ज्योतिष तंत्र तत्त्व गूढ़ रहस्य

√••कुण्डली में लग्नस्थान जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्ववाला स्थान सप्तम है। लग्न कितना ही अच्छा हो, सप्तम के अशुभ होने से जीवन नीरस और कभी-कभी कुरस हो जाता है। सप्तम अग्निस्थान है ऐसा कौन है, जिसे कामाग्नि नहीं जलाती ? सारा संसार कामयज्ञ कर रहा है। यह यज्ञ उत्पत्ति का हेतु है। यह यज्ञ आनन्द का उत्स है। 
                 "तस्मै यज्ञाय नमः।"

√•सप्तम भाव कालपुरुष का उपस्थ है। पुरुष की कुण्डली में सप्तमस्थान शिश्न है तो स्त्री की कुण्डली में योनि । दोनों की कुण्डली में यह मैथुन क्रिया का स्थान है। काम यज्ञ का निष्पादन स्थान सप्तम भाव है। जैसे काष्ठमन्थन से यज्ञाग्नि प्रकट होती है, उसी तरह पुरुष स्त्री के उपस्थ मन्थन से कामाग्नि का प्रज्ज्वलन होता है। इसमें पुरुष अपने वीर्य की आहुति डालता है। स्त्री की योनि यज्ञ को वेदी होती है। मैथुन ही सृष्टियज्ञ का दूसरा नाम है। इसका फल है; सुख, आनन्द, तृप्ति इस विषय में ऋषि का कथन है...

"एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ,
ओषधीनां पुष्पाणि, पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः,
 पुरुषस्य रेतः । "
( बृहदारण्यक उपनिषद ६।४।१)

√•【इन पञ्चभूतों का रस पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का रस (सार) ओषधि है। ओषधियों का रस पुष्प हैं। पुष्पों के रस फल हैं। फलों का रस पुरुषशरीर है। पुरुष शरीर का रस वीर्य है।】

√•प्रजापति ब्रह्मा ने सर्वप्रथम वीर्य उत्पन्न किया। इस वीर्य को व्यर्थ न होने देने के लिये उसने स्वी की रचना की है। ऋषि कहता है...

"सह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हस्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति,
 स स्त्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाध उपास्त, तस्मात्
 स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत् तेनैनामभ्यसृजत्।"
(बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।२)

√• [उस प्रजापति ने इच्छा की कि इस पुरुषसार (वीर्य) के लिये प्रतिष्ठा (उत्तम स्थान) बनाऊं। तब उसने स्त्री को रचा। उसको रच कर उसेनीचे आराधा अर्थात् भूलोक में उसे पत्नी रूप में नियत किया। जिससे पुरुष उसे पत्नी रूप में अराधे। उसने इस पुरातन शिलावत् कठोर व्रत को पूरा किया। उसी से स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक नियम को रचा ।]

 ••सप्तम भाव रूप स्त्री तत्व का वर्णन करते हुए ऋषि कहता है...

 "तस्या वेदिरूपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे, समिद्धो ।
मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य 
लोको भवति, तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानद्योपहासं
 चारत्यासाँ स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानघोपहासं - चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृते।" 
      (बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।३)

√•तस्या = उस (स्त्री) की। 
√•वेदि (पुत्रेष्टि यज्ञ का स्थल ।
√•उपस्थः = योनि स्थान।
√•लोमानि= रोएँ । 
√•बर्हिः =कुशाएँ।
 √•चर्म-अधिषवणे = मृगचर्म और अधिषवण।
 √•समिद्धः = दीप्त।
 √•मध्यतः = मध्यभाग में।
 √•तौ = वे दोनों। 
√•मुष्कौ= दोनों मुष्क (कपाट)। 
√•सः वह यावान् = जितना ।
√•ह वै = निश्चय से। 
√•वाजपेयेन = वाजपेय (यज्ञ) से। यजमानस्य = यज्ञकर्ता का।
 √•लोकः = स्थिति फल प्राप्ति। 
√•भवति = होता है।
 √•तावान् = उतना । 
√•अस्य = इसका।
 √•लोकः = स्थान, फल। 
√•भवति = होता है।
 √•यः =जो।
 √•एवम् = इस प्रकार। 
√•विद्वान् = जानने वाला।
√•अद्योपहासम् = रतिकर्म, आधान-निषेक क्रिया ।
 √•चरति =करता है।
 √•आसाम् = इन स्त्रीणाम् स्त्रियों के।
 √•सुकृतम्= पुण्य को।
 √•वृङ्क्ते = पा लेता है।
 √•अथ =और।
 √•यः जो इदम् = इसको 
√•अविद्वान्= न जानता हुआ। अद्योपहासम् =मैथुन कर्म।
 √•चरति = करता है।
 √•अस्य = इस (मूर्ख के)।
 √•स्त्रियः = स्त्रियाँ।
 √•सुकृतम् = पुण्य को।
 √•वृञ्जते = हर लेती हैं।

√•••इस मन्त्र में यही बताया गया है कि स्वी का शरीर यज्ञशाला है। उसका जननांग / योनि स्थल यज्ञ की वेदी है। योनि स्थान पर उगे हुए रोयें. (बाल) उस वेदी पर बिछी हुए कुशाएँ हैं। भगोष्ठ (योनि के छिद्र को ढके हुए दो मांस फलक) ही मृगचर्म है। इस भगोष्ठ के नीचे दो अन्य लघु कपाट (मांस फलक) ही अधिषवण हैं। भगांकुर ही प्रदीप्त अग्नि की लपट है।

 √••मैथुन कर्म वाजपेय यज्ञ है। वाजपेय का अर्थ है-बल, मैथुननि जो बली है, जिस पुरुष के शिश्न में शक्ति है, जिस पुरुष का लिंग स्त्री योनि के सन्निकर्ष से कठोरता/दृढ़ता को प्राप्त करता है, वही इस यज्ञ का सम्पादन कर सकता है। ऐसा पुरुष बाजपेयी है। यजमान स्त्री है। बाजपेयी पुरुष, यजमान स्वी का यज्ञ करता है-उसकी योनि में शेफ रूपी खुवा से घृतरूपी वीर्य की आहुति डालता है। इससे स्त्री को लोक में प्रतिष्ठा मिलती है। स्त्री गर्भवती होगी, पुत्र जनेगी तो लोक में सम्मान प्राप्त पायेगी जो विद्वान् 1 स्त्री में यज्ञ की भावना से निषक करता है, वह स्त्री के पुण्य कर्मों के फल का आस्वादन पाता है। स्त्री को यज्ञशाला मानकर, उसकी योनि को यज्ञ वेदिका समझ कर रतिकर्म करने का अर्थ है-स्त्री को मान प्रतिष्ठा देते हुए उसका उपभोग करना। इससे स्त्री प्रसन्न होगी। उसकी इस प्रसन्नता से उसका पुण्य उसे स्वतः प्राप्त होता है। ऐसा विद्वान पुरुष सुखी होता है। जो यज्ञ भाव से अद्योपहासन (रतिक्रिया) नहीं करता अर्थात् स्त्री को सम्मान नहीं देता, वह उसका पुण्य पाने से वञ्चित रहता है, उल्टे अपना पुण्य ही उसे देता है। पुण्य से रिक्त पुरुष दुर्दशा को प्राप्त होता है। ऐसा पुरुष अविद्वान् होता है। ऐसा करने वाला अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता है। बलात्कारी पति मूर्ख होता है, क्योंकि वह अपने पुण्य को गवाँता है।

√•स्त्रीरूप  यजमान यज्ञ से सन्तुष्ट है प्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा पायेगा ही। यह दक्षिणा ही स्त्री का सुकृत है। यजमान असन्तुष्ट है, अप्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा से च्युत रहेगा। दक्षिणा से होन विपन्न पुरुष की गति का वर्णन में कैसे करूँ !

 √•यज्ञशाला साफ सुथरी होनी चाहिये। स्त्री को देह स्वच्छ एवं सुभूषित-सुवासित होनी चाहिये। यज्ञवेदी पवित्र होनी चाहिये। स्त्री की योनि भी पवित्र (ऋतु स्नान के पश्चात् काँ) होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त यजमान स्त्री एवं होता पुरुष के भाव भी दिए होने चाहिये। ऐसा यज्ञ करने कराने वाले नर-नारी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम ।

√• हर पुरुष (गृहस्थ) की अपनी एक यज्ञशाला (पत्नी) होनी चाहिये। हर स्त्री (विवाहिता) का अपना एक याज्ञिक (वाजपेय पुरुष) वा पति होना चाहिये। यह यज्ञ (मैथुन) यथा समय होते रहना चाहिये। इससे दोनों स्त्री-पुरुष का ऐश्वर्य बढ़ता है। यह मैथुन यज्ञ तीन प्रकार का होता है।

 √•१. तामसी मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष जब अपना स्वार्थ देखता है, स्त्री के स्वार्थ (आनन्द) की अवहेलना करता है तो वह पिशाच होता (कहा जाता है। जब स्त्री ऐसा करती है तो वह पिशाचिनी की संज्ञा प्राप्त करती है। कलियुग में ऐसे यज्ञ अधिक हो रहे हैं।

 √•२. राजसी मैथुन- इसमें स्त्री और पुरुष परस्पर के सुख का ध्यान रखते हैं। ऐसे स्त्री-पुरुष क्रमशः यक्षिणी एवं यक्ष कहलाते हैं।

 √|३. सात्विक मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष को सतत चेष्ठा रहती है कि वह स्त्री को पूर्णतः तृप्ति पुरुष को सुसन्तुष्ट रखती है। ऐसे स्त्री पुरुष क्रमशः ऋषि और ऋषि होते हैं। 

√•अपनी ही वेदी (स्वस्त्रीयोनि) में ही पुरुष हवन करे, दूसरे की वेदी (परस्त्रीयोनि) में नहीं। धर्मसंगत होन पर दूसरे की वेदी पर हवन किया जा सकता है। जैसा कि जगद्गुरू श्री वेदव्यास ने अपनी माता सत्यवती के आह्वान पर महाराज विचित्रवीर्य की दो विधवाओं एवं एक दासी की यज्ञ वेदी पर स्ववीर्य का हवन करके धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर को पैदा किया। इससे अस्त होता हुआ कौरव वंश बच गया।

√• गृहस्थी का यही आचार धर्म है कि वह स्त्री को यज्ञ रूप जान कर उसके साथ बर्ताव करे। इस धर्म का समर्थन आणि उद्दालक, मौद्रल्य नाक एवं कुमार हारीत ने अपनी-अपनी स्मृतियों में किया है।

 "एतद्ह स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणि: आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह ।"
         (बृह.उप. ६।४।४)

 √•ब्राह्मण कहलाने वाले बहुत से मनुष्य मैथुन कर्म को यज्ञ न मानते हुए दुराचार के कारण इन्द्रियहीन सुकृतरहित होकर इस लोक से अशुभ लोक को जाते हैं। ऐसे वे ही जन होते हैं जो इस सदाचार के भेद को न जानते हुए संसर्ग (मैथुन) करते हैं। कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनका वीर्य सोते वा जागते स्खलित होता है अर्थात् स्त्री को यज्ञ के समान पवित्र नहीं समझते और उसे विषय का साधन समझते हैं, वे भी बुरे लोकों को पाते हैं, पतन के गर्त में गिरते हैं।

 "बहवो मर्या ब्राह्मणाय निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्त्रीस्माल्लोकात् यन्ति य इदमविद्वांसोबी धोपहासं वरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दयति ।"
        ( बृह. उप. ६।४।४ )

 √•पुरुष मैथुन यज्ञ नहीं करेगा तो उसका वीर्य सोते-जागते व्यर्थ में स्खलित होगा। स्खलन से होने वाली क्षति से बचने के लिये उसे मैथुन करना चाहिये वीर्य की सार्थकता इसी में है। जिसका वीर्य स्वप्नदोषादि के माध्यम से वह जाय उसे क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...

"तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत्वन्मेऽद्यरेतः पृथवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः । इदमहं तदेत आददे पुनर्मामेत्विन्द्रियं पुनस्ते पुनर्भगः । पुनराधिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनी वा भ्रुवौ वा निमृज्यात्।"
         (बृह.उप.६/४/५)

√•तद् =उस (स्खलित वीर्य) को ।
√•अभिमृशेत्= छुवे।
√•अनुवा मन्त्रयेत्= अथवा चिन्तन करे कि ऐसा क्यों हुआ)। 
√•यत् = जो।
 √•मे= मेरा ।
√•अद्य = आज।
 √•रेतः = वीर्य।
 √•पृथिवीम् = पृथिवी पर ।
√•अस्कान्सीत् =स्खलित होकर गिरा है।
√• यद्= जो। 
√•ओषधीः= ओषधियों को। 
√•अपि = भी।
√•असरत् = चला / सरका है।
√• यद् = जो।
√•अप = जलों को।
√•इदम् = यह इस ।
√•अहम् = मैं।
 √•तद् = उस।
√• रेतः =वीर्य को।
 √•आददे = ग्रहण करता हूँ, पुनः संचित करता हूँ (फिर से स्खलित नहीं होने दूंगा)।
 √•पुनः= मुझको।
√• एतु = प्राप्त हो, आवे।
 √•इन्द्रियम्= इन्द्रिय सामर्थ्य ।
 √•पुनः = फिर। 
√•अग्निः =शरीराग्नि।
 √•धिष्ण्या = धारण करने वाली (बुद्धि या समझ) ।
 √•यथास्थानम् = पूर्ववत् अपने-अपने स्थान पर । 
√•कल्पन्ताम् = होवें । 
√•इति = ऐसे जप कर वा चिन्तन कर।
 √•अनामिका + अङ्गुष्ठाभ्याम् = अनामिका अंगुली तथा अंगूठे से।
 आदाय ग्रहण कर।
 √•अन्तरेण = मध्य में।
 √•स्तनौवा = दोनों स्तनों (हृदय प्रदेश) के।
 √•भ्रुवौ वा = दोनों भृकुटियों (मस्तिष्क वा ललाट) के।
 √•निमृज्यात्= प्रक्षालन करे, जल से मार्जन करे (हृदय एवं मस्तिष्क की शुद्धि करे)।

√••हृदय भावों का घर है। मस्तिष्क विचारों का आलय है। हृदय और मस्तिष्क के दूषित होने पर भाव और विचार दूषित होते हैं। इनके दूषित होने पर वीर्य का नाश होता है इसलिये अंगुष्ठा और अनामिका से स्खलित वीर्य वा वीर्य स्थान शिश्न का स्पर्श कर पुनः इसी से पश्चात्ताप की भावना करता हुआ भृकुटिमध्य एवं हृदयमध्य का संस्पर्श करे। अनामिका सूर्य की अंगुली है। सूर्य आत्मा का कारक है। अंगुष्ठ शुक्रमह का स्थान है। शुक्र वीर्य वा काम शक्ति का कारक है। सूर्य और शुक्र दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। दोनों का सहयोग होना पारस्परिक पुष्टि के लिये शुभ है। तन और मन से वीर्य की रक्षा करना ही स्पर्श का उद्देश्य है। स्पर्श मन्त्र का भाव यह है...

√•आज जो मेरा रेतस् पृथ्वी पर स्खलित हो गया, जो ओषधियों की ओर तथा जलों की ओर बहा, मैं वह सामर्थ्य लेता हूँ-निमह की शक्ति धारण करता हूँ। रेतस् निग्रह से मुझको फिर इन्द्रिय बल प्राप्त होवे, फिर तेज, फिर सौभाग्य प्राप्त होवे। अग्नि है स्थान जिसका वे अग्निधिष्ण्य देव- अपनी सामर्थ्य से फिर मुझको यथा स्थान में कर दे, मेरे गये हुए बल को फिर लौटा दे। ऐसा जफ्ते हुए अनामिका और अंगूठे से जल लेकर दोनों स्तनों एवं भ्रुवों के मध्य में लगावे।

 √•सबकी उत्पत्ति मैथुन से होती है। इसलिये सबके भीतर मैथुन क्रिया का संस्कार होता है। किसी को मैथुन सिखाना नहीं पड़ता। मैथुन करने का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता। रतिकर्म की दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। सबमें सम्भोग की इच्छा होती है। सब लोग सम्भोग करना जानते हैं। कोई तन से संयोग करता है। कोई मन से सहवास करता है। कोई मन और तन दोनों से संश्लेष करता है। ऐसा क्यों 7 स्त्री, पुरुष का एक भाग है। पुरुष उसे पाना चाहता है। पुरुष स्त्री का एक अंग है। वह उसे प्राप्त करने की इच्छा रखती है। इसलिये स्त्री-पुरुष का पारस्परिक सम्मिलन अनिवार्य एवं स्वाभाविक है। इसके लिये पुरुष स्त्री के साथ संगम करता है, पुरुष के साथ स्त्री सहयोग करती है। स्त्री यजमान है तो पुरुष पुरोहित। दोनों के सहकार से यह यज्ञ चल रहा है। दोनों की पार्थिव / शारीरिक संयुक्ति न होने पर मानसिक मैथुन होता है। इसमें कभी-कभी वीर्य स्खलित हो जाता है। इससे बचने के लिये परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन करते हुए भगवन्नाम जाप सरल निदान है। राम नाम जप से इष्टदेव का स्मरण करने से वीर्य की रक्षा होती है। मैथुन करते हुए वीर्य की रक्षा करने का यत्न करना चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास एवं ईश कृपा आवश्यक है । यह मेरा अनुभव है। इससे वीर्य की रक्षा होती है।

√•सप्तम भाव योनि है। योनि से सबका प्राकट्य होता है। इसलिये सप्तम भाव जन्म स्थान है। दूसरी ओर, लग्न को जन्म स्थान कहते हैं। यह विरोधाभास क्यों ? इसका अर्थ है-लग्न भाव प्रथम एवं योनिस्थान सप्तम का समान महत्व है। लग्न के अच्छा या बुरा होने से सप्तम भाव अच्छा या बुरा होता है। सप्तम स्थान के शुभाशुभ होने से लग्न स्थान शुभ वा अशुभ होता है। भविष्यफल कथन में इस तथ्य को आँखों से दूर नहीं करना चाहिये। ज्योतिषी अपनी दोनों आँखों से इन दोनों भावों पर एक साथ दृष्टि कर देखे और तब निर्णय करे। यही कारण है कि लग्न में मंगल के रहने से कुण्डली मंगली होती है तथा सप्तम में मंगल की उपस्थिति से भी कुण्डली में मंगलीपन आ जाता है। मंगल दोनों स्थानों में रहता हुआ दोष उत्पन्न करता है।

 √•लग्न में मैथुन का विचार होता है तो सप्तम मे वह विचार मैथुन क्रिया रूप में प्रतिफलित होता है। लग्न (मस्तिष्क) में मैथुन का विचार उठता है तो सप्तम (उपस्थ) में हलचल मच जाती है। यह तथ्य सब के द्वारा अनुभूत है।

 √••श्रीमद भगवद्रीता का एक श्लोक है...

 "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्बह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम् ।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥"
        (गीता अध्याय ४, श्लोक २४ )

√•मैथुन कर्म ब्रह्म कर्म है क्योंकि यह व्यापक रूप से सर्वत्र सब प्राणियों द्वारा किया जा रहा है। जब स्वी और पुरुष आपस में मिलते हैं-रतिक्रिया में लीन होते हैं तो दोनों की आँखें मुंद जाती हैं। सम्भोग की चरम अवस्था में दोनों निष्पन्द हो जाते हैं, हिलते-डुलते नहीं, एकाकार हो जाते हैं। यह आनन्द की अवस्था होती है। यह समाधिस्थता है। जीव, ईश्वर का ध्यान करता है। जब ईश्वर के साथ मिलकर जीव समाधि अवस्था में पहुँचता है अर्थात् ब्रह्म हो जाता है तो उसे जो सुख मिलता है, वही सुख पुरुष वा स्त्री को एक दूसरे में प्रवेश करके एक हो जाने से होता है। यह सुख ब्रह्मानन्द सहोदर है। मैथुन में स्त्री, पुरुषमय हो जाती है तथा पुरुष, स्वीमय हो जाता है। समाधि में जीव ईश्वरमय हो जाता है तथा ईश्वर, जीवमय हो जाता है। दोनों की युज्यता असम्पृक्तता ही आनन्द है। यह अनिवर्चनीय है। जो इसे अनुभव करे, वही जाने । समाधि ब्रह्मकर्म है, मैथुन ब्रह्मकर्म है। समाधि में ब्रह्माकार वृत्ति होती है। मैथुन में भी ब्रह्माकार वृत्ति होती है। यह अनुभूत सत्य है।

√•ब्रह्मार्पणम् = ब्रहम अर्पणम् वहा, अर्पण / दक्षिणा/ उपहार भेंट है। 

√•ब्रह्म हवि = ब्रहम हविघृत/आहुति/हवनीय द्रव्य है। 

√•ब्रह्माग्नौ= ब्रह्मारिन में बह्यरूपी अग्नि में ब्रह्म अग्नि है।

√• ब्रह्मणा हुतम् =ब्रह्म के द्वारा यज्ञीय अग्नि में डाला गया द्रव्य ।

√• तेन = उस (यज्ञ) के द्वारा।

 √•ब्रह्मैव गन्तव्यम् = ब्रह्म ही गन्तव्य / लक्ष्य प्राप्तव्य है।

 √•ब्रह्मकर्म समाधिना= समाधि से ब्रह्मकर्म।

【 सम् + आ + था कि = समाधि ।

√•समाधि का अर्थ है-ठहराव / स्थिरता/ गतिशून्यता, मन को, चित्त की, विचार की।】

√•चलता का त्याग समाधि है। पूर्ण शान्तिमयता समाधि है। गीता के इस श्लोक का पार्थिव अग्नि में हवन करने से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि यहाँ समाधि होती ही नहीं। ध्याता, ध्येय और ध्यान की त्रिपुटी का एकीकरण समाधि है। शान्तचित्तता समाधि है। शान्तचित से जो कर्म किया जाता है, वह साधारण कर्म न होकर ब्रह्म कर्म होता है। अथवा, शान्तचित्त व्यक्ति का हर कर्म ब्रह्मकर्म है।

√• यह सृष्टि अग्निषोमीय है। स्त्री अग्नि है। पुरुष सोम है। स्त्री को योनि में योषाग्नि है। पुरुष का वीर्य सोमतत्वी है। योषाग्नि में पुरुष अपने वीर्य का हवन करता है। इससे जो प्राप्त होता है अर्थात् सुख, वह ब्रह्म है। स्त्री को पुरुष द्वारा अथवा पुरुष को स्त्री द्वारा जो अर्पण किया जाता है, वह है प्रेम। यही दक्षिणा है।

√•प्रेम अर्पण वा दक्षिणा है, मैथुन यज्ञ की। यह दक्षिणा मैथुन से पूर्व दी जाती है। यह प्रेम ब्रह्म है। हवि वा घृत रूप वीर्य ब्रह्म है। योनिस्थ अग्नि / रज भी ब्रह्म है। रज ब्रह्म में रेतस ब्रह्म की आहुति डाली जाती है। आहुति डालने वाला पुरुष ब्रह्म है। यह मैथुन यज्ञ ब्रह्म है। इस यज्ञ के द्वारा प्राप्त होने वाला आनन्द भी ब्रह्म है। रतिक्रिया ब्रह्म कर्म है, केवल तभी जब यह शान्तचित्त होकर की जाती है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- यह उपनिषद् वाक्य इस श्लोक का केन्द्र बिन्दु है। इस ब्रह्माकार वृत्ति से मैथुन करने वाला पुरुष प्रणम्य है, विष्णु है। मैं उसे प्रणाम करता हूँ।

 √•स्त्री ब्रह्म है। पुरुष ब्रह्म है। स्त्री का रज ब्रह्म है। पुरुष का वीर्य ब्रह्म है। रति कर्म ब्रह्म है। दोनों के बीच प्रेम (आकर्षण) ब्रह्म है। दोनों के परिरम्भ से मिलने वाला सुख ब्रह्म है। इसका जिसे बोध है, वह ज्ञानी है। 
          "तस्मै ज्ञानिने नमः।"

 √•गृहस्थी को यह ब्रह्मज्ञान कब होगा ? जब उसकी कुण्डली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह होगा, अशुभ प्रभाव नाम मात्र का भी न होगा। ऐसा जातक कामयोग से ईश्वरसाक्षात्कार करता है। उसके लिये मैथुन अनिवार्य है, आत्मलाभ के लिये। वह अपने वीर्य की रक्षा करता करता हुआ स्त्री को तुष्ट करता है। न उसका पतन होता है, न स्त्री का।

√••कुण्डली में लग्नस्थान जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्ववाला स्थान सप्तम है। लग्न कितना ही अच्छा हो, सप्तम के अशुभ होने से जीवन नीरस और कभी-कभी कुरस हो जाता है। सप्तम अग्निस्थान है ऐसा कौन है, जिसे कामाग्नि नहीं जलाती ? सारा संसार कामयज्ञ कर रहा है। यह यज्ञ उत्पत्ति का हेतु है। यह यज्ञ आनन्द का उत्स है। 
                 "तस्मै यज्ञाय नमः।"

√•सप्तम भाव कालपुरुष का उपस्थ है। पुरुष की कुण्डली में सप्तमस्थान शिश्न है तो स्त्री की कुण्डली में योनि । दोनों की कुण्डली में यह मैथुन क्रिया का स्थान है। काम यज्ञ का निष्पादन स्थान सप्तम भाव है। जैसे काष्ठमन्थन से यज्ञाग्नि प्रकट होती है, उसी तरह पुरुष स्त्री के उपस्थ मन्थन से कामाग्नि का प्रज्ज्वलन होता है। इसमें पुरुष अपने वीर्य की आहुति डालता है। स्त्री की योनि यज्ञ को वेदी होती है। मैथुन ही सृष्टियज्ञ का दूसरा नाम है। इसका फल है; सुख, आनन्द, तृप्ति इस विषय में ऋषि का कथन है...

"एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ,
ओषधीनां पुष्पाणि, पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः,
 पुरुषस्य रेतः । "
( बृहदारण्यक उपनिषद ६।४।१)

√•【इन पञ्चभूतों का रस पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का रस (सार) ओषधि है। ओषधियों का रस पुष्प हैं। पुष्पों के रस फल हैं। फलों का रस पुरुषशरीर है। पुरुष शरीर का रस वीर्य है।】

√•प्रजापति ब्रह्मा ने सर्वप्रथम वीर्य उत्पन्न किया। इस वीर्य को व्यर्थ न होने देने के लिये उसने स्वी की रचना की है। ऋषि कहता है...

"सह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हस्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति,
 स स्त्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाध उपास्त, तस्मात्
 स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत् तेनैनामभ्यसृजत्।"
(बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।२)

√• [उस प्रजापति ने इच्छा की कि इस पुरुषसार (वीर्य) के लिये प्रतिष्ठा (उत्तम स्थान) बनाऊं। तब उसने स्त्री को रचा। उसको रच कर उसेनीचे आराधा अर्थात् भूलोक में उसे पत्नी रूप में नियत किया। जिससे पुरुष उसे पत्नी रूप में अराधे। उसने इस पुरातन शिलावत् कठोर व्रत को पूरा किया। उसी से स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक नियम को रचा ।]

 ••सप्तम भाव रूप स्त्री तत्व का वर्णन करते हुए ऋषि कहता है...

 "तस्या वेदिरूपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे, समिद्धो ।
मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य 
लोको भवति, तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानद्योपहासं
 चारत्यासाँ स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानघोपहासं - चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृते।" 
      (बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।३)

√•तस्या = उस (स्त्री) की। 
√•वेदि (पुत्रेष्टि यज्ञ का स्थल ।
√•उपस्थः = योनि स्थान।
√•लोमानि= रोएँ । 
√•बर्हिः =कुशाएँ।
 √•चर्म-अधिषवणे = मृगचर्म और अधिषवण।
 √•समिद्धः = दीप्त।
 √•मध्यतः = मध्यभाग में।
 √•तौ = वे दोनों। 
√•मुष्कौ= दोनों मुष्क (कपाट)। 
√•सः वह यावान् = जितना ।
√•ह वै = निश्चय से। 
√•वाजपेयेन = वाजपेय (यज्ञ) से। यजमानस्य = यज्ञकर्ता का।
 √•लोकः = स्थिति फल प्राप्ति। 
√•भवति = होता है।
 √•तावान् = उतना । 
√•अस्य = इसका।
 √•लोकः = स्थान, फल। 
√•भवति = होता है।
 √•यः =जो।
 √•एवम् = इस प्रकार। 
√•विद्वान् = जानने वाला।
√•अद्योपहासम् = रतिकर्म, आधान-निषेक क्रिया ।
 √•चरति =करता है।
 √•आसाम् = इन स्त्रीणाम् स्त्रियों के।
 √•सुकृतम्= पुण्य को।
 √•वृङ्क्ते = पा लेता है।
 √•अथ =और।
 √•यः जो इदम् = इसको 
√•अविद्वान्= न जानता हुआ। अद्योपहासम् =मैथुन कर्म।
 √•चरति = करता है।
 √•अस्य = इस (मूर्ख के)।
 √•स्त्रियः = स्त्रियाँ।
 √•सुकृतम् = पुण्य को।
 √•वृञ्जते = हर लेती हैं।

√•••इस मन्त्र में यही बताया गया है कि स्वी का शरीर यज्ञशाला है। उसका जननांग / योनि स्थल यज्ञ की वेदी है। योनि स्थान पर उगे हुए रोयें. (बाल) उस वेदी पर बिछी हुए कुशाएँ हैं। भगोष्ठ (योनि के छिद्र को ढके हुए दो मांस फलक) ही मृगचर्म है। इस भगोष्ठ के नीचे दो अन्य लघु कपाट (मांस फलक) ही अधिषवण हैं। भगांकुर ही प्रदीप्त अग्नि की लपट है।

 √••मैथुन कर्म वाजपेय यज्ञ है। वाजपेय का अर्थ है-बल, मैथुननि जो बली है, जिस पुरुष के शिश्न में शक्ति है, जिस पुरुष का लिंग स्त्री योनि के सन्निकर्ष से कठोरता/दृढ़ता को प्राप्त करता है, वही इस यज्ञ का सम्पादन कर सकता है। ऐसा पुरुष बाजपेयी है। यजमान स्त्री है। बाजपेयी पुरुष, यजमान स्वी का यज्ञ करता है-उसकी योनि में शेफ रूपी खुवा से घृतरूपी वीर्य की आहुति डालता है। इससे स्त्री को लोक में प्रतिष्ठा मिलती है। स्त्री गर्भवती होगी, पुत्र जनेगी तो लोक में सम्मान प्राप्त पायेगी जो विद्वान् 1 स्त्री में यज्ञ की भावना से निषक करता है, वह स्त्री के पुण्य कर्मों के फल का आस्वादन पाता है। स्त्री को यज्ञशाला मानकर, उसकी योनि को यज्ञ वेदिका समझ कर रतिकर्म करने का अर्थ है-स्त्री को मान प्रतिष्ठा देते हुए उसका उपभोग करना। इससे स्त्री प्रसन्न होगी। उसकी इस प्रसन्नता से उसका पुण्य उसे स्वतः प्राप्त होता है। ऐसा विद्वान पुरुष सुखी होता है। जो यज्ञ भाव से अद्योपहासन (रतिक्रिया) नहीं करता अर्थात् स्त्री को सम्मान नहीं देता, वह उसका पुण्य पाने से वञ्चित रहता है, उल्टे अपना पुण्य ही उसे देता है। पुण्य से रिक्त पुरुष दुर्दशा को प्राप्त होता है। ऐसा पुरुष अविद्वान् होता है। ऐसा करने वाला अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता है। बलात्कारी पति मूर्ख होता है, क्योंकि वह अपने पुण्य को गवाँता है।

√•स्त्रीरूप  यजमान यज्ञ से सन्तुष्ट है प्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा पायेगा ही। यह दक्षिणा ही स्त्री का सुकृत है। यजमान असन्तुष्ट है, अप्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा से च्युत रहेगा। दक्षिणा से होन विपन्न पुरुष की गति का वर्णन में कैसे करूँ !

 √•यज्ञशाला साफ सुथरी होनी चाहिये। स्त्री को देह स्वच्छ एवं सुभूषित-सुवासित होनी चाहिये। यज्ञवेदी पवित्र होनी चाहिये। स्त्री की योनि भी पवित्र (ऋतु स्नान के पश्चात् काँ) होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त यजमान स्त्री एवं होता पुरुष के भाव भी दिए होने चाहिये। ऐसा यज्ञ करने कराने वाले नर-नारी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम ।

√• हर पुरुष (गृहस्थ) की अपनी एक यज्ञशाला (पत्नी) होनी चाहिये। हर स्त्री (विवाहिता) का अपना एक याज्ञिक (वाजपेय पुरुष) वा पति होना चाहिये। यह यज्ञ (मैथुन) यथा समय होते रहना चाहिये। इससे दोनों स्त्री-पुरुष का ऐश्वर्य बढ़ता है। यह मैथुन यज्ञ तीन प्रकार का होता है।

 √•१. तामसी मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष जब अपना स्वार्थ देखता है, स्त्री के स्वार्थ (आनन्द) की अवहेलना करता है तो वह पिशाच होता (कहा जाता है। जब स्त्री ऐसा करती है तो वह पिशाचिनी की संज्ञा प्राप्त करती है। कलियुग में ऐसे यज्ञ अधिक हो रहे हैं।

 √•२. राजसी मैथुन- इसमें स्त्री और पुरुष परस्पर के सुख का ध्यान रखते हैं। ऐसे स्त्री-पुरुष क्रमशः यक्षिणी एवं यक्ष कहलाते हैं।

 √|३. सात्विक मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष को सतत चेष्ठा रहती है कि वह स्त्री को पूर्णतः तृप्ति पुरुष को सुसन्तुष्ट रखती है। ऐसे स्त्री पुरुष क्रमशः ऋषि और ऋषि होते हैं। 

√•अपनी ही वेदी (स्वस्त्रीयोनि) में ही पुरुष हवन करे, दूसरे की वेदी (परस्त्रीयोनि) में नहीं। धर्मसंगत होन पर दूसरे की वेदी पर हवन किया जा सकता है। जैसा कि जगद्गुरू श्री वेदव्यास ने अपनी माता सत्यवती के आह्वान पर महाराज विचित्रवीर्य की दो विधवाओं एवं एक दासी की यज्ञ वेदी पर स्ववीर्य का हवन करके धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर को पैदा किया। इससे अस्त होता हुआ कौरव वंश बच गया।

√• गृहस्थी का यही आचार धर्म है कि वह स्त्री को यज्ञ रूप जान कर उसके साथ बर्ताव करे। इस धर्म का समर्थन आणि उद्दालक, मौद्रल्य नाक एवं कुमार हारीत ने अपनी-अपनी स्मृतियों में किया है।

 "एतद्ह स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणि: आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह ।"
         (बृह.उप. ६।४।४)

 √•ब्राह्मण कहलाने वाले बहुत से मनुष्य मैथुन कर्म को यज्ञ न मानते हुए दुराचार के कारण इन्द्रियहीन सुकृतरहित होकर इस लोक से अशुभ लोक को जाते हैं। ऐसे वे ही जन होते हैं जो इस सदाचार के भेद को न जानते हुए संसर्ग (मैथुन) करते हैं। कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनका वीर्य सोते वा जागते स्खलित होता है अर्थात् स्त्री को यज्ञ के समान पवित्र नहीं समझते और उसे विषय का साधन समझते हैं, वे भी बुरे लोकों को पाते हैं, पतन के गर्त में गिरते हैं।

 "बहवो मर्या ब्राह्मणाय निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्त्रीस्माल्लोकात् यन्ति य इदमविद्वांसोबी धोपहासं वरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दयति ।"
        ( बृह. उप. ६।४।४ )

 √•पुरुष मैथुन यज्ञ नहीं करेगा तो उसका वीर्य सोते-जागते व्यर्थ में स्खलित होगा। स्खलन से होने वाली क्षति से बचने के लिये उसे मैथुन करना चाहिये वीर्य की सार्थकता इसी में है। जिसका वीर्य स्वप्नदोषादि के माध्यम से वह जाय उसे क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...

"तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत्वन्मेऽद्यरेतः पृथवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः । इदमहं तदेत आददे पुनर्मामेत्विन्द्रियं पुनस्ते पुनर्भगः । पुनराधिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनी वा भ्रुवौ वा निमृज्यात्।"
         (बृह.उप.६/४/५)

√•तद् =उस (स्खलित वीर्य) को ।
√•अभिमृशेत्= छुवे।
√•अनुवा मन्त्रयेत्= अथवा चिन्तन करे कि ऐसा क्यों हुआ)। 
√•यत् = जो।
 √•मे= मेरा ।
√•अद्य = आज।
 √•रेतः = वीर्य।
 √•पृथिवीम् = पृथिवी पर ।
√•अस्कान्सीत् =स्खलित होकर गिरा है।
√• यद्= जो। 
√•ओषधीः= ओषधियों को। 
√•अपि = भी।
√•असरत् = चला / सरका है।
√• यद् = जो।
√•अप = जलों को।
√•इदम् = यह इस ।
√•अहम् = मैं।
 √•तद् = उस।
√• रेतः =वीर्य को।
 √•आददे = ग्रहण करता हूँ, पुनः संचित करता हूँ (फिर से स्खलित नहीं होने दूंगा)।
 √•पुनः= मुझको।
√• एतु = प्राप्त हो, आवे।
 √•इन्द्रियम्= इन्द्रिय सामर्थ्य ।
 √•पुनः = फिर। 
√•अग्निः =शरीराग्नि।
 √•धिष्ण्या = धारण करने वाली (बुद्धि या समझ) ।
 √•यथास्थानम् = पूर्ववत् अपने-अपने स्थान पर । 
√•कल्पन्ताम् = होवें । 
√•इति = ऐसे जप कर वा चिन्तन कर।
 √•अनामिका + अङ्गुष्ठाभ्याम् = अनामिका अंगुली तथा अंगूठे से।
 आदाय ग्रहण कर।
 √•अन्तरेण = मध्य में।
 √•स्तनौवा = दोनों स्तनों (हृदय प्रदेश) के।
 √•भ्रुवौ वा = दोनों भृकुटियों (मस्तिष्क वा ललाट) के।
 √•निमृज्यात्= प्रक्षालन करे, जल से मार्जन करे (हृदय एवं मस्तिष्क की शुद्धि करे)।

√••हृदय भावों का घर है। मस्तिष्क विचारों का आलय है। हृदय और मस्तिष्क के दूषित होने पर भाव और विचार दूषित होते हैं। इनके दूषित होने पर वीर्य का नाश होता है इसलिये अंगुष्ठा और अनामिका से स्खलित वीर्य वा वीर्य स्थान शिश्न का स्पर्श कर पुनः इसी से पश्चात्ताप की भावना करता हुआ भृकुटिमध्य एवं हृदयमध्य का संस्पर्श करे। अनामिका सूर्य की अंगुली है। सूर्य आत्मा का कारक है। अंगुष्ठ शुक्रमह का स्थान है। शुक्र वीर्य वा काम शक्ति का कारक है। सूर्य और शुक्र दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। दोनों का सहयोग होना पारस्परिक पुष्टि के लिये शुभ है। तन और मन से वीर्य की रक्षा करना ही स्पर्श का उद्देश्य है। स्पर्श मन्त्र का भाव यह है...

√•आज जो मेरा रेतस् पृथ्वी पर स्खलित हो गया, जो ओषधियों की ओर तथा जलों की ओर बहा, मैं वह सामर्थ्य लेता हूँ-निमह की शक्ति धारण करता हूँ। रेतस् निग्रह से मुझको फिर इन्द्रिय बल प्राप्त होवे, फिर तेज, फिर सौभाग्य प्राप्त होवे। अग्नि है स्थान जिसका वे अग्निधिष्ण्य देव- अपनी सामर्थ्य से फिर मुझको यथा स्थान में कर दे, मेरे गये हुए बल को फिर लौटा दे। ऐसा जफ्ते हुए अनामिका और अंगूठे से जल लेकर दोनों स्तनों एवं भ्रुवों के मध्य में लगावे।

 √•सबकी उत्पत्ति मैथुन से होती है। इसलिये सबके भीतर मैथुन क्रिया का संस्कार होता है। किसी को मैथुन सिखाना नहीं पड़ता। मैथुन करने का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता। रतिकर्म की दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। सबमें सम्भोग की इच्छा होती है। सब लोग सम्भोग करना जानते हैं। कोई तन से संयोग करता है। कोई मन से सहवास करता है। कोई मन और तन दोनों से संश्लेष करता है। ऐसा क्यों 7 स्त्री, पुरुष का एक भाग है। पुरुष उसे पाना चाहता है। पुरुष स्त्री का एक अंग है। वह उसे प्राप्त करने की इच्छा रखती है। इसलिये स्त्री-पुरुष का पारस्परिक सम्मिलन अनिवार्य एवं स्वाभाविक है। इसके लिये पुरुष स्त्री के साथ संगम करता है, पुरुष के साथ स्त्री सहयोग करती है। स्त्री यजमान है तो पुरुष पुरोहित। दोनों के सहकार से यह यज्ञ चल रहा है। दोनों की पार्थिव / शारीरिक संयुक्ति न होने पर मानसिक मैथुन होता है। इसमें कभी-कभी वीर्य स्खलित हो जाता है। इससे बचने के लिये परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन करते हुए भगवन्नाम जाप सरल निदान है। राम नाम जप से इष्टदेव का स्मरण करने से वीर्य की रक्षा होती है। मैथुन करते हुए वीर्य की रक्षा करने का यत्न करना चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास एवं ईश कृपा आवश्यक है । यह मेरा अनुभव है। इससे वीर्य की रक्षा होती है।

√•सप्तम भाव योनि है। योनि से सबका प्राकट्य होता है। इसलिये सप्तम भाव जन्म स्थान है। दूसरी ओर, लग्न को जन्म स्थान कहते हैं। यह विरोधाभास क्यों ? इसका अर्थ है-लग्न भाव प्रथम एवं योनिस्थान सप्तम का समान महत्व है। लग्न के अच्छा या बुरा होने से सप्तम भाव अच्छा या बुरा होता है। सप्तम स्थान के शुभाशुभ होने से लग्न स्थान शुभ वा अशुभ होता है। भविष्यफल कथन में इस तथ्य को आँखों से दूर नहीं करना चाहिये। ज्योतिषी अपनी दोनों आँखों से इन दोनों भावों पर एक साथ दृष्टि कर देखे और तब निर्णय करे। यही कारण है कि लग्न में मंगल के रहने से कुण्डली मंगली होती है तथा सप्तम में मंगल की उपस्थिति से भी कुण्डली में मंगलीपन आ जाता है। मंगल दोनों स्थानों में रहता हुआ दोष उत्पन्न करता है।

 √•लग्न में मैथुन का विचार होता है तो सप्तम मे वह विचार मैथुन क्रिया रूप में प्रतिफलित होता है। लग्न (मस्तिष्क) में मैथुन का विचार उठता है तो सप्तम (उपस्थ) में हलचल मच जाती है। यह तथ्य सब के द्वारा अनुभूत है।

 √••श्रीमद भगवद्रीता का एक श्लोक है...

 "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्बह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम् ।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥"
        (गीता अध्याय ४, श्लोक २४ )

√•मैथुन कर्म ब्रह्म कर्म है क्योंकि यह व्यापक रूप से सर्वत्र सब प्राणियों द्वारा किया जा रहा है। जब स्वी और पुरुष आपस में मिलते हैं-रतिक्रिया में लीन होते हैं तो दोनों की आँखें मुंद जाती हैं। सम्भोग की चरम अवस्था में दोनों निष्पन्द हो जाते हैं, हिलते-डुलते नहीं, एकाकार हो जाते हैं। यह आनन्द की अवस्था होती है। यह समाधिस्थता है। जीव, ईश्वर का ध्यान करता है। जब ईश्वर के साथ मिलकर जीव समाधि अवस्था में पहुँचता है अर्थात् ब्रह्म हो जाता है तो उसे जो सुख मिलता है, वही सुख पुरुष वा स्त्री को एक दूसरे में प्रवेश करके एक हो जाने से होता है। यह सुख ब्रह्मानन्द सहोदर है। मैथुन में स्त्री, पुरुषमय हो जाती है तथा पुरुष, स्वीमय हो जाता है। समाधि में जीव ईश्वरमय हो जाता है तथा ईश्वर, जीवमय हो जाता है। दोनों की युज्यता असम्पृक्तता ही आनन्द है। यह अनिवर्चनीय है। जो इसे अनुभव करे, वही जाने । समाधि ब्रह्मकर्म है, मैथुन ब्रह्मकर्म है। समाधि में ब्रह्माकार वृत्ति होती है। मैथुन में भी ब्रह्माकार वृत्ति होती है। यह अनुभूत सत्य है।

√•ब्रह्मार्पणम् = ब्रहम अर्पणम् वहा, अर्पण / दक्षिणा/ उपहार भेंट है। 

√•ब्रह्म हवि = ब्रहम हविघृत/आहुति/हवनीय द्रव्य है। 

√•ब्रह्माग्नौ= ब्रह्मारिन में बह्यरूपी अग्नि में ब्रह्म अग्नि है।

√• ब्रह्मणा हुतम् =ब्रह्म के द्वारा यज्ञीय अग्नि में डाला गया द्रव्य ।

√• तेन = उस (यज्ञ) के द्वारा।

 √•ब्रह्मैव गन्तव्यम् = ब्रह्म ही गन्तव्य / लक्ष्य प्राप्तव्य है।

 √•ब्रह्मकर्म समाधिना= समाधि से ब्रह्मकर्म।

【 सम् + आ + था कि = समाधि ।

√•समाधि का अर्थ है-ठहराव / स्थिरता/ गतिशून्यता, मन को, चित्त की, विचार की।】

√•चलता का त्याग समाधि है। पूर्ण शान्तिमयता समाधि है। गीता के इस श्लोक का पार्थिव अग्नि में हवन करने से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि यहाँ समाधि होती ही नहीं। ध्याता, ध्येय और ध्यान की त्रिपुटी का एकीकरण समाधि है। शान्तचित्तता समाधि है। शान्तचित से जो कर्म किया जाता है, वह साधारण कर्म न होकर ब्रह्म कर्म होता है। अथवा, शान्तचित्त व्यक्ति का हर कर्म ब्रह्मकर्म है।

√• यह सृष्टि अग्निषोमीय है। स्त्री अग्नि है। पुरुष सोम है। स्त्री को योनि में योषाग्नि है। पुरुष का वीर्य सोमतत्वी है। योषाग्नि में पुरुष अपने वीर्य का हवन करता है। इससे जो प्राप्त होता है अर्थात् सुख, वह ब्रह्म है। स्त्री को पुरुष द्वारा अथवा पुरुष को स्त्री द्वारा जो अर्पण किया जाता है, वह है प्रेम। यही दक्षिणा है।

√•प्रेम अर्पण वा दक्षिणा है, मैथुन यज्ञ की। यह दक्षिणा मैथुन से पूर्व दी जाती है। यह प्रेम ब्रह्म है। हवि वा घृत रूप वीर्य ब्रह्म है। योनिस्थ अग्नि / रज भी ब्रह्म है। रज ब्रह्म में रेतस ब्रह्म की आहुति डाली जाती है। आहुति डालने वाला पुरुष ब्रह्म है। यह मैथुन यज्ञ ब्रह्म है। इस यज्ञ के द्वारा प्राप्त होने वाला आनन्द भी ब्रह्म है। रतिक्रिया ब्रह्म कर्म है, केवल तभी जब यह शान्तचित्त होकर की जाती है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- यह उपनिषद् वाक्य इस श्लोक का केन्द्र बिन्दु है। इस ब्रह्माकार वृत्ति से मैथुन करने वाला पुरुष प्रणम्य है, विष्णु है। मैं उसे प्रणाम करता हूँ।

 √•स्त्री ब्रह्म है। पुरुष ब्रह्म है। स्त्री का रज ब्रह्म है। पुरुष का वीर्य ब्रह्म है। रति कर्म ब्रह्म है। दोनों के बीच प्रेम (आकर्षण) ब्रह्म है। दोनों के परिरम्भ से मिलने वाला सुख ब्रह्म है। इसका जिसे बोध है, वह ज्ञानी है। 
          "तस्मै ज्ञानिने नमः।"

 √•गृहस्थी को यह ब्रह्मज्ञान कब होगा ? जब उसकी कुण्डली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह होगा, अशुभ प्रभाव नाम मात्र का भी न होगा। ऐसा जातक कामयोग से ईश्वरसाक्षात्कार करता है। उसके लिये मैथुन अनिवार्य है, आत्मलाभ के लिये। वह अपने वीर्य की रक्षा करता करता हुआ स्त्री को तुष्ट करता है। न उसका पतन होता है, न स्त्री का।

√●फलितशास्त्र का एक सामान्य सूत्र है-"भावात् भावम्" किसी भाव से संबंधित विषय का विचार करते समय उस भाव से उतनी संख्या आगे के भाव से भी करना चाहिये। जैसे पंचम भाव का विचार करना है तो इस सूत्र से पञ्चम अर्थात् नवम् भाव भी विचारणीय है। ऐसे ही षष्ठ का विचार षष्ठात् षष्ठ अर्थात् एकादश भाव, सप्तम का, सप्तमात् सप्तम अर्थात् प्रथम भाव लग्न, अष्टम का अष्टमात् अष्टम् अर्थात् तृतीय भाव, नवम् का नवमात् नवम अर्थात् पञ्चम भाव विचार्य है। इसी क्रम में यदि सुख का विचार करना हुआ तो चतुर्थ भाव के अतिरिक्त चतुर्थ से चतुर्थ अर्थात सप्तम भाव का विचार अनिवार्य है। सुख के ज्ञान के लिये केवल सुख (चतुर्थ) भाव का विचार अधूरा है। चौथा भाव शुभ है किन्तु सप्तम अशुभ, तो सुखकी अल्पता है-ऐसा जानना चाहिये।

√●इस सूत्र से चतुर्थात् चतुर्थ अर्थात् सप्तम सुख हुआ। सुख नाम विष्णु का। [विष्णुः सुख:, विष्णुसहस्रनाम] यह सप्तम भाव आनन्द है। सुख = आनन्द आनन्द ब्रह्म है। यह श्रुति प्रमाणित है।

 "आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्द्ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशं तीति।"
( तैत्तिरीयोपनिषद् अनुवा भृगु वल्ली)

√● [ आनन्दः = सुख। ब्रह्म = विष्णु । इति = ऐसे, यह व्यजानात् निश्चयपूर्वक जाना। आनन्दाद् = आनन्द से हि एवं खलु = वस्तुतः निश्चय ही इमानि ये भूतानि = प्राणिवर्ग । जायन्ते = उत्पन्न होते हैं। आनन्देन = आनन्द से/ के द्वारा जातानि उत्पन्न हुए प्राणी जीवन्ति = जीवित रहते हैं। आनन्दम् = आनन्दे, आनन्द में प्रयन्ति = प्रयाण करते हैं, लौट जाते हैं। अभिसंविशन्ति प्रविष्ट होते हैं, लीन हो जाते हैं। 】

√●आनन्दः ब्रह्म इति वि-अजानात् = आनन्द ब्रह्म है, इस सत्य को (वरुण के पुत्र भृगु ने अपने पिता के उपदेश से) जाना। 

√●आनन्दात् हि एवं खलु इमानि भूतानि जयन्ते= (उन्होंने यह भी जाना कि) आनन्द से हो ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं।

 √●आनन्देन जातानि जीवन्ति = उत्पन्न हुए प्राणी आनन्द के द्वारा / आनन्द पाने की आशा में जीवन यापन करते हैं।

 √●आनन्दं प्रयन्ति अभि-सम्-विशन्ति = (सभी प्राणी) आनन्द को प्राप्त होते हैं/ आनन्द में प्रवेश करते हैं, आनन्द में लीन होते हैं। आनन्द में समा जाते हैं।

√●आनन्द से सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं-का अर्थ है, वह क्रिया जिसमें सुख मिलता है, जिसमें सुख होता है, उसके करने से पैदा होते हैं। यह क्रिया है-मैथुन मैथुन में सहज आनन्द है। इसे पाने के लिये प्राणी मैथुन करता है और इस मैथुन से संतति होती है। मैथुन से उत्पन्न होने वाला प्राणी मैथुन की कामना करता है। उसमें मैथुन के संस्कार होते हैं। यह संस्कार उसे मैथुन के लिये प्रेरित करता है। मैथुनजन्य आनन्द को पाने के लिये वह जीवन की आकांक्षा करता है। इस आनन्द की प्राप्ति हेतु वह अनन्त गुना कष्ट सहने के लिये तैयार होता है। इसके लिये वह अपना जीवन अर्पण कर देता है।

√● यह आनन्द ब्रह्म है-इसका तात्पर्य है कि ब्रह्म और आनन्द में अभेद है वा, आनन्द बहुत बड़ी वस्तु है/ मूल्यवान वस्तु है/ अगद्य है। विष्णु सहस्र नाम में, आनन्दः = ब्रह्म = धर्मः = अर्थः = कामः = मोक्षः विष्णुः =......। इसलिये सप्तम भाव धर्म है, अर्थ है, काम है, मोक्ष है, विष्णु (मूल प्रकृति) है। यही ज्ञान है जो सप्तम भाव को नहीं जानता वह ज्ञानी नहीं है। यह समस्या आद्य श्री शंकराचार्य के सम्मुख आयी। वे इस समस्या से पार हुए। कथा इस प्रकार है।

√● शंकराचार्य का मण्डनमिश्र के साथ काशी में शास्त्रार्थ हुआ। इस शास्त्रार्थ में मण्डनमिश्र पराजित हुए। शंकराचार्य अवतारी पुरुष थे। उनके पास मेधासाम्राज्य था। किसी को भी पराजित करना उनके लिये आसान कार्य था। मण्डनमिश्र की पत्नी ने इस पराजय को पूर्ण पराजय नहीं माना अर्धांगिनी होने के नाते बिना उसे पराजित किये शंकराचार्य पूर्ण विजयी नहीं माने गये। अतः मण्डनमिश्र की पत्नी सुश्री भारती से शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ। भारती ने उनसे सप्तम भाव (काम) पर प्रश्न करना प्रारम्भ किया। शंकराचार्य निरूत्तर हो गये। शंकराचार्य ने इसके लिये समय माँगा। आचार्य तो आठ वर्ष की आयु में सन्यास ले चुके थे। उन्हें काम-शास्त्र का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं था। शंकराचार्य सिद्ध योगी थे। अपने इस शरीर को भोग में लगाना नहीं चाहते थे। कामोपभोग हेतु उन्होंने परकाया प्रवेश का निश्चय किया। शंकराचार्य ने अपने दो शिष्यों को अपने शरीर की रक्षा में नियुक्त किया। एकान्त स्थान में ये शिष्य अपने गुरु शरीर की रक्षा करते रहे। आचार्य ने अपने सूक्ष्म शरीर से एक मृतराजा की देह में प्रवेश किया। शंकराचार्य का सूक्ष्म शरीर राजा के स्थूलशरीर द्वारा कामोपभोग करता रहा। संभोग की शैली बदल जाने से रानी को संदेह होता था पर कर ही क्या सकती थी ? शरीर तो राजा का ही था। राजा के शरीर में सन्यासी और सन्यासी का व्यवहार अपने ढंग का एक मास तक रानियों के साथ कामक्रीड़ा करते हुए काम तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर आचार्य अपने शरीर में लौट आये। अब कामशास्त्र में निष्णात शंकराचार्य ने भारती को शास्त्रार्थ में पीछे ढकेला अनन्तर, मण्डनमिश्र शंकराचार्य के चार प्रधान शिष्यों में से एक शिष्य हुए।

√●महा पुरुषों का कर्म अनुकरणीय होता है। शंकराचार्य ने सन्यास आश्रम को कलंकित नहीं किया। ब्रह्मानन्द में निमग्न रहने वाले आचार्य ने परकाया को माध्यम बनाकर कर मैथुनानन्द का अनुभव लिया। इसका अनुकरण किस सन्यासी के लिये शक्य है ? धन्य हैं, शंकराचार्य । 
          "तस्मै शंकराचार्याय नमः।"

√●कुण्डली में, धर्म और काम आमने-सामने हैं। काम को धर्म देख रहा है। काम पर धर्म की सप्तम पूर्ण दृष्टि होने से काम धर्ममय हुआ। इसका अर्थ हुआ कामोपभोग धर्मानुकूल होना चाहिये। शंकराचार्य ने धर्मानुसार काम का सेवन किया। शंकराचार्य ने ऐसा स्वार्थ में नहीं, अपितु लोकल्याणार्थ किया। इसलिये वे सदैव आदरणीय माने जाते रहेंगे।

√●● रति यज्ञ का दो उद्देश्य होता है। 
★१. पुत्र प्राप्ति/ संतति विस्तार।
 ★२. आनन्दानुसन्धान / समाधि सुख ।

 √●श्री व्यास देव ने कुरुवंश को नष्टप्राय होने से बचाने के लिये रतियज्ञ किया था। जिसके फलस्वरूप धतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर का जन्म हुआ। इसके ठीक विपरीत श्री शंकराचार्य ने आनन्दानुसन्धान के लिये मृत राजा के शरीर में प्रवेश कर रतियज्ञ पूर्ण किया था। शंकराचार्य के द्वारा किये गये रति यज्ञ से राजपत्नी गर्भवती नहीं हुई। जबकि महापुरुषों का वीर्य अमोघ होता है। इसमें हेतु है। इस विषय में उपनिषद् वाक्य है ...

"अथ यामिच्छेन्न गर्भ दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायाभिप्रायापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यारेता एव भवति । " 
( बृहदारण्यक उपनिषद ६ । ४। १०)

【 अथ याम् इच्छेत् न गर्भम् दधीत इति तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संघाय अभिप्राय अपान्यात् इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः आदद इति अरेताः एव भवति ।】

√●अथ = और, सर्वप्रथम ।याम् = जिस स्त्री को। इच्छेत् =चाहे ।न =नहीं। गर्भम्= गर्भ को । दधीत = धारण करे। इति = ऐसे। तस्याम् = उस (स्त्री) में। अर्थम् = अभिप्राय को। निष्ठाय = रखकर मुखेन मुख से। मुखम् मुख को संधाय = मिलाकर लगाकर । इन्द्रियेण = इन्द्रिय बल से। ते तेरे रेतसा = वीर्य से रेतः = वीर्य आदद = आददे लेता हूँ सोचता हूँ इति ऐसा | बोलक]। अरेताः = वीर्य से रहित एव = ही भवति = हो जाती है।

√●जिस स्त्री को पुरुष चाहे कि वह गर्भधारण न करे तो सर्वप्रथम उसमें अपने प्रयोजन को स्थापित कर, उसके मुख से अपना मुख मिलाकर प्राणवायु को बाहर निकाले (अभिप्राणन करे)। प्राण को बाहर रोके (अपानन करे। तब मैथुनक्रिया करते हुए कहे कि मैं अपने जननेन्द्रिय (शिश्न बल) से, अपने वीर्य से तेरे (तुझ स्त्री के रेतस (रज) को लेता हूँ। ऐसा करने एवं कहने से स्त्री अरेत हो जाती है। वीर्य उसकी योनि में नहीं गिरता और वह गर्भ धारण नहीं करती। स्त्री गर्भ धारण न करे इसके लिये इस मन्त्र में दो क्रियाओं का प्रयोग बताया गया है।
 १. अभिप्राणन (अभि + + अन् + ल्युट)।
 २. अपानन (अप + अन् + ल्युट्)। यहाँ अभि उपसर्ग 'के विरुद्ध' अर्थ में तथा अप उपसर्ग निषेध अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

√● साँस लेना प्राणन है। साँस को देना अभिप्राणन है। जो सांस बाहर निकाल दी गई है, उसे न लेना अपानन है। अभिप्राणन एवं अपानन इन दो क्रियाओं का मैथुनकाल में क्रमशः प्रयोग करने से स्त्री गर्भवती नहीं होती। इसी के साथ-साथ उपनिषदकार ने पुरुष के लिये यह मन्त्र बताया है- 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद (आददे)। " रतिकाल में यह मंत्र पुरुष द्वारा जपनीय है। इससे वीर्य का स्तम्भन होता है, वीर्य स्खलित नहीं होता, दीर्घकाल तक मैथुन में रत रहा जाता है, जननेन्द्रिय शिथिल नहीं होती, स्त्री पूरी तरह संतुष्ट होती है, पुरुष शक्ति का संचय करता है, आत्मोत्थान करता है। यह मंत्र मन ही मन जपा जाता है। क्योंकि सम्भोग समय में पुरुष का मुंह रखी के मुंह में होता है। यह अधरपान क्रिया है। इसलिये मंत्रोच्चार शक्य नहीं। मानसिक जप ही प्रशस्त है।

√●●यदि पुरुष चाहता है कि स्त्री गर्भ धारण करे तो उसे इसका उल्टा करना चाहिये। आगे उपनिषद्कार कहता है...

"अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधाय अपान्याभिमान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति।"  
     (बृहदारण्यक उपनिषद् ६ । ४ । ११)

 [अथ याम् इच्छेत् दधीत इति तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संधाय अपान्य अभिप्राण्यात् इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः आदधामि इति गर्भिणी एव भवति ।] 

√●अथ याम् इच्छेत् = और जिसको (पुरुष) चाहे कि । 

√●दधीति इति = यह (स्त्री गर्भ को धारण करे। 

√●तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संधाय =उस (स्त्री) में अपने अभिप्राय को रखकर मुख से मुख को संयुक्त कर। 

√●अपान्य =सांस निकाल कर । 

√● अभिप्राण्यात् = गहरा साँस खींचे।

√● इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः = स्व इन्द्रिय बल से उस (स्वी) के रेतस (रज) में।

 √●आदधामि = स्थापित करता हूँ, स्खलित करता हूँ, चुबाता हूँ, निचोड़ता हूँ। 

√●इति = ऐसा (कहे)।

√●गर्भिणी एव भवति = गर्भवती होना निश्चित है। 

√●●पुरुष स्त्री के साथ रतिक्रिया करता है और इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य गर्भस्थापित करना होता है; ऐसे अवसर पर उसे क्या करना चाहिये ? यही इस मंत्र का प्रतिपाद्य है। यह गर्भाधान क्रिया है। इसमें सर्वप्रथम स्त्री के सप्तम स्थान से पुरुष का सप्तम स्थान संयुक्त होता है। अर्थात् योनि में लिंग का समावेशन होता है। इसके पश्चात् स्त्री के द्वितीय स्थान से पुरुष का द्वितीय स्थान जुड़ता है। अर्थात् स्त्री, पुरुष के अधरोष्ठ को अपने दोनों ओष्ठों के बीच में रखकर उसका चूषण करती है। व्युत्क्रमतः पुरुष, स्त्री के अधरोष्ठ को ।

√●गर्भाधान यज्ञ में 'अभिप्राण्य अपान्यात्' सूत्र से पुरुष अपानन के पश्चात् अभिप्राणन करता है। इसमें प्राण वायु को अपने अन्दर खींचते हुए पुरुष अपने वीर्य को स्त्री की योनि में (के भीतर) गिरा देता है। साथ ही साथ यह मंत्र जपता है- 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि।' इससे गर्भ निश्चित रूप से ठहरता है।

√●अग्नि जब प्रज्जवलित हो, तभी उसमें घी की आहुति डालनी चाहिये। अप्रज्जवलित/बुझी हुई अग्नि में मृताहुति डालना व्यर्थ होता है। स्त्री की योनि के मध्य भाग में अग्नि का निवास होता है। यह अग्नि जब तक जागे न लपटों से युक्त न हो, सुप्रज्ज्वलित न हो तब तक उसमें वीर्य रूपों घृत की आहूति नहीं डालना चाहिये। सुप्त अग्नि में वीर्याहुति व्यर्थ होती है। ऐसी अवस्था में गर्भाधान नहीं होता । अतः योषाग्नि को सर्वप्रथम प्रज्जवलित करना चाहिये। शिश्न की सतत अपानु (आगे-पीछे) गति से योनि को भीतरी दीवारों पर घर्षण के बढ़ने से उष्मा बढ़ती है। जैसे ग्वाला गाय के थन को मुझे में लेकर उससे दूध निकालता है, ठीक वैसे ही योनि को अन्तमांसपेशियाँ शिश्न से वीर्य का दोहन करती हैं। ऐसी अवस्था में वीर्य का रोक पाना पुरुष के लिये नितान्त कठिन होता है। खुजलाहट के साथ स्त्री का रज जब क्षरित होता है तभी तत्क्षण पुरुष का वीर्य भी झरता है। इन दोनों का परस्पर एक साथ मिलन गर्भाधान है। यह क्रिया स्वाभाविक है। प्राय: पुरुष शीघ्र उत्तेजित होता है और उसका वीर्य टपक पड़ता है। किन्तु स्वी शीघ्र नहीं उत्तेजित होती, विलम्ब से उत्तेजित होती है। गर्भाधान में पुरुष को उत्सुकता और धैर्य के साथ अमानुगति (मैथुन करते रहना चाहिये। स्त्री स्खलित नहीं हुई और पुरुष स्खलित हो गया तो गर्भ नहीं ठहरता।

√●कुण्डली में द्वितीय एवं सप्तम भाव मारक स्थान माने गये हैं। क्यों ? ये दोनों भाव काम को मारते हैं अथवा इन दोनों भावों के द्वारा काम स्वयं जातक को मारता है। इसलिये ये मारक हैं। काम अमूर्त देवता है। द्वितीय और सप्तम भाव इसके प्रिय स्थान हैं। द्वितीय भाव अर्थात् आँखों में बसता है, जिहा (वाणी) पर रहता है, ओठों (विशेष कर अधरोष्ठ) में होता है। द्वितीय के अतिरिक्त सप्तम भाव अर्थात् उपस्थ (योनि वा शिश्न) में इसका प्रकृष्ट वास होता है। सम्भोग में स्त्री का द्वितीय भाव पुरुष के द्वितीय भाव से जुड़ता है तथा स्त्री का सप्तम भाव पुरुष के सप्तम भाव से एकाकार होता है। इससे स्त्री और पुरुष तृप्त होते हैं, क्षरित होकर शान्त वा शिथिल हो जाते हैं। इस प्रकार उन दोनों के अन्दर का काम मर जाता है। इसलिये ये भाव काम के लिये मारक कहे गये हैं। एक विशेष बात यह है कि यह काम मर कर पुनः जीवित होता है। धीरे-धीरे यह बढ़ता है, बढ़कर पुष्ट होता है, पुष्ट होकर स्त्री और पुरुष दोनों को पीड़ा पहुंचाता है। दोनों एक दूसरे को देखने के लिये, बोलने के लिये तथा चूमने के लिये व्याकुल होते हैं। यह व्याकुलता बढ़कर उन्हें मैथुनातुर करती है। इसमें बाधा होना इन (स्त्री-पुरुष) के लिये मृत्युतुल्य है। अतः ये मारक है।

√●शिव जी ने काम को मारा/ अपने तीसरे नेत्र से जलाया / ज्ञान से शान्त किया। यह सर्वविदित है। काम तब से अशरीरी होकर अधिक व्यापक और शक्तिशाली हो गया। काम तो जल/मर नहीं सकता। मरा/जला उसका शरीर काम प्रेत बन गया है। इसी प्रेत काम ने शिवकोधर दबोचा। शिव ने स्कन्द को पैदा किया। स्कन्द पार्वती के पुत्र नहीं थे। ये किसी स्त्री के गर्भ में पले ही नहीं इसलिये मातृहीन हैं। एक कथा है कि शिव पार्वती के साथ खुले एकान्त स्थान में बिहार कर रहे थे। शिव पार्वती के साथ मैथुनरत थे। इसी समय ऋषिगण उनसे मिलने के लिये आये। हड़बड़ी में शिव ने अपना लिंग पार्वती की योनि से बाहर निकाला। उनका वीर्या योनि में न गिरकर बाहर भूमि पर बिछे हुए सरकण्डों पर पड़ा। इस वीर्य के ६ भाग हो गये। इस अमोघ वीर्य के एक-एक भाग को ६ कृत्तिकाओं ने ले लिया। इन कृत्तिकाओं ने आपस में मिलकर इस वीर्य के ६ भागों को एक में मिलाकर ६ सिर, १२ आंख १२ हाथ वाले एक अद्भुत बालक को रचना किया। इसे कार्तिकेय कहा गया। इसे पड़ानन भी कहते हैं। यह कथा सामान्य लोगों के लिये बोधगम्य नहीं है। ६ कृत्तिकाएँ ही कृत्तिकानक्षत्र के ६ तारे हैं। कृतिका का स्वामी सूर्य है। सूर्य ही शिव है। सूर्य अग्नि है। इसीलिये कार्तिकेय का नाम अग्निभू है। पार्वती त्रिगुणात्मक मूल प्रकृति है।

√●【कार्तिकेय = अग्निभू = प्रकाश = ज्ञान। शिव =सूर्य = प्रकाश = ज्ञान पार्वती = प्रकृति= अज्ञान यह सब जाननीय हैं। 】

√● "मनुष्यवदेवताभिधानम्" यह सूत्र है। पौराणिक कथाएँ इस सूत्र के परिप्रेक्ष्य में सत्य का निगूहन एवं अनावरण करती हैं। मूखों को यह सब अटपटा अश्लील और अनहोनी मालूम पड़ता है। यह मूर्खो के लिये नहीं, वैष्णवजनों/विद्वानों के लिये हैं। कृतिका नक्षत्र का प्रथम चरण मेष राशि में पड़ता है। मेष में सूर्य उच्च का होता है। कृत्तिका नक्षत्र के शेष चरण वृष राशि में पड़ते हैं। वृष में चन्द्रमा उच्च का होता है। जिसका सूर्य (आत्मा) और मन (चन्द्रमा) उच्च का अर्थत् बलवान है वह कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं होता। पुत्रकामी को ऐसे व्यक्तित्व वाले पुत्र के लिये यज्ञ करना चाहिये ।

 √●ब्रह्म सत् है, चित् है, आनन्द है। 'सच्चिदानन्दं ब्रह्म' जो इस आनन्द को नहीं जानता, जिसने इस आनन्द का अनुभव नहीं किया, वह ब्रह्म को क्या जानेगा ? वह ब्रह्म सुख की कल्पना कैसे करेगा ? उपस्थ आनन्द का घर है। इसे अवश्य जानना चाहिये। ऋषि का कथन है...

 "सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकावनम्।" 
          (बृह. उ. ४।५।१२ )

【सर्वेषाम् आनन्दानाम् उपस्थः एक आयनम्】

√●'सर्वेषां आनन्दानाम्' पद से स्पष्ट है कि आनन्द एक होकर भी अनेक है। आनन्द अपने अन्दर है। आनन्द अपने बाहर भी है। पुरुष का आनन्द स्त्री के अन्दर रहता है। इसको पाने के लिये पुरुष, स्त्री के पास जाता है। स्त्री का आनन्द पुरुष के अन्दर रहता है। इसे पाने के लिये स्त्री, पुरुष के निकट जाती है। पुरुष, स्त्री से आनन्द प्राप्त करता है। स्त्री, पुरुष को आनन्द देती है। पुरुष स्त्री को आनन्द देता है। स्त्री, पुरुष से आनन्द पाती है। यह संसार इसी आनन्द का चक्र है। देने में आनन्द है लेने में भी आनन्द है। यदि लेन-देन में आनन्द न हो तो ऐसा लेन देन किस काम का ? दाता को देने मेंसुख मिलना ही चाहिये। जो पाता है, उसको भी लेने में सुख होना चाहिये। जब माहक और दाता दोनों को सुखानुभूति होती है तो ऐसे व्यापार को उत्तम कहा जाता है। स्त्री और पुरुष दोनों एक ही साथ एक ही समय में दाता और माहक होते हैं। यदि दोनों आनन्दित है तो उनका पारस्परिक व्यापार (मैथुन यश) श्रेष्ठ है, अन्यथा तुच्छ स्त्री, पुरुष के वीर्य को लेती है। पुरुष अपना वीर्य स्त्री की योनि में उड़ेलता है। पुरुष का वीर्य जब स्त्री की योनि में गिरता है तो उसे अतीव सुख मिलता है। ये देने का आनन्द है। स्त्री जब पुरुष के वीर्य को अपनी योनि में लेती है, उसके उष्मात्मक स्पर्श से उसे आनन्द मिलता है।

√●इसी प्रकार, स्त्री अपना रज पुरुष को देती है। उस रज के स्पर्श की सुखानुभूति पुरुष अपने शिशन (लिंग के अग्रभाग) से करता है। स्त्री जब अपना रज पुरुष के शिश्न पर चुवाती है तो उसे अतीव आनन्द मिलता है। इस आनन्द की अनुभूति में वह आँखें मूंद लेती है तथा स्तब्ध हो जाती है। स्त्री रज देकर आनन्दित होती है तो पुरुष रज लेकर उतना ही आनन्दित होता है। दोनों का आनन्द सम होता है। होना भी चाहिये । क्योंकि सप्तम भाव में तुला राशि है।

√● तुला का बायाँ पलड़ा स्त्री है, दायाँ पलड़ा पुरुष है। तुला न्याय की प्रतीक है। न्याय यही है कि तुला का दण्ड सीधा क्षैतिज हो। यदि ऊपर नीचे होता है तो न्याय नहीं है। यदि पुरुष का आनन्द स्त्री के आनन्द से अधिक है तो अन्याय है। यदि स्त्री का आनन्द पुरुष से अधिक है तो अन्याय है। अतः स्त्री और पुरुष दोनों को चाहिये कि वे एक दूसरे को समान आनन्द दें तथा समान आनन्द लें। यही न्यायोचित रति यज्ञ है। 

√●सम्भोग के सुख में, आनन्द की खोज में पुरुष, स्त्री हो जाता है तथा स्त्री, पुरुष हो जाती है। यह अद्भुत क्रिया है। स्त्री में पुरुष तत्व की न्यूनता होती है। पुरुष में स्त्री तत्व की अल्पता होती है। यही अभाव उन दोनों को एक दूसरे के निकट लाता है। दोनों अर्धनारीश्वर बनना चाहते हैं। अर्थ = ॠ (अर) + था (थ)। नारी स्त्री ईश्वर= पुरुष ।अर्धनारीश्वर का अर्थ हुआ- स्त्री और पुरुष तत्व समान मात्रा में धारण करते हुए क्रियाशील रहना। हर स्त्री हर पुरुष अर्धनारीश्वर का अपूर्ण रूप है। इसकी पूर्णता समत्व के लिये ये परस्पर मिलते हैं, संश्लिष्ट होते हैं, एक दूसरे में प्रविष्ट होकर अपने अभाव की पूर्ति करते हैं। संभोग में समत्व होता है। समत्य में आनन्द है, सुख है। क्योंकि समत्व योग है। व्यास जी कहते है...
"समत्वं योगमुच्यते।"
 (श्रीमद्भागद्गीता)

√● संभोग में समता होती है। इससे सुख को उत्पत्ति होती है। कैसे ? सप्तम भाव समत्व योग या सम्भोग स्थान है। संख्या ४ की उत्पादक संख्या ७ है।

【 ७ + ९ = १६, 
१६ - १२ = ४ चतुर्थ भाव ।】

√●चतुर्थ भाव सुख है। अतः सप्तम भाव आनन्द का स्रोत है। सप्तम भाव सुख का समुद्र है। इस समुद्र का मन्थन करके स्त्री-पुरुष सुखरूप रत्न पाते हैं। सप्तम भाव केवल स्त्री और पुरुष के संयोगजन्य आनन्द का स्रोत ही नहीं है, यह ब्रह्म और जीव के मिलन का, भक्त और भगवान् के सान्निध्य का भी स्थान है। हर प्रकार के आनन्दों की यह स्थली है। इस आनन्द को पाने के लिये लोग जीते और साँस लेते हैं। ऋषि कहता है...

 "को होवान्यात् कः प्राप्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ।"
             (तैतिरीय उप. २/७)

 [कः हि एवं अन्यात् कः प्राण्यात् यद् एषः आकाशः आनन्दः न स्यात् ।]

 √●अन् धातु अनिति जीवने विधिले प्र.पु. एक व. अन्यात् ।

√● प्र + अन् प्रणिति श्वास-प्रश्वासे विधिलिङ् प्र.पु. एक व. प्राण्यात् । 

√●आकाश = व्यापक ।

 √●यदि वह व्यापक आनन्द न होता तो कौन जीवित रहता ? कौन साँस लेता ? 

एक अन्य कथन है...

 “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति । " 
(बृहदारण्यक् उप. ४।३।३२)

 【 एतस्य एव अनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उप जीवन्ति ।】

 √●अन्य समस्त लोग, आनन्द के ही इस अंश को पाकर जीवित रहते हैं। 

आनन्द से पृथक कौन है ? चाहे वह आनन्द भौतिक हो वा पराभौतिक ।

√● सप्तम भाव के लिये गणितीय सूत्र है- १ + १ = १ यहाँ पर १+१=२ सूत्र से काम नहीं चलता । यहाँ स्त्री और पुरुष के बीच खटपट/ विभेद / झगड़ा/वैमनस्य नहीं होना चाहिये। यदि सप्तम भाव में शुभ प्रभाव का पूर्ण वर्चस्व है, अशुभ प्रभाव नाममात्र का भी नहीं है तो १+१=१ का सूत्र काम करेगा। इसी में आनन्द है। १ + १ = १२ में आनन्द नहीं है। जीव और ईश्वर का एकीकरण यहीं होता है। समाधि अवस्था में ईश्वर और जीव का भेद मिट जाता है। न ईश्वर रहता है, न जीव रहता है। इन दोनों के स्थान पर जो अनिर्वचनीय तत्व रहता है, उसे ब्रह्म कहते हैं। यह निर्गुण है और आनन्द है। जो इस आनन्द को जानता है वह अभय होता है। वह किसी से क्यों कम्पित होवे ? अद्वैत में दो होता नहीं। डर तो द्वैत में है। आनन्द में कभी भी डर नहीं होता। उपनिषद् का वाक्य है...

"आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कदाचन।" 
       (तैत्तिरीय उपनिषद. २ । ४)

 【(तस्य ब्रह्मणः आनन्दम् विद्वान् कदाचन न बिभेति 】 

√●उस ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला / अनुभव करने वाला कभी भय नहीं करता। तस्मै ब्रह्मणे नमः । तस्मै विदुषे नमः ।

√● मैथुनानन्द मात्र प्रतिदर्श है, ब्रह्मानन्द का यह ब्रह्मानन्द नहीं है। मैथुनानन्द क्षणिक होता है, घटी भर होता है वा प्रहर भर रहता है। यह काल सापेक्ष है। ब्रह्मानन्द काल निरपेक्ष है, शाश्वत है, निरवधि है। इसलिये व्यक्ति (स्त्री व पुरुष) को चाहिये कि वे केवल मैथुन जन्य सुख तक सीमित न रहें। इसे ब्रह्मानन्द की छाया वा झलक समझ कर ब्रह्मानन्द की ओर उन्मुख होवें। इसको पाने के लिये इसे सिद्ध करने के लिये अनन्त वर्षो तक जियें। ऋषि बाल्मीकि कहते हैं...

 "एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्ष शतादपि।"
   (रामायण, सुन्दरकाण्ड, सर्ग ३४। ६ )

【मनुष्य जीता है तो सौ वर्ष के बाद भी उसे आनन्द प्राप्त होता है ।】

√●अतएव आनन्दकामी को दीर्घायुष्य की कामना करनी चाहिये। भोग के लिये नहीं, भजन के लिये/ भक्ति के लिये / ज्ञान के लिये। भोगानन्दी से भजनानन्दी होना चाहिये। मैं भगवान् का भजन करता हूँ। उसी के प्रताप से यह सब लिख रहा हूँ।
√●फलितशास्त्र का एक सामान्य सूत्र है-"भावात् भावम्" किसी भाव से संबंधित विषय का विचार करते समय उस भाव से उतनी संख्या आगे के भाव से भी करना चाहिये। जैसे पंचम भाव का विचार करना है तो इस सूत्र से पञ्चम अर्थात् नवम् भाव भी विचारणीय है। ऐसे ही षष्ठ का विचार षष्ठात् षष्ठ अर्थात् एकादश भाव, सप्तम का, सप्तमात् सप्तम अर्थात् प्रथम भाव लग्न, अष्टम का अष्टमात् अष्टम् अर्थात् तृतीय भाव, नवम् का नवमात् नवम अर्थात् पञ्चम भाव विचार्य है। इसी क्रम में यदि सुख का विचार करना हुआ तो चतुर्थ भाव के अतिरिक्त चतुर्थ से चतुर्थ अर्थात सप्तम भाव का विचार अनिवार्य है। सुख के ज्ञान के लिये केवल सुख (चतुर्थ) भाव का विचार अधूरा है। चौथा भाव शुभ है किन्तु सप्तम अशुभ, तो सुखकी अल्पता है-ऐसा जानना चाहिये।

√●इस सूत्र से चतुर्थात् चतुर्थ अर्थात् सप्तम सुख हुआ। सुख नाम विष्णु का। [विष्णुः सुख:, विष्णुसहस्रनाम] यह सप्तम भाव आनन्द है। सुख = आनन्द आनन्द ब्रह्म है। यह श्रुति प्रमाणित है।

 "आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्द्ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशं तीति।"
( तैत्तिरीयोपनिषद् अनुवा भृगु वल्ली)

√● [ आनन्दः = सुख। ब्रह्म = विष्णु । इति = ऐसे, यह व्यजानात् निश्चयपूर्वक जाना। आनन्दाद् = आनन्द से हि एवं खलु = वस्तुतः निश्चय ही इमानि ये भूतानि = प्राणिवर्ग । जायन्ते = उत्पन्न होते हैं। आनन्देन = आनन्द से/ के द्वारा जातानि उत्पन्न हुए प्राणी जीवन्ति = जीवित रहते हैं। आनन्दम् = आनन्दे, आनन्द में प्रयन्ति = प्रयाण करते हैं, लौट जाते हैं। अभिसंविशन्ति प्रविष्ट होते हैं, लीन हो जाते हैं। 】

√●आनन्दः ब्रह्म इति वि-अजानात् = आनन्द ब्रह्म है, इस सत्य को (वरुण के पुत्र भृगु ने अपने पिता के उपदेश से) जाना। 

√●आनन्दात् हि एवं खलु इमानि भूतानि जयन्ते= (उन्होंने यह भी जाना कि) आनन्द से हो ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं।

 √●आनन्देन जातानि जीवन्ति = उत्पन्न हुए प्राणी आनन्द के द्वारा / आनन्द पाने की आशा में जीवन यापन करते हैं।

 √●आनन्दं प्रयन्ति अभि-सम्-विशन्ति = (सभी प्राणी) आनन्द को प्राप्त होते हैं/ आनन्द में प्रवेश करते हैं, आनन्द में लीन होते हैं। आनन्द में समा जाते हैं।

√●आनन्द से सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं-का अर्थ है, वह क्रिया जिसमें सुख मिलता है, जिसमें सुख होता है, उसके करने से पैदा होते हैं। यह क्रिया है-मैथुन मैथुन में सहज आनन्द है। इसे पाने के लिये प्राणी मैथुन करता है और इस मैथुन से संतति होती है। मैथुन से उत्पन्न होने वाला प्राणी मैथुन की कामना करता है। उसमें मैथुन के संस्कार होते हैं। यह संस्कार उसे मैथुन के लिये प्रेरित करता है। मैथुनजन्य आनन्द को पाने के लिये वह जीवन की आकांक्षा करता है। इस आनन्द की प्राप्ति हेतु वह अनन्त गुना कष्ट सहने के लिये तैयार होता है। इसके लिये वह अपना जीवन अर्पण कर देता है।

√● यह आनन्द ब्रह्म है-इसका तात्पर्य है कि ब्रह्म और आनन्द में अभेद है वा, आनन्द बहुत बड़ी वस्तु है/ मूल्यवान वस्तु है/ अगद्य है। विष्णु सहस्र नाम में, आनन्दः = ब्रह्म = धर्मः = अर्थः = कामः = मोक्षः विष्णुः =......। इसलिये सप्तम भाव धर्म है, अर्थ है, काम है, मोक्ष है, विष्णु (मूल प्रकृति) है। यही ज्ञान है जो सप्तम भाव को नहीं जानता वह ज्ञानी नहीं है। यह समस्या आद्य श्री शंकराचार्य के सम्मुख आयी। वे इस समस्या से पार हुए। कथा इस प्रकार है।

√● शंकराचार्य का मण्डनमिश्र के साथ काशी में शास्त्रार्थ हुआ। इस शास्त्रार्थ में मण्डनमिश्र पराजित हुए। शंकराचार्य अवतारी पुरुष थे। उनके पास मेधासाम्राज्य था। किसी को भी पराजित करना उनके लिये आसान कार्य था। मण्डनमिश्र की पत्नी ने इस पराजय को पूर्ण पराजय नहीं माना अर्धांगिनी होने के नाते बिना उसे पराजित किये शंकराचार्य पूर्ण विजयी नहीं माने गये। अतः मण्डनमिश्र की पत्नी सुश्री भारती से शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ। भारती ने उनसे सप्तम भाव (काम) पर प्रश्न करना प्रारम्भ किया। शंकराचार्य निरूत्तर हो गये। शंकराचार्य ने इसके लिये समय माँगा। आचार्य तो आठ वर्ष की आयु में सन्यास ले चुके थे। उन्हें काम-शास्त्र का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं था। शंकराचार्य सिद्ध योगी थे। अपने इस शरीर को भोग में लगाना नहीं चाहते थे। कामोपभोग हेतु उन्होंने परकाया प्रवेश का निश्चय किया। शंकराचार्य ने अपने दो शिष्यों को अपने शरीर की रक्षा में नियुक्त किया। एकान्त स्थान में ये शिष्य अपने गुरु शरीर की रक्षा करते रहे। आचार्य ने अपने सूक्ष्म शरीर से एक मृतराजा की देह में प्रवेश किया। शंकराचार्य का सूक्ष्म शरीर राजा के स्थूलशरीर द्वारा कामोपभोग करता रहा। संभोग की शैली बदल जाने से रानी को संदेह होता था पर कर ही क्या सकती थी ? शरीर तो राजा का ही था। राजा के शरीर में सन्यासी और सन्यासी का व्यवहार अपने ढंग का एक मास तक रानियों के साथ कामक्रीड़ा करते हुए काम तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर आचार्य अपने शरीर में लौट आये। अब कामशास्त्र में निष्णात शंकराचार्य ने भारती को शास्त्रार्थ में पीछे ढकेला अनन्तर, मण्डनमिश्र शंकराचार्य के चार प्रधान शिष्यों में से एक शिष्य हुए।

√●महा पुरुषों का कर्म अनुकरणीय होता है। शंकराचार्य ने सन्यास आश्रम को कलंकित नहीं किया। ब्रह्मानन्द में निमग्न रहने वाले आचार्य ने परकाया को माध्यम बनाकर कर मैथुनानन्द का अनुभव लिया। इसका अनुकरण किस सन्यासी के लिये शक्य है ? धन्य हैं, शंकराचार्य । 
          "तस्मै शंकराचार्याय नमः।"

√●कुण्डली में, धर्म और काम आमने-सामने हैं। काम को धर्म देख रहा है। काम पर धर्म की सप्तम पूर्ण दृष्टि होने से काम धर्ममय हुआ। इसका अर्थ हुआ कामोपभोग धर्मानुकूल होना चाहिये। शंकराचार्य ने धर्मानुसार काम का सेवन किया। शंकराचार्य ने ऐसा स्वार्थ में नहीं, अपितु लोकल्याणार्थ किया। इसलिये वे सदैव आदरणीय माने जाते रहेंगे।

√●● रति यज्ञ का दो उद्देश्य होता है। 
★१. पुत्र प्राप्ति/ संतति विस्तार।
 ★२. आनन्दानुसन्धान / समाधि सुख ।

 √●श्री व्यास देव ने कुरुवंश को नष्टप्राय होने से बचाने के लिये रतियज्ञ किया था। जिसके फलस्वरूप धतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर का जन्म हुआ। इसके ठीक विपरीत श्री शंकराचार्य ने आनन्दानुसन्धान के लिये मृत राजा के शरीर में प्रवेश कर रतियज्ञ पूर्ण किया था। शंकराचार्य के द्वारा किये गये रति यज्ञ से राजपत्नी गर्भवती नहीं हुई। जबकि महापुरुषों का वीर्य अमोघ होता है। इसमें हेतु है। इस विषय में उपनिषद् वाक्य है ...

"अथ यामिच्छेन्न गर्भ दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधायाभिप्रायापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यारेता एव भवति । " 
( बृहदारण्यक उपनिषद ६ । ४। १०)

【 अथ याम् इच्छेत् न गर्भम् दधीत इति तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संघाय अभिप्राय अपान्यात् इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः आदद इति अरेताः एव भवति ।】

√●अथ = और, सर्वप्रथम ।याम् = जिस स्त्री को। इच्छेत् =चाहे ।न =नहीं। गर्भम्= गर्भ को । दधीत = धारण करे। इति = ऐसे। तस्याम् = उस (स्त्री) में। अर्थम् = अभिप्राय को। निष्ठाय = रखकर मुखेन मुख से। मुखम् मुख को संधाय = मिलाकर लगाकर । इन्द्रियेण = इन्द्रिय बल से। ते तेरे रेतसा = वीर्य से रेतः = वीर्य आदद = आददे लेता हूँ सोचता हूँ इति ऐसा | बोलक]। अरेताः = वीर्य से रहित एव = ही भवति = हो जाती है।

√●जिस स्त्री को पुरुष चाहे कि वह गर्भधारण न करे तो सर्वप्रथम उसमें अपने प्रयोजन को स्थापित कर, उसके मुख से अपना मुख मिलाकर प्राणवायु को बाहर निकाले (अभिप्राणन करे)। प्राण को बाहर रोके (अपानन करे। तब मैथुनक्रिया करते हुए कहे कि मैं अपने जननेन्द्रिय (शिश्न बल) से, अपने वीर्य से तेरे (तुझ स्त्री के रेतस (रज) को लेता हूँ। ऐसा करने एवं कहने से स्त्री अरेत हो जाती है। वीर्य उसकी योनि में नहीं गिरता और वह गर्भ धारण नहीं करती। स्त्री गर्भ धारण न करे इसके लिये इस मन्त्र में दो क्रियाओं का प्रयोग बताया गया है।
 १. अभिप्राणन (अभि + + अन् + ल्युट)।
 २. अपानन (अप + अन् + ल्युट्)। यहाँ अभि उपसर्ग 'के विरुद्ध' अर्थ में तथा अप उपसर्ग निषेध अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

√● साँस लेना प्राणन है। साँस को देना अभिप्राणन है। जो सांस बाहर निकाल दी गई है, उसे न लेना अपानन है। अभिप्राणन एवं अपानन इन दो क्रियाओं का मैथुनकाल में क्रमशः प्रयोग करने से स्त्री गर्भवती नहीं होती। इसी के साथ-साथ उपनिषदकार ने पुरुष के लिये यह मन्त्र बताया है- 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद (आददे)। " रतिकाल में यह मंत्र पुरुष द्वारा जपनीय है। इससे वीर्य का स्तम्भन होता है, वीर्य स्खलित नहीं होता, दीर्घकाल तक मैथुन में रत रहा जाता है, जननेन्द्रिय शिथिल नहीं होती, स्त्री पूरी तरह संतुष्ट होती है, पुरुष शक्ति का संचय करता है, आत्मोत्थान करता है। यह मंत्र मन ही मन जपा जाता है। क्योंकि सम्भोग समय में पुरुष का मुंह रखी के मुंह में होता है। यह अधरपान क्रिया है। इसलिये मंत्रोच्चार शक्य नहीं। मानसिक जप ही प्रशस्त है।

√●●यदि पुरुष चाहता है कि स्त्री गर्भ धारण करे तो उसे इसका उल्टा करना चाहिये। आगे उपनिषद्कार कहता है...

"अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखं संधाय अपान्याभिमान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति।"  
     (बृहदारण्यक उपनिषद् ६ । ४ । ११)

 [अथ याम् इच्छेत् दधीत इति तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संधाय अपान्य अभिप्राण्यात् इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः आदधामि इति गर्भिणी एव भवति ।] 

√●अथ याम् इच्छेत् = और जिसको (पुरुष) चाहे कि । 

√●दधीति इति = यह (स्त्री गर्भ को धारण करे। 

√●तस्याम् अर्थम् निष्ठाय मुखेन मुखम् संधाय =उस (स्त्री) में अपने अभिप्राय को रखकर मुख से मुख को संयुक्त कर। 

√●अपान्य =सांस निकाल कर । 

√● अभिप्राण्यात् = गहरा साँस खींचे।

√● इन्द्रियेण ते रेतसा रेतः = स्व इन्द्रिय बल से उस (स्वी) के रेतस (रज) में।

 √●आदधामि = स्थापित करता हूँ, स्खलित करता हूँ, चुबाता हूँ, निचोड़ता हूँ। 

√●इति = ऐसा (कहे)।

√●गर्भिणी एव भवति = गर्भवती होना निश्चित है। 

√●●पुरुष स्त्री के साथ रतिक्रिया करता है और इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य गर्भस्थापित करना होता है; ऐसे अवसर पर उसे क्या करना चाहिये ? यही इस मंत्र का प्रतिपाद्य है। यह गर्भाधान क्रिया है। इसमें सर्वप्रथम स्त्री के सप्तम स्थान से पुरुष का सप्तम स्थान संयुक्त होता है। अर्थात् योनि में लिंग का समावेशन होता है। इसके पश्चात् स्त्री के द्वितीय स्थान से पुरुष का द्वितीय स्थान जुड़ता है। अर्थात् स्त्री, पुरुष के अधरोष्ठ को अपने दोनों ओष्ठों के बीच में रखकर उसका चूषण करती है। व्युत्क्रमतः पुरुष, स्त्री के अधरोष्ठ को ।

√●गर्भाधान यज्ञ में 'अभिप्राण्य अपान्यात्' सूत्र से पुरुष अपानन के पश्चात् अभिप्राणन करता है। इसमें प्राण वायु को अपने अन्दर खींचते हुए पुरुष अपने वीर्य को स्त्री की योनि में (के भीतर) गिरा देता है। साथ ही साथ यह मंत्र जपता है- 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि।' इससे गर्भ निश्चित रूप से ठहरता है।

√●अग्नि जब प्रज्जवलित हो, तभी उसमें घी की आहुति डालनी चाहिये। अप्रज्जवलित/बुझी हुई अग्नि में मृताहुति डालना व्यर्थ होता है। स्त्री की योनि के मध्य भाग में अग्नि का निवास होता है। यह अग्नि जब तक जागे न लपटों से युक्त न हो, सुप्रज्ज्वलित न हो तब तक उसमें वीर्य रूपों घृत की आहूति नहीं डालना चाहिये। सुप्त अग्नि में वीर्याहुति व्यर्थ होती है। ऐसी अवस्था में गर्भाधान नहीं होता । अतः योषाग्नि को सर्वप्रथम प्रज्जवलित करना चाहिये। शिश्न की सतत अपानु (आगे-पीछे) गति से योनि को भीतरी दीवारों पर घर्षण के बढ़ने से उष्मा बढ़ती है। जैसे ग्वाला गाय के थन को मुझे में लेकर उससे दूध निकालता है, ठीक वैसे ही योनि को अन्तमांसपेशियाँ शिश्न से वीर्य का दोहन करती हैं। ऐसी अवस्था में वीर्य का रोक पाना पुरुष के लिये नितान्त कठिन होता है। खुजलाहट के साथ स्त्री का रज जब क्षरित होता है तभी तत्क्षण पुरुष का वीर्य भी झरता है। इन दोनों का परस्पर एक साथ मिलन गर्भाधान है। यह क्रिया स्वाभाविक है। प्राय: पुरुष शीघ्र उत्तेजित होता है और उसका वीर्य टपक पड़ता है। किन्तु स्वी शीघ्र नहीं उत्तेजित होती, विलम्ब से उत्तेजित होती है। गर्भाधान में पुरुष को उत्सुकता और धैर्य के साथ अमानुगति (मैथुन करते रहना चाहिये। स्त्री स्खलित नहीं हुई और पुरुष स्खलित हो गया तो गर्भ नहीं ठहरता।

√●कुण्डली में द्वितीय एवं सप्तम भाव मारक स्थान माने गये हैं। क्यों ? ये दोनों भाव काम को मारते हैं अथवा इन दोनों भावों के द्वारा काम स्वयं जातक को मारता है। इसलिये ये मारक हैं। काम अमूर्त देवता है। द्वितीय और सप्तम भाव इसके प्रिय स्थान हैं। द्वितीय भाव अर्थात् आँखों में बसता है, जिहा (वाणी) पर रहता है, ओठों (विशेष कर अधरोष्ठ) में होता है। द्वितीय के अतिरिक्त सप्तम भाव अर्थात् उपस्थ (योनि वा शिश्न) में इसका प्रकृष्ट वास होता है। सम्भोग में स्त्री का द्वितीय भाव पुरुष के द्वितीय भाव से जुड़ता है तथा स्त्री का सप्तम भाव पुरुष के सप्तम भाव से एकाकार होता है। इससे स्त्री और पुरुष तृप्त होते हैं, क्षरित होकर शान्त वा शिथिल हो जाते हैं। इस प्रकार उन दोनों के अन्दर का काम मर जाता है। इसलिये ये भाव काम के लिये मारक कहे गये हैं। एक विशेष बात यह है कि यह काम मर कर पुनः जीवित होता है। धीरे-धीरे यह बढ़ता है, बढ़कर पुष्ट होता है, पुष्ट होकर स्त्री और पुरुष दोनों को पीड़ा पहुंचाता है। दोनों एक दूसरे को देखने के लिये, बोलने के लिये तथा चूमने के लिये व्याकुल होते हैं। यह व्याकुलता बढ़कर उन्हें मैथुनातुर करती है। इसमें बाधा होना इन (स्त्री-पुरुष) के लिये मृत्युतुल्य है। अतः ये मारक है।

√●शिव जी ने काम को मारा/ अपने तीसरे नेत्र से जलाया / ज्ञान से शान्त किया। यह सर्वविदित है। काम तब से अशरीरी होकर अधिक व्यापक और शक्तिशाली हो गया। काम तो जल/मर नहीं सकता। मरा/जला उसका शरीर काम प्रेत बन गया है। इसी प्रेत काम ने शिवकोधर दबोचा। शिव ने स्कन्द को पैदा किया। स्कन्द पार्वती के पुत्र नहीं थे। ये किसी स्त्री के गर्भ में पले ही नहीं इसलिये मातृहीन हैं। एक कथा है कि शिव पार्वती के साथ खुले एकान्त स्थान में बिहार कर रहे थे। शिव पार्वती के साथ मैथुनरत थे। इसी समय ऋषिगण उनसे मिलने के लिये आये। हड़बड़ी में शिव ने अपना लिंग पार्वती की योनि से बाहर निकाला। उनका वीर्या योनि में न गिरकर बाहर भूमि पर बिछे हुए सरकण्डों पर पड़ा। इस वीर्य के ६ भाग हो गये। इस अमोघ वीर्य के एक-एक भाग को ६ कृत्तिकाओं ने ले लिया। इन कृत्तिकाओं ने आपस में मिलकर इस वीर्य के ६ भागों को एक में मिलाकर ६ सिर, १२ आंख १२ हाथ वाले एक अद्भुत बालक को रचना किया। इसे कार्तिकेय कहा गया। इसे पड़ानन भी कहते हैं। यह कथा सामान्य लोगों के लिये बोधगम्य नहीं है। ६ कृत्तिकाएँ ही कृत्तिकानक्षत्र के ६ तारे हैं। कृतिका का स्वामी सूर्य है। सूर्य ही शिव है। सूर्य अग्नि है। इसीलिये कार्तिकेय का नाम अग्निभू है। पार्वती त्रिगुणात्मक मूल प्रकृति है।

√●【कार्तिकेय = अग्निभू = प्रकाश = ज्ञान। शिव =सूर्य = प्रकाश = ज्ञान पार्वती = प्रकृति= अज्ञान यह सब जाननीय हैं। 】

√● "मनुष्यवदेवताभिधानम्" यह सूत्र है। पौराणिक कथाएँ इस सूत्र के परिप्रेक्ष्य में सत्य का निगूहन एवं अनावरण करती हैं। मूखों को यह सब अटपटा अश्लील और अनहोनी मालूम पड़ता है। यह मूर्खो के लिये नहीं, वैष्णवजनों/विद्वानों के लिये हैं। कृतिका नक्षत्र का प्रथम चरण मेष राशि में पड़ता है। मेष में सूर्य उच्च का होता है। कृत्तिका नक्षत्र के शेष चरण वृष राशि में पड़ते हैं। वृष में चन्द्रमा उच्च का होता है। जिसका सूर्य (आत्मा) और मन (चन्द्रमा) उच्च का अर्थत् बलवान है वह कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं होता। पुत्रकामी को ऐसे व्यक्तित्व वाले पुत्र के लिये यज्ञ करना चाहिये ।

 √●ब्रह्म सत् है, चित् है, आनन्द है। 'सच्चिदानन्दं ब्रह्म' जो इस आनन्द को नहीं जानता, जिसने इस आनन्द का अनुभव नहीं किया, वह ब्रह्म को क्या जानेगा ? वह ब्रह्म सुख की कल्पना कैसे करेगा ? उपस्थ आनन्द का घर है। इसे अवश्य जानना चाहिये। ऋषि का कथन है...

 "सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकावनम्।" 
          (बृह. उ. ४।५।१२ )

【सर्वेषाम् आनन्दानाम् उपस्थः एक आयनम्】

√●'सर्वेषां आनन्दानाम्' पद से स्पष्ट है कि आनन्द एक होकर भी अनेक है। आनन्द अपने अन्दर है। आनन्द अपने बाहर भी है। पुरुष का आनन्द स्त्री के अन्दर रहता है। इसको पाने के लिये पुरुष, स्त्री के पास जाता है। स्त्री का आनन्द पुरुष के अन्दर रहता है। इसे पाने के लिये स्त्री, पुरुष के निकट जाती है। पुरुष, स्त्री से आनन्द प्राप्त करता है। स्त्री, पुरुष को आनन्द देती है। पुरुष स्त्री को आनन्द देता है। स्त्री, पुरुष से आनन्द पाती है। यह संसार इसी आनन्द का चक्र है। देने में आनन्द है लेने में भी आनन्द है। यदि लेन-देन में आनन्द न हो तो ऐसा लेन देन किस काम का ? दाता को देने मेंसुख मिलना ही चाहिये। जो पाता है, उसको भी लेने में सुख होना चाहिये। जब माहक और दाता दोनों को सुखानुभूति होती है तो ऐसे व्यापार को उत्तम कहा जाता है। स्त्री और पुरुष दोनों एक ही साथ एक ही समय में दाता और माहक होते हैं। यदि दोनों आनन्दित है तो उनका पारस्परिक व्यापार (मैथुन यश) श्रेष्ठ है, अन्यथा तुच्छ स्त्री, पुरुष के वीर्य को लेती है। पुरुष अपना वीर्य स्त्री की योनि में उड़ेलता है। पुरुष का वीर्य जब स्त्री की योनि में गिरता है तो उसे अतीव सुख मिलता है। ये देने का आनन्द है। स्त्री जब पुरुष के वीर्य को अपनी योनि में लेती है, उसके उष्मात्मक स्पर्श से उसे आनन्द मिलता है।

√●इसी प्रकार, स्त्री अपना रज पुरुष को देती है। उस रज के स्पर्श की सुखानुभूति पुरुष अपने शिशन (लिंग के अग्रभाग) से करता है। स्त्री जब अपना रज पुरुष के शिश्न पर चुवाती है तो उसे अतीव आनन्द मिलता है। इस आनन्द की अनुभूति में वह आँखें मूंद लेती है तथा स्तब्ध हो जाती है। स्त्री रज देकर आनन्दित होती है तो पुरुष रज लेकर उतना ही आनन्दित होता है। दोनों का आनन्द सम होता है। होना भी चाहिये । क्योंकि सप्तम भाव में तुला राशि है।

√● तुला का बायाँ पलड़ा स्त्री है, दायाँ पलड़ा पुरुष है। तुला न्याय की प्रतीक है। न्याय यही है कि तुला का दण्ड सीधा क्षैतिज हो। यदि ऊपर नीचे होता है तो न्याय नहीं है। यदि पुरुष का आनन्द स्त्री के आनन्द से अधिक है तो अन्याय है। यदि स्त्री का आनन्द पुरुष से अधिक है तो अन्याय है। अतः स्त्री और पुरुष दोनों को चाहिये कि वे एक दूसरे को समान आनन्द दें तथा समान आनन्द लें। यही न्यायोचित रति यज्ञ है। 

√●सम्भोग के सुख में, आनन्द की खोज में पुरुष, स्त्री हो जाता है तथा स्त्री, पुरुष हो जाती है। यह अद्भुत क्रिया है। स्त्री में पुरुष तत्व की न्यूनता होती है। पुरुष में स्त्री तत्व की अल्पता होती है। यही अभाव उन दोनों को एक दूसरे के निकट लाता है। दोनों अर्धनारीश्वर बनना चाहते हैं। अर्थ = ॠ (अर) + था (थ)। नारी स्त्री ईश्वर= पुरुष ।अर्धनारीश्वर का अर्थ हुआ- स्त्री और पुरुष तत्व समान मात्रा में धारण करते हुए क्रियाशील रहना। हर स्त्री हर पुरुष अर्धनारीश्वर का अपूर्ण रूप है। इसकी पूर्णता समत्व के लिये ये परस्पर मिलते हैं, संश्लिष्ट होते हैं, एक दूसरे में प्रविष्ट होकर अपने अभाव की पूर्ति करते हैं। संभोग में समत्व होता है। समत्य में आनन्द है, सुख है। क्योंकि समत्व योग है। व्यास जी कहते है...
"समत्वं योगमुच्यते।"
 (श्रीमद्भागद्गीता)

√● संभोग में समता होती है। इससे सुख को उत्पत्ति होती है। कैसे ? सप्तम भाव समत्व योग या सम्भोग स्थान है। संख्या ४ की उत्पादक संख्या ७ है।

【 ७ + ९ = १६, 
१६ - १२ = ४ चतुर्थ भाव ।】

√●चतुर्थ भाव सुख है। अतः सप्तम भाव आनन्द का स्रोत है। सप्तम भाव सुख का समुद्र है। इस समुद्र का मन्थन करके स्त्री-पुरुष सुखरूप रत्न पाते हैं। सप्तम भाव केवल स्त्री और पुरुष के संयोगजन्य आनन्द का स्रोत ही नहीं है, यह ब्रह्म और जीव के मिलन का, भक्त और भगवान् के सान्निध्य का भी स्थान है। हर प्रकार के आनन्दों की यह स्थली है। इस आनन्द को पाने के लिये लोग जीते और साँस लेते हैं। ऋषि कहता है...

 "को होवान्यात् कः प्राप्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ।"
             (तैतिरीय उप. २/७)

 [कः हि एवं अन्यात् कः प्राण्यात् यद् एषः आकाशः आनन्दः न स्यात् ।]

 √●अन् धातु अनिति जीवने विधिले प्र.पु. एक व. अन्यात् ।

√● प्र + अन् प्रणिति श्वास-प्रश्वासे विधिलिङ् प्र.पु. एक व. प्राण्यात् । 

√●आकाश = व्यापक ।

 √●यदि वह व्यापक आनन्द न होता तो कौन जीवित रहता ? कौन साँस लेता ? 

एक अन्य कथन है...

 “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति । " 
(बृहदारण्यक् उप. ४।३।३२)

 【 एतस्य एव अनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उप जीवन्ति ।】

 √●अन्य समस्त लोग, आनन्द के ही इस अंश को पाकर जीवित रहते हैं। 

आनन्द से पृथक कौन है ? चाहे वह आनन्द भौतिक हो वा पराभौतिक ।

√● सप्तम भाव के लिये गणितीय सूत्र है- १ + १ = १ यहाँ पर १+१=२ सूत्र से काम नहीं चलता । यहाँ स्त्री और पुरुष के बीच खटपट/ विभेद / झगड़ा/वैमनस्य नहीं होना चाहिये। यदि सप्तम भाव में शुभ प्रभाव का पूर्ण वर्चस्व है, अशुभ प्रभाव नाममात्र का भी नहीं है तो १+१=१ का सूत्र काम करेगा। इसी में आनन्द है। १ + १ = १२ में आनन्द नहीं है। जीव और ईश्वर का एकीकरण यहीं होता है। समाधि अवस्था में ईश्वर और जीव का भेद मिट जाता है। न ईश्वर रहता है, न जीव रहता है। इन दोनों के स्थान पर जो अनिर्वचनीय तत्व रहता है, उसे ब्रह्म कहते हैं। यह निर्गुण है और आनन्द है। जो इस आनन्द को जानता है वह अभय होता है। वह किसी से क्यों कम्पित होवे ? अद्वैत में दो होता नहीं। डर तो द्वैत में है। आनन्द में कभी भी डर नहीं होता। उपनिषद् का वाक्य है...

"आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कदाचन।" 
       (तैत्तिरीय उपनिषद. २ । ४)

 【(तस्य ब्रह्मणः आनन्दम् विद्वान् कदाचन न बिभेति 】 

√●उस ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला / अनुभव करने वाला कभी भय नहीं करता। तस्मै ब्रह्मणे नमः । तस्मै विदुषे नमः ।

√● मैथुनानन्द मात्र प्रतिदर्श है, ब्रह्मानन्द का यह ब्रह्मानन्द नहीं है। मैथुनानन्द क्षणिक होता है, घटी भर होता है वा प्रहर भर रहता है। यह काल सापेक्ष है। ब्रह्मानन्द काल निरपेक्ष है, शाश्वत है, निरवधि है। इसलिये व्यक्ति (स्त्री व पुरुष) को चाहिये कि वे केवल मैथुन जन्य सुख तक सीमित न रहें। इसे ब्रह्मानन्द की छाया वा झलक समझ कर ब्रह्मानन्द की ओर उन्मुख होवें। इसको पाने के लिये इसे सिद्ध करने के लिये अनन्त वर्षो तक जियें। ऋषि बाल्मीकि कहते हैं...

 "एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्ष शतादपि।"
   (रामायण, सुन्दरकाण्ड, सर्ग ३४। ६ )

【मनुष्य जीता है तो सौ वर्ष के बाद भी उसे आनन्द प्राप्त होता है ।】

√●अतएव आनन्दकामी को दीर्घायुष्य की कामना करनी चाहिये। भोग के लिये नहीं, भजन के लिये/ भक्ति के लिये / ज्ञान के लिये। भोगानन्दी से भजनानन्दी होना चाहिये। मैं भगवान् का भजन करता हूँ। उसी के प्रताप से यह सब लिख रहा हूँ।

√••कुण्डली में लग्नस्थान जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्ववाला स्थान सप्तम है। लग्न कितना ही अच्छा हो, सप्तम के अशुभ होने से जीवन नीरस और कभी-कभी कुरस हो जाता है। सप्तम अग्निस्थान है ऐसा कौन है, जिसे कामाग्नि नहीं जलाती ? सारा संसार कामयज्ञ कर रहा है। यह यज्ञ उत्पत्ति का हेतु है। यह यज्ञ आनन्द का उत्स है। 
                 "तस्मै यज्ञाय नमः।"

√•सप्तम भाव कालपुरुष का उपस्थ है। पुरुष की कुण्डली में सप्तमस्थान शिश्न है तो स्त्री की कुण्डली में योनि । दोनों की कुण्डली में यह मैथुन क्रिया का स्थान है। काम यज्ञ का निष्पादन स्थान सप्तम भाव है। जैसे काष्ठमन्थन से यज्ञाग्नि प्रकट होती है, उसी तरह पुरुष स्त्री के उपस्थ मन्थन से कामाग्नि का प्रज्ज्वलन होता है। इसमें पुरुष अपने वीर्य की आहुति डालता है। स्त्री की योनि यज्ञ को वेदी होती है। मैथुन ही सृष्टियज्ञ का दूसरा नाम है। इसका फल है; सुख, आनन्द, तृप्ति इस विषय में ऋषि का कथन है...

"एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ,
ओषधीनां पुष्पाणि, पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः,
 पुरुषस्य रेतः । "
( बृहदारण्यक उपनिषद ६।४।१)

√•【इन पञ्चभूतों का रस पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का रस (सार) ओषधि है। ओषधियों का रस पुष्प हैं। पुष्पों के रस फल हैं। फलों का रस पुरुषशरीर है। पुरुष शरीर का रस वीर्य है।】

√•प्रजापति ब्रह्मा ने सर्वप्रथम वीर्य उत्पन्न किया। इस वीर्य को व्यर्थ न होने देने के लिये उसने स्वी की रचना की है। ऋषि कहता है...

"सह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हस्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति,
 स स्त्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाध उपास्त, तस्मात्
 स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत् तेनैनामभ्यसृजत्।"
(बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।२)

√• [उस प्रजापति ने इच्छा की कि इस पुरुषसार (वीर्य) के लिये प्रतिष्ठा (उत्तम स्थान) बनाऊं। तब उसने स्त्री को रचा। उसको रच कर उसेनीचे आराधा अर्थात् भूलोक में उसे पत्नी रूप में नियत किया। जिससे पुरुष उसे पत्नी रूप में अराधे। उसने इस पुरातन शिलावत् कठोर व्रत को पूरा किया। उसी से स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक नियम को रचा ।]

 ••सप्तम भाव रूप स्त्री तत्व का वर्णन करते हुए ऋषि कहता है...

 "तस्या वेदिरूपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे, समिद्धो ।
मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य 
लोको भवति, तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानद्योपहासं
 चारत्यासाँ स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानघोपहासं - चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृते।" 
      (बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।३)

√•तस्या = उस (स्त्री) की। 
√•वेदि (पुत्रेष्टि यज्ञ का स्थल ।
√•उपस्थः = योनि स्थान।
√•लोमानि= रोएँ । 
√•बर्हिः =कुशाएँ।
 √•चर्म-अधिषवणे = मृगचर्म और अधिषवण।
 √•समिद्धः = दीप्त।
 √•मध्यतः = मध्यभाग में।
 √•तौ = वे दोनों। 
√•मुष्कौ= दोनों मुष्क (कपाट)। 
√•सः वह यावान् = जितना ।
√•ह वै = निश्चय से। 
√•वाजपेयेन = वाजपेय (यज्ञ) से। यजमानस्य = यज्ञकर्ता का।
 √•लोकः = स्थिति फल प्राप्ति। 
√•भवति = होता है।
 √•तावान् = उतना । 
√•अस्य = इसका।
 √•लोकः = स्थान, फल। 
√•भवति = होता है।
 √•यः =जो।
 √•एवम् = इस प्रकार। 
√•विद्वान् = जानने वाला।
√•अद्योपहासम् = रतिकर्म, आधान-निषेक क्रिया ।
 √•चरति =करता है।
 √•आसाम् = इन स्त्रीणाम् स्त्रियों के।
 √•सुकृतम्= पुण्य को।
 √•वृङ्क्ते = पा लेता है।
 √•अथ =और।
 √•यः जो इदम् = इसको 
√•अविद्वान्= न जानता हुआ। अद्योपहासम् =मैथुन कर्म।
 √•चरति = करता है।
 √•अस्य = इस (मूर्ख के)।
 √•स्त्रियः = स्त्रियाँ।
 √•सुकृतम् = पुण्य को।
 √•वृञ्जते = हर लेती हैं।

√•••इस मन्त्र में यही बताया गया है कि स्वी का शरीर यज्ञशाला है। उसका जननांग / योनि स्थल यज्ञ की वेदी है। योनि स्थान पर उगे हुए रोयें. (बाल) उस वेदी पर बिछी हुए कुशाएँ हैं। भगोष्ठ (योनि के छिद्र को ढके हुए दो मांस फलक) ही मृगचर्म है। इस भगोष्ठ के नीचे दो अन्य लघु कपाट (मांस फलक) ही अधिषवण हैं। भगांकुर ही प्रदीप्त अग्नि की लपट है।

 √••मैथुन कर्म वाजपेय यज्ञ है। वाजपेय का अर्थ है-बल, मैथुननि जो बली है, जिस पुरुष के शिश्न में शक्ति है, जिस पुरुष का लिंग स्त्री योनि के सन्निकर्ष से कठोरता/दृढ़ता को प्राप्त करता है, वही इस यज्ञ का सम्पादन कर सकता है। ऐसा पुरुष बाजपेयी है। यजमान स्त्री है। बाजपेयी पुरुष, यजमान स्वी का यज्ञ करता है-उसकी योनि में शेफ रूपी खुवा से घृतरूपी वीर्य की आहुति डालता है। इससे स्त्री को लोक में प्रतिष्ठा मिलती है। स्त्री गर्भवती होगी, पुत्र जनेगी तो लोक में सम्मान प्राप्त पायेगी जो विद्वान् 1 स्त्री में यज्ञ की भावना से निषक करता है, वह स्त्री के पुण्य कर्मों के फल का आस्वादन पाता है। स्त्री को यज्ञशाला मानकर, उसकी योनि को यज्ञ वेदिका समझ कर रतिकर्म करने का अर्थ है-स्त्री को मान प्रतिष्ठा देते हुए उसका उपभोग करना। इससे स्त्री प्रसन्न होगी। उसकी इस प्रसन्नता से उसका पुण्य उसे स्वतः प्राप्त होता है। ऐसा विद्वान पुरुष सुखी होता है। जो यज्ञ भाव से अद्योपहासन (रतिक्रिया) नहीं करता अर्थात् स्त्री को सम्मान नहीं देता, वह उसका पुण्य पाने से वञ्चित रहता है, उल्टे अपना पुण्य ही उसे देता है। पुण्य से रिक्त पुरुष दुर्दशा को प्राप्त होता है। ऐसा पुरुष अविद्वान् होता है। ऐसा करने वाला अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता है। बलात्कारी पति मूर्ख होता है, क्योंकि वह अपने पुण्य को गवाँता है।

√•स्त्रीरूप  यजमान यज्ञ से सन्तुष्ट है प्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा पायेगा ही। यह दक्षिणा ही स्त्री का सुकृत है। यजमान असन्तुष्ट है, अप्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा से च्युत रहेगा। दक्षिणा से होन विपन्न पुरुष की गति का वर्णन में कैसे करूँ !

 √•यज्ञशाला साफ सुथरी होनी चाहिये। स्त्री को देह स्वच्छ एवं सुभूषित-सुवासित होनी चाहिये। यज्ञवेदी पवित्र होनी चाहिये। स्त्री की योनि भी पवित्र (ऋतु स्नान के पश्चात् काँ) होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त यजमान स्त्री एवं होता पुरुष के भाव भी दिए होने चाहिये। ऐसा यज्ञ करने कराने वाले नर-नारी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम ।

√• हर पुरुष (गृहस्थ) की अपनी एक यज्ञशाला (पत्नी) होनी चाहिये। हर स्त्री (विवाहिता) का अपना एक याज्ञिक (वाजपेय पुरुष) वा पति होना चाहिये। यह यज्ञ (मैथुन) यथा समय होते रहना चाहिये। इससे दोनों स्त्री-पुरुष का ऐश्वर्य बढ़ता है। यह मैथुन यज्ञ तीन प्रकार का होता है।

 √•१. तामसी मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष जब अपना स्वार्थ देखता है, स्त्री के स्वार्थ (आनन्द) की अवहेलना करता है तो वह पिशाच होता (कहा जाता है। जब स्त्री ऐसा करती है तो वह पिशाचिनी की संज्ञा प्राप्त करती है। कलियुग में ऐसे यज्ञ अधिक हो रहे हैं।

 √•२. राजसी मैथुन- इसमें स्त्री और पुरुष परस्पर के सुख का ध्यान रखते हैं। ऐसे स्त्री-पुरुष क्रमशः यक्षिणी एवं यक्ष कहलाते हैं।

 √|३. सात्विक मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष को सतत चेष्ठा रहती है कि वह स्त्री को पूर्णतः तृप्ति पुरुष को सुसन्तुष्ट रखती है। ऐसे स्त्री पुरुष क्रमशः ऋषि और ऋषि होते हैं। 

√•अपनी ही वेदी (स्वस्त्रीयोनि) में ही पुरुष हवन करे, दूसरे की वेदी (परस्त्रीयोनि) में नहीं। धर्मसंगत होन पर दूसरे की वेदी पर हवन किया जा सकता है। जैसा कि जगद्गुरू श्री वेदव्यास ने अपनी माता सत्यवती के आह्वान पर महाराज विचित्रवीर्य की दो विधवाओं एवं एक दासी की यज्ञ वेदी पर स्ववीर्य का हवन करके धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर को पैदा किया। इससे अस्त होता हुआ कौरव वंश बच गया।

√• गृहस्थी का यही आचार धर्म है कि वह स्त्री को यज्ञ रूप जान कर उसके साथ बर्ताव करे। इस धर्म का समर्थन आणि उद्दालक, मौद्रल्य नाक एवं कुमार हारीत ने अपनी-अपनी स्मृतियों में किया है।

 "एतद्ह स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणि: आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह ।"
         (बृह.उप. ६।४।४)

 √•ब्राह्मण कहलाने वाले बहुत से मनुष्य मैथुन कर्म को यज्ञ न मानते हुए दुराचार के कारण इन्द्रियहीन सुकृतरहित होकर इस लोक से अशुभ लोक को जाते हैं। ऐसे वे ही जन होते हैं जो इस सदाचार के भेद को न जानते हुए संसर्ग (मैथुन) करते हैं। कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनका वीर्य सोते वा जागते स्खलित होता है अर्थात् स्त्री को यज्ञ के समान पवित्र नहीं समझते और उसे विषय का साधन समझते हैं, वे भी बुरे लोकों को पाते हैं, पतन के गर्त में गिरते हैं।

 "बहवो मर्या ब्राह्मणाय निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्त्रीस्माल्लोकात् यन्ति य इदमविद्वांसोबी धोपहासं वरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दयति ।"
        ( बृह. उप. ६।४।४ )

 √•पुरुष मैथुन यज्ञ नहीं करेगा तो उसका वीर्य सोते-जागते व्यर्थ में स्खलित होगा। स्खलन से होने वाली क्षति से बचने के लिये उसे मैथुन करना चाहिये वीर्य की सार्थकता इसी में है। जिसका वीर्य स्वप्नदोषादि के माध्यम से वह जाय उसे क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...

"तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत्वन्मेऽद्यरेतः पृथवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः । इदमहं तदेत आददे पुनर्मामेत्विन्द्रियं पुनस्ते पुनर्भगः । पुनराधिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनी वा भ्रुवौ वा निमृज्यात्।"
         (बृह.उप.६/४/५)

√•तद् =उस (स्खलित वीर्य) को ।
√•अभिमृशेत्= छुवे।
√•अनुवा मन्त्रयेत्= अथवा चिन्तन करे कि ऐसा क्यों हुआ)। 
√•यत् = जो।
 √•मे= मेरा ।
√•अद्य = आज।
 √•रेतः = वीर्य।
 √•पृथिवीम् = पृथिवी पर ।
√•अस्कान्सीत् =स्खलित होकर गिरा है।
√• यद्= जो। 
√•ओषधीः= ओषधियों को। 
√•अपि = भी।
√•असरत् = चला / सरका है।
√• यद् = जो।
√•अप = जलों को।
√•इदम् = यह इस ।
√•अहम् = मैं।
 √•तद् = उस।
√• रेतः =वीर्य को।
 √•आददे = ग्रहण करता हूँ, पुनः संचित करता हूँ (फिर से स्खलित नहीं होने दूंगा)।
 √•पुनः= मुझको।
√• एतु = प्राप्त हो, आवे।
 √•इन्द्रियम्= इन्द्रिय सामर्थ्य ।
 √•पुनः = फिर। 
√•अग्निः =शरीराग्नि।
 √•धिष्ण्या = धारण करने वाली (बुद्धि या समझ) ।
 √•यथास्थानम् = पूर्ववत् अपने-अपने स्थान पर । 
√•कल्पन्ताम् = होवें । 
√•इति = ऐसे जप कर वा चिन्तन कर।
 √•अनामिका + अङ्गुष्ठाभ्याम् = अनामिका अंगुली तथा अंगूठे से।
 आदाय ग्रहण कर।
 √•अन्तरेण = मध्य में।
 √•स्तनौवा = दोनों स्तनों (हृदय प्रदेश) के।
 √•भ्रुवौ वा = दोनों भृकुटियों (मस्तिष्क वा ललाट) के।
 √•निमृज्यात्= प्रक्षालन करे, जल से मार्जन करे (हृदय एवं मस्तिष्क की शुद्धि करे)।

√••हृदय भावों का घर है। मस्तिष्क विचारों का आलय है। हृदय और मस्तिष्क के दूषित होने पर भाव और विचार दूषित होते हैं। इनके दूषित होने पर वीर्य का नाश होता है इसलिये अंगुष्ठा और अनामिका से स्खलित वीर्य वा वीर्य स्थान शिश्न का स्पर्श कर पुनः इसी से पश्चात्ताप की भावना करता हुआ भृकुटिमध्य एवं हृदयमध्य का संस्पर्श करे। अनामिका सूर्य की अंगुली है। सूर्य आत्मा का कारक है। अंगुष्ठ शुक्रमह का स्थान है। शुक्र वीर्य वा काम शक्ति का कारक है। सूर्य और शुक्र दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। दोनों का सहयोग होना पारस्परिक पुष्टि के लिये शुभ है। तन और मन से वीर्य की रक्षा करना ही स्पर्श का उद्देश्य है। स्पर्श मन्त्र का भाव यह है...

√•आज जो मेरा रेतस् पृथ्वी पर स्खलित हो गया, जो ओषधियों की ओर तथा जलों की ओर बहा, मैं वह सामर्थ्य लेता हूँ-निमह की शक्ति धारण करता हूँ। रेतस् निग्रह से मुझको फिर इन्द्रिय बल प्राप्त होवे, फिर तेज, फिर सौभाग्य प्राप्त होवे। अग्नि है स्थान जिसका वे अग्निधिष्ण्य देव- अपनी सामर्थ्य से फिर मुझको यथा स्थान में कर दे, मेरे गये हुए बल को फिर लौटा दे। ऐसा जफ्ते हुए अनामिका और अंगूठे से जल लेकर दोनों स्तनों एवं भ्रुवों के मध्य में लगावे।

 √•सबकी उत्पत्ति मैथुन से होती है। इसलिये सबके भीतर मैथुन क्रिया का संस्कार होता है। किसी को मैथुन सिखाना नहीं पड़ता। मैथुन करने का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता। रतिकर्म की दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। सबमें सम्भोग की इच्छा होती है। सब लोग सम्भोग करना जानते हैं। कोई तन से संयोग करता है। कोई मन से सहवास करता है। कोई मन और तन दोनों से संश्लेष करता है। ऐसा क्यों 7 स्त्री, पुरुष का एक भाग है। पुरुष उसे पाना चाहता है। पुरुष स्त्री का एक अंग है। वह उसे प्राप्त करने की इच्छा रखती है। इसलिये स्त्री-पुरुष का पारस्परिक सम्मिलन अनिवार्य एवं स्वाभाविक है। इसके लिये पुरुष स्त्री के साथ संगम करता है, पुरुष के साथ स्त्री सहयोग करती है। स्त्री यजमान है तो पुरुष पुरोहित। दोनों के सहकार से यह यज्ञ चल रहा है। दोनों की पार्थिव / शारीरिक संयुक्ति न होने पर मानसिक मैथुन होता है। इसमें कभी-कभी वीर्य स्खलित हो जाता है। इससे बचने के लिये परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन करते हुए भगवन्नाम जाप सरल निदान है। राम नाम जप से इष्टदेव का स्मरण करने से वीर्य की रक्षा होती है। मैथुन करते हुए वीर्य की रक्षा करने का यत्न करना चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास एवं ईश कृपा आवश्यक है । यह मेरा अनुभव है। इससे वीर्य की रक्षा होती है।

√•सप्तम भाव योनि है। योनि से सबका प्राकट्य होता है। इसलिये सप्तम भाव जन्म स्थान है। दूसरी ओर, लग्न को जन्म स्थान कहते हैं। यह विरोधाभास क्यों ? इसका अर्थ है-लग्न भाव प्रथम एवं योनिस्थान सप्तम का समान महत्व है। लग्न के अच्छा या बुरा होने से सप्तम भाव अच्छा या बुरा होता है। सप्तम स्थान के शुभाशुभ होने से लग्न स्थान शुभ वा अशुभ होता है। भविष्यफल कथन में इस तथ्य को आँखों से दूर नहीं करना चाहिये। ज्योतिषी अपनी दोनों आँखों से इन दोनों भावों पर एक साथ दृष्टि कर देखे और तब निर्णय करे। यही कारण है कि लग्न में मंगल के रहने से कुण्डली मंगली होती है तथा सप्तम में मंगल की उपस्थिति से भी कुण्डली में मंगलीपन आ जाता है। मंगल दोनों स्थानों में रहता हुआ दोष उत्पन्न करता है।

 √•लग्न में मैथुन का विचार होता है तो सप्तम मे वह विचार मैथुन क्रिया रूप में प्रतिफलित होता है। लग्न (मस्तिष्क) में मैथुन का विचार उठता है तो सप्तम (उपस्थ) में हलचल मच जाती है। यह तथ्य सब के द्वारा अनुभूत है।

 √••श्रीमद भगवद्रीता का एक श्लोक है...

 "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्बह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम् ।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥"
        (गीता अध्याय ४, श्लोक २४ )

√•मैथुन कर्म ब्रह्म कर्म है क्योंकि यह व्यापक रूप से सर्वत्र सब प्राणियों द्वारा किया जा रहा है। जब स्वी और पुरुष आपस में मिलते हैं-रतिक्रिया में लीन होते हैं तो दोनों की आँखें मुंद जाती हैं। सम्भोग की चरम अवस्था में दोनों निष्पन्द हो जाते हैं, हिलते-डुलते नहीं, एकाकार हो जाते हैं। यह आनन्द की अवस्था होती है। यह समाधिस्थता है। जीव, ईश्वर का ध्यान करता है। जब ईश्वर के साथ मिलकर जीव समाधि अवस्था में पहुँचता है अर्थात् ब्रह्म हो जाता है तो उसे जो सुख मिलता है, वही सुख पुरुष वा स्त्री को एक दूसरे में प्रवेश करके एक हो जाने से होता है। यह सुख ब्रह्मानन्द सहोदर है। मैथुन में स्त्री, पुरुषमय हो जाती है तथा पुरुष, स्वीमय हो जाता है। समाधि में जीव ईश्वरमय हो जाता है तथा ईश्वर, जीवमय हो जाता है। दोनों की युज्यता असम्पृक्तता ही आनन्द है। यह अनिवर्चनीय है। जो इसे अनुभव करे, वही जाने । समाधि ब्रह्मकर्म है, मैथुन ब्रह्मकर्म है। समाधि में ब्रह्माकार वृत्ति होती है। मैथुन में भी ब्रह्माकार वृत्ति होती है। यह अनुभूत सत्य है।

√•ब्रह्मार्पणम् = ब्रहम अर्पणम् वहा, अर्पण / दक्षिणा/ उपहार भेंट है। 

√•ब्रह्म हवि = ब्रहम हविघृत/आहुति/हवनीय द्रव्य है। 

√•ब्रह्माग्नौ= ब्रह्मारिन में बह्यरूपी अग्नि में ब्रह्म अग्नि है।

√• ब्रह्मणा हुतम् =ब्रह्म के द्वारा यज्ञीय अग्नि में डाला गया द्रव्य ।

√• तेन = उस (यज्ञ) के द्वारा।

 √•ब्रह्मैव गन्तव्यम् = ब्रह्म ही गन्तव्य / लक्ष्य प्राप्तव्य है।

 √•ब्रह्मकर्म समाधिना= समाधि से ब्रह्मकर्म।

【 सम् + आ + था कि = समाधि ।

√•समाधि का अर्थ है-ठहराव / स्थिरता/ गतिशून्यता, मन को, चित्त की, विचार की।】

√•चलता का त्याग समाधि है। पूर्ण शान्तिमयता समाधि है। गीता के इस श्लोक का पार्थिव अग्नि में हवन करने से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि यहाँ समाधि होती ही नहीं। ध्याता, ध्येय और ध्यान की त्रिपुटी का एकीकरण समाधि है। शान्तचित्तता समाधि है। शान्तचित से जो कर्म किया जाता है, वह साधारण कर्म न होकर ब्रह्म कर्म होता है। अथवा, शान्तचित्त व्यक्ति का हर कर्म ब्रह्मकर्म है।

√• यह सृष्टि अग्निषोमीय है। स्त्री अग्नि है। पुरुष सोम है। स्त्री को योनि में योषाग्नि है। पुरुष का वीर्य सोमतत्वी है। योषाग्नि में पुरुष अपने वीर्य का हवन करता है। इससे जो प्राप्त होता है अर्थात् सुख, वह ब्रह्म है। स्त्री को पुरुष द्वारा अथवा पुरुष को स्त्री द्वारा जो अर्पण किया जाता है, वह है प्रेम। यही दक्षिणा है।

√•प्रेम अर्पण वा दक्षिणा है, मैथुन यज्ञ की। यह दक्षिणा मैथुन से पूर्व दी जाती है। यह प्रेम ब्रह्म है। हवि वा घृत रूप वीर्य ब्रह्म है। योनिस्थ अग्नि / रज भी ब्रह्म है। रज ब्रह्म में रेतस ब्रह्म की आहुति डाली जाती है। आहुति डालने वाला पुरुष ब्रह्म है। यह मैथुन यज्ञ ब्रह्म है। इस यज्ञ के द्वारा प्राप्त होने वाला आनन्द भी ब्रह्म है। रतिक्रिया ब्रह्म कर्म है, केवल तभी जब यह शान्तचित्त होकर की जाती है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- यह उपनिषद् वाक्य इस श्लोक का केन्द्र बिन्दु है। इस ब्रह्माकार वृत्ति से मैथुन करने वाला पुरुष प्रणम्य है, विष्णु है। मैं उसे प्रणाम करता हूँ।

 √•स्त्री ब्रह्म है। पुरुष ब्रह्म है। स्त्री का रज ब्रह्म है। पुरुष का वीर्य ब्रह्म है। रति कर्म ब्रह्म है। दोनों के बीच प्रेम (आकर्षण) ब्रह्म है। दोनों के परिरम्भ से मिलने वाला सुख ब्रह्म है। इसका जिसे बोध है, वह ज्ञानी है। 
          "तस्मै ज्ञानिने नमः।"

 √•गृहस्थी को यह ब्रह्मज्ञान कब होगा ? जब उसकी कुण्डली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह होगा, अशुभ प्रभाव नाम मात्र का भी न होगा। ऐसा जातक कामयोग से ईश्वरसाक्षात्कार करता है। उसके लिये मैथुन अनिवार्य है, आत्मलाभ के लिये। वह अपने वीर्य की रक्षा करता करता हुआ स्त्री को तुष्ट करता है। न उसका पतन होता है, न स्त्री का।
√••कुण्डली में लग्नस्थान जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्ववाला स्थान सप्तम है। लग्न कितना ही अच्छा हो, सप्तम के अशुभ होने से जीवन नीरस और कभी-कभी कुरस हो जाता है। सप्तम अग्निस्थान है ऐसा कौन है, जिसे कामाग्नि नहीं जलाती ? सारा संसार कामयज्ञ कर रहा है। यह यज्ञ उत्पत्ति का हेतु है। यह यज्ञ आनन्द का उत्स है। 
                 "तस्मै यज्ञाय नमः।"

√•सप्तम भाव कालपुरुष का उपस्थ है। पुरुष की कुण्डली में सप्तमस्थान शिश्न है तो स्त्री की कुण्डली में योनि । दोनों की कुण्डली में यह मैथुन क्रिया का स्थान है। काम यज्ञ का निष्पादन स्थान सप्तम भाव है। जैसे काष्ठमन्थन से यज्ञाग्नि प्रकट होती है, उसी तरह पुरुष स्त्री के उपस्थ मन्थन से कामाग्नि का प्रज्ज्वलन होता है। इसमें पुरुष अपने वीर्य की आहुति डालता है। स्त्री की योनि यज्ञ को वेदी होती है। मैथुन ही सृष्टियज्ञ का दूसरा नाम है। इसका फल है; सुख, आनन्द, तृप्ति इस विषय में ऋषि का कथन है...

"एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ,
ओषधीनां पुष्पाणि, पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः,
 पुरुषस्य रेतः । "
( बृहदारण्यक उपनिषद ६।४।१)

√•【इन पञ्चभूतों का रस पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का रस (सार) ओषधि है। ओषधियों का रस पुष्प हैं। पुष्पों के रस फल हैं। फलों का रस पुरुषशरीर है। पुरुष शरीर का रस वीर्य है।】

√•प्रजापति ब्रह्मा ने सर्वप्रथम वीर्य उत्पन्न किया। इस वीर्य को व्यर्थ न होने देने के लिये उसने स्वी की रचना की है। ऋषि कहता है...

"सह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हस्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति,
 स स्त्रियं ससृजे तां सृष्ट्वाध उपास्त, तस्मात्
 स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत् तेनैनामभ्यसृजत्।"
(बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।२)

√• [उस प्रजापति ने इच्छा की कि इस पुरुषसार (वीर्य) के लिये प्रतिष्ठा (उत्तम स्थान) बनाऊं। तब उसने स्त्री को रचा। उसको रच कर उसेनीचे आराधा अर्थात् भूलोक में उसे पत्नी रूप में नियत किया। जिससे पुरुष उसे पत्नी रूप में अराधे। उसने इस पुरातन शिलावत् कठोर व्रत को पूरा किया। उसी से स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक नियम को रचा ।]

 ••सप्तम भाव रूप स्त्री तत्व का वर्णन करते हुए ऋषि कहता है...

 "तस्या वेदिरूपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे, समिद्धो ।
मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य 
लोको भवति, तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानद्योपहासं
 चारत्यासाँ स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानघोपहासं - चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृते।" 
      (बृहदारण्यकोपनिषद् ६।४।३)

√•तस्या = उस (स्त्री) की। 
√•वेदि (पुत्रेष्टि यज्ञ का स्थल ।
√•उपस्थः = योनि स्थान।
√•लोमानि= रोएँ । 
√•बर्हिः =कुशाएँ।
 √•चर्म-अधिषवणे = मृगचर्म और अधिषवण।
 √•समिद्धः = दीप्त।
 √•मध्यतः = मध्यभाग में।
 √•तौ = वे दोनों। 
√•मुष्कौ= दोनों मुष्क (कपाट)। 
√•सः वह यावान् = जितना ।
√•ह वै = निश्चय से। 
√•वाजपेयेन = वाजपेय (यज्ञ) से। यजमानस्य = यज्ञकर्ता का।
 √•लोकः = स्थिति फल प्राप्ति। 
√•भवति = होता है।
 √•तावान् = उतना । 
√•अस्य = इसका।
 √•लोकः = स्थान, फल। 
√•भवति = होता है।
 √•यः =जो।
 √•एवम् = इस प्रकार। 
√•विद्वान् = जानने वाला।
√•अद्योपहासम् = रतिकर्म, आधान-निषेक क्रिया ।
 √•चरति =करता है।
 √•आसाम् = इन स्त्रीणाम् स्त्रियों के।
 √•सुकृतम्= पुण्य को।
 √•वृङ्क्ते = पा लेता है।
 √•अथ =और।
 √•यः जो इदम् = इसको 
√•अविद्वान्= न जानता हुआ। अद्योपहासम् =मैथुन कर्म।
 √•चरति = करता है।
 √•अस्य = इस (मूर्ख के)।
 √•स्त्रियः = स्त्रियाँ।
 √•सुकृतम् = पुण्य को।
 √•वृञ्जते = हर लेती हैं।

√•••इस मन्त्र में यही बताया गया है कि स्वी का शरीर यज्ञशाला है। उसका जननांग / योनि स्थल यज्ञ की वेदी है। योनि स्थान पर उगे हुए रोयें. (बाल) उस वेदी पर बिछी हुए कुशाएँ हैं। भगोष्ठ (योनि के छिद्र को ढके हुए दो मांस फलक) ही मृगचर्म है। इस भगोष्ठ के नीचे दो अन्य लघु कपाट (मांस फलक) ही अधिषवण हैं। भगांकुर ही प्रदीप्त अग्नि की लपट है।

 √••मैथुन कर्म वाजपेय यज्ञ है। वाजपेय का अर्थ है-बल, मैथुननि जो बली है, जिस पुरुष के शिश्न में शक्ति है, जिस पुरुष का लिंग स्त्री योनि के सन्निकर्ष से कठोरता/दृढ़ता को प्राप्त करता है, वही इस यज्ञ का सम्पादन कर सकता है। ऐसा पुरुष बाजपेयी है। यजमान स्त्री है। बाजपेयी पुरुष, यजमान स्वी का यज्ञ करता है-उसकी योनि में शेफ रूपी खुवा से घृतरूपी वीर्य की आहुति डालता है। इससे स्त्री को लोक में प्रतिष्ठा मिलती है। स्त्री गर्भवती होगी, पुत्र जनेगी तो लोक में सम्मान प्राप्त पायेगी जो विद्वान् 1 स्त्री में यज्ञ की भावना से निषक करता है, वह स्त्री के पुण्य कर्मों के फल का आस्वादन पाता है। स्त्री को यज्ञशाला मानकर, उसकी योनि को यज्ञ वेदिका समझ कर रतिकर्म करने का अर्थ है-स्त्री को मान प्रतिष्ठा देते हुए उसका उपभोग करना। इससे स्त्री प्रसन्न होगी। उसकी इस प्रसन्नता से उसका पुण्य उसे स्वतः प्राप्त होता है। ऐसा विद्वान पुरुष सुखी होता है। जो यज्ञ भाव से अद्योपहासन (रतिक्रिया) नहीं करता अर्थात् स्त्री को सम्मान नहीं देता, वह उसका पुण्य पाने से वञ्चित रहता है, उल्टे अपना पुण्य ही उसे देता है। पुण्य से रिक्त पुरुष दुर्दशा को प्राप्त होता है। ऐसा पुरुष अविद्वान् होता है। ऐसा करने वाला अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता है। बलात्कारी पति मूर्ख होता है, क्योंकि वह अपने पुण्य को गवाँता है।

√•स्त्रीरूप  यजमान यज्ञ से सन्तुष्ट है प्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा पायेगा ही। यह दक्षिणा ही स्त्री का सुकृत है। यजमान असन्तुष्ट है, अप्रसन्न है तो बाजपेयी पुरुष दक्षिणा से च्युत रहेगा। दक्षिणा से होन विपन्न पुरुष की गति का वर्णन में कैसे करूँ !

 √•यज्ञशाला साफ सुथरी होनी चाहिये। स्त्री को देह स्वच्छ एवं सुभूषित-सुवासित होनी चाहिये। यज्ञवेदी पवित्र होनी चाहिये। स्त्री की योनि भी पवित्र (ऋतु स्नान के पश्चात् काँ) होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त यजमान स्त्री एवं होता पुरुष के भाव भी दिए होने चाहिये। ऐसा यज्ञ करने कराने वाले नर-नारी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम ।

√• हर पुरुष (गृहस्थ) की अपनी एक यज्ञशाला (पत्नी) होनी चाहिये। हर स्त्री (विवाहिता) का अपना एक याज्ञिक (वाजपेय पुरुष) वा पति होना चाहिये। यह यज्ञ (मैथुन) यथा समय होते रहना चाहिये। इससे दोनों स्त्री-पुरुष का ऐश्वर्य बढ़ता है। यह मैथुन यज्ञ तीन प्रकार का होता है।

 √•१. तामसी मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष जब अपना स्वार्थ देखता है, स्त्री के स्वार्थ (आनन्द) की अवहेलना करता है तो वह पिशाच होता (कहा जाता है। जब स्त्री ऐसा करती है तो वह पिशाचिनी की संज्ञा प्राप्त करती है। कलियुग में ऐसे यज्ञ अधिक हो रहे हैं।

 √•२. राजसी मैथुन- इसमें स्त्री और पुरुष परस्पर के सुख का ध्यान रखते हैं। ऐसे स्त्री-पुरुष क्रमशः यक्षिणी एवं यक्ष कहलाते हैं।

 √|३. सात्विक मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष को सतत चेष्ठा रहती है कि वह स्त्री को पूर्णतः तृप्ति पुरुष को सुसन्तुष्ट रखती है। ऐसे स्त्री पुरुष क्रमशः ऋषि और ऋषि होते हैं। 

√•अपनी ही वेदी (स्वस्त्रीयोनि) में ही पुरुष हवन करे, दूसरे की वेदी (परस्त्रीयोनि) में नहीं। धर्मसंगत होन पर दूसरे की वेदी पर हवन किया जा सकता है। जैसा कि जगद्गुरू श्री वेदव्यास ने अपनी माता सत्यवती के आह्वान पर महाराज विचित्रवीर्य की दो विधवाओं एवं एक दासी की यज्ञ वेदी पर स्ववीर्य का हवन करके धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर को पैदा किया। इससे अस्त होता हुआ कौरव वंश बच गया।

√• गृहस्थी का यही आचार धर्म है कि वह स्त्री को यज्ञ रूप जान कर उसके साथ बर्ताव करे। इस धर्म का समर्थन आणि उद्दालक, मौद्रल्य नाक एवं कुमार हारीत ने अपनी-अपनी स्मृतियों में किया है।

 "एतद्ह स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणि: आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह ।"
         (बृह.उप. ६।४।४)

 √•ब्राह्मण कहलाने वाले बहुत से मनुष्य मैथुन कर्म को यज्ञ न मानते हुए दुराचार के कारण इन्द्रियहीन सुकृतरहित होकर इस लोक से अशुभ लोक को जाते हैं। ऐसे वे ही जन होते हैं जो इस सदाचार के भेद को न जानते हुए संसर्ग (मैथुन) करते हैं। कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनका वीर्य सोते वा जागते स्खलित होता है अर्थात् स्त्री को यज्ञ के समान पवित्र नहीं समझते और उसे विषय का साधन समझते हैं, वे भी बुरे लोकों को पाते हैं, पतन के गर्त में गिरते हैं।

 "बहवो मर्या ब्राह्मणाय निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्त्रीस्माल्लोकात् यन्ति य इदमविद्वांसोबी धोपहासं वरन्तीति बहु वा इदं सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दयति ।"
        ( बृह. उप. ६।४।४ )

 √•पुरुष मैथुन यज्ञ नहीं करेगा तो उसका वीर्य सोते-जागते व्यर्थ में स्खलित होगा। स्खलन से होने वाली क्षति से बचने के लिये उसे मैथुन करना चाहिये वीर्य की सार्थकता इसी में है। जिसका वीर्य स्वप्नदोषादि के माध्यम से वह जाय उसे क्या करना चाहिये ? ऋषि कहता है...

"तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत्वन्मेऽद्यरेतः पृथवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः । इदमहं तदेत आददे पुनर्मामेत्विन्द्रियं पुनस्ते पुनर्भगः । पुनराधिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनी वा भ्रुवौ वा निमृज्यात्।"
         (बृह.उप.६/४/५)

√•तद् =उस (स्खलित वीर्य) को ।
√•अभिमृशेत्= छुवे।
√•अनुवा मन्त्रयेत्= अथवा चिन्तन करे कि ऐसा क्यों हुआ)। 
√•यत् = जो।
 √•मे= मेरा ।
√•अद्य = आज।
 √•रेतः = वीर्य।
 √•पृथिवीम् = पृथिवी पर ।
√•अस्कान्सीत् =स्खलित होकर गिरा है।
√• यद्= जो। 
√•ओषधीः= ओषधियों को। 
√•अपि = भी।
√•असरत् = चला / सरका है।
√• यद् = जो।
√•अप = जलों को।
√•इदम् = यह इस ।
√•अहम् = मैं।
 √•तद् = उस।
√• रेतः =वीर्य को।
 √•आददे = ग्रहण करता हूँ, पुनः संचित करता हूँ (फिर से स्खलित नहीं होने दूंगा)।
 √•पुनः= मुझको।
√• एतु = प्राप्त हो, आवे।
 √•इन्द्रियम्= इन्द्रिय सामर्थ्य ।
 √•पुनः = फिर। 
√•अग्निः =शरीराग्नि।
 √•धिष्ण्या = धारण करने वाली (बुद्धि या समझ) ।
 √•यथास्थानम् = पूर्ववत् अपने-अपने स्थान पर । 
√•कल्पन्ताम् = होवें । 
√•इति = ऐसे जप कर वा चिन्तन कर।
 √•अनामिका + अङ्गुष्ठाभ्याम् = अनामिका अंगुली तथा अंगूठे से।
 आदाय ग्रहण कर।
 √•अन्तरेण = मध्य में।
 √•स्तनौवा = दोनों स्तनों (हृदय प्रदेश) के।
 √•भ्रुवौ वा = दोनों भृकुटियों (मस्तिष्क वा ललाट) के।
 √•निमृज्यात्= प्रक्षालन करे, जल से मार्जन करे (हृदय एवं मस्तिष्क की शुद्धि करे)।

√••हृदय भावों का घर है। मस्तिष्क विचारों का आलय है। हृदय और मस्तिष्क के दूषित होने पर भाव और विचार दूषित होते हैं। इनके दूषित होने पर वीर्य का नाश होता है इसलिये अंगुष्ठा और अनामिका से स्खलित वीर्य वा वीर्य स्थान शिश्न का स्पर्श कर पुनः इसी से पश्चात्ताप की भावना करता हुआ भृकुटिमध्य एवं हृदयमध्य का संस्पर्श करे। अनामिका सूर्य की अंगुली है। सूर्य आत्मा का कारक है। अंगुष्ठ शुक्रमह का स्थान है। शुक्र वीर्य वा काम शक्ति का कारक है। सूर्य और शुक्र दोनों एक दूसरे के शत्रु हैं। दोनों का सहयोग होना पारस्परिक पुष्टि के लिये शुभ है। तन और मन से वीर्य की रक्षा करना ही स्पर्श का उद्देश्य है। स्पर्श मन्त्र का भाव यह है...

√•आज जो मेरा रेतस् पृथ्वी पर स्खलित हो गया, जो ओषधियों की ओर तथा जलों की ओर बहा, मैं वह सामर्थ्य लेता हूँ-निमह की शक्ति धारण करता हूँ। रेतस् निग्रह से मुझको फिर इन्द्रिय बल प्राप्त होवे, फिर तेज, फिर सौभाग्य प्राप्त होवे। अग्नि है स्थान जिसका वे अग्निधिष्ण्य देव- अपनी सामर्थ्य से फिर मुझको यथा स्थान में कर दे, मेरे गये हुए बल को फिर लौटा दे। ऐसा जफ्ते हुए अनामिका और अंगूठे से जल लेकर दोनों स्तनों एवं भ्रुवों के मध्य में लगावे।

 √•सबकी उत्पत्ति मैथुन से होती है। इसलिये सबके भीतर मैथुन क्रिया का संस्कार होता है। किसी को मैथुन सिखाना नहीं पड़ता। मैथुन करने का प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता। रतिकर्म की दीक्षा की आवश्यकता नहीं होती। सबमें सम्भोग की इच्छा होती है। सब लोग सम्भोग करना जानते हैं। कोई तन से संयोग करता है। कोई मन से सहवास करता है। कोई मन और तन दोनों से संश्लेष करता है। ऐसा क्यों 7 स्त्री, पुरुष का एक भाग है। पुरुष उसे पाना चाहता है। पुरुष स्त्री का एक अंग है। वह उसे प्राप्त करने की इच्छा रखती है। इसलिये स्त्री-पुरुष का पारस्परिक सम्मिलन अनिवार्य एवं स्वाभाविक है। इसके लिये पुरुष स्त्री के साथ संगम करता है, पुरुष के साथ स्त्री सहयोग करती है। स्त्री यजमान है तो पुरुष पुरोहित। दोनों के सहकार से यह यज्ञ चल रहा है। दोनों की पार्थिव / शारीरिक संयुक्ति न होने पर मानसिक मैथुन होता है। इसमें कभी-कभी वीर्य स्खलित हो जाता है। इससे बचने के लिये परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन करते हुए भगवन्नाम जाप सरल निदान है। राम नाम जप से इष्टदेव का स्मरण करने से वीर्य की रक्षा होती है। मैथुन करते हुए वीर्य की रक्षा करने का यत्न करना चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास एवं ईश कृपा आवश्यक है । यह मेरा अनुभव है। इससे वीर्य की रक्षा होती है।

√•सप्तम भाव योनि है। योनि से सबका प्राकट्य होता है। इसलिये सप्तम भाव जन्म स्थान है। दूसरी ओर, लग्न को जन्म स्थान कहते हैं। यह विरोधाभास क्यों ? इसका अर्थ है-लग्न भाव प्रथम एवं योनिस्थान सप्तम का समान महत्व है। लग्न के अच्छा या बुरा होने से सप्तम भाव अच्छा या बुरा होता है। सप्तम स्थान के शुभाशुभ होने से लग्न स्थान शुभ वा अशुभ होता है। भविष्यफल कथन में इस तथ्य को आँखों से दूर नहीं करना चाहिये। ज्योतिषी अपनी दोनों आँखों से इन दोनों भावों पर एक साथ दृष्टि कर देखे और तब निर्णय करे। यही कारण है कि लग्न में मंगल के रहने से कुण्डली मंगली होती है तथा सप्तम में मंगल की उपस्थिति से भी कुण्डली में मंगलीपन आ जाता है। मंगल दोनों स्थानों में रहता हुआ दोष उत्पन्न करता है।

 √•लग्न में मैथुन का विचार होता है तो सप्तम मे वह विचार मैथुन क्रिया रूप में प्रतिफलित होता है। लग्न (मस्तिष्क) में मैथुन का विचार उठता है तो सप्तम (उपस्थ) में हलचल मच जाती है। यह तथ्य सब के द्वारा अनुभूत है।

 √••श्रीमद भगवद्रीता का एक श्लोक है...

 "ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्बह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम् ।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥"
        (गीता अध्याय ४, श्लोक २४ )

√•मैथुन कर्म ब्रह्म कर्म है क्योंकि यह व्यापक रूप से सर्वत्र सब प्राणियों द्वारा किया जा रहा है। जब स्वी और पुरुष आपस में मिलते हैं-रतिक्रिया में लीन होते हैं तो दोनों की आँखें मुंद जाती हैं। सम्भोग की चरम अवस्था में दोनों निष्पन्द हो जाते हैं, हिलते-डुलते नहीं, एकाकार हो जाते हैं। यह आनन्द की अवस्था होती है। यह समाधिस्थता है। जीव, ईश्वर का ध्यान करता है। जब ईश्वर के साथ मिलकर जीव समाधि अवस्था में पहुँचता है अर्थात् ब्रह्म हो जाता है तो उसे जो सुख मिलता है, वही सुख पुरुष वा स्त्री को एक दूसरे में प्रवेश करके एक हो जाने से होता है। यह सुख ब्रह्मानन्द सहोदर है। मैथुन में स्त्री, पुरुषमय हो जाती है तथा पुरुष, स्वीमय हो जाता है। समाधि में जीव ईश्वरमय हो जाता है तथा ईश्वर, जीवमय हो जाता है। दोनों की युज्यता असम्पृक्तता ही आनन्द है। यह अनिवर्चनीय है। जो इसे अनुभव करे, वही जाने । समाधि ब्रह्मकर्म है, मैथुन ब्रह्मकर्म है। समाधि में ब्रह्माकार वृत्ति होती है। मैथुन में भी ब्रह्माकार वृत्ति होती है। यह अनुभूत सत्य है।

√•ब्रह्मार्पणम् = ब्रहम अर्पणम् वहा, अर्पण / दक्षिणा/ उपहार भेंट है। 

√•ब्रह्म हवि = ब्रहम हविघृत/आहुति/हवनीय द्रव्य है। 

√•ब्रह्माग्नौ= ब्रह्मारिन में बह्यरूपी अग्नि में ब्रह्म अग्नि है।

√• ब्रह्मणा हुतम् =ब्रह्म के द्वारा यज्ञीय अग्नि में डाला गया द्रव्य ।

√• तेन = उस (यज्ञ) के द्वारा।

 √•ब्रह्मैव गन्तव्यम् = ब्रह्म ही गन्तव्य / लक्ष्य प्राप्तव्य है।

 √•ब्रह्मकर्म समाधिना= समाधि से ब्रह्मकर्म।

【 सम् + आ + था कि = समाधि ।

√•समाधि का अर्थ है-ठहराव / स्थिरता/ गतिशून्यता, मन को, चित्त की, विचार की।】

√•चलता का त्याग समाधि है। पूर्ण शान्तिमयता समाधि है। गीता के इस श्लोक का पार्थिव अग्नि में हवन करने से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि यहाँ समाधि होती ही नहीं। ध्याता, ध्येय और ध्यान की त्रिपुटी का एकीकरण समाधि है। शान्तचित्तता समाधि है। शान्तचित से जो कर्म किया जाता है, वह साधारण कर्म न होकर ब्रह्म कर्म होता है। अथवा, शान्तचित्त व्यक्ति का हर कर्म ब्रह्मकर्म है।

√• यह सृष्टि अग्निषोमीय है। स्त्री अग्नि है। पुरुष सोम है। स्त्री को योनि में योषाग्नि है। पुरुष का वीर्य सोमतत्वी है। योषाग्नि में पुरुष अपने वीर्य का हवन करता है। इससे जो प्राप्त होता है अर्थात् सुख, वह ब्रह्म है। स्त्री को पुरुष द्वारा अथवा पुरुष को स्त्री द्वारा जो अर्पण किया जाता है, वह है प्रेम। यही दक्षिणा है।

√•प्रेम अर्पण वा दक्षिणा है, मैथुन यज्ञ की। यह दक्षिणा मैथुन से पूर्व दी जाती है। यह प्रेम ब्रह्म है। हवि वा घृत रूप वीर्य ब्रह्म है। योनिस्थ अग्नि / रज भी ब्रह्म है। रज ब्रह्म में रेतस ब्रह्म की आहुति डाली जाती है। आहुति डालने वाला पुरुष ब्रह्म है। यह मैथुन यज्ञ ब्रह्म है। इस यज्ञ के द्वारा प्राप्त होने वाला आनन्द भी ब्रह्म है। रतिक्रिया ब्रह्म कर्म है, केवल तभी जब यह शान्तचित्त होकर की जाती है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- यह उपनिषद् वाक्य इस श्लोक का केन्द्र बिन्दु है। इस ब्रह्माकार वृत्ति से मैथुन करने वाला पुरुष प्रणम्य है, विष्णु है। मैं उसे प्रणाम करता हूँ।

 √•स्त्री ब्रह्म है। पुरुष ब्रह्म है। स्त्री का रज ब्रह्म है। पुरुष का वीर्य ब्रह्म है। रति कर्म ब्रह्म है। दोनों के बीच प्रेम (आकर्षण) ब्रह्म है। दोनों के परिरम्भ से मिलने वाला सुख ब्रह्म है। इसका जिसे बोध है, वह ज्ञानी है। 
          "तस्मै ज्ञानिने नमः।"

 √•गृहस्थी को यह ब्रह्मज्ञान कब होगा ? जब उसकी कुण्डली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह होगा, अशुभ प्रभाव नाम मात्र का भी न होगा। ऐसा जातक कामयोग से ईश्वरसाक्षात्कार करता है। उसके लिये मैथुन अनिवार्य है, आत्मलाभ के लिये। वह अपने वीर्य की रक्षा करता करता हुआ स्त्री को तुष्ट करता है। न उसका पतन होता है, न स्त्री का।
√•जैसे ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है, तत्क्षण मुक्ति मिलती है। जैसे ही माया की प्राप्ति होती है, तत्क्षण बन्धन मिलता है। यह कहने/समझाने से मन में बैठता नहीं। यह प्रत्यक्ष है। उदाहरण से समझ में आ जाता है। द्वापर युग की घटना है। वसुदेव और देवकी दोनों लौह बन्धन से जकड़े हुए कारागार में बन्द थे। देवकी के गर्भ से कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ। कृष्ण का प्राकट्य होते ही वसुदेव और देवकी बन्धन मुक्त हो गये। कारागार के सातों द्वारा खुल गये। द्वारपाल सो गये। कृष्ण ब्रह्म थे। कृष्ण को ले कर वसुदेव गोकुल गये। गोप नन्द के घर, कृष्ण को दे कर योगमाया ले आये। माया के आते ही वसुदेव देवकी को बन्धन लग गया। सातों द्वार बन्द हो गये। द्वारपाल जाग गये। विषाद छा गया। उधर नन्द के घर आनन्द आ गया। इससे स्पष्ट है ब्रह्म प्राप्ति का फल है, मोक्ष तथा माया प्राप्ति का फल है, बन्धनः। श्री पं. जी महाराज माया से हीन है तथा ब्रह्म दृष्टि सम्पन्न हैं। जहाँ ग्रहादृष्टि है, वहाँ बन्धन कैसा ? बन्धन मुक्त श्री महाराज जी को मैं प्रणाम करता हूँ। सब को बाँधने वाली माया से युक्त होते हुए भी उससे मुक्त होने के लिये माया शक्ति को प्रणाम कर माया शास्त्र (ज्योतिष) का निरुपण करता हूँ।

√•कुण्डली का षठ एवं अष्टम भाव विषाद है। ऐसा कौन मनुष्य है, जिस के जीवन में विषाद का आगमन न होता हो ? इस विषाद से त्राण पाने वाले कितने हैं ? जो विषाद से छुटकारा पाते हैं, वे धन्य हैं। ऐसे लोगों का चरित्र श्रवणीय एवं कथनीय है। अर्जुन को विषाद हुआ था। १८ अक्षौहिणी सैनिक थे। इनमें से विषाद किसी को नहीं हुआ। केवल अर्जुन को ही हुआ। ऐसा क्यों ? अर्जुन के साथ कृष्ण थे, सारथी रूप में। कृष्ण साक्षात् ब्रह्म थे। जिस के साथ ब्रह्म हो, उसे विषाद हो ? विचारणीय है। कारण स्पष्ट है। अर्जुन नहीं जानता था कि कृष्ण ब्रह्म हैं। उसके लिये कृष्ण सखा और सारथी मात्र थे। विषाद का बीज है, मोह मोह कहते हैं आसक्ति को। आसक्ति होती है उसे जो अपने को कर्ता, धर्ता संहर्ता मानता है। अर्जुन अपने को योद्धा समझता था। रणक्षेत्र में खड़े हुए अपने कुटुम्बी जनों संबंधियों गुरुजनों को देख कर उसे मोह इसलिये हुआ कि वे सब उसके हाथसे मारे जायेंगे। इस मोह ने उसे विषाद में डाल दिया। फलस्वरूप वह अपने धर्म से च्युत हुआ और युद्ध विमुखता को प्राप्त हुआ। स्वभाव धर्म स्वधर्म है। अर्जुन का स्वधर्म क्षात्र धर्म था। वह क्षात्र धर्म से विमुख हुआ जो अपने धर्म (वर्णश्रम धर्म) से विमुख होगा, उसे विषाद होगा ही और यही हुआ। 

√•कृष्ण ने अर्जुन को बहुत समझाया, अनेक प्रकार से बताया। कृष्ण और अर्जुन का यह संवाद वेदव्यास ने महाभारत में ७०० श्लोकों में लिखा है। मैं इसे चाव से पढ़ा, समझा हूँ। सब कुछ अद्भुत है। अर्जुन समझ गया। उसका मोह भंग हुआ, विषाद मिटा। वह पुनः क्षात्र धर्म में प्रवृत्त हुआ। अर्जुन कहता है ...

"नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत् प्रसादान्मयाच्युत। 
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥"
               ( गीता १८/७३)

√• हे अच्युत । आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ। स्मृति स्वधर्म | मेरा सन्देह मिट गया। मैं स्वस्थ हूँ। आप के वचन का पालन करूँगा।

√•विषाद तो सब को होता है, पर सब का विपाद जाता नहीं। ऐसा क्यों ? जब विषाद का होना योग होता है, तभी वह जाता है, मिटता है। गीता में १८ अध्याय हैं । प्रत्येक अध्याय एक योग है। इस प्रकार गीता में कुल १८ योग हैं। प्रथम अध्याय गीता की नींव (आधार शिला) है। इसका नाम 'विषाद योग है। अन्तिम अठारहवां अध्याय 'मोक्षसंन्यास योग है जो विषाद योग की कक्षा में प्रविष्ट होगा वह धीरे-धीरे मोक्ष संन्यास योग तक पहुंचेगा ही। इसमें तनिक सन्देह नहीं। योगः= विष्णुः [सहस्रनाम] विषाद का योग अर्थात् विष्णु में संयुक्त होना ही विषाद योग है। विषाद योग विषाद का विष्णुमय होना। यहाँ जाननीय विषय है। कृष्ण को उपस्थिति में अर्जुन को विषाद हुआ था। इस लिये उस विषाद को विषादयोग नाम दिया गया। कृष्ण न होते और उस परिस्थिति में अर्जुन को विषाद होता तो मात्र विषाद (दुःख) ही होता। योग नहीं। विषाद होने पर त्राण नहीं। विषाद योग होने पर त्राण निश्चित। यह जीव हो अर्जुन है, आत्मा कृष्ण जो जीव अपने भीतर स्थित आत्मा से जुड़ता है, भगवान् से संलग्न होता है, ईश्वर से युक्त होता है, उसका विषाद उसे मोक्ष की ओर ले जाता है। जो परमात्मा से विमुख रहना है, परमेश्वर को भुलाये बैठा है, उसका विषाद उसे धराशायी कर देता है। यह शरीर क्षेत्र है। यह शरीर धर्म के लिये है। इस लिये यह धर्मक्षेत्र है, अधर्म क्षेत्र नहीं। इस शरीर को पाकर निष्क्रिय नहीं रहना है। शरीर से धर्म करते रहना है। इसलिये यह कुरुक्षेत्र है, अकुरु क्षेत्र नहीं गीता के १८ अध्यायों में क्या है ? इसे व्यास जो ने प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक के दो पदों में रख दिया है। प्रारंभ के दो पद हैं- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे । इन दो पदों से गीता के ७०० श्लोकों का क्या अर्थ निकलता है ? क्षेत्रे क्षेत्रे धर्म (?) कुरु । यहाँ पर प्रथम दो सामासिक पदों- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे को तोड़ कर चार सरल पदों में रखने पर उपर्युक्त वाक्य निसृत होता है। क्षेत्र क्षेत्रे धर्म (?) कुरु । धर्म = धर्म] इसका अर्थ हुआ हर क्षेत्र में / हर स्थान में जहाँ-जहाँ जाओ या रहो वहाँ धर्म करो, धर्मका आचरण करो। यहाँ गौता का अर्थ है। यही महाभारत का सार है, है निचोड़ है।

√• धर्मी कभी विषादयुक्त होता नहीं। धर्मो विष्णु है, क्यों कि वह कभी विषाद को प्राप्त नहीं होता। जो उस विष्णु का सतत चिन्तन करता है वह वैष्णव होता है। वैष्णव स्वधर्मस्थ होता है। स्वधर्मस्थ को विषाद कैसा ? वह षष्ठ भाव से परे हो चुकाहोता है। स्वधर्म का वास्तविक अर्थ क्या है ? स्व स्व = स्वः = श्रेष्ठ सर्वोपरि/स्वच्च। स्व सु + अ । सु एक निपात है जो संज्ञा शब्दों से पूर्व (कर्मधारय और बहुब्रीहि समास बनाने के लिये) जोड़ा जाता है। सु के अर्थ है-श्रेष्ठ सुन्दर, सर्वथा, अत्यधिक सरलतापूर्वक, तुरन्त । अ का अर्थ है-ब्रह्म सर्व विष्णु ।

"अकारो वै सर्वावाक्।' ऐतरेय ब्राह्मण २३६ 'अ इति ब्रहा।"
         ( ऐतरेय ब्राहाण २। ३।६)

"अधाराणां अकारोऽस्मि ।" 
      ( गीता १०। ३३)

√• सर्वाचाक् सम्पूर्ण वाङ्मय (वेदपुराणदि ।

 √•अक्षराणां = अविनश्वर पदार्थों में।

 √•अकार = आत्मा= अ

√• अ का सतत चिन्तन करते करते जीव अ हो जाता है। जो अ है, वह बहा है। ऐसे लोग जो भाव को प्राप्त हो चुके हैं विषाद मुक्त हो गये हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। जिस का कोई प्रतिद्वन्द्वी, प्रतिस्पर्धी विरोधी वा शत्रु नहीं है,उसे विषाद नहीं।

√•अब में विषाद का अर्थ अधिक स्पष्टता एवं सरलता से बताता हूँ। विषाद विष + आद।द = दा+क= देने वाला ।आ + दा + क= आद =लेने वाला महण करने वाला जो विष लेता है,  वह विषाद हुआ। विषु (क्रयादिगण परस्मैपदी विष्णाति वियुक्त करना, अलग-थलग करना) धातु से क/ अच् प्रत्यय करने पर विष शब्द बनता है। जो वियुक्त करे, अलग-अलग करे, छिन्न भिन्न करे, वह विष है। जिसके कारण मन बुद्धि प्राण शरीरादि एक दूसरे से अलग हो जायें, वह विष है। विष भक्षण करने से, ग्रहण करने से, पाने से, लेने से, छूने से, देखने से व्यक्ति मर जाय वह विष है। जो अमृत = मृत्यु। जिसके नहीं है, जिसमे अमरत्व देने की शक्ति नहीं है, प्रत्युत इसके विपरीत है, वह विष है। विष का ग्रहण, स्पर्श, दर्शन विपाद है। अविष =अमृत = परमात्मा का ग्रहण दर्शन आनन्द है। विषाद प्रस्त की औषधि है, गुरु गुरु देता है ज्ञान ज्ञान मिलता है, अहंकार के त्याग से अहंकार कैसे छोड़ जाय ? अपने से जो हर माने में बढ़ चढ़ कर है श्रेष्ठ है, उसके सामने जाने से अहंकार चला जाता है। श्रेष्ठ के सम्मुख सतत रहने से अहंकार नहीं रहता।
 श्रेष्ठ क्या है ? यह सर्वविदित है।

 "तस्मै श्रेष्ठाय नमः ।"

√• केवल एक राम ही श्रेष्ठ है।

√• संत कबीरका एक दोहा है ...

"राम पदारथ पाइ के, कविरा गाँठ न खोल।
 नहि पट्टन नहि पारंतू नहि गाहक न मोल ॥"

√• जिसे 'राम' रूपी पदार्थ मिल चुका है उसे चाहिये कि वह उसको गठरी न खोले। क्योंकि इसको बेंचने के लिये कोई हार नहीं है, इसका कोई पारखी नहीं है, न ही इस का कोई ग्राहक है तथा इसका मूल्य भी कोई देने वाला नहीं है। ऐसे सन्त के सम्मुख मैं नत मस्तक हूँ। किन्तु इस राम की गठरी न जाने कहाँ से मेरे पास आई है। 

√•राम सर्वत्र है दृश्य और अदृश्य दोनों रूपों में इसे देखते हुए भी लोग देख नहीं पाते। इसका प्राकट्य अयोध्या में हो होता है, अन्यत्र नहीं, यह निर्विवाद सत्य है। जहाँ युद्ध नहीं होता, वहीं अयोध्या है। जहां दो होता है वहाँ युद्ध निश्चित होगा। अतएवं द्वन्द्व में अयोध्या नहीं है। द्वैत में इन्द्र है। यह इन्द्र पुरुष और प्रकृति का है। यह योध्या है। यहाँ राम तिरोहित रहता है। जहाँ अइन्द्र है, अद्वैत है, वहीं अयोध्या है; वहीं राम का प्रादुर्भाव है प्राकट्य है जहाँ द्वैत है वहां दो प्रकृति है, दो महत् तत्व/ बुद्धि दो अहंकार (मैं-मैं, तू-तू) है, दो मन है, दो-दो तन्मात्रें, दो-दो भूतें दो-दो ज्ञानेन्द्रियाँ दो-दो कर्मेन्द्रियाँ हैं। इसलिये संघर्ष है, टकराहट है, युद्ध है, अशान्ति है हाहाकार है। यहाँ पर विराजमान राम दिखायी नहीं पड़ता। जैसे ही दो प्रकृति मिलकर एक प्रकृति हो जाती है, दो महत्तत्व/ बुद्धियाँ एक हो जाती है, दो मन एकाकार हो जाते हैं, वैसे ही वहाँ राम का साक्षात् होता है। अयोध्या वहाँ है, जहाँ १ + १ = १ होता है। यह वा गणित है, ज्ञानियों का गणित है। अयोध्या वहाँ नहीं है, जहाँ १ + १=२ । यह बालकों का गणित है, मायावियों का गणित है। आध्यात्मिक गणित लोक गणित से भिन्न है। एक औरएक मिल कर एक होता है। यह सत्य गणित है। एक और एक मिल कर दो होता है। यह मिथ्या गणित है।

√• हर हृदय में अयोध्या है। अयोध्या वहीं होती है जहाँ सरयू है। सरयू के तट पर अयोध्या है। सरयू = सर + यू । सर= सृ (सरति सिसर्ति गति करना) + अच् ।यू = या (याति चलना) + कू। जो (सर (गतिशील) यू (गतिमान) है, वह सरयू है। हृदय में निरन्तर गति है। इसलिये हृदय = वा विष्पन्द हृदय को सरयू नहीं कहते। क्योंकि वह मृत है। मृत में सरयू नहीं सरयू नाम भावों का प्रवाह, सरयू गति होन भावों की नदी। जिस हृदय में प्रेम का भाव नहीं वलं सरयू नहीं वहीं अयोध्या नहीं। इस लिये वहाँ राम नहीं। गोस्वामी जी कहते हैं...

"रामहि केवल पेम पियारा।
 जानि लेहु जो जाननिहारा ॥"
  (अयोध्याकाण्ड रा. च.मा.)

√• प्रेम= प्रेम हे जानने वालों । जान लो राम को केवल प्रेम प्रिय है। जहाँ प्रेम वहाँ राम जहाँ द्वैत है, वहाँ प्रेम नहीं। जहाँ अद्वैत है, वहाँ भी प्रेम नहीं तो प्रेम कहाँ है ? प्रेम वहाँ है, जहाँ द्वैत में अद्वैत है तथा अद्वैत में द्वैत है। यह विशिष्टाद्वैत है। यहाँ राम का दर्शन है। यह राम अयोध्यापति है। गोस्वामी जी कहते हैं ...

"सब कर परम प्रकाशक जोई।
 राम अनादि अवधपति सोई ।"
    ( बालकाण्ड रा.च.मा.)

 √•जो सबका परम प्रकाशक है, वहाँ अनादि अयोध्या पति राम है। जहाँ पर किसी का वध न हो, वह अवधपुरी है। अतः अवधु = अयोध्या। देवताओं की पुरी का नाम अयोध्या है। वेदवचन है ...

"देवानां पूरयोध्या।"
( अथर्व १०।२।३१)

【 देवानाम् पूर् अयोध्या।】

 √•राम में सभी देवता हैं। राम में अविच्छिन्न शांति है। उस शांति के लिये संतजन राम का भजन करते हैं। राम का प्राकट्य कौशल्या से होता है। जहाँ जिसमें कुशलता है, वह कौशल्या है। पञ्चकोशों वाली यह देह कोशल है। कोशल कोशयुक्त। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञान मय आनन्दमय में = पाँच कोश हैं। यह कोशलपुरी अयोध्या है। कौशल्या परमशान्ति। जिस चित्त में विचारों का संघर्ष नहीं है, संदेह का अभाव है, वहाँ शांति है, कुशल मंगल है। चित्त को वह स्थिति कौशल्या है। यहाँ राम प्रकट होते हैं। राम सभी पापों को जला देता है। इसलिये राम अग्नि है। अग्नि पूज्य है। वेद मंत्र है...

"अग्नी रक्षांसि सेधति शुक्रशोचिरमर्त्यः ।
 शुचिः पावक ईदयः ।।"
(अथर्ववेद ८।३।२६)

√•अग्नी =अग्निः। सेधति (सिध् संरोद्धौ)= जीतता है, परास्त करता है, रोकता है, आधात करता है। रक्षांसि= राक्षसों को। शुक्रशोभिः = धवल कांति, श्वेतप्रकाश, विमल ज्योति ।अमर्त्यः = अमृत ।शुचिः= पवित्र शुद्ध। पावक= पवित्र शुद्ध करने वाला। ईदयः =स्तुत्य पूज्य प्रशंस्य । 

√•अग्नि के तीन रूपकार्य है। गर्भस्थ अग्नि रजवीर्य में शिशु का सर्जन करती है। जन्म के बाद यही अग्नि पक्वाशय में स्थित हो कर अन्न को पचाती हुई प्राणियों का पालन करती है। अन्त में यही अग्नि श्मशान में शरीर को जलाती है। ये तीनों अग्नियाँ क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव है। कामाग्नि का नाम ग्रहा है। यह उपस्थस्थानी है। भारत का नाम विष्णु है। यह हृदयस्थानी है। चिताग्नि का नाम शिव है। यह शिरस्थानी है। अतएव ब्रह्मा मूल देवता है विष्णु केन्द्रीय देवता है शिव शीर्ष देवता है। इनतीनों का एकीभूतसूर्य है। सूर्य को उपासना से इन तीनों की सिद्धि होती है। इसलिये सूर्य ही विश्वात्मा है।

 √•शरीर में ७ चक्र है। सबसे नीचे के चक्र में बह्मा, सबसे ऊपर के चक्र में शिव तथा बौच के पाँच चक्रों में विष्णु नामक अग्नि का वास होता है। पद्म चक्रों में होने से अग्नि को विष्णु (व्यापक) कहा गया है। पथि विस्तारे से पक्ष भी व्यापक है। शीर्षस्थ होने से अग्नि शिव है। कामात्मक जनन शक्ति के रूप में सब से नीचे मूल में सभी प्राणियों में बृहद रूप में होने से यह अग्नि ब्रह्मा है।

√•ब्रह्म कामुक देवता है। भद्रजनों द्वारा यह अपूज्य है। यही कारण है कि लोक में ब्राह्म की पूजा का प्रचलन नहीं है। जीवन रक्षक पालक विष्णु गृहस्थों एवं प्रवृत्तिमार्गियों का देवता है। वैरागी एकान्तवासी निवृत्तिमार्गी का देवता शिव है। श्मशान में जाने पर इसके स्वरूप का आभास होता है। मैं तो बह्मा वैष्णव एवं शैव तीनों हूँ। शिव होना जीवन का परम लक्ष्य है। जो शिव स्वरूप है, उसे मेरा नमस्कार ।

√• जीवन यात्रा मूलाधार चक्र से आरम्भ होती है तथा सहस्रार चक्र में जा कर समाप्त होती है। ब्रह्माग्नि से शिवाग्नि पर्यन्त यह यात्रा जन्मजन्मान्तरों से चल रही है। 

√•शरीर भेद से यह अग्नि तत्व दो है-पुरुष अग्नि, स्त्री अग्नि इन दोनों अग्नियों में परस्पर अतीव आकर्षण होता है। पुरुष और स्त्री जब एक दूसरे से मिलते हैं, संगम करते हैं तो सर्वप्रथम ७,७ से अर्थात् उपस्थ उपस्थसे मिलता है। इसके बाद ६, ६ से (कटि, कटि से मिलती है। पुनः ५ (नाभि ) ५ (नाभि से मेल खाती है। ततपश्चात् ४ (हृदय, वक्षस्थल) ४ (हृदय, वक्षस्थल) से चिपकता है। फिर ३ (कण्ठ ग्रीवा) ३ (कण्ठ पौवा) के सन्निकट आती है। इसके बाद २ (मुख ओष्ठादि), २ (मुख ओष्ठादि) से मिलता है। किन्तु १ (मूर्धा स्थान, शीर्ष), १ (मूर्धा/शिर) से नहीं मिलता। यह रहस्यमय सत्य है। दोनों की मूर्धा का मिलना जन्ममरण के चक्र का अन्त है। यह असम्भव है। क्यों कि दोनों के मूर्धा स्थान सम्भोगावस्था में मिल नहीं सकते। यह समाधि अवस्था सबोज/सविकल्प है। इस लिये शिव होना, सहसार में पहुँचना सम्भव नहीं। निवज/ निर्विकल्प होना शिव है। इसका वर्णन अशक्य है।

 √•कुण्डली को हम ध्यान से देखें तो पायेंगे कि पुरुष तत्व ऊपर है, स्त्री तत्व नीचे स्वौ पहले से ही नौचे है, उसका पुनः पतन क्या होगा ? पुरुष का पतन होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं। जो ऊपर होता है। वह नीचे गिरता ही है। पुरुष जब स्त्री को देखता है तो वह पतनोन्मुख होता है। उसको छूते ही वह उसकेऊपर गिरता है, पतन को प्राप्त होता है। यह ध्रुव है।

√•स्त्री को सामने पा कर पुरुष ऊपर से नीचे कैसे गिरता है ? सर्वप्रथम आँखें मिलती है, भाव २ । २ आँखें + २ ऑंखें= ४ ऑंखें। ४ चतुर्थ सुख स्थान है। आँखें चार होने पर सुख मिलेगा ही। बिहारी का एक दोहा नेत्राचार का दृश्य उपस्थित करता है...

 "कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात ।
 भरे भौन में करते हैं, नैनन ते दोउ बात ।।" 
                ( सतसई )

√•प्रेमी प्रेमिका, पुरुष-स्त्री की आंखें परस्पर कहती है, खती है, पुनः मिलती हैं, खिलती है, फिर लजाती हैं। इस प्रकार भरे हुए भुवन में दोनो नर-नारी परस्पर आँखों से वार्ता करते हैं।

 √•चक्षु मिलन के बाद दोनों के हाथ मिलते हैं, भाव ३। इसके बाद क्रमशः दक्ष, भाव ४: नाभि उदर, भाव ५: कटि भाव ६ एवं उपस्थ भाव ७ मिलता है। यह सघन आलिंगन है।

√• यह पुरुष के पतन की प्रक्रिया है। हर पुरुष गिरता है। स्त्री उसे सतत गिराती है। वह बार बार गिरता है। इस गिरावट का कोई अन्त नहीं। न गिरने देने का एक उपाय है और यह है-राम का अवलम्ब । गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं ...

"पय अहार फल खाइ जप, राम नाम पट मास।
 सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास॥"
            (दोहावली )

√•६ मास तक केवल दूध का आहार करके अथवा फल खाते हुए, राम नाम का जप करिये। तुलसीदास का यह दृढ़ मत हैं कि ऐसा करने से सब प्रकार के सुमंगल तथा सिद्धियाँ सहज में ही प्राप्त हो जायेंगी।

√• स्त्री हो वा पुरुष, मनुष्य शरीर पाकर आत्मकल्याण के मार्ग पर न चलना कहाँ की बुद्धिमानी है ? एकश्लोक है...

 "यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावच्च दूरे जरा 
यावच्चेन्द्रिय शक्तिप्रतिहता यावत्यो नायुषो
 आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् 
संदीप्ते भुवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृश: ?" 
               (सुभाषितम् )

√• जब तक यह शरीर स्वस्थ है, निरोग है तथा जब तक वृद्धावस्था दूर है जब तक इन्द्रियों को शक्ति क्षीण नहीं हुई है तथा जब तक आयु का नाश नहीं है अर्थात् जीवन है, तब तक ही विद्वानों को अपने कल्याण का प्रयत्न करना चाहिये। घर में आग लग जाये तो उस समय पर कुआँ खोदना कैसा रहेगा ?

 √•मेरी आयु के १६ वर्ष पूर्ण हो चुके थे, १७वां वर्ष चल रहा था। मुझे एक स्थान पर यह पढ़ने को मिला कि वृद्धावस्था की तैयारी, युवावस्था से सम्यक् रूप से करनी चाहिये। इस कथन को मैंने गाँठ बाँध लिया। तब से अब तक निश्रेयस के पथ पर अग्रसर हूँ। जीवन के झंझावात में इससे डिगा नहीं हूँ। मृत्यु सतत साथ है, यह भलीभांति जानता हूँ। इसका स्मरण रहता है। इसलिये राम के चरणों में हूँ। जीवन का अन्त होने से पहले अहंकार का अन्त हो जाय, अन्तिम साँस लेने से पूर्व राम की छबि हृदय में अंकित हो जाय, चिता पर देह जलने से पूर्व मोह मद ममता माया मनोमालिन्य जल जाय, श्मशान में भस्म होने से पहले श्मशानवासी शिव का दर्शन हो जाय यही जीवन का लक्ष्य है, ध्येय है, संकल्प है !

√• मैं उस महामाया को प्रणाम करता हूँ जो मेरा वाडन एवं पालन एक ही साथ कर रही है। काम की आँधी बह रही है। क्रोध का बवण्डर उठ रहा है। मद के बादल गरज रहे हैं। मोह की घटायें घिरी हुई हैं। लोभ की बौंछों पड़ रही हैं। द्वेष के कीचड़ में पैर धँस रहे हैं। अज्ञान का अन्धकार बढ़ रहा है। ऐसे में न जाने किस पुण्य के प्रभाव से राम नाम की बिजुली चमकती है, रास्ता दिखाई पड़ता है, चलने लगता हूँ अपना स्वरूप दिखने लगता है। अब मैं धन्य हूँ धन्य हूँ ।

√•सत्य क्या है ? असत्य (मिथ्या) क्या है ? इसे जानना अति सरल है। किन्तु इसे कोई नहीं जानता ।। आज इस रहस्य का अनावरण हो रहा है। वर्तमान सत्य है। भूत एवं भविष्य असत्य हैं। क्यों कि विष्णु का नाम न तो भूत है, न भविष्य हो। विष्णु का नाम है, भू। अखण्ड एवं व्यापक होने से विष्णु केवल भू वर्तमान है। भूत, भविष्य मानने से उसकी अखण्डता एवं व्यापकता बाधित होती है। इसलिये वह केवल भू नाम से अभिहित है। हमारा मन या तो भूत में विचरता है या भविष्य में भ्रमता है। यह वर्तमान में एक क्षण भी नहीं ठहरता। इसलिये हमारे सभी व्यवहार भूत एवं भविष्य से सम्बद्ध होने के कारण मिथ्या/ असत् हैं। जगत् था एवं रहेगा, यही मिध्यापना है। सत्य तो यहाँ है कि जगत् है, न था न रहेगा। यह ब्रह्म विचार  है। गीता का एक वाक्य है...

 "मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ।" 
                (गीता १५। ७ )

[इसका अन्वय है- प्रकृतिस्थानि षष्ठानि इन्द्रियाणि मनः कर्षति ।]

 √•इसमें,
√• मनः= मनस् शब्द प्रथमा विभक्ति एक वचन ।

 √•कर्षति = कृष् धातु परस्मैपदी, लट् लकार प्रथम पुरुष एक व. । 

√•इन्द्रियाणि= इन्द्रिय शब्द द्वितीया बहुवचन नुपं. लिंग।

√•षष्ठानि = पृष्ठ शब्द इन्द्रिय का विशेषण होने से तद्वत लिंग, वचन, विभक्ति ।

√• प्रकृतिस्थानि =प्रकृतिस्थ शब्द द्वितीया बहुवचन इन्द्रिय का विशेषण है। 

√• इस वाक्य का अर्थ है-स्वभाव में स्थित छहों इन्द्रियों को मन खींचता है। ये ६ इन्द्रियाँ हैं- श्रोत्र, त्वक, चक्षु, जिह्वा, प्राण तथा उपस्थ अग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् पढ़ने के बाद मैं ऐसा अर्थ कर रहा हूँ। अन्यथा, मैं भी सब लोगों की तरह भेंड़ चाल में वही अवैदिक अर्थ करता जो गीता की असंख्य टीकाओं में है। मन के अतिरिक्त ६ ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जो अन्न को नहीं पकड़ सकतीं। यह उपनिषद् का घोष है। ऐतरेय उपनिषद् के प्रथम अध्याय तृतीय खण्ड में इसका वर्णन इस प्रकार है 

√•१. स ईक्षतेमे तु लोकाश्च लोकपालाश्च अनेभ्यः सृजा इति ।

 √•२. सोऽपोऽभ्यतपत् ताभ्योऽभितपत् ताभ्यो मूर्तिरजायत या वे सामूर्तिरजायत अन्नं वै तत्।

√•३. तदेनत्सृष्टं पराङत्यजिघांसत् तद्वाचाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत् वाच गृहीतुम् । यद्वैनद्वाचापहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् । 

√•४. तत्प्राणेनाजित् तन्नाशक्नोत्प्राणेन महीतुम् स यनत्मानामप्यदभिप्राय देवान्नमस्यत्। 

√•५. जच्चक्षुषाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम्। स यद्वैनत् चक्षुषामहेष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् । 

√•६. तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद्वैनत् श्रोत्रेणामहेष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ।

√• ७. तत् त्वचाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत्त्वचाग्रहीतुम् । स यद्वैनत् त्वचामहेष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्राप्स्यत् ।

√• ८. तन्मनसाजिपृथत् तन्नाशक्नोन्मनसा महीतुम्। यद्वैनत् मनसापयत् ध्यात्वा देवान्नमस्यत्। 

√•९. तत् शिश्नेनाजित् तन्नाशक्नोत् शिश्न महीम् स यद्धेनत् शिश्नेनाप्यत् विसृज्य हैवान्नममप्स्यत् ।

√• १०. तदपानेनाजित् तदानयत्। सैषोऽन्नस्य महो यद्वायुः अन्नायुर्वा एष यद्वायुः।

√• परमात्म ने जीव के लिये अन्न उत्पन्न किया। अन्न को वह क्रमशः जिह्वा, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र, त्वचा, मन और शिश्न (उपस्थ) से ग्रहण करना चाहा, किन्तु ग्रहण न कर सका। अपान से उसने इसे ग्रहण किया। यहाँ अन्न के दो अर्थ हैं- १. खाद्य पदार्थ, २. ब्रह्मानन्द । जिह्वा से अन्न चखने/ कथन करने, घ्राण से सूंघने, चक्षु से देखने, श्रोत्र से सुनने, त्वक् से छूने, मन से ध्यान करने शिश्न से वीर्यत्याग करने से जीव को तृप्ति नहीं होती । उदरस्थ अपान वायु अन्न को ग्रहण करती है। आंत्र में स्थित यह अपान अन्न को पचाने से अन्नायु तथा हृदय में मन से परे होकर वायु (वा + आयु ब्रह्म चैतन्य है। उपनिषद् में शिश्न को रसना, नेत्र, नासिका, कर्ण, त्वचा एवं मन के साथ रख कर ज्ञानेन्द्रिय माना गया है। इससे सुख का की ज्ञान / अनुभूति होता होती है। अब मैं पूर्व प्रसंग पर आता हूँ।

 √•मन अमूर्त है। मूर्त ज्ञानेन्द्रियाँ ६ हैं। मन इनका स्वामी है। मन इन छओं को अपनी ओर खींचता अर्थात अपने अधिकार में रखता और इनसे एकाकार हो विषय का अनुभव करता है। यह प्राकृतिक नियम है। 

√•पुरुष की इन्द्रियों पष्ठानद्रयाणि स्त्री की इन्द्रियाँ = १२ । १२ = एक पूर्ण चक्र । यही विवाह है। विवाह करके पुरुष-स्त्री ६ इन्द्रियों का सुख भोगते हैं। ६ = शत्रु । षष्ठ भाव शत्रु का है। ६ की संख्या दोनों में है। इसलिये दोनों आमने-सामने हो कर परस्पर शत्रु हुए। संख्या ६ शत्रुता की बीज है तथा रोग भी है। यही कारण है कि दोनों एक दूसरे की अस्वस्थता के कारक भी हैं।

 √• मैं अच्युत तत्व में अपने चित्त का लोपन करता हूँ। ब्रह्मा जी की सभा में नवग्रह विराजमान हैं। इनके दर्शन मात्र से संसार के स्वरूप का ज्ञान होता है। शनि ग्रह दुःख का कारक है। मन्द गति वाला होने से दुःख की गति मन्द है। जीवन में दुःख जब आता है तो अधिक समय तक टिकता है। दुःख भोगते-भोगते व्यक्ति ऊब जाता है। शुक्र ग्रह शनि का मित्र है और सुख का कारक है। यह शनि की अपेक्षा तीव्रगति से चलता है। यही कारण है कि व्यक्ति के जीवन में आया हुआ सुख शीघ्र भाग जाता है, अधिक समय तक नहीं टिकता। शनि-शुक्र में नैसर्गिक मैत्री होने से दुःख सुख भी परस्पर मित्र हैं। दोनों साथ-साथ रहते हैं। दुःख अपज है। सुख इसका अनुज हैं। दुःख के पीछे सुख का होना ध्रुव है। लोग दुःख इस आशा से सहन करते हैं कि सुख अवश्य आयेगा। चन्द्रमा मन है। सूर्य आत्मा (शरीर) है। सर्वाधिकि तीव्र गति से चलने वाला ग्रह चन्द्रमा है। अतएव मन तीव्रतम गति वाला है। सूर्य की गति चन्द्रमा की अपेक्षा बहुत कम है। इसलिये शरीर की क्रियाशीलता मन की तुलना में अत्यल्प है। बुध यह बुद्धि का कारक है। इसकी गति चन्द्र से कम किन्तु सूर्य से अधिक है। व्यक्ति को बुद्धि शारीरिक क्रियाशीलता से पूर्व कार्य कारण में प्रवेश करती है। यह मन की अनुवर्ती है। मंगल ग्रह बल है। बुध की अपेक्षा कम गति वाला है। इसलिये शारीरिक बल सदैव बुद्धि का अनुगामी है। बृहस्पति ग्रह ज्ञान का कारक है। यह सभी ग्रहों से दूर है पर शनि के निकट है। ज्ञान और दुःख दोनों पड़ोसी हैं। अतः दुःख / तप से ज्ञान को सिद्धि-पुष्टि होती है। महों में सबसे बड़ा मह बृहस्पति है। इसलिये ज्ञान सबसे बड़ा है। जिसे ज्ञान की प्राप्ति हो जाये वह गुरु है। गुरु धन्य है। तस्मै श्री गुरुवे नमः । राहु राक्षस है। इसने सारे संसार को प्रसा है। यह मन्द गति वक्री है। इसका रंग काला है। इसका स्थान केश है। केश कहते हैं मूर्धज 1 को मूर्धा अर्थात् शिर से जायमान / उत्पन्न दो पदार्थ हैं-केश और विचार। सबका केश काला होता है। अतः सबके सिर पर राहु बैठा है। जिसके विचार काले/मलिन/पापमय हैं, उनके सिर में (के भीतर) राहु का वास है। जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु कम होती है, अवस्था वा शारीरिक वय अधिक होती है, राहु का प्रभाव क्षीण होता जाता है-केश काले से श्वेत होने लगते हैं। जब सम्पूर्ण केश श्वेत हो जाते हैं तो व्यक्ति राहु से पूर्ण मुक्ति पाता है। तब राहु का स्थान केतु ले लेता है। केतु = किरण, उच्च विचार। यह राहु का युग है। केश श्वेत होने लगते हैं तो लोग उन्हें काले रंग से रंगते हैं। कोई राहु से मुक्त होना नहीं चाहता है। मरने के कगार पर पड़ा अति बूढ़ा भी बालों को रंग कर काला किये रहता है। ऐसे राहु देव को मेरा नमस्कार !

√•राहु और शुक्र में नैसर्गिक मैत्री है। राहु दैत्य सेना का सेनापति है तो शुक्र दैत्यों का मन्त्री सिर पर बैठा हुआ राहु दैत्य मंत्री के घर सप्तम में भी अपन आसन जमा देता है-गुह्य स्थान में वयस्कता प्राप्त होने पर काले रंग के लोम उग आते हैं। इन्हें गुहाज कहते हैं। लग्न का राहु सप्तम में उतरता है तो व्यक्ति इन्द्रियलोलुप हो कर विपरीत लिंग से टकराता है। यह टकराहट तब तक चलती रहती है, जब तक कि राहु का स्थान केतु न ले ले अर्थात् गुह्यज लोम कृष्ण से श्वेत वर्ण न हो जायें। केश वा लोम का कारक शनि, केश, की कृष्णता का कारक राहु तथा केश की श्वेतता का कारक केतु है। शनि राहु प्रधान व्यक्ति मोहग्रस्त आसक्त तथा संशयालु होता है। शनि + केतु प्रधान व्यक्ति निर्मोही, अनासक्त एवं ज्ञानी होता है। ऐसे व्यक्ति को मेरा नमस्कार ।

√•अग्नि का त्याग करने वाला निरग्नि वा संन्यासी है। स्त्री ही अग्नि है। स्वी का त्याग करना सम्भव ही नहीं है। स्त्री प्रकृति है। प्रकृति = स्वभाव। क्या कोई अपना स्वभाव छोड़ सकता है ? अग्नि का रंग लाल है। रक्त का रंग लाल है। मासिक धर्म में लाल रंग का आर्तव निकलता है। यह स्त्री की आग्न्येयता है। स्वाँ इसको दिखाने के लिये लाल रंग का महावर पैरों (पादतल) में लगाती है, हाथों (करतल) में लाल रंग की मेंहदी लगाती है, हाथ पैर के नाखूनों पर लाल रंग की पर्त चढ़ाती है, ओठों पर लाल रंग का रसायन पोतती है, गालों पर लाली का लेप करती है, माथे पर लाल रंग की टिकुली स्थापित करती है, कपाल के मध्य (माग) में लाल रंग की सिन्दूरी रेखा खींचती है, आँखों में रतिभावजन्य लाल रंग की धारियाँ ला कर पुरुष को अपनी ओर खींचने का सतत प्रयत्न करती है। इस प्रकार स्त्री लालिमामयी है। स्त्री को त्यागने वाला संन्यासी लाल वा गेरूवा रंग का वस्त्र पहनता है। उसका यह गेरुवा वस्व इसी स्त्री तत्व का प्रतीक है। रक्ताम्बर संन्यासी को हम कैसे कह सकते हैं कि वह स्त्री से पृथक है ? संन्यासी का काषाय वस्त्र अग्नि का प्रतीक है। कामाग्नि से घिरा हुआ संन्यासी अनजाने में स्त्री की आग्न्येयता से अपने को आच्छादित किये रहता है। संन्यसी के गौरिक वस्त्र में स्त्री के कपोलों, ओष्ठों, नेत्रों, चरणों, करों, नखों की ललाई के अतिरिक्त भालस्थ बिन्दी, मागस्थ सिन्दूर तथा भगस्थ आर्तव की लालिमा समाहित होती है। लाल रंग राग का प्रतीक है। संन्यासी रागी होता है, जो रक्ताम्बर/ कायायाम्बर है। जटाजूट रख कर, मुड़ा कर केश उखाड़ कर काषायाम्बर पहन कर पेट पालन करने वालों को शंकराचार्य ने अज्ञानी कह कर उन्हें कस कर फटकारा है। भक्ति के बिना यह सब पाखण्ड है।

√•पराशरः। परान् आश्रृणाति । मत्स्यगन्धा नाम की धीवर कन्या पराशर मुनि को नाव पर बैठा कर यमुना पार करा रही थी। प्रातः काल का समय था। नाव यमुना के मध्य में एक द्वीप के पास पहुँची। मुनि के मन में प्रबल वासना जाग उठी। उन्होंने कन्या से मैथुन की इच्छा व्यक्त की। कन्या ने धर्म की दुहाई। दी। कामान्ध मुनि ने कुछ भी न सुना। उन्होंने अपने तपोबल से उस मत्स्यगन्धा को कस्तूरी के गन्धवाली योजनगंधा बना दिया। दिन में संभोग करते हुए कोई देखे न, इसलिये उन्होंने घना कुहरा उत्पन्न कर दिया। उन्होंने उसे सद्यः अतुस्नाता कर उसे अगम्या से गम्या बनाया। तत्पश्चात् यमुना की रेती पर उसे वीर्यदान दिया। इसके बदले में उसे सदैव नवयुवती बने रहने तथा कन्यावत भंग न होने का वर दिया। वह धीवर कन्या योजनगन्धा सत्यवती मुनि के अमोघ वीर्य को धारण कर गर्भवती हुई। इस गर्भ से विष्णु के अंश रूप में एक पुत्र उत्पन्न हुआ। यमुन के द्वीप में उत्पन्न होने से यह द्वैयायन कहलाया। यह अत्यन्त आकर्षक था। अतः कृष्णद्वैयायन नाम पड़ा। इसने वेदों का विभाजन किया। इसलिये वेदव्यास नाम से ख्यात हुआ। बदरी वन में तप करते हुए निवास किया। जिससे इसे बादरायण कहा गया। यह पराशरपुत्र पैदा होते ही अपनी माता सत्यवती को स्मरण करने पर उपस्थित होने का वरदान देते हुए तप करने चला गया। पुत्रवती होने पर भी वह कन्या बनी रही। आगे चल कर इसका विवाह महाराज शन्तनु से हुआ, जिसके कारण भीष्म को आजीवन विवाह न करने का व्रत लेना पड़ा। दैव की गति विचित्र है। काम के वशीभूत कौन नहीं है ?

√•सप्तम भाव अर्थात् स्त्री को देखते ही पराशर के विवेक का तिरोभाव हो गया- ज्ञान को ग्रहण लग गया प्रज्ञा का सूर्य अस्त हो गया। शक्ति पुत्र पराशर जैसा अषि इससे बच न सका तो औरों की क्या बात की जाय ? महापुरुषों का हर बात में अनुकरण नहीं करना चाहिये। पराशर का यह कृत्य जन साधारण के लिये अनुकरणीय नहीं है। पराशर स्मृति में कलियुग के लोगों के लिये जो कुछ कहा गया है, वह श्लाघ्य एवं अनुपालनीय है। यह वाक्य है...

"यथा भूमिस्तथा नारी, तस्मात्ता न तु दूषयेत्।" 
        (पराशर स्मृति, १० । २४ )

√• नारी पृथ्वी के समान (पूज्य) है। इसलिये (पुरुष) कभी भी उसे दूषित / अपवित्र न करे।
 
√•आधुनिक युग में कोई देशों में वीर्यबैंक स्थापित किये गये हैं, जहाँ पुरुष अपना वीर्य जमा कर देते हैं। स्त्रियाँ इन वीर्य बैंकों से इष्ट पुरुष का वीर्य लेकर गर्भ धारण करती हैं। इस पद्धति में पुरुष से सीधे सहवास की आवश्यकता नहीं होती। उसका वीर्य प्रविधि से गर्भाशय में पहुँचा दिया जाता है। यह संकर संतानों का युग है। जाति वा नस्ल सुधार की दिशा में यह एक प्रारंभ है। प्राचीन काल में भी ऐसी प्रविधि थी। किन्तु उस समय वर्णसंकरता को प्रश्रय नहीं मिला था। वर्ण की शुद्धता पर ध्यान दिया जाता था। द्वापर युग की एक कथा है। राजा उपरिचर आखेट के लिये अपनी राजधानी से बहुत दूर चले गये। उस दिन सायं तक राजा का घर लौटना सम्भव नहीं हो पाया। उनकी रानी अतुस्नाता थीं। उन्हें वीर्यदान देना अनिवार्य था। राजा ने अपना वीर्य निकाल कर वटपत्र के 'दोने' में रखा। इस 'दोने' को बाजपक्षी को देकर रानी के पास भेज दिया। बाज की चोच में 'दोना था। सामने से आते हुए दूसरे बाज पक्षी ने इस बाज की चोंच में स्थित 'दोने' को मांस खण्ड समझ कर उससे छीनने लगा। इस छीना झपटी में वीर्यापूरित दोना यमुना जी के जल में गिर पड़ा। उस वीर्य को मौनदेहधारी अद्रिका नाम की अप्सरा ने शीघ्र लपककर से लिया। कालान्तर में यह अद्रिका मछली एक मछलीमार धीवर के जाल में फँस गई। उस समय उसे गर्भ का दसवाँ महीना चल रहा था। धीवर ने उसके पेट को चीरा तो उसमें से दो मनुष्याकार बच्चे निकले एक शोभा सम्पन्न बालक तो दूसरी सुन्दरी कन्या इस आश्चर्यजनक घटना को देख कर धीवर ने उन दोनों बच्चों को राजा को सौंप दिया। राजा ने उस सुन्दर पुत्र को अपने पास रख लिया। राजा उपरिचर के वीर्य से उत्पन्न हुआ यह बालक मत्स्य नाम से विख्यात हुआ। राजा ने उस कन्या को धीवर को लौटा दिया। वह कन्या काली मत्स्योदरी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके शरीर से मछली की गन्ध निकलती थी। इसलिये यह मत्स्यगन्धा कहलायी। वह मत्स्यदेह धारी अद्रिका अप्सरा दो बच्चों का जन्म दकर शाप मुक्त हुई और पुनः दिव्य रूप धारण कर सुन्दरी अप्सरा के रूप में स्वर्ग चली गई। राजा उपरिचर का यह वीर्य व्यर्थ नहीं गया। उनके वीर्य से उत्पन्न हुई यह कन्या दाशराज केवट द्वारा पाली पोषो गई। इसके गर्भ से पराशर के अमोघ वीर्य द्वारा भगवान् विष्णु ने व्यास के रूप में अवतार लिया। विधि का यह अद्भुत विधान सर्वसाधारण की समझ से परे है। 

√•सामान्य रूप से स्त्री-पुरुष का योग है रन्ध्रोत्पादक है। १+७ = ८१ = पुरुष ७ = स्त्री [८] = रन्ध्र/ छिद्र / दोष / अवगुण यदि पुरुष स्त्री बन जाय तथा स्त्री पुरुष बन जाय तो यह छिद्र फैल जाता है, और अधिक अशुभ हो जाता है। यह स्थिति पुरुष की कुण्डली में हो तो अधिक अशुभ है। अर्थात् पुरुष है । की कुण्डली में लग्न में तुला राशि पड़ी हो तो वह स्त्री बन जाता है। क्योंकि तुला का स्वामी शुक्र स्त्री मह है। ऐसे जातक की स्त्री का गुण धर्म पुरुष का हो जाता है। ऐसे जातक की स्त्री उसे दबोचे रहती है। ऐसी कुण्डली वाला जातक स्त्री से पीड़ा पाता है। ऐसी ही एक कुण्डली यहाँ प्रस्तुत करता हूँ। इस कुण्डली में, लग्न ७ + सप्तम १=८ मृत्यु इस जातक का दाम्पत्य जीवन मृत्यु तुल्प कष्ट देने वाला होगा। यही नहीं, तुला लग्न वाले पुरुष दाम्पत्य जीवन की कंटीली शय्या पर पड़े हुए कराहते मिलेंगे। महों के तारतम्यानुसार उनकी इस कराह में न्यूनाधिक्यता रहेगी। ध्यान देने वाली बात यह है कि तुला लग्नी जातक जिस स्त्री के साथ ७ फेरे करेगा, वह स्त्री भार्या बन कर उसे पीड़ित करती रहेगी। तुला लग्नी जावक जिस खी के साथ ७ फेरे नहीं करेगा, वह उसे सुख देती रहेगी। निष्कर्ष यह निकला जिस स्त्री के साथ ऐसा जातक विवाह करके उसका भोग करेगा, वह उसे कांटे की तरह चुभेगी तथा जिस स्त्री से विवाह किये बिना उसका उपभोग करेगा, वह उसे पुष्प पंखुड़ियों के समान स्पर्श सुख देगी। 

√•सप्तम भाव के परिप्रेक्ष्य में मैं इस कुण्डली का पाराशरीय लेखा जोखा रख रहा हूँ।

√•१.सप्तमेश मंगल है। लग्नेश शुक्र है। दोनों नैसर्गिक रूप से सम हैं-न शत्रु, न मित्र कुण्डली में इन दोनों में तातकालिक मैत्री संबंध है। अतएव इस जातक एवं उसको भार्या में प्रथमतः मित्रता है। 

√• २. लग्नेश शुक्र होने से जातक सौम्य एवं श्रेष्ठ स्वभाव का है। सप्तमेश मंगल होने से स्त्री उप एवं तीक्ष्ण स्वभाव की तथा कटुवाक्य पद है। यह स्त्री अपने वाग्बाणों से जातक को सदैव बाँधती रहेगी।

 √•३. लग्नेश लग्न में है। इसके साथ गुरु है। इससे जातक सद्गुणों का पुतला है, सत्पुरुषों के संग में रहेगा. गुरु का सतत सहयोग मिलता रहेगा तथा जातक के गले में सुन्दरियों की पुष्पमाला रहेगी। नवमेश 

√•४. सप्तमेश मंगल, स्वराशि वृश्चिक में कुटुम्ब स्थान द्वितीय में है। इसके साथ चार यह है। बुध = स्त्री का भाई / जातक का साला है। दशमेश चन्द्रमा स्त्री की माता/ जातक की सास है। एकादशेश सूर्य स्त्री को सन्तान / जातक का पुत्र है। इसके अतिरिक्त स्त्री का साथी केतु = गोप्य पुरुष/राज पुरुष/तान्त्रिक ब्राह्मण है। 

√•५. सप्तम स्थान को राहु पस रहा है, अपनी वक्र गति एवं दृष्टि से सप्तम स्थान को शनि अपनी पृथक्कारक दृष्टि से देख रहा है। फलस्वरूप जातक एवं उसकी स्त्री में पार्थक्य निश्चित है। राहु इस जातक को, शुक्र राशिस्थ होने के कारण स्त्री सुख से वंचित कर रहा है। शनि इसे स्त्री से दूर भगा रहा है।

 √•६. जातक का मन (चन्द्रमा) सप्तमेश (स्त्री) मंगल की राशि वृश्चिक में है। फलतः जातक का मन अहर्निश अपनी स्त्री में उलझा है। यही चन्द्रमा शुक्र की नवांश राशि तुला में है। इस कारण मन अन्य रूपवती स्त्री से भी मस्त है। पति-पत्नी में विद्वेष का कारण व्यवहारतः यही है। 

√•७. जब शुक्र को महादशा आयेगी तो जातक को यह स्त्री जो सर्वप्रथम उसके लिये चन्द्रमुखी रही होगी, सूर्यमुखी हो जायेगी। इस दशा का मध्य होते-होते ज्वालामुखी हो जायेगी। इस ज्वाला से जातक को जो पीड़ा होगी, उसका वर्णन करने की सामर्थ्य स्वयं जातक में भी नहीं है। मैं कैसे करूँ ? 

√•८. इस जातक के जीवन में अन्ततः एक न एक दिन घोर टक्कर होना निश्चित है। कब ? शुक्र की महादशा में क्यों ? अष्टमेश है, यह शुक्र लग्नेश भी तो है ? शुभ फल देगा। सन् १९७८ से लेकर सन् १९९७ तक का २० वर्ष का समय सर्वभोग प्राप्ति किन्तु उसका सम्यक आस्वाद न मिलने का होगा। इस जातक के जीवन का महाभारत २० वर्ष पर्यना चलता हुआ, अब समाप्त होने के निकट आ गया है। जातक के पक्ष में खड़ा हुआ में इस युद्ध का अवलोकन कर रहा हूँ।

 √•९. स्त्री पुरुष के बीच चलने वाला यह दाम्पत्य युद्ध घर के बाहर कुरुक्षेत्र (कलिकोर्ट) तक फैलने पर स्पष्टतः दो पक्ष उभर रहे हैं।

√•देखने से ही लगता है, स्त्रों का पक्ष प्रबल है। शुक्र व गुरु जातक के पक्ष में हैं। सूर्य चन्द्र मंगल बुध केतु जातक की स्त्री के पक्ष में हैं। राहु और शनि इन दोनों को समान रूप से पीड़ा दे रहे हैं। ये पूर्व जन्म के दोनों के पाप हैं। किसी न किसी के दाम्पत्य में इन दोनों ने लोभ / स्वार्थवश विष बोया है। उनकी आह (शाप) का फल इस जन्म में भोगना तो पड़ेगा ही।

 √•१०. स्त्री और पुरुष के इस संघर्ष में स्त्री अधिक पीड़ित है, पुरुष बहुत कम राहु, शनि तो दोनों को चोट पहुँचा रहे हैं। स्त्री स्वयं अपने द्वारा (मंगल) एवं अपनी सन्तानों (सूर्य) अपने भाई (बुध) तथा अपनी माता (चन्द्रमा) पीड़ित है। राजपुरुष/ तांत्रिक के रूप में केतु इसकी सहायता कर रहा है। पुरुष जातक को उस का गुरु (लग्नस्थ) रक्षा प्रदान कर रहा है। यह सभी अशुभ अपने ऊपर ले कर जातक की रक्षा कर रहा है। धन्य है, ऐसा गुरु । 

√•११. भाग्य विधाता चतुर्मुख ब्रह्मा जी स्वयं आ जायें तब भी इन दोनों स्त्री पुरुष में मेल मिलाप नहीं हो सकता। मैं इन दोनों के बीच की कटुता को इसी जन्म में कम करने, मृदु करने के पक्ष में हूँ। बिना कटुता गये शान्ति नहीं। बिना शांति के सुख नहीं। इसका उपाय है। "यले कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोष:  है

 √•१२. किसका क्या दोष है. ? कितना दोष है ?इस पर विचार करना व्यर्थ है। एक सुभाषित श्लोक...

 "अम्बा तुष्यति न मया, न स्नुषया सापि नाम्बया, न मया । अहमपि न तथा, न तया वद राजन् । कस्य दोषोऽयम् ?"

√• मेरी माता न मुझसे सन्तुष्ट है, न बहू (मेरी पत्नी) से मेरी पत्नी न मुझ से तुष्ट है, न मेरी माता मैं न अपनी माता से सन्तुष्ट हूँ, न अपनी पत्नी से। हे राजन् । बताइये कि यह किसका दोष है।

√• कुटुम्ब में, समाज में राष्ट्र में सर्वत्र यही संघर्ष है। एक का दोष नहीं है। देश, काल, पात्र सब इसके उत्तरदायी हैं। प्रारब्ध इसके मूल में है। कबीर की वाणी है से ...

 " करत गति टारे नाहि टरी ।
 मुनि वसिष्ठ अति पण्डित ग्यानी सोधि के लगन धरी।
 दसरथ मरन, हरन सीता को, बन में विपति परी ॥ "

 √•होनी (भवितव्यता) इतनी प्रबल होती है कि इसके सामने कालज्ञ को मति मारी जाती है। जातक तो दुःखी होता है। दुःखी व्यक्ति की बुद्धि कुण्ठित होती है। गोस्वामी जी कहते हैं है...

 "आरत के हिय नहि कछु चेतू ।"
        (अयोध्या काण्ड )

√•लोक में देखा जाता है-दीनांग अधिकांग हो, जिसके पास रहने का ठौर ठिकाना न हो, माता पिता भाई बन्धु से हीन हो, दरिद्र हो, वस्त्रहीन नंग धडंग हो, कुसंगी हो, पागल जैसा हो, कुवेश हो, विचित्र हो तो ऐसे व्यक्ति को कोई अपनी कन्या नहीं देता और न ही उसे कोई कन्या पाने की इच्छा रखती है। यदि ऐसे व्यक्ति का विवाह अच्छी तरह सम्पन्न हो तो इसे क्या कहा जाय ? भाग्य का खेल वा समर्थशीलता 2 उत्तर है-दोनों भाग्य और सामर्थ्य शिव ऐसे ही पुरुष हैं। उनके रहने का कोई निश्चित स्थान नहीं है। वे गृहहीन हैं। वे माता पता से हीन हैं। उनके न कोई भाई बन्धु सखा ही हैं। वे लोगों भूत प्रेत पिशाचादि से घिरे रहते हैं। वे अधिक नेत्र है। उनके पाँच मुख हैं। कुवेशधारी हैं। स्नान करते ही नहीं। भस्म लगाये रहते हैं। सर्प के ही आभूषण पहनते हैं। उनके कण्ठ में विष है। विषयुक्त वा वैराग्यमयी कते करते हैं। विष पीते हैं। अखाद्य खाते हैं। भरता अवभूत बने फिरते रहते हैं। पशु बैल उनका साथी है। हाथ में त्रिशूल रहने से डरावने लगते हैं। डिंडिम के अप्रिय नाद से जीवों को आतंकित करते रहते हैं। लोगों को मारने का काम उन्हें प्रिय है। उनकी आयु का कोई पता नहीं है, वे न बालक हैं. न किशोर हैं, न युवक है, न औड़ हैं, न वृद्ध है, न जीर्ण हैं। गंगा नाम की स्वी को सिर पर रखे घूमते हैं। ऐसे निर्लज्ज हैं। चन्द्रमा जैसे क्षय रोगी को अपने ललाट पर बैठाये रखते हैं। दशमुख बीस भुजा वाले व्यक्ति से अपनी स्तुति कराते हैं। ऐसे शिव को वर रूप में पाने के लिये हिमवान् की कन्या पार्वती ने ८८ हजार वर्ष तक घोर तप किया। शिव की बारात और विवाह की चर्चा १४ भुवनों में होती है। विष्णु सहित इन्द्रादि देवता बाराती बन कर गये। बड़े-बड़े अषि मुनि सिद्ध चारण गन्धर्व विद्याधर भी गये। भूतगण प्रेतगण पिशाचगण डाकिनी शाकिनी योगिनी आदि उनके साथ-साथ थे। विवाह हुआ। पार्वती आयों और पूरी तरह सन्तुष्ट । इस के पीछे रहस्य क्या है ? केवल एक बात- शिव सामर्थ्यवान् हैं, सर्वशक्तिशाली हैं। ऐसे का भला कौन विवाह नहीं करेगा? ऐसे महापुरुष की बारात में कौन जाने की इच्छा नहीं करता ?

√• इस प्रवचन का सारांश है-सामर्थ्यशाली पुरुष को पा कर कन्या वा कन्या पक्ष के लोग कुण्डली नहीं देखते, गुण नहीं मिलाते आयु कुल गोत्र जाति आचार कुछ भी नहीं देखते। यह सत्य है।

 √•शिव जगदीशवर हैं। पार्वती महामाया हैं। इनकी कुण्डली होती ही नहीं। यह नक्षत्र तो इन्हीं से जायमान हैं। इससे कुण्डली के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। कुण्डली का फल तो शाश्वत सत्य है। शिव भले ही माता पिता होना है, पार्वती को माता मयना तथा पिता हिमालय हैं। इस लिये इनकी कुण्डली है। जो शिव सारे संसार के लोगों को रहने के लिये घर देता है, वह क्या पार्वती को घर नहीं दे सकता। यह तो सर्वसामर्थ्यवान् है न ।

√• विवाह के पश्चात् एकाकी जीवन में परिवर्तन आता है। गृहस्थ में जाने के बाद घर की आवश्यकता होती है। शिव ने पार्वती के लिये त्रिकूटपर्वत पर स्वर्ण की एक पुरी बनवायी। गृह प्रवेश के समय दशमुख रावण ने इसे दक्षिणा में मांग लिया। शिव को देना पड़ा। तब से अब तक/ सदा के लिये शिव निगृही हैं। गृहस्थी शिव को धन की आवश्यकता हुई। इसके लिये उन्होंने यक्षाधिपति कुबेर से मित्रता की। कुबेर नव निधियों के स्वामी हैं। कुबेर जैसे मित्र के रहते घर में धन का अभाव कैसा ? शिव का दाम्पत्य सुखमय है। यद्यपि घर नहीं है। कोई भी घर सीमित होगा। पार्वती मूल प्रकृति है। यह आदि-अन्त विहीन असीमित है। सीमित घर में असीमित पार्वती का प्रवेश कैसे हो ?

√• शिव के इस विवाह से संसार के मनुष्यों को बहुत लाभ हुआ है। संसार में जो कुछ भी ज्ञान विज्ञान है, वह शिव पार्वती के सम्वाद द्वारा प्राप्त हुआ, फैला है। पार्वती जी प्रश्न करती हैं, शिव जी उसका उत्तर देते हैं। पुराण साहित्य तथा तन्त्र वाङ्मय में शिव उत्तर देते हैं, पार्वती प्रश्न पूछती हैं। ज्ञान की हर शाखा, प्रत्येक विधा पर यह प्रश्नोत्तर हुआ है। हर गृहस्थी को शिव की बात समझना चाहिये क्योंकि शिव गृहस्थी हैं। शिव जी कहते हैं मैं ...

"उमा कहऊ में अनुभव अपना । 
सत हरि भजन जगत सब सपना ॥"  
         (उत्तरकाण्ड, रा. च. मा.) 

√•हे पार्वती । मैं अपना अनुभव तुम से कहता हूँ। हरि का सतत चिन्तन स्मरण भजन सत्य है, सुख देने वाला है। है । यह लोकाचार स्वप्न के समान (क्षणिक सुख और दुःख दोनों का देने वाला होने से) मिथ्या है।

√•हम सब गृहस्थों का कर्तव्य है- भोग भोगते हुए, लोकाचार का निर्वाह करते हुए भगवान् को न भूलें। यही जीवन का सार है।    
              "शिवपार्वत्यै नमः।"
√•लिखने की इच्छा नहीं होती, बिना लिखे रहा नहीं जाता। न और हाँ के दो पंख फड़फड़ाते हुए मैं ज्ञान के आकाश में नित्य उड़ता हूँ। अपार व्योम का पार पा नहीं सकता। पुनः गगन के नीचे पृथ्वी पर उतरता हूँ जो खेचरपति सूर्य के चारों ओर अनादिकाल से घूमती चली आ रही है। अपने से बड़े की परिक्रमा करने की शुभ परम्परा रही है। यह पृथ्वी हम से बड़ी है। इसलिये, इसकी प्रदक्षिणा लग्न से प्रारम्भ कर सप्तम में आया हूँ। सप्तम स्थान बड़ा बीहड़ है। यहाँ सब की गति मन्द पड़ जाती है। इस स्थान में सब की बोलती बन्द हो जाती है। श्री महाराज की प्रेरक कृपा से मैं इस भाव का अधिवक्ता बना हूँ। आज मैं प्रवचन से पूर्व अपने चतुर्दिक एक अमूर्त रक्षाभित्ति स्थापित करता हूँ।

"शिरो मे भास्करः पातु, ललाटं मे अमित-द्युतिः। 
नेत्रे दिन मणिः पातु श्रवणे वासरेश्वरः ॥ १ ॥ 
घ्राणं धर्मपूणिः पातु वदनं वेदवाहनः ।
 जिहां मे मानदः पातु कण्ठं मे सुरवन्दितः ॥ २॥ 
स्कन्धौ प्रभाकरः पातु वक्षः पातु जनप्रियः ।
 पातु पादौ द्वादशात्मा, सर्वांग सकलेश्वरः ॥ ३॥"
 
√•त्रिदेव हमारे शरीर में हैं। मस्तके शिवः हृदि विष्णुः । उपस्थे ब्रह्मा । 

√•१. मस्तक कैलाश पर्वत है, जो कि ऊंचा है। संहारकर्ता शिव नित्य यहाँ विराजते हैं।

√• २. हृदय क्षीर सागर है। यह गहन एवं विस्तृत है। पालन कर्ता विष्णु नित्य यहाँ रहते हैं।

√• ३. उपस्थ द्विदल कमल है। इस पर ब्रह्मा जी बैठे रह कर सृजन का कार्य करते रहते हैं।

√• कमलासन चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पादक हैं। गरुणासन सहस्रमुख विष्णु परिपालक हैं। वृषभासन पञ्चमुख शिव संहारक हैं। ये तीनों पत्नीवान् हैं। ब्रह्मा अपनी पत्नी वाग्देवी को मुख में जिहा के ऊपर रखे हुए उसकी सेवा में लगे रहते हैं। विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी को अपने वक्ष के ऊपर रखे हुए हृदय से लगाये रहते हैं। श्रीवत्स चिह्न विष्णु की छाती में है। शिव अपनी पत्नी पार्वती को अपने शरीर के वामार्थ भाग में स्थान दे कर सतत उसे अपने से चिपकाये रहते हैं। ये त्रिदेव महाकामी देवता हैं। ये स्त्री से अलग रह ही नहीं सकते। जब ऐसे देव हमारे शरीर में हों तो क्या हम स्त्री से अपने को दूर रखने में सफल हो सकते हैं ? कदापि नहीं जायत वा स्वप्न में वह हमारे मन में इन्द्रियों के प्रवेश द्वार से आयेगी ही। इसे कोई रोक नही सकता। इसीलिये विवाह की लालसा, रति की आकांक्षा, भोग की इच्छा सब में देखी जाती है। कुण्डली में तीन केन्द्र स्थान इन देवों के हैं। चौथे में जीव अपना डेरा डाले रहता है। तीनों देवों से घिरा हुआ जीव इन्हीं की तरह स्त्री की कामना करते हुए उससे अपृथक रह उसकी सेवा करना चाहता है। प्रकारान्तरतः स्त्री सतत पुरुष से अविलग रहना एवं उसका साथ देना चाहती है। यही विवाह का हेतु है। १ लग्न मस्तक, स्त्रीविषयक विचारः ४ सुख हृदय, स्त्री को मन में रखना ७ भोग, स्त्री प्रसंग है। १० जानु जीव, स्त्री के सम्मुख घुटने टेकता है। ऐसा कौन है, जो स्त्री के सामने प्रणय याचना न करे, न झुके ? यही पुरुष की गति है कि वह स्त्री (माया) के वशीभूत रहे और उसके लिये नाचे ।

√• मनुष्यों को तीन कोटियाँ हैं। मूर्ख लोग भोग मात्र के लिये विवाह करते हैं। विवेकशील संतति हेतु विवाह करते हैं। ज्ञानीजन विवाह हो नहीं करते। ज्ञानियों के सिरमौर श्री शुकदेव जी ने विवाह नहीं किया इसकी कथा सुनाता हूँ। 

√•१८ पुराणों के रचयिता वेदव्यास के मन में पुत्रेषणा का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने शिव की उपासना प्रारंभ की। व्यास जी के तप से इन्द्र चितित हुए। इन्द्र ने घृताची नाम की देवांगना को व्यास जी के पास भेजा। वह अप्सरा आकाश से उतर रही थी कि व्यास जी उसे देख लिये वे उसके गोघृत सदृश अंग कांति के व्यामोह से पस्त हो काम विह्वल हो उठे। उस समय व्यास जी अरणि मन्यन कर रहे थे। उनका वीर्य उस काष्ठ खण्ड पर गिर पड़ा। वह अप्सरा व्यास जी के तेज से भयभीत हो शुकी के रूप को ग्रहण कर उड़ गई। व्यास जी के अमोघ वीर्य से एक शिशु उत्पन्न हुआ। इसका नामकरण शुक देव किया गया। मातृहीन अयोनिज शुकदेव के पिता व्यास हुए। व्यास जी अविवाहित थे। इस प्रकार वेदव्यास महाराज पुत्रवान् हुए। अपने पिता व्यास जी के बहुत आग्रह करने पर भी शुक देव जी महाराज विवाह नहीं किये। व्यास जी ने महस्थ धर्म के महत्व का प्रतिपादन उनके सम्मुख किया। किन्तु वे टस से मस न हुए। उनका तर्क था गृहस्थाश्रम सदा कष्ट देने वाला है, गृह एक ग्रह है, बन्धन है। स्वभावतः शान्त शुकदेव जी अविवाहित ही रहे।

 √•अन्य सब लोग शुरू देव तो नहीं हैं और न ही उनके सदृश अयोनिज हैं। योनिज प्राणी योनि की ओर दौड़ता है, उसे पाने की चेष्टा करता है। विवाह संस्कार इस चेष्टा का पूरक द्वार है। यह संस्कार किस वय में सम्पन्न हो ? यह विचारणीय है। 

√•देश काल पात्र के अनुसार विवाह का विधान है। 

√•गौतम का मत है...

 "गृहस्थ सदृशीं भायां विन्देतानन्यपूर्वा यवीयसी।" 
         (गौतमस्मृति ४। १ ।)

 √•गृहस्थ अपने समान पत्नी को प्राप्त करे जो उसके अतिरिक्त अन्य किसी पुरुष को पहले से न चाही वा भोगी हो तथा जो युवावस्था से युक्त हो किन्तु अवस्था में पुरुष से छोटी हो। यवीयस् युवन् + ईयसुन वय, ऊंचाई, भार में कम तथा यौवन श्री से सम्पन्न, अभुक्त भार्या का वरण पुरुष करे। सदृश भार्या होने का अर्थ है- शशक पुरुष पद्मिनी नारी का, मृगपुरुष चित्रिणी नारी का, वृषभ पुरुष शंखिनी नारी का अश्व पुरुष हस्तिनी नारी का वरण करे। कहा गया है..

 "शशके पद्मिनी तुष्टा, मृगे तुष्टा च चित्रिणी।
 वृषभे शखिनी तुष्टा, हये तुष्टा च हस्तिनी ॥"
               ( रतिमञ्जरी ।)

 √•सभी भावों का बोझ सप्तम भाव पर है। सबको यह ढोता वहन करता है। सभी इस पर अवलम्बित हैं। यह भाव काम है। काम की व्यापकता के विषय में सब के सन्देह का निवारण करते हुए संत कबीर कहते हैं...

 "काम काम सब कोई कहै, काम न चीन्है कोई।
 जेती मन की कलपना, काम कहावै सोइ ।। 
तन मन लज्जा ना करै, काम बान उस साल
 एक काम संब बस किये, सुर नर मुनि बेहाल||" 
             ( कबीर साखी)

 √•सृष्टि का कण-कण काम से पस्त है। सुर नर मुनि सिद्ध सब इससे पीड़ित हैं। मन ही काम का पिता वा जनक है। उर्वर मन में काम उत्पन्न होगा ही यह भूत है। जहाँ मन वहाँ काम जहाँ मन नहीं, वहाँ काम नहीं। जहाँ प्रकृति है, वहाँ मन है क्योंकि मन प्रकृतिज है। शुद्ध चैतन्य में मन का अभाव है। इसलिये वह अकाम है। उस अकाम का भजन करने वाला जीव भी तद्रूप हो जाता है। सनकादि ऐसे ही जीव हैं। मैं इन्हें प्रणाम करता हूँ। जीव भग से उत्पन्न होता है। उत्पन्न जीव भग को भोगता है। जो इस भग से बचे वही भक्त है। भा प्रकाशने + क्त भक्त अर्थात् ज्ञानी ऐसे भक्त जीव को मैं सादर नमन करता हूँ।

 "भग भोगे भग ऊपजै, भगते बचे न कोई।
 कह कबीर भगते बजे भगत कहावे सोइ ।"    
               ( कबीर साखी)

√• सप्तम भाव काम है। 

√•काम के २१, पर्याय हैं...

 "मदनो मन्मथो मारः प्रद्युम्नो मीनकेतनः ।
 कन्दर्पो दर्पकोऽनङ्गः कामः पशरः स्मरः ॥ 
शम्बरारिर्मनसिजः कुसुमेषुरनन्यजः ।
 पुष्पधन्वा रतिपतिर्मकरध्वजः ।।
 आत्मभूः बासू अष्यकेतुरस्यात् ॥" 
            ( अमरकोश )

√•१. मद माद्यति अनेन मद करणे ल्यूट मदनः = पागल विवेक हीन करने वाला, आनन्ददायक,उल्लासमय । में, भाज = 

√• २. मन् मन्यते + क्विप् + मधु मध्नाति + अच् = मन् + मय = मन्यथः, जो चिन्तन / विचार को सुख्ध करे, मधे, आडोलित करे।

√• ३. मन्यतेऽनेन मन करणे असुन मनस्, जन् + उ = जः । मनसि जायते मनसिजः । मन में जो उत्पन्न हो, जन्म ले।

√•४. मकर = मा माति मिमीते + + कृ करोति + अप, जो चिह्न करता, देता है यौवन का शरीर चिह्न, पताका, झंडा में करोति मापन करता है तथा ध्वज लगाता (किशोर में दाढ़ी-मूंछ तथा किशोरी मे वक्षोभार- आर्तव), उसे मकर ध्वज कहते हैं। मकर राशि में जो ध्वज (उच्च) है अर्थात् मंगल = भीम = भूमिज = शरीरज (भू देह)। अतः मकरध्वजः = देहजरोमाञ्च सिहरन रजवीर्य का कारक तत्व।

√• ५. मीनकेतन अर्थात् जो मीन राशि में उच्च का हो केतन पताका झंडा ध्वज झंडा ऊँचाई पर होता है। शुक्र यह मीन में उच्च का है। मी मयति गति करना + ल्युट् = मौन, जो चंचल हो गतिशील हो। मीनकेतन= जो चलायमान केतन (घर) में रहे। शरीर वा मन दोनों चलायमान हैं। 

 √•६. मार=पृ+घञ्।जो सब को मारता है। अर्थात् सब पर जिसकी विजय पताका फहराती है, वह मार है। 

√•७. प्रकृष्टं द्युम्नं (बले) यस्य सः प्रद्युम्नः प्रद्युद्यौति + म्ना मनति, जो मन में अग्रसर होता है   मन को आक्रान्त करता है, वह प्रद्युम्न है।

 √•८. शोषण, दीपन, सम्मोहन, तापन, उन्मादन ये पाँच शर है। काम के द्वारा ये पाँच शर धारण किये तथा छोड़े जाते हैं। अतः वह पंचशर है। 

√•९.पुष्प पुष्यति + अच् =पुष्पः ;विस्तृत, प्रफुल्लित, विकसित। धन् धनतीति शब्दे + उ = धनु > धन्वा। शब्दधारी पुष्पधन्वा व्यापक शब्दवाला परावाक्युक्त चुप, मौन रहने वाला व सुप्रसन्न पुष्पधन्वन् है।

√•१०. वह स्वतः उत्पन्न होने से आत्मभू है।

√• ११. सू सूते सूयते+ क्विप् =सु ,उत्पादक ब्रह्म वा विश्व का उत्पादक होने से वह ब्रह्मसू है।

√• १२. ऋषि ऋषति, ऋर्षति + क्यम्= ऋष्य, मारक गमनशील अत्यन्त मारक एवं निरन्तर गतिशील होने से वह ऋष्यकेतु है। 

√•१३. कुष कुष्णाति फाड़ना निचोड़ना + उम + इष् + उ = कुसुमेषुः वह इच्छा वा बाण जो शरीर वा मन को फाड़े निचोड़े पीड़ित करे।

 √•१४. जिसके समान कोई नहीं है, उससे उत्पन्न होने वाला अन् + अन्य + जः। अर्थात् परात्पर एक । ब्रह्म से जायमान काम ही अनन्यज है।

 √•१५. स्मृ स्मृणोति स्मरति + अ = स्मर, सतत प्रसन्न एवं जीवित रहने वाला मनस्य तत्व ।

√• १६. रम् रमि+ क्तिन् =रति, सम्भोग मैथुन। पा पाति पिवति + इति पति, स्वामी रक्षक, (आँख कान से पीने वाला सौन्दर्य, प्रेम का देवता रतिपति है। 

 √•१७. शम् शाम्यन्ति शान्त होना + बरच् = शंवर ।शम्बरारि = शांतिभंग करने वाला होने से काम को शम्बरारि कहते हैं। शम्बर का अर्थ जल भी है। जल को सुखाने वाला अग्नि (कामाग्नि) भी शम्बरारि है।

√•१८. अनंग= अन् + अंग, बिना अंगों वाला अंदेह अंगति गच्छति नास्ति स अनंग जो चलता नहीं अर्थात् सर्वत्र व्यापक है।

 √•१९. "प्रजनश्चारिम कन्दर्पः।" 
             (गीता १० । २८ )
 दूप दर्पति दर्पयति दृष्यति प्रज्ज्वलित करना ढीठ करना + घञ् अच् वा = दर्पः के कुत्सितो दर्पो यरमात् सः कन्दर्पः ।

 √•२०. जो ढीठ (लज्जा हीन) करता तथा मन तन में कामाग्नि सुलगाता है, उसे दर्पक कहते हैं।

√• २१. कम् कामयते + पञ् = कामः । प्रबल लालसा अनुरक्ति का नाम काम है। द्वादश इच्छाओं में काम की गणना होती है।

 "द्वादश इच्छायाः।
 अथ दोहदम् ।
 इच्छा कांक्षा स्पृहा तृड्वाञ्छा लिप्सा मनोरथः। 
कामोऽभिलाषास्तर्षश्च ॥"
         (अमरकोश)

√• पुनः, ६ ईप्साओं में काम भी एक ईप्सा है।

 "षट् ईप्सितस्य। 
कामं प्रकाम पर्याप्तं निकामेष्टं यथेप्सितम् ।"  
             ( अमरकोश)

 √•अनिच्छापूर्वक दी गई स्वीकृति का नाम भी काम है।
 "अकामानुमतौ कामम्।"
         ( अमरकोश)

√• मन में विराजमान किन्तु अप्रकट भाव भी काम है।

 "इच्छामनोभवाँ कामी।"
     ( अमरकोश)

 √•आधुनिक युग में पत्नी शब्द के कई अर्थ सामने आ रहे हैं। पतिं तनोति तनुते वा सा पत्नी जो पति को जानती है फैलाती है पसारती है, वह पत्नी है। अथवा पति-तनी पतिनी (पति को साथ ले कर चलने वाली, पति का नेतृत्व करे वाली) पत्नी [तनी तन् + अ + डी] जो पति से तनी रहे, पति को ताने रहे अर्थात् पति से असंतुष्ट रहे, पति को असंतुष्ट किये रहे वा पति को ताना मारती रहे, पति को तनाव में डाले रहे, जिससे पति का मन तनाव प्रस्त रहे वह पत्नी है। आज कल ऐसी पत्नियों की भरमार है। ऐसी पत्नी कुत्ते की पूँछ की तरह टेढ़ी तनी रहती है, कभी सोधी नहीं होती। मूर्ख पति अपनी ऐसी पत्नी को तुष्ट करने का, निरन्तर यत्न करता है। ऐसी पत्नियों को मेरा नमस्कार ।

 √•पत्नी विज्ञान अथाह एवं अपार सागर है। बुद्धिरूपी नौका इस सागर की भँवर में फंस जाती है। इससे इसका वर्णन सम्भव ही नहीं है। विधिपूर्वक विवाहिता स्त्री के ७ नाम हैं..

 "सप्तपरिणीतायाः स्त्रियाः ।
 पत्नी पाणिगृहीतो च द्वितीया सहधर्मिणी 
भार्या जायाऽथ पुंभूम्नि दाराः ॥" 
           ( अमरकोश)

√•१. पत्नी।
√• २. पाणिगृहीती।
√• ३. द्वितीया (पुरुष का अपर रूप)।
√•४. सहधर्मिणी । 
√•५. भार्या (भरण पोषण
किये जाने योग्य)। 
√•६. जाया (जो पुरुष को पुनः उत्पन्न करें)।
 इसमें शास्त्र वाक्य है...

 "पतिजया प्रविशति गर्भो भूत्वेह मातरम्।
 तस्यां पुनर्नको भूत्वा दशमे मासि जायते। 
तज्जाया जाया भवति यदस्या जायते पुनः ।। "

 √•७. दारा【 (+ न् + टापू) छिद्रयुक्त छिद्रान्विरानी] पुरुष को जो अपना छिद्र (दरार) भोग दे, वह दारा है। ददाति रातोति दारा।

 √•स्त्री की कुण्डली को देखने से उसके अंग प्रत्यंग की पुष्टता एवं अपुष्टता का ज्ञान होता है। भावस अह एवं राशि शुभता अशुभता, शुष्कता- सजलता, सुदृष्टि-कुदृष्टि, शुभयुति पापयुति, उच्चांश नीचांश, शः दृष्टियुति, मित्र दृष्टियुति आदि को ध्यान रखते हुए इसका निर्णय करना चाहिये भावानुसार इस पर विचा करता हूँ। शुभ प्रभावों के परिप्रेक्ष्य में ...

√•१. प्रथम भाव...

 मृदुल मसृणमसि सुमूर्धज, 
दीर्घ द्युम्न द्रविण केश।
 सघन सूक्ष्म शस्य कुन्तल, 
दीप्तिमय नवचन्द्र भाल ॥

 √•२. द्वितीय भाव ...

आकर्णदीर्घ मधु मत्त नवन,
 रक्ताकुर लोल सुनील नेत्र।
 दोलायमान कज्जल कृष्ण चक्षु,
 अबुज्य शीतल लवणीय दृष्टि ॥ 
श्री पुष्प श्रोत्र, उत्फुल्ल गण्ड ।
 सौम्य सुहास शुभ तुण्ड ।
तनु मिष्ठ रसना, मुक्ताभ दन्त ।
 सुरसाल चिबुक कूर्ज जयन्त ॥ किञ्जल्क कलिकायत रक्त, ओष्ठ ।
 शहद निर्झर अधर संतत सोम कोष्ठ ॥
 सरल नासा स्निग्ध सुन्दर तुंग अचल । उष्ण सुरभित उच्छ्वास नित्य अमल ।।

 √•३. तृतीय भाव ...

श्री कम्बुग्रीवा, कलकण्ठ कामा । विस्तीर्ण असा, गुह्यजत्रु वामा ।। पानालबाहु,कलित कफोणि,
पुष्ट प्रगण्ड, द्वितय प्रकोष्ठ ।
 सुलोच्य मणिबन्ध, शुभरेख पाणि; पिगाभ कररूह, करभ प्रदेश || 

√•४. चतुर्थ भाव ...

पीन उन्नत वर्तुलाकृति दुग्धकलश ।
 संघनित परिपुष्टं समुदित तंगतर कुच ।
 काम कन्दुक मयन घट कन्दर्पपर्वत पिण्ड वा।
 कृच्छ्र श्रृंग काम अंकुर चोष्य चारु, सुचुचूक ॥ 

√•५. पञ्चम भाव...
 ब्रह्मविद्या-कुण्ड, मनसिज-कुञ्ज गह्रर ललित रतिपति-गर्त, सुन्दर- पुज्ञ्ज नाभि ।
 त्रिवलययुत् सुनत अवतल कोमलोदर
 भास्कर गृह, खेचर-पथ कार्ष्णि कुक्षि ॥

√• ६. षष्ठ भाव ...

अल्प प्रधि सुलोच्य दृढ़ मुष्टिकायत क्षीण तट
 सूत्र तनु सुसूक्ष्म मृदु डिडिमाकृति मध्यम । 
लास्यमय अदृश्य चंचल आशुगतिकृत्
 काम्य कृश तनु मन्द क्षीण क्षतहरण कटि ॥

 √•७. सप्तम भाव ...

मीनकेतन स्थली सुगुह्य वर कल ।
 सूक्ष्म रोमिल कूर्मपृष्ठाकृति समुत्तल ॥ रतिमहार्णव सृष्टिमुख आह्लादकर ।
 भूरि भोग्य गोप्य सुभग पूर्ण अचल || 

√•८. अष्टम भाव...

 कामपीठ कामशाला कामकूट कामकोश,
 काममय अनंग आश्रय पृथुल सुस्फिच् ।
 पर्वतायत लोल उन्नत बृहद्गुरुतर शोभन,
 नुत नितम्ब पृश्न श्रोणि भाव आकर पुम्मनोहर||

 √•९. नवम भाव...

 हस्तिशुण्डी कदलिकास्तम्भवत्,
 दृढ सुचिक्कण पुष्य प्राञ्जल ऊरुद्वय ।
भारवह विलासप्रद संघट्टमान, 
लोमहीन दीप्तिवन्त रतिप्रसाद सक्थिरय ।।

√• १०. दशम भाव ...

अस्थूल रमणीय गतिशील जानु
 मांसावरित बलवत् रीढ़ रज्जु 
मकरध्वज क्षेत्र आधार मूल 
संस्पर्शणीय प्रहर्षणीय ||

 √•११. एकादश भाव ...

पृथु हेमदण्ड अतीव कोमल
 ज्योतिर्मय मरण युग्म जंघा ।
 नितान्त सुहृद सुरति कर सित
 मुग्धि कारक मतिहरति हा ॥ 

√•१२. द्वादश भाव...

 युगल चरणतल लोहित कोमल
 मञ्जु मृदुतर अत्यभिराम । 
अलक्तक्रांघ्रि अंगुलि अविरल
 शोभा धाम सुरम्य ललाम ॥

 √•ऐसा रहा द्वादश भावों के शुभ प्रभाव का फल अशुभ प्रभाव होने से तद्भाव सम्बंधित अंग अशोध्य अरम्य शुष्क अपुष्ट विकृत होते हैं। इनका क्या वर्णन किया जाय ? संसार सेतु पर ऐसी कोई स्त्री नहीं जो सर्वांग सुन्दर हो। उसमें कहीं न कहीं छिद्र अवश्य होगा। प्रकृति का यह विधान है। 

√•अशुभ एवं पाप प्रभाव वाले यह भी विशेष स्थानों में पड़ कर अंग कांति एवं सौन्दर्य को विवृद्धि करते हैं। यथा-भाव ३, ६, ११ में राहु केतु शनि मंगल सूर्य क्रमशः शुभांगद हैं।

 √•तृतीय स्थान में राहु केतु वा शान हाथों को पतला लम्बा एवं सशक्त करते हैं। पष्ठ में मंगल कटि भाग को पतला लचकीला एंव बलिष्ठ बनाता है। एकादश में सूर्य प्रस्ता वा पिंडलियों को सुन्दर चमकीला एवं रोमरहित चिक्कण बनाता है। जो अंग कुश होने से अच्छे माने जाते हैं, उनमें शुष्क वा पाप ग्रह तथा जो अंग पीन होने से अच्छे समझे जाते हैं, उनमें सजल वा शुभ ग्रहों का रहना उत्तम, मान्य है। राशियों की उपस्थिति से भी ऐसा प्रभाव होता है। कवि सौन्दर्य की सृष्टि करता है। जो रूप माधुर्य भूषालंकरण एक साथ कहीं नहीं है, वह कवि की कल्पना में उतरता है। कवि हृदय बोलता है।

√• पल्लववत् कोमल चरण, गरल सम दीर्घ नयन, सुधासम मधुर कण्ठ, टूटने का भय उत्पन्न करने वाली सूक्ष्म कटि दन्त रूपी कुन्द कलियों को प्रकट करती हुई हंसी, विशाल पृष्ठ प्रान्त को परिवृत किये अलक कानन, उपा के सौन्दर्य का हरण करने वाला रक्त मुख, कान्त ललाट से युक्त रतियुद्ध में आनन्द पाने का विचार करती हुई अग्नि कुण्ड में डाले गये होम घृत के समान अन्तर स्थित कामाग्नि को भड़का कर बाहर प्रकट करने वाली श्वेत सोम की घूँटों का आस्वाद लेती विद्रुम ओष्ठा, विद्युल्लता समान क्षीण काया एवं तुंग अजु जिघ्रासिका वाली कज्जलाक्षा, मदनानन्द के सिन्धु में तितीर्षमान श्यामा, अति सुरभित कल्पवृक्ष की शाखा के समान करों वाली, शर्करा जैसी मिष्ठ वाणी वाली नाचते हुए सर्प के फन जैसे विस्तृत ऊरु तट वाली, सुनील कुवलय जैसे नयनों वाली, कुंकुमाचित कोमल कपोलों वाली, उस रमणी को प्रणाम करता हूँ जो विष्णु भगवान के चरणों में नत है। 

√•मेधतुल्य केश, लता तुल्य देह, राहु तुल्य आँख, केतु तुल्य नाक, शुक्र तुल्य दाँत, भीम तुल्य ओठ, चन्द्र तुल्य भाल, सूर्य तुल्य तेज, जिस भामिनी का है, उसे प्रणाम । 

√•आम के टिकोरे जैसे नटखट नयन, तिल पुष्प जैसी सरल नासिका, प्रतिपल वर्धमान उच्छलस्तन, प्रकाशमान हासयुक्त लवण आनन, जिस वामलोचना के हैं, उसे प्रणाम ।

 √•चित्त को चलायमान करने वाले पारदर्शी आवरण में लिपटे पृथुल द्वय वरांकुर, आपस में सटे हुए वक्ष भूमि को फोड़ कर निकले हुए दो दुग्ध कलशों का सौन्दर्य, श्रीफल सदृश वर्तुल तट का अचिन्त्य सौष्ठव साक्ष, जिस प्रमदा का है, उसे भूरि-भूरि प्रणाम ।

 √•संध्या की लालिमा से रंगे अपर, शुद्धान्धकार से सजे स्निग्धकेश, कन्दर्प केतु से लसे दो उदीयमान पृथु एवं पूर्ण स्तन उपल, समुद्रफेन सम उज्जवल धौम वस्त्र से युक्त काया, जिस तरुणी की है, उसे सतत नमन ।

 √•विशाल कमल कोशों से लदी सर्पकटि, मन्दहास फेंकने वाले प्रवाल ओष्ठों का लालित्य, विष को परास्त करने वाली आँखें, जिस ललना की हैं, उसे प्रणाम । 

√•लता को भी लज्जित करने वाली पतली कटि, अन्तरिक्ष को भरने वाले वक्ष सौधों का भार मधु इच्छुरस एवं दुग्धामृत के भार से भरित वाणी, कंचुक के बन्धन की भी उपेक्षा कर उभरने वाले उराल से युक्त मन्दहासिनी को मेरा प्रणाम ।

 √•आम्रपल्लव सम अरुण तनु स्निग्ध कोमल, अमृतोपम तरल पूरित, वासनासव से लबालबपूर्ण, विमल विद्रुम आभ खचित, शर्करामय चोष्य चारुल, मुस्कराहटयुक्त मनहर मुखफलक जिस रामा के हैं, उसे मेरा प्रणाम । 

√•प्रसूत मेरुपृष्ठ के भार को ढोते पुष्ट कदलीस्तम्भ, पुष्प सानु से शोभायमान वक्षलोक, फुल्लमुख कुमुद, विकम्पमान तनुल मध्यमांग, ताम्बूलरस रंजित आर्द्र अधर, वीणोपम सुमधुर वाक् जिस कान्ता के हैं, उसे मेरा प्रणाम । 

√• नूपुर भूषित आम्रपल्लव जैसे चरण तल, चंचल भ्रमर जैसी नीलोत्पल आँखें, मेखला के नीचे के नन्दन को लसती ढकती अलक लताएँ, कोमल नारिकेलफलों की समता करने वाले वक्षाश्रित अमृत घट, जिस मानिनी के हैं, उसे मेरा प्रणाम । 

√•जैसे अधर, सेमल के फूल चमेली के पुष्प जैसे दाँत, अयस्कान्त मणि सम मुख कपोल, मन मथती मदमाती भ्रमती आँख, नव स्तनादद्य उर अधित्यिका का अगद्य अद्भुत आकर्षण, जिस जिस कामिनी का है, उसे मेरा प्रणाम । 

√•कोमल पदों को दुःखाने वाले पृथुल श्रोणि भार, अदृश्य कटि को पीडित करने वाले पीनस्तन भार अमोघ चितवन वाले विस्तीर्ण नयन धार पृष्णिपर्यन्त कुन्दर एवं कटिप्रोथ क्षेत्र को ढकती सुदीर्घ सुन्दर वेणी वाली अंगना को मेरा अनन्त नमन ।
√•कुण्डली का षष्ठभाव शत्रु भाव नाम से जाना जाता है। रोग भी शत्रु होता है। इसलिये यह रोग भाव हुआ। इस भाव से हर प्रकार के शत्रुओं का बोध होता है।

 √•शत्रु की परिभाषा क्या है ? जो दुःख दे वह शत्रु है। जो विरोध करे वह शत्रु है। दुःख देने वाले/विरोध करने वाले सभी व्यक्ति, वस्तु आदि शत्रु हैं। इन शत्रुओं में एक बड़ा शत्रु है और वह है-दरिद्रता। कहा गया है...

 "दारिद्रयान् मरणाद्वापि दारिद्रयमवरं स्मृतम्। 
अल्पक्लेशेन मरणं दारिद्यमति दुःसहम् ॥"
        (हितोपदेश, मित्रलाभ १२८  )

√• दरिद्रता और मरना-इन दोनों में से दरिद्रता बुरी है। क्योंकि मरण तो थोड़े क्लेश से होता है और दरिद्रता सदा दुःख देती है ।

√•कोई भी वस्तु जो नियन्त्रण वा अधिकार में नहीं है, वह शत्रु है। शंकराचार्य कहते हैं...

 "के शत्रवः सन्ति ? निजेन्द्रियाणि । तान्येव मित्राणि जितानि यानि ।"
             ( प्रश्नोत्तरी।)

 √•[कौन शत्रु है ? अपनी इन्द्रियाँ यदि ये जीत ली जाती हैं तो मित्र हैं।]

√• विष सब का शत्रु है। यदि इसका शोधन कर औषधि बनाया जाय तो यही मित्र हो जाता है। इसी प्रकार व्यक्ति का अपना आत्मा ही उसका मित्र वा शत्रु है। गीता में भगवान् कृष्ण का अर्जुन के प्रति वचन है...

"बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । 
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥"
              (गीता ६।६)

√•जिसने आत्मा को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उसका आत्मा ही आत्मा का मित्र है। जिसने ऐसा नहीं किया उसका आत्मा निश्चय ही शत्रुवत् व्यवहार करता है। अर्थात् उसका शत्रु है। आत्मकारक पह है, सूर्य जब सूर्य षष्ठ भाव में होता है, तो व्यक्ति अपना शत्रु होता है। सबसे अधिक अंशवाला यह जैमिनीय मत से आत्मकारक होता है। ऐसा यह जब पष्ठस्थ होता है तो भी व्यक्ति अपना शत्रु स्वयं होता है। लग्नेश के पृष्ठ में होने से भी जातक स्व शत्रु होता है। 

√•लग्नेश जिस नवांश में हो उस नवांश का स्वामी यदि पृष्ठ में हो तो भी व्यक्ति अपना शत्रु होता है। लग्न राशि का नवांशेश भी षष्ठ में होने पर जातक अपना शत्रु होता है।

 √•नीतिशास्त्र का एक वाक्य है...
 "उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
 तागोदर संस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥"
       ( हितोपदेश, मित्रलाभ १५६)

√•जैसे सरोवर के पानी के चारों ओर छलकने/ बहते रहने से उस पानी को शुद्धि होती है, वैसे हो उपार्जित वित्त के त्याग/दान से धन की रक्षा/ शुद्धि होती है। अतः जन्मजन्मान्तर से प्राप्त विद्या की शुद्धि के लिये मैं इसका त्याग / दान, लेखन के द्वारा करता हूँ।

 √•कुण्डली का षष्ठ भाव शत्रु क्यों ? यह विचारणीय प्रश्न है। जीवन के अन्त का द्योतक होने से द्वादश भाव दुःस्थान है। यह भाव अपनी १८०° की ऋजु दृष्टि से षष्ठ को देख रहा है। इसलिये षष्ठ भी दुःस्थान हुआ। दुष्ट भाव होने से यह जातक का शत्रु हुआ। कुण्डली में तीन दुःस्थान हैं-६, ८, १२ । ये उत्तरोत्तर अधिक दुष्ट है।

 √•अष्टम से एकादश स्थान भाव ६ है इसलिये यह मृत्यु का लाभ हुआ। इस प्रकार भाव ६, मृत्यु वा अष्टम का सहायक (लाभकर) हुआ। रोग के द्वारा मृत्यु होती है। अब यह स्पष्ट है-भाव ६, भाव ८. भाव १२ अशुभ स्थान हैं। भाव १२ पूर्णमृत्यु का द्योतक है। भाव ८ तीन चौथाई मृत्यु का प्रतिनिधि है। भाव ६ अर्ध मृत्यु का कारक है। रोग, व्रण, शोक का होना अर्धमृत्यु है। इससे जातक मरता नहीं, कष्ट से तड़पता रहता है। भाव ६ रोग है, त्रिताप है। दैहिक दैविक भौतिक-तीन ताप हैं। वात पित्त कफ जन्य दोषों का विचार इस भाव से होता है। किस कारण वा कर्म के फलस्वरूप रोग होते हैं ? इसका विचार जैमिनि ने किया है। 

√•जैमिनीय आश्वमेधिकपर्व के अड़तालीसवें अध्याय में यमराज ने नाना प्रकार के रोगों की उत्पत्ति का कारण बताते हुए, उनसे छूटने के उपाय का निरूपण किया है। 

√•१. ब्रह्महत्या करके प्रायश्चित न करने वाले को 'गलत्कुष्ठ' होता है। महारुद्र का जप हवन करके २४ निष्क स्वर्ण की पुरुष प्रतिमा का दान ब्राह्मण को करने से इस रोग से मुक्ति मिलती है।

√•२. देवधन का अपहरण करने से तथा ब्राह्मण भोजन में बाधा पहुँचाने से विषूचिका रोग होता है।  अन्न का दान करने से यह रोग नहीं होता। 

√•३. स्वगोत्र में विवाह करके कामोपभोग करने से प्रमेह रोग होता है।

 √•४. शिव सम्पत्ति की चोरी करने, पराई उन्नति देख कर मुंह बिचकाने वाले को लिंगपीडा का रोग होता है। 

√•५. स्वर्ण की चोरी करने वाला कुनखी होता है तथा उसे पाण्डु रोग होता है। विष्णु सम्बन्धी मंत्र का जप करने से यह रोग ठीक होता है। 

√•६. गर्भपात कराने वाले मनुष्य के शरीर में जलोदर रोग होता है। 

√•७. जो रस की चोरी करता है उसे विवचिका (खाज) नामक रोग होता है।

√•८. विश्वासघाती को सन्निपात नामक रोग होता है।

 √•९. पराई निन्दा करने वाले तथा जलस्थान को दूषित करने वालों को अतिसार।

√• १०. जो धार्मिक सम्पत्ति को हड़प लेता है, ऐसे मनुष्य को संग्रहणी का रोग होता है। 

√•११. भोजन करते हुए ब्राह्मणों से द्वेष करने वालों को अ-रोचक रोग होता है। रोग होता है।

 √•१२. जो सुहदों पर धिक् शब्द का प्रहार करता है, मार्ग में जाते हुए पथियों को हँस कर पीडित करता है, किसी को आशा देकर उसे पूरी नहीं करता, उसे शूल पीड़ा होती है। कारागार में बन्द हुए मनुष्यों को, पिंजड़े में बन्द पक्षियों को, मार्ग में पीटे जाते हुए पथिकों को उस महान् भय से जो छुड़ाते हैं उन्हें तीन सौ शूलों में से एक भी शूल नहीं सताता ।

√• १३. जो पराये उत्कर्ष को सह नहीं पाता, उसे हिक्का (हिचको) रोग होता है। 

√•१४. जिसके पास बहुत धन हो परन्तु वह कृपण हो, सत्कार्य में धन व्यय न करता हो तो उसे धनुर्वात रोग होता है।

 √•१५. जो भगवान् हरि की कथा नहीं सुनते और न सत्पुरुषों के हरि गुणगान सम्बन्धी प्रवचन को सुनते हैं, उन्हें कर्णशूल होता है। 

√•१६. पराये ऐश्वर्य को लोभ भरी दृष्टि से देखने वाले पराई स्त्रियों का अपहरण करने वाले तथा सवारी पर बैठ कर भोजन करते हुए चलने वाले को नेत्र रोग होता है।

 √•१७. पिता की हत्या करने वाला चेतनाशून्य (पागल) होता है। 

√•१८. माता की हत्या करने वाला अन्धा होता है। 

√•१९. जो सत्पुरुषों की प्रशंसा नहीं करता, उल्टे उनकी निन्दा किया करता है, उसे मुख-रोग होता है। 

√•२०. जो धरोहर को हड़प लेता है, उसके पैर में बल्मीक नामक रोग होता है।

 √•२१. जो मन्द बुद्धि दूसरे के मुख के पास को छीन लेता है तथा देव-सामग्रियों को हड़प लेता है, उसे गण्डमाला रोग होता है। 

√•२२. जो गुरु पत्नी के साथ समागम करता है, उसे कुण्डुकुष्ठ रोग होता है।

 √•२३. उदारदानी को देख कर विमूर्छित होने वाले को अपस्मार रोग होता है।

 √•२४. जो दम्भपूर्वक धर्म का आचरण करता है उसे गजचर्म रोग होता है। 

√•२५. विश्वास न करने वाले को सिर संबंधी रोग होते हैं सूर्य का पूजन करने से इनकी निवृत्ति होती है।

√•२६. जो मन वचन कर्म से सदा परद्रोह करता रहता है, वह मरने के पश्चात् पुनः जन्म लेने पर पुत्रहीन (अनुत्पादक रोग से पीड़ित) होता है। इसमें अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

 "कर्मणा मनसा वाचा परद्रोह करोति यः । 
स त्यापुत्रतां गच्छेत् नात्र कार्या विचारणा ।"

 √•यदि वह तीन बार हरिवंश पुराण का श्रवण करे तो उस पाप से मुक्त हो जाता है तो उसे पुत्र रूपी धन की प्राप्ति होती है।

 "श्रृणुयात् हरिवंशं वै वारत्रितयमेव च। समुक्तस्तेन पापेन पुत्रवान् धनवान् भवेत् ॥"

√• जैमिनीय आश्वमेधिक पर्व के इस रोगाध्याय का श्रवण करने वाले को रोग नहीं व्यापता । 

√•वर्तमान जन्म के दोष से जो रोग होते हैं, उनक निवारण औषधि से होता है। जो रोग पूर्वजन्म के पापों के फलस्वरूप होते हैं, वे प्रायश्चित के बिना शान्त नहीं होते। गो ब्राह्मण की सेवा तथा दान से सभी प्रकार के रोग दूर होते हैं। गो ब्राह्मण की कृपा होने पर औषधियाँ प्रभाव डालने में समर्थ होती हैं। यहीं कारण है कि एक ही औषधि से, एक ही रोग होने पर, किसी का रोग ठीक होता है तो किसी का नहीं। मह रोगों की उत्पत्ति एवं शमन की सूचना देते हैं। कोई यह न तो रोग उत्पन्न करता है और न उसका नाश करता है। कर्मफल अदृष्ट भोगने से कटता है, तप से कटता है। जो प्रायश्चित किया जाता है, वह तप ही है। अपने शरीर के प्रति आहार-विहार के असंयम रूप पाप से रोग होते रहते हैं।

 √•रोग सृष्टि की व्यवस्था के अंग हैं। रोग रूपी अस्त्र से विधाता प्राणियों को नियन्त्रण में रखता है। यमराज की सेना का नाम रोग है। इस सेना से यम देव सब पर शासन करते हैं। पुण्यात्माओं पर उनका शासन नहीं चलता। क्योंकि पुण्यात्मा स्वयं यम वा विष्णु होता है।   
            "तस्मै यमाय नमः।"
√•व्यवहार में अभेद/अद्वैत सम्भव नहीं। व्यवहार में अनेकता है, भेद भाव है। यहाँ संसार है। संसार में द्वैत है, द्वन्द्व है, संघर्ष है, समस्या है। किसी का कोई मित्र है तो उसका शत्रु भी कोई न कोई होगा- ऐसा सर्वत्र है। जिसका न कोई मित्र है, न कोई शत्रु है, वह समाज से परे है और वह समाज के लिये व्यर्थ है। अद्वैत की बातें सत्य होते हुए भी व्यवहार में व्यर्थ हैं। राम ब्रह्म थे। कृष्ण ब्रह्म थे। योगी ब्रह्म होता है। सन्त ब्रह्म होता है। ये सब शत्रु-मित्र युक्त हुए हैं, होते हैं। शत्रु और मित्र अनायास होते हैं। मित्र होना कष्टप्रद नहीं होता। शत्रु होने से व्यक्ति कष्ट पाता है। कुण्डली का षष्ठ भाव शत्रु है। संसार में जितने लोग हैं, वे सब षष्ठ भाव विहीन नहीं हैं। सब के शत्रु हैं। शत्रुओं से निपटना पड़ता है। ईश निन्दक ईश्वर का शत्रु है। जो जिससे द्वेष करे, वह उसका शत्रु है। जब दो लोग परस्पर द्वेष करते हैं तो वे एक दूसरे के शत्रु हुए। शत्रु नाश का सरल उपाय अषियों ने बताया है। 

√•पष्ठ भाव सबको पीड़ित करता है। षष्ठ भाव के अनिष्ट प्रभाव को दूर करने के लिये शत्रुञ्जयी होने के लिये, अथर्व वेदोक्त रिपु सूक्तों का नित्य पाठ करना चाहिये। इससे व्यक्ति ज्ञाताज्ञात शत्रुओं से स्वकुटुम्ब की रक्षा करने में सफल होता है।

√•१. अथर्ववेद काण्ड २, सूक्त १९ 

"अग्ने यत् ते तपः तेन तं प्रतितप।
 योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ १ ॥
 अग्ने यत् ते हरः तेन तं प्रतिहर
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ २ ॥ 
अग्ने यत् ते अर्चिः तेन तं प्रत्यर्च ।
 योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ३ ॥
 अग्ने यत् ते शोचिः तेन तं प्रतिशोच ।
 योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ४ ॥
 अग्ने यत् ते तेजः तेन तं अतेजस कृणु। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।। ५ ।।"

 √•सरसों का बीज प्रज्ज्वलित अग्नि में डालते हुए अथवा सरसों के तेल का दीपक जला कर उसके सम्मुख लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठ कर इस सूक्त का पाठ / जप करना चाहिये ।

√•२. अथर्ववेद काण्ड २, सूक्त २० 

"वायो यत् ते तपः तेन तं प्रतितप योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ १ ॥ 
वायो यत् ते हरः तेन तं प्रतिहर ।
 योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ २ ॥
 वायो यत् ते अर्चिः तेन तं प्रत्यर्च ।
 योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ३ ॥ 
वायो यत्ते शोधितेन तं प्रतिशोच योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ४ ॥
 वायो यत् ते तेज तेन तं अतेजसं कृणु। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ५ ॥" 

√•इस सूक्त का पाठ / जाप ऐसे स्थान पर करना चाहिये जहाँ शीतल मन्द सुगन्ध वायु चल रही हो। स्थान खुला हुआ होना चाहिये, बन्द / कक्ष नहीं। काले वा नीले रंग का ऊनी आसन होना चाहिये। वायु की दिशा में मुख करके बैठना चाहिये ।

√• ३. अथर्ववेद काण्ड २ सूक्त २१ 

"सूर्य यत् ते तपः तेन तं प्रतितप । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ १ ॥ 
सूर्य यत् ते हरः तेन तं प्रतिहर । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ २ ॥
 सूर्य यत् ते अर्चिः तेन तं प्रत्यर्च । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ३ ॥ 
सूर्य यत् ते शोचि तेन तं प्रतिशोच
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ४ ॥
 सूर्य यत् ते तेजः तेन तं अतेतजं कृणु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ५ ॥"

 √•इस सूक्त का पाठ दिन में सूर्याभिमुख होकर करना चाहिये। चमकते हुए सूर्यमण्डल की ओर अधमुंदी आँखें हों। गौरिक रंग का ऊनी आसन हो। आकाश के नीचे वा किसी पूज्य वृक्ष की छाया में बैठ कर पाठ प्रशस्त होता है। 

√•४. अथर्ववेद काण्ड २, सूक्त २२ 

"चन्द्र यत् ते तपः तेन तं प्रतितप । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ १ ॥
 चन्द्र यत् ते हरः तेन तं प्रतिहर । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ २ ॥
 चन्द्र यत् ते अर्चिः तेन तं प्रत्यर्च । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ३ ॥
 चन्द्र यत् ते शोचिः तेन तं प्रतिशोच । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ४ ॥
 चन्द्र यत् ते तेजः तेन तं अतेजस कृणु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।। ५ ।।"

 √•इस सूक्त का पाठ रात में चन्द्रमा की किरणों से स्नान करते हुए करना चाहिये। चन्द्रमा में पर्याप्त प्रकाश हो अर्थात् शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक एवं कृष्ण १ से कृष्ण पञ्चमी तक का चन्द्रमा हो पाटल (पीत रक्त वर्ण का आसन हो।

√• ५. अथर्ववेद काण्ड २, सूक्त २३ 

"आपो यद् वः तपः तेन प्रतितपत । 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ १ ॥
 आपो यद् बोकि तेन तं प्रत्यर्चत।
 वोऽचिः योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ २ ॥
 आपो यद वो हर तेन तं प्रतिहरत योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ३ ॥
 आपो यद् वः शोचि तेन तं प्रतिशोचत।
 योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ ४ ॥
 आयो यद् वस्तेजः तेन तं अतेजसं
 कृणुत। 
योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्टः ॥ ५॥" 

√•इस सूक्त का पाठ सामने जल से भरा हुआ पात्र/ कलश रख कर अथवा नदी, समुद्र, सरोवर, झील,प्रपात, आकाशीय जल (वर्षा) को उपस्थिति में श्वेत रंग के आसन पर बैठ कर करना चाहिये।

 √•ऐसा कौन है, जिसे शत्रु का भय नहीं। यहाँ का राजा सूर्य तथा चन्द्रमा सतत राहु से भय पाते हैं। राहु इन दोनों को प्रसता है। ग्रहों में राहु भी एक ग्रह है। सूर्य इससे नहीं पसा जाता। सूर्य चन्द्रमा को जो राहु प्रसता है, वह इससे भिन्न है। मह मण्डली वाले राहु से चन्द्रमा हर महीने युत होता है, किन्तु महण नहीं लगता। सूर्य वर्ष में एक बार अवश्य इस से युत होता है। इस राहु की युति में भी ग्रहण नहीं लगता। क्योंकि यह राहु उस (ग्रहणकारक) राहु से भिन्न है। उस राहु का अर्थ है- छाया वा अन्धकार। अन्धकार का अर्थ है- प्रकाश का अभाव। प्रकाश का अर्थ है-ज्ञान। इस प्रकार, अन्धकार = अज्ञान = राहु राहु नाम अज्ञान का है। मानवमात्र का शत्रु है- अज्ञान। षष्ठ भाव है-अज्ञान। सब लोग अज्ञान से त्रस्त हैं। एक मात्र ज्ञानी शत्रु विहीन है। जो सर्व विद्याप्रवीण है, वह ज्ञानी है। शंकराचार्य का वाक्य है...

 "विद्या हि का ? ब्रह्मगति प्रदा या । 
बोधो हि को ? यस्तु विसक्ति हेतुः।"
               ( प्रश्नोत्तरी। )

√•१. प्रश्न. विद्या क्या है ? 
उत्तर. जो ब्रह्मगति दे[ जीव को ब्रह्म कर दे]

 √•२. प्रश्न. बोध क्या है ?
 उत्तर. जो आसक्ति न होने दे। [बोध = ज्ञान]

 √•विद्यावान् एवं विसक्त श्री पं. महाराज के निमित्त लिखे जाते रहे ज्योतिष प्रवचन  के ७७ सत्र के इस पाठ द्वारा मैं वैष्णव जनों की जयजयकार करता हूँ।
√•१. कुण्डली में षष्ठ भाव पञ्चम से दूसरा होने के कारण बुद्धि का धन हुआ। क्योंकि पंचम स्थान बुद्धि है। जिस वस्तु के प्राप्त होने से बुद्धि को महत्व मिले, वह बुद्धि का धन है। इस प्रकार, बुद्धिधन= विद्या 

√•२. कुण्डली में द्वितीय भाव वाणी वा मुख है। इसकी शोभा विद्या से होती है। अतः द्वितीय भाव विद्या है। षष्ठ भाव द्वितीय से पञ्चम है। अतः षष्ठ भाव द्वितीयस्थान वाणी का सुत/अपत्य है। वाणी/ मुख की शोभा विद्या से होती है। इसलिये षष्ठ भाव = विद्या।

√• ३. विराट् पुरुष की कुण्डली में षष्ठ भाव में कंन्या राशि ६ पड़ती है। कन्या राशि का अधिपति बुध है। बुध का अर्थ है-विद्वान् विद्यावान् । नैसर्गिक रूप से षष्ठ विद्या का भाव हुआ। बुध ग्रह लौकिक विद्याओं का कारक है। इसलिये षष्ठ भाव = लौकिक विद्या।

√• ४. षष्ठ भाव पुत्र है, नवम भाव का।

      [ ९+९= १८ । १८- १२=६ ।]

√• नवम का स्वामी है। है गुरु, षष्ठ का स्वामी है बुध गुरु का क्षेत्रज पुत्र बुध। [ गुरु की पत्नी को योनि में चन्द्रमा का बीज पड़ा था।] बुध ग्रह, गुरु का नैसर्गिक शत्रु है। प्रायः पुत्र अपने पिता का शत्रु होता ही है। यथा, शनि सूर्य का, मकरध्वज अपने पिता हनुमान का, गणेश अपने पिता शिव का ।] गुरु है ज्ञान। ज्ञान का शत्रु है अज्ञान । ज्ञान है पराविद्या अज्ञान है अपरा विद्या।

 √•पराविद्या = अध्यात्म ज्ञान । अपराविघा अनात्म ज्ञान  = लौकिक ज्ञान = पार्थिव ज्ञान । अतएव पृष्ठ भाव = लौकिक ज्ञान।

√• इसका कारक स्वभावतः बुध है ही ।

 √•५. चतुर्थ भाव सुख है। चतुर्थ से तीसरा भाव पष्ठ है। षष्ठ भाव है बल, चतुर्थ का। इसका अर्थ हुआ लौकिक ज्ञान से सुख मिलता है, मन प्रफुल्लित रहता है।

√•६. पृष्ठ से दशम भाव - पांचव है। इसलिये दशम स्थान पष्ठ भाव का पुत्र है। दशम स्थान है-पद प्रतिष्ठा यश अर्थात् लोक विद्या से पद की प्राप्ति होती है, प्रतिष्ठा मिलती है, यश फैलता है। लौकिक विद्याओं में गणित ज्योतिष आयुर्वेद धनुर्वेद स्थापत्यशास्त्र संगीत शास्त्र ललित कलाओं की गणना होती है। पृष्ठ इनका कारक है। 

√•७. एकादश भाव लाभ है। एकादश से अष्टम पड़ता है, षष्ठ भाव। इसलिये षष्ठ भाव लाभ का मृत्यु स्थान हुआ। लौकिक विद्याएं तो लाभ देती हैं, सुख देती है, फिर कैसे यह लाभनाशक हुआ ? भौतिक सम्पत्ति इकट्ठा कर लेना, उच्चपद पा जाना, चारों ओर अपनी जयजयकार सुनना-लाभ नहीं है। वास्तव में लाभ तो वह है, जिससे अपने स्वरूप की प्राप्ति हो अर्थात आत्मलाभ । 

"विद्या हि का ? ब्रह्मगतिप्रदा या । 
बोधो हि को ? यस्तु विसति हेतु।
 को लाभ ? आतमवगमो हि यो वै।
 जितं जगत्केन ? मनो हि येन ॥"
          ( शंकराचार्य ।)

√• प्रश्न. वास्तविक विद्या क्या है ?
 उत्तर. जो ब्रह्मगतिप्रदायिन् अर्थात् मोक्षप्रदा है।

√• प्रश्न. ज्ञान क्या है ?
 उत्तर. जो विसक्ति / अनासक्ति / वैराग्य का हेतु है।

 √•प्रश्न. लाभ क्या है ?
 उत्तर. जो परमात्मा की प्राप्ति है, निश्चय ही वही।

 √•प्रश्न. जगत् को किसने जीता है ?
 उत्तर. जिसने मन को वश में कर लिया।

√• पष्ठ भाव लौकिक विद्या का भाव है। लौकिक विद्या बांधती है- धन से, यश से, मान से, पद से, सत्ता से वास्तविक विद्या तो आत्मविद्या हो है। यह अवर्ण्य है, अकथ्य है, मौन है। इस विज्ञान का बोध होने पर व्यक्ति निर्वाचन करना बन्द कर देता है, मुनि हो जाता है। तस्मै मुनये नमः । जगदीश्वर शिव माता पार्वती से कहते हैं...

"नि: शब्द तु विजानीयात् स्वभावाद ब्रह्म पार्वति ।"
               ( गुरु गीता)

 √•[हे पार्वती । स्वभाव से ही ब्रह्म निःशब्द है, अवर्ण्य है, ऐसा जानो ।]

√• यह ब्रह्म प्रत्यक्ष है। इसे हम देखते हुए भी नहीं देखते नहीं समझते, नहीं पहचानते नहीं जानते। प्रकृति इस ब्रह्म का वर्णन नित्य करती रहती है, वाणी से नहीं, क्रिया से प्रकृति की इस क्रिया को अषियों ने सावधानी से देखा। उसका वर्णन, संकेतन उन्होंने वाणी से किया। यही वेद है। तस्मै वेदाय नमः ।

√•ऋषि वाक्य है ...

"नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥"
        ( केनोपनिषद् २ । २)

√•[ अहं सुवेद इति न मन्ये नो इति न वेद वेद च नः यः तद् वेद, तद् च वेद। (अहं) वेद (अहं) न वेद इति, नो। मैं (ब्रह्म को) भली प्रकार से जानता हूँ, ऐसा (मैं) नहीं मानता। न ऐसा ही मानता हूँ कि मैं (उस ब्रह्म को) नहीं जानता हूँ। (क्योंकि) जानता भी हूँ। हम में से जो कोई भी उस ब्रह्म को जानता है, वही (मेरे उक्त वचन के अभिप्राय को) भी जानता है कि मैं जानता हूँ तथा नहीं जानता हूँ। ये दोनों ही नहीं हैं।]

 √•ज्ञान ही ब्रह्म है। ज्ञान हो आत्मा है। ज्ञान प्राप्ति का अर्थ है-ब्रह्म साक्षात्कार, अपने स्वरूप / आत्मा की प्राप्ति । प्राप्त होना कुछ भी नहीं है। आत्मा तो पहले से प्राप्त है, केवल पहचानना भर है। गुरु के द्वारा आत्मा को पहचाना जाता है। इस सन्दर्भ में एक लघु कथा है। राजा जनक गुरु की खोज में थे उनको एक शर्त थी- अश्वारोहण करते हुए एक पैर एक रकाब में रखने के पश्चात् दूसरा पैर दूसरी रकाब में रखने के बीच जो समय लगता है, उतने समय में उन्हें (राजा जनक को) जो आत्म ज्ञान करा दे, उसे वे अपना आधा राज्य दे देंगे। उनकी इस शर्तको पूरा करने वाला कोई गुरु नहीं मिला। एक दिन उनकी सभा में अवधूत श्री अष्टावक्र का आगमन हुआ। अष्टावक्र ने उनकी वह शर्त स्वीकार कर ली। अष्टावक्र ने कहा कि मैं गुरु दक्षिणा पहले लूंगा। राजा जनक तैयार हो गये। अष्टावक्र ने राजा जनक से दक्षिणा में उनका मन माँगा। राजा ने अपनी रानियों से परामर्श लिया। आधा राज्य बचाने के लोभ से रानियों ने राजा को अपना मन देने की स्वीकृति दे दिया। घोड़ा लाया गया। राजा ने अपना एक पैर रकाब (पादासनी) पर रखा। दूसरा पैर जैसे ही दूसरी रकाब में रखने को उद्यत हुए, वैसे ही श्री अष्टावक्र ने उन्हें वैसा करने से रोक दिया। क्योंकि राजा ने अपना मन अष्टावक्र को दे दिया था। मन अब राजा का रहा नहीं। बस इतने समय में राज जनक को आत्मज्ञान हो गया। जिसने अपना मन गुरु (परमात्मा) को दिया ओर अमन हो गया, उसके आत्मज्ञानी होने में संदेह नहीं विलम्ब नहीं मनदेने के लिये कोई तैयार नहीं बताइये, आत्मसाक्षात्कार कैसे हो ? 

√•यज्ञ से, दान से, व्रत से, तप से आत्म ज्ञान नहीं होता। एक मात्र अपना मन राम को देने से, राम में लगाने से, राम की आधीनता स्वीकार करने से, राममय होने से व्यक्ति स्वयं राम हो जाता है। स्वयं राम होना ही स्वरूप की प्राप्ति है, ब्रह्म ज्ञान है। ऐसे ब्रह्मज्ञानी को मेरा प्रणाम ! द्रव्य का दान यज्ञ है। सुख का दान तप है। सब का हेतु मन है। मन का दान अनिर्वचनीय है। यह कठिन दान है। जिसने अपने मन का दान गुरु को कर दिया, वह निश्चय ही धन्य है। ऐसे दानी को मेरा प्रणाम ! जो अपने वश में नहीं है, उसका दान कैसे किया जाय ? मन को वश में करने का उपाय क्या है ? मन योगाभ्यास से वश में होता है-ऐसा लोग कहते हैं। योगाभ्यास कठिन कार्य है। मन को वश में करने का कोई सरल उपाय होना चाहिये। ऐसा उपाय है। मेरी समझ में यह उपाय है, नाम जप नाम की औषधि खाते-खाते मन निरोग हो जाता है। मन का निरोग होना ही, उसका वश में होना है। निरोग मन अपने स्वरूप में होता है। अपने स्वरूप में होने का अर्थ है- 'मनो वै सः।' जब मन की ब्रह्माकार वृत्ति हो गयी तो मन का निवास स्थान यह शरीर भी ब्रह्म हो जाता है। ऐसे सन्त (शरीर) का दर्शन करने से शान्ति मिलती है। षष्ठ भाव के दुष्प्रभाव का नाश सन्त दर्शन से, सन्त सेवा से, सन्त कृपा से होता है। 
             "तस्मै सन्ताय नमः।।"
√•तत्व एक है। जो इस एक को जानता है, एक की शरण में है, मैं उसे नमन कर रहा हूँ। जो एक के शरणागत है, उसे अन्य का भय नहीं।

 "एकचेंभ्यः स्वाहा।"
(अथर्ववेद १९।२३।२०)

"एकानृचेभ्यः स्वाहा।"
(अथर्ववेद १९।२३।२२)

एक + अचेभ्यः स्वाहा। 
एक + अन्-अचेभ्यः स्वाहा ।

 √•अच् (तुदादि परस्मै अचति प्रशंसा करना स्तुति करना ढकना छिपाना चमकना प्रकाशित होना) + क्विप् अच्] स्त्रीलिंग शब्द ।

 √•अच् का अर्थ है- सूक्त, अग्वेद का मंत्र, अक्संहिता, दीप्ति, प्रशंसा, पूजा । 

√•इन मन्त्रों का अर्थ हुआ जिसकी प्रशंसा के लिये अचाएँ प्रकट हुई हैं, वह तत्व एक है। जिसकी प्रसंशा में अचाएँ नहीं, प्रत्युत् यजुस् वा साम प्रकट हुए हैं, वह तत्व एक है। चमकने वाले तथा न चमकने वाले उस एक को आहुति दी जाती है।

 √•यह एक, विष्णु है। मैं, इस एक विष्णु का उपासक हूँ। जो इसके सेवक हैं, वे धन्य हैं। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। इस एक के संबंध में एक कथा सुना हूँ। सम्राट अकबर की सभा परिषद् में श्रीपति नाम के एक कवि थे। वे वैष्णव थे। वे भगवान् विष्णु की प्रशंसा में ही लिखते थे। अकबर की उन्होंने कभी स्तुति नहीं की। उनके सम्राट् एक मात्र लक्ष्मीपति विष्णु थे। यह बात अन्य सभासदों को अच्छी नहीं लगती थी। सबों ने मिल कर एक षड्यन्त्र रचा। उन लोगों ने एक पंक्ति "करौ मिलि आस अकबर की" अकबर ने के सम्मुख रख कर समस्यापूर्ति के लिये कवि सम्मेलन में प्रस्तुत किया। यदि श्री पति इस पंक्ति की समस्यापूर्ति स्वकवित्त में न करते तो सभा से बहिष्कृत होते वा दण्डित किये जाते। यदि इसे अपने कवित्त में ग्रहण करते तो अकबर की प्रशंसा हो जाती। इससे उनकी विष्णु के प्रति एक निष्ठा का हनन होता । किन्तु श्रीपति अटल थे। जिसकी विष्णु में निष्ठा है, वह अटल होता ही है। उन्होंने एक ऐसी कविता रची, जिसमें कथित पंक्ति भी आ गयी तथा अकबर की प्रशंसा भी नहीं हुई। उल्टे भगवान् विष्णु की स्तुति ही हुई। यह है, उनका वह कवित्त ...

"अब के सुलता फनियान समान हैं
 बाँधत पाग अटब्बर की ।
 तजि एक को दूसर, को जो भजै,
 कटि जीभ गिरै वा लब्बर की ।
सरनागत 'श्री पति' श्रीपति की,
 नहि त्रास है काहुकि जब्बर की । 
जिन को हरि की कछु आस नहीं,
 सो 'करौ मिलि आस अकब्बर की॥"

√• फनियान = साँप। अटब्बर = मखमल / रेशम लब्बर = मुखर/ बातूनी/बकबकी। जब्बर = बली। सुलता = राजा। श्रीपति = लक्ष्मीपति विष्णु । 

√•जो विष्णु वा विष्णु के भक्तों की प्रशंसा करता है, वह बुद्धिमान् है जो इनसे परामुख हो कर रचना करता है, वह मूर्ख है। ऐसे मूर्ख को मैं नमन करता हूँ। यहाँ नमन में श्लेष है। नमन = झुकना नत होना। नमन = न + मन अर्थात् मन न लगाना, अन्यमनस्क होना, उदासीन होना। मूखों के वाक्यों की उपेक्षा करना ही उनका नमन करना है। वाक् (निन्दा वा स्तुति) तथा अवाक् (मौन)- सब कुछ विष्णु है। यह विष्णु हिरण्यगर्भ है । हृ + ल्युट् हिरण। हिरण कहते हैं स्वर्ण वा वीर्य को हिरण + यत् स्वार्थे = हिरण्य। इसका अर्थ है- स्वर्णिम, चमकदार, आकर्षक। ह धातु भ्वादि उभय हरति-ते कर्म वा. हियते का अर्थ है-लेना, उठाकर ले जाना, लूटना, चुराना, छीन लेना, वञ्चित करना, मुग्ध करना, आकृष्ट करना, , जीत लेना, प्रभाव डालना, अधीन करना, वशीभूत करना, ग्रहण करना, प्राप्त करना ।

 √•गृ + भन् = गर्भ गर्भाशय, पेट, भ्रूण, गर्भस्थ बच्चा, अण्डशावक, किसी वस्तु का अभ्यन्तर भाग, मध्यभाग भीतरी भाग के अतिरिक्त अग्नि को गर्भ कहा गया है। गृ भ्वादि परस्मै गरति सेचने गीला करना, तर करना, सींचना अर्थ में तथा गृ विज्ञाने गायते समझना, जानना आत्मनेपदी धातु है। जो जानता है, सर्वज्ञ है, वह अग्नि / गर्भ है। जिसे गीला करते हैं, तर करते हैं, सींचते हैं वह भी गर्भ है। जल से उदर भरते हैं, वीर्य से गर्भाशय साँचते हैं। अतः ये दोनों पेट, योनि प्रकोष्ठ गर्भ हैं। 

 √•जो वीर्य से सींचा जाता है वीर्य रूप जल से तर गीला होता है वह हिरण्यगर्भ है। यह सृष्टि स्थान है, सृष्टि का मूल है। यह पृथ्वी हिरण्यगर्भा है। इस पर आकाश से वीर्यरूप जल की वर्षा होती है। इससे प्राणि समुदाय का आविर्भाव होता है सूर्य हिरणगर्भ है। यह अपनी रश्मियों से जल खींचता है। कुण्डली में पञ्चम भाव हिरण्यगर्भ है। इससे सन्तति का विचार किया जाता है। गर्भाधान/ संसेचन/निषेचन/निषेक की सफलता विफलता का ज्ञान पंचम भाव से ही होता है। संतान के लिये हिरण्यगर्भ विष्णु की कृपा अपेक्षित है। वेद कहता है...

"हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
 स दाधार पृथिवीमु॒त द्यां कस्मै देवय हविषा विधेम ॥"
          ( अथर्ववेद ४।२।७)

 [हिरण्यगर्भः समवर्तत अग्रे भूतस्य जातः पतिः एकः आसीत् । सः दाधार पृथिवीम् उत् द्याम् कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥]

 √•सम् + वृत् (स्थिती विद्यमानतायाम्) आत्मनेपद सह प्र. पु. एक व. अवर्तत।

 √•सम् + अवर्तत =समवर्तत ।
 = उपस्थित था।

√•अग्रे हिरण्यगर्भः सम्-अवर्तत= सबसे पहले/सृष्टि के आरंभ से पूर्व हरिण्यगर्भ / विष्णु विद्यमान था।

√• (हिरण्यगर्भः) भूतस्य पतिः जातः = हिरण्यगर्भ विष्णु भूतसमुदाय का स्वामी हुआ [ब्रह्मा के रूप में] जन् + क्त =जातः ।

√• (हिरण्यगर्भः) एकः आसीत् = वह हिरण्यगर्भ विष्णु एक/ अकेला था। [अस् लङ् प्र.पु. एक व. आसीत्]

√• सः दाधार पृथिवीम् उत द्याम् = उस (हिरण्यगर्भ विष्णु) ने पृथिवी तथा द्युलोक को धारण किया [बराह वा सूर्य रूप में]। दाधार : = अधत्त (घा आ. लङ् प्र. पु. एक व.)

 √•कस्मै देवाय हविषा विधेम = उस हरिण्यगर्भ विष्णु के लिये हम हविषु अर्पित करें। 

√•कस्मै= तस्मै। विधेम= दधामहै[ धा आ. लोट् व. उ. पु.]

√• देवाय = विष्णवे। विधेम =परिचरणकर्मा, (निघण्टु ३ । ५) हविष् = पुष्टान्न ।परिचरणम् = सेवा । 

√••कुण्डली के पञ्चम भाव में नैसर्गिक रूप से सूर्य की राशि सिंह होती है। सूर्य ही हिरण्यगर्भ है। सूयते स सूर्यः। सिंह तो विष्णु का पर्याय है हो। (विष्णु सहस्रनाम से)। अतः संख्या ५ वा पंचम भाव वा सूर्य = हरिण्यगर्भ । 

√•सूर्य = सु + उर् (ओरति गतौ) + यत् । जो सतत गतिशील हो वह सूर्य है। सूर्य हो आत्मा है। अत् अतति गतौ + मनिन् = आत्मन् । जो निरन्तर चलता रहता है, वह आत्मा है। इस प्रकार, पंचम भाव सूर्यज / आत्मज हुआ। कुण्डली में यह सन्तति के सन्दर्भ में विचारणीय है। सन्तान पक्ष का विचार करते समय क्या-क्या देखना चाहिये ? 

√•१. पञ्चम भाव का बलाबल । 

√•२. पंचम भाव के अधिपति की स्थिति ।

√• ३. सिंह राशि पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव । 

√•४. सिंहाधिपति सूर्य की स्थिति ।

√•५. पञ्चमात् पञ्चम अर्थात् नवम भाव । 

√•६. नवम का स्वामी अर्थात् भाग्येश की दशा।

√•७. गुरु से पाँचवाँ स्थान। 

√•गुरु पंचम एवं नवम भावों का कारक है। गुरु प्रज्ञा और धर्म है। सन्तान का तात्पर्य है- स्ववृद्धि ।

√•धर्म के बिना स्ववृद्धि नहीं होतीं। धर्म कराने वाला यह है-गुरु गुरु प्रबल होने पर भी सन्तान नहीं होती, ऐसा देखा जाता है। ऐसे जातक का सन्तान द्युलोक में होता है। भूलोक में सन्तान प्राप्ति हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ (महान प्रयत्न) करना होता है। ऐसे घर में महात्मा का अवतरण (जन्म) होता है। व्यक्ति अमरत्व प्राप्त करना चाहता है। वह अपने शरीर को नश्वरता को रोक नहीं सकता। इसके लिये वह स्त्री के गर्भ में बीज रूप से प्रवेश कर पुनः स्वयं जैसा गुणों वाला से कर उत्पन्न होता है। यह उसकी सन्तता/ अमरता है। यहाँ पुत्रेषणा है। जो ऐसा नहीं कर सकता पर अपने विचार एवं ज्ञान को अक्षुण्ण रखने के लिये किसी भी स्वानुरूप जातक को शिष्य के रूप अपनाता है। वह उस शिष्य में अपने संस्कारों का पात/ प्रत्यारोपण करता है है। इस प्रकार यह शिष्य उसका पुत्र ही होता है। शिष्य, पुत्र ही होता है। शिष्य-परम्परा, सन्तति-परम्परा जैसी होती है। जैसी पुजेपणा होती है, वैसी ही है। पञ्चम भाव से इसका भी विचार किया जाता है। पुत्र और शिष्य दोनों का कारक गुरु है।

√•विष्णु का नाम है- सुरानन्दः (विष्णु सहस्रनाम) सु + ग + ड= सुर। सु = अतिशय र= रा राति देता है। जो बहुत अधिक देता है, वह है सुर आनन्द आङ (समग्रतापूर्वक) + नन्द (सुख/प्रसन्नता)। जो हर प्रकार से अत्यधिक सुख प्रदान करता है, वह सुरानन्द है। यह पुत्र का पर्याय है। पुत्र को देख कर पिता प्रसन्न होता है। अथवा पुत्र अपने पिता को स्वसगुणों से सुख देता है। योग्य शिष्य अपने गुरु को बहुत सुख देता है। अतः सुरानन्द पुत्र वा शिष्य । सुरानन्द पति का पर्याय है। पति गर्भाधान की क्रिया में स्वी को अतिसुख देता है। इसलिये पति सुरानन्द है। 

√•गुरु अपने शिष्य को ज्ञान देकर सुख पहुंचाता है। इसलिये गुरु सुरानन्द है। निष्कर्ष यह निकला जिसे गुरु की इच्छा हो, शिष्य प्राप्त करने की इच्छा हो, पति पाने की कामना हो, पुत्र की ईहा हो, वह सुरानन्द नाम वाले विष्णु की उपासना करे। वह सुरानन्द विष्णु ही पुत्र है, पति है, गुरु है, शिष्य है। वह सुरानन्द विष्णु प्रजाओं का पालन करते हुए उन्हें सब प्रकार से सुख देता है। इसलिये वह प्रजापति है। वह ज्ञानदाता है। इसलिये गुरु है। स्त्रियों में पुत्र प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है। वह पति को पुत्र रूप में पाना चाहती है। पुत्र की प्राप्ति पुरुष को स्त्री से ही होता है। स्त्री को प्रकृति/ देवकी कहती हैं। दा (दाने) + इकिन्= देवकी। पुत्र से स्त्री को सुख मिलता है। अतः देवकीनन्दन नाम पुत्र का हुआ। देवकीनन्दनः =सुरानन्दः।  स्त्री को पति से जो सुख निषेचन क्रिया में से मिलता है, वही सुख उसे पुत्र द्वारा स्तनपान से मिलता है। स्त्री के स्तनों को सार्थकता तभी है जब उसमें दुग्ध उतरे और उसका पान पुत्र करे। रतिसुख को बराबरी करने वाला वात्सल्य सुख जिस नारी को प्राप्त होता है, वह धन्य है। सुरानन्दाय नमः । 

√•सूर्य और शनि परस्पर पिता-पुत्र हैं। दोनों एक दूसरे के आमने-सामने के घरों के निवासी हैं। सूर्य की मूलत्रिकोण स्वराशि सिंह है, जब कि शनि की मूलत्रिकोण स्वरशि कुम्भ है। सूर्य और शनि एक दूसरे के शत्रु हैं। लोक में भी देखा जाता है- पिता-पुत्र में पटरी नहीं खाती। ऐसा क्यों ? पिता के रूप में जातक भार्या का सम्पूर्ण सुख प्राप्त करना चाहता है। पुत्र के रूप में जातक माता का सम्पूर्ण सुख पाना चाहता है पुत्र होने पर स्त्री भार्या के रूप में वह सुख/सेवा अपने पति को नहीं दे पाती जो वह पुरोत्पत्ति से पूर्व देती है। सुख/ सेवा की हानि होने से पिता अपने पुत्र का विरोधी हो जाता है। दूसरी ओर, पुत्र चाहता है उसे सम्पूर्ण मातृ सुख/सेवा मिले। इसमें पिता बाधक होता है। अतः पुत्र अपने पिता का विरोधी हो जाता है। नारी एक है। उसकी सेवा लेने वाले दो हैं। विरोध तो होगा ही । दूसरा कारण, पुत्र होने पर स्त्री के यौवन की हानि होती है। पिता के रतिसुख में कमी होने से वह पुत्र का विरोधी होता है। स्वरक्त होने से पिता के मन में पुत्र के प्रति मोह होता है। पिता का पुत्र के प्रति प्रेम गुणों के कारण होता है। किन्तु मोह में गुणों का कोई स्थान नहीं है। पुत्रासक्ति रखने वाला पिता धृतराष्ट्र/ अन्धा है। उसकी दुर्दशा होनी है।
"ईश्वरोऽसि जगन्नाथ ततः परम उच्यते जरामरणमोक्षार्थं त्वां प्रपन्नोऽस्मि सर्वशः।।"

आर्षेय पंडित जी के प्रति सभी दिशाओं से मेरा अनन्त प्रणाम !

√•जैसे १४ रत्नों का आकर समुद्र बिना दृड़ पोत के पार नहीं किया जा सकता, वेसे १४ सूत्रों का ग्रंथिल पाश बिना भगवत्कृपा के खोला नहीं जा सकता। सत्य भाष्य के आलोक में मैं इस ग्रंथि का निर्बन्धन कर रहा हूँ। इस प्रक्रिया का दृश्य सत्य के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं उस सत्य की शरण में हूँ। सत्य के आवेश से अनुप्राणित मेरा अन्तःकरण केवल सत्य का उत्सर्जन करे। सत्य के ओज से आप्लावित मेरा बहिष्करण केवल सत्य का प्रदर्शन करे। सत्य के देवता को मेरा प्रणाम । वाणी ४ प्रकार की होती है परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी। जिसके मुख से चारों प्रकार की वाणी का उद्भव होता है, वह चतुरानन कहलाता है। मैं ऐसे चतुरानन नाम ब्रह्मा की स्तुति करता हूँ । वाणी ५ स्थानों से उत्पन्न होती है-कण्ठ मूर्धा तालु दन्त ओष्ठ। जिसके मुख के इन पाँचों स्थानों से वाणी का उद्गम होता है, वह पंचानन वा पंचवक्त्र कहलाता है। ऐसे पंचानन नाम शिव का मैं स्तवन करता हूँ । वाणों का सम्प्रसारण चराचर जगत के प्रत्येक अंश से हजार रूपों में सतव होता रहता है। ऐसे विश्वरूप महत् स्रोत को सहस्रमुख कहा जाता है। मैं सहस्रमूर्धा नाम विष्णु का स्मरण करता हूँ । हर प्रकार की वाणी के जनक ये १४ सूत्र हैं। चतुर्दश सूत्र बाह्य कुछ है ही नहीं। संस्कृत ही नहीं संस्कृतेतर भाषाएँ भी इसी से परिनिष्ठ होकर फूल-फल रही हैं। एक शब्द में कहा जाय तो सब कुछ अल् है, अल से है, अल् में है। 

√•अल् = अ इ उ...... श ष स(:) ल्।

  √• चर्तुदश सूत्र वर्तमान काल एकवचन प्रथम पुरुष कथनार्थे, बोलना अर्थ में अल, प्रत्याहार यह विश्व, परमात्मा का साक्षाद् विग्रह है- "सर्वं खल्विदं ब्रह्म।" इससे प्रतिक्षण अल् का कथन किसी न किसी रूप में होता रहता है। इसलिये इस संसार को 'अल्'' कहते हैं। यह संसार शिव वा विष्णु रूप है। अतः शिव को अल् कहते हैं।  प्रत्यक्षतः वाक् ब्रह्म का पर्यायवाची शब्द अल् है। शिव से अल प्रत्याहार प्रस्फुटित हुआ है, शिव अल् हैं। शिव के उपासक शैव हैं। पौराणिक आख्यानों के परिप्रेक्षय में अधिकतर असुर शैव हैं। शिव वैष्णव हैं। मरुभूमि वा द्वीपों में रहने वाले असुर हैं, पर्वतों वा शस्यश्यामला भूमि पर रहने वाले सुर हैं। सुर संस्कृत बोलते हैं, असुर संस्कृत का अपभ्रंश रूप बोलते हैं। अरबी भाषा संस्कृत का भ्रष्ट रूप है। आधुनिक समय में असुरों को म्लेच्छ संज्ञा दी गयी है। संस्कृतेतर भाषाओं को म्लेच्छ भाषा कहा गया है। मलं इच्छति स मलेच्छः मलिच्छः म्लेच्छः वा। असभ्य, असंस्कृत, अशुद्ध लोग जो स्वभावतः मलाभिमुख होते हैं, मलिच्छ हैं। मलिच्छों की भाषा अस्पष्ट होती है। उच्चारण अशुद्ध होता है। संस्कृत से दूरतर होने के कारण ऐसा है जो भाषा संस्कृत के जितना निकट है, वह उतनी ही शुद्ध एवं स्पष्ट है। मात्र संस्कृत भाषा ही सुरवाणी वा देववाणी है। इसे बोलने वाले देव वा देवता हैं। 

√•असुरराट् रावण वाग् ब्रह्म शिव की स्तुति करता है ...
"डमड्डमड्डमड्डमड् निनाद मर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्।"
     
√• शिव का यह नृत्य अहर्निश होता रहता है।  आचार्य रावण का ध्वनि प्रवर्तक अल्लाह शिव के प्रति यह कथन द्रष्टव्य है "धिमिद् धिमिद् धिमिद् ध्वनन् मृदंग तुंग मंगल ध्वनि  क्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः।"

√•१४ की संख्या और वाणी में क्या संबंध है ? अब इस पर विचार कर रहा हूँ। १४=६+८।वाणी में ६ भाव वा विकार होते हैं-काम भाव क्रोध भाव, मोह भाव, लोभ भाव, सदभाव, सतार भाव। वाणी ८ स्थानों से प्रोद्भूत होती है-उर, कण्ठ, शिर, जिहामूल, दाँत, नासिका, ओष्ठ, तालु।

√•भाव ६ से द्वितीय भाव नवम है। अतः भाव ६ का भाग्य स्थान, द्वितीय भाव हुआ। षडि्विकार द्वितीय स्थान से फलते-फूलते हैं। 

√•भाव ८ से द्वितीय भाव सप्तम है। अतः भाव आठ पर प्रहार होने से उसके सामने द्वितीय भाव से जो ध्वनि निःसृत होती है, वह आठ स्थानों से निकल कर आठ वर्गों में विभक्त होती है। ये वर्ग है-अवर्ग, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, वर्ग, पवर्ग, यवर्ग, शवर्ग ।

√•इस तथ्य को अन्य प्रकार से भी समझा जा सकता है-वाणी (भाव २) से पंचम स्थान पर ज्ञान स्थान, भाव ६ है अतः वाणी का ज्ञान भाव ६ वा संख्या ६ से होता है। वाणी (भाव २) से सप्तम स्थान वा विवाह स्थान भाव ८ है। अतः वाणों के प्रोद्भवन में भाव ८ वा संख्या ८ का महत्वपूर्ण योगदान है। ६ की संख्या, वाणी का गर्भाशय है, भाव २ से पंचम होने के कारण। ८ की संख्या, वाणी का मैथुनालय है, भाव २ से सप्तम होने के कारण। संख्या ६ से वाणी वृद्धि एवं पुष्टि को प्राप्त होती है।

√•संख्या ८ से वाणी की नींव पड़ती है-वाणी जन्म लेती है। इसलिये ६+ ८= १४ सूत्र, अल्लाह शिव द्वारा उत्पन्न किये गये हैं। चतुर्दशाधिपतये नमः ।

√• वाणी में अन्तर्निहित काम भाव की प्रतिष्ठा होती है-विष्णु में "धर्माविरुद्ध कामोऽस्मि ।" इसी प्रकार वाणी में वर्तमान क्रोध भाव का अधिष्ठाता रुद्र है। मोह भाव का प्रतिष्ठापक अन्धक दैत्य है। शिव को अन्धकान्तक कहा गया है। लोभ भाव का समावेश होता है यक्षराज कुबेर में वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । मद भाव का उत्स है- भस्मासुर स्वयं के द्वारा ही इसका नाश होता है। वाणी में प्रस्यूत मत्सर भाव का स्थापकदेवता इन्द्र है। मोह और मद को आसुरी भाव कहते हैं। मोह बाँधता है। मद मारता है। मोहं बध्नाति । मदं छिन्दति छिनत्ति वा । 

√•जीव मोह से अपने को बांधता है, मद से अपनी मृत्यु बुलाता है। मोह भाव और मद भाव परस्पर मिलकर महाबन्धनकारी एवं महामारक बनते हैं। 'मोहम् मदम्' भाव जिस जीव में प्रचुर रूप से विद्यमान होता है, असुरगणों में इन दो भावों का विशिवेश होता है। वे लोग मोहम्मदम् भाव का आदर करते हैं और उस व्यक्ति का सम्मान करते हैं अथवा उस व्यक्ति की आधीनता ग्रहण करते हैं जो इन दो भावों से आवेशित होता है। इन भावों से आवेशित व्यक्ति मोहम्मद होता है। मोहम्मद शब्द जितना संस्कृत है उतना ही अरबिक है। इस शब्द का संक्रमण संस्कृत से अरबो भाषा में हुआ है। देवी दृष्टि से मोहम्मद पुण्य है, आसुरी दृष्टि से पूज्य है मान्य है समाद है। कहा गया है...
"वाण्येका समलंकरोति पुरुषं, या संस्कृता धार्यते।"

√• मैं इस संस्कृत वाणी को धारण करने के लिये संस्कृतज्ञों की शरण में आ रहा हूँ, संस्कृत के अनभिमानी पण्डितों की पादरज को अपने मस्तक पर धारण कर रहा हूँ, संस्कृत वाङ्मय के मूर्धन्य विद्वानों की कृपा दृष्टि प्राप्त कर प्रयाग की त्रिपथगा में मज्जन कर रहा हूँ तथा संतों का सेवक बन कर इतस्ततः इस धरती पर चर रहा हूँ।

√• एक बार फिर आपके चरणोंमें प्रणाम करते हुए परमात्मा की गोद में आराम करने जा रहा हूँ।

√•शिव परम वैष्णव हैं, सबके गुरु हैं, ज्ञानदाता हैं। शिव की जय हो। ज्ञान गंगा का प्रवाह शिव-पार्वती के संवाद के रूप में अनादि काल से चला आ रहा है। ज्ञान की इस गंगा में स्नान करने वालों की जय हो। इस गंगा के तट पर मैं रह रहा हूँ। यह गंगा पाखण्डियों पापियों के स्पर्श से दूषित होती रहती है। साधु-सन्तों के मज्जन करने से यह शुद्ध होती रहती है। इस शुद्ध गंगा के जल का पान करने वालों को मैं प्रणाम करता हूँ। जिसके भीतर यह गंगा है, वह गुरु है। जिसके सिर पर यह गंगा है, वह गुरु है जिसके मुख में यह गंगा है, वह गुरु है जिसकी आँखों में यह गंगा है, वह गुरु है ऐसे गुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ । 

√• [गुरु मुख में नाद (शब्द) है। गुरु मुख में वेद (ज्ञान) है। गुरु मुख में सब विश्व समाया हुआ है। गुरु ईश्वर है। गुरु गोरस (गंगा) है। गुरु ब्रह्मा है। गुरु माता पार्वती (मूल प्रकृति) है ।] 

√•परम गुरु ज्ञान वृद्ध होता है। उसकी देह दिव्य होती है। वह सतत युवा होता है। वह मौन उपदेश करता है। वृद्ध शिष्यगणों का संशय नष्ट करने में वह समर्थ होता है।

"चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥"
              (शंकराचार्य )

 √•ऐसे गुरु को दक्षिणामूर्ति कहा जाता है। जो मूर्तिमन्त है तथा उपदेश देने में दक्ष (कुशल) है, उसका नाम दक्षिणामूर्ति है।

 "ओं नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये ।
 निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ॥
 निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।
 गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥" 
              (शंकराचार्य)

√•जिससे संदेह रहित ज्ञान प्राप्त हो, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। जिसके भीतर का ईश तत्व जितना विकसित होता है, उसमें उतना ही गुरुत्व होता है। पूर्ण विकसित होने पर वह ईश्वर होता है। ईश्वर गुरु है। यह विकास तप से सम्भव होता है। तपी गुरु है। तपस्वी गुरु है। तप का स्वरूप निर्माणात्मक होता है, ध्वंसात्मक नहीं। बिना तप के निर्माण असंभव है। उदाहरणार्थ मिट्टी में पानी डाल कर उसे पैरों से रौंदा जाता है। इसके बाद चाक पर रख कर उसे पट का रूप दिया जाता है। फिर सुखाया जाता है। तब अग्नि में रख कर तप्त किया जाता है। इस प्रकार बना हुआ घट अपने भीतर पानी को धारण करने में समर्थ होता है। पानी भर जाने पर वह घट कलश रूप में पूज्य होता है। अन्य उदाहरण- बाँस काटा जाता है। फिर उसे तपा कर सीधा किया जाता है। पुनः उसमें छिद्र किये जाते हैं। इतना कष्ट सहने के पश्चात् वह वेणु (बाँसुरी) के रूप में ओठों पर रखा जाता है। भगवान् कृष्ण के अधरामृत को पौने का सौभाग्य बाँसुरी को मिलता है। यह तप का फल है। बाँस तप कर के बाँसुरी बन कर पूज्य हो जाता है। जैसे बाँसुरी के मध्य में पोलास्थान (शून्य) होता है, वैसे ही जिसका हृदय छल कपट से शून्य होता है, वह तपस्वी भगवान् को प्रिय है। तीसरा उदाहरण- स्वर्ण को अग्नि में डाला जाता है। इससे उसको मैल जल जाती है। और उसमें चमक आ जाती है। पुनः इस स्वर्ण को गलाकर गर्म कर, ठोक पीट कर विभिन्न आकार देते हैं। ये आकार आभूषण के रूप में सुन्दरियों के नाक, कर्ण, कण्ठ, मस्तक पर शोभायमान होते हैं। इससे स्वर्ण का महत्व/मान बढ़ता है। यह तप का फल है। मनुष्य के सन्दर्भ में तप का अर्थ है-व्रत उपवासादि / प्रायाश्चित। जो संकल्प के साथ नियम पूर्वक भगवत् परायण होकर अपने शरीर को तपाता है, मन को तपाता है, इन्द्रियों को तपाता है, वह तपी है। सहर्ष कष्ट का वरण करना अथवा सुखोपभोग से अपने को विलग रखना ही तप है। इससे शरीर का मल जल जाता है, मन की मैल मिट जाती है, चित शुद्ध हो जाता है। मल= पाप पाप नाश का एक मात्र उपाय है, तप तप से पाप जलता है। पापहीन होने से व्यक्ति महत्व को प्राप्त होता है।

√• असत्य भाषण न करना, अप्रिय वचन न बोलना, अत्यधिकि न बोलना वाणी का तप है। मौन रहने से वाक् सिद्धि मिलती है। 

√•दोष दर्शन से परे रहना, आँखें आधीमुदी रखना, दृश्य के पीछे आँखें न दौड़ाना नेत्रों का तप है। आँखों पर पट्टी बाँधने से चक्षु सिद्धि मिलती है। गान्धारी को यह सिद्धि प्राप्त थी ।

 √•मन की चञ्चलता का निरोध करके उसे एकाम करना मानस तप है। मानस तप से संकल्प की सिद्धि होती है। 

√•अल्पाहार करना, अस्वाद भोजन करना, विवस्त्र रहना वा अत्यल्पवस्त्र पहनना, शीत-उष्ण प्रभाव सहन करना, ब्रह्मचर्य, पवित्रता शारीरिक तप है। शारीरिक तप से आरोग्य एवं दीर्घायु की प्राप्ति होती है। कायिक, बाचिक, मानसिक तप से हर प्रकार का कल्याण होता है। तप से निः श्रेयस की प्राप्ति होती है। तपी ब्राह्मण पूज्य होता है। ऐसे ब्राह्मण को मैं प्रणाम करता हूँ ।

 √•आशीर्वाद देने से तथा शाप देने से तप की हानि होती है। अतः तपी के लिये उदासीन वृत्ति श्रेयस्कर है। अवधूत साधु इसी कोटि में आते हैं जैसे-जड भरत, शुकदेव, दत्तात्रेय ।

√•तप का पर्याय है, अग्नि। अग्नि स्वयं तपता है तथा अपनी आँच से दूसरों को तपाता है। अतः तपी अग्निमय होता है। अपने भीतर की अग्नि को प्रज्ज्वलित करना तप है। इस अग्नि को छिपाये रखना तप है। किन्तु अग्नि छिपती नहीं। जो लोग अपने तेज को बाहर प्रकट होने नहीं देते, वे धन्य हैं। ऐसे तपी को मेरा प्रणाम ! 

√•अग्नि के तीन रूप हैं- जठराग्नि, वडवाग्नि, दावाग्नि। इन तीनों अग्नियों के ताप को जो सहन करता है, वह तपस्वी है। कुण्डली में इन अग्नियों के स्थान नियत हैं।

√•कुण्डली में दूसरा भाव मुख है। मुख में जिहा होती है। वडवा नाम जिहा का। जिहा स्वादेन्द्रिय है। 

√•रस से स्वाद की अनुभूति होती है। रस तनमात्र की उत्पत्ति रूप से होती है। रूप तन्मात्र से अग्नि की सृष्टि होती है। अग्नि से जल की सृष्टि होती है। इस प्रकार जिह्वा में विराजमान अग्नि रस वा जल रूप लार टपकाता रहता है। जिह्वास्थ अग्नि भोजन के रस को पाने के लिये सतत उद्यत रहती है। यह अग्नि कभी शान्त नहीं होती। इसके कारण व्यक्ति बिना भूख के स्वाद के चक्कर में उदर को भरता जाता है। इससे उदर की अग्नि कुपित होती है, मन्द पड़ती है। इसका फल होता है- अग्निमान्द्य। यह व्याधि का मूल है। कुण्डली में पाँचवाँ भाव आमाशय है। आमाशय की भीतरी दीवारों में असंख्य जठर पन्थियाँ होती हैं। इनसे जठर रस निकलता है। यह रस पाचक है। आमाशयस्थ अग्नि को जठराग्नि कहते हैं। इससे भूख लगती है। जठराग्नि एवं वडवाग्नि में धनिष्ठ संबंध है। इन दोनों अग्नियों में संतुलन की स्थिति समाप्त होते ही रोगोत्पत्ति होती है वडवाग्नि के आधिक्य से जठराग्नि मन्द पड़ती है।

 √•जठराग्नि के मन्द पड़ते ही अरुचि/स्वादहीनता आती है। इस असंतुलन के कारण जिड़ा में छाले पड़ते हैं। इतना ही नहीं, वडवाग्नि और जठराग्नि के संघर्ष के फलस्वरूप मुख और पेट दोनों बिगड़ जाते हैं। दाँतों की जड़ें हिल जाती हैं, आँखों की ज्योति क्षीण होने लगती है, पेट भारी हो जाता है और स्फूर्ति चली जाती है। पेट के अन्दर अग्न्याशय, पित्ताशय, आमाशय, पक्वाशय होते हैं। इनमें व्याप्त अग्नि को व्यापक रूप से जठराग्नि कहते हैं। अग्न्याशय, पित्ताशय (यकृत), पक्वाशय (आंत्र), जठराशय से निकलने वाला रस पित्तज होता है। इस रस की कमी से कान के पर्दे पर कफ जमा हो जाती है जिससे कम सुनाई देता है, नाक में कफ बढ़ जाती है जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है, ओठों पर श्वेतता का आगमन होता है, उच्चारण दोष उत्पन्न होता है। वात पित्त कफ- ये तीनों अग्नि के स्वरूप है। बात पिता है, अग्नि का। कफ पुत्र है, अग्नि का। पित्त स्वयं अग्नि है। वात का तन्मात्र स्पर्श है। पित्त का तन्मात्र रूप है। जल का तन्मात्र रस है। 

√•१. शब्द= शब्द (वाणी) 

√•२. स्पर्श =वात (वायु) उपस्थस्थानी (सप्तम भाव)। 

√•३. रूप= पित (अग्नि) उदर स्थानी (पंचम भाव)।

√• ४. रस =कफ (जल) मुख स्थानी (द्वितीय भाव ) ।

 √•५. गन्ध =पुरीष (ठोस)

 √•स्पर्श तन्मात्र रस का पितामह है, रूप का पिता है। अथवा, वात तत्व/ धातु कफ का पितामह है, पित्त का पिता है।

√•इन तीनों अग्नियों में दावाग्नि सबसे बली है। यह उपस्थस्थानी है। यह घर्षण जन्य महान् सुख की अधिष्ठात्री है। शिश्न की बाह्य दीवार तथा योनि की भीतरी दीवार के परस्पर सघन स्पर्श से इस अग्नि की उत्पत्ति होती है। यह काम / मैथुन सुख की जनयित्री है। इस अग्नि का सेवन करने के लिये सारा संसार सतत लालयित रहता है। जो इस पर विजय पाता है, वह तपी है। मैं ऐसे तपी को प्रणाम करता हूँ। 

√•मुख कफ प्रधान है। पेट पित्त प्रधान है। उपस्थ वात प्रधान है। मुख ऊर्ध्व भाग में है। पेट मध्य क्षेत्र में है। उपस्थ अधोस्थानी है।

 √•१. मुख में कफाग्नि / रसाग्नि / जिह्वाग्नि / वडवाग्नि का निवास है। इस अग्नि में पड्स की आहुति दी जाती है। फिर भी यह अग्नि शान्त नहीं होती। यह अग्नि कटु तिक्ति अम्ल लवण कषाय मिष्ठ समिधाओं से प्रसन्न होती है। इन समिधाओं से मुख में हवन न करना वा अस्वाद रस लेना तप है। केवल पानी पीकर रहना एक तप है।

√• २. पेट में पित्ताग्नि / जठराग्नि / रूपाग्नि / पचनाग्नि का निवास होता है। इसमें अन्न ही आहुति दी जाती है। इस अग्नि को प्रसन्न करने के लिये अन्न खाना अनिवार्य है। यह अग्नि मृत्यु होने पर ही बुझती है। अन्न न खाना अर्थात् उपवासन/ अनशन पेट का तप है। यह दूसरा तप है।

 √•३. गुह्य स्थान में वातग्नि / स्पर्शाग्नि / मैथुनाग्नि / कामाग्नि का वास होता है। इसमें पुरुष और स्त्री  क्रमशः वीर्य और रज का हविष डालते हैं। इससे यह अग्नि प्रसन्न होती है/तृप्त होती है/ शान्त होती है, किन्तु बुझती नहीं यह घर्षणाग्नि दावाग्निसृष्टि का हेतु है। बिना इसके संतति वृद्धि नहीं होती। सभी प्राणी इस अग्नि की चपेट में हैं। मैथुन न करना/ वीर्य वा रज का क्षयन न करना तीसरा तप है। लोक में इसे ब्रह्मचर्य कहते हैं। सूर्य ब्रह्मचारी है।

 √•संसार में बिना तप किये कोई महान् सुख नहीं प्राप्त होता । 

"नातप्ततपसो लोके प्राप्नुवन्ति महासुखम्।"
         ( वनपर्व २५९ । १३)

 √•तप के द्वारा महान की प्राप्ति होती है।

"तपसा विन्दते महत्।"
   (आश्रमपर्व ३६ । २९ )

√•इस कर्मभूमि में जन्म लेकर जो मनुष्य तप नहीं करता, वह भाग्यहीन है, अभागा है।

"प्राप्येमा कर्मभूमिं न चरति मनुजो वस्तपो मन्दभाग्यः ।"
      (भर्तृहरिनीति शतक १०१)

 √•तप के प्रभाव को दबाना वा तप का अतिक्रमण करना कठिन है। 

"तपो हि दुरतिक्रमम् ।"
  ( मनुस्मृति १२ । २३९)

 √•तप का अभियान करने से तप का प्रभाव क्षीण होता है। 

"तपः क्षरति विस्मयात् ।"
 ( मनुस्मृति ४ । २३६)

√• इस सारे दैव और मानुष जगत् का मूल तप ही है।

 "तपोमूलमिदं सर्वं दैवमानुषकं जगत्।"
         (मनु. ११ । २३३ )

√•तप कर के सब कुछ पाया जाता है, बहुत बातें करने से क्या होता है ?

 "तपसा लभ्यते सर्व प्रलापः किं करिष्यति।"
          (शान्तिपर्व १५३ । ३४)

√• इन्द्रियों का संयम करने से ही तप होता है, अन्यथा नहीं ।

"इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नाऽन्यथा।"
                 ( पञ्चदशी)

 √•घर में ही रहते हुए पाँचों इन्द्रियों को वश में रखना तप है। 

"गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रस्तपः ।"
        ( हितोपदेश ४।८५ )

√•शिवजी कहते हैं-हे पार्वती । सम्पूर्णि सृष्टि का आधार एक मात्र तप है। गोस्वामी जी के शब्दों में...

 "तप अधार सब सृष्टि भवानी !"
    ( बालकाण्ड, रा. च. मा.)

√•तप सुख देने वाला तथा दुःखों का नाश करने वाला होता है।

 "तपु सुखप्रद दुःख दोष नसावा।" 
     ( बालकाण्ड, रा. च. मा. )

√• जब तक तीन अग्नियों के स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता, तब तक तप का प्रत्यय समझ में नहीं आता । तप का बोध होते ही व्यक्ति तपारूढ़ होता है, तप में प्रतिष्ठित होता है। ऐसे तपोमूर्ति श्री पं. जी महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मुझसे तप विषयक प्रश्न पूछा। उस प्रश्न के उत्तर में मैंने यहाँ वह सब लिखा, जो मुझे दृष्टिगत हुआ। अग्निदेव तप से प्रसन्न होते हैं। मैं अग्नि की शरण में हूँ ।

√●●शिव ज्ञान के जनक हैं। पार्वती ज्ञान की जननी हैं। पार्वती प्रश्न पूछती हैं। शिव प्रश्नों का उत्तर देते हैं। इससे ज्ञान रूप संतति का विस्तार होता है। शिव और पार्वती का ज्येष्ठ पुत्र है, ज्ञान। इसके बाद दूसरा पुत्र हुआ, भक्ति। यह कन्या है। ज्ञान पुरुष है, भक्ति स्त्री है। शिव जी स्वयं पुरुष हैं। शिव जी साक्षात् वैराग्य है। पार्वती स्वयमेव श्रद्धा है, श्री हैं। विष्णु का यही चतुरात्मक रूप है।

 【शिव = ब्रह्म पुरुष = वैराग्य- १,
 पार्वती मूल प्रकृति = = श्रद्धा-२, 
(शिव + पार्वती),
 पुत्र = ज्ञान ३ ,
पुत्री= भक्ति ४】

√★  जहाँ वैराग्य है, श्रद्धा है, वहाँ निश्चय ही ज्ञान है, भक्ति है। इन चारों का एक स्थान में पाया जाना ही वैष्णवत्व है। विष्णु के इस चतुर्भुजात्मक रूप को मेरा प्रणाम ।

√★जिस पुरुष में वैराग्य है, वह शिव है। जिसमें श्रद्धा है, वही पुरुष पार्वती है। वैराग्य + श्रद्धा =अर्धनारीश्वर पुरुष जिसमें ज्ञान है, वही पुत्रवान् है ज्ञानहीन= पुत्रहीन ।पुत्रहीन की गति कहाँ ? ज्ञानहीन नरक का अधिकारी है भले ही वह अपने वीर्य से सैकड़ों पुत्रों को पैदा किया हो। भक्तिहीन =पुत्री विहीन। पुत्री नहीं है तो कंन्यादान किसका किया जाय ? पुत्रीविहीन पुरुष सुखी नहीं होता। भक्ति रूपी केन्या का विवाह भगवान् विष्णु से करने वाला व्यक्ति अमित सुख का भागी होता है। अविवाहित वा कन्याहीन होते हुए जो भगवान् विष्णु को भक्ति भाव से भजता है, वह पुत्रीवान् होने का सुख पाता ही है।

√★ जिस पुरुष में वैराग्य नहीं है, वह अशिव वा अमंगल कारक है, लतखोर है। संसार उसे लात मारता है। जिस पुरुष में श्रद्धा नहीं है, वह स्त्री विहीन / विधुर है। उसे स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता। जहाँ ये दोनों वैराग्य एवं श्रद्धा है, वह पुरुष अर्धनारीश्वर शिव है। उसे मेरा प्रणाम । जहाँ वैराग्य एवं श्रद्धा है, वहाँ ज्ञान एवं भक्ति होगी ही। इन चारों वैराग्य, श्रद्धा, ज्ञान, भक्ति का एक साथ होना पूर्णता है। ऐसा पूर्ण पुरुष विष्णु है। ऐसे विष्णु को मेरा प्रणाम ! जहाँ ये चारों नहीं, उस महापापी को भी मेरा प्रणाम ! इन चारों से विहीन कोई नहीं होता। कुछ न कुछ मात्रा में ये चारों सब में होते हैं। इन चारों के बीजों को अंकुरित करके इन्हें अभिवृद्ध करने वाला गुरु है। ऐसे सदुरु को मैं प्रणाम करता हूँ। गुरु कैसा है, कौन है ? पृथ्वी कहती है...

 "अग्निसुवर्णस्य गुरुर्गवां सूर्यः परो गुरुः ।
 ममाप्यखिल लोकानां गुरुर्नारायणे गुरुः ॥ १ ॥
 प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा पूर्वेषामपि पूर्वजः ।
 कलाकाष्टानिमेषात्मा कालश्चाव्यक्तमूर्तिमान् ॥ २ ॥
 आदित्या मरुतस्साध्या रुद्रा वस्वाश्विवह्नयः ।
 पितरो ये च लोकानां स्रष्टारो ऽत्रिपुरोगमाः ॥ ३ ॥
 ग्रहर्क्षतारकाचित्रगगनाग्निजलानिलाः । 
अहं व विषयाश्चैव सर्व विष्णुमयं जगत् ॥ ४ ॥ 
तथाप्यनेक रुपस्य तस्य रूपाण्यहर्निशम् ।
 बाध्यबाधकतां यान्ति कल्लोला इव सागरे ॥ ५ ॥ " 
            (श्री विष्णु पुराण ५/१)

 √★जिस प्रकार अग्नि सुवर्ण का तथा सूर्य गो (किरण प्रकाश) समूह का परम गुरु है, उसी प्रकार सम्पूर्ण लोकों के गुरु श्री नारायण मेरे हैं। वे प्रजापतियों के पति और पूर्वजों के पूर्वज ब्रह्माजी हैं तथा ये ही कला-काष्ठा-निमेष-स्वरूप अव्यक्त मूर्तिमान काल हैं। आदित्य, मरुद्रण, साध्यगण, रुद्र, बसु, अग्नि, पितृगण और अत्रि आदि प्रजापति-ये सब अप्रमेय महात्मा विष्णु के ही रूप है। यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, सर्प, दानव, अप्सरा, गन्धर्व आदि भी महात्मा विष्णु के रूप हैं। मह, नक्षत्र तथा तारागणों से चित्रित आकाश, अग्नि, जल, वायु में (पृथ्वी) और इन्द्रियों के सम्पूर्ण विषय-यह सारा जगत् विष्णुमय ही है। तथापि उन ㄢ अनेकरूपधारी विष्णु के ये रूप समुद्र की तरंगों के समान रात दिन एक दूसरे के बाध्य बाधक (विरोधी) होते रहते हैं।

√★पृथ्वी हमारी माता है। पृथ्वी के गुरु नारायण हैं। इसलिये हमारे भी गुरु नारायण हैं ये नारायण सब के हृदय में बैठे हैं। शरीर रूप रथ का संचालन करते हैं। अर्जुन जीव है, रथ शरीर है, जीवन कुरूक्षेत्र है। इस कुरूक्षेत्र (कर्मक्षेत्र) में जीव का प्रेरक मार्गदर्शक अन्तर्यामी कृष्ण है। जो इसके कहे अनुसार चलता है, वह महाभारत रूप भीषण जीवन संग्राम में विजयी होता है। इसके लिये प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह स्वतः प्रमाण है। यह कृष्ण सबके हृदय में (हृदिसंनिविष्ट:- गीता) है। जो पुरुष तप करता है उसमें यह अपनी विभूतियों सहित प्रकट होता है और वह गुरु के रूप में लोक में ख्यात होता है। भगवान् के असंख्य 'गुरु' अवतार हैं। सभी गुरु नारायण के रूप अंश है। ऐसे नारायण रूप श्री महाराज जी को सब लोग प्रणाम करते हैं। जैसे अपनी आँख को जातक अपनी आँखों से नहीं देखता और यदि देखता है तो दर्पण में अपनी आँख के प्रतिबिम्ब को ही देखता है, वैसे जीव अपने भीतर के गुरु को नहीं देख पाता, दूसरे के हृदय में अवतीर्ण कृष्ण रूप गुरु को देखता है, मानता है और उसे नमन करता है। भगवान् विष्णु को इस गुरु लीला को कौन समझ सकता है ? भगवान् कहते हैं-

 "ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्य हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।"
            (गीता १३/१७ )

"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो 
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं महोपनं च । " 
             (गीता १५/१५ )

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।"
            ( गीता १८/६१)

√★इससे सिद्ध है, गुरुदेव सब के हृदय में छिपे बैठे हैं। अतः सभी चारचर प्राणी गुरु हुए। किन्तु सदुरू सभी नहीं हैं जो नारायण से अपने को अपृथक् समझता है, वह श्रोत्रिय ब्रह्मविद् ब्राह्मण ही सद्गुरु है। अन्या ऐसे गुरु को नहीं देखता। गुरु का ज्ञान से अभिन्न सम्बन्ध है। ज्ञान दो प्रकार कहा है- शाश्वत ज्ञान, परिवर्तनशील ज्ञान । शाश्वत ज्ञान दो प्रकार का है- आत्मा का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान। व्यवहार का ज्ञान वा लौकिक ज्ञान परिवर्तनशील है। गुरु में सम्पूर्ण ज्ञान अध्यात्मिक, आधिदैविक एवं भौतिक तीनों होते हैं। ऐसा गुरु पूर्णगुरु है। पूर्णगुरवे नमः। पूर्ण गुरु का मिलना चरम लाभ है। सद्गुरु का मिलना अमित लाभ है। गुरु की सम्प्राप्ति = एकादश भाव की सिद्ध। एकादशेश / एकादशस्थ ग्रह / एकादश दृष्ट मह/ एकादशेशयुत् दृष्ट मह के अनुरूप जातक को वर्तमान जीवन में गुरु मिलता है।

√★वास्तव में व्यक्ति के रूप में भगवान् ही गुरु हैं। इसलिये मानवतनधारी गुरु को साक्षात् नारायण समझ कर उसे नमस्कार करना चाहिये। एक नारायण अनेक शरीरों में रहता हुआ अनेक है। अतः गुरु एक है, गुरु अनेक हैं। जिस गुरु के शासन में जो रहता है, वह उसका शिष्य है। शिष्याय नमः ।

√★ शिवजी आदि गुरु हैं। आदिगुरुवे नमः । पार्वती जी प्रथम शिष्य हैं। प्रथमशिष्याय नमः । शिव ने पार्वती को रामतत्व का उपदेश दिया। गोस्वामी तुलसीदास की भाषा में- 

"राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी । 
सर्वरहित सब उर पुर बासी ॥
 राम सो परमातमा भवनी।
तहँ भ्रम अति अविहित तव बानी ।।
 राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी।
मत हमार अस सुनहि सयानी ॥
 राम ब्रह्म व्यापक जग जाना। 
परमानन्द परेस पुराना।
सब कर परम प्रकासक जोई। 
 राम अनादि अवधपति सोई।"  
          (बालकाण्ड)

√★【राम ब्रह्म है, चिन्मय हैं, अविनाशी है, सर्वरहित हैं, सब के हृदय में रहता है। हे भवानी । वह राम परमात्मा है। उस राम के विषय में भ्रम का होना तुम्हारे लिये अनुचित है। राम तो मन बुद्धि और वाणी से अतर्क्य है। ऐसा मेरा मत है, सुनो। राम व्यापक है, जगत् है, ब्रह्मज्ञान है, परमानन्द है, परेश है, पुराण है जो सबका परम प्रकाशक है, वही अनादि राम अवधपति है।】

√★ राम से विमुख व्यक्ति को स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। कहते हैं-

 "राम विमुख सिधि सपनेहु नाही।"
          (अयोध्याकाण्ड )

 √★राम से विमुख रहने वाले को सम्पत्ति लाभ नहीं होता। विभीषण, रावण को फटकारता है...

 "राम विमुख सठ चहासि सम्पदा ?" 
             (लंकाकाण्ड )

√★हे शठ । तू राम से विमुख रहकर सम्पत्ति की इच्छा करता है ? सम्पत्ति का अर्थ देवी सम्पदा से है । ज्ञान वैराग्य श्रद्धा भक्ति ये चार दैवी सम्पत्तियाँ हैं। जब जीव राम के सम्मुख होता है तो ये उसे प्राप्त होती हैं। राम स्वयं कहते हैं-

 "सनमुख होई जीव मोहि जवहीं ।
जन्म कोटि अघ नासहि तबहीं।" 
         ( सुन्दरकाण्ड )

√★राम के सम्मुख होते ही जीव के करोड़ों जन्मों के पाप कट जाते हैं। ऐसा निष्पाप जातक सद्यः सम्पत्ति लाभ का अधिकारी होता है। तस्मै नमः।

√•कहा गया है गया में पिण्डदान से पितरों का उद्धार होता है। मेरे एक कश्मीरी मित्र हैं। वे गया में जा कर स्वयं अपना श्राद्ध कर आये, यह सोच कर कि बेटों का क्या ठिकाना ? वे पिण्ड दें कि न दें । यह साधारण लोगों की समझ है। तथ्य कुछ और है। वह क्या है ?

 √•गय+टाप् = गया, स्त्रीलिंग शब्द। गय शब्द पुंलिंग है। दोनों का अर्थ समान है, एक ही है। गाय कहते हैं, प्राण को ।

 "प्राणा वै गया: ।"
 ( बृहदारण्यक उप. ५।१४।४)

 √•गया में श्राद्ध करने / पिण्ड देने का अर्थ है- प्राणों में आहुति देना ।

 "अपाने जुह्वति प्राणं प्राणोऽपानं तथापरे ।"
                    (गीता ४ । २९ )

√• १.अपान में प्राण की आहुति देना ।

 √•२. प्राण में अपान की आहुति देना ।

 √•आगे पुनः कहा गया है ...

"अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति।"
               (गीता ४।३०)

√•३. प्राणों में प्राणों की आहुति देना।

 √•यहाँ श्वाँस का बाहर से भीतर जाना प्राण है, श्वसन । 
√•तथा श्वांस का भीतर से बाहर आना अपान है, निःश्वसन ।
 √•प्राण और अपान की गति को रोक देना प्राणायाम है।

 "प्राणापान गती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।"
              (  गीता ४। २९)

 √•प्राणायाम के परायण होना ही गया में पिण्डदान करना है। शरीर के भीतर गया (प्राण) है। शरीर के बाहर गया (प्राण) है। ये प्राण ही पितर (पालन कर्ता) हैं। मुख्यतः पाँच पितर हैं- प्राण, अपान, व्यान, उदान,समान। इन पितरों का उद्धार प्राणायाम से होता है। प्राणायाम करने वाले को पूर्वजन्मकृत् पाप स्पर्श तक नहीं करते। कहा गया है।

 "गीताध्ययन शीलस्य प्राणायामपरस्य च ।
 नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्म कृतानि च ।।"

√• प्राण में आयु है। प्राण पुष्ट होने पर दीर्घायु होती है। कुम्भक से प्राण पुष्ट होता है। इसके द्वारा व्यक्ति इच्छानुसार अपनी आयु बढ़ा लेता है। एक होरा अर्थात् ६० घटी (२४ घंटे) कुम्भक करने से व्यक्ति की आयु में ६० वर्ष की वृद्धि होती है। १ पल के कुम्भक से ६ दिन आयु बढ़ती है। नाम जप के साथ कुम्भक करना श्रेष्ठ है। प्राण अपान की गति को रोक देना ही कुम्भक है। यह कुम्भक सभी प्राणियों में स्वतः होता है। इसकी कालावधि की वृद्धि के लिये प्रयास करना पड़ता है। प्राण को प्रसन्न करने का सूत्र है-कुम्भक ।

√• पञ्चम भाव और द्वितीय भाव में उत्पादक और उत्पाद्य का संबंध है। 

√•५ + ९ = १४ । १४ १२= २ [ द्वितीय भाव ]

√•२ - ९ = (१२ + २) - ९ = १४ - ९ = ५ [पंचम भाव] 

√•दूसरा भाव नासिका है। नासाछिद्रों से प्राण प्रवेश करता है। यह प्राण वायु फुफ्फुस में प्रसारित होकर पेट पर्यन्त फैलती है। पेट है, पंचम भाव नासा से लेकर नाभि (कुक्षि) तक प्राण का विस्तार है। प्राण वायु का परिमाण भिन्न-भिन्न समयों में भिन्न-भिन्न होता है। यथा

 √•१. प्रवेश समय प्राणवायु = १० अंगुल ।

 √•२. निर्गम समय प्राणवायु = १२ अंगुल ।

√• ३.चलते समय प्राणवायु =२४ अंगुल ।

√• ४. दौड़ते समय प्राणवाय=४२ अंगुल ।

√• ५. मैथुन समय प्राणवायु = ६५ अंगुल ।

√•६. निद्रा समय प्राणवायु= १०० अंगुल ।

√•७. भोजन/ वमन समय प्राणवायुप=१८ अंगुल।

√• प्राण वायु के परिमाण को जितना ही कम किया जाय, उतना ही आयु में वृद्धि होती है। अधिक सोने से आयु क्षीण होती है। अधिक मैथुन से आयु अल्प होती है। अधिक चलने एवं दौड़ने से भी आयु का ह्रास होता है। कम भोजन करने से तथा वायु को अधिक देर तक भीतर रोके रहने से आयु बढ़ती है। सर्वाधिक आयु का क्षयन निद्रा एवं मैथुन से होता है। निद्रा कम होनी चाहिये। मैथुन में कुम्भक का प्रयोग करना चाहिये । प्राण निकलते समय १२ अंगुलि होता है। इसके अंगुलात्मक परिमाण को कम करते रहने से निम्नलिखित उपलब्धियां होती है।

√•१ अंगुल कम करने से, निष्कामता।
√•२ अंगुल कम करने से, आनन्द ।
√•३ ,, ,, ,, ,, ,,  काम शक्ति मे वृद्धि।
√•५ ,, ,, ,, ,, ,, दूर दर्शन की शक्ति ।
√•६ ,, ,, ,, ,, ,,  आकाश गमन ।
√•७ ,, ,, ,, ,, ,, प्रबलता वेगता/अव्यहत गति।
√•८ ,, ,, ,, ,, ,, अष्टसिद्धियाँ।
√•९ ,, ,, ,, ,, ,, नौ निधियाँ।
√•१० ,, ,, ,, ,, ,, दस मूर्तियाँ।
√•११ ,, ,, ,, ,, ,, छाया शक्ति/अदृश्य उपस्थिति।
√•१२ ,, ,, ,, ,, ,, हंस / मोक्ष।

√•प्राण की लम्बाई जब १२ अंगुल कम होती है अर्थात् शून्य हो जाती है तो प्राणन क्रिया का अभाव होता है। ऐसा योगी हंस वा ब्रह्म है। तस्मै नमः ।

 √•प्राण पंचतत्वात्मक होता है। इनमें से किसी न किसी तत्व की अतिशयता होती है। कैसे यह जाना जाय कि अमुक समय में प्राणान्तर्गत कौन तत्व प्रवाहित हो रहा है? स्वर दैर्ध्य द्वारा तत्व का ज्ञान होता है। 

√•१६ अंगुल स्वर की लम्बाई होने पर, पृथ्वी तत्व ।

 √•१२ ,, ,, ,, ,, ,,  जल तत्व । 

√•८ ,, ,, ,, ,, ,,अग्नि तत्व ।

√•६ ,, ,, ,, ,, ,, वायु तत्व।

√•३ ,, ,, ,, ,, ,, आकाश तत्व।

√•इन पञ्च तत्वों के ज्ञान से बुद्धि में प्रकाश होता है। जिससे भविष्य कथन किया जाता है। इसमें गणित की खटपट नहीं होती। इन तत्वों के संबंध में कहा जाता है ...

√•१. पृथ्वी तत्व नासा छिद्रों के बीचोबीच प्रवाहित होता है। इसका स्वाद मधुर, वर्ण पीत, आकार चौकोर, अग्रगामी सरल मन्द प्रवाह, स्थिर कार्यों में सफलता दायक । 

√•२. जल तत्व नासा छिद्रों के तल को स्पर्श करता हुआ नीचे की ओर प्रवाहित होता है। इसका स्वाद कषैला, लवण होता है। श्वेतवर्ण, अदर्श चन्द्राकार, नीचे की ओर तीव्र गति से प्रवहमान, ध्वनियुक्त, शीतस्पर्श तथा शुभ कार्यों में सफलता दायक है। 

√•३. अग्नि तत्व नासिका की छत को स्पर्श करता हुआ ऊपर की ओर प्रवाहित होता है। इसका स्वाद तिक्त, वर्ण रक्त, आकार त्रिकोण, प्रवाह चक्राकार, उष्ण स्पर्श, ऊर्ध्वगामी वेग है। यह क्रूर कर्मों में प्रशस्त है।

√• ४. वायु तत्व नासिका की बगल वाली दीवार को स्पर्श करता हुआ तिरछे प्रवाहित होता है। इसका स्वाद खट्टा/ क्षारीय होता है। इसकी गति तिर्यक्, रंग नीला, काला, स्पर्श समशीतोष्ण/कुनकुना, आकार गोल है मारण, मोहनादि कर्मों के लिये यह प्रशस्त है।

 √•५. आकाश तत्व नासारन्धों के भीतर ही प्रवाहित होता है। यह चित्रवर्ण वाला वा बुदुद्दत/बिन्दु पुक्कमात्र होता है। इसमें गति का अभाव होता है। इसके उदय होने पर आत्मचिन्तन, ध्यान, धारणदि कर्म किये जाते हैं। इसका स्वाद कटु है। यह स्पर्शहीन है। 

√•जिस जातक का पश्ञ्चम भाव शुभ एवं बली होता है, उसकी बुद्धि में ये तत्व प्रकाश करते हैं। जिससे इनके स्वरूप का ज्ञान होता है। ऐसा जातक त्वरित प्रश्नफल कहता है। घुटनों में पृथ्वी तत्व पाँव में जल तत्व, कन्धों पर अग्नि तत्व, नाभि में वायु तत्व तथा सिर पर आकाश तत्व रहता है। पृथ्वी तत्व पूर्व से पश्चिम तक, जल तत्व नीचे से ऊपर तक, अग्नि तत्व दक्षिण में, वायु तत्व उत्तर में तथा आकाश तत्व मध्य में स्थित होता है। पृथ्वी तत्व के समय में लाभ विलम्ब से होता है, सफलता देर से मिलती है। जल तत्व के समय में लाभ तत्क्षण होता है, सफलता शीघ्र मिलती है। अग्नि तत्व के समय में हानि होती है, मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। वायु तत्व भी हानिकारक है तथा कार्य का नाश होता है। आकाश तत्व में विफलता की प्राप्ति होती है। पृथ्वी तत्व में स्तम्भन कार्य, खेती का कार्य, उद्योग स्थापन, वाणिज्य कर्म, मन्त्रार्थ करना, लाभार्थ यत्न करना, प्रतियोगिता में संमिलित होना शुभ होता है। जल तत्व में मन्त्रसिद्ध करना, यज्ञ करना, अनुष्ठान करना, औषधि ग्रहण करना, उपदेश देना, दीक्षा लेना-देना प्रशस्त माना गया है। अग्नि वायु और आकाश तत्व अलाभकर हैं। आकाश तत्व प्रत्येक कार्य में अशुभ है। इसमें नाम जप ईश चिन्तन भजन ही श्रेयस्कर है। पृथ्वी और अग्नि तत्व में यात्रा करने पर सुख मिलता है। अग्नि और वायु तत्व में यात्री को दुःख को प्राप्ति होती है। आकाश तत्व में यात्री दिवंगत हो जाता है। यात्रा के प्रश्न में, पिंगला में वायु तत्व हो तो है यात्री निरन्तर यात्राप्रेल होता है। पिंगला में जल तत्व हो तो यात्री वापस आ रहा होता है। पिंगला में पृथ्वी तत्व हो तो यात्री जहाँ गया है, वहाँ रुका हुआ होता है। पिंगला में अग्नि तत्व हो तो यात्री को इहलीला समाप्त हो गई होती है। इड़ा नाड़ी में यात्रा का अभाव होता है। यदि कोई घात-प्रतिघात, रोग, व्रण, सम्बन्धी प्रश्न पूछे तो

 √•१. पृथ्वी तत्व के उदय होने के समय पेट में रोग/ व्रण/ घात होता है।

√•२. जल " " " " " पैर में रोग/हानि/ चोट । 

 √•३. अग्नि " " " " "जाँघों घुटने में रोग/ घाव। 

√•४. वायु " " " " " हाथों अंगुलियों में रोग ।

 √•५. आकाश " " " " "  मस्तक में पीडा / प्रहार।

 √•यदि कोई प्रतियोगिता, स्पर्धा, विवाद, लड़ाई, झगड़ा, युद्ध की स्थिति आ पड़े तो ऐसी स्थिति में ...

√•१. पृथ्वी तत्व के चलने पर बराबर की स्थिति रहती है। 

√•२. जल तत्व के चलने पर विजयश्री मिलती है। 

√•३. अग्नि तत्व में शरीर के अंगों की हानि होती है।

 √•४. वायु तत्व में हार अपमान, मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

 √•५. आकाश तत्व में निश्चित पराजय / अपमृत्यु होती है।

 √•कुम्भक में प्राण का होम करने से हर प्रकार की जय तथा इष्ट की सिद्धि होती है-यह सत्य है। यदि कोई जानना चाहे कि गर्भ में क्या है ? तो...

√•१. पृथ्वी तत्व के उदय होने से कंन्या होती है। 

√•२. जल तत्व के उदय होने से पुत्र होता है।

√•३. वायु तत्व हो तो क्षीणकाय कन्या होती है। 

√•४. अग्नि तत्व हो तो गर्भ का अभाव होता है। 

√•५. आकाश तत्व में नपुंसक सन्तान जन्मती है। 

√•प्रश्न कर्ता पूर्ण प्राण की ओर बैठकर प्रश्न करे तो संतान स्वस्थ होती है। शून्य प्राण की ओर बैठकर प्रश्न पूछे तो गर्भ ठहरता ही नहीं। सुषुम्ना गत प्राण में गर्भपात हो जाता है। स्त्री की योनि में वीर्य डालने पर यदि...

√•१. पृथ्वी तत्व होता है तो गर्भ ठहरता है तथा जन्मने वाला जातक भोगी होता है, सम्पत्ति उसके पैर है तथा वह शक्ति शाली होता है। 

 √•२. जल तत्व में गर्भ ठहरने पर जायमान सुत सुखी एवं लोक-विख्यात होता है, विद्वान् यात्री होता है।

√•३. अग्नि तत्व में गर्भ ठहरने पर जातक रुग्ण एवं अल्पायु होता है, विकलांग होता है। 

√•४. वायु तत्व में गर्भ रहने से बच्चा जीवन भर दुःखी रहता है। वह मारा-मारा फिरता तथा भिक्षा मांगता है।

 √•५. आकाश तत्व में गर्भ ठहर जाय तो गर्भपात निश्चित है।

 √•पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश - इन पाँच तत्वों की गुरुता में ५ : ४ :३:२: १ का अनुपात होता है।

 अर्थात्...

 √•पृथ्वी तत्व = ५ इकाई ५० पल पर्यन्त अवधि वाला। 

√•जल तत्व = ४ इकाई ४० पल पर्यन्त अवधि वाला।

 √•अग्नि तत्व = ३ इकाई ३० पल पर्यन्त अवधि वाला।

 √•वायु तत्व = २ इकाई । २० पल पर्यन्त अवधि वाला।

√•आकाश तत्व = १ इकाई । १० पल पर्यन्त अवधि वाला।

 √•इससे स्पष्ट हैं-पृथ्वी से आकाश पर्यन्त पाँचों तत्व गुणों की दृष्टि से क्रमशः न्यून न्यूनतर होते चले गये हैं। इन तत्वों के प्रवाह के समय जन्मने वाली संतति गुणात्मक दृष्टि से हीन-हीनतर होती चली जाती है। इस प्रकार पृथ्वी तत्व एवं जल तत्व उत्तम, अग्नि तत्व मध्यम, वायु तत्व अधम तथा आकाश तत्व व्यर्थ होता है। जल तत्वज जातक में वीर्य, रक्त, मज्जा, मूत्र, लार का बाहुल्य होता है। अग्नि तत्वज जातक के शरीर में भूख, प्यास, नींद, कान्ति, आलस्य का आधिक्य होता है। वायु तत्वज जातक का शरीर रुकना, चलना, फैलना, सिकुड़ना, दौड़ना गुणों से ओतप्रोत होता है। आकाश तत्वज जातक में प्रेम, द्वेष, भय, लज्जा, मोह की प्रबलता होती है।

 √•इडा में पृथ्वी तत्व के उदय होने पर शांति एवं पुष्टि करने से सिद्धि मिलती है। पिंगला में अग्नि तत्व होने पर क्रूर कर्म करने से सिद्धि शीघ्र मिलती है। दिन में चलने वाला पृथ्वी तत्व लाभ देता है। रात्रि के समय प्रवाहित होने वाला जल तत्व लाभ कराता है। अग्नि, वायु और आकाश तत्व मृत्यु, हानि एवं विनाश कारक होते हैं। 

√••शत्रु के आगमन संबंधी प्रश्न में...

 √•१. पृथ्वी तत्व से शत्रु को आया हुआ समझें।

 √•२. जल तत्व से शत्रु द्वारा लाभ मिलता है।

 √•३. वायु तत्व से शत्रु को अन्यत्र गया हुआ समझे।

 √•४. अग्नि तत्व में शत्रु द्वारा घेरान्दी होती है। 

५. आकाश तत्व में शत्रु से पूर्णतः हानि होती है।

 √•मूक प्रश्न में; पृथ्वी तत्व से मूल चिन्ता, जल और वायु तत्व से जीव चिन्ता, अग्नि तत्व से धातु चिन्ता तथा आकाश तत्व से चिन्ता का अभाव समझना चाहिये। अन्य प्रकार से, पृथ्वी तत्व में कीट चिन्ता, जल तत्व में मनुष्य चिन्ता, वायु तत्व में पक्षी चिन्ता, अग्नि तत्व में पशु चिन्ता तथा आकाश तत्व में अपद (सर्पादि) चिन्ता होती है।
√•सत्य की पूजा में आज में इस मंत्र पुष्प को अर्पित करता हूँ...

 "कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः ।
 तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा ।।" 
           ( अथर्ववेद १९।५३।१)

 √●रस् (चुरादि उभय रसयति-ते) धातु चखना / स्वाद लेना तथा मी (क्र्यादि उभय मीनाति, मीनीते ) धातु मार डालना, विनाश करना, चोट पहुँचाना, क्षति करना, घटाना, कम करना, परिवर्तित करना, अतिक्रमण करना, उल्लंघन करना अथवा

√● मी (भ्वादि परस्मै मयति, चुरादि उभय मायायति-ते) धातु जाना, हिलना-डुलना, जानना, समझना से रस्मी धातु/ धातु शब्द बनता है। सकार, शकार को समता की तुला पर रखने पर रस्मी = रश्मी तथा इकार, ईकार में अभेद मानने पर रश्मी रश्मि की व्युत्पत्ति होती है। जो वा जिससे सूर्य, भूमण्डल का रस चखता है, प्राणियों को चोट पहुँचाता है, सबका अतिक्रमण करता है, सब कुछ जानता समझता है, सर्वत्र जाता है, उसे रश्मि कहते हैं। रश्मि का यह अर्थ प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर है। 

√●सप्तरश्मिः = सात प्रकार की रश्मियों वाला रसं पिबति रक्षति गच्छति जानाति ताडयति परिवर्तते वा सा रश्मिः जब सूर्य रश्मि, मेघों के पारदर्शी आवरण से होकर चलती है तो आकाश पटल पर उससे सात वर्ण प्रकट होते हैं। इनके नाम हैं- बैगनी, जामुनी, हरा, नीला, पीला, नारंगी, लाल। इस वर्ण विक्षेपण को इन्द्र धनुष नाम मिला है। इन्द्र = सूर्य, धनुष चाप। इस सूर्य चाप का दर्शन आह्लादकारी होता है। यह सबके लिये दृष्टिगोचर है।

 √●सहस्राक्षः = सहस् (बल नाम निघण्टु २ । ९) र (युक्ति बोधक प्रयय) + अ (नकारार्थक) + क्षः (क्षि + ड) न क्षयति इति अक्षः । सूर्य रश्मियाँ बली बलाढ्य वा बलशाली हैं। इसलिये ये सहस्र हैं। इनका कभी क्षरण वा नाश नहीं होता। ये अक्षयधर्मा हैं। इसलिये ये अक्षः कही गई हैं। अतः सहास्रक्षः पद का अर्थ हुआ वली एवं अविनश्वर सहस्र का संख्यात्मक अर्थ लें तो सहस्र = अनन्त/अपरिमित/अमित/ अमेय / अगणित। तब सहस्राक्षः का अर्थ होगा- अनन्त एवं अक्षय रश्मियों वाला अर्थात् सूर्य।

 √●अजरः = अजः (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र) + र ये तीनों देवता अजन्मा हैं न जायते इति अजः =  नञ् + जन + ड)। इन तीनों देवताओं वा शक्तियों (उत्पादन, संवहन, विनशन) से युक्त होने के कारण सूर्य रश्मियों को अजर कहा गया है। अन्य प्रकार से,

 √●अजरः = अ (नञ्) + जृ (ध्वा. दिवा. क्रया. पर, चुराः उभ. जरति, जीर्यति, जूणाति, जारयति-ते) + अङ् । जो बूढ़ा नहीं होता, क्षोण नहीं होता, निर्बल नहीं होता, नाश को प्राप्त नहीं होता वह अजरः है। सूर्य रश्मियों का यह गुण है।

√● भूरिरेताः = भूरि (बहुत अधिक) + रेताः (रेतस् + टाप) रेतस् का अर्थ वीर्य / धातु है। जो सबको धारण करे वा धारण की क्षमता प्रकृष्टता के साथ प्रचुर रूप से जिसमें हो, वही भूरिरेता है। सूर्य रश्मियों का यह गुण है। इसलिये उन्हें यहाँ भूरिरेताः कहा गया है।

√● कालः = पुरुषः । चेतन तत्व नाम काल है।

 √●अश्व = अ (नञ्) + श्वः (अव्यय)। श्वः नाम भविष्यत्काल जो भविष्य में न होकर सदैव वर्तमान में हो, वह अश्वः है। प्रत्यक्ष का सम्बन्ध सीधे वर्तमान काल से है। अतः जो साक्षात् और यहीं वा सर्वत्र है, वह अश्व नाम वाला काल है। प्राण को भी अश्व कहते हैं। अश अश्नुते + वा वाति + ड = अश्वः । जो सर्वत्र व्याप्त है, सर्वत्र गतिशील है, उसे अश्व कहते हैं। प्राण कहाँ नहीं है? 'प्राणो वै सः।' श्रुति वाक्य है। प्राण ही ब्रह्म है। अतः अश्व = प्राण चेतन तत्व को प्राण नाम दिया गया है। सूर्य रश्मियों में प्राणन क्षमता है। इसलिये ये अश्व हैं। एको अश्वो वहति सप्तनामादित्यः (निरुक्त ४ । ४ । २७) यहाँ अश्व, एक है, आदित्य है) यह सप्तनामा सप्तवर्णा प्रकाश से युक्त है। तस्मै अश्वाय नमः ।

 √●तम् आ- रोहन्ति कवयः विपश्चितः = कवि विद्वान् लोग उस पर चढ़ते हैं।

√●विपश्चितः वि + प्र + चित् + क्विप्। विप्रकृष्टां चिनोति चेतति चिन्तयति। विद्वान् बुद्धिमान् । अथवा वि + दृश् विशेषेण पश्यति, चित्ते धारयति च विपश्चितः। उस ब्रह्म तत्व को जो देखता है और अपने चित्र में सतत धारण करता है, वह विपश्चित् वा विद्वान् है।

 √●कवयः = क्रान्तदर्शनः योगिनः तत्वज्ञाः ।

√● आ-रोहन्ति = आ + ह् + लट् प्र. पु. ब. व.।

 √●तम् = तद् पुंलिंग द्वितीया ए. व यह ब्रह्म काल वाचक है। 

√●तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा = तस्य चक्राणि विश्वानि भुवनानि । यहाँ चक्रा = चक्राणि विश्वा विश्वानि । [ चक्रा, विश्वाः भी] 

मन्त्र का स्वरूप ...
"काल: अश्वः वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षः अजरः भूरिरेताः ।
 तम्-आ रोहन्ति कवयः विपश्चितः तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा ॥"

【 मन्त्र का अन्वय सहस्राक्षः कालः अजरः अश्व: भूरिरेताः सप्तरश्मिः वहति । तम् कवयः विपश्चितः आरोहन्ति 

 तस्य , तस्मिन्) विश्वा भुवनानि चक्राणि (सन्ति)।

 मंत्रार्थ कालः सहस्र अस्ति, सहस्ररूपे तिष्ठति वा । काल: अजरः अविनश्वरः वा । कालः अश्वः वर्तमानः प्राणः वा।

काल: भूरिरेताः सामर्थ्यशाली वा ।
कालः सप्तरश्मिः वहति । 
काले सर्व प्रतिष्ठितः ।

 तं कालं कवयः जानन्ति, विपश्चितः पश्यन्ति योगिनः आरोहन्ति, तस्मिन्, भक्ताः क्रीडन्ति, ज्ञानिनः कर्म कुर्वन्ति । तस्मिन् काले सर्वे निवसन्ति। तस्मिन् भुवनानि सन्ति, विश्वानि सन्ति नाना चक्राणि सन्ति । सः कालः सर्व आप्नोति । 】

√●यह काल ही सत्य है। अन्य कुछ तो है नहीं। यदि कुछ है तो काल के समक्ष वह गौण/ तुच्छ है। काल के वश में सभी हैं। इस सत्य को कौन नकार सकता है ?

 √●काल स्वयं दिखाई नहीं पड़ता। काल का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसके प्रभाव को अषिगण जैसा देखते हैं, वैसा कहते हैं।

 "या दगेव ददृशे तद्गुच्यते ।"
       ( ऋग्वेद ५। ४४।६)

√● इस सत्य को कौन नकार सकता है ! काल के महत्व का प्रतिपादन इस मंत्र में कितने सुन्दर ढंग से किया गया है ।

 "कालेऽयमंगिरा देवोऽथर्वा चाधि तिष्ठतः ।
 इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधृतीश्च पुण्याः ।।
 सर्वाल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देव ।"
        ( अथर्ववेद १९।५४।५)

√●काले अयम् अंगिरा: देव अथर्वा च अधि तिष्ठतः। इमम् च लोकम् परमम् च लोकम् पुण्यान् च लोकान् विधृतीः च पुण्याः सर्वान् लोकान् अभिजित्य ब्रह्मणा कालः सः ईयते परमः नु देवः ॥ 

 √●अन्वय- अयम् अंगिराः देवः अथर्वा च काले अधितिष्ठतः । सः कालः नु परमः देवः, इमम् लोकम् च, परमम् लोकम् च, पुण्यान् लोकान् च, पुण्याः विधृतीः च ब्रह्मणा (प्रसूतः) सर्वान् लोकान् अभिजित्य ईयते ।

 √●अंगिरा = अ + गिरा। यहाँ अड् माहेश्वर सूत्र प्रत्याहार है। 

√●अङ् = अ इ उ ण् +ऋक् + ए ओ ङ् । 
= अ इ उ ऋ ए ओ ।
 = अ इ उ ए ओ ।ऋ शुद्धस्वर नहीं है, कृत्रिम है। 

"अक्षराणां अकारोऽस्मि इन्द्रः सामासिकस्य च।
 अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥"
             (गीता १०।३३ )

√●अकार ब्रह्माक्षर है। अं अग्नि बीज है। यह पंचाग्नि है जो पंचाग्नि तापता (साधता) है, वह धन्य है। मैं उसे प्रणाम करता हूँ। पंचाग्नि अर्थात् पाँच स्वर पाँच स्वर ही पाँच प्राण हैं। प्राण चलते हैं, उड़ते हैं, खेचर हैं। इसलिये इन पंच प्राणों को पंचपक्षी भी कहते हैं। पंचपक्षी शास्त्र का एक श्लोक है...

"अकारः श्येन आख्यातः इकारः पिंगलस्तथा
 उकारोवायसश्चैव एकारः ताम्रशेखरः।
 ओकारो नीलकण्ठश्च पक्षिसंज्ञा स्वरक्रमात् ॥"
                  (अगस्त्य ऋषि)

√● अकार की श्येन (बाज) संज्ञा है, इकार की पिंगल (उल्लू), उकार की वायस (कौवा), एकार की ताम्रशेखर (मुर्गा), ओकार की नीलकण्ठ (मोर)। अकार में आकार, इकार में ईकार, उकार में ऊकार, एकार में ऐकार तथा ओकार में औकार का समावेश समझना चाहिये। इसी तरह, श्येन में श्येनी, पिंगल में पिंगली, वायस में वायसी, ताम्रशेखर में ताम्रशेखरी नथा नीलकण्ड में नीलकण्ठिनी का समाहार है। संसार के हस्व-दीर्घमय (ह्रस्व में दीर्घ, दीर्घ में ह्रस्व) वा पुरुष-स्त्रीमय होने (पुरुष में स्त्री, स्त्री में पुरुष) से ऐसा है। ये प्रसिद्ध पश्च स्वर वा पञ्च पक्षी ही पञ्च प्राण हैं। अदादि अन् धातु परस्मैपदी अनिति जीवने से आन शब्द बनता है। इसमें पाँच उपसर्ग से बनता है-प्राण (म + आन), अपान (अप + आन), समान (सम्+आन), व्यान (वि + आन), उदान (उद् + आन) शरीर के भीतर विद्यमान ये पाँच पक्षी हैं।

√●प्राणों में पाँच तत्व रहते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश-ये पाँच तत्व श्येन, पिंगल वायस, कुक्कुट, मयूर इन पाँच पक्षियों में उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार ५ x ५ = २५ से २ x ५ = १० तथा २ + ५ = ७ अर्थात् १० दिशाओं में व्याप्त ७ रश्मियों वाले विश्व को जो देखता है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। 

√●अंग-अंग में सुव्याप्त रस रूप प्राण को अंगिरस कहते हैं।

 √●अंगिरा = अंगिरस शब्द पुलिंग प्रथमा विभक्ति, एक वचन। = विश्वव्यापी प्राण ।

 √●अयम् = यह पार्थिव पृथ्वी लोक का।

 √●अथर्वा= थर्वतिः चरति कर्मा तत्प्रतिषेधः         (निरुक्त ११।३।१९)

√● थृ (भ्वादि परस्मै चरति, कम्पने गतौ वा) + वा (भ्वा. परस्मै वाति, गतौ गतिगन्धनयोः) = पर्वा, गच्छन्धर्मा कम्पनश्च । अ + थर्वा, तत्पुरुष, अकम्पमानः स्थिरश्च ।

√● जिसमें न गति है, न कम्पन है, न परिवर्तन है, जो शाश्वत स्थिर है, वह अथर्वा है। जैसे- आकाश गंगा। पृथ्वी पर जो गंगा नदी है, वह स्थिर है। उसका उद्गम स्थिर है, उसका अन्त स्थिर है, उसका मध्य क्षेत्र स्थिर है। किन्तु उसमें स्थित जल स्थिर नहीं है। ऐसे ही आकाश गंगा जिसमें हमारा सौर मण्डल भी है, इन सब से अप्रभावित निष्कम्प एवं सुस्थिर है। इसलिये यह अथर्वा है।

 "दिवि देवा अथर्वाणः।'
     (अथर्ववेद ११।६।१३) 

 √●दिवि = द्युलोक में वर्तमान, देवाः = द्योतनशील प्रकाश पुज, अथर्वाणः = निश्चल अकम्प स्थिर है। 

√●अथर्वा स्त्रीलिंग प्रथमाविभक्ति एक वचन इसका अर्थ है-मूल प्रकृति अंगिरस् का अर्थ है-गुण।

√●अंगिरा = तीनों गुण- सत् रज तम। युगपद अथर्वागिरा का अर्थ है-त्रिगुणात्मक प्रकृति ।

 √●अधि तिष्ठतः = अधिपूर्वक स्था धातु लट् प्रथम पुरुष द्विवचन। प्रकृति और उसके गुण (अथर्वागिरस) काल में स्थित होते हैं।

√● इमम् लोकम् = इह लोक/ यह संसार ।

 √●परमम् लोकम् = पर लोक/ वह संसार ।

 √●पुण्यान् लोकान् = पुण्यस्थली / धर्मक्षेत्र ऐसे देश वा स्थान जहाँ पर लोग स्व-स्व धर्म में निरत रहते हुए समाचरण करते हैं। इस भाव को स्पष्ट करने वाला एक मंत्र है...

 "यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह । तँल्लोकं पुण्यं ज्ञेयं यत्र देवाः सहाग्निना ॥" 
          ( यजुर्वेद २०।२५)

 [ जिस देश में शास्त्रवेत्ता तथा शस्त्रधारी परस्पर सहयोग पूर्वक साथ-साथ रहते हैं, वह पुण्य लोक है. तथा जहाँ देवगण (दानी लोग) यज्ञाग्नि को प्रज्ज्वलित रखते हों, वह पुण्य लोक है-ऐसा जानना चाहिये ।]

 √●विघृती: पुण्याः = वि उपसर्ग पृथक्करणे वियोजने वा धृ धातु धारणार्थे संवहने वा + क्त प्रत्यय + प् विधृती। इस शब्द का प्रथमा एक वचन स्त्रीलिंग रूप है, विधृतीः। इसका अर्थ हुआ, न धारण करने वाले। पुण्याः पुण्य पुञ्ज ।

√● पुण्याः विधूती का अर्थ हुआ ऐसी स्थली जो पुण्यों को धारण नहीं करती अर्थात् पाप स्वली/अधर्म = = 'क्षेत्र ।' 

√●पुण्याःविधृतीः=पुण्यों में वियुक्त देश पुण्यकमों से पृथक क्षेत्र/ पापमय लोक/अपुण्य लोक = अपुण्यान् लोकान् ।

√●सर्वान् लोकान् सर्व (ध्वादि परस्मै सर्वति जाना, हिलना दुलना तथा चोट पहुंचाना, क्षतिग्रस्त करना, वध करना, यातना देना) + क = सर्व । 

★★★सर्व का दो अर्थ है★★★

√◆१. चर्यमाण / गतिशील/ नर्तनशील ।

 √◆२. हानिकारक / पीडादायक / वधकृत् । अतः सर्वान् लोकान् का भी दो अर्थ हुआ- 

♂१. वे भुवन वा लोक जो निरन्तर गतियुक्त होते हैं। जैसे- ग्रह नक्षत्रादि राशियाँ अर्थात् चर संसार। 

♂२. वे लोक जो पीड़ा पहुँचाते हैं यातना देते हैं मारते हैं। हानि वा अपमान करते हैं। जैसे-भागवत में वर्णित २८ नरक रौरव, कुम्भीपाक आदि । 

√★अभिजित्य = अभि पूर्वक जि ध्वादि परस्मै जये + ल्यप् हर प्रकार से जीत कर/ हराकर / अधिकार मैं लेकर/ परास्त कर/ वश में कर/ पूर्णविजय प्राप्त कर।

√★ ब्रह्मणा = ब्रह्मन् शब्द पुंलिंग तृतीया विभक्ति एक वचन । = ब्रह्मा सृष्टिकर्ता सर्जक चतुरानन से / द्वारा।

√★ नु= अव्यय। निस्संदेह, निश्चयपूर्वक ।

 √★सः परमः देवः कालः = सः (वह, अपने से भिन्न), 

√★परमः (उच्चतम, सर्वोत्तम, सर्वप्रमुख, सर्वश्रेष्ठ महत्तम)

√★देवः (दैदीप्यमान, सुश्रुत व्यापकख्यात, प्रकाशक)
कालः (सर्वोपरि सत्ता परमेश्वर) 

√★ईयते = ई (अदा. आ. गती प्रकाशने व्यापने च) लट् प्रथम पुरुष एक वचन। व्याप्त है/ विचर रहा है/ प्रकाशित हो रहा है।

√■मन्त्रार्थ = यह लौकिक वा पार्थिव अग्नि जो सब को भस्मीभूत करने वाला है, काल के मुंह में है। युन्मय अचर आकाश गंगा काल के गाल में हैं। यह अंगिरा और देव अथर्वा काल के जबड़ों में फँसे हुए हैं। निस्सन्देह वह काल महादेव है, परम सत्ता है, परमात्मा है। वही काल इस भू लोक को अपने वश में किये हुए विचर रहा है। वही काल स्वर्गलोक को अपने अधीन करके गतिशील हो रहा है। वहीं काल पुण्य लोकों का #अतिक्रमण करता हुआ सर्वत्र जाना जा रहा है। वही काल ब्रह्मा प्रसूत समस्त चेतन प्राणियों को तथा नरकों को भी अपने अधिकार में करके प्रकाशित हो रहा है। 

√■इस मंत्र में काल की महिमा का आख्यान अत्यन्त उदात्ततापूर्ण ढंग से किया गया है। काल से परे कुछ है ही नहीं। काल के भीतर सब कुछ है तथा काल सब के भीतर घुस कर सर्वत्र सत्तावान् है। यह काल महाकाश रूप से सबको अपने उदर में बन्द किये हुए है। यह काल अण्वाकाश रूप से सब के उदर में प्रवेश कर सबकी हर गतिविधि का प्रतिक्षण लेखा जोखा ले रहा है। यह सबके सिर पर सवार है। यह सबका शासक है। इसके शासन का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। वह काल पुरुष हमारे आगे-पीछे, दायें-बायें, ऊपर-नीचे दर्शन भी दे रहा है। हतभाग्य जीव देख नहीं रहा है। यही विडम्बना है। तं काल पुरुषं नतोऽस्यहम् । काल असीम है, अनन्त है, अज्ञेय है। जीव के लिये इसे जानना सम्भव नहीं। काल को केवल काल ही जान सकता है। ससीम जीव असीम काल को कैसे जान सकता है ? महाभारत की एक कथा कहता हूँ- कौरव नरेश धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे काल पुरुष कृष्ण से #धृतराष्ट्र ने कहा, हे कृष्ण । मुझे अपने पहले के १०० जन्मों का ज्ञान है। इन १०० पूर्वजन्मों में मैंने कोई पाप नहीं किया। क्या कारण है। कि मैं जन्मान्ध हूँ ? कृष्ण ने कहा, हे राजन् तुम्हें १०१ वें जन्म का पता नहीं है। उस जन्म में भी तुम राजा थे। क्रौञ्च पक्षी का एक जोड़ा तुम्हारे राजमहल के परिसर में रहता था। उस क्रौंच पक्षी से १०१ अण्डे हुए। वे युगलपक्षी तुम्हें धर्मात्मा राजा समझकर उन अण्डों को सुरक्षा का भार तुम्हें सौंप कर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। तुमने उन्हें उनके अण्डों की सुरक्षा का आश्वासन दिया था। तुम्हें पक्षियों का आहार प्रिय था। जंगल से प्रतिदिन पक्षियों का आखेट कर उनके मांस को तुम खाते थे। एक दिन दैवात् जंगल जा कर आखेट से पक्षी मांस लाना सम्भव नहीं हुआ। तुम्हारा रसोइयाँ क्रौंच पक्षी के अण्डे से निकले हुए एक बच्चे को पका कर तुम्हें खिलाया। वह तुम्हें अतीव रुचिकर लगा। इसके बाद वह क्रम चलता रहा। उस क्रौंच युगल के १०१ बच्चों को तुम खा गये। जब वे क्रौंच तीर्थ यात्रा से लौट कर आये और अपने बच्चों को नहीं पाये तो वे तुमसे इस विषय में पूछे। तुमने अपनी अनभिज्ञता दिखायी। धीरे-धीरे उन्हें वास्तविकता का पता चल गया। स्वाद के पीछे तुम अपना विवेक चक्षु मूँद लिये थे। इसलिये उनके शाप से तुम इस जन्म में अन्धे हुए हो तथा वे पक्षिशावक तुम्हारे १०० पुत्र एवं १ पुत्री बन कर जन्मे हैं।

√★ इस कथा से जो निष्कर्ष निकलता है, वह इस प्रकार है।

 √●काल के ऊपर व्यक्ति का वश नहीं है। व्यक्ति अपने तपोबल से अपने सम्पूर्ण जन्मों के विषय में नहीं जान सकता। कर्मफल कब फूटेगा, इसे जानना कठिन है। कालात्मक परमेश्वर सब कुछ जानता है। हमारे द्वारा किये गये पुण्यापुण्य कर्मों का फल हमें भोगना पड़ेगा। ईश कृपा संतकृपा से दुरितफल का वेग कम हो जाता है। कभी-कभी नाम मात्र का रह जाता है। बिना भगवान् की कृपा से संत नहीं मिलते। गोस्वामी जो कहते हैं...

 "अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता ।
 बिनु हरिकृपा मिलहिं नहि सन्ता।।"
      (सुन्दरकाण्ड, रा. च. मा.)

संत भेंट हो गई तो उसका आदेश मानना चाहिये। संत की अवज्ञा से अरिष्ट होता है। शिव जी पार्वती माता से कहते हैं...

"साधु अवज्ञा तुरत भवानी ।
 कर कल्यान अखिल कै हानी।।'
       ( सुन्दरकाण्ड )

मेरे लिये साधु आदेश शिरोधार्य है। मैं साधु की शरण में हूँ। काल की कृपा से ही ऐसा है। 
【तस्मै काल पुरुषाय रामाय नमो नमः।】

•••••तेरह दिवसों का पक्ष (विश्वघस्रपक्ष)•••••

√•महाभारत में तेरह दिवसों के पक्ष की चर्चा आयी है । महाभारत युद्ध से कुछ पहले व्यास जी धृतराष्ट्र से कहते हैं -

"चतुर्दशीं पञ्चदशीं भूतपूर्वां च षोडशीम् ।
इमां तु नाभिजानेऽहममावास्यां त्रयोदशीम् ।
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ॥
अपर्वणि ग्रहेणेतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः ।"
( महाभारत भीष्मपर्व ३।३२-३३)

√•अर्थात् एक तिथि का क्षय होने पर चौदहवें दिन, तिथि क्षय न होने पर पन्द्रहवें दिन और एक तिथि की वृद्धि होने पर सोलहवें दिन अमावस्या का होना तो पहले देखा गया हे, परन्तु इस पक्ष में जो तेरहवें दिन यह अमावस्या आ गयी है, ऐसा पहले भी कभी हुआ है, इसका स्मरण मुझे नहीं है । इस एक ही महीने में तेरह दिनों के भीतर चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों लग गये । इस प्रकार अप्रसिद्ध पर्व में ग्रहण लगने के कारण ये सूर्य और चन्द्रमा प्रजा का विनाश करने वाले होंगे ।

√•महाभारत युद्ध में हुए विनाश का परिमाण भी महाभारत में मिलता है । धृतराष्ट्र के द्वारा मृतों की संख्या बतलाने के लिए कहने पर युधिष्ठिर कहते हैं -

"दशायुतानामयुतं सहस्राणि च विंशतिः ।
कोट्यः षष्टिश्च षट् चव ह्यस्मिन् राजन् मृधे हताः ॥
अलक्शितानां वीराणां सहस्राणि चतुर्दश ।
दश चान्यानि राजेन्द्र शतं षष्टिश्च पञ्च च ॥"
      ( स्त्रीपर्व २६।९-१०)

√•हे राजन् ! इस युद्ध में एक अरब, छियासठ करोड़, बीस हजार (१,६६,००,२०,०००) योद्धा मारे गये हैं । राजेन्द्र ! इनके अतिरिक्त चौबीस हजार एक सौ पैंसठ (२४,१६५) सैनिक लापता हैं ।

√•मुहूर्त्तगणपति नामक ज्योतिष ग्रन्थ के मिश्रप्रकरण, श्लोक १३३ में भी तेरह दिवसों के पक्श को उत्पात सूचक बताया गया है -

"त्रयोदशदिनः पक्षो यस्मिन् वर्षे भवेत्तदा ।
प्रजानाशोऽथ दर्भिक्षं तथा भूमिभुजां क्षयः ॥"

√•अर्थात् जिस वर्ष में तेरह दिन का पक्ष होता है उस वर्ष में प्रजा का नाश, अकाल एवं राजाओं का क्षय होता है ।

√•मुहूर्तचिन्तामणि के शुभाशुभ प्रकरण, श्लोक ४८ में कहा गया है -

"अस्ते वर्ज्य सिंहनक्रस्थजीवे वर्ज्य केचिद् वक्रगे चातिचारे ।
गुर्वादित्ये विश्वघस्रेऽपि पक्षे प्रोचुस्तद्वद् दन्तरत्नादिभुषाम् ॥"

√•अर्थात् जिस किसी शुभ कार्य को गुरु ग्रह के अस्त रहने पर निषिद्ध कहा गया है, उसे गुरु ग्रह के सिंह या मकर राशि में रहने पर भी निषिद्ध समझे । कुछ आचार्यों के मत में उसकी वक्रगति होने पर और उसके अतिचार होने पर भी निषिद्ध है । कुछ के मत में, गुरु और सूर्य की युति (एक राशि में दोनों की स्थिति) में भी और विश्वघस्रपक्ष में भी निषिद्ध है । इसी प्रकार हस्तिदन्त, रत्न आदि भूषणों के प्रयोग के लिए भी उपर्युक्त कालों को निषिद्ध कहा गया है ।

√•'विश्वघस्रपक्ष' पर पीयूष टीका इस प्रकार है-
 "विश्वघस्रेऽपि पक्षे त्रयोदशदिने पक्षे यस्मिन् पक्षे तिथिद्वयह्रासः, स त्रयोदशदिनात्मकः पक्षोऽतिनिन्द्यः ।"

√• तदुक्तं ज्योतिर्निबन्धे –

"पक्षस्य मध्ये द्वितिथी पतेतां तदा भवेद् रौरवकालयोगः ।
पक्षे विनष्टे सकलं विनष्टमित्याहुराचार्यवराः समस्ताः ॥"
                  इति ।

तथा -
 "त्रयोदशदिने पक्षे तदा संहरते जगत् ।
अपि वर्षसहस्रेण कालयोगः प्रकीर्तितः ॥" 
               इति।

√•तदुक्तं व्यवहारचण्डेश्वरे -

"त्रयोदशदिने पक्षे विवाहादि न कारयेद् ।
गर्गादिभुनयः प्राहुः कृते मृत्युस्तदा भवेत् ॥" 
                  इति ।

√•ज्योतिर्निबन्धेऽपि -
"उपनयनं परिणयनं वेश्मारम्भादिकर्मणि ।
यात्रां द्विक्षयपक्षे कुर्यान्न जिजीविषुः पुरुषः ॥"

√•उपर्युक्त श्लोक में 'वर्षसहस्रेण कालयोगः' अर्थात् तेरह दिनों का पक्ष एक हजार वर्षों की अवधि पर होता है, ऐसा कहा गया है । इस पर डॉ० फ्लीट ने टिप्पणी की है -

"This of course is an extensive exaggeration. A lunar fortnight of thirteen solar days appears to occur at least once in twenty-five years." 
[ J. F. Fleet: "A lunar fortnight of thirteen solar days", Indian Antiquary, March 1887, pp. 81-84]

√•पं० शंकर बाळकृष्ण दीक्षित के अनुसार शक संवत् १७९३ का फाल्गुन कृष्ण पक्ष और शक संवत् १८०० ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष तेरह दिनों का था [ भारतीय ज्योतिषशास्त्राचा इतिहास, पृष्ठ ११४.] अर्थात् सात वर्षों के अन्तराल में ही विश्वघस्रपक्ष का पुनरावर्तन हुआ ।

√•ई० सन् १९८२ से १९९७ तक के पञ्चाङ्ग के अवलोकन के बाद हमने पाया कि सन् १९८२ (शन १९०४ वि० सं० २०३९) का संसर्प आश्विन कृष्ण पक्ष तेरह दिनों का था (चिन्ताहरण जंत्री, वाराणसी के अनुसार); सन् १९९० (शक १९१२, वि०सं० २०४६) का भाद्रपद कृष्ण पक्ष और सन् १९९३ (शक १९१५, वि० सं० २०४९) का आसाढ़ शुक्ल पक्ष भी तेरह दिनों का था (दाते पञ्चाङ्ग, सोलापुर के अनुसार) पुणे शहर के लिए भी उपर्युक्त तीनों वर्षों में विश्वघस्रपक्ष था । इस प्रकार क्रमशः आठ एवं तीन वर्षों में विश्वघस्रपक्ष का पुनरावर्त्तन हुआ । परन्तु, उपर्युक्त तेरह दिवस वाले पक्ष के वर्षों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि तेरह दिवस वाले पक्ष का वर्ष जगत का संहार करने वाला होता है ।

√•कोई पक्ष तेरह दिन का होता है तो इसका अर्थ १३x२४ घंटे नहीं है । ई० सन् १९०० के लिए चान्द्रमास का मान २९.५३०५८८६७ दिन था । [पं० शंकर बाळकृष्ण दीक्षितः "भारतीय ज्योतिषशास्त्राचा इतिहास", तृतीय संस्करण, प्रकाशक-ह. अ. भावे, वरदा बुक्स 'वरदा', ३९७-१ सेनापति बापट रोड, पुणे, १९८९ ई०, पृष्ठ ४८+५६६.] एक शताब्दी में इस मान में दशमलव के चौथे अङ्क से ही परिवर्तन होता है अर्थात् कुछ सेकेण्डों का । अतः एक पक्ष या अर्धचान्द्रमास का औसत मान लगभग १४.७६५३ दिन अर्थात् १४ दिन १८ घंटे २२ मिनट प्राप्त होता है । पक्ष का स्पष्ट मान कभी भी १३ दिन २० घंटे से कम नहीं होता ।  परम्परा के अनुसार सूर्योदय के समय जो चान्द्र तिथि होती है, वहीं तिथि अगले अहोरात्र के लिए मानी जाती है । इसलिए किसी तिथि का क्षय भी प्राप्त होता है और तेरह दिन का पक्ष भी । अर्धचान्द्रमास के औसत मान के आधार पर किसी भी तिथि का क्षय नहीं हो सकता और न कोई पक्ष तेरह दिन का । उदाहरण के लिए शक संवत् १९१५ के आषाढ़ शुक्ल पक्ष (२१ जून-३जुलाई १९९३) पर विचार करें । २१ जून को पुणे में सूर्योदय काल ६ बजे और प्रतिपदा तिथि का समाप्ति काल ६ बजकर १२ मिनट है । अतः सूर्योदय के समय पहली तिथि अर्थात् प्रतिपदा हुई और परम्परानुसार यही तिथि अगले सूर्योदय तक अर्थात् २२ जून के सूर्योदय तक मानी जायगी जबकि २१ जून को सुबह ६ बजकर १२ मिनट के बाद से वस्तुतः द्वितीया तिथि चल रही होती है । द्वितीया तिथि का समाप्ति काल २२ जून की सुबह ४ बजकर ३५ मिनट है अर्थात् सूर्योदय होने के पूर्व ही द्वितीया तिथि समाप्त हो जाती है । अतः सूर्योदय के समय तृतीया तिथि प्राप्त होती है । इस प्रकार द्वितीया तिथि का क्षय प्राप्त होता है । इसी तर्क से चतुर्दशी के क्षय के बारे में समझा जा सकता है ।
√●●सप्तम भाव का बल है नवम भाव (सप्तम से तृतीय) तुला राशि का बल है धनुराशि (तुला से तीसरी)। नवम भाव एवं धनुराशि में प्रकृष्ट बल नहीं है तो सप्तम भाव बली नहीं होगा। तात्पर्य यह है। कि, नवम = ९ = ज्ञान =धर्म की प्रबलता दाम्पत्य जीवन को सुखमय करती है। सप्तम भाव का सुखपाने  के लिये, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिये ब्रह्मचारी को तदनुरूप कन्या (ब्रह्मचारिणी) चाहिये। मान लिया पुरुष के पास जन्मकुण्डली नहीं है। ऐसी दशा में वह ज्योतिषी के पास जाय और अभीष्ट स्त्री के बारे में प्रश्न करे। ज्योतिषी प्रश्नकुण्डली बनाकर स्त्री के विषय में सब कुछ बताता है। कैसे ? आगे इसका विवेचन करता हूँ।

√●●प्रश्न १. कैसी स्त्री मिलेगी ? 

★(i) अष्टम में स्वक्षेत्री शनि 
और सूर्य बन्ध्या । 
★(ii) अष्टम में स्वक्षेत्री चन्द्र और बुध रोगयुक्त बन्ध्या । 
★(iii) अष्टम में स्वक्षेत्री शुक्र और गुरु- मृतवत्सा।  
★(iv) अष्टम में स्वक्षेत्री मंगल-गर्भपात वाली। 
★(v) लग्न में चन्द्रमा शुक्ल २-१० तक क्वारी कन्या । 
शुक्ल १० कृष्ण ५ तक युवा । 
कृष्ण ५- अमावस्या तक, अधिकवय वाली।
★(vi) लग्न बुध युत् या दृष्ट-युवती । 
★(vii) लग्न शनियुत् वा दृष्ट-वृद्धा वयः । ★(viii) लग्न सूर्य / गुरू, युत वा दृष्ट- सुप्रसन्ना । 
★(ix) मंगल + शुक्र-कर्कशा तरुणी।

 √●◆प्रश्न २. स्त्री शुद्ध है वा भुक्त (भोगी हुई) ?
★(i) लग्न, लग्नेश, चन्द्रमा- तीनों अचर राशि में, शुद्ध। 
★(ii) लग्न, लग्नेश, चन्द्र- तीनों चर राशि में, अशुद्ध । 
★(iii) लग्न, लग्नेश, चन्द्रमा- तीनों द्विस्वभाव में, अल्पशुद्ध ।
★ (iv) लग्नेश चन्द्र स्थिर में अक्षता (अभुक्त)।
 ★(v) लग्नेश चन्द्र पर राशि में ता (भोगी हुई)। 
★(vi) चन्द्र द्विस्वभाव राशि में, लग्न चर में सदोष । 
केन्द्र में शुक्र, बुध चन्द्र द्वारा दृष्ट सदोष । वृश्चिक में बुध एवं शुक्र स्थित हो- सदोष।
 ★(vii) (मंगल + शनि) केन्द्र में चन्द्र से दृष्ट अशुद्ध । (मंगल + शुक्र) कहीं भी शनि से दृष्ट अशुद्ध । शुक्र वृश्चिक राशि एवं नवांश में अशुद्ध। 
★(viii) चन्द्रमा, लग्न द्विस्वभाव राशि में गुप्तभोगी । मंगल, बुध, शुक्र की युति द्विस्वभाव में गुप्तभोगी। (चन्द्र मंगल की युति द्विस्वभाव में गुप्तभोगी।
 (मंगल + शनि) केन्द्र में शुक्र से दृष्ट, शुक्र चन्द्र नवांश में प्रकट भोगी।
★ (ix) चन्द्र शनि लग्न में प्रकट भागी। चन्द्र मंगल शुक्र सप्तम में प्रकट भोगी। 

√●●प्रश्न ३. स्त्री का शील स्वभाव कैसा है ?
★ (i) लग्न से ३, ७, १०, ११ में चन्द्रगुरू युति दृष्टि- पतिव्रत । 
 चन्द्र सूर्य अथवा चन्द्र शुक्र युति / दृष्टि पतिव्रता । केन्द्र/ त्रिकोण में बृहस्पति बलवान हो- पतिव्रता । 
★(ii) चन्द्रमा, मंगल सूर्य से युत् / दृष्ट- परपुरुष से प्रेम । 

★(iii) मंगल, शुक्र से युत् दृष्ट- पर पुरुष से सहवास । 
★(iv) गुरू, मंगल और बुध से युत्- बाल्यावस्था में परकीया । 
★(v) सूर्य, मंगल अष्टम में पर पुरुष को पति बनाये। 
★(vi) लग्न, लग्नेश से एक राशि आगे मंगल- पति छोड़ पर पुरुष करे। 
★(vii) मंगल यदि चन्द्र या लग्नेश से एक हो अंश में योग करे तो अपने घर में पर पुरुष सेवे, यदि मंगल स्वगृही हो तो जार के घर स्वतः जावे।
★(viii) लग्नेश, सप्तम में शत्रु क्षेत्री हो तो देवरगामिनी हो। 
★(ix) मकर/ कुम्भ लग्न में, शुक्र एवं चन्द्र पाप दृष्ट हो-पुंश्चली।
★ (x) चन्द्रमा दो पाप महों के बीच एवं पाप दृष्ट हो-कुलनाशिनी।
★ (xi) लग्न से ३, ७, १०, ११ में नीच/ शत्रुक्षेत्री चन्द्रमा, नीच/ शत्रुक्षेत्री ग्रह से दृष्ट हो- व्यभिचारिणी ।
 ★(xii) सप्तम में मंगल- दूसरा हर ले जाये।
 (xiii) पष्ठ में बुध-कलहकारी । 
★(xiv) पठ में शुक्र अखण्ड सुहागिन/ सौभाग्यवती। 
★(xv) केन्द्र त्रिकोण लाभ में बुध गुरू- भाग्यवती । 

√●●प्रश्न ४. पुरुष के मन में कैसी रखी है ? सप्तम भाव में स्थित मह वा सप्तमेश वा सप्तम को देखने वाले महों में जो बलवान हो, वह यदि 

★(i) सूर्य है- क्षत्रिया दुस्सह स्वभाव प्रौढ़ा। 
★(ii) चन्द्र- वैश्या सुमुखी सौम्य।
★ (iii) मंगल- कर्कशा परकीया युवानी। 
★(iv) बुध - वैश्या युवावस्था गुणवती । 
★(v) गुरु- ब्राह्मणी स्वकीया विदुषी । 
★(vi) शुक्रब्राह्मणी परकीया सुन्दरी ।
★(vii) शनि हीनजातीय शूद्रा अधिकवया कुरूपा न्वी । 
★(viii) राहु म्लेच्छा विधर्मी दीर्घता मली।
 ★(ix) केतु शीलवती विजातीय बुद्धिमती।

√●● स्त्री की अवस्था का ज्ञान चन्द्रमा से करना चाहिये चन्द्रमा, 
◆शुक्ल १ से ५ तक बाला । 
◆कृष्ण १ से ५ तक प्रौढ़ा। 
◆शुक्ल ६ से १० तक कुमारी ।
 ◆कृष्ण ६ से १० तक वृद्धा ।
◆ शुक्ल ११ से १५ तक युवती । 
◆कृष्ण ११ से ३० तक जरा। 

√●●प्रश्न ५. स्त्री पुरुष संबंध कैसा रहेगा ?

★ (i) सप्तमेश, लग्नेश का योग- परस्पर प्रीति ।
★ (ii) सप्तमेश, लग्नेश का योग लग्न वा सप्तम में- प्रगाढ़ मैत्री ।
★(iii) सप्तमेश लग्न में श्री आज्ञाकारिणी।
★ (iv) लग्नेश, सप्तम में- पुरुष
 आज्ञाकारी । 
★(v) लग्नेश सप्तमेश की परस्पर मित्र दृष्टि दोनों में सहयोग । 
★(vi) लग्नेश सप्तमेश की परस्पर शत्रु दृष्टि दोनों में विरोध । 
★(vii) चन्द्रमा मंगल से युत वा दृष्ट-दोनों में कलह । 
★(viii) शनि शुक्र से युत वा दृष्ट-दोनों दूर रहें। 
★(ix) चन्द्रमा शुभग्रह युत्/दृष्ट-स्त्री, पति से प्रेम करे।
★(x) चन्द्रमा अशुभग्रह युत्/दृष्ट-स्त्री, पति से प्रेम न करे। 
★(xi) सप्तमभाव बलवान्- स्त्री बलवती हो।
★ (xii) लग्न बलवान् पुरुष प्रबल हो।

√●◆ प्रश्न ५. विवाह के पश्चात् दाम्पत्य कैसा रहेगा ?. 

√●क- ★(i) लग्न में मंगल बुध सूर्य-शीघ्र विधवा ।
★(ii) षष्ठ में चन्द्रमा- विधवा ।
★ (iii) सप्तम में शनि / राहु विधवा।
★ (iv) दशम में पापमह-विधवा। 
★(v) १, ८, ७, १२ पाप ग्रह-विधवा। 

√●ख-★ (i) लग्न में शनि-बन्ध्या/ मृतवत्सा
★ (ii) तृतीय में राहु-बन्ध्या/ मृतवत्सा ।
★ (iii) पंचम में सूर्यचन्द्र- बन्ध्या/ मृतवत्सा। 
★(iv) व्यय में राहु सूर्य, बन्ध्या / मृतवत्सा ।
 ★(v) अष्टम् में ५, १०, ११ राशि के सूर्य शनि- मृतवत्सा। 
★(vi) नवम में पापग्रह- मृतवत्सा ।

 √●ग-★ (i) अष्टम् में बुध चन्द्र- काक बन्ध्या (पुरुष दृष्टि होने पर) - एक कन्या (चन्द्रबली होने पर)।
 ★(ii) पंचम में मंगल - पुत्रनाश 
★(iii) पंचम में शनि-रोगी। 
★(iv) सप्तम में सूर्य, रोगी।
 ★(v) द्वितीय में मंगल सूर्य शनि-दरिद्री
★ (vi) अष्टम् में गुरु शुक्र राहु-नाशिनी । 

√●ब- ★(i) पंचम में राहु-जाया पाश ।
★(ii) अष्टम् में चन्द्र, खीमरण। 
★(iii) सप्तम में शुक्र पाप युत्-स्त्रीनाश। 
★(iv) लग्न में चन्द्र पापयुत्-स्त्रीनाश । 

√◆ड- ★(i) पष्ठ/ अष्टम में चन्द्रमा- स्त्री पुरुष नाश । 
★(ii) सूर्य अष्टम्, चन्द्र लग्न, मंगल सप्तम-दोनों मरें आठवें महीने। 
★(iii) लग्न में गुरु शुक्र दोनों जिये। ध-(I)व्यय में शुक्र-सुखी। 
★(ii) व्यय में गुरु- धनधान्य युक्तः ।
 ★(iii) नवम में बुध- सदा स्वस्थ । 
★(iv) द्वितीय में चन्द्र धनाढ्यः ।

√●●प्रश्न ६. कौन पहले मरेगा ? 

√●सूर्य पुरुष है। शुक्र स्त्री है। शुक्र के आगे सूर्य हो तो पुरुष पहले मरेगा अर्थात् स्त्री विधवा होकर मरेगी। सूर्य के आगे शुक्र हो तो स्त्री पहले मरेगी, पुरुष विधुर होकर मरेगा। 

√●●प्रश्न ७. सुखी दाम्पत्य के लिये क्या किया जाय ?

 √●लग्न एवं सप्तम दोनों यदि पाप प्रभाव में हैं तो इसका कोई उपाय नहीं है, दुःख भोगना पड़ेगा। दुःख सहने से पाप का चयन होता है। तप से पुण्य संचय होता है अतः तप करना होगा। यदि ये दोनों भाव अल्प पाप प्रभाव में हैं तो शुक्र एवं शनि को नित्य प्रणाम करना पड़ेगा। इससे सुख मिलेगा, दाम्पत्य की गाड़ी ठीक चलेगी। भगवत्शरण अन्तिम विकल्प है।
√●शरीर के यौवन का उफान समाप्त होता है, पर मन के भीतर का नहीं। मन चिरयुवा है। यह कभी बूढ़ा नहीं होता। यह भोक्ता है। शरीर तो भोग का साधन है। इस शरीर में बैठा मन इन्द्रियरूपी भुजाओं से भोग ग्रहण करता है। जो जीव जवानी भर भोग का कीड़ा बना रहा, प्रौढ़ावस्था में भोग की उपत्यका में भ्रमण करता, वह आगे वृद्धावस्था में कैसे इससे विरत रह सकता है ? यह संसार ऐसे पुरुषों से भरा पड़ा है। इन भोग कीटों के उद्धार का कोई उपाय नहीं, सिवाय राम नाम के।

√●यौवन की चौखट पर पुरुष पहुँचता है तो स्त्री ढूंढ़ता है। कैसी स्त्री ? त्रिपुरसुन्दरी, भुवनमोहिनी, स्वर्णवर्णा, विभुवदना, नवयौवना भले ही वह काला कलूटा, खूसट, गौबरेला मैलाकुचैला, टेढ़ामेढ़ा हो। उसकी कुण्डली में सप्तम भाव जैसा है, वैसी स्त्री उसे बिना प्रयास एवं चाह के मिलेगी। यह विधि का विधान है। फड़फड़ाने से कुछ नहीं होता। सप्तम भाव का स्वाद सबके लिये भिन्न-भिन्न होता है। किसी को मीठा, किसी को तोता, किसी को कटुतिक्त मिष्ठ चरपरा, किसी को रूखा सूखा शुष्क भाद। प्रारब्ध ने जो दिया वह ठीक है। इसमें संतोष होना चाहिये। हाय-हाय करना व्यर्थ है। सर्वगुण सम्पन्ना श्रीमयी शीलवती विश्रुत सुन्दरी नयनाभिराम नारी केवल उसी पुरुष को मिलती है जिसके सप्तम स्थान में, गुरू, शुक्र, चन्द्र एवं बुध हों तथा ये पापदृष्ट न हो ऐसा भाग्यवान् कौन है ? जो है उसे मेरा नमस्कार ।

√★स्वृ उपतापयोः स्वरति + गम् गतौ गच्छति = स्वर्ग जहाँ से दुःख संताप चला जाता है, वह स्थान स्वर्ग है। स्वर्ग = पीड़ा का अभाव, वेदना का अन्त। नृ नृणाति क्लेशं प्रापयति न् + वुन्=नरक।जहाँ से क्लेश कष्ट प्राप्त होता है, वह नरक है। ऊपर स्थित स्थान भी स्वर्ग है। स्वृ शब्दे स्वरति + गम् गतौगच्छति, जहां शब्द ध्वनि का गमन होता है, वह स्वर्ग है। यह स्थान है, आकाश आकाश का तन्मात्र या गुण है, शब्द। आकाश ऊपर है। इसलिये स्वर्ग = ऊपर ऊपर प्रकाश है, नीचे अन्धकार दीपक जलता है तो ऊपर चतुर्दिक प्रकाश फैलता है पर नीचे अन्धकार ही रहता है। यह अन्धकार नरक नाम से जाना जाता है।
 न अर्चिंः यस्मिन् यस्मात् वा स नार्चिः> नाकि: (चस्यकः) =नर्कः (दीर्घस्य लोपः) = नरकः > ( र् व्यञ्जने अकारस्य प्रवेशः)।

【 इस प्रकार, नरक= प्रकाश का अभाव / घनान्धकार/ अज्ञान/अन्ततिमिर/अगति ।】

√★सप्तम भाव सूर्यास्त स्थान है। यहाँ प्रकाश का अभाव हो जाता है। इसलिये यह नर्क / नरक स्थान है। प्रथम भाव में सूर्योदय होता है, प्रकाश का भाव होता है। इसलिये यह स्वर्ग है। स्वर्ग और नर्क आमने सामने हैं। नर्कसे स्वर्ग दिखायी पड़ता है, स्वर्ग से नर्क में झाँका जाता है। एक को पाकर व्यक्ति दूसरे से वंचित नहीं होता। मूर्धास्थान स्वर्ग है। उपस्थ स्थान नर्क है। इस नर्क में स्वर्ग का प्रतिबिम्ब है।

√★सप्तम भाव एवं प्रथम भाव की सीमाएँ एक दूसरे से मिलती हैं। सप्तम भाव के चतुर्भुज का ऊपरी कोण, प्रथम भाव के चतुर्भुज के निचले कोण को छूता है। इसलिये इन दोनों भावों की दूरी नगण्य हुई। अन्य प्रकार से, सप्तम के चतुर्भुज का निम्न कोण एवं प्रथम भाव के चतुर्भुज का उच्च कोण एक दूसरे से अनन्त दूरी पर हैं और परस्पर कभी नहीं कहीं नहीं मिलते। इसलिये इन दोनों भावों की दूरी अमाप्य एवं अनन्त है। इसके दो अर्थ हो ...

√◆१. जहाँ स्वर्ग है, वहीं नर्क है जहाँ नर्क है, वहाँ स्वर्ग है। 

√◆२. जहाँ स्वर्ग है, वहाँ नर्क कदापि नहीं है, जहाँ नर्क है, वहाँ स्वर्ग का होना सम्भव नहीं ।

■ ये दोनों निष्कर्ष एक साथ सत्य हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। यह अद्भुत तथ्य है, विशेषतायुक्त है।

√◆ऊपर से नीचे गिरना आसान है। इस क्रिया में विलम्ब नहीं लगता। नीचे से ऊपर चढ़ना / उठना कठिन है। यह श्रमसाध्य एवं समयसाध्य क्रिया है। पुरुषतत्व ऊपर है और दिव्य है। स्त्री तत्व नीचे और गूड़ है। स्त्री कभी गिरती नहीं। केवल पुरुष गिरता है। स्त्री को सामने पाकर पुरुष के भाव विचार आचार सब बदलने लगते हैं। स्त्री में आकर्षण शक्ति है वह उसे खींच लेती है। गिरने के भय से अनेकों पुरुष स्त्री से दूर रहते हैं, स्त्री का दर्शन करना भी नहीं चाहते। नवयौवना नारी को देखकर नवयुवक पुरुष अपने को सम्हाल नहीं सकता। जो सम्हाल से यह शिव है। तस्मै शिवाय नमः ।

√◆कुण्डली का सप्तम भाव कामियों का स्वर्ग, वैरागियों का नर्क है। स्त्री स्वर्ग स्वरूपा है, नरकमयी भी है। वस्तुतः सप्तमभाव स्वर्ग नहीं, अपितु स्वर्ग का आभास है। इसमें स्वर्गीयसुख की अनुभूति होती । इसे स्वर्ग समझ कर पुरुष इसमें गिरता है।

√●सप्तम भाव सम्पूर्ण रूप से स्त्री है। इस स्वी में स्वर्ग के सुख का आभास एवं नरक की यातना की अनुभूति नित्य है। एक बार पुरुष के मन मस्तिष्क में यदि स्त्री का प्रवेश हुआ तो उससे मुक्तिपाना कठिन है। पुरुष का स्वो से शारीरिक सम्बन्ध हो तो वह उससे मुक्ति पा सकता है। कौन ऐसा है, जो स्त्री को मन में, मस्तिष्क में स्थान देकर उसे वहाँ से हटाये ? स्त्री को तो जाने दीजिये, स्त्री संबंधी चर्चा से इस संसार में भला कौन अपने को बचा सकता है ?

√★पुरुष ९ महीने तक स्त्री के गर्भ में मलमूत्र के मध्य रहता है। यह उसके लिये नरक है। जब वह गर्भ से बाहर आता है तो वह माता की गोद में प्रेमपूर्वक स्थान पाता है। यह उसका स्वर्ग है। इसके अतिरिक्त जब पुरुष स्खों को पाकर उससे मैथुन करता, लिपटता-चिपटता, हँसता-मुस्कुराता है तो यह उसके लिये स्वर्ग है। यही पुरुष जब स्त्री प्रसंग से अपने वीर्य का नाश करता हुआ रोगग्रस्त होकर कराहता है तो यह उसका नरककुण्ड है। पुरुष स्त्री को प्राप्त करना चाहता है और प्राप्त करने के पूर्व, सात फेरा करने के पहले उसके विषय में जानना चाहता है। स्त्री तो माया है, न । क्या इसे कोई पकड़ सकता, जान सकता है ? संत तुलसी दास कहते हैं...

 "सत्य कहहि कबि नारि सुभाऊ । 
सब विधि अगम अगाध दुराऊ ॥
 निज प्रतिविम्बु बरकु गहि जाई ।
 जानि न जाइ नारि गति भाई ॥" 
    (अयोध्याकाण्ड, रा.च.मा. )

√●कविगण सत्य ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य, अथाह तथा रहस्यपूर्ण है। अपनी परछाहाँ भले ही पकड़ ली जाय पर हे भाई लियों की चाल (कब कहाँ किससे क्या करेंगी) नहीं जानी जा सकती। स्त्री स्वयं में एक मह है। इस ग्रह को शान्त करने का उपक्रम व्यक्ति जानकर भी नहीं कर पाता। यहां अद्भुत बात है।

 आगे गोस्वामी जी कहते हैं...

 "राखिय नारि जदपि उर माहीं।
 जुवती शास्त्र नृपति बस नाहीं ॥"
     (अरण्य काण्ड, रा.च.मा.) 

"काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ ?
 का न करै अवला प्रबल, केहि जग कालु न खाइ ??" 
     (अयोध्याकाण्ड, रा.च.मा. )

√●युवती, शास्त्र एवं राजा किसी के बस में नहीं होते। स्त्री को भले ही पुरुष अपने हृदय में बन्द किये रहे, वह उसके वश में नहीं होती। आग क्या नहीं जला सकती ? समुद्र में क्या नहीं समा सकता ? अबला कहाने वाली प्रबल स्त्री (जाति) क्या नहीं कर सकती ? जगत् में काल किसको नहीं खाता ? इन चारों प्रश्नों का उत्तर है-सब।

 √●माया वा प्रकृति रूप होने से स्वी जड़ है। यही कारण है कि वह हठी दुस्साहसी अवज्ञाशील होती है। पार्वती ने हठ किया, शिव की बात को भी न माना और अपने शरीर को जलाकर भस्म कर लिया। 【 पार्वती = सती (दक्षपुत्री) 】अब भी लोक में देखा जाता है, स्त्रियाँ अपने को जला लेती हैं। ऐसी जड़ स्त्री का कैसे विश्वास किया जाय ? शंकराचार्य कहते हैं...

 'विश्वासपात्रं न किमस्ति ? नारी।" 
          ( प्रश्नोत्तरी)

 राजा दशरथ कैकेयी का विश्वास कर पछताये। गोस्वामी जी के शब्दों में, 

"कवने अवसर का भयउ ? गयऊ नारि विस्वास।
 जोग सिद्धि फल समय जिमि, जतिहि अविद्या नास ॥"
      (अयोध्याकाण्ड, रा.च.मा. )

 √●स्त्री का विश्वास कर के व्यक्ति यह नहीं जान सकता कि किस अवसर पर क्या हो जाय ? स्त्री बने बनाये काम को बिगाड़ देती है, ठीक वैसे ही जैसे योग की सिद्धि रूपी फल के मिलने के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है। स्त्री के गहन चरित्र को अपने अनुभवानुसार राजा भर्तृहरि इस प्रकार व्यक्त  करते हैं

 "स्त्रीचरित्रं दैवो न जानाति, कुतो मनुष्यः ?"

 √●किन्तु ऐसा नहीं है। कुण्डली हर जातक का नग्न चित्र है। स्त्री की कुण्डली ज्योतिषी के सामने स्वयं बोलती है। लग्न और चन्द्र राशि से उसके अन्तर्बाह्य स्वरूप का पता कर लिया जाता है। इसमें नवांश. की महत्वपूर्ण भूमिका है। लग्न की राशि एवं उसके नवांश से तथा चन्द्रमा की राशि एवं उसके नवांश से फल कहना चाहिये। लग्न और चन्द्रमा में से जो बलवान् हो उसी का फल प्रकट होता है। दोनों के समान बली होने पर मिश्रित फल होता है। नवांश का फल अमिट होता है। क्योंकि यह बीज है। यहाँ प्रत्येक राशि के नवांश को आधार मानकर फलानयन कर रहा हूँ।
【व्याख्यान नीचें चित्र मे संलग्न है】

√●ग्रहों के लग्न में होने एवं देखने से तथा चन्द्रमा से युति एवं दृष्टि संबंध करने से उनके स्वभाव के अनुसार स्त्री का आधार हो जाता है। फल कथन में इसको प्रश्रय देना चाहिये। प्रारब्धवश पुरुष को स्त्री जन्य सुख-दुःख मिलता है। इसको मेटना असम्भव नहीं तो सरल भी नहीं। गृहस्थ में रहते हुए हरि स्मरण करना नहीं भूलना ही श्रेयस्कर है। कहा है...

 "शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् ।
 लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत्॥ " 

√●सौ काम छोड़कर (देहपुष्टि के लिये) भोजन करें। हजार काम छोड़ कर (शुद्धि के लिये) स्नान करें। लाख काम छोड़कर (यश के लिये) धन का दान करें। करोड़ों काम छोड़कर (संसार सागर से पार होने के लिये) भगवान का भजन करें।

 【हरये नमः 】
√•स्त्री की कुण्डली में, सूर्य उसका पति है, चन्द्रमा वह स्वयं है, मंगल धन है, बुध पुत्र है, गुरु सुख है, शुक्र धर्म है, शनि घर है। विवाह से पूर्व इसका विचार करना चाहिये। वार-तिथि-नक्षत्र तथा ग्रह-भाव के योग से विषांगना योग बनता है। क्रूरवार, भद्रातिथि तथा शतभिषा, आश्लेषा, कृत्तिका के योग से स्त्री जातक विष सदृश होता है।

 "सूर्यभौमार्किवारेषु भद्रातिथि शताभिषे (विशाखे च) 
आश्लेषा कृत्तिका चेत् स्यात् तत्र जाता विषांगना ॥"
          ( ज्योतिष तत्व )

 【क्रूरवार = रवि, मंगल, शनि । 

√•भद्रातिथि =द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी।

√•शतभिषा =  राहु का नक्षत्र, आश्लेषा =  बुध का नक्षत्र कृत्तिका = सूर्य का नक्षत्र, विशाखा गुरू का नक्षत्र ।

√• विषांगना का फल है-गुरु = सुख का नाश, बुध पुत्र का नाश, सूर्य पति का नाश ।】 

√•द्वितीय (कुटुम्ब), सप्तम (पति), द्वादश (भोगशय्या) भावों में यदि सूर्य, मंगल, शनि हों तो सास ससुर पति धन सबका नाश होता है। यह भी विषांगना योग है।

√•【(सूर्य, मंगल, शनि) वार + (द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी तिथि + (शतभिषा, आश्लेषा, कृत्तिका) नक्षत्र + (२, ७, १२) भाव क्रूराक्रान्त विषांगना योग।】

√•【त्रिकोण स्थानों (१, ५, ९) में क्रूर ग्रहों के योग से भी विषांगना जानना चाहिये। अल्पवय में विवाह होने पर कंन्या बाल विधवा होती है।】

 √•प्रौढ वय में वा विलम्ब से विवाह होने पर वैधव्य नहीं होता किन्तु अनपत्यता होती है। जीवन दुःखमय होता है। विषांगना दोष के परिहार के लिये कंन्या को सावित्री व्रत करना चाहिये। पीपल आदि से विवाह करके चिरायु वर के साथ विवाह करें। कहा है...

 "सावित्र्यादिवतं कृत्वा वैधव्यविनिवृत्तये
अश्वत्थादिभिरुद्वाह्य  दद्यात्तां चिरजीविने ॥"
            (ज्योतिष तत्व)

√•ऐसी कंन्या के विवाह की लग्न ऐसी हो जिससे कुयोगों का नाश होकर शुभ का उदय हो। विवाह शुक्र के बली होने पर कन्या को सास का सुख, सूर्य से ससुर का सुख, गुरू एवं सप्तमेश से पति काल में का सुख, लग्न से शारीरिक सुख तथा सोम से कंन्या के मन को प्रसन्नता का विचार करना चाहिये। इनका शुभ प्रभावी होना लग्न की निर्दोषता पर निर्भर करता है। ज्योतिषी द्वारा सुझाया गया उपाय भी दैव के सम्मुख निरस्त हो जाता है। इससे संबंधित एक आख्यान सुनाता हूँ।

 √•भास्कराचार्य नाम के एक महान् ज्योतिषी थे। उनकी कन्या विषांगना योग से युक्त थी। उन्होंने उसके वैधव्य दोष के निवारण हेतु शुद्ध लग्न निकाला। इस लग्न में विवाह का होना निश्चित किया गया। इसके लिये एक जलयंत्र समय ज्ञान के लिये स्थापित किया गया। इसी बीच विवाह के दिन उनकी कंन्या कौतूहलवश उस यंत्र के पास गयी और उस पात्र में झाँकने लगी, जिससे जल बूंद-बूंद कर टपक रहा था। उसके नाक का मोती उस जल में गिर पड़ा। फलस्वरूप पानी के गिरने की गति मंद हो गई। शुद्ध लग्न का समय निकल गया। अशुद्ध लग्न में विवाह हुआ। कंन्या विधवा हुई और स्वयं मरी भास्कराचार्य ने कन्या की स्मृति में उसके नाम पर 'लीलावती' नामक ज्योतिष का ग्रन्थ लिखा। यद्यपि दैव बलवान है, प्रयत्न / उपाय करना मनुष्य की नियति है।

√• वैवाहिक लग्न की प्रबलता का बड़ा महत्व है। निर्दोष लग्न में हुआ विवाह सब प्रकार के अशुभ प्रभाव का नाश कर दाम्पत्य जीवन में सुख का प्रकाश विखेरता है। 

√•विवाह इन्द्रिय भोग के लिये नहीं, वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये किया जाता है। इस विस्तार प्रक्रिया में पुरुष तीन बार जन्म लेता है।

√•१. पुरुष का पहला जन्म स्त्री (भार्या) के गर्भ में होता है। यहाँ वह ९ महीने रहता है और अपने विषय में चिन्तन करता है।

√• २. पुरुष का दूसरा जन्म गर्भ से बाहर आने पर होता है। यहाँ वह गर्भ के चिन्तन को बिल्कुल भूल जाता है और नया जीवन जीता है।

√•  ३. पुरुष का तीसरा जन्म वर्तमान शरीर को छोड़कर अन्यत्र कर्मानुसार पुनः होता है।

√• ऐतरेयोपनिषद् में पुरुष के तीन जन्म लेने की विस्तृत चर्चा की गई है। ऋषि का कथन है...

"पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्वेतः तदेतत्सर्वेभ्यः अङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं विभर्ति । तदादा खियाँ सित्यथैनञ्जयति तदस्य प्रथमं जन्म ।" 
          (ऐतरेय उप. २ ।१)

√•【पुरुषे =पुरुष शरीर में, ह = निश्चयपूर्वक, वा (वै) = ही, अयम् = यह (संसारी जीव), गर्भः = वीर्य रूप में स्थित, भवति होता है। यत् जो, एतत् = यह, रेतः = वीर्य है, तत् = वह, एतत् = यह (वीर्य), सर्वेभ्यः सम्पूर्ण, अंगेभ्यः अंगों से (निकल कर), तेजः = तेज (शक्ति) है, सम्भूतम् इकट्ठा (उत्पन्न) हुआ, आत्मानम् अपने आप को, अपने स्वरूप को, विभर्ति = धारण (पोषण) करता है, आत्मनि = अपने (शरीर) में। तद् = तो उसको, यदा जब, स्त्रियाम् = स्त्री (योनि) के अन्दर, सिञ्चति सींचता (डालता) है, तद् = वह, अस्य = इस (पुरुष) का, प्रथमम् = पहला, जन्म जन्म (है)।

 "तत् स्त्रिया आत्मभूतं (य) गच्छति ।
 यथा स्वमंगं तथा । 
तस्मादेनां न हिनस्ति सास्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति।" 
          ( ऐतरेय उप. २ । २)

√• तत् = वह (सिंचित वीर्य), स्त्रियाः= स्त्री के ,आत्मभूयम् / आत्मभूतम् = आत्म्भाव (अपनत्व) को, गच्छति | = प्राप्त हो जाता है। यथा= जैसे, स्वम् = अपना, अंगम् = अंग होता है, तथा वैसे। तस्मांत् = उस कारण से ही, एनाम् = इस (स्त्री) को न नहीं, हिनस्ति = मारता, हानि पहुँचाता है। सा वह (स्त्री), अस्य = इस (पुरुष) के एतत् = इस आत्मानम् = स्वरूप ( गर्भ रूप वीर्य) को, अत्र = यहाँ (अपने शरीर में), गतम् = आये हुए को, भावयति पालन करती है।

 "सा भावयित्री भायितव्या भवति । 
तं खी गर्म बिभर्ति । सोऽय एवं कुमारं जन्मोऽग्रेऽधिभावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म।"
           ( ऐतरेय उप. २ । ३)

√•【सा = वह, भावयित्री = (पुरुष के तेज रूप गर्भ का) पालन करने वाली स्त्री, भावयितव्या= (पुरुष द्वारा) पालन करने योग्य, भवति= होती है। तम् = उस (पुरुष) को, स्त्री =स्त्री, गर्भम् गर्भ को (में), विभर्ति पालन पोषण करती है। सः = वह (पुरुष), अग्रे =(जन्म से पहले, एव-ही, कुमारम्= (उत्पन्न) शिशु को, जन्मनः = जन्म से (के बाद), अग्रे आगे, बाद में, अधिभावयति = संस्कारों द्वारा पुष्ट करता है। सः = वह (पुरुष), यत् = जो, कुमारम् = जातक को, जन्मनः अग्रे अधि-भावयति जन्म के अनन्तर अभ्युदयशील बनाता है, आत्मानम् एव = (वास्तव में वह अपने आप की ही, तत्= तो, भावयति = पालना करता है, एषाम्=इन , लोकानाम्= लोकों (मनुष्यों) की, संतत्या = बढ़ाने के द्वारा [संतत्या संतत्यै बढ़ाने के लिये, विस्तार के लिये, नष्ट न होने देने के लिये।]】

 √•एवम् = इस प्रकार, संतता विस्तार को प्राप्त हुए विस्तृत, हि = क्योंकि, इमे=ये सब, लोका: =लोक (मनुष्य समाज), तत् = वह, अस्य = इस (पुरुष / जीवात्मा) का, द्वितीयम् दूसरा जन्म जन्म (होता है)।

"सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति।
 स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म।"
           (ऐतरेय उप. २ । ४)

√•सः = वह (पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ जातक), अस्य = इस (पिता) का अयम् यह, आत्मा  = स्वरूप, पुण्येभ्यः = शुभ कर्मों के लिये, प्रतिधीयते = स्थापित किया जाता है, प्रतिनिधि (आगे सम्हालने वाला) बनाया जाता है। अथ = और उसके बाद, अस्य = इस (पुत्र) का, अयम् = यह (पिता रूप पुरुष), इतर = दूसरा, आत्मा = शरीर, कृतकृत्यः = सफल, अपना कर्तव्य पूरा करके, वयोगतः= अवस्था बीत ही, पुनः जाने पर, वृद्ध होने पर, प्र- एति =(यहाँ से) मर कर चला जाता है। सः = वह, इतः = यहाँ से, इस मनुष्य = लोक से, प्रयन् = जाता हुआ, शरीर को छोड़ता हुआ, एवं = पैदा होता है। तद् फिर, जायते = जन्म लेता है, वह, अस्य = इस पुरुष का, तृतीयम् तीसरा, जन्म = जन्म (है)।

√•वामदेव ऋषि ने इसका कथन किया है। गर्भ वास्तव में पहले स्वयं पुरुष धारण करता है। पुरुष के अंग-अंग में व्याप्त तेज का सार यह वीर्य है। इस तेज रूप वीर्य को पुष्ट करना, सम्हालना ही वीर्यरूप गर्भ को धारण करना है। पुरुष जब इस वीर्य को अपने शिश्न द्वार से निकालता है और इसे स्त्री की योनि मैं जाने देता है तो यह इसका प्रथम जन्म है। यदि यह स्त्री की योनि में न जाकर अन्यत्र / बाहर गिरता है. तो उसका यह प्रथम जन्म नष्ट / व्यर्थ समझना चाहिये।

√•पुरुष का वीर्य उसका ही स्वरूप है। इस वीर्य के द्वारा स्त्री की योनि को सींचना / गर्भाधान करना, इसका जन्मना है। गर्भाधान क्रिया में पुरुष अपने को उत्पन्न करता है। स्त्री के गर्भाशय में इस वीर्य की प्रविष्टि गर्भाधानकर्ता का प्रथम जन्म है। पुरुष के शरीर से निकला हुआ रेत स्त्री के शरीर में जाकर आत्मवत् हो जाता है, ठीक ऐसे ही जैसे उसका अपना अंग। अब वह विजातीय द्रव्य नहीं रहता। विजातीय द्रव्य को शरीर स्वीकार नहीं करता, उसे सदा ही निकालने का प्रयास करता रहता है। विजातीय द्रव्य उसे कष्ट देता है। वीर्य विजातीय द्रव्य होकर भी स्वी को कष्ट नहीं देता। वह इसे अपना प्राकृतिक भाग मान कर इसे स्वीकारती है और इसका पालन करती है। अतएव पुरुष का भी यह कर्तव्य होता है कि वह उस स्त्री. का पालन करे आप ही की तरह जैसे कि वह स्त्री उसके द्वारा स्थापित उसके ही स्वरूप उस गर्भ का पालन करती है। स्त्री का पालन करना अपना ही परिवर्धन करना है। स्त्री जब इस गर्भ को बाहर करती है तो यह पुरुष का दूसरा जन्म है। इस द्विजन्मा कुमार का पालन संस्करण दोनों पति-पत्नी मिलकर करते हैं। कुमार रूप में पुरुष का आत्मा उसके पुण्य कर्मों का प्रतीक बन कर संसार में रहता हुआ उसके कर्मों को आगे बढ़ाता है। पिता रूप पुरुष कृतकृत्य होकर अपने स्थूल शरीर को छोड़ देता है। इस लोक से जाते ही, वह फिर उत्पन्न होता है। यह उसका तीसरा जन्म है। यह तीसरा जन्म उसके प्रथम जन्म का हेतु बनता है। इससे सिद्ध होता है, यह पुरुष त्रिविक्रम है। 
       "तस्मै त्रिविक्रमविष्णवे नमः।"

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