तकों का शौक होता है या इनसे जुड़े रहते हैं। सातवां भाव व शुक्र अच्छी स्थिति में हो तो गृहस्थ जीवन से संतुष्ट रहते हैं। चन्द्रमा लग्न में ही कन्या राशि में शनि के साथ हो तो समय से पूर्व गंजे हो जाते हैं।

कन्या (6) यह छठी राशि है। इसका निर्देशांक 6 है। नक्षत्र के प्रथम दो चरण मिलकर कन्या राशि बनती है। चंद्र 00.00 से 10.00 उ.फा. 10.00 से 23.20 हस्त 23.20 से 30.00 चित्रा 2,3,4 टो,,पी 1234 पू,,,12 |पे,पो, कन्या राशि की आकृति कुमारी कन्या जैसी है। पृथ्वी के क्रांति अंश पर आधारित विषुवत रेखा से 12 से 0 अंशों तक इस राशि का प्रभाव रहता है। विशेषताएं इसे अंग्रेजी में विरगो (Virgo) कहते हैं। जीवनसंज्ञक यह राशि स्नेह व विवेक की प्रतीक है। दीर्घकाय, स्त्री राशि, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, शस्यश्यामलाभूमि, खेती, बाग-बगीचे, स्त्री-पुरुषों के क्रीड़ास्थान, हस्तकला केंद्र आदि जगहों पर विचरण करनेवाली है। यह द्विस्वभावी, बाल्यावस्था की, सत्वगुणी, पृथ्वी तत्त्व की, दिन में बली, वात प्रकृति की, शूद्र जाति की, शीर्षोदयी समराशि है इस राशि का स्वामी बुध, दिन बुधवार एवं अंक 5 है। केरल प्रांत इसका निवास स्थान है। शरीर में कटिप्रदेश, कमर, पेट, आंतों इत्यादि पर इसका प्रभाव रहता है। जनसेवा एवं स्वास्थ्य विषयक कामों से यह जुड़ी हुई रहती है। इसे 'मातुलराशि' कहा जाता है। दादा-पिता के कारकत्व इस राशि के पास हैं। मूंग, मटकी, अलसी, पीली सरसों, मटर, ज्वार, जवस, कपास एवं वस्त्र कन्या राशि के द्रव्य हैं। मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में तुर्की, यूनान, ब्राजील, भारत, पेरिस इत्यादि की प्रतिनिधित्व यह राशि करती है। नोट: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के जातक के लक्षण, व्याधियां एवं उनसे मुक्ति के उपाय सिंह राशि के परिच्छेद में पढ़िए। जातकों का भविष्य कन्या राशि के जातक स्त्रियोचित गुण-स्वभाव से युक्त, आचरण से शुद्ध, हंसी-मजाक करनेवाले, अधिक कन्या संतान के पिता, शत्रुओं का नाश बुद्धिचातुर्य से करनेवाले, उपकार माननेवाले होते हैं। इन्हें आकस्मिक धनप्राप्ति होती है। ये परंपरा और मर्यादा का पालन विशेष रूप से करते हैं। शिक्षा में काफी तरक्की करते हैं। क्रोधित होने पर भी शीघ्र ही शांत हो जाते हैं। जीवनभर दूसरों के लिए परिश्रम करनेवाले होते हैं। कन्या राशि की महिलाएं सुंदर, गृहकार्य में दक्ष, माता-पिता एवं पति से प्रेम करनेवाली, साधन संपन्न, अन्न, वस्त्र एवं संपत्ति का सुख भोगनेवाली, नृत्यकला प्रवीण एवं चरित्र से कुछ शिथिल रहती हैं। जातकाभरण के अनुसार कन्या राशि के जातक परिवार से वाहवाही प्राप्त करते हैं। देश-विदेश की काफी जानकारी रखते हैं। गुप्तेंद्रिय, जननेद्रिय या गले पर कोई चिह्न होता है। जन्म से तीसरे वर्ष में अग्निभय रहता है। पांचवें वर्ष में नेत्र पीड़ा से कष्ट होता है। नौवें एवं तेरहवें साल में गुप्तेंद्रिय पीड़ा होती है। 15वें वर्ष में जहरीले जंतु से भय होता है। 21वें वर्ष में पेड़ या दीवार से नीचे गिरकर जख्मी होने की संभावना रहती है। 30वें वर्ष जंगल में शस्त्राघात से जख्मी होना पड़ता है। आयु 80 वर्ष की रहती है। अनुभवसिद्द फलित सरल एवं सीधा स्वभाव, स्वाभिमानी एवं उदार स्वभावी होने से धनसंग्रह नहीं होता। साझेदार धोखा देते हैं। उपकार के बदले अपकार मिलता है। भाई-बहन एवं माता-पिता के साथ मतभिन्नता रहती है। मित्र इनका ही खाकर इन्हें डुबोते हैं। लेखनकला में प्रवीण, प्रभावी वक्ता, गायन-वादनादि कला में रुचि रखनेवाले जातक कन्या राशि के ही होते हैं। चाल-ढाल में सीधे होते हैं। भ्रमित की तरह इनकी चाल होती है। कामकला में प्रवीण, मधुरवाणी से सबको लुभाने की कला भी कन्या राशि के जातक में होती है। कन्या राशि के व्यक्ति बैंक में अकाउंटेंट, कानूनी सलाहकार, राजकर्मी, पुस्तक विक्रेता, आयुर्वेदिक या एलोपैथिक डॉक्टर, होटल का व्यवसाय करनेवाले, वकील, इनकमटैक्स-सेल्सटैक्स के सलाहकार आदि व्यवसायों में बहुतायत से पाए जाते हैं। जन्म से 14 वर्ष की आयु तक विविध प्रकार के शारीरिक कष्ट भागने पड़ते हैं। 18 से 26 वर्ष की आयु में विवाह योग बनता है। वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। भोग-विलास में काफी समय व्यतीत होता है। माता-पिता एवं मित्रों से सुख पुरुषः कन्या

राशि का शास्त्रीय स्वरूप

युवतिगे शशिनि प्रमदाजन-प्रबलकेलि-विलास-कुतूहलैः। विमलशीलसुताजननोत्सवैः सुविधिना विधिना सहित: पुमान् ।। कन्या राशि के जातक स्वयं स्त्रियोचित गुण-स्वभाव से सम्पन्न होकर स्त्रियों के समाज से अधिक सम्बन्ध रखते हैं। निर्मल आचरण होते हुए भी हास-विलास-प्रिय होते हैं। भाग्यशाली होते सन्तानों का अधिक सुख मिलता है और पुत्र-सुख की स्वल्पता रहती है। अपने शत्रुओं को निजी बुद्धि-विवेक द्वारा निर्बल बनाने में स्वतः समर्थ होते हैं, तदंगत्वेन विरोधियों पर विजयी भी बनते हैं।॥१॥ खस्तांशबाहुः परवित्तगेहै: सम्पूज्यते सत्यरत: प्रियोक्तिः। ब्रीडालसाक्षः सुरतप्रिय: स्याच्छास्त्रार्थविच्चाल्पसुतोऽगनायाम्।२। इस प्रमाण के अनुसार कन्या राशि के व्यक्ति सत्यभाषी व कोमल प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के नेत्र में लज्जा रहती है। विद्वान् और शास्वकार की उपमा से सुशोभित किये जाते हैं। कन्धा और भुजा दोनों डीले होते हैं। दूसरों से धन-प्राप्ति का सुख मिलता है। सन्तान पक्ष का उत्तम सुख, कन्या सन्तान अधिक होती है। सुन्दर मुखाकृति, हृदय होता है। कुछ क्रोधी स्वभाव तो रहता है, किन्तु शीघ्र ही मान जाने का गुण भी होता है, विलम्ब इन्हें पसन्द नहीं होता, किसी भी कार्य में जल्दी फल की आशा रखते हैं। साहित्य में रुचि रहती है। इनकी बुद्धि का विकास सुन्दर ढंग से होता है। विद्याध्ययन में इनको अभूतपूर्व सफलता मिलती है और प्रायः सभी परीक्षाओं का अनुकूल परिणाम निकलता है। अपने जीवन में विभिन्न अनुभवों को पाते हुए जैसे-तैसे ये लोग अपना शरीर कर्मठ बनाते हैं, पुरुषार्थ को महत्त्व देते हुए भाग्य का विधाता स्वयं सिद्ध होते हैं। इनके हाथ धन का संचय कदाचित् ही हो पाता है। इन्हें जहाँ एक आमदनी होती है, वहीं दो खर्चा का प्रसंग मौजूद मिलता है। मन से उदार और मस्तिष्क से सहज जीवन में मिलता है। परम्परा और मर्यादा को अधिक महत्त्व देते हैं। पुत्र भाग्यशाली और प्रतिभा-सम्पन्न होते हैं॥२॥ कन्या राशि की महिलाएँ कन्यालग्नःजा कन्या धन्या कन्या प्रजावती । मिश्रप्रकृतिरल्पाया निपुणा उदार अपने गृहकर्मसु ॥३॥ ७१ अथवा चिह्न इन्हें निश्चित होता है, ऐसा शास्त्र के जानकारों का वचन है।७। जीवन-भविष्य दर्पण धर्मप्रिया जनेस्वेष्टा धनवस्त्रसुखान्विता। शस्त्रात् पित्तमयाद्वापि सन्तापान्मृत्युमाप्नुयात् ।। ४ ।। कन्या राशि (लग्न) की महिलाएँ सुन्दर, गृहकार्यपरायणा, पारिवारिक सदस्यों का विशेष स्नेह-ममत्व प्राप्त करनेवाली, माता-पिता एवं पति की प्रिया होती है। कफ-पित्त एवं वायु से प्रभावित होती हैं। साधन- सम्पन्न, अन्न-वस्व-धन का उत्तम सुख प्राप्त करती हैं। धर्म-कर्म में विशेष रुचि होती है। इन्हें कन्या सन्तान का सुख अधिक मिलता है अर्थात् कन्या सन्तति अधिक होती है। सुखी दाम्पत्य जीवन प्राप्त करती हैं। शस्त्र अथवा किसी शोक से मृत्यु को प्राप्त करती हैं। मतान्तरेण, कन्या राशिवाली महिलाएं अपने स्वभाव को स्थिर नहीं रखतीं, लेकिन सफल गार्हस्थ्य जीवन के लिए बड़ा संघर्ष करती हैं। लोकापवाद से बचकर यदि अपने चरित्र और सम्मान की रक्षा करने में सफल हो गयी तो महिलाओं के समाज में अग्रगण्य और पूज्य बन जाती हैं। नाना प्रकार के अध्ययन में इन्हें पर्याप्त ख्याति और यश मिलता है॥३-४।। जातकाभरणोक्त चन्द्रनिर्याणाध्याय के अनुसार- स्वजनानन्दकृन्नित्यं धनवान्बहुसेवकः । प्रवासी च कलाभिज्ञो गुरुभक्तः प्रियंवदः ॥५॥ कन्या राशि के व्यक्ति अधिकांशतः स्वजनों का सामीप्य प्राप्त करते हुए उन्हें आनन्दित करते हैं। दास-दासियों का बहुत सुख प्राप्त करनेवाले और धनी-मानी होते हैं। देश-विदेश की पर्याप्त जानकारी रखनेवाले होते हैं। ५। देवता द्विजवर्याणां भक्तस्तत्परमानसः । धर्मकर्मसमायुक्तो जनानामतिदुर्लभः ॥६॥ अपने आदरणीय जन, गुरुजनों के प्रिय और भक्त होते हैं। प्रिय- भाषण करना, समस्त देवता व ब्राह्मणों के प्रति अच्छी भावना रखना और धर्म-कर्म में अग्रणी होकर अपने समुदाय में श्रेष्ठ कहे जाते हैं ।।६।। कन्यकाल्पत्वमापन्नो भूरिपुत्रो भवेन्नरः । शिश्ने कण्ठप्रदेशे च लांछनं निश्चितं भवेत् ॥७॥ कुछ जातकों को कन्या सन्तति अधिक नहीं होती, वरन् पुत्र सन्तान अधिक होते हैं। गुप्तेन्द्रिय-जनेन्द्रिय व कण्ठ में किसी प्रकार का लक्षण वह्निपीड़ा तृतीयेऽब्दे पंचमे लोचनव्यथा । नवमे द्वाबाधा च त्रयोदशमितेऽपि च ॥८॥ इन्हें स्वयं से अधिक बुद्धिमती-विदुषी-गुणवती-साहसी-परिश्रमी और विवेक-सम्पन्न पत्नी मिलती है। इसके विपरीत कन्या राशि की महिलाओं को परम चतुर और कठोर हृदयवाले पति मिलते हैं। लगभग २५ वर्ष लम्बे संघर्ष का दौर शुरू होकर ३१ वें वर्ष भयावह ७२ जीवन-भविष्य-दर्पण जन्म से तीसरे वर्ष की आयु में आग से भय होता है। पाँच वर्ष की अवस्था में नेत्र-रोग अथवा नेत्रपीड़ा से परेशानी होती है। आयु क्रम के विस्तार के साथ-साथ स्वाँ वर्ष और १३ वाँ वर्ष भी गुप्तेन्द्रियों के रोग से कष्टदायी होता है॥८॥ तथा पंचदशे वर्षे सर्पतो भयमादिशेत् । एकविंशन्मिते वर्षे पतनं वृक्षभित्तितः ॥६॥ १५ वर्ष की आयु में विषैले का भय व्याप्त रहता है। २१ वर्ष की आयु में किसी पेड़ के क्षतिग्रस्त होने के कारण चोट-चपेट की संभावना अथवा किसी दीवाल आदि से गिरने का कुयोग भी बन सकता है।।६।। अरण्ये शस्त्रघातः स्याद्वर्षे त्रिंशन्मिते ध्रुवम् । अशीत्यब्दं भवेदायुश्चन्द्रे सौभ्यग्रहेक्षिते ॥१०॥ ऐसे जातकों को ३० वर्ष की आयु में, जंगली प्रदेशों में किसी शस्त्र (हथियार) से चोट पहुँचने का भय रहता है। इनकी पूर्णायु लगभग ८० वर्ष होती है, यदि राशिस्थ चन्द्रमा को बलवान् शुभ देखते हों।।१०।। चैत्रकृष्णत्रयोदश्यां निधनं रविवासरे। शीतयुतो स्थिते सूतौ कन्यायामिति संस्मृतम् ॥११॥ चैत्र का महीना, कृष्णपक्ष १३ रविवार का संयोग होने पर इनके गोलोकवासी होने का योग बनता है। ऐसा शास्त्र-वचन है। इस सन्दर्भ में यह स्पष्ट कर देना है कि कन्या राशि के जातक लब्धप्रतिष्ठ, किसी विशिष्ट विषय के मर्मज्ञ, परोपकारी, व्यवहार-कुशल और संकोची प्रवृत्ति के होते हैं। तीसरे वर्ष मानसिक आघात का भय होता है। पाँचवें वर्ष से ही संघर्षमय जीवन प्रारंभ होकर ६ वर्ष से १३ वर्ष के अन्दर किसी विशिष्ट आत्मीय स्वजन के वियोग का दुःख झेलना पड़ता वें वर्ष परिवार या अभिभावकों की नाराजगी प्राप्त होती है, तब वे लोग अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा, भ्रमण-नौकरी या व्यापार की दिशा में प्रवेश लेकर स्वाधीन SELF-MADE-MAN बनने की कोशिश करते हैं। २०-२१ वर्ष की आयु के लगभग विवाह-सूत्र में बँधकर या यों ही अपनी जिम्मेदारियों का अनुभव करने लगते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि की आयु में एक स्थिति का निर्माण होता है, तब वे ३८ वें वर्ष की आयु तक चिन्तनशील और सम्वेदनशील बने रहते हैं। पूर्वोक्य शास्त्र-वचनों का सामंजस्य न बैठते भी मत-मतान्तर के अध्ययन के आधार पर यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि कन्या राशि के जातक कितने ही लोगों के सुख-दुख के साथी बनकर, सबको अपना स्नेह-सहयोग ही नहीं, बल्कि सर्वस्व निछावर करके भी उपकृत लोगों का वांछित सहयोग नहीं प्राप्त कर पाते हैं। इनकी तपस्या सदैव अधूरी रहती है, जिस स्तर पर ये पहुँचना चाहते हैं, वहाँ तक पहुँचने का मार्ग इन्हें ज्ञात नहीं रहता, फलस्वरूप अपने जीवन पक्ष में भटकाव महसूस करने लगते हैं। इन्हें स्त्री की ओर से (स्त्रियों को अपने पति की ओर से) कोई कष्ट नहीं होता, फिर भी ये अपने जीवन साथी के प्रति चिन्तित रहते हैं। इनका कार्यक्षेत्र बहुत ही विस्तृत, प्रशंसनीय एवं लोकप्रियता देनेवाला होता है, किन्तु सीधे-सादे सरल-स्वाभिमानी और उदार स्वभाव के कारण धनोपार्जन की कला में सफलता बहुत कम ही मिल पाती है। एक कटु सत्य यह भी है कि इनके प्रशंसक ही विरोधी बनते हैं और विरोधी लोग ही किसी स्थिति में प्रशंसक बन जाते हैं; इसलिए दूसरों का दिल भले ही जीत लें, किन्तु दूसरों का हृदय पहचान पाने में असमर्थ रहते हैं। स्वभाव से नाजुक और नाजो-अदा दिखानेवाले सुकुमार प्रवृत्ति के ये लोग सहसा कोई विपत्ति बरदाश्त नहीं कर पाते, फिर भी हर कदम पर विपत्ति स्वरूप मँडराते काले बादल देखने तो पड़ते ही हैं। जन्म से मरण-पर्यन्त संघर्ष की सत्यता स्वीकार करनेवाले ऐसे लोग कितनी आयु तक जीवन जीते हैं, यह कह पाना कठिन है; लेकिन शास्त्र- अधिकतम त्र-वचनानुसार ८० वर्ष तक जीवित रहने के लिए बहुत नियम-संयम, परिश्रम, ईमानदारी और कर्मठता की साधना करनी आवश्यक होती है। इन वाक्यों को पाद-टिप्पणी समझनी चाहिए, और अब, ग्रहपीडोपशमनार्थ रत्ना- भरणोक्त उपचार का परामर्श दिया जाता है-॥११॥ कन्या लग्ने मूप्रिलापतृष्णाभ्रमज्वराश्च यदा । से परेशान, मूर्छा- भैरवयजनाद्धवनात् गुडूचिसं सेवनाच्छान्तिः ॥१२॥ कन्या (लग्न, राशि के जातक अधिकांशतः विभिन्न भौतिक उपद्रवों -प्रलाप-तृष्णा और मस्तिष्क-भ्रम से पीड़ित होते हैं। अधिक श्रम द्वारा मानसिक पीड़ा, सिर-दर्द और ज्वरादि भय अक्सर बना रहता है। इन्हें श्रीभैरव देवता की नित्य आराधना, भैरव-मन्त्र- जप, सविधि अनुष्ठान और श्रीबटुक-बलि बराबर करते रहने से यथेष्ट राहत मिलती है। गुडूच (गुरुच फलौषधि द्रव्य) का नित्य हवन करना दैनिक कल्याण चाहने वाले श्रद्धालु जन निम्नलिखित मन्त्र का प्रतिदिन १०८ बार (एक माला) जप करें- ॐ नमो प्रीं पीताम्बराय नमः।१२। ७४ जीवन-भविष्य-दर्पण और प्रत्येक महत्त्वपूर्ण अवसर पर गुडूच का सेवन करना शुभ होता है। कन्या राशि का स्वानुभूत जीवन-फल

ऋषिवाक्य है- पाण्डुर्द्विपात्स्त्रीद्वितनुर्यमाशा निशामरुच्छीतसमोदयक्ष्मा। कन्यार्षऽशब्दः शुभभूमिवैश्या रूक्षाऽल्पसंगप्रसवा शुभा च ॥१३॥ कदम-कदम पर अड़चनें, असफलताएँ और बेइज्जत होने वाली परिस्थिति आपके समझ आती रहेंगी। धन, परिवार, गड़ा धन, आयु, व्यापार, बुद्धि, सन्तान के सम्बन्ध में आपको बहुत सोच विचार करना पड़ेगा। इज्जत खूब होगी, धन इकट्ठा नहीं कर सकेंगे। दुश्मन आपके पीछे हाथ धोकर बरबाद करने की चेष्टा करेंगे। आपका भाग्य काफी अच्छा है, अपनी पुरुषार्थ शक्ति और परिश्रम के जरिये तथा निज- विवेक बुद्धि के द्वारा अपने हर एक महत्त्वपूर्ण कार्यों में उन्नति करेंगे। आमदनी के क्षेत्र में बहुत बड़ी-बड़ी सफलता पाते रहेंगे। धन का लाभ, जमीन-जायदाद-मकान, व्यापार आदि कामनाओं की सिद्धि के लिए आप बड़े इज्जत के साथ पेंचीदी तरकीब और तिकड़म लगाया करेंगे। से लोगों की भलाई करेंगे, मगर बदले में बुराई मिलेगी। हर किसी की झूठी-सच्ची बातों पर बहुत जल्द विश्वास कर लेने वाले होंगे, इसी कारण आपके खास लोग ही आपको बहुत ज्यादा धोखा देते रहेंगे। भाई-बहन, माता-पिता आदि अन्य पारिवारिक सदस्यों से बराबर आपका मतभेद रहेगा। आपका सिद्धान्त, उद्देश्य और नियम-संयम बिल्कुल निराला रहेगा। खास तौर से लिखा-पढ़ी, कागज-पत्र, दौड़- धूप, तीन तिकड़म वाली नौकरी से आपकी जीविका चलती रहेगी। आप अपनी कुछ खास बुरी आदतों की वजह से अपना बना-बनाया काम कभी-कभार चौपट कर दिया करेंगे। ज्यादातर आपके दोस्त खाने खरचवाने वाले ही मिलेंगे, खरचने और खिलाने वाले नहीं- अतः अपने दोस्तों से ही ज्यादा सावधान रहें। अल्पविद्या एवं बुद्धि तेज रहेगी। जिन्दगी भर जो कमायेंगे, पूँक ताप सब बराबर होता रहेगा। धनसंग्रह नहीं कर पायेंगे। स्वामी बुध, वैश्य वर्ण, पृथ्वी तत्व, द्विस्वभाव संज्ञा, शीतल स्वभाव, वायु प्रकृति, दान-पुण्य-धर्म-पूजन-पाठ-नियम-संयम में रुचि रखने वाले, चतुराई के काम निकालने में निपुण, लेखन व भाषण आप बहुत की प्रबल शक्ति, गायन-वादन-संगीत में अभिरुचि, सदैव श्रेष्ठ-जनों का निर्धन एवं सामान्य ढंग से कमाने-खाने वाले व्यक्ति आप होंगे। १८ से २६ वर्ष या कम उम्र में विवाह, पति-पत्नी का आपसी मेल-जोल काफी सुदृढ़ और स्थाई रहेगा। सन्तान-सुख के मामले में आपको बहुत ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। भोग-विलास की शक्ति मात्रा से में क्षयरोग से अचानक मृत्यु होगी, मृत्यु-समय में आपके परिवार का कोई व्यक्ति आपके पास नहीं रहेगा। अथवा पारिवारिक मनमुटाव होने से मृत्यु-समय कोई साथ न देगा। प्रायः कन्याराशि वाली स्त्रियाँ अपने पति के पहले ही मरती हैं। स्वभाव सुन्दर, रसीला मिजाज, कुछ क्रोधी, जीवन-भविष्य दर्पण प्रिय, पारिवारिक मनमुटाव को बरदास्त करनेवाले, धन-सम्पत्ति से कुछ अधिक रहेगी। माता-पिता, भाई-बन्धुओं तथा दोस्तों का सुख बहुत ही कम मिलेगा। स्वप्न और बड़ी-बड़ी बातें ज्यादा सोचेंगे। आपके लिए बुधवार का दिन सबसे अच्छा है। जहाँ तक हो सके; कर्क, वृश्चिक और मीन राशिवालों से दोस्ती करें तो उनसे कुछ काम निकलता रहेगा। मार्च का महीना, ८-११-२३-३० तारीखें और शनिवार का दिन आपके लिए हमेशा खराब रहेगा। पिता पहले और माता का स्वर्गवास बाद में होना चाहिए। जन्म से १४ वर्ष तक अनेक विचित्र रोगों की परेशानियों एवं उलझनों में फँसे रहेंगे। खास तौर से पैर, सिर, आँख एवं प्लीहा आदि रोगों के शिकार होंगे। पाकिट तो हमेशा खाली रहेगा, मगर रुपयों-पैसों से होने वाले जरूरी कामकाज हमेशा पूर्ण होते रहेंगे। ज्यादा खर्च करने की ताकत बनी रहेगी। २० से ३५ वर्ष तक मन में सदा उत्साह, साहस, पत्नी के साथ सुखी जीवन, कारोबार-नौकरी में पूर्ण सफलता मिलती रहेगी। दौड़-धूप और व्यर्थ के वाद-विवाद ज्यादा करते रहेंगे। अपना निजी मकान होगा, जिसमें आप पूर्ण सुख-शान्ति के साथ रहेंगे। २५ वें वर्ष और ३१ वें वर्ष सरकारी विवाद संभव होगा। ३६ वर्ष तक का समय महान खतरनाक सिद्ध होगा। जी-तोड़ मेहनत करने पर भी दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल हो जायेगा। स्वास्थ्य गिरता जायेगा। शारीरिक शक्ति कमजोर होती जायेगी, बरबादी के सारे लक्षण दिखाई देंगे। अनायास अनेक कर्मों की ओर झुकाव होगा। वैरागी जीवन भी व्यतीत करना संभव है। ४६ से ६२ तक की अवस्था का समय सहसा से भाग्य-विस्तार करायेगा। बिगड़ी परिस्थितियाँ जायेंगी। बहुत सुधर मददगार भी मिल जायेंगे। सारी चिन्ताओं और परेशानियों का अन्त हो स्वास्थ्य नहीं सुधर पायेगा। अनेक प्रकार की सुख- सम्पत्ति, वैभव का आनन्द लेते हुए ७० वर्ष ५ मास १८ दिन की अवस्था से ४८ - जायेगा। किन्तु ७६ अध्ययन और निर्माण में रुचि होना तथा कई ज्ञानशक्ति का भण्डार ऊँचे दरजे के सार्वजनिक कार्यों में बहुधा असमर्थ रहती है। आपके शरीर में लीवर-तिल्ली-गुर्दा-चर्मरोग-नासिकारोग-अतिसार-संग्रहणी और पीठ की हड्डियों में कभी-कभी रोगव्याधि का भय होगा। प्रतिवर्ष मार्च का महीना, प्रतिमास ८, ११, २३, ३० तारीखें, शनिवार का दिन, मेष, सिंह, धनुराशि वाले व्यक्ति और लालरंग के वस्त्रादि पदार्थ आपको ठीक नहीं है। आपके स्वभाव में वैश्यों की तरह भरपूर गुण जीवन-भविष्य-दर्पण विपरीत वातावरण, घर -गृहस्थी-शिल्प-संगीत आदि कलाओं में निपुण तथा अखण्ड पतिव्रता होती हैं। ऐसी स्त्रियों की मानसिक स्थिति चंचल, परोपकारी और शीघ्र ही दूसरों के वश में हो जाने वाली प्रवृत्ति होती है। ज्यादा घूमने-फिरने वाली, भोग-विलास की अधिकता, खर्च और सौन्दर्य में आगे, पति- सन्तान के व्यवहार से दुःखी, धनवती, अध्ययनशील तथा सिनेमा-नाटक-खेलकूद-गाना-बजाना-संगीत आदि की शौकीन होती हैं। यदि आपकी कन्या राशि है तो आपकी आस्तिकता में नास्तिक लोगों से निरन्तर पाला पड़ता रहेगा। आपके सुखी जीवन में दुखियों की भीड़ छायी रहेगी। मध्यम-ऊँचा-दुर्बल-कृशकाय शरीर, घबड़ाई हुई हाथी की गति से चलने वाले, हाथ-पाँव फटकारते बेफिकर चलना, सुकुमार, विभिन्न कला में निपुण, कामकला में चतुर, प्रियभाषण से ही सबको सन्तुष्ट करना, कुछ व्यसनों में थोड़े समय तक फँसे रहना, पवित्र आचरण, हँसते हुए बोलना, अपनी परम्परा से प्रेम रखना, दयालु स्वभाव, देशाटन में हिचकिचाहट महसूस करना, वस्तुतः देश-परदेश भ्रमण से ही भाग्योदय होना, आनन्द-प्राप्ति में जरा भी विघ्न पैदा होने पर घबड़ा जाना, काँट-छाँट, तर्क-वितर्क किये बिना हर किसी की बात मान लेना, एकान्त अध्ययन एवं चिन्तन में रुचि, विद्याध्ययन में बाधायोग होने के बावजूद भी अपने विषय का अनुभवी जानकार होना, नाटक- अभिनय-संगीत- खाद्य पदार्थ-लेखनी-खनिज-पदार्थ अथवा यन्त्रालय से सम्बन्धित कार्य में परिपक्व सफलता हस्तगत करना, उत्तम वस्त्र और उत्तम भोजन से प्रेम रखना और विद्वज्जनों के बीच समादरित होना आपके कन्याराशि की विशेषता है। अपने परिश्रम तथा उपार्जित द्रव्य के बल पर यश प्राप्त करने में आप अपनी सारी ताकत लगा देंगे। आपके जीवन में श्रेष्ठता केवल उम्र बिताना नहीं, अपितु संकटों पर विजय प्राप्त कर भावी जीवन को सुखी बनाना है। दूसरे देशवासियों से सम्बन्ध, वकालत में रुचि, एक संवाद कई जगह पहुँचाने का कार्य, ग्रन्थ- होना कन्याराशि का गुण है। आपकी राशि स्वार्थ की भावना देने वाली, स्वातीप्रसूतौ मनुजस्य यस्य महीपतिप्राप्तविभूतियुक्तःमिलकर रहते हैं और शीघ्र ही दूसरों को आत्मसात् कर लेते हैं, इन्हें भ्रमण-पर्यटन का पर्याप्त अवसर मिलता है।।१७।। कन्दर्परूपः प्रभया समेतः कान्तापरप्रीतिरतिप्रसन्नः। मौजूद हैं। आपक अपने जीवन- कल्याणार्थ प्रतिदिन निम्न श्रीरामवन्दना का ११ पाठ करने का अभ्यास डालें।।१३।। आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।।१४।। रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय मानसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ।।१५।। नीलाम्बुजश्यामलकोमलांगं सीतासमारोपितवामभागम् । पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ।१६। आपकी कन्या राशि का स्वामी बुध आपके स्वभाव का भी अधिपति है। आपकी जीविका नौकरी हो चाहे व्यापार, जीविका क्षेत्र में उतार- चढ़ाव देखना ही पड़ेगा। बुध तीब्रगामी ग्रह है, इसलिए तेजी से प्रगति करते समय अन्धाधुन्ध मुसीबतों का भी सामना करते रहना पड़ेगा। बुध ग्रह का प्रिय रत्न पन्ना है, उसके साथ श्री बटुकभैरव कवच आपको निश्चित रूप से धारण कर लेना चाहिए। चूँकि व्रत-पूजन में भी आपकी आस्था है, इसलिए भैरव की उपासना एवं शक्ति विनायक मन्त्र का जप और वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी का मास-व्रत आपके लिए हितकारी होगा। भविष्य उत्तम है।।

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के अंतिम तीन चरण, हस्त नक्षत्र के चार चरण एवं चित्रा कन्या (6) यह छठी राशि है। इसका निर्देशांक 6 है। नक्षत्र के प्रथम दो चरण मिलकर कन्या राशि बनती है। नीचे दी गई सारिणी में चंद्र के अंश, नक्षत्र, चरण, नामाक्षर, राशि स्वामी, नक्षत्र स्वामी, योनि, नाड़ी, गण की जानकारी दी जा रही है। चंद्र के अंश अंश कला से चरण नक्षत्र नामाक्षर नक्षत्र योनि नाड़ी गण राशि स्वामी स्वामी अंश कला मनुष्य 00.00 से 10.00 उ.फा. 10.00 से 23.20 हस्त 23.20 से 30.00 चित्रा 2,3,4 टो,,पी 1234 पू,,,12 |पे,पो बुध बुध बुध सूर्य गो आद्य चंद्र महिष आद्य देव मंगल व्याघ्र मध्य कन्या राशि की आकृति कुमारी कन्या जैसी है। पृथ्वी के क्रांति अंश पर आधारित विषुवत रेखा से 12 से 0 अंशों तक इस राशि का प्रभाव रहता है। विशेषताएं इसे अंग्रेजी में विरगो (Virgo) कहते हैं। जीवनसंज्ञक यह राशि स्नेह व विवेक की प्रतीक है। दीर्घकाय, स्त्री राशि, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, शस्यश्यामलाभूमि, खेती, बाग-बगीचे, स्त्री-पुरुषों के क्रीड़ास्थान, हस्तकला केंद्र आदि जगहों पर विचरण करनेवाली है। यह द्विस्वभावी, बाल्यावस्था की, सत्वगुणी, पृथ्वी तत्त्व की, दिन में बली, वात प्रकृति की, शूद्र जाति की, शीर्षोदयी समराशि है इस राशि का स्वामी बुध, दिन बुधवार एवं अंक 5 है। केरल प्रांत इसका निवास स्थान है। शरीर में कटिप्रदेश, कमर, पेट, आंतों इत्यादि पर इसका प्रभाव रहता है। जनसेवा एवं स्वास्थ्य विषयक कामों से यह जुड़ी हुई रहती है। इसे 'मातुलराशि' कहा जाता है। दादा-पिता के कारकत्व इस राशि के पास हैं। मूंग, मटकी, अलसी, पीली सरसों, मटर, ज्वार, जवस, कपास एवं वस्त्र कन्या राशि के द्रव्य हैं। मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में तुर्की, यूनान, ब्राजील, भारत, पेरिस इत्यादि कीप्रतिनिधित्व यह राशि करती है। नोट: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के जातक के लक्षण, व्याधियां एवं उनसे मुक्ति के उपाय सिंह राशि के परिच्छेद में पढ़िए। जातकों का भविष्य कन्या राशि के जातक स्त्रियोचित गुण-स्वभाव से युक्त, आचरण से शुद्ध, हंसी-मजाक करनेवाले, अधिक कन्या संतान के पिता, शत्रुओं का नाश बुद्धिचातुर्य से करनेवाले, उपकार माननेवाले होते हैं। इन्हें आकस्मिक धनप्राप्ति होती है। ये परंपरा और मर्यादा का पालन विशेष रूप से करते हैं। शिक्षा में काफी तरक्की करते हैं। क्रोधित होने पर भी शीघ्र ही शांत हो जाते हैं। जीवनभर दूसरों के लिए परिश्रम करनेवाले होते हैं। कन्या राशि की महिलाएं सुंदर, गृहकार्य में दक्ष, माता-पिता एवं पति से प्रेम करनेवाली, साधन संपन्न, अन्न, वस्त्र एवं संपत्ति का सुख भोगनेवाली, नृत्यकला प्रवीण एवं चरित्र से कुछ शिथिल रहती हैं। जातकाभरण के अनुसार कन्या राशि के जातक परिवार से वाहवाही प्राप्त करते हैं। देश-विदेश की काफी जानकारी रखते हैं। गुप्तेंद्रिय, जननेद्रिय या गले पर कोई चिह्न होता है। जन्म से तीसरे वर्ष में अग्निभय रहता है। पांचवें वर्ष में नेत्र पीड़ा से कष्ट होता है। नौवें एवं तेरहवें साल में गुप्तेंद्रिय पीड़ा होती है। 15वें वर्ष में जहरीले जंतु से भय होता है। 21वें वर्ष में पेड़ या दीवार से नीचे गिरकर जख्मी होने की संभावना रहती है। 30वें वर्ष जंगल में शस्त्राघात से जख्मी होना पड़ता है। आयु 80 वर्ष की रहती है। अनुभवसिद्द फलित सरल एवं सीधा स्वभाव, स्वाभिमानी एवं उदार स्वभावी होने से धनसंग्रह नहीं होता। साझेदार धोखा देते हैं। उपकार के बदले अपकार मिलता है। भाई-बहन एवं माता-पिता के साथ मतभिन्नता रहती है। मित्र इनका ही खाकर इन्हें डुबोते हैं। लेखनकला में प्रवीण, प्रभावी वक्ता, गायन-वादनादि कला में रुचि रखनेवाले जातक कन्या राशि के ही होते हैं। चाल-ढाल में सीधे होते हैं। भ्रमित की तरह इनकी चाल होती है। कामकला में प्रवीण, मधुरवाणी से सबको लुभाने की कला भी कन्या राशि के जातक में होती है। कन्या राशि के व्यक्ति बैंक में अकाउंटेंट, कानूनी सलाहकार, राजकर्मी, पुस्तक विक्रेता, आयुर्वेदिक या एलोपैथिक डॉक्टर, होटल का व्यवसाय करनेवाले, वकील, इनकमटैक्स-सेल्सटैक्स के सलाहकार आदि व्यवसायों में बहुतायत से पाए जाते हैं। साझेदारों से अनबन रखनेवाले, कदम-कदम पर मुसीबतों से जूझनेवाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति वेदों के ज्ञाता, व्यापारी, कुशल कार्यकर्ता, तरल पदार्थों के शौकीन, कपड़े के व्यवसायी, इंजीनियर, पेंटर, राजदूत, सरकारी नौकर, कथाकार, सर्जन, नर्स, पंडित, कवि, छापाखाने में काम करनेवाले तथा वकील होते हैं। स्त्री: हस्त नक्षत्र में जन्मी महिलाएं घमंडी, महत्त्वाकांक्षी, दूसरों से धन कमानेवाली, अपने कामों में दक्ष, गृहस्थ जीवन में सुव्यवस्थित रहनेवाली, उत्साही, खूबसूरत किंतु निर्लज्ज, दूसरों की चीजें अपनी ही समझकर भक्षण करनेवाली होती हैं। व्याधियां एवं उपाय सूर्य की अनिष्टता के कारण हस्त नक्षत्र में जन्मे जातकों को काफी कुछ सहना पड़ता है। इस अनिष्टता के निवारण के लिए नीचे दिए मंत्र का जाप पांच हजार बार स्वयं करें या योग्य ब्राह्मण से करवा लें। दशांश हवन दूध-घी की आहुतियों से करें। ॐ बिभ्राडवृहलिबनु सौम्यंमध्वासुर्दधज्ञ पत्तावविहुत। वातजुतो यो अभिक्षतित्मता प्रजाः पुवोषापुरुषा विराजति ॐ सवित्रे नमः। सोमवार को हस्त नक्षत्र के दिन जाति वृक्ष की जड़ तावीज में रखकर गले में या बाहु पर धारण करें। पन्ना या फिरोजा चांदी की अंगूठी में जड़वाकर करांगुली में धारण करें। चरण प्रभाव प्रथम चरण: में जन्मे जातक अभिमानी, घमंडी, झूठे, दुराभिमानी, अवगुणों से युक्त किंतु पशु, जीव, जंतुओं पर मुग्ध रहते हैं। द्वितीय चरण: में जन्मे जातक संगीत, वाद्य-नृत्य प्रेमी, कलाकार होते हैं। तृतीय चरण: में जन्मे जातक सफल व्यापारी, कुशल कार्यकर्ता, चतुर एवं सामान्य रोगी होते हैं। चतुर्थ चरण: में जन्मे जातक हंसमुख, प्रसन्नचित्त, मातृभक्त, सुदृढ़, लंबे कद के, बलिष्ठ शरीरधारी होते हैं। चित्रा नक्षत्र में जन्मे जातक चित्रा नक्षत्र में जन्मे जातक हंसमुख, नाक, कान एवं सुंदर आंखों से युक्त, विनोदी, आज्ञाकारी, महत्त्वाकांक्षी, सफेद परिधानों के शौकीन, आकर्षक व्यक्तित्ववाले किंतु शीघ्र क्रोधी होते हैं। व्याधियां एवं उपाय चित्रा नक्षत्र में जन्मे स्त्री-पुरुष बहुमूत्र रोगी, अर्धांगवायु, उन्माद, कामवासना के कारण गुप्तेंद्रिय रोगों से ग्रसित होते हैं। व्यापार में असफलता के शिकार होते हैं। गृहस्थ जीवन में भी कई मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। इन समस्त अनिष्टताओं के निवारणार्थ मंगलवार के दिन जब चित्रा नक्षत्र हो तब 'विश्वकर्मादेव' का पूजन करके नीचे दिए मंत्र का दस हजार जाप करें। ॐ त्वष्टा तुरीयो अद्भुत इन्द्राग्निपुष्टि वर्धनपू। द्विपदादन्द इन्द्रियमुक्षा गौत्रवयोदथः ॐ विश्वकर्मेण नमः। जाप के बाद दशांश हवन स्वयं करें या योग्य ब्राह्मण से करवा लें। इसके फलस्वरूप वाहन, मकान के विषय में आनेवाले कष्ट दूर होकर समृद्धि आपके घर आएगी।भी कन्या होते हैं। आकस्मिक धन या विरासत में धन-प्राप्ति का सुन्दर सुयोग इन्हें जीवन-भविष्य-दर्पण कन्या राशि का शास्त्रीय स्वरूप युवतिगे शशिनि प्रमदाजन-प्रबलकेलि-विलास-कुतूहलैः। विमलशीलसुताजननोत्सवैः सुविधिना विधिना सहित: पुमान् ।। कन्या राशि के जातक स्वयं स्त्रियोचित गुण-स्वभाव से सम्पन्न होकर स्त्रियों के समाज से अधिक सम्बन्ध रखते हैं। निर्मल आचरण होते हुए भी हास-विलास-प्रिय होते हैं। भाग्यशाली होते सन्तानों का अधिक सुख मिलता है और पुत्र-सुख की स्वल्पता रहती है। अपने शत्रुओं को निजी बुद्धि-विवेक द्वारा निर्बल बनाने में स्वतः समर्थ होते हैं, तदंगत्वेन विरोधियों पर विजयी भी बनते हैं।॥१॥ खस्तांशबाहुः परवित्तगेहै: सम्पूज्यते सत्यरत: प्रियोक्तिः। ब्रीडालसाक्षः सुरतप्रिय: स्याच्छास्त्रार्थविच्चाल्पसुतोऽगनायाम्।२। इस प्रमाण के अनुसार कन्या राशि के व्यक्ति सत्यभाषी व कोमल प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के नेत्र में लज्जा रहती है। विद्वान् और शास्वकार की उपमा से सुशोभित किये जाते हैं। कन्धा और भुजा दोनों डीले होते हैं। दूसरों से धन-प्राप्ति का सुख मिलता है। सन्तान पक्ष का उत्तम सुख, कन्या सन्तान अधिक होती है। सुन्दर मुखाकृति, हृदय होता है। कुछ क्रोधी स्वभाव तो रहता है, किन्तु शीघ्र ही मान जाने का गुण भी होता है, विलम्ब इन्हें पसन्द नहीं होता, किसी भी कार्य में जल्दी फल की आशा रखते हैं। साहित्य में रुचि रहती है। इनकी बुद्धि का विकास सुन्दर ढंग से होता है। विद्याध्ययन में इनको अभूतपूर्व सफलता मिलती है और प्रायः सभी परीक्षाओं का अनुकूल परिणाम निकलता है। अपने जीवन में विभिन्न अनुभवों को पाते हुए जैसे-तैसे ये लोग अपना शरीर कर्मठ बनाते हैं, पुरुषार्थ को महत्त्व देते हुए भाग्य का विधाता स्वयं सिद्ध होते हैं। इनके हाथ धन का संचय कदाचित् ही हो पाता है। इन्हें जहाँ एक आमदनी होती है, वहीं दो खर्चा का प्रसंग मौजूद मिलता है। मन से उदार और मस्तिष्क से सहज जीवन में मिलता है। परम्परा और मर्यादा को अधिक महत्त्व देते हैं। पुत्र भाग्यशाली और प्रतिभा-सम्पन्न होते हैं॥२॥ कन्या राशि की महिलाएँ कन्यालग्नःजा कन्या धन्या कन्या प्रजावती । मिश्रप्रकृतिरल्पाया निपुणा उदार अपने गृहकर्मसु ॥३॥७१ अथवा चिह्न इन्हें निश्चित होता है, ऐसा शास्त्र के जानकारों का वचन है।७। जीवन-भविष्य दर्पण धर्मप्रिया जनेस्वेष्टा धनवस्त्रसुखान्विता। शस्त्रात् पित्तमयाद्वापि सन्तापान्मृत्युमाप्नुयात् ।। ४ ।। कन्या राशि (लग्न) की महिलाएँ सुन्दर, गृहकार्यपरायणा, पारिवारिक सदस्यों का विशेष स्नेह-ममत्व प्राप्त करनेवाली, माता-पिता एवं पति की प्रिया होती है। कफ-पित्त एवं वायु से प्रभावित होती हैं। साधन- सम्पन्न, अन्न-वस्व-धन का उत्तम सुख प्राप्त करती हैं। धर्म-कर्म में विशेष रुचि होती है। इन्हें कन्या सन्तान का सुख अधिक मिलता है अर्थात् कन्या सन्तति अधिक होती है। सुखी दाम्पत्य जीवन प्राप्त करती हैं। शस्त्र अथवा किसी शोक से मृत्यु को प्राप्त करती हैं। मतान्तरेण, कन्या राशिवाली महिलाएं अपने स्वभाव को स्थिर नहीं रखतीं, लेकिन सफल गार्हस्थ्य जीवन के लिए बड़ा संघर्ष करती हैं। लोकापवाद से बचकर यदि अपने चरित्र और सम्मान की रक्षा करने में सफल हो गयी तो महिलाओं के समाज में अग्रगण्य और पूज्य बन जाती हैं। नाना प्रकार के अध्ययन में इन्हें पर्याप्त ख्याति और यश मिलता है॥३-४।। जातकाभरणोक्त चन्द्रनिर्याणाध्याय के अनुसार- स्वजनानन्दकृन्नित्यं धनवान्बहुसेवकः । प्रवासी च कलाभिज्ञो गुरुभक्तः प्रियंवदः ॥५॥ कन्या राशि के व्यक्ति अधिकांशतः स्वजनों का सामीप्य प्राप्त करते हुए उन्हें आनन्दित करते हैं। दास-दासियों का बहुत सुख प्राप्त करनेवाले और धनी-मानी होते हैं। देश-विदेश की पर्याप्त जानकारी रखनेवाले होते हैं। ५। देवता द्विजवर्याणां भक्तस्तत्परमानसः । धर्मकर्मसमायुक्तो जनानामतिदुर्लभः ॥६॥ अपने आदरणीय जन, गुरुजनों के प्रिय और भक्त होते हैं। प्रिय- भाषण करना, समस्त देवता व ब्राह्मणों के प्रति अच्छी भावना रखना और धर्म-कर्म में अग्रणी होकर अपने समुदाय में श्रेष्ठ कहे जाते हैं ।।६।। कन्यकाल्पत्वमापन्नो भूरिपुत्रो भवेन्नरः । शिश्ने कण्ठप्रदेशे च लांछनं निश्चितं भवेत् ॥७॥ कुछ जातकों को कन्या सन्तति अधिक नहीं होती, वरन् पुत्र सन्तान अधिक होते हैं। गुप्तेन्द्रिय-जनेन्द्रिय व कण्ठ में किसी प्रकार का लक्षण वह्निपीड़ा तृतीयेऽब्दे पंचमे लोचनव्यथा । नवमे द्वाबाधा च त्रयोदशमितेऽपि च ॥८॥इन्हें स्वयं से अधिक बुद्धिमती-विदुषी-गुणवती-साहसी-परिश्रमी और विवेक-सम्पन्न पत्नी मिलती है। इसके विपरीत कन्या राशि की महिलाओं को परम चतुर और कठोर हृदयवाले पति मिलते हैं। लगभग २५ वर्ष लम्बे संघर्ष का दौर शुरू होकर ३१ वें वर्ष भयावह ७२ जीवन-भविष्य-दर्पण जन्म से तीसरे वर्ष की आयु में आग से भय होता है। पाँच वर्ष की अवस्था में नेत्र-रोग अथवा नेत्रपीड़ा से परेशानी होती है। आयु क्रम के विस्तार के साथ-साथ स्वाँ वर्ष और १३ वाँ वर्ष भी गुप्तेन्द्रियों के रोग से कष्टदायी होता है॥८॥ तथा पंचदशे वर्षे सर्पतो भयमादिशेत् । एकविंशन्मिते वर्षे पतनं वृक्षभित्तितः ॥६॥ १५ वर्ष की आयु में विषैले का भय व्याप्त रहता है। २१ वर्ष की आयु में किसी पेड़ के क्षतिग्रस्त होने के कारण चोट-चपेट की संभावना अथवा किसी दीवाल आदि से गिरने का कुयोग भी बन सकता है।।६।। अरण्ये शस्त्रघातः स्याद्वर्षे त्रिंशन्मिते ध्रुवम् । अशीत्यब्दं भवेदायुश्चन्द्रे सौभ्यग्रहेक्षिते ॥१०॥ ऐसे जातकों को ३० वर्ष की आयु में, जंगली प्रदेशों में किसी शस्त्र (हथियार) से चोट पहुँचने का भय रहता है। इनकी पूर्णायु लगभग ८० वर्ष होती है, यदि राशिस्थ चन्द्रमा को बलवान् शुभ देखते हों।।१०।। चैत्रकृष्णत्रयोदश्यां निधनं रविवासरे। शीतयुतो स्थिते सूतौ कन्यायामिति संस्मृतम् ॥११॥ चैत्र का महीना, कृष्णपक्ष १३ रविवार का संयोग होने पर इनके गोलोकवासी होने का योग बनता है। ऐसा शास्त्र-वचन है। इस सन्दर्भ में यह स्पष्ट कर देना है कि कन्या राशि के जातक लब्धप्रतिष्ठ, किसी विशिष्ट विषय के मर्मज्ञ, परोपकारी, व्यवहार-कुशल और संकोची प्रवृत्ति के होते हैं। तीसरे वर्ष मानसिक आघात का भय होता है। पाँचवें वर्ष से ही संघर्षमय जीवन प्रारंभ होकर ६ वर्ष से १३ वर्ष के अन्दर किसी विशिष्ट आत्मीय स्वजन के वियोग का दुःख झेलना पड़ता वें वर्ष परिवार या अभिभावकों की नाराजगी प्राप्त होती है, तब वे लोग अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा, भ्रमण-नौकरी या व्यापार की दिशा में प्रवेश लेकर स्वाधीन SELF-MADE-MAN बनने की कोशिश करते हैं। २०-२१ वर्ष की आयु के लगभग विवाह-सूत्र में बँधकर या यों ही अपनी जिम्मेदारियों का अनुभव करने लगते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि की आयु में एक स्थिति का निर्माण होता है, तब वे ३८ वें वर्ष की आयु तक चिन्तनशील और सम्वेदनशील बने रहते हैं। पूर्वोक्य शास्त्र-वचनों का सामंजस्य न बैठते जीवन-भविष्य-दर्पण ७३ भी मत-मतान्तर के अध्ययन के आधार पर यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि कन्या राशि के जातक कितने ही लोगों के सुख-दुख के साथी बनकर, सबको अपना स्नेह-सहयोग ही नहीं, बल्कि सर्वस्व निछावर करके भी उपकृत लोगों का वांछित सहयोग नहीं प्राप्त कर पाते हैं। इनकी तपस्या सदैव अधूरी रहती है, जिस स्तर पर ये पहुँचना चाहते हैं, वहाँ तक पहुँचने का मार्ग इन्हें ज्ञात नहीं रहता, फलस्वरूप अपने जीवन पक्ष में भटकाव महसूस करने लगते हैं। इन्हें स्त्री की ओर से (स्त्रियों को अपने पति की ओर से) कोई कष्ट नहीं होता, फिर भी ये अपने जीवन साथी के प्रति चिन्तित रहते हैं। इनका कार्यक्षेत्र बहुत ही विस्तृत, प्रशंसनीय एवं लोकप्रियता देनेवाला होता है, किन्तु सीधे-सादे सरल-स्वाभिमानी और उदार स्वभाव के कारण धनोपार्जन की कला में सफलता बहुत कम ही मिल पाती है। एक कटु सत्य यह भी है कि इनके प्रशंसक ही विरोधी बनते हैं और विरोधी लोग ही किसी स्थिति में प्रशंसक बन जाते हैं; इसलिए दूसरों का दिल भले ही जीत लें, किन्तु दूसरों का हृदय पहचान पाने में असमर्थ रहते हैं। स्वभाव से नाजुक और नाजो-अदा दिखानेवाले सुकुमार प्रवृत्ति के ये लोग सहसा कोई विपत्ति बरदाश्त नहीं कर पाते, फिर भी हर कदम पर विपत्ति स्वरूप मँडराते काले बादल देखने तो पड़ते ही हैं। जन्म से मरण-पर्यन्त संघर्ष की सत्यता स्वीकार करनेवाले ऐसे लोग कितनी आयु तक जीवन जीते हैं, यह कह पाना कठिन है; लेकिन शास्त्र- अधिकतम त्र-वचनानुसार ८० वर्ष तक जीवित रहने के लिए बहुत नियम-संयम, परिश्रम, ईमानदारी और कर्मठता की साधना करनी आवश्यक होती है। इन वाक्यों को पाद-टिप्पणी समझनी चाहिए, और अब, ग्रहपीडोपशमनार्थ रत्ना- भरणोक्त उपचार का परामर्श दिया जाता है-॥११॥ कन्या लग्ने मूप्रिलापतृष्णाभ्रमज्वराश्च यदा । से परेशान, मूर्छा- भैरवयजनाद्धवनात् गुडूचिसं सेवनाच्छान्तिः ॥१२॥ कन्या (लग्न, राशि के जातक अधिकांशतः विभिन्न भौतिक उपद्रवों -प्रलाप-तृष्णा और मस्तिष्क-भ्रम से पीड़ित होते हैं। अधिक श्रम द्वारा मानसिक पीड़ा, सिर-दर्द और ज्वरादि भय अक्सर बना रहता है। इन्हें श्रीभैरव देवता की नित्य आराधना, भैरव-मन्त्र- जप, सविधि अनुष्ठान और श्रीबटुक-बलि बराबर करते रहने से यथेष्ट राहत मिलती है। गुडूच (गुरुच फलौषधि द्रव्य) का नित्य हवन करना दैनिक कल्याण चाहने वाले श्रद्धालु जन निम्नलिखित मन्त्र का प्रतिदिन १०८ बार (एक माला) जप करें- ॐ नमो प्रीं पीताम्बराय नमः।१२। ७४ जीवन-भविष्य-दर्पण और प्रत्येक महत्त्वपूर्ण अवसर पर गुडूच का सेवन करना शुभ होता है। कन्या राशि का स्वानुभूत जीवन-फल ऋषिवाक्य है- पाण्डुर्द्विपात्स्त्रीद्वितनुर्यमाशा निशामरुच्छीतसमोदयक्ष्मा। कन्यार्षऽशब्दः शुभभूमिवैश्या रूक्षाऽल्पसंगप्रसवा शुभा च ॥१३॥ कदम-कदम पर अड़चनें, असफलताएँ और बेइज्जत होने वाली परिस्थिति आपके समझ आती रहेंगी। धन, परिवार, गड़ा धन, आयु, व्यापार, बुद्धि, सन्तान के सम्बन्ध में आपको बहुत सोच विचार करना पड़ेगा। इज्जत खूब होगी, धन इकट्ठा नहीं कर सकेंगे। दुश्मन आपके पीछे हाथ धोकर बरबाद करने की चेष्टा करेंगे। आपका भाग्य काफी अच्छा है, अपनी पुरुषार्थ शक्ति और परिश्रम के जरिये तथा निज- विवेक बुद्धि के द्वारा अपने हर एक महत्त्वपूर्ण कार्यों में उन्नति करेंगे। आमदनी के क्षेत्र में बहुत बड़ी-बड़ी सफलता पाते रहेंगे। धन का लाभ, जमीन-जायदाद-मकान, व्यापार आदि कामनाओं की सिद्धि के लिए आप बड़े इज्जत के साथ पेंचीदी तरकीब और तिकड़म लगाया करेंगे। से लोगों की भलाई करेंगे, मगर बदले में बुराई मिलेगी। हर किसी की झूठी-सच्ची बातों पर बहुत जल्द विश्वास कर लेने वाले होंगे, इसी कारण आपके खास लोग ही आपको बहुत ज्यादा धोखा देते रहेंगे। भाई-बहन, माता-पिता आदि अन्य पारिवारिक सदस्यों से बराबर आपका मतभेद रहेगा। आपका सिद्धान्त, उद्देश्य और नियम-संयम बिल्कुल निराला रहेगा। खास तौर से लिखा-पढ़ी, कागज-पत्र, दौड़- धूप, तीन तिकड़म वाली नौकरी से आपकी जीविका चलती रहेगी। आप अपनी कुछ खास बुरी आदतों की वजह से अपना बना-बनाया काम कभी-कभार चौपट कर दिया करेंगे। ज्यादातर आपके दोस्त खाने खरचवाने वाले ही मिलेंगे, खरचने और खिलाने वाले नहीं- अतः अपने दोस्तों से ही ज्यादा सावधान रहें। अल्पविद्या एवं बुद्धि तेज रहेगी। जिन्दगी भर जो कमायेंगे, पूँक ताप सब बराबर होता रहेगा। धनसंग्रह नहीं कर पायेंगे। स्वामी बुध, वैश्य वर्ण, पृथ्वी तत्व, द्विस्वभाव संज्ञा, शीतल स्वभाव, वायु प्रकृति, दान-पुण्य-धर्म-पूजन-पाठ-नियम-संयम में रुचि रखने वाले, चतुराई के काम निकालने में निपुण, लेखन व भाषण आप बहुत की प्रबल शक्ति, गायन-वादन-संगीत में अभिरुचि, सदैव श्रेष्ठ-जनों का निर्धन एवं सामान्य ढंग से कमाने-खाने वाले व्यक्ति आप होंगे। १८ से २६ वर्ष या कम उम्र में विवाह, पति-पत्नी का आपसी मेल-जोल काफी सुदृढ़ और स्थाई रहेगा। सन्तान-सुख के मामले में आपको बहुत ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। भोग-विलास की शक्ति मात्रा से में क्षयरोग से अचानक मृत्यु होगी, मृत्यु-समय में आपके परिवार का कोई व्यक्ति आपके पास नहीं रहेगा। अथवा पारिवारिक मनमुटाव होने से मृत्यु-समय कोई साथ न देगा। प्रायः कन्याराशि वाली स्त्रियाँ अपने पति के पहले ही मरती हैं। स्वभाव सुन्दर, रसीला मिजाज, कुछ क्रोधी, जीवन-भविष्य दर्पण प्रिय, पारिवारिक मनमुटाव को बरदास्त करनेवाले, धन-सम्पत्ति से कुछ अधिक रहेगी। माता-पिता, भाई-बन्धुओं तथा दोस्तों का सुख बहुत ही कम मिलेगा। स्वप्न और बड़ी-बड़ी बातें ज्यादा सोचेंगे। आपके लिए बुधवार का दिन सबसे अच्छा है। जहाँ तक हो सके; कर्क, वृश्चिक और मीन राशिवालों से दोस्ती करें तो उनसे कुछ काम निकलता रहेगा। मार्च का महीना, ८-११-२३-३० तारीखें और शनिवार का दिन आपके लिए हमेशा खराब रहेगा। पिता पहले और माता का स्वर्गवास बाद में होना चाहिए। जन्म से १४ वर्ष तक अनेक विचित्र रोगों की परेशानियों एवं उलझनों में फँसे रहेंगे। खास तौर से पैर, सिर, आँख एवं प्लीहा आदि रोगों के शिकार होंगे। पाकिट तो हमेशा खाली रहेगा, मगर रुपयों-पैसों से होने वाले जरूरी कामकाज हमेशा पूर्ण होते रहेंगे। ज्यादा खर्च करने की ताकत बनी रहेगी। २० से ३५ वर्ष तक मन में सदा उत्साह, साहस, पत्नी के साथ सुखी जीवन, कारोबार-नौकरी में पूर्ण सफलता मिलती रहेगी। दौड़-धूप और व्यर्थ के वाद-विवाद ज्यादा करते रहेंगे। अपना निजी मकान होगा, जिसमें आप पूर्ण सुख-शान्ति के साथ रहेंगे। २५ वें वर्ष और ३१ वें वर्ष सरकारी विवाद संभव होगा। ३६ वर्ष तक का समय महान खतरनाक सिद्ध होगा। जी-तोड़ मेहनत करने पर भी दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल हो जायेगा। स्वास्थ्य गिरता जायेगा। शारीरिक शक्ति कमजोर होती जायेगी, बरबादी के सारे लक्षण दिखाई देंगे। अनायास अनेक कर्मों की ओर झुकाव होगा। वैरागी जीवन भी व्यतीत करना संभव है। ४६ से ६२ तक की अवस्था का समय सहसा से भाग्य-विस्तार करायेगा। बिगड़ी परिस्थितियाँ जायेंगी। बहुत सुधर मददगार भी मिल जायेंगे। सारी चिन्ताओं और परेशानियों का अन्त हो स्वास्थ्य नहीं सुधर पायेगा। अनेक प्रकार की सुख- सम्पत्ति, वैभव का आनन्द लेते हुए ७० वर्ष ५ मास १८ दिन की अवस्था से ४८ - जायेगा। किन्तु
७६ अध्ययन और निर्माण में रुचि होना तथा कई ज्ञानशक्ति का भण्डार ऊँचे दरजे के सार्वजनिक कार्यों में बहुधा असमर्थ रहती है। आपके शरीर में लीवर-तिल्ली-गुर्दा-चर्मरोग-नासिकारोग-अतिसार-संग्रहणी और पीठ की हड्डियों में कभी-कभी रोगव्याधि का भय होगा। प्रतिवर्ष मार्च का महीना, प्रतिमास ८, ११, २३, ३० तारीखें, शनिवार का दिन, मेष, सिंह, धनुराशि वाले व्यक्ति और लालरंग के वस्त्रादि पदार्थ आपको ठीक नहीं है। आपके स्वभाव में वैश्यों की तरह भरपूर गुण जीवन-भविष्य-दर्पण विपरीत वातावरण, घर -गृहस्थी-शिल्प-संगीत आदि कलाओं में निपुण तथा अखण्ड पतिव्रता होती हैं। ऐसी स्त्रियों की मानसिक स्थिति चंचल, परोपकारी और शीघ्र ही दूसरों के वश में हो जाने वाली प्रवृत्ति होती है। ज्यादा घूमने-फिरने वाली, भोग-विलास की अधिकता, खर्च और सौन्दर्य में आगे, पति- सन्तान के व्यवहार से दुःखी, धनवती, अध्ययनशील तथा सिनेमा-नाटक-खेलकूद-गाना-बजाना-संगीत आदि की शौकीन होती हैं। यदि आपकी कन्या राशि है तो आपकी आस्तिकता में नास्तिक लोगों से निरन्तर पाला पड़ता रहेगा। आपके सुखी जीवन में दुखियों की भीड़ छायी रहेगी। मध्यम-ऊँचा-दुर्बल-कृशकाय शरीर, घबड़ाई हुई हाथी की गति से चलने वाले, हाथ-पाँव फटकारते बेफिकर चलना, सुकुमार, विभिन्न कला में निपुण, कामकला में चतुर, प्रियभाषण से ही सबको सन्तुष्ट करना, कुछ व्यसनों में थोड़े समय तक फँसे रहना, पवित्र आचरण, हँसते हुए बोलना, अपनी परम्परा से प्रेम रखना, दयालु स्वभाव, देशाटन में हिचकिचाहट महसूस करना, वस्तुतः देश-परदेश भ्रमण से ही भाग्योदय होना, आनन्द-प्राप्ति में जरा भी विघ्न पैदा होने पर घबड़ा जाना, काँट-छाँट, तर्क-वितर्क किये बिना हर किसी की बात मान लेना, एकान्त अध्ययन एवं चिन्तन में रुचि, विद्याध्ययन में बाधायोग होने के बावजूद भी अपने विषय का अनुभवी जानकार होना, नाटक- अभिनय-संगीत- खाद्य पदार्थ-लेखनी-खनिज-पदार्थ अथवा यन्त्रालय से सम्बन्धित कार्य में परिपक्व सफलता हस्तगत करना, उत्तम वस्त्र और उत्तम भोजन से प्रेम रखना और विद्वज्जनों के बीच समादरित होना आपके कन्याराशि की विशेषता है। अपने परिश्रम तथा उपार्जित द्रव्य के बल पर यश प्राप्त करने में आप अपनी सारी ताकत लगा देंगे। आपके जीवन में श्रेष्ठता केवल उम्र बिताना नहीं, अपितु संकटों पर विजय प्राप्त कर भावी जीवन को सुखी बनाना है। दूसरे देशवासियों से सम्बन्ध, वकालत में रुचि, एक संवाद कई जगह पहुँचाने का कार्य, ग्रन्थ- होना कन्याराशि का गुण है। आपकी राशि स्वार्थ की भावना देने वाली, स्वातीप्रसूतौ मनुजस्य यस्य महीपतिप्राप्तविभूतियुक्तः।१८। जीवन-भविष्य-दर्पण मिलकर रहते हैं और शीघ्र ही दूसरों को आत्मसात् कर लेते हैं, इन्हें भ्रमण-पर्यटन का पर्याप्त अवसर मिलता है।।१७।। कन्दर्परूपः प्रभया समेतः कान्तापरप्रीतिरतिप्रसन्नः। मौजूद हैं। आपक अपने जीवन- कल्याणार्थ प्रतिदिन निम्न श्रीरामवन्दना का ११ पाठ करने का अभ्यास डालें।।१३।। आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।।१४।। रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय मानसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ।।१५।। नीलाम्बुजश्यामलकोमलांगं सीतासमारोपितवामभागम् । पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ।१६। आपकी कन्या राशि का स्वामी बुध आपके स्वभाव का भी अधिपति है। आपकी जीविका नौकरी हो चाहे व्यापार, जीविका क्षेत्र में उतार- चढ़ाव देखना ही पड़ेगा। बुध तीब्रगामी ग्रह है, इसलिए तेजी से प्रगति करते समय अन्धाधुन्ध मुसीबतों का भी सामना करते रहना पड़ेगा। बुध ग्रह का प्रिय रत्न पन्ना है, उसके साथ श्री बटुकभैरव कवच आपको निश्चित रूप से धारण कर लेना चाहिए। चूँकि व्रत-पूजन में भी आपकी आस्था है, इसलिए भैरव की उपासना एवं शक्ति विनायक मन्त्र का जप और वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी का मास-व्रत आपके लिए हितकारी होगा। भविष्य उत्तम है।। १४-१६ ।। तुला राशि के अन्तर्गत चित्रा नक्षत्र का अन्तिम २ चरण, स्वाती नक्षत्र का ४ चरण और विशाखा नक्षत्रारंभ का ३ चरण आता है। स्वाती नक्षत्र के जातक का लक्षण चन्द्रभोग १८६०-४०' से २०० -००' तक नामाक्षर-रू,रे,रो,ता। विदग्धो धार्मिकश्चैव कृपणः प्रियवल्लभः । सुशीलो देवभक्तश्च स्वातीजातो भवेन्नरः ।।१७।। स्वाती नक्षत्र के व्यक्ति चालाक और धर्मप्रिय होते हैं। स्वभाव से कृपण, किन्तु मन से उदार होते हैं। स्त्रियों में विशेष अनुरक्ति होती है। स्वभाव से उत्तम और शान्तिप्रिय होते हैं। अपनी स्त्री, पुत्र और कुटुम्बियों से इनका मन कुछ व्यथित रहते हुए भी सबके साथ घुल- -इस प्रमाण के अनुसार ऐसे जातक अद्वितीय शारीरिक सौन्दर्य को प्राप्त होते हैं, हर सुन्दर वस्तु और प्राणी इन्हें आकर्षित कर लेते हैं। स्त्रियों के समाज द्वारा प्रीति-प्रशंसा और व्यवहार के पात्र ये लोग बनते हैं। प्रत्येक सम-विषम स्थिति में अपनी प्रसन्नता को सुरक्षित रख पाना इनके लिए संभव होता है और राजकीय सम्बन्धों द्वारा इन्हें धनोपार्जन का मार्ग मिलता है। मतान्तरेण, वायु-पित्तादि दोषों से इनका शरीर कृशित और क्षयातुर होता है। देश-परदेश (विदेश) में घूमने के अनेक योग मिलते हैं। इनकी आर्थिक स्थिति सदैव एक-सी नहीं रहती, अपितु उसमें हास- वृद्धि होती रहती है। यदि स्वाभिमान की रक्षा और अपनी बहादुरी का उपयोग सही अर्थ में करना चाहें तो इन्हें अपने क्रोध का परित्याग करना आवश्यक होता है। ज्यादा श्रेष्ठ तब बनते हैं, जब इनके व्यक्तित्व में चंचलता निखरती है। भाग्यशाली होते हैं; जनप्रियता हासिल करने में इन्हें कोई यत्न नहीं करना पड़ता। पशु-पक्षियों से उतना ही स्नेह होता है, जितना स्नेह अपने परिवार वालों से करते हैं।।१८।। स्वाती नक्षत्र की महिलाओं का लक्षण निरालस्या निरूपा च कुत्सिता च जयान्विता । कन्यका चाप्रमादी च जायते वायुदैवते ॥१६॥ स्वाती नक्षत्र में उत्पन्न महिलायें कर्मनिष्ठ और वांछित मनोरथ परिपूर्ण करनेवाली होती हैं। इन्हें रूपवान् नहीं कहा जा सकता। विपरीत कार्यों की प्रवृत्ति नहीं रहती। असंगत वार्ता से दूर रहने का स्वभाव होता है।१६। स्वातौ सुशीलसम्पन्ना दयाा प्रियवादिनी । धर्मव्रतपरा नारी कुशला क्रयकर्मणि ॥२०॥ ऐसी महिलाएँ प्रियभाषी, दयावान् और धर्म के प्रति श्रेष्ठ अनुराग रखने वाली, परिजनों की प्रिय होती हैं। दान-पुण्य में हमेशा आगे रहना इनका गुण होता है। क्रय -विक्रय के मामले में बेहद चुस्त और चालाक होती हैं। ऐसी महिलायें यदि व्यवसायी बन जायें तो स्वल्पकाल में ही सफलता पाती हैं।।२०।। विशेष- स्वाती नक्षत्र में उत्पन्न जातक बहुधा ज्वर-पीड़ा और नाना प्रकार से शारीरिक क्लेश से ग्रसित पाये जाते हैं। कष्टकारी अनुभव होने या न होने, दोनों ही स्थिति में पूर्वा पर उपचार को ध्यान में रखना आदि आवश्यक समझें तो निम्नलिखित मन्त्र का न्यूनतम १० हजार जप विधि- विधान से स्वयं करना या सुयोग्य ब्राह्मण से कराना चाहिए। मन्त्र- ॐ वायो ये ते सहस्रिणे रथासस्ते चिरागहि नियुत्वाम सोमपीतये ॐ वायवे नमः।।२१।।

इसी मन्त्र से दैनिक होम या जपसंख्या का दशांश हवन तिल-यव-घृत द्वारा करना-कराना चाहिए। वायुदेवता के प्रीत्यर्थ घृत-पायस की बलि देनी चाहिए। चन्दन-गन्ध (इत्र), दमनक-पुष्प, अगर-गुग्गुल, धूप, घृतदीपक और घृत-पायस नैवेद्य द्वारा वायु देवता (अथवा शिवजी या हनुमानजी) का पूजन करना चाहिए। स्वाती नक्षत्र के दिन यथाशक्ति स्वर्णदान, रक्तधेनु (लाल गाय) का दान अथवा पक्वान्न दान करना चाहिए। भुजा में या हृदय पर "जाति-मूल" धारण करना चाहिए। इन उपायों के माध्यम से दुर्घटनाओं की आशंका, अस्वस्थता और दुर्भाग्य का निवारण होकर दैनिक जीवन में अनुकूलता प्राप्त होती है, साथ ही व्यवहार-कुशलता, लोक-प्रियता, राज-मान्यता, ऐश्वर्य- सम्पन्नता और भृत्यादि सुखों की प्राप्ति होती है। दैविक शक्तियों को आत्मसात् कर आत्मशक्ति को बढ़ाने से ही सक्रिय जीवन का निर्माण होता है।।२१।। विशाखा नक्षत्र के जातक का लक्षण चन्द्रभोग-२०००-००' से २१३०-२०' तक, नामाक्षर-ती,तू,ते,तो। अतिलुब्धोऽतिमानी च निष्ठुरः कलहप्रियः । विशाखायां नरो जातो वेश्याजनरतो भवेत ।।२२।। विशाखा नक्षत्र के जातक विलासी और लोलुप प्रवृत्ति के होते हैं। वाद-विवाद में दिलचस्पी भी रखते हैं। स्वभाव से निष्ठुर एवं स्त्रियों के व्यवहार में और सम्पर्क बढ़ाने में अधिक रुचि लेने की आदत होती है। इनके बन्धु-बान्धव परेशान रहते हैं। इनका मन सदैव अशान्त रहता है, दुर्जनों से भयभीत होने का स्वभाव होता है, फिजूलखर्ची में चिन्तनशील भी रहते हैं।।२२।। सदानुरक्तोऽग्निसूरक्रियायां धातुक्रियायामपि चोग्रसौम्यः। यस्य प्रसूतौ च भवेद्विशाखा सखा न कस्यापि भवेन्मनुष्यः।२३। इस प्रमाण के अनुसार ऐसे जातक पूजन-पाठ-हवन-आराधना- उपासना और साधना में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुचि अवश्य रखते हैं। नीति-व्यवहार में ऐसे लोग कभी उग्र (कठोर) रहते हैं, तो कभी सौम्य (सरल)। अपने मनोनुकूल मित्रों की कमी रहती है। जो लोग इनको अपना गहरा मित्र मानेंगे, वैसे लोगों को विशाखा नक्षत्र के जातक अपना संदिग्ध मित्र समझते हैं। मतान्तरेण ये विद्वान्, गुणी, यशस्वी, भाग्यशाली, रसिक-मिजाज, व्यवहार-कुशल और स्वच्छन्द प्रकृति के होते हैं। कभी आस्तिक, कभी नास्तिक अर्थात् धर्म के मामलों में लचीला स्वभाव होता लोग प्रसिद्धि पाने के ध्येय से कुशल सम्पादक, कवि, ज्योतिषी, नेता, अभिनेता और अन्य रुचिकर विषय के वेत्ता बन बैठते हैं। इनका पराक्रम अद्वितीय और प्रशंसनीय होता है, किन्तु अधिक सम्मान पाने की स्थिति में गर्वीले और लापरवाह (अलहदी) भी बन जाते हैं।।२३।। विशाखा नक्षत्र की महिलाओं का लक्षण धर्ममूलविनीता च प्रज्ञाधनसमन्विता । द्विदैवते तु संजाता कन्यका सत्यवादिनी ॥२४॥ जिनका जन्म विशाखा नक्षत्र में होता है, वे महिलाएँ धार्मिक कार्यों में अग्रसर व कर्मशक्ति पर विश्वास रखने वाली होती हैं। स्वभाव से नम्र और सत्यभाषी होती हैं। धनी और विद्वान् भी होती हैं। लेखन-भाषण में चतुर और गुणी होती हैं, किन्तु नीच-व्यसनी-लम्पट और धोखेबाज मित्रों के संसर्ग से तथा बदनीयत लोगों की नजर से इन्हें बचना चाहिए।।२४।। विशाखासम्भवा कान्ता क्रूरा देवरघातिनी । ईर्ष्यालोभसमायुक्ता प्रवीणा च प्रभाषणे ।।२५।। ऐसी महिलाएँ आकर्षक मुखाकृति से युक्त, गुणवान् एवं वाक्पटु होती हैं। दूसरों के प्रति शीघ्र-ही ईर्ष्या का भाव बना लेने का दोष होता है। लोभ की अधिकता रहती है। देवर से इनकी पटरी कम बैठती है।।२५।। विशेष-विशाखा नक्षत्र में उत्पन्न अधिकांश जातक कुक्षिशूल, मस्तिष्क वेदना या सर्वांग-पीड़ा से ग्रसित होते हैं, इन्हें इन्द्राग्नि देवता के प्रसन्नतार्थ चन्दन, केशर-गन्ध, कमलपुष्प, देवदारु-घृत-धूप, घृतदीप और घृतपायस- नैवेद्य द्वारा इन्द्राग्नी देवता की स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा का दैनिक पूजन करना और अनेक रंग के अन्न द्वारा बलि देना चाहिए। भुजा में या हृदय पर "गुंजामूल' धारण करना चाहिए। गुरुवार को विशाखा नक्षत्र पड़ने पर लाल-पीले वस्त्र का दान, कृष्ण वृषभ (काले बैल) का दान अथवा छायापात्र का दान करना चाहिए। विशेष अवसरों पर निम्नलिखित मन्त्र का न्यूनतम १० हजार जप विधि-विधानपूर्वक स्वयं करना अथवा सुयोग्य ब्राह्मण द्वारा कराना चाहिए, आज्य-पायस द्वारा इसी मन्त्र से दैनिक होम या जपसंख्या का दशांश होम भी करना श्रेयस्कर होता है, मन्त्र- ॐ इन्द्राग्नी आगत गूं सुतं गीभिर्नमो वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषिता ॐ इन्द्राग्निभ्यां नमः ॥२६॥ दैनिक जीवन में सुख-शान्ति, आरोग्य-ऐश्वर्य, प्रभुत्व-वर्चस्व एवं भौतिक सुख-साधनों की स्थिरता के लिए विशाखा नक्षत्रोत्पन्न जातकों के लिए उपरोक्त मन्त्रानुष्ठान ही विधेय है।।२६।।

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