कर्क राशि
कर्क राशि
जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जब कर्क राशि में हो, यानी भचक्र के चौथे खण्ड (90-120) में हो तो उस जातक की जन्मराशि कर्क होती है। इस राशि के जातकों का राशीश चन्द्रमा है। कर्क राशि के जातक अत्यधिक भावुक तथा संवेदनशील होते हैं। इनके फैसले व जीवनचर्या दिमाग पर नहीं दिल पर आधारित होते हैं। किन्तु ये लग्न के पक्के होते हैं। जिस काम को ठान लें, उसे करके ही रहते हैं। यदि चन्द्रमा निर्बल न हो तो इनका मनोबल बहुत उठा होता है। इच्छा शक्ति व मनोयोग के बल पर ये जातक ऐसे कार्य भी कर जाते हैं जो इनकी शारीरिक क्षमता या आर्थिक सामर्थ्य से परे होते हैं। ये लोग अपने बच्चों व परिवार का विशेष ध्यान रखने वाले होते हैं और प्रायः इनका पूरा जीवन ही घर-गृहस्थी को समर्पित रहता है। कर्क कर्क राशि का चंद्र कुंडली में होने पर जातक दीर्घायु, कुमारी स्त्रियों के अधीन रहनेवाला, अच्छा दोस्त, ज्योतिषशास्त्र में रुचि रखनेवाला, बाग-बगीचों का शौकीन, अनेक बिल्डिंगों का मालिक, सुगंधित द्रव्यों का शौकीन, आचरणशील, मित्रों और भाइयों से लगाव रखनेवाला, आदर्शवादी, निष्ठावान, परिवार, गांव, प्रांत एवं देश के लिए त्याग करनेवाला और कोधी स्वभाव का रहता है। ऐसे जातक को कठिनाई में स्त्रियों की मदद मिलती है।
ये लोग मूडी व अस्थिर स्वभाव के होते हैं। चांदनी रात में तथा तालाब, झील आदि के निकट से विशेष प्रकार की प्रसन्नता अनुभव करते हैं। स्वतंत्रताप्रिय, प्रकृतिप्रेमी, सौंदर्यप्रेमी तथा शृंगारप्रिय होते हैं। कला में दखल/रुचि रखने वाले तथा रात में विशेषरूप से संवरने के शौकीन होते हैं। ये लोग संकोची प्रवृत्ति के होते हैं और अपने मन की पीड़ा से स्वयं घुटने वाले होते हैं। छोटी-छोटी बात से भी आहत हो जाते हैं, उसकी शिकायत न कर उसे मन में रखकर ही घुलते रहते हैं और बहुत समय बाद मानसिक विस्फोट होने पर उस शिकायत को करते हैं। गुरु शुभ स्थान पर हो तो ये जातक अत्यंत भाग्यशाली होते हैं।
ये शांतिप्रिय, उदार, दयालु, जानवरों से विशेष करुण भाव रखने वाले, न्यायप्रिय/निष्पक्ष तथा परोपकारी होते हैं और अपनी सामर्थ्य से बढ़कर भी दूसरों की मदद करते हैं, क्षमाशील होते हैं। इन्हें अपने बचपन की छोटी-छोटी घटनाएं भी विस्तार से याद होती हैं, जो कभी उदास/निरुत्साहित होने पर याद किए जाने पर इनमें पुनः प्रेरणा का संचार करती हैं। ये जातक प्रायः चुप रहने वाले (व्यर्थ बकवास न करने वाले) होते हैं। इन्हें क्रोध बहुत कम आता है, क्योंकि इनका धैर्य व सहनशीलता अत्यधिक होती है। जब कभी आ जाए तो इन्हें खुद पता नहीं होता कि गुस्से में क्या कर बैठें। फिर भी बहुत शीघ्र अपने क्रोध को नियंत्रित कर लेते हैं और बाद में इसके लिए पछताते हैं। कई बार स्वयं को दण्डित भी करते हैं।
कर्क राशि के जातक ऊंचे स्वर में बात नहीं करते तथा चिल्लाकर बोलने वालों को पसंद भी नहीं करते। दूसरों की परेशानियों को समझने वाले तथा उनके अधिकारों का हनन न करने वाले होते हैं, भले ही अपने अधिकारों का इन्हें त्याग करना पड़े। किन्तु ये रसिकमिजाज अवश्य होते हैं, बुद्धिमान होते हैं किन्तु मासूम/भोले होते हैं। यद्यपि स्वयं को बहुत अनुभवी समझते हैं। परन्तु दुनियादार नहीं होते। इनकी भावुकता का लाभ उठाकर या इनकी करुणा को उभारकर इन्हें सहज ही ठगा जा सकता है। ये अत्यधिक कल्पनाजीवी होते हैं। स्मरणशक्ति बहुत अच्छी होती है, प्रेम सम्बन्धों में प्रायः असफल ही रहते हैं। क्योंकि आदर्शवादी और संकोची होते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धात्मक ईर्ष्या विद्यमान रहती है। पेट, फेफड़ों या कफ सम्बन्धी रोग इन्हें सम्भावित होते हैं । मनोरोग, डिप्रेशन आदि भी सम्भव होते है। यदि चन्द्रमा दुष्प्रभाव में अथवा निर्बल हो तो इन जातकों में प्रायः अन्तरणा या स्वप्न से भविष्य दर्शन की विशेषता होती है तथा आध्यात्मिक रूप से उन्नति की प्रबल सम्भावना होती है। इस राशि की स्त्रियां श्रेष्ठ गृहणी होती हैं तथा आदर्श पत्नी के रूप में सफल होती हैं। वे सुन्दर व गुणवती भी होती हैं।कर्क राशि जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जब कर्क राशि में हो, यानी भचक्र के चौथे खण्ड (90°-120°) में हो तो उस जातक की जन्मराशि कर्क होती है। इस राशि के जातकों का राशीश चन्द्रमा है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 22 जून से 22 जुलाई के मध्य उत्पन्न हुए जातक कर्क राशि के होते हैं। कर्क राशि के जातक अत्यधिक भावुक तथा संवेदनशील होते हैं। इनके फैसले व जीवनचर्या दिमाग पर नहीं दिल पर आधारित होते हैं। किन्तु ये लग्न के पक्के होते हैं। जिस काम को ठान लें, उसे करके ही रहते हैं। यदि चन्द्रमा निर्बल न हो तो इनका मनोबल बहुत उठा होता है। इच्छा शक्ति व मनोयोग के बल पर ये जातक ऐसे कार्य भी कर जाते हैं जो इनकी शारीरिक क्षमता या आर्थिक सामर्थ्य से परे होते हैं। ये लोग अपने बच्चों व परिवार का विशेष ध्यान रखने वाले होते हैं और प्राय: इनका पूरा जीवन ही घर-गृहस्थी को समर्पित रहता है। ये लोग मूडी व अस्थिर स्वभाव के होते हैं। चांदनी रात में तथा तालाब, झील आदि के निकट से विशेष प्रकार की प्रसन्नता अनुभव करते हैं। स्वतंत्रताप्रिय, प्रकृतिप्रेमी, सौंदर्यप्रेमी तथा श्रृंगारप्रिय होते हैं। कला में दखल/रुचि रखने वाले तथा रात में विशेषरूप से संवरने के शौकीन होते हैं। ये लोग संकोची प्रवृत्ति के होते हैं और अपने मन की पीड़ा से स्वयं घुटने वाले होते हैं। छोटी-छोटी बात से भी आहत हो जाते हैं, उसकी शिकायत न कर उसे मन में रखकर ही घुलते रहते मंगल व्रत हमेशा ही श्रेष्ठ रहेगा। स्त्री हो तो मंगला गौरी व्रत करें अर्थात् मंगल के दिन पार्वती की पूजा कर व्रत करें। । रविवार व्रत श्रेष्ठ है।
★★★★कर्क राशि★★★★
"कर्काय नमः ।"
√●संत वचन है ...
"सबहिं नचावत राम गोसाई।"
(रा.च.मा।)
√●राम सब को नचा रहा है। यह नाच रहे हैं। नक्षत्र राशियों नाच रही हैं। जीव नाच रहे हैं। मन नाच रहा है। सब को नचाने वाला विश्व रूप हो कर स्वयं नाच रहा है। वह नाचना बन्द कर दे तो संसार श्मशान हो जाय। यह उसकी लीला है। इसे केवल वही जानता है। मुझ में सामर्थ्य कहाँ की मैं जानूँ । मैं उसकी शरण में रह कर नाम का अवलम्बन लिये जी रहा हूँ। नाम से गतिशील हूँ।
√●सहस्रनाम की महिमा को प्रकाशित करने के लिये एक आख्यान सुना रहा हूँ। संकट से उबरने का क्या उपाय है ? ऐसा प्रश्न पार्वती माता ने भोले शिव से किया। शिव ने उत्तर दिया- सहस्रनाम द्वारा विष्णु का स्तवन । पार्वती को यह बात हृदयंगम हो गई। ऐसी कथा है, रावण शिव के पास गया। स्तुति करके शिव को प्रसन्न किया। शिव ने वर माँगने को कहा। पार्वती के अनिन्द्य सौन्दर्य को देख कर रावण ने पार्वती को ही माँग लिया। शिव ने पार्वती को दे दिया। रावण पार्वती को लेकर कैलाश से लंका को चला। शिव से बिछुड़ कर रावण के साथ होना ही पार्वती का संकट था। पार्वती ने इस संकट से त्राण पाने के लिये सहस्रनामों से भगवान् विष्णु का स्मरण किया। विष्णु प्रसन्न हुए।
√●विष्णु ने अपने शरीर पर लगे हुए चन्दन से पार्वती के सदृश एक सुन्दरी का निर्माण किया । इस सुन्दरी को उन्होंने मय दानव को दे दिया। मय दानव इसे लेकर पाताल लोक चला गया। वह इसे अपनी पुत्री समझा। विष्णु ब्राह्मण का वेश धारण कर मार्ग में पार्वती को साथ लिये जा रहे रावण से मिले । भगवान् ने रावण से कहा- शिव ने तुम्हें ठग लिया है। उन्होंने असली (वास्तविक) पार्वती मय दानव को दे दी है। मयदानव उसे लेकर पाताल में रह रहा है। ऐसा उन्होंने इसलिये किया है, जिससे तुम पार्वती को न पा सको। अधिक से अधिक तुम भूलोक एवं स्वर्ग लोक में ढूंढोगे। पाताल को अपनी पूरी समझ कर उसमें खोजोगे नहीं। शिव ने तुम्हें नकली (माया की) पार्वती दिया है। ब्राह्मण झूठ नहीं बोलता। ऐसा समझ कर रावण ने इस बात पर विश्वास किया। रावण यह न जान सका कि यह छद्य ब्राह्मण है, वास्तविक नहीं। रावण लौट पड़ा। उसने शिव को पार्वती वापस कर दो। वहाँ से पाताल लोक गया। मय दानव से उसने उस (विष्णु प्रदत्त) कन्या को छीन लिया। वहीं विवाह किया। वह कन्या भी पार्वती सदृश थी। उसका कटि भाग अत्यन्त कृश था। कृश कुक्षि होने ने रावण ने उसका नाम मन्दोदरी रखा। सोता को खोज में गये हुए हनुमान ने इस मन्दोदरी को कुछ क्षण के लिये सीता समझ लिया था। सीता (मानवी), पार्वती (देवी) तथा मन्दोदरी (दानवी) एक जैसे रूप वाली थीं। गुण अलग-अलग थे।
√●सीता पति राम मानव आदर्श के प्रतीक हैं। पार्वती-पति शिव देव आदर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं। मन्दोदरी-पति रावण राक्षसी मूल्यों का आदर्श है। ज्योतिष में तीन गण होते हैं। २७ नक्षत्र इन्हीं तीन गणों में बँटे हुए हैं। देवगण, मनुष्य गण राक्षसगण। जिसका देवगण है, वह पुरुष शिव के गुणों वाला है तथा वह स्त्री पार्वती के गुणों वाली है। जिसका मनुष्य गण है, वह पुरुष राम के गुणों से ओतप्रोत है तथा वह स्त्री सीता के गुणों वाली है। जिसका राक्षस गण है, वह पुरुष रावण के गुणों को रखता है तथा वह स्त्री मन्दोदरी के गुणों से युक्त है। शिवपार्वती, राम जानकी, रावण मन्दोदरी के गुण धर्म पुराणों के माध्यम से सब को ज्ञात हैं। शिव के आधे (वाम) भाग से पार्वती का प्राकट्य हुआ है। तबसे नारियों को वामांगी एवं अर्द्धांगिनी कहा जाने लगा है। सीता का अविर्भाव अधिरक्त से हुआ है। ऐसी कथा सुना हूँ कि रावण ने अषियों से कर (दण्ड शुल्क) माँगा। सभी अषियो ने अपना एक-एक बूंद रक्त एक घट में एकत्रित करके रावण के पास भेजा। रावण ने उस घट के ढक्कन को हटाया तो उसमें से एक कन्या निकली। यह कन्या रावण की मृत्यु के लिये आयी है-ऐसी आकाशवाणी हुई। रावण ने उसे अपने दूतों से सुदूर उत्तर दिशा में भेज कर भूमि में गाड़ देने का आदेश दिया। नारी अवध्य है, इस कारण रावण ने उसे मारा नहीं। दैव योग से राजा जनक ने उस भूमि को एक ब्राह्मण को दान कर दिया। ब्राह्मण ने उसमें हल चलवाया। भूमि से एक घट निकला। इसे राज धन समझकर ब्राह्मण ने राजा को दिया। राजा जनक ने उस घट का ढक्कन हटवाया तो उसमें से एक कन्या निकली। जनक ने इसे अपने पास रख लिया। इसे जानकी, धरणिजा, सीता कहते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि पार्वती, सीता, मन्दोदरी अयोनिजा हैं। ये तीनों देवियां वैष्णव धर्म में प्रतिष्ठित हैं। इनके प्रति आदर भाव रखते हुए मैं सभी वैष्णवों की प्रसन्नता के लिये ज्योतिष तत्व की चर्चा करता हूँ।
√●ज्योतिष चक्र की चौथी राशि कर्क है।
कृ + क= कर्क।
कृ धातु स्वादि. उभ. कृणोति कृणुते हिसार्थक / ध्वंसार्थक है तथा तनादि, उभ करोति कुरुते क्रिया बोधक निर्माणार्थक/रचनार्थक है।
कर्क का अर्थ है- अग्नि, श्वेत अश्व, केकड़ा कोट, दर्पण, जल कुम्भ । अग्नि जलाने के कारण हिंसा ध्वंस विनाश करता है।
श्वेत अश्व (मन) अत्यन्तक्रियाशील है तथा तीव्र गति से भागता है। केकड़ा कीट भी जल के निकट रहता हुआ चलता रहता है। दर्पण और जलकुंभ में देखने पर द्रष्टा का प्रतिबिम्ब बनता है। इसलिये ये दोनों रचना धर्मी वा निर्माणक हैं। ये सभी विशेषताएँ कर्क राशि में विद्यमान हैं। कर्क राशि की विशेषता बतलाने वाला एक श्लोक है...
"कर्कों कुलीराकृतिरम्भसंस्थो
वक्षः प्रदेशे विहितश्च धातुः ।
केदार वापी पुलिनानि तस्य
देवाङ्गनारम्यविहारभूमिः ॥"
√●कर्क राशि की आकृति केकड़े के समान है। यह जलचर संज्ञक है। काल-पुरुष के शरीर में इसका स्थान वक्षस्थल है। दलदल वाली भूमि, आर्द्रभूमि, तालाब का तट, देवांगना (सुन्दर स्त्री), मनोहर एवं विहारयोग्य स्थान में इस राशि का निवास होता है।
√● राशि चक्र में इसका विस्तार ९१° से लेकर १२०° तक है। यह चन्द्रमा की राशि है। चन्द्रमा राज ग्रह है। इसलिये यह राजराशि हुई। चन्द्रमा मन है। इसलिये कर्क राशि भी मन हुई। जातक का मन कैसा है ? यह जानने के लिये कुण्डली में कर्क राशि पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। यह राशि जितनी अधिक बली होगी, जातक का मन उतना ही बलवान होगा। कर्क राशि में जो ग्रह होता है, मन पर उसी का वर्चस्व होता है। कर्क राशि को जो ग्रह देखता है, तदनुसार मन की गति होती है। चन्द्रमा जिस राशि में होता है, उस राशि के स्वामी की तरह उसका मन होता है। चन्द्रमा को जो यह देखता है, उसी के गुण-धर्मों वाला उसका मन होता है। कुण्डली में चतुर्थ भाव मन है। चतुर्थ भाव में जो ग्रह होता है, तदनुरूप मन का स्वरूप होता है। चतुर्थ भाव को जो ग्रह देखता है, वह अपनी प्रकृति के समान मन को बनाता है। कर्क राशि में जो ग्रह है, वह जिस नवांश में है, उस नवांश के स्वामी का प्रभाव भी मन की संरचना पर गहराई से पड़ता है। चन्द्रमा जिस नवांश में है, उस नवांशेश की प्रकृति के अनुसार मन होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मन पर बहु कोणीय प्रभाव पड़ता है। इस कारण मन बड़ा जटिल होता है। जो प्रभाव सर्वाधिक होता है, मन वैसा दिखायी पड़ता (व्यवहार में होता) है। ४ की संख्या साक्षात् मन है।
√●राशि ४ हर प्रकार से बली है तो उस जातक को चार पुरुषार्थ धर्म अर्थ, काम, मोक्ष का सम्यक् लाभ ध्रुव है। अब इस राशि के गुण शील का कथन पूर्वाचार्यों के मत से करता हूँ।
√●यह राशि चर, बहुपद कीट, जलाशय निवास, सम आकार, स्त्री, सौम्य, चतुर्थस्थान बली, हृदय अवयव, स्निग्ध कांति, रात्रिबली, उत्तरदिशा वली, धातुकारक, पृष्ठोदय है। नकारात्मक सत्ता, अशक्त पुष्टता, गुलाबीरंग, जलतत्व, पूर्णजलराशि, होन शब्द वाली राशि है। इससे खनिज पदार्थ, मातृसंबंध श्वसुर उपसंबंध का विचार किया जाता है। यह कफप्रकृति बहुसंतान, सतोगुणी, ब्राह्मण वर्ण, द्वार राशि है। इसका वायव्य ओर प्लवत्व है।
√●कर्क राशि प्रश्न लग्न में होती है तो उससे व्यवसाय चिन्ता का विचार किया जाता है।
√●इसका उदयमान २ घण्टा १८ मिनट है।
√●इसका मृत्युप्रद चन्द्रांश २२ है।
√●कर्क राशि के ५° तक बृहस्पति उच्च का होता है।
√● इसी राशि के २८° तक मंगल नीच का होता है।
√●यह राशि अस्थिर, स्त्री संज्ञक, सौम्य शीत प्रकृति जलचारी उत्तरदिशा की स्वामिनी, रक्त धवल मिश्रित वर्ण तथा मोटे शरीर वाली है। इस का प्राकृतिक स्वभाव सांसारिक उन्नति में प्रयत्न शोलता, लज्जा, कार्य स्थैर्य, समयानुनायिता है। इससे पेट का ऊपरी हिस्सा छाती और गुर्दे का विचार किया जाता है।
√★★विभिन्न भावों में कर्क राशि का क्या फल है, अब इसे लिखता हूँ।
√★१. प्रथम में ४- गौरांग, बड़ा बुद्धिमान्, क्षमाशील, पवित्र, धर्मात्मा, हँसमुख, नदी में तैरने का प्रेमी, अधिक मित्रों वाला।
√★२. द्वितीय में ४ - न्याय से संग्रह करने वाला, जलोत्पन्न पदार्थों का संग्राहक, जल से भय, बड़ा कुटुम्ब ।
√★३. तृतीय में ४ कृषि कर्म, धर्म कथानुरागी, सुशील, अहंकारी, बाहुबली, क्रियाशील, वैश्य से मैत्री संबंध |
√★४. चतुर्थ में ४- रूपवान्, सुभग, सुशील, स्त्री सम्मत, विद्यावान्, जलोद्यान का सुख, सर्वप्रिय ।
√★५. पञ्चम में ४ - विपुल कीर्ति, महानुभाव, धनी, कंन्यासंतति, विदेश वास, दुघर्षपुत्रों से सुख, विनयी स्वभाव।
√★ ६. षष्ठ में ४- ब्राह्मणों से, राजपरिवार वालों से, महाजनों से झगड़ा होने का भय, शीतज्वर का भय ।
√★ ७. सप्तम में ४- अतिमनोहरी सौभाग्य शालिनी सगुणी सौम्य कुलीन पत्नी की प्राप्ति ।
√★८. अष्टम में ४ जल में डूब कर किसी जहरीले कोट के काटने से या परदेश में जीवन का अन्त।
√★९. नवम में ४- कठिन व्रतों का करना, यज्ञानुष्ठानादि को करते रहना, तीर्थ में भ्रमण, वन में तपकर्म ।
√★१०. दशम में ४ - लोगों के लिये जल की व्यवस्था करना, अधिक दौड़धूप वाले कार्यों का सम्पादन करना।
√★११. एकादश में ४ - कृषि व्यवसाय से, शास्त्र की वृत्ति से, सत्पुरुषों के सम्बन्ध से अधिक लाभार्जन ।
√★१२. द्वादश में ४ ब्राह्मण देवताओं के निमित्त, यज्ञ के निमित्त, साधुजनों द्वारा प्रशंसित कार्यों में विपुल व्यय ।
√●●कर्क राशि में विभिन्न ग्रहों की स्थिति से जो फल होता है, अब उसका कथन करता हूँ।...
√●१. सूर्य ४ में सौजन्य हीन, बहुत धनी, कलियुगी, तीक्ष्ण स्वभाव, मार्ग क्लेश, खिन्न मन ।
√●२. चन्द्र ४ में अदीर्घसूत्री, स्त्री वशी, ज्योतिषी, गृही, प्रकृतिप्रेमी, कला प्रेमी, कुटिल, बलवान् बुद्धिमान, वृद्धि-क्षय को प्राप्त, विलासी ।
√●३. मंगल ४ में तीक्ष्ण किन्तु दूषित बुद्धि, अत्यन्तदीन, उपद्रवी, स्त्री द्वेषी, परगृह सेवी, दुर्जन, नौकर्मी, जलभृत्य ।
√●४. बुध ४ में राजसेवक, परदेशगमन में रुचि, दुष्ट आचरण, सुन्दर स्त्रियों के संग रमण करने वाला, अभिनेता ।
√● ५. गुरु ४ में अनेक शास्त्रों एवं कलाओं की जानकारी काममरा, धनी, चतुर, मृदुभाषी, ऐश्वर्यशाली, सुखी।
√●६. शुक्र ४ में सैण, याचक, लोभी, मृदु, कलावन्त दुःखी, भय युक्त, एकाधिक स्त्रीसंग ।
√● ७. शनि ४ में दुर्बल काय, मातृसुखवंचित लक्ष्मीवान् भोगी शत्रुघ्न खिन्नमन विरागी।
√●८. राहु ४ में कल्पनाशील, काव्यात्मक अभिरुचि, दरिद्री, घरहीन, सुखहीन, परावलम्बी। सुखी ।
√● ९. केतु ४ में उत्कृष्ट प्रतिष्ठा, प्रतिभावान् गुप्त विद्याओं का जानकार, शीघ्रकर्मी, श्रेष्ठ आवास ।
√●कर्कराशि निर्वैर राशि है। इस राशि वाले दुष्टों एवं सज्जनों दोनों से कुशलतापूर्वक अपने सम्बन्ध बनाये रखते हैं। ऐसे लोग किसी के प्रति शत्रुता रखना पसन्द नहीं करते। लोगों से इनका सम एवं मैत्र सम्बन्ध होता है।