धनु राशि
धनु राशि
जन्मकण्डली में चन्द्रमा धनु राशि में हो, यानी भचक्र के नौवें खण्ड ।270°) में हो (जातक के जन्म के समय) तो जातक की जन्म राशि धन होगी। राशि का राशीश गुरु है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार यदि 23 नवम्बर से दिसम्बर के मध्य जातक का जन्म हुआ हो तो उसकी राशि धनु कहलाती है। धनु राशि के जातक सदैव अपने लक्ष्य की तलाश में प्रयत्नशील रहते हैं। अलबत्ता ध्येय कुछ भी हो सकता है। ये अपने प्रयत्नों (लक्ष्य बेधन) में सफल भी। रहते हैं। बशर्ते चन्द्रमा और गुरु अशुभ स्थिति में न हों। ये सृजनात्मक होते हैं। असफलताओं से निराश नहीं होते या उनका मातम नहीं मनाते रहते। बहुत जल्द उन्हें भुलाकर नए लक्ष्य की खोज में जुट जाते हैं। कर्म में इनका अत्यधिक विश्वास होता है। ये भावुक व संवेदनशील होते हैं किन्तु बहुत अधिक नहीं, क्योंकि यथार्थवादी और स्वतंत्रताप्रिय होते हैं। अक्सर वायदे निभाने में ढीले होते हैं। अपनी मर्जी के मालिक होते हैं तथा पैसे को महत्त्व देने वाले होते हैं। यदि गुरु कुंडली में अशुभ न हो तो ये लोग कमिटमेंट पूरी करने वाले, धोखा न देने वाले, स्पष्ट हृदय तथा यथाशक्ति दूसरों की सहायता करने वाले भी होते हैं। ऐसे लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में भी सफल हो सकते हैं। व्यक्तित्व भी आकर्षक होता है तथा ये आस्तिक व धर्मभीरू होते हैं। ये SEX के मामले में विशेष संयम व नियम से चलते हैं।धनु राशि
जन्मकुण्डली में चन्द्रमा धनु राशि में हो, यानी भचक्र के नौवें खण्ड (240-270) में हो (जातक के जन्म के समय) तो जातक की जन्म राशि धनु होगी। इस राशि का राशीश गुरु है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार यदि 23 नवम्बर से 21 दिसम्बर के मध्य जातक का जन्म हुआ हो तो उसकी राशि धनु कहलाती है।
धनु राशि के जातक सदैव अपने लक्ष्य की तलाश में प्रयत्नशील रहते हैं। अलबत्ता ध्येय कुछ भी हो सकता है। ये अपने प्रयत्नों (लक्ष्य बेधन) में सफल भी रहते हैं। बशर्ते चन्द्रमा और गुरु अशुभ स्थिति में न हों। ये सृजनात्मक होते हैं। असफलताओं से निराश नहीं होते या उनका मातम नहीं मनाते रहते। बहुत जल्द उन्हें भुलाकर नए लक्ष्य की खोज में जुट जाते हैं। कर्म में इनका अत्यधिक विश्वास होता है। ये भावुक व संवेदनशील होते हैं किन्तु बहुत अधिक नहीं, क्योंकि यथार्थवादी और स्वतंत्रताप्रिय होते हैं। अक्सर वायदे निभाने में ढीले होते हैं। अपनी मर्जी के मालिक होते हैं तथा पैसे को महत्त्व देने वाले होते हैं।
यदि गुरु कुंडली में अशुभ न हो तो ये लोग कमिटमेंट पूरी करने वाले, धोखा न देने वाले, स्पष्ट हृदय तथा यथाशक्ति दूसरों की सहायता करने वाले भी होते हैं। ऐसे लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में भी सफल हो सकते हैं। व्यक्तित्व भी आकर्षक होता है तथा ये आस्तिक व धर्मभीरू होते हैं। ये ैम्ग् के मामले में विशेष संयम व नियम से चलते हैं।
धनु राशि के जातकों को पीलिया, यकृत रोग, मेदवृद्धि, नितम्ब के रोग, गले, फेफड़ों तथा चर्म व दंत रोगों की सम्भावना रहती है। यदि बुध अशुभ स्थिति में हो तो और भी ज्यादा। ऐसे जातकों का दूसरा स्थान कुंडली में पाप पीड़ित हो तो वाणी दोष भी सम्भावित होता है।
धनु राशि के जातकों को पीलिया, यकृत रोग, मेदवृद्धि, नितम्ब के रोग, गले,
फेफड़ों तथा चर्म व दंत रोगों की सम्भावना रहती है। यदि बुध अशुभ स्थिति में हो
रचरण एवं उत्तराषाढ़ नक्षत्र का न चरण, नामाक्षर, राशि स्वामी. राक्षस धनु (9) 12 राशियों में यह नौवीं राशि है। इसका निर्देशांक 9 है। मल नक्षत्र के चार चरण, पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के चार चरण एवं पहला चरण मिलकर यह राशि बनती है। नीचे दी गई सारिणी में चंद्र के अंश, नक्षत्र, चरण, नामा नक्षत्र स्वामी, योनि, नाड़ी, गण की जानकारी दी गई है। चंद्र के अंश नक्षत्र चरण नामाक्षर राशि नक्षत्र योनि अंश कला से स्वामी स्वामी अंशकला 00.00 से 13.20 मूल से4 ये यो भा भी बृहस्पति केतु श्वान पर 13.20 से 26.40 पूर्वाषाढ़ 1 से4 भूथ फाढ बृहस्पति शुक्र वानर मा 26.40 से 30.00 उत्तराषाढ़ भ बृ हस्पति सूर्य नकुल अन्त्यमा इस राशि की आकृति धनुर्धारी की है। पृथ्वी के क्रांति अंशों पा विषवत रेखा से 20 से 25 अंशों तक इस राशि का प्रभाव माना जाता है। विशेषताएं इसे अंग्रेजी में सेजिटेरिअस (Sagittarius) कहते हैं। । यह समदेह की, करुणामय, पुरुष स्वभाव की, सौम्य, क्रूर, चंचल एवं शांत लक्षणों की द्विस्वभावी, सत्वगुणी, अग्नितत्त्व की, पीले रंग की दिवसवली, अल्प संतानयुक्त, क्षत्रिय जाति की, पृष्ठोदयी, विषम राशि है। इस राशि का निवास स्थान सैंधव देश है। स्वामी बृहस्पति एवं अंक 3 है। शरीर की दोनों जांघों, छाती एवं कूल्हों पर इस राशि का प्रभाव माना गया है। शस्त्र-अस्त्र, घोड़े, वाहन, नमक, कंदमूल, आलू, अन्न, वस्त्र, रबर, चरबा, कागज, बीमा व्यवसाय एवं समुद्र से उत्पन्न होनेवाली चीजें तथा औषधि विज्ञान । पर इस राशि का प्रभाव रहता है। । मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में स्पेन, अरब, ऑस्टेलिया. हंगरी का प्रतिनिधित्व राशि करती है। जातकों का भविष्य धनु राशि के व्यक्ति अनेक कलाओं में प्रवीण होते हैं। उनकी शाराएवं मानसिक शक्ति उत्तम श्रेणी की होती है। स्पष्ट बोलनेवाले, एकांतप्रिय यासी जैसा जीवन जीनेवाले, अज्ञातवास, मिथ्यापवाद, कारावास, विषप्रयोग इत्यादि का इन्हें भय रहता है। हास्पिटल, अनाथाश्रम, काराग्रह जैसी समाजसेवी संस्थाओं में ये अच्छा काम कर सकते है। दीर्घयोग, महत्त्वाकांक्षा, दूरदेशी एवं पामाणिकता के कारण 36 या 40वें वर्ष में श्रेष्ठपद पर आसीन होते हैं। इनकी नाक, कान, गरदन, साधारण रूप में बड़ी होती है। नीतियों का विशेष शान रखनेवाले, गुप्त शत्रुओं से पीड़ित, अधिक जनसंपर्क से जुड़े व्यवसाय से धन कमानेवाले होते हैं। धन राशि की महिलाएं स्थूलकाय होती हैं। इनके होंठ बड़े होते हैं और ये श्रेष्ठ जानी होती हैं। बाहू एवं कमर के नीचे का हिस्सा मजबूत रहता है। पति के हर कार्य में इनके द्वारा हस्तक्षेप होता है। अपकीर्ति या बदनामी का डर रहता है। जातकाभरण के अनुसार धनु राशि के स्त्री-पुरुष धर्मप्रिय, बुद्धिमान, प्रतापी एवं विद्वान होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विशेष प्रगति करते हैं। राजकीय नेताओं एवं मान्यवरों से उचित सम्मान इन्हें प्राप्त होते हैं। परिवार में भी इनका सक्रिय सहयोग होता है। परमात्मा में विश्वास करते हैं। पुत्रसुख उत्तम मिलता है। इन्हें गुस्सा बहुत जल्द आता है किंतु शीघ्र ही शांत भी हो जाते हैं। जन्म से पहला वर्ष शारीरिक कष्टों में गुजरता है। रोगबाधा, जीवनबाधा योग रहता है। 13वें साल में अरिष्ट योग बनता है। आयु 68 से 75 तक रहती है। अनुभवसिद्ध फलित धनु राशि के व्यक्ति धर्म में आस्थावान, धैर्यशाली, उत्साही एवं दृढ़ निश्चय से स्वयं की भाग्यवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। अध्ययनप्रिय, कलासक्त, एकांतप्रिय, साफ-सफाई प्रिय, व्यवहारकुशल, गंभीर, परिश्रमी, श्रेष्ठजनों के प्रिय, लेखन-भाषण कला में प्रवीण, स्वाभिमानी, बुरे काम बेहिचक करनेवाले, अपने मकान एवं वाहन का सुख लेनेवाले, विदेश यात्री, स्वभाव से हंसमुख एवं नटखट होते हैं। शिकार का शौक रखते हैं। इनका निशाना कभी खाली नहीं जाता। राजकीय क्षेत्र में मंत्री से मुख्यमंत्री तक बन सकते हैं। लेखक, हाईकोर्ट के जज, अध्यापक, प्राध्यापक, गणितज्ञ, एकाउंटेंट, टेक्नीशियन,ज्योतिषी, कीर्तनकार, इनकमटैक्स, सेल्सटैक्स सलाहकार इत्यादि क्षेत्रों में सफल व्यवसायी होते हैं। प्रतिकूलता .किसी भी वर्ष का जून मास। • हर महीने की 3,9,18,24 तारीखें। • शुक्रवार। • नीला रंग, नीले रंग के वस्त्र, नीले रंग की चीजें। • कर्क, वृश्चिक एवं मीन राशि के व्यक्ति।जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएं ___ आयु के 17 से 26 या 30 से 35 वर्ष में विवाह योग बनता है। 18 से तक धन प्राप्ति, ख्याति, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी, निजी मकान बन सभी क्षेत्रों में प्रगति के हकदार बनते हैं। 38 से 47 वर्ष में कई कठिन प्रसंगों गुजरना होगा। 48 से 60 वर्ष में आर्थिक तंगी रहेगी। मानसिक अस्वस्थता बढी 61 से 69 वर्ष में आर्थिक तंगी दूर होकर विविध मार्गों से धनागम होगा। लॉटरी से भी धनलाभ संभव है। आयु 75 वर्ष की रहेगी। विशेष उपासना धनु राशि के स्त्री-पुरुष ग्रामदेवता, कुलदेवता, स्थान देवता के कोप के कारण दुखी रहते हैं। श्वास, उदरशूल, नाभिशूल, हृदयशूल, कटिशूल आदि व्याधियों से परेशान रहते हैं। कुशाग्र बुद्धि होने पर भी समय-समय पर उन्हें अपयश प्राप्त होता है। इन सभी परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए नित्य महामृत्युंजय का जाप करें। साथ ही निम्न मंत्र का रोज 108 बार जाप करें: ॐ श्रीं देवकृष्णाय उध्वान्तकाय नमः। धनु राशि के जातकों को शनि ग्रह अनिष्ट फलदायी होता है, अतएव वे हर शनिवार को दाएं हाथ में एक लोहे की कील लेकर निम्न मंत्र बारह बार बोलकर उस कील को दक्षिण दिशा में फेंक दें। ॐ लोह दंड समंदानं यम प्रीतिकरं शुभम। हे लोहलांगल दिनित्वतः शान्ति प्रगच्छमे। मूल नक्षत्र में जन्मे जातक पुरुषः मूल नक्षत्र में जन्मे पुरुषों को पढ़ने-लिखने का शौक रहता है। वे कार्य तत्पर, निष्कपट, हास्यप्रिय, सरल मन के लेकिन कुछ हद तक क्रोधी, स्पष्टवक्ता, वाक्युद्ध में प्रवीण, हाजिरजवाब, कटुभाषी, अंधविश्वासी, धार्मिक कार्यों में खूब खर्च करनेवाले, घमंडी, दृढ़ निश्चयी, ज्योतिष प्रेमी, सुखी, संपत्तिवान होते हैं। बलिष्ठ शरीर, हिंसक प्रवृत्तियों से अपनी यक्ति-शक्ति के बल पर शत्रुओं का। परास्त करनेवाले धनु व्यक्ति मूल नक्षत्र में जन्मे होते हैं। जन्म समय में परिवार की हालत कुछ हद तक प्रतिकूल रहती है। परिवार पर आई अनेक प्रकार बाधाएं इन्हें देखने को मिलती हैं। तीव्र बुद्धि होने सज सलाहकार साबित होते हैं। कुछ मूल नक्षत्रियों की शिक्षा अधूरी रहती है, प्रवार मुनाफा मिलता है। शरीर से हृष्ट-पुष्ट व ऊंचे कद के होते हैं। जांघे बलिष्ठ हाता । फलाकर चलने की आदत होती है। पैतक संपत्ति एवं मिल्कियत काला दीर्घकाल तक प्राप्त होता है। वकील, न्यायाधीश, शिक्षक, लेखक, ज्योतिषी. धार्मिक, व्यवस क्षेत्रों में इनकी कुशलता प्रकट होती है। ल्कयत का लाभ इन्हेंजी मल नक्षत्र में जन्मी महिलाएं लंबी और हृष्ट-पुष्ट होती हैं। जांच छाती नितंब गठीले होते हैं। परिवार के व्यक्तियों से इनकी अनबन रहती है। क्रोधी पाव एवं अपना कहा सच माननेवाली होती हैं। सदाचारी, धैर्यशील, ढाढसी परंतु भोगविलास में मग्न रहती हैं। व्याधियां एवं उपाय मल नक्षत्र का पहला चरण जातक के पिता के लिए दूसरा चरण जातक की माता के लिए तथा तीसरा चरण स्वयं जातक के लिए आर्थिक दृष्टि से प्रतिकूल रहता है। चौथा चरण अनिष्ट नहीं करता। मूल के प्रथम तीन चरणों में जन्मे जातकों के लिए मूल शांति अपरिहार्य है। रक्त विकार, फेफड़ों की शिराओं में सूजन होना, पीठ की रीढ तथा स्नाय में दर्द सिर फिरना, मी आना, हिस्टीरिया जैसी बीमारियों के शिकार मल नक्षत्र में जन्मे स्त्री-पुरुष बनते हैं। योगक्षेम ठीक से चले एवं इन व्याधियों से मुक्ति मिले इसलिए नीचे लिखे मंत्र का कम-से-कम पांच हजार जाप एवं एक दशांश हवन स्वयं या योग्य ब्राह्मण द्वारा संपन्न करवा लें। ॐमातेव पुत्रं पृथिवी पुरुषमग्निगं स्वेयोनाव भारूषा। तां विश्वदेवेनुभिः संवदानः प्रजापतिः। विश्वकर्मा विमंचतु ऊ निऋतये नमः।। मन्दार की जड़ धारण करें। वैदूर्य रल का प्रयोग करें। चरण प्रभाव प्रथम चरण में जन्मे जातक स्वभाव से चिड़चिडे, व्याकुल चित्त, उदासीन, पित्त प्रकोप से पीड़ित, बने-बनाए काम बिगाड़नेवाले होते हैं। द्वितीय चरण: में जन्मे जातक वायुविकार, कब्ज, उदर व्याधि से ग्रसित, कपटपूर्ण आचरण करनेवाले, मिथ्याभाषी, अविश्वसनीय फिर भी सभी को प्रिय होते हैं। तृतीय चरण में जन्मा जातक कामकाज में आलसी, सुंदर, मृदुभाषी, जादूगरी करनेवाले तथा कामातुर रहते हैं। चतुर्थ चरण: में जन्मे जातक हृष्ट-पुष्ट,शत्रुओं पर विजय पानेवाले, विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब देनेवाले तथा गले के रोग से ग्रसित होते हैं। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में जन्मे जातक पुरुषः पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में जन्मे पुरुष दिखने में सुंदर, परोपकारी, प्रतिभासंपन्न, धनवान, विद्वान होते हैं, उदात्त, आप्त-मित्र, स्वकीय धोखा देते हैं। बार-बार पानी या तरल पदार्थ पीने की आदत होती है। अपने मृदुल व्यवहार से सबको अपना बना लेते हैं किंतु पिता से अनबन रहती है। जन्म स्थान से दूसरे स्थान पर भाग्योदय होता हा पत्नी कम बोलनेवाली, हमेशा उदास, दुखी एवं निराश रहती है। इसी कारण सएक से अधिक विवाह होने की संभावना रहती है। स्त्रीः पूर्वाषाढ नक्षत्र में जन्मी महिलाएं चरित्रवान, सत्यप्रिय, मदमा व्यवहारकशल, धार्मिक वृत्ति की होती हैं। इनका विवाह जल्द होता है कित छोटी आयु का होता है। पति सुख अच्छा रहता है। आर्थिक स्थिति सुदृढ रहती है पुत्र सुख भी प्राप्त होता है। कोर्ट-कचहरी के कामों में इनके हाथ अपयश लगता है। व्याधियां एवं उपाय मूत्राशय से संबंधित रोग, विक्षिप्तता, संधिवात, कामासक्ति, कैंसर आदि। व्याधियों से पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के जातक ग्रसित रहते हैं। इन व्याधियों से मुक्त होने के लिए निम्नलिखित मंत्र का पांच हजार जाप एवं एक दशांश हवन स्वयं करें या। योग्य ब्राह्मण द्वारा संपन्न करा लें। ॐ अपाधमप किल्विषमपकृत्यायमोरपः। अपामार्गत्वम स्मरणः दुःष्वण्य गूंसुव ॐ अद्भ्यो नमः॥ इस मंत्र जाप के साथ ही पानी से भरा घड़ा दान में दें। चरण प्रभाव प्रथम चरण: में जन्मे जातक निष्फल एवं विफल रहते हैं। जीवन का मध्यकाल चैतन्यपूर्ण रहता है। उचित सम्मान प्राप्त होता है। द्वितीय चरण: में जन्मे जातक चरित्रहीन, विपरीत संगति में रुचि रखनेवाले, साधारण बुद्धि के होते हैं। तृतीय चरण: में जन्मे जातक धन-धान्य एवं ऐश्वर्यसंपन्न, मातुलपक्ष से असहयोग पानेवाले, कुष्ठरोग से ग्रसित, चरित्र संपन्न होते हैं। चतुर्थ चरण: में जन्मे जातक साहसी, वीर, पराक्रमी एवं शत्रुहंता होते हैं। उत्तराषाढ़ नक्षत्र में जन्मे जातक पुरुषः उत्तराषाढ़ नक्षत्र में जन्मे पुरुष बोलने में लड़खड़ाते हैं। अनेक भाषाओं। के जानकार, वाक्कला में प्रवीण, सार्वजनिक कामों में रुचि रखनेवाले, अल्पायु, बुद्धिश्रेष्ठ, तीव्र स्मरणशक्ति से युक्त, स्वाभिमानी, कपड़ों के बारे में विशेष । सतर्क, सर्वजनप्रिय, दयालु होते हैं। नौकरी-व्यवसाय में हमेशा घाटा सहन करना। पड़ता है। वकील, जज, अध्यापक, प्राध्यापक, कलेक्टर, कमिश्नर, कीर्तनकार । ज्योतिषी, लेखक एवं प्रकाशक की हैसियत से सफल रहते हैं। स्त्री: उत्तराषाढ नक्षत्र में जन्मी महिलाएं मधरभाषिणी. आवभगत में तत्परः । पति की आज्ञा में रहनेवाली, बुद्धि चार्य से जीवन में यश पानेवाली, पुत्रसुल भोगनेवाली होती हैं। व्याधियां एवं उपाय उत्तराषाढ़ नक्षत्र में जन्मे स्त्री-पुरुष अधिकतर नेत्ररोग, कमर दर्द, जलन नएवंरोगों से त्रस्त रहते हैं। इन व्याधियों के शमनार्थ नित्य विश्वदेव पजन करें निम्न मंत्र का दस हजार जाप करें एवं एक दशांश हवन भी करें। विश्वेदेवा शृणुतेन गूहवं मे ये अन्तरिक्षेय य उपद्यविष्ठाय। अग्निजिव्हा तवायजत्रा आद्यास्मिन्वाहर्षि मादयधम।। ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।। चरण प्रभाव प्रथम चरण में जन्मे जातक उदारमना, गोरे, सुंदर, सुदृढ़ कायावाले, अच्छी सझबूझकै धनी, दानकर्ता,कला एवं कारीगरी में कुशल एवं सफल होते हैं। द्वितीय चरण: में जन्मे जातक कुशल वक्ता, सुंदर, गठीले, स्वभाव से कटोर,कंजूस,अनायास शत्रुओं से घिरे रहते हैं। तृतीय चरण में जन्मे जातक असफल, अभिमानी, जिद्दी, गंभीर वाणीयुक्त एवं मोटे होते हैं। चतुर्थ चरण: में जन्मे जातक जीवनीशक्ति से भरपूर, सदैव अद्भुत कार्य करने में लगे रहनेवाले, व्यापार में सफलता प्राप्त करनेवाले होते हैंजीचन अविष्य बर्षण धनु राशि का शास्त्रीय स्वरूप बहुकलाकुशलः प्रबलो महाविमलताकलितः सरलोक्तिभाका शशधरे तु धनुर्धरगे नरो धनकरो न करोति बहुव्ययम।। धनु राशि के जातक अनेक कलाओं में चतुर, शारीरिक-मानसिक और बौद्धिक शक्तियाँ बलवान होती हैं। निर्मल बुद्धि-व्यवहार पोषक, स्वच्छ-स्पष्ट वाणी बोलने वाले और कृपणतापूर्वक गय करते हुए धनवान् बनते हैं। (इनकी प्रवृत्ति एकान्तप्रिय और संन्यासी जैसी होती है। यदा-कदा पशु-आघात का भय होता है। अज्ञातवास, विषप्रयोग मिथ्यापवाद, कारावास आदि के भय से कष्ट भी सम्भव होता है। भिक्षागा चिकित्सालय, अनाथाश्रम, कारागृह, रिटेबुल ट्रस्ट तथा समाजसेवी संस्थाओं से इनका सम्बन्ध बनता है। अपने ही जीवनकाल में कई एक प्रियजन की मृत्यु (या विछोह) से खेदग्रस्त होना पड़ता है। दीर्घ उद्योग परिश्रम, महत्त्वाकांक्षा, दूरदृष्टि, पका इरादा, प्रामाणिकता आदि गुणों से ये लोग ३६ या ४० वर्ष की आयु के बाद श्रेष्ठ पद-पोजीशन प्राप्त । करते हैं। वरिष्ठ अधिकारियों से झगड़ा भी होता रहता है।)।।१।। दीर्घास्य कण्ठः पृथकर्णनासः कर्माद्यतः कुब्जतनुनपेष्टः।। प्रागल्भ्यवाक्त्यागयुतोऽरिहन्ता साम्नैकसाध्योऽश्विभवो बलाढ्यः।। इस प्रमाण के अनुसार धनु राशि के व्यक्ति श्रमशील एवं त्यागी होते हैं। सामान्य कद होता है। साहस व पराक्रम द्वारा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। इन्हें खाली रहना अच्छा नहीं लगता। वाकपटु और आकर्षक भाषण से सबका मन मोह लेते हैं। इस राशि के व्यक्ति बलाढ्य और राजा के प्रिय होते हैं। नाक-कान-चेहरा व कण्ठ औसत से कुछ बड़ा होता है। फालतू समय बर्बाद करना इन्हें पसन्द नहीं होता। ऐसे लोग नीति को विशेष महत्त्व देते हैं। नीति द्वारा ही स्वयं । कार्य करते हैं और वैसी ही नीति अपनाकर दूसरे लोग इनसे कार्य करा लेते हैं। (गुप्त शत्रुओं के कारण इनकी प्रगति में बारम्बार रुकावटें आती। है। अपने आलस्य और लापरवाही से ही कभी-कभी अपना नुकसान। कर बैठते हैं। कभी तीव्र अशुभ फल तो कभी तीव्र शुभफलों की प्राप्ति । होती है। जिन व्यवसायों में जन-सम्पर्क अधिक होता है, वैसे व्यवसाय । में इन्हें लाभ उठाना पड़ता है। गुप्त रीति से धन-संचय करना पड़ता ह। उदासीनता एवं शोकपूर्ण प्रवृत्ति को त्यागना इनके लिए अ होता है। ये लोग संकल्पवान और ठोस इरादों के धनी होते . पण्डअमण-मनोरंजन के एवं अपव्यय पसन्द नही मनोरंजन के प्रति कम रुचि रखते हैं, साथ ही अनावश्यक बातें पव्यय पसन्द नहीं करते और न ही ऐसी बातों को प्रश्रय देते हैं। व-शस्त्र-संचालन में रुचि हो सकती है। धनु राशिवाली महिलाएँ चापः चापलग्ने वा स्थूलोष्ठरदनासिका । कफवाताधिका पुष्ट-भुजोरुानसंयुता ॥३॥ धर्मे मध्यमतिः कार्य रता पतिविरोधिनी। सर्पाद्वा मुखरोगाद्वा कफाद्वा मृत्युमाप्नुयात् ॥४॥ धन राशि (लग्न) की महिलाएँ मोटे शरीर और मोटे होठवाली तो होती ही हैं, साथ ही इनके दाँत भी कुछ बड़े होते हैं, नाक-नक्श भी स्थल कहे जा सकते हैं। ज्ञान-क्षमता श्रेष्ठ होती है। धर्म के मामले में सामान्य रुचि रखती हैं। बॉहे एवं कमर से नीचे के अंग प्रायः मजबूत होते हैं। पति के क्रिया-कलापों में हस्तक्षेप अथवा तर्क-वितर्क, कॉट- छाँट की आदत से युक्त होती हैं। सर्प-भय, मुख-रोग अथवा कफजनित रोगों से पीड़ा एवं मृत्युपद पाती हैं। कफ-वात प्रकृति-प्रधान ऐसी महिलाएँ होती हैं। (एकान्तप्रियता प्रमुख होती है। उच्चाधिकारी या अन्य बड़े लोगों से शत्रुता, अपमान या अपकीर्ति का भय होता है। फिल्म- इण्डस्ट्रीज में रुचि होने पर लोकप्रियता प्राप्त हो सकती है।)॥३-४|| जातकाभरणोक्त चन्द्र-निर्याणाध्याय के अनुसार- प्राज्ञो धर्मी सुपुत्रश्च राजमान्यो जनप्रियः । द्विजदेवार्चन प्रीतिर्वस्तुसंग्रहतत्परः ॥५॥ धनु राशि के व्यक्ति अधिकांशतः धर्मप्रिय, बुद्धिमान, प्रतापी और विद्वान् होते हैं। अध्ययन में विशेष सफलता प्राप्त करते हैं। राजनेताओं ' एवं आदरणीयजनों से पर्याप्त सम्मान प्राप्त करते हैं। समाज-परिवार में भी अपना उत्तम स्थान बनानेवाले व पुत्रवान् होते हैं॥५॥ सभायां च भवेद्भक्तो सुनखी सुमतिः शुचिः । स्थूलदन्ताधरग्रीवः काव्यकर्ता प्रगल्भकः ॥६॥ देवता और ब्राह्मणों के भक्त होते हैं। इनके हृदय की पवित्रता अपना एक अलग स्थान रखती है। सुन्दर नख, स्थूल दाँत और सामान्य कुछ मोटा होंठ होता है। अपने ही बुद्धि-विवेक से सफलता प्राप्त करनेवाले, मधुर कण्ठ से युक्त और रचनाकार होते हैं।।६।।रिवार में विशेष ( म कुलशाली वदान्यश्च सभाग्यो दृढ़सौहृदः। निम्नपादतलः क्लेशी साहसी विनयान्वित अपने वंश और परम्परा को महत्त्व देने के कारण परिवार में स्थान प्राप्त करते हैं। संकल्प के धनी और भाग्यवान् ऐसे जातक इनके पैर का निचला हिस्सा गहरा होता है। मित्र बना लेने की दक्ष और साहसी प्रवृत्ति के होते हैं व नम्र स्वभाव होता है। शान्तः क्षिप्रकोपी च तापसः स्वल्पभुग्नरः। स्वल्पापत्यो सुबंधुश्च पूर्व वयसि वित्तवान् ।। शास्त्रकारों के अनुसार इनको क्रोध जितनी जल्दी आता है. उनकी ही शीघ्रता से ये शान्त हो जाता है। धैर्यवान् और अल्प भोजन के बार होते हैं। सन्तोष की मात्रा भी पर्याप्त होती है। इन्हें अल्प सन्तान और अल्प बन्धु का सुख मिलता है तथा पूर्वार्ध जीवन में धनी होते हैं। सबाधः प्रथमे वर्षे महापीडा त्रयोदशे। अष्टषष्टिमितं प्राहुरायुर्वा पंचसप्तति ॥६॥ चन्द्रे सर्वशुभैदृष्टे शतवर्षाणि जीवति । आषाढस्याऽसिते पक्षे पंचम्यां भृगुवासरे ॥२०॥ उपरोक्त प्रमाण-वाक्य के अनुसार जन्म से पहला वर्ष बाधाओं के साथ व्यतीत होता है। रोग-बाधा, आयुष्य-बाधा का कुयोग भी इसी आयु में संभव होता है। जीवन के १३वें वर्ष में विशेष अरिष्ट योगों का सामना करना पड़ता है। शास्त्रकार के मतानुसार ६८ अथवा ७५ वर्ष की पूर्णायु का उल्लेख प्राप्त है।।६।। यदि धनु राशिस्थ चन्द्रमा सभी शुभ ग्रह के द्वारा दृष्ट हो तो निश्चय ही ऐसे जातक की पूर्णायु १०० वर्ष मानी गयी है। शास्त्र-वचनानुसार आषाढ़ मास में कृष्णपक्ष पंचमी तिथि और गुरुवार का संयोग बने एवं-1॥१०॥ निशायां हस्तनक्षत्रे निधनं सर्वथा भवेत् । निर्याणमिति सम्प्रोक्तं चन्द्रे सूतौ धनुस्थिते ॥११॥ हस्त नक्षत्र हो और रात्रि का समय हो तो इन सब योगों के एक साथ । मिलने पर जीवनी शक्ति समाप्त होने की प्रबल संभावना होती है। (पाद- टिप्पणी के रूप में) यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि खान-पान, नियम-संयम, रहन-सहन एवं आचरण की शुद्धता के आधार पर राशिवाले भाग्यशाली पुरुषों को १०० वर्ष की दीर्घायु प्राप्त होता है। अन्यथा इनकी आयु का १,१३.६८.७५वाँ वर्ष जीवनशक्ति को क्षयकरनेवाला होता है। एकाध बार कर्म में पदावनति .. होना, फौजदारी (वामन फेफड़ा जैसे असाध्य रोगों की द्वारा आयु (जीवनशक्ति) का -भविष्य-दर्पण होता है। एकाध बार ऐसा प्रसंग भी आ सकता है कि नौकरी- पदावनति Demotion होना, पदच्युति (सस्पेण्ड) होना, निर्वासित जिदारी (वाद-विवाद-अभियोग) से कारावास भुगतना, हृदय- असाध्य रोगों का होना अथवा अन्य किसी भी कारण-विशेष जय (जीवनशक्ति) का क्षय होना, असमय में ही (अकाल) मृत्यु सम्भव होता है। इस राशि का एक लक्षण यह भी है कि इनकी धन- पति दुष्ट-प्रकृति के लोग हड़प कर लेते हैं या चोरी चला जाता है। साप-बेटा एक साथ एक जगह खुशहाल नहीं रहते। अर्थात अपने पिता के साथ अथवा अपने पुत्र के साथ सम्मिलित रहने पर कष्ट ही होता है। बा-पत्र एक साथ उन्नति की एक ही दिशा में अग्रसर नहीं हो पाते। कभी अच्छी सफलता का अवसर इनके सामने आता है तो विरोधी पदा हो जाते हैं या देवकोप से कोई दुर्घटना हो जाती है, जिससे सफलता- मिका मोह त्यागना पड़ता है। परामर्श है कि इन राशिवाले लोगों को रुपये-पैसे के रूप में ऋण का लेन-देन (आर्थिक व्यवहार) कभी नहीं करना चाहिए, अन्यथा उपरोक्त कारणों में से कोई भी कारण असमय में इनकी आय का काल बनकर दुःखदायी हो जाता है। ऐसी स्थिति में इन्हें देवाराधन. गरु-भक्ति एवं श्रेष्ठजनों के सादरातिथ्य का अवलंब लेना बहत आवश्यक होता है और अब ग्रहपीडोपशमनार्थ रत्नाभरणोक्त उपचार का परामर्श दिया जाता है-||११|| "धने यदा ग्रामभवस्य दोषः शूलं सकासं ज्वरयुक्तदेहम् । प्रत्यंगिरायाश्च सुदीपदानात् मृत्युञ्जयाराधनतश्च शान्तिः।१२।" धनु (लग्न राशि के जातक अपने ग्राम-देवता (अर्थात् कुल-पूज्य देवता, स्थान-देवता, वास्तु देवता आदि) के कोप से पीड़ित होकर श्वास- कास-उदर-शूल-नाभिशूल-हृदयशूल-कटिशूल और ज्वर से पीड़ित होते है। मतान्तर से, अजीर्ण-रोग के कारण मलेरिया, अर्धागवायु, ब्लड प्रेशर, ' श्वासनलिका-विकृति आदि की सम्भावना दुःखदायी होती है। कुशाग्रमति- ताक्ष्ण बुद्धि होते हुए भी इन्हें प्रसंगानुकूल सफलता न मिलने से इधर- उधर मन भटकता है, परिणामस्वरूप ये लोग रोगी, आलसी, प्रमादी और लापरवाह बन जाते हैं। धनु राशि वालों के लिए नीतिवचन- “उद्योगिन अरुपसिंहमुपैति लक्ष्मी:" चरितार्थ नहीं होता और ये "भाग्यं फलति सर्वत्र विद्या न च पौरुषम" के विरोधी बन जाते हैं, इसलिए इन्हें व्यवाधिकारस्ते मा फलेष कदाचन" गीता के इस वचन पर बड़ी मस्या हो जाती है. अतएव इन्हें श्रीप्रत्यंगिरादेवी के प्रीत्यर्थ जप-हवन-
श्रेयस्कर सिद्ध होती ले लोग प्रतिदिन जप करें।।१२।। लोहे का बना हुआ जीवन-भविष्य-दर्पण अनुष्ठान-दीपदान तथा श्रीमहामृत्युंजय की आराधना श्रेयस्कर है। दैनिक कल्याण और मंगलमय जीवन चाहनेवाले लोग शुद्धतापूर्वक निम्नलिखित मन्त्र का १०८ बार (एक माला) जप करें ॐ श्री देवकृष्णाय ऊध्वन्तिकाय नमः।। धन राशिवालों को शनिदेव मारक प्रभाव दत ह. अतः - दिन इस मन्त्र का १२ बार उच्चारण करके एक पक्के लोहे का का कील (काँटा) घर से दक्षिण दिशा में फेंकना चाहिए। मन्त्र- ॐ लोहदण्डसमं दानं यमप्रीतिकरं शुभम् । हे लोहलांगलादीनि त्वत्तः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२३॥ धनु राशि का स्वानुभूत जीवन-फल शास्त्रीय वचनानुसार- ना स्वर्णभाः शैलसमादयोऽतिशब्दो दिनं प्राग्दृढ़रूक्षपीतः। राजोष्णपित्तो धनुरल्पसूतिसंगो द्विमूर्तिर्द्विपदोऽग्निरुग्रः॥१४॥ __आपका जीवन धार्मिक आस्था, विश्वास, साहस, उत्साह और दृढ- निष्ठा से भरा-पूरा है। आप अपनी उन्नति और भाग्यवृद्धि-हेतु प्रत्येक । कठोर साध्य मार्गों पर चलने को तैयार रहते हैं। वचन के धनी और पक्के तथा क्षण-प्रतिक्षण विचार बदलते रहनेवाले व्यक्ति आप हैं। आपकी विचारधाराएँ दार्शनिक, धैर्ययुक्त, अध्ययन-प्रिय, कला-प्रेमी, एकान्त- प्रिय, स्वच्छता-प्रिय, आराम-पसन्द, उदार सहानुभूति-पूर्ण, स्पष्टवक्ता विनम्र, शान्त, दयालु, परोपकारी, सौन्दर्य-प्रेमी, व्यवहार-कुशल, समय के पाबन्द, गम्भीर, परिश्रमी और बड़ी गहराई तक सोचने की शक्ति रखते हैं। स्वामी गुरु, क्षत्रिय वर्ण, अग्नि तत्त्व. द्विस्वभाव संज्ञा, सुन्दर स्वभाव पित्तप्रकृति, कठोर सिद्धान्तों को अपनाने वाले, सात्त्विक वृत्ति और विचार वाले, श्रेष्ठजनों के प्रिय, लेखन-भाषण-शिल्पकलाओं में निपुण, दिव्य- स्त्री से युक्त, अभिमानी, गलत कार्यों को निःसंकोच न करनेवाले, मनोहर । बोली, तेजस्वी, स्थूल शरीर, चतुर एवं अत्यन्त कठोर परिश्रम से ख्याति । प्राप्त करनेवाले व्यक्ति आप होंगे। माता-पिता से सुख, मान-प्रतिष्ठा। मकान-मोटर-नौकर-चाकर तथा रोजगार-हाल का सुख सुन्दर होगा कलाकार, शिक्षक, विद्वान लेखक क्लर्क, डाइरेक्टर या नेता हान १ शक्ति आपमें भरपूर पाई जाती है। वेद-शास्त्र-पुराण एवं धर्मो में होगी। हृदय और स्वास्थ्य की सुरक्षा कर पाना आपके लिए बड़ा पड़ेगा। जिन्दगी में कई बार देश-विदेश की यात्राएँ करनी पड़ेगी। आपका स्थाई नहीं रहेगा, लड़कपन जैसी विचारधारा हमेशा र
पापण्य-दपण १११ भाव शरारती और हँसमुख होगा। बोच-चाल खेल में निशानेबाज होंगे। आपका लगाया हुआ निशाना शायद ही भी खाली चला जाय। आपकी चाल-ढाल तथा और पेचीदा ही रहेगा, ताकि कोई भी आपके रहस्य का पता पा सके। परदेश-यात्रा से आपका भाग्योदय होगा। मित्रों की भरमार गी। आतिथ्य-सत्कार के अनेकों अवसर मिलेंगे। विदेशों से सम्पर्क किन्त पारिवारिक व्यवहार आपके लिए कष्टकारक रहेगा। नशीले का सेवन यदि आप करेंगे तो विशेष मानसिक कष्टों का सामना रना होगा। १७ से २६ वर्ष की उम्र तक विवाह के योग पाये जाते हैं। पानी के साथ का जीवन कलह और दुःख से भरा-पूरा होगा, परिवार का सख कम मिलेगा। सन्तान बहुत ज्यादा पैदा हों या बिल्कुल सन्तानहीन रहे अथवा सन्तान-पक्ष से आपको गहरी चिन्ता बनी रहे अर्थात् किसी भी प्रकार से आपको सन्तान की तरफ से सुख नहीं मिलेगा। जून का महीना ३.६.१८, २४ तारीखों और शुक्रवार का दिन आपके लिए हमेशा घातक है, अतः इन दिनों सावधानीपूर्वक रहने की आदत डालें। जहाँ तक हो मक, मेष, सिंह, धनु और कुम्भ राशिवाले प्राणियों से ही मित्रता करें तो लाभदायक होगा। पूर्व दिशा की यात्रा गुरुवार को करें तो निश्चय ही कार्य सिद्ध होता रहेगा। बशर्ते कि आप अपना राशिवाला यन्त्र अवश्य धारण कर लें। किसी अपराधी को शीघ्र क्षमा प्रदान करना आपके स्वभाव में नहीं है। पारिवारिक कारणों से प्रायः आपका मन दुःखी रहेगा। दौड़- धूप और चटकार चीजें खाने की आदत रहेगी। आप अपना स्नान-ध्यान, भोजन, जलपान, सोना-उठना ठीक नियमित समय पर नहीं कर पाते, इसी वजह से कभी-कभी आप अपने को बीमार करार देते है। जन्म से १७ वर्ष तक तथा ४ से ६० वर्ष तक आपका मन एकाग्र नहीं रहेगा। बना नियम-संयम के अपना कार्य करते रहेंगे। रुपये पैसों की कमी से चन्ता, परेशानी और मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। विद्याध्ययन, पराक्षा, व्यापार और नौकरी के क्षेत्र में बहुत ज्यादा मेहनत करने पर सफलता मिलेगी। साधारण तौर पर आपके निजी सम्पर्क में रहनेवाले घाखा देते रहेंगे। खर्च बढा-चढाकर करने की आदत होगी। १८ यवसाय में इतनी ज्या लोग आपको नुकसान २७ वष तक की अवस्था में सन्तोषजनक धन का लाभ, ख्याति-मान- तष्ठा, भाग्योदय, धार्मिक प्रवत्ति, जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री, पदश की यात्राएँ और कारोबार-नौकरी, कृषि अथवा मशीनरी म इतनी ज्यादा सफलता प्राप्त होगी कि जलने-भुननेवाले दुश्मन पिको नुकसान पहुँचाने की हर मुमकीन कोशिश करने लगेंगे। ३८
नों-परेशानियों नाइयों और कानूनी ११२ से ४७ वर्ष तक की अवस्था में आपको परिवार की उलझनों-परेल का डटकर सामना करना पड़ेगा। आर्थिक कठिनाइयों और फसादों की स्थिति पैदा हो जायेगी। खर्च तगड़ा, मित्रों से, दुश्मनों से हानि, निजी-सम्पत्ति की चोरी इत्यादि अनेक प्रकार फल देखने पड़ेंगे। ६१ वर्ष से ६६ वर्ष तक का समय चारो ओर धन-दौलत दिलानेवाले होगा। सट्टा, जुआ या लाटरी से अधिक मिलेगा। सभी दुःख और दरिद्रता दूर हो जायेगी, मगर शरीर सखी । एवं स्वस्थ नहीं रह पायेगा। खासतौर से Heart. Hernia. store __Typheid and insomnia जैसी बीमारी लगी रहेगी, इसी दौरान ७ वर्ष २ मास ७ दिन की अवस्था में आपकी मृत्यू भी होगी। धन राशि वाली स्त्रियाँ व्रत-पूजा-पाठ में रुचि, दान-उपकार और मदद करने में दक्ष, गीत-संगीत-शिल्प-नृत्य, घर-गृहस्थी, सन्तान-पालन आदि विविध कलाओं में पूर्ण विदूषी रहती हैं और अपने पति के पूर्व स्वर्ग सिधारने। का सौभाग्य प्राप्त करती हैं। अखण्ड सौभाग्यवती होती हैं।॥१४॥ यदि आपकी धनुराशि है तो आपका जीवन एक गतिशील ध्रुव है जो कि निरन्तर प्रगति की प्रेरणा देता है। साधारण स्थूल-रोगयुक्त-मजबूत शरीर, ऊँचा माथा, लम्बी नाक, गौर (रक्त) गेहुँआ रंग, मनमोहक आकृति, गम्भीर हृदय, उदार, तेजस्वी, शिल्प कर्म में रुचि, न्यायप्रिय, बन्धु-द्वेष, पैतृक धन का उत्तम सुख, प्रेम के वशीभूत होकर सबका प्रेमी बनना, परन्तु जबर्दस्ती किसी के काबू में न आना, अपने परिवार में गौरव प्राप्त करना, अधिक पुत्र सन्तति का सुख और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते । रहना धनुषाकार धनु राशि का लक्षण है। आपका भाग्य आपत्ति काल। में उचित सलाह देनेवाला एक सच्चा मित्र है। आप प्रायः सात्विक- राजसी-तामसी तीनों गुणों से प्रभावित व्यक्ति हैं, सुख-दुःख के प्रवास काल में बुद्धि व प्रयत्न के बल से सत्त्व-रज-तम में से किसी भी गुण स्वीकार कर सकते हैं। वकील, न्यायाधीश. धर्मोपदेशक और धना बन अथवा ऐसे लोगों की संगति करना धनराशि का गुण है। सभा रा में धनुराशि परस्पर सहायक, उत्कर्षदायक, महत्त्वदर्शक, उच्च स्थिति का निर्माता तथा आपको सत्ताधिकारी बनाने में समर्थ है। शरीर में कमर-रोग, कर्ण-पीड़ा, स्मरणशक्ति की कमी, च तपट में गैस आना, जोड़-जोड में दर्द, ज्वरादि प्रकाप से कभी-कभी पीड़ित रहना पड़ेगा। प्रतिवर्ष जन मास, प्रतिमास र ताराब, शुक्रवार का दिन, कर्क, वृश्चिक, मीन राशिवाले व्या नीला-काला रंग के वस्त्रादि पदार्थ आपके लिए उपयुक्त नही ए उपयुक्त नहीं है। किसीकी जिम्मेदार पद को सम्भालने में आप समर्थ रहेंगे। आप किसी भी जाति । और धर्म में पैदा क्यों न हुए हों, लेकिन स्वभाव के अन्दर राजपूत-क्षत्रियों जैसा साहस अवश्य होगा। आपका राश्यधिपति बृहस्पति शुभग्रह होने के नाते शुभ फल तो देता ही रहेगा, किन्तु गुरु जब अपना अशुभ फल देता है तो सर्वथा विनाशकारी ही हो जाता है। गुरु का सीधा अर्थ है भारी। गुरु का अशुभ फल विश्व का कोई भी प्राणी सहन नहीं कर सकता। गुरु महाराज का अशुभ प्रभाव तो तत्क्षण होता है, किन्तु उनके शुभ फल- प्राप्ति में ज्यादा से ज्यादा विलम्ब हो जाता है। गुरु महाराज के प्रसन्ननतार्थ गुरुवार का नियमित व्रत, किसी ब्राह्मण की नित्य सेवा, पुखराज रत्न अथवा आज्ञाचक्र जागृत पीताम्बरा श्रीकवच धारण करना विशेष उत्तम