पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

 पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल


नक्षत्रो के नामकरण व महत्व

अश्विनी : सूर्य पत्नी छाया घोड़ी रूप मे सूर्य घोडा रूप मे रति के कारण दो अश्व मुख शिशु उत्पन्न हुआ। इस शिशु का नाम अश्विनी कुमार रखा गया जिसे कालान्तर मे आकाश मे स्थान मिला। यही अश्विनी नक्षत्र है।

भरणी : भरणी का शाब्दिक अर्थ भरण-पोषण करना है। वैदिक ज्योतिषी इसका अभिप्राय प्रजनन के बाद होने वाले शिशु के भरण-पोषण को मानते है। इसी कारण इसका प्रतीक चिन्ह योनि (स्त्री का प्रजनन अंग) है। इसका रचना से गहरा सम्बन्ध है, माना जाता है कि सृष्टि की रचना का प्रारम्भ इसी नक्षत्र से हुआ। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र-यह पच्चीसवां नक्षत्र शतभिषा नक्षत्र से अगले 1320’ क्षेत्र में भचक्र पर कुम्भ तथा मीन राशियों के क्षेत्र में अवस्थित है। इस नक्षत्र के प्रारम्भिक तीन चरण कुम्भ राशि के क्षेत्र में पड़ते हैं। इस नक्षत्र के दो तारे वर्तुल आकृति बनाते हैं। इस नक्षत्र के देवता अजैकपाद तथा स्वामी गुरु/बृहस्पति हैं।

     पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में उत्पन्न पुरुष जातक भोगी-विलासी किन्तु राजाओं द्वारा मान प्राप्त करने वाला होता है। ऐसा जातक प्रायः निद्रालु, बातूनी और व्यर्थ समय को नष्ट करने वाला होता है।

     पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में जन्मी स्त्री जातक अति धनवाली (धनियों में प्रधान), विद्या-सज्जनों के संग से युक्त, सत्पात्र को दान देने वाली तथा पुत्र की इच्छा रखने वाली होती है। ऐसा जानकारों का मत है।

कृतिका : सप्त ऋषि की पत्नियो काे शिव पुत्र कार्तिकेय ने अपहरण कर उन्हे अपनी पत्निया बना लिया। इन्ही ताराओ का समूह कार्तिकेय के नाम पर कृतिका कहलाता है।

रोहिणी : नक्षत्रो को जीवधारी प्रतिपादित कर दक्ष प्रजापति ने उन्हे अपनी पुत्रिया मानकर चन्द्रमा से विवाह किया इनमे एक का नाम रोहिणी है, जो चन्द्रमा की सबसे प्रिय पत्नी है। रोहिणी का मूल शब्द रोहण है, जिसका अर्थ उदय और विध्यमान होता है।

मृगशीर्ष : मृगशीर्ष का भी विवाह चंद्र से हुआ था। संस्कृत शब्द "मृग" यानि चन्द्रमा का लांछन जो हरिण के रूप में लगा है। कहते है कि शारीरिक इन्द्रिय प्रकोपन के कारण मृगशीर्ष ने अपने नजदीकी से मैथुन सम्बन्ध बना लिए थे , इसी कारण चन्द्रमा मे दाग़ लग गया है। लांछन इसी का प्रतीक है।

आर्द्रा : नक्षत्र चक्र का आर्द्रा ही वर्षा का प्रथम नक्षत्र है। सूर्य जब आर्द्रा में प्रवेश करता है तब पृथ्वी आर्द्र (गिला) होने का उपक्रम करती है। वैदिक ज्योतिष में इसे पृथ्वी का रजस्वला से होना माना है। आकाश का तेजस्वी तारा रूद्र भी इसी के साथ है।

पुनर्वसु : पौराणिक आख्यानो अनुसार देवताओ ने यज्ञादि के लिए जिस नक्षत्र मे अग्नि प्रज्ज्वलित की वह पुनर्वसु कहलाया। इस नक्षत्र की दर्शनीयता और सुंदरता पर भी इसका नाम पुनर्वसु रखा गया।

पुष्य : पुष्य का अर्थ पोषण, ऊर्जा व शक्ति प्रदान करने वाला है। मतान्तर से पुष्य को पुष्प का बिगड़ा रूप मानते है। प्राचीन नाम तिष्य शुभ, सुन्दर तथा सुख सम्पदा देने वाला है। विद्वान इस नक्षत्र को बहुत शुभ व कल्याणकारी मानते है। यह चन्द्रमा की स्व राशि कर्क का नक्षत्र है, यह बृहस्पति का जन्म नक्षत्र भी है। 27 नक्षत्रो में सबसे सुहाना व प्यारा नक्षत्र है लेकिन भारत मे इसमे विवाह वर्जित है।

श्लेषा या अश्लेषा : सूर्य जब अश्लेषा नक्षत्र मे प्रवेश करते है तब पृथ्वी और आकाश का श्लेष (आलिंगन) वर्षा के कारण होता है। इस समय सूर्य की किरणो के साथ बिजली कड़कती है। यह 27 नक्षत्रो में सबसे खौफनाक और भयानक नक्षत्र माना जाता है।

उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र

भाद्रपद एक युगल नक्षत्र है। इसके दो भाग पूर्वा और उत्तरा है। इसके मुख्य देवता सांप या भुजग या अजगर है। इसके चिन्ह भी युगल रूप मे है। पूर्वा यदि छिपा गुस्सा है, तो उत्तरा गुस्से को काबू करने की शक्ति है। यही दोनो मे अंतर है।

पूर्वा भाद्रपद

राशि चक्र मे 32000 से 33320 के विस्तार क्षेत्र को पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र कहते है। अरब मंजिल मे इसे अल फर्ग अल मुकदिम अर्थात पानी के मर्तबान मे चार टोटिया, ग्रीक मे मरकब, चीन सियु मे शिह कहते है। पूर्व + भाद्र + पद अर्थात पूर्व यानि पहले का, भाद्र यानि सुन्दर, पद यानि पाद होता है। इसके अधिष्ठाता देवता अजैकपाद पाद (अज यानि एकापथ अर्थात एक पैर का बकरा ) है। यह शिव का एक रूप अर्थात रूद्र है जो पुराणो मे वर्णित एक देवता है।

देवता अजैकपाद, स्वामी गुरु, राशि कुम्भ 2000 से मीन 0320 अंश। भारतीय खगोल का यह 25 वा ध्रुव संज्ञक नक्षत्र है। इसे पूर्व सुखी पाद या पूर्व पृष्ठाप्रदा भी कहते है। यह अशुभ, राजसिक, पुरुष नक्षत्र है। इसकी जाति ब्राम्हण, योनि सिंह, योनि वैर गज, गण मनुष्य, नाड़ी आदि है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है।

यह द्वि आकृति का नक्षत्र है। दो तारो वाला यह मण्डल दो जुड़वाँ शिशुओ जैसा दिखता है इसलिए इसे यमल सृदृश्य कहा जाता है।

अजैकपाद-शिव (त्रिमूर्ति)

प्रतीकवाद - इसके देवता अजैकपाद या अजिकपद है। ये प्राचीन असुर देवता है। इन्हे एक पैर का बकरा, आग का अजगर, शिव का एक रूप रूद्र कहा जाता है। एकपाद हिन्दू भगवान शिव के एक पैर पहलु को दर्शाता है। यह मूलतः दक्षिण भारत और उड़ीसा मे पाया जाता है। इसके तीन शास्त्रीय रूप है। 1 एकपाद मूर्ति - एक पैर और चार भुजा, एकपाद त्रिमूर्ति - एक पैर शिव के साथ ब्रम्हा और विष्णु के धड़, 3 एकपाद भैरव - शिव का अत्यंत भयंकर रक्त बलिदानो का रूपांकन।

विशेषताएँ - इस नक्षत्र का वर्णन अथर्वेद, तैत्तरीय संहिता, शतपथ ब्राम्हण मे मिलता है। जातक सभी कलाओ का विशेषज्ञ, शत्रुहंता, इन्द्रियों पर नियंत्रण करने वाला होता है। पहले तीन चरण में जन्मा जातक लम्बा और पतला होता है।

नक्षत्र फलादेश

पूर्वा भाद्रपद जीवन मे आध्यात्मिक अभिलाषा को ऊँचा उठाने वाला और स्वार्थपरता के प्रदेश से निकालने वाला, परिवर्तनकारी नक्षत्र है। जातक स्व योग्यता का पूर्ण विश्वासी, साधन युक्त, धन कमाने मे सफल, शक्तिवान और धनी मित्र वाला, खतरा लेने वाला, परस्थितियो का सामना करने वाला, ग्रहण करने योग्य, अधिक सोने वाला, व्यर्थ समय व्यतीत करने वाला, जितेन्द्रिय, शत्रु नाशक, मितव्ययी होता है।

पुरुष जातक - इसकी एड़ी जमीन से ऊपर रहती है। यह मध्यम कद, चौड़े गाल, गुदेदार होंठ वाला होता है। जातक शांतिप्रिय, यदा-कड़ा भड़कने वाला, आर्थिक कमजोर लेकिन सम्मान पाने वाला, स्वनिर्भर, मददगार, स्वदिष्ट भोजन प्रिय, भुक्कड़ होता है।

जातक पक्षपात हीन, धर्मान्ता रहित, ईश्वरभक्त, शास्त्रो का पालन करने वाला, मितव्ययी, साधारण वस्त्र प्रिय, अवरोध और नफरत सहन करने वाला, व्यवसाय मे पारंगत, शासकीय सेवक हो, तो शीघ्र उन्नति करने वाला, समाज और अर्थ से आजाद जीवन व्यापन करने वाला होता है। उम्र वर्ष 23 से 34 तक अप्रत्याशित उन्नति करता है और 40 से 54 के मध्य स्थाई स्थिरता होती है।

यह व्यापारी, कोषालय कार्यकारी, लेखक, अभिनेता, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, शासकीय सेवक, अध्यापक होता है। यह माता के प्यार-दुलार से वंचित, पिता की विशेषताओ से गर्वित लेकिन विचारो मे मतभेद होने से विरोध रहता है। माता कार्यशीला होने से प्यार से वंचित होता है लेकिन माता की मृत्यु अन्य ग्रहो के प्रभाववश होती है। यदि शासकीय सेवक हो तो राजस्व अधिकारी होता है।

स्त्री जातक - स्त्री जातक मे पुरुष जैसे ही गुण दोष पाए जाते है। अंतर निम्न होते है।

1 यह न तो मोटी और न पतली न लम्बी न ठिगनी, सुंदर मूर्ति होती है। कोई-कोई इकहरे बदन की होती है।

2 ईमानदारी और निष्कपटता ये दो गुण मुख्य होते है। यदि सिर भी कट जाय तो यह नियम और सत्यमार्ग से नही डिगने वाली होती है। जन्मजात नेता, दूसरो से काम लेने वाली, शक्ति और अधिकार मिलने पर सफल आशावाद का प्रतीक होती है।

3 इसकी शिक्षा विज्ञान और तकनिकी मे होने के कारण अध्यापिका, सांख्यक, गणक, ज्योतिषी होती है।

4 इसकाे पति और संतान से विशेष लगाव होता है। गृह कार्य और गृह प्रशासन मे प्रवीण, संतान अधिक फायदे कारक होती है। यदि रोहणी जातक से विवाह हो तो संतान अधिक होती है।

आचार्यो अनुसार नक्षत्र फलादेश

पूर्वा भाद्रपद के जातक हमेशा उद्विग्न और तनावग्रस्त रहते है तथा छोटी-छोटी बातो पर चिढ़ जाते है। ये शांति की खोज मे अक्सर घर से बाहर भटकते रहते है और बाहरी लोगो पर विशेषतया स्त्रियो पर अधिक खर्च करते है। वैसे तो ये लोग चतुर होते है लेकिन स्त्रिया इन्हे मुर्ख बनाकर पैसे ठगती रहती है। - वराहमिहिर

वराहमिहिर की बातो की पुष्टि नारद भी करते है। ये लोग निंदा रशिक, हेकड़ स्वभावी ढोंगी होते है। विभिन्न स्वांग रचना, अन्यथा अपने को प्रदर्शित करना इनकी फितरत होती है। स्त्रियो के अलावा दूसरो को फूटी कोड़ी भी नही देते है। - नारद

इन लोगो की संकल्प शक्ति प्रशंसनीय होती है। सामान्यतः ये रात मे देर से सोकर सुबह देर से उठते है। रात्रि जागरण मे इनका व्यावसायिक उद्देश्य रहता है। चुस्त चौकस रहने वाले ये लोग हिम्मतवर भी होते है। इन लोगो का स्वभाव जटिल और दुर्गम होता है। इन लोगो मे ठण्डा करके खाने की आदत होती है यानि शत्रुता या मित्रता मे त्वरित भुगतान न करके समय आने पर चुकता करते है। - पराशर

चन्द्र : यदि चंद्र पूर्वा भाद्रपद मे हो, तो जातक अति कामुक, परिवर्तनकारी परन्तु दयालु, आदर्शवादी, भीरु, प्रभावोत्पादक, प्रवक्ता, निराश, चिड़चिड़ा, केंद्र भ्रष्ट होता है।

जातक आध्यात्मिक गहराई युक्त, अध्यापन दक्ष, रहस्यमय, अंतर्ज्ञानि, लेखक, ठिठोलिया, कार्य करने मे चतुर, धनी होता है। जीवन समस्या ग्रस्त होता है।

वराहमिहिर अनुसार साझेदारो पर आर्थिक सम्पन्नता होती है।

सूर्य : यदि सूर्य इस नक्षत्र मे हो, तो जातक रचनात्मक विद्वद्ता वाला, दीर्घकार्यकारी, अनियमित, विविधता प्रिय, लेखक, तुनुक मिजाजी, स्वाधीन, एकांत प्रिय होता है।

लग्न : जातक सुवक्ता, दार्शनिक, कामातुर, निरंतर निवास बदलने वाला, यात्रा शौकीन, राज्य से धनी, अपंने कार्य मे मसगुल, दीर्घायु होता है।

चरण या पाद फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे शनि, गुरु, मंगल ♂का प्रभाव है। कुम्भ 32000 से 32320 अंश। नवमांश मेष। यह आक्रामकता, मानसिक ऊर्जा, तोड़फोड़, दृढ़ निष्कर्ष का द्योतक है। जातक मेढे के सामान मुख और नेत्र वाला, स्त्रियो से अश्लील प्रेम करने वाला, भीड़ से दूर, अपमानित, पित्त पीड़ित, साहसी, धैर्य युक्त होता है। इस पाद का जातक अति आक्रामक, अन्तिम लक्ष्य पाने के लिए कर्मठ, विपरीत लिंग का शौकीन, शय्या सुख से अनभिज्ञ होता है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है। इसमे शनि, गुरु, शुक्र ♀का प्रभाव है। कुम्भ 32320 से 32640 अंश। नवमांश वृषभ। यह संतोष स्पष्टता का द्योतक है। जातक स्थिर सत्व बुद्धि वाला, राजा का प्रेमी, सैन्याधिकारी, सुभग, मैत्री पूर्ण स्वभाव वाला, स्नेहशील, मोटे दांत, बड़े नेत्र वाला होता है। इस पाद मे जातक रहस्य, काला जादू मे रुचिवान, पथ भ्रष्ट होने वाला होता है। यदि जातक रहस्यवादी हो, तो अच्छा ज्योतिषी और कला जादूगर हो सकता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे शनि, गुरु, बुध का प्रभाव है। कुम्भ 32640 से 33000 अंश। नवमांश मिथुन। यह संचार और जिज्ञासा का द्योतक है। जातक श्याम वर्ण, गोल मुख, सुन्दर, उत्कृष्ट, स्त्री-पुत्र युक्त, सुवक्ता, प्रसिद्ध, शक्तिशाली होता है। इस पाद का जातक ज्ञानवान, भौतिक स्तर पर कुशल, श्रेष्ट लेखक, अच्छा संचारवान होता है।

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी चन्द्र है। इसमे शनि, गुरु, चन्द्र का प्रभाव है। मीन 33000 से 33320 अंश। नवमांश कर्क। यह जादू की विद्या, सीमान्त परोपकारिता, तोड़फोड़, सामाजिकता का द्योतक है। जातक रक्त गौर वर्ण, छोटा गाल, पतली कमर, बुद्धिमान, चंचल चित्त, उत्साही, आशावादी, कोमलांगी पत्नी वाला होता है। इस पाद मे जातक वाह्य वातावरण मे संवेदनशील, परस्थितियो से विपरीत रहने वाला होता है। इनकी ऊर्जा को नकारात्मक के बजाय सकारात्मक मार्ग पर ले जाने की आवश्यकता होती है।

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप मे कहा है लेकिन अंतर बहुत है।

यवनाचार्य : पूर्वा भाद्रपद के पहले पाद मे शूरवीर, दूसरे पाद मे चोर, तीसरे पाद मे बुद्धिमान, चौथे पाद मे आगे चलने वाला या मुखिया होता है।

मानसागराचार्य : पूर्वा भाद्रपद के प्रथम चरण मे योगीन्द्र, द्वितीय चरण मे अंगहीन, तृतीय चरण मे शुभ लक्षण वाला, चतुर्थ चरण में धनवान होता है।

पूर्वा भाद्रपद विभूतियाँ

प्रसिद्ध रॉक स्टार माइकल जैक्शन का यह जन्म नक्षत्र है।

भारतीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की आपसी पूर्ण या पाद दृष्टि नही होती क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है।

सूर्य :

पूर्वा भाद्रपद सूर्य पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक स्त्रियो मे धन गंवायेगा और दुःखी होगा।

पूर्वा भाद्रपद सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो समझोतो मे धन कमाने और गवाने से मानसिक विकृत होगा।

पूर्वा भाद्रपद सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक विद्वान और दयालु होगा।

पूर्वा भाद्रपद सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक शत्रुहंता, सरकार से लाभवान होगा।

पूर्वा भाद्रपद चरण फल

प्रथम चरण - जातक उद्विग्न, तनावग्रस्त, अनियमित, बात-बात पर चिड जाने वाला, तुनुक मिजाजी, हेकड़ी युक्त स्वभाव वाला होता है। घर से बाहर रहता है।

द्वितीय चरण - जातक रचनात्मक विद्वदता वाला, स्वाधीन, स्वभाव से दुर्गम, निशाचर होता है। सुसराल से धन प्राप्त करने वाला, पेय पदार्थो का व्यवसायी होता है।

तृतीय चरण - जातक रचनात्मक कार्य करने मे सक्षम, आध्यात्मिक अभिलषा को ऊँचा उठाने वाला, दीर्घ कार्यकारी, सफल लेखक, अल्पायु होता है।

चतुर्थ चरण - जातक कार्य करने मे दक्ष, शांति की खोज मे बाहर रहने वाला, चुस्त-चौकस रहने वाला, व्यग्र, सिद्धांतवादी, हर परस्थिति मे अडिग रहने वाला, विविधता प्रिय होता है।

कुछ व्यक्तियो मे आध्यात्मिक शक्ति अन्तर्निहित होती है। वह गुप्त शक्तियो मे विश्वास रखने वाला होता है।

चन्द्र :

पूर्वा भाद्रपद चंद्र पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक राजा के सामान प्रजा पालक होगा।

पूर्वा भाद्रपद चंद्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक विद्वान तेज-तर्राट होगा।

पूर्वा भाद्रपद चंद्र पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक धनवान मुद्रा विनिमय करने वाला होगा।

पूर्वा भाद्रपद चंद्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक राजनीतिज्ञ होगा, शासन मे दखल रखेगा।

पूर्वा भाद्रपद चंद्र पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन, कामुक, वीर्यहीन होगा।

पूर्वा भाद्रपद चंद्र पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक सुखी, धनवान, जमींदार होगा।

पूर्वा भाद्रपद चंद्र चरण फल

प्रथम चरण - जातक परिवर्तनकारी परन्तु दयालु, भीरु, कामुक, बात-बात पर चीड़-चीड़ करने वाला, निराश, केंद्र भ्रष्ट होता है।

द्वितीय चरण - जातक आध्यात्मिक गहराई युक्त, शांति की खोज मे घुमक्कड़, बाहरी लोगो विशेषकर स्त्रियो पर धन खर्च करने वाला, अंतर्ज्ञानी, निर्भीक वक्ता होता है।

अन्यत्र कोई-कोई जातक ठिठोलिया, किसी की नही सुनने वाला, अपनी सोच को ही ठीक समझने वाला, जिद्दी स्वाभाव के कारण दूसरो का अहित करने वाला होता है।

तृतीय चरण - जातक धनवान, कार्य करने मे चतुर लेखक, सफल लेखक, अध्यापन दक्ष, स्त्रियो पर धन लुटाने वाला लेकिन दूसरो को एक पैसा भी नही देने वाला, धुन का पक्का होता है।

अन्यत्र पुरुष जातक बाहर से दिखने मे दुष्ट लेकिन अंतरंग से दयालु व दो पत्नियो वाला होगा। स्त्री जातक के पूर्व प्रेम सम्बन्ध होगे लेकिन प्रेमी से विवाह नही होगा। उसका वास्तविक विवाह सुखी होगा, वह बच्चो और पति के प्रति समर्पित होगी।

चतुर्थ चरण - जातक, सुन्दर, शांति का अन्वेषक, आध्यात्मिक, रहस्यज्ञानी, अंतर्प्रेरणा युक्त, दृढ़ संकल्प शक्ति युक्त, देर रात तक काम और देर तक सोने वाला होता है।

मंगल :

पूर्वा भाद्रपद मंगल पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक कलाविद, रुखा और हर प्रकार सुखी होगा।

पूर्वा भाद्रपद मंगल पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक माता के सुख से वंचित, अल्पकालिक मित्र वाला होगा।

पूर्वा भाद्रपद मंगल पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक मधुर भाषी, व्यवसाय मे झूठा होगा।

पूर्वा भाद्रपद मंगल पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक संचार वाहक, परिवार पालक, दीर्घायु, सदगुणी, मृदु होगा।

पूर्वा भाद्रपद मंगल पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक योन तृप्त, झगड़ालू, भाग्यवान होगा।

पूर्वा भाद्रपद मंगल पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक राजनीतिज्ञ, प्रसिद्ध, स्त्रियो से परे होगा।

पूर्वा भाद्रपद मंगल चरण फल

प्रथम चरण - व्यक्ति व्याकुल, चिड-चिड़ा, उद्विग्न, सकल्प सिद्धि के लिए कठोर कार्य करने वाला, जटिल स्वभाव वाला, हेकड़, जन्मजात पाखंडी होता है।

द्वितीय चरण - व्यक्ति स्त्रियो पर अनाप-शनाप पैसा खर्च करने वाला और दूसरो को कुछ भी नही देने वाला, चतुर होता है। लड़किया इसे मुर्ख बनाकर पैसा ठगती रहती है।

तृतीय चरण - व्यक्ति छोटी-छोटी बातो पर चिढ़ने वाला, निन्दा रशिक, हेकड़, ढोंग व स्वांग करने में माहिर, स्वयं को अन्यथा प्रदर्शित करने वाला, साहसी और खोजी होता है। वह सोचता कुछ और है और करता कुछ और है, इसलिए अंत मे नाम और यश पता है।

चतुर्थ चरण - व्यक्ति रात्रि जागरण के व्यवसाय करने वाला, रात्रि मे किये जाने वाले आपराधिक क्रत्यो मे सलग्न, जुंवा घर या क्लब, या काल गर्ल आदि कार्यो मे सलग्न, निशाचर होता है। वह लुहार, मशीनी इंजीनियर या भवन निर्माण करने वाला या कसाई होता है।

बुध :

पूर्वा भाद्रपद बुध पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक भीरु, धनवान, चिंताग्रस्त होता है।

पूर्वा भाद्रपद बुध पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक धन के लिए अवैध कार्य निसंकोच करने वाला होता है।

पूर्वा भाद्रपद बुध पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक ज्ञानवान, प्रमुख, संस्था अध्यक्ष होगा।

पूर्वा भाद्रपद बुध पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक दुःखी, निर्धन, निर्दयी होगा।

पुर्वा भाद्रपद बुध चरण फल

प्रथम चरण - जातक बहुत अधिक सोने वाला, व्यर्थ के काम करने मे समय गंवाने वाला, साधनयुक्त, धन कमाने मे सफल होता है। ये लोग ठन्डे रहकर शत्रुता या मित्रता समय आने पर ही निभाते है। यदि गुरु से युक्त हो, तो दूसरो के झगडे निपटने वाला, कानून विशेषज्ञ, स्वयं झगड़ो फसा रहता है।

द्वितीय चरण - जातक तनाव ग्रस्त, शांति की खोज मे घर से बाहर भटकने वाला, नारियो पर धन खर्च करने वाला होता है। चुस्त चौकस रहने वाले ये लोग हिम्मतवर भी पाए जाते है। रात में होने वाले साहसिक कार्यो मे इनकी सहभागिता नकारी नहीं जा सकती है। ये प्रकशक, संपादक, उपन्यासकार हो सकते है।

तृतीय चरण - जातक उद्विग्न, तनावग्रस्त, दूसरो की निंदा करने वाला, रात्रि मे कार्य करने वाला, अपने संकल्प के लिए कठोर कार्य करने वाला, जटिल और कठोर स्वभाव वाला, समय आने पर बदला लेने वाला होता है। उसकी पत्नी उससे ज्यादा बुद्धिमान होती है। यदि इस पाद मे लग्न हो, तो कैंसर हो सकता है।

चतुर्थ चरण - जातक स्त्रियो का रशिक, कुम्भकर्णी निद्रा वाला, निंदक, हेकड़बाज, समय आने पर शत्रुता या मित्रता निभाने वाला, अवैध तरीको से धन कमाने वाला होता है।

गुरु :

पूर्वा भाद्रपद गुरु पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक आकर्षक, मददगार होता है।

पूर्वा भाद्रपद गुरु पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक समाज नेता या राज नेता होता है।

पूर्वा भाद्रपद गुरु पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक विश्वासपात्र होता है।

पूर्वा भाद्रपद गुरु पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक शांतिप्रिय, धर्मी-कर्मी होता है।

पूर्वा भाद्रपद गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक कामुक, विद्वान, वाहनादि युक्त होता है।

पूर्वा भाद्रपद गुरु पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक की समस्त आकांक्षाऐ पूर्ण होती है।

पुर्वा भाद्रपद गुरु चरण फल

प्रथम चरण - जातक उद्विग्न, बात-बात पर चिढ़ने वाला, स्त्रियो पर धन खर्च करने वाला, रात्रि मे कार्य करने वाला, तनावग्रस्त होता है।

अन्यत्र - जातक दार्शनिक, सर्जन होगा, साधारण परिवार में उत्पन्न होकर परिश्रम व प्रयासो से उच्च स्थिति प्राप्त करेगा। चित्रा चरण 4 मे शुक्र हो, तो स्त्री या पुरुष जातक का पति या पत्नी डाक्टर या केमिस्ट होगी।

द्वितीय चरण - जातक घर से भटकने वाला, स्त्रियो के बहलावे-फुसलावे में आकर धन खर्च करने वाला, दूसरो को धन नही देने वाला, अदालत मे नौकर, अपनी विशेषता से क्षेत्र में प्रमुख होगा। यदि अाश्लेषा मे सूर्य हो तो 45 वर्ष की आयु मे राजनीति मे होगा।

तृतीय चरण - जातक उद्विग्न, छोटी-छोटी बात पर चिढ़ने वाला, दृढ़ संकल्प शक्ति वाला, वास्तविकता को बढ़ा चढ़ा कर प्रदर्शित करने वाला, ढोंगी, हेकड़ी युक्त, मोके की तलाश मे रहने वाला, आलसी या सुस्त होता है।

जातक अच्छे परिवार वाला, धन सम्पत्ति से सृमद्ध होगा। प्रशिक्षिण क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्र में कार्य करेगा।

चतुर्थ चरण - जातक मानसिक रूप से परेशान, स्त्रियो की चिकनी-चुपड़ी बातो मे आकर धन लुटाने वाला, देर रात तक कार्य करने का अभ्यस्त, सुबह देर तक सोने वाला, दीर्घ कार्यकारी, मोके की तलाश मे रहने वाला, समय पर बदला लेने वाला होता है।

जातक वैज्ञानिक अथवा आद्योगिक क्षेत्र प्रमुख, प्रशासक, या वित्तीय प्रमुख, तत्व मीमांसक होता है।

शुक्र :

पूर्वा भाद्रपद शुक्र पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक सुन्दर, खिलखिलाते चेहरे वाला होता है।

पूर्वा भाद्रपद शुक्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक आर्थिक व मानसिक रूप से पीड़ित होता है।

पूर्वा भाद्रपद शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक अनेक कलाओ का ज्ञाता होता है।

पूर्वा भाद्रपद शुक्र पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक मैथुन प्रिय होता है।

पूर्वा भाद्रपद शुक्र चरण फल

प्रथम चरण - जातक महा दिखावटी, ललनाओं के पीछे भागने वाला और उन पर धन खर्च करने वाला, रात्रि मे किये जाने वाले कार्यो मे माहिर, चतुर, चालक, उलझे स्वभाव वाला प्रतिकारी, माता-पिता को समर्पित, विदेश मे स्थापित होता है।

द्वितीय चरण - जातक शांति की खोज में घर से बाहर रहने वाला, स्त्रियो पर धन खर्च करने वाला, स्त्रियो से मूर्ख बनने वाला, ढोंग और स्वांग करने वाला, प्रदर्शनकारी होता है।

तृतीय चरण - जातक स्व योग्यता का पूर्ण विश्वासी, धन कमाने मे सफल, समाज सेवक, आन्तरिक सज्जाकार, जहर का व्यापार व्यवसाय करने वाला, नारियो की खरीद फरोख्त करने वाला, तस्कर, बहु निद्रा वाला होता है।

चतुर्थ चरण - जातक मानसिक परेशान रहने वाला, ललनाओ की खोज मे रहने वाला, रात्रि कार्य मे माहिर, देर रात तक जगने वाला और देर तक सोने वाला, समय आने पर बदला लेने वाला, अपने स्तर की जीवनसाथी पसंद करने वाला, शिशु रोग विशेषज्ञ होता है।

शनि :

पूर्वा भाद्रपद शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक की पत्नी बदसूरत होती है।

पूर्वा भाद्रपद शनि पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक माता के स्नेह से वंचित, चरित्रवान होता है।

पूर्वा भाद्रपद शनि पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक विपरीत मत के कार्य करने वाला होता है।

पूर्वा भाद्रपद शनि पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक नेक, धनवान, प्रतिष्ठित होता है।

पूर्वा भाद्रपद शनि पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक राज्य का शासक होता है।

पूर्वा भाद्रपद शनि पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक धनवान होता है।

पूर्वा भाद्रपद शनि चरण फल

प्रथम चरण - जातक अत्यधिक निराश, बात-बात पर गुस्सा होने वाला, दूसरो की निंदा करने वाला , चुगली करने वाला, आचरण भ्रष्ट, चुस्त, चालक, चौकस, महा कंजूस, हिम्मतवर होता है।

द्वितीय चरण - जातक उद्विग्न, तनावग्रस्त, स्त्री परस्त, अपनी योग्यता को पूर्ण मानने वाला, रात मे वृथा नहीं जागने वाला, कठोर स्वाभाव वाला, प्रत्येक कार्य की पूर्ण जानकारी रखने वाला होता है। जातक की पत्नी रोजगार युक्त होने से धनवान होती है।

तृतीय चरण - जातक कृपण, कृतध्न, जहर व नशीले पदार्थ (पेय पदार्थो को छोड़कर) तथा कामोत्तेजक पदार्थो का व्यापार व्यवसाय करने वाला, औरत माफिया, अन्धकार मे आपराधिक कार्यो में सलग्न, अपना बदला लेना नही भूलने वाला होता है।

यदि यह चरण लग्न हो, तो जातक के अंग प्रत्यंग सुन्दर होते है, जातक आकर्षक, केंद्र या राज्य में मंत्री या नगर प्रशासक होता है।

चतुर्थ चरण - जातक तनाव ग्रस्त, दुःखी, स्त्रियो से फरेब खाने वाला, स्त्रियो तस्कर, ढोंगी, हेकड़, स्वांग करने मे माहिर, योन शोषण करने वाला, नियोक्ता का धन हड़पने वाला होता है।

पूर्वा भाद्रपद राहु चरण फल

पहला पाद - जातक मानसिक तनावो से त्रस्त, परिस्थिति अनुसार परिवर्तन कर जीवन व्यापन करने वाला, ऊपर से शांत किन्तु अंदर से उद्विग्न होता है।

दूसरा पाद - आर्थिक विकास, सुखी जीवन व्यापन होता है। यदि गुरु शुभ हो, तो आय में वृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा होती है।

तीसरा पाद - व्यापार व्यवसाय में उन्नति, दृढ़ संकल्पी, धन का सदुपयोगी, धुन का पक्का, रोजगार की तलाश मे भटकने वाला, कठनाईयो का सामना करने वाला होता है।

चौथा पाद - तनाव, धन मे वृद्धि, संकल्प के लिए कठोर कार्य करने वाला, यदि गुरु अशुभ हो, तो समाज मे अपमान, धन हानि, परिवार मे कलह होता है।

पूर्वा भाद्रपद केतु चरण फल

प्रथम चरण - शान्त परन्तु छेड़ने पर अत्यंत विकराल, उद्विग्न, मंगल से युत हो, तो गांव प्रमुख होता है।

द्वितीय चरण - स्त्रियो से धन हानि, जीवन मे अस्त-व्यस्त, रात्रिकालीन अपराधो मे सलग्न होता है।

तृतीय चरण - व्यापार व्यवसाय मे अवनति, कंजूस, अपमानित, मानसिक दबाब से परेशान होता है।

चतुर्थ चरण - मानसिक रोगो से ग्रस्त, अवसाद, स्त्रियो से हानि, सट्टेबाज होता है।

जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।

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