अभिजित् नक्षत्र

 विशेष-(अभिजित् नक्षत्र)-

इस अति लघु नक्षत्र की कल्पना उत्तराषाढ़ा तथा श्रवण नक्षत्र के बीच की गई है। इस नक्षत्र में उत्पन्न होने वाला जातक कुलदीपक होता है।

निष्कर्ष-जन्मनक्षत्र बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। नक्षत्र का प्रभाव कुण्डली के फलित को कम-अधिक तो कर ही सकता है। कभी-कभी भारी अन्तर भी पैदा कर सकता है। अतः नक्षत्र का विचार अवश्य करना चाहिए। दूसरी बात नक्षत्र से सम्बन्धित देवता की पूजा विशेष रूप से सिद्धिदायक मानी गई है। अतः उपाय खण्ड में भी नक्षत्र की विशेष उपयोगिता है। मुहूर्त शास्त्र भी विवाह तथा गृह प्रवेश आदि कार्यों में जन्म नक्षत्र को वर्जित मानते हैं। अतः नक्षत्र विचार हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

जन्मनक्षत्र के अलावा अच्छे ज्योतिषी को कुण्डली का फलादेश करते समय विभिन्न भावों में पड़ने वाली राशियों, ग्रहों, युतियों, स्थितियों, दृष्टियों आदि के साथ-साथ उन नक्षत्रों को भी विचारना चाहिए, जो अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डली में मौजूद होते हैं। उनके ग्रहों तथा राशियों की भांति कुण्डली के भावों में लिखा नहीं जाता। अतः वे प्रत्यक्ष नहीं होते किन्तु विभिन्न राशि क्षेत्रों में सवा दो नक्षत्र उपस्थित रहते ही हैं। अतः परदे के पीछे छिपे रहने वाले नक्षत्रों को तथा उनके स्वामियों से किसी राशि में बैठने वाले ग्रहों के सम्बन्धों को जरूर विचारना चाहिए तभी फलादेश करना चाहिए। इसी प्रकार कुंडली में अप्रत्यक्ष रहने वाले विभिन्न भावों के कारकों की स्थितियों को भी विचारना चाहिए। तभी फलादेश करना चाहिए। और उसे चन्द्रकुंडली व नवमांश आदि में ’कन्फर्म’ करके ही जातक को बताना चाहिए। क्योंकि फलादेश सटीक न होने पर यद्यपि दोष ज्योतिषी का होता है किन्तु अपयश ज्योतिष विद्या को मिलता है। अतः धैर्यपूर्वक सर्वांगीण विचार व अध्ययन करके ही फलादेश करना चाहिए। जल्दबाजी में नहीं।

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