मकर राशि

 

मकर राशि का स्वभाव एवं चरित्र विवेचन विवरण और व्याख्या :


12 राशियों में यह दसवीं राशि है। इसका निर्देशांक 10 है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अंतिम 3 चरण, अभिजित नक्षत्र का चौथा चरण, श्रवण नक्षत्र के चारों चरण एवं धनिष्ठा नक्षत्र के पहले दो चरण मिलकर मकर राशि बनती है। नक्षत्रों के कुल 13 चरण मकर राशि में समाविष्ट होते हैं। 00.00 से 10.00 उत्तराषाढ़ 2,3,4 भो,जा,जी शनि सूर्य 10.00 से 23.20 श्रवण 123 खो,,खे,खो शनि चंद्र 23.00 से 30.00 धनिष्ठा गा,गी शनि मंगल सिंह मध्य इस राशि की आकृति मगर जैसी होती है। । मकर राशि

     जन्मकुंडली में चन्द्रमा मकर राशि में हो। यानी जातक के जन्म के समय में चन्द्रमा भचक्र के दसवें खण्ड (270-300) में हो तो जातक की जन्मराशि मकर होगी। मकर राशि का राशीश शनि है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 22 दिसम्बर से 21 जनवरी के बीच जन्मे सभी जातक मकर राशि के कहलाते हैं।

     मकर राशि के जातक प्रायः ।ब्ज्प्टम् होते हैं। अपने लाभ के प्रति सतत् जागरूक रहते हैं। ये लोग दूसरों के अहसानों व भेंटों को कम ही स्वीकार करते हैं। इनका दहाना (मुख) व दांत बड़े होते हैं। शरीर पतला व लम्बा होता है जो मध्यायु के बाद भरने लगता है। ये लोग जो दायित्व लेते हैं, उसे निभाते हैं। भरोसे के लायक होते हैं परन्तु इन पर निराधार संदेह किया जाए/आरोप लगाया जाए तो ये बहुत अधिक आहत होते हैं। इनका धैर्य बहुत अधिक बढ़ा हुआ होता है। सामान्यतः ये क्रोध नहीं करते, किन्तु क्रोध आ जाए तो मुश्किल से शांत होता है। कई दिनों तक रुष्ट रहते हैं। ये कुछ सनकी स्वभाव के हो सकते हैं तथा अपनी पीड़ा को भी व्यंग्यात्मक शब्दों में अभिव्यक्त करने वाले होते हैं। इनका बचपन प्रायः कठिनाइयों में बीतता है। ये शनैः शनैः प्रगति करते हैं किन्तु स्थायी रूप से।

     जीवनसाथी से ये लोग प्रायः सुख नहीं पाते। फिर भी धैर्यवान होने से निभाते रहते हैं। इस प्रकार परिवार या जीवनसाथी के लिए अथवा कुटुम्ब के लिए अपनी खुशियों का बलिदान कर देने वाले होते हैं। अक्सर ये बचपन से ही जिम्मेदार हो जाते हैं। किन्तु इनमें एकाकीपन का भाव सदैव रहता है। सम्बन्ध भी ये जांचपरख कर बनाते हैं। इनका मित्र वर्ग सीमित होता है। अक्सर कोई बड़ा/महान कार्य करने की लालसा इनमें पाई जाती है। किन्तु ये भावनात्मक रूप से सदैव असुरक्षा महसूस करते हैं और चेहरे से अक्सर उदास दिखाई देते हैं। जोड़ों का दर्द, गठिया, वायु विकार, पाचन तथा नेत्ररोग इनको सम्भावित होते हैं । चन्द्र व सूर्य यदि शनि या राहू द्वारा अशुभ हों तो वृद्धावस्था में इन्हें हृदय रोग या मनोरोग सम्भव होते हैं।

विशेषताएं

इसे अंग्रेजी में कैप्रीकॉर्न (Capricorn) कहते हैं। मकर राशि जन्मकुंडली में चन्द्रमा मकर राशि में हो। यानी जातक के जन्म के समय में चन्द्रमा भचक्र के दसवें खण्ड (270°-300°) में हो तो जातक की जन्मराशि मकर होगी। मकर राशि का राशीश शनि है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 22 दिसम्बर से 21 जनवरी के बीच जन्मे सभी जातक मकर राशि के कहलाते हैं। मकर राशि के जातक प्राय: ACTIVE होते हैं। अपने लाभ के प्रति सतत् जागरूक रहते हैं। ये लोग दूसरों के अहसानों व भेंटों को कम ही स्वीकार करते हैं। इनका दहाना (मुख) व दांत बड़े होते हैं। शरीर पतला व लम्बा होता है जो मध्यायु के बाद भरने लगता है। ये लोग जो दायित्व लेते हैं, उसे निभाते हैं। भरोसे के लायक होते हैं परन्तु इन पर निराधार संदेह किया जाए/आरोप लगाया जाए तो ये बहुत अधिक आहत होते हैं। इनका धैर्य बहुत अधिक बढ़ा हुआ होता है। सामान्यतः ये क्रोध नहीं करते, किन्तु क्रोध आ जाए तो मुश्किल से शांत होता है। कई दिनों तक रुष्ट रहते हैं। ये कुछ सनकी स्वभाव के हो सकते हैं तथा अपनी पीड़ा को भी व्यंग्यात्मक शब्दों में अभिव्यक्त करने वाले होते हैं। इनका बचपन प्राय: कठिनाइयों में बीतता है। ये शनैः शनैः प्रगति करते हैं किन्तु स्थायी रूप से। जीवनसाथी से ये लोग प्रायः सुख नहीं पाते। फिर भी धैर्यवान होने से निभाते रहते हैं। इस प्रकार परिवार या जीवनसाथी के लिए अथवा कुटुम्ब के लिए अपनी खुशियों का बलिदान कर देने वाले होते हैं। अक्सर ये बचपन से ही जिम्मेदार हो जाते हैं। किन्तु इनमें एकाकीपन का भाव सदैव रहता है। सम्बन्ध भी ये जांच- परख कर बनाते हैं। इनका मित्र वर्ग सीमित होता है। अक्सर कोई बड़ा/महान कार्य करने की लालसा इनमें पाई जाती है। किन्तु ये भावनात्मक रूप से सदैव असुरक्षा महसूस करते हैं और चेहरे से अक्सर उदास दिखाई देते हैं। जोड़ों का दर्द, गठिया, वायु विकार, पाचन तथा नेत्ररोग इनको सम्भावित होते हैं। चन्द्र व सूर्य यदि शनि या राहू द्वारा अशुभ हों तो वृद्धावस्था में इन्हें हृदय रोग या मनोरोग सम्भव होते हैं।यह समदेही, स्त्री स्वभावी, हिरन के चेहरे जैसी, धातुसंज्ञक, दक्षिण एवं पश्चिम भूभाग पर नदी या समुद्र के पानी में 15 अंश तक एवं उसके बाद के अंशों में वन प्रदेशों में निवास करनेवाली, सौम्य किंतु चंचल, चर, वृद्ध, भूरे वर्ण की, रजोगुणी, भूतत्वप्रधान, रात्रिबली, जलचर, वात प्रकृति की, शूद्र जाति की, पृष्ठोदय सम राशि है। सफेद, साफ एवं सुंदर वस्त्रों से विभूषित, मधुर एवं कटु व्यवहार में पारंगत, ठिगनी, भ्रमणशील राशि है। इस राशि में सूर्य आने पर रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा रहता है। इस राशि का निवास स्थान पांचाल देश, स्वामी शनि एवं अंक 8 है। शरीर के घुटने एवं हड्डियों के जोड़ों पर इस राशि का प्रभाव रहता है। सोना, चांदी लोहा, जस्ता, कांसा, तांबा, कोयला एवं गन्ना इस राशि के प्रभाव में आते हैं। मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में अबिसिनीया, भारत, मैक्सिको, बुल्गारिया, बंगाल, पंजाब इत्यादि प्रांत-देशों का प्रतिनिधित्व मकर राशि करती है।

जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएं

आयु के 15 से 21 या 26 से 32 वर्ष की कालावधि में विवाह योग बनता है। संतान विलंब से होती है। जन्म से 16 वर्ष की आयु तक का समय अच्छा गुजरता है। 33 से 49 वर्ष की कालावधि में सभी प्रकार के लाभ, यश, आनंद, सुख वैभव मिलता है। इसी अवधि में मां या पिता की मृत्यु होती है। 50 से 51वें वर्ष में असाध्य रोगों से शारीरिक कष्ट झेलने पड़ते हैं। 52 से 57 वर्ष में एक बार फिर श्रीवृद्धि, सुख प्राप्ति, हर्षोल्लास का समय रहता है। 67वें वर्ष में गंडातर योग बनता है। यह टल जाए तो आयु 85 से 90 वर्षों तक रहती है।

विशेष उपासना

मकर राशि के व्यक्तियों का जीवन शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक दृष्टि से संघर्षों से भरा रहता है। मकर राशि का स्वामी शनि है। शनि के प्रतिकूल प्रभाव या अनिष्टता के कारण ही प्रभु राम को वनवास जाना पड़ा, रावण को सीता हरण की कुबुद्धि हुई, वशिष्ठ के सौ पुत्रों का नाश हुआ, पांडवों का वनवास एवं कौरवों का नाश, सत्याभिमानी राजा विक्रमादित्य की परेशानियां एवं दुख भोगना भी प्रतिकूल शनि के कारण ही हुआ। शनि की अनिष्टता निवारण के लिए हनुमानजी की उपासना अनिवार्य है। वट वृक्ष का नियमित पूजन एवं हनुमान कवच पढ़ने से भी अनिष्टता दूर होती है। ॐ श्रीवत्सलाय वत्सराजाय नमः। इस मंत्र का 108 बार नित्य जाप करें।

अभिजित नक्षत्र में जन्मे जातक स्त्री-पुरुषः

अभिजित नक्षत्र की महिमा अवर्णनीय है। सभी नक्षत्रों में यह नक्षत्र सर्वाधिक प्रभावी है, दोपहर में तपते सूरज की तरह। इस नक्षत्र में जन्मे स्त्री-पुरुष आकर्षक व्यक्तित्व तथा कांतियुक्त शरीर के, हमेशा सज्जनों की संगति में रहनेवाले, प्रभावी वक्ता, सुखी, पुत्र सुख से युक्त, अद्भुत लेखन एवं वाक् शक्ति के धनी, दांपत्य जीवन में सामंजस्यता रखने पर वैवाहिक दृष्टि से भी सुखी, अध्ययन, अध्यापन, ज्योतिष, तंत्रमंत्र, पत्रकारिता आदि इस नक्षत्र के विशेष विषय हैं। ये बहरूपिये होते हैं। सरकारी क्षेत्र में नाम कमाते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे डॉक्टर की डॉक्टरी ठीक से नहीं चलती। व्याधियां एवं उपाय अभिजित नक्षत्र में जन्मे स्त्री-पुरुषों की शारीरिक अवहेलना होने की वजह से कब, कौन-सा रोग या विपत्ति इन पर हमला बोलेगी, इसकी पूर्व कल्पना नहीं की जा सकती। परेशानियों, व्याधियों से मुक्ति पाने एवं योगक्षेत्र सुखपूर्वक चलाने के लिए निम्न प्रार्थना रोज करें। तांबे के बर्तन में शुद्ध जल लेकर सूर्य को अर्घ्य दें और यह मंत्र बोलें:

श्रवण नक्षत्र में जमे जातक

पुरुषः श्रवण नजमें जमे पुरुष गोल चेहरे एवं गोरे रंग के होते हैं। इनको आयुका अंदाज नहीं किया जा सकता। आयु बड्ने पर भी वे युवा लगते हैं। आंखें आकर्षक मध्यम कद गंभोर, सेवाभावी, सर्वगुणसंपन्न, कुछ हद तक स्वार्थी होते हैं। विवाह से पूर्व प्रेम संबंध जुड़ जाते हैं। वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। पुत्र सुख कामी लाभ होता है। अर्थिक स्थिति अच्छी रहती है। बुरी आदतों के शिकार शीघ्र बनते हैं। व्यसनी होते हैं। घर-परिवार के विषय में उदासीन रहते हैं।

स्त्रीः श्रवण नक्षत्र में जन्मी महिलाएं प्रतिभासंपन्न, सद्गुणी, कुल परंपरा को मर्यादा संभालनेवाली होती हैं। ललित कलाओं में प्रवीण, लोकप्रिय, पतिव्रता एवं पतिप्रिय रहती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्धि पाती हैं। आचरण शुद्ध एवं सदाचारी रहता है।

व्याधियां एवं उपाय

ॐ आदिदेव नमस्तुभ्यं सप्तसप्ते दिवाकर। त्वं रखे तारयस्वास्मानस्मात्संसार सागशत्।। वीर जिषतु मे माता आरोग्यं चाहतु मे पितः। भ्राता भवतु, दीर्घायुर्धनधान्य सदागृहे। रक्ष मां पुत्रपौत्रांश्च रक्षमा पशुबन्धनात। रक्ष पत्नी पति चैव पितरं मातरं धनम्।। नक्षत्र ग्रहताराणमधिसी विहवभावनः। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमो स्तुते।।

श्रवण नक्षत्र में जन्मे स्त्री-पुरुष चर्मरोग, कुष्ठ, पित्त, जोड़ों के दर्द से परेशान, विक्षिप्तता, क्षय, प्लूरिसी, वायु गुल्म आदि रोगों से पीड़ित होते हैं। दैनंदिन के जीवन में काफी संघर्ष सहना पड़ता है। नौकरी-व्यवसाय में परेशानियां होती हैं। इस अनिष्टता के निवारण के लिए 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मंत्र का स्फटिक की माला से प्रतिदिन 108 बार जाप करें।

चरण प्रभाव प्रथम चरण: में जन्मे जातक लंबे, स्वाभिमानी, अपनी बात पर अड़े रहनेवाले, उदास, हर कार्य सोच-समझ कर करने के बावजूद अपयश पानेवाले होते हैं।

द्वितीय चरण: में जन्मे जातक कंजूस, किसी के काम न आनेवाले, स्वार्थी, विशेष कामातुर रहते हैं।

तृतीय चरण: में जन्मे जातक नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित, धनसंपन्न किंतु अधिक खर्चीले, वैद्य, हकीम, डॉक्टर होते हैं। कामातुर भी रहते हैं।

चतुर्थ चरण: में जन्मे जातक चरित्रहीन, किंतु धर्मात्मा, कृषिकार्य में दक्ष होते हैं।

धनिष्ठा नक्षत्र में जन्मे जातक पुरुषः

धनिष्ठा नक्षत्र में जन्मे पुरुष आशावादी, अभिमानी, दानी, साहसी, 58- आर्थिक तंगी में रहनेवाले होते हैं। आततायीपन, उतावलेपन, लोभ, क्रोध के कारण नुकसान सहन करनेवाले, लोहे के व्यवसाय में धन कमानेवाले होते हैं। प्रेम प्रकरणों के झंझटों में न फंसनेवाले होते हैं। कुछ जातक नपुंसक होते हैं। जिसे चाहते हैं उस स्त्री के साथ विवाह नहीं हो पाता। संगीत एवं खेलकूद में प्रवीण रहते हैं। साधु-संन्यासी, मदिरा उद्योग, जासूस, पुलिस, धर्मशाला के व्यवस्थापक, स्पेयर पार्ट्स के व्यवसायी, आलू के व्यापारी के रूप में इन्हें यश और धन प्राप्त होता है।

स्त्री: धनिष्ठा नक्षत्र में जन्मी महिलाएं आर्थिक दृष्टि से कमजोर होती हैं। वस्त्राभूषणों का शौक रहता है। अपने हावभाव से दूसरों को सहज आकृष्ट करती हैं। लोभी वृत्ति होने से कई बार अच्छे मौके खोने पड़ते हैं। धैर्यवान एवं गुण संपन्न, धर्म में श्रद्धा रखनेवाली होती हैं। लेखन कला में रुचि रहती है। सुगृहिणी एवं सामाजिक कार्यों में हाथ बंटानेवाली होती हैं। इनके कन्या संतान अधिक होती है।

व्याधियां एवं उपाय

धनिष्ठा नक्षत्र के स्त्री पुरुषों को पैरों में फ्रैक्चर, रक्तचाप, रक्तविकार, अचानक हृदय गति में अवरोध उत्पन्न होना, मूर्छा आना आदि व्याधियों से कष्ट सहन करना होता है। इस अनिष्टता को दूर करने के लिए विष्णु भगवान की उपासना करें। नीचे दिए मंत्र का जाप 108 बार करें। मंत्र जाप होने पर घड़ा भर पानी अपने मकान के बाहर दक्षिण दिशा में डालें। ॐ वसूनांच कृषश्यक्षन्धिया वा यज्ञेवशरोस्यो अर्वन्तोवायेरत्रिमतरः। सातौ वतुंवाये सुश्रुणं सुश्रुतोधुः ॐ वसुभ्यो नमः।।

चरण प्रभाव प्रथम चरण:

में जन्मे जातक जीवन का अपना कोई सिद्धांत नहीं होने के कारण अच्छे मौकों से फायदा नहीं उठा पाते। व्यापार या छोटी-मोटी नौकरी ही इनके नसीब में लिखी होती है। सिनेमा के क्षेत्र में सफल होते हैं। काला या फीका रंग इन्हें बहुत भाता है। पुत्र सुख प्राप्त होता है किन्तु कन्या संतान अधिक रहती है। माता-पिता एवं सहोदरों से अनबन रहती है। कागज, कपड़ा, लेखन, भाषण, पुस्तक प्रकाशन या पुस्तकों की बिक्री, जज, क्लर्क, रेल, फायर ब्रिगेड, पेट्रोल पंप, फैक्टरी, फिल्म उद्योग, ट्रक, रिक्शा ड्राइवर, आटे की चक्की, खेती, लांड्री, प्रवचनकार आदि क्षेत्रों में ऐसे नाम आगे दिखते हैं। राजनीति में पंच, सरपंच या विधायक बन सकते हैं।

प्रतिकूलता हर वर्ष का जुलाई महीना। हर महीने की 9,12,22,30 तारीखें। सफेद, लाल रंग एवं इन्हीं रंगों के कपड़े तथा चीजें। मंगलवार मेष, सिंह, धनु राशियों के स्त्री-पुरुष।

मकर राशि का शास्त्रीय स्वरूप कलितशीतमयं किलगीतवित्तनुरुजा सहितो मदनातुरः। निजकुलोत्तमवृत्तिकरः परं हिमकरे मकरे पुरुषो भवेत्।१। आवरण को मजबूत बनाते हुए ऐसे लोग समाज का अगुवा, धर्मगुरु अथवा धर्मध्वज के रूप में सम्मान पाते हैं। इनके शरीर में कमर से पैर तक के अंग विभिन्न रोगों से ग्रसित होते हैं। अधिक पैदल चलने से इन्हें कष्ट होता है, किन्तु विभिन्न परिस्थितियों के परिवेश में इन्हें अक्सर चलना पड़ ही जाता है। भ्रमण करने का अधिक शौक रखते हुए काम-काज की व्यस्तता इनके भ्रमण-कार्य में अवरोधक होती है। आर्थिक और साम्पत्तिक मामलों में भाग्यशाली होते। से पीड़ित इनका स्वास्थ्य होता है। (पुनः एक मत यह है कि इस राशि मकर राशि के जातक स्नानादि कर्म और शीतलता के प्रेमी होते भी जलाशय और जलमार्गीय यात्रा से डरते हैं। गायन वादन- लेखन-अभिनव-अभिनय आदि कला में निपुण होते हैं। इनका शरीर रोगी और मन कामातुर रहता है। कुलीन और सम्भ्रान्त परिवार के सदस्य होकर स्वाभिमान और पारिवारिक मर्यादा का संरक्षण भी करते हैं। (ये लोग साहसी और उद्यमी भी होते हैं। ) ।।१॥ अधः कृशः सत्त्वयुतो गृहीतवाक्योऽलसो गम्य नरांगनेष्टः। धर्मध्वजो भाग्ययुतोऽटनश्च वातार्दितो नक्रभवोविलज्जः।२। इस प्रमाण के अनुसार मकर राशि के व्यक्ति सात्त्विक गुणों का महत्त्व स्वीकार करते हुए शारीरिक श्रम, मानसिक चिन्तन तथा आत्मिक लक्ष्य-साधन में प्रवीण होते हैं। किसी भी विषय में स्वयं के द्वारा किये गये निर्णय पर विश्वास नहीं होता, इसलिए अलसाये मन से ही दूसरों की बात अक्सर मान लेते हैं। (यहाँ एक मतान्तर वाक्य यह है कि इनका व्यक्तित्व सदैव उद्यमी और क्रियाशील होता है। विनोदी होते हैं, पर सबसे विनोद नहीं करते। लेखन-भाषण-मनन- -चिन्तन-स्वाध्याय आदि विशेषताओं से भरपूर इनकी प्रतिभा होती है, जिनका लोहा सभी लोग मानते हैं, बशर्ते कि स्वजनों द्वारा इनकी प्रतिभा को बल और प्रोत्साहन मिलता रहे, अन्यथा शिकारी के जबर्दस्त खूटे में बँधे हुए सिंह की भाँति ये लोग भी कुण्ठाग्रस्त और उदास बन जाते हैं।) वृद्धा स्त्रियों के सम्पर्क द्वारा लाभकारी सम्बन्ध प्रायः प्रौढावस्था में इन्हें प्राप्त होता है। धार्मिक मामलों में इनकी कट्टरता विख्यात होती है। धार्मिकता के बाहरी पैदल भी वात-रोग के जातक जब किसी संस्था में प्रविष्ट होते हैं तो केवल सदस्य मात्र बनकर सन्तुष्ट नहीं होते, प्रत्युत स्वप्रयत्न द्वारा उच्च स्थिति प्राप्त करके ही दम लेते हैं। यही बात इनके कार्यक्षेत्र में भी लागू होती है। )॥२॥ मकर राशि की महिलाएँ गृगः मृगलग्ने वा दीर्घास्या लघुनासिका । वातप्रकृतिका भीरुः कृपणाल्पधनान्विता ।।३।। कन्या प्रजा मृगाक्षी च चंचलाधमभत्रिका । वातामलादजीर्णाद्वा पतनान्मृत्युमाप्नुयात् ।।४॥ मकर राशि (लग्न) की महिलाएँ बड़े मुख और छोटी नाक वाली होती हैं। कन्या सन्तति अधिक होती है। नेत्र सुन्दर और आकर्षक होते हैं। स्वभाव से अधिक चंचल, किन्तु भयभीत जल्दी होती हैं। साधारण धन का सुख मिलता है। खर्च के मामले में इन्हें कंजूस कहा जा सकता है। वातजनित रोग अथवा पाचन-संस्थान की गड़बड़ी से परेशान होती हैं। गिरने का भय इन्हें अधिक होता है। गिरने से मृत्यु होती है। इन महिलाओं में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाने की भी शक्ति होती है।।३-४|| जातकाभरणोक्त चन्द्र-निर्याणाध्याय के अनुसार- धीरो विचक्षणः क्लेशी पुत्रवान्नृपतिप्रियः । कृपालु सत्यसम्पन्नो वदान्यो सुभगोऽलसः ॥५॥ मकर राशि के व्यक्ति अधिकांश धैर्यपूर्वक कार्य करनेवाले विभिन्न कला एवं विद्याओं के जानकार अर्थात् पण्डित कहे जाते हैं। जीवन में कष्टों का सामना भी इन्हें अधिक करना पड़ता है। श्रीमान् लोगों से सम्मानित, दयावान् और पुत्रवान् होते हैं। सत्य भाषण में इन्हें अधिक आनन्द आता है। दान के कार्यों में भी अग्रणी रहते हैं, किन्तु कभी- कभी ये आलसी होने का भी परिचय देते हैं॥५॥ कृष्णतालुः पुमानूनं विस्तीर्णकटिरुग्भवेत् । पंचमे वत्सरे पीडां सप्तमे च जलाद्भयम् ॥६॥ इनका श्यामवर्ण होता है एवं कमर अपेक्षाकृत कुछ अधिक चौड़ा होता है। सुन्दर मुखाकृति होती है। जन्म से ५ वर्ष और ७ वे वर्ष की आयु में जलाशय से भय रहता है।।६।। दशमे पतनं वृक्षात् द्वादशे शस्त्रपीड़नम् । विंशन्मिते ज्वराद्वाधा शाखासु पंचविंशके ॥७॥ इसी प्रकार अपनी आयु के १० वें वर्ष में किसी ऊँचे स्थान अथवा किसी वृक्ष पर से गिरने की संभावना बनती है। १२ वर्ष की आयु में किसी तेज धारदार हथियार अथवा अन्य किसी शस्त्र होता है। २५ वर्ष की आयु में शरीर के विभिन्न अंगों में ! शमनार्थ रत्नाभरणोक्त उपचार का परामर्श दिया जाता है- शूलिनीर्मन्त्रैर्हवनात् यन्त्रविशेषस्य धारणाच्छान्तिः ॥१०॥ मकर (लग्न राशि के जातक अतिकालव्यापिनी कष्ट (बहुकाल तक पीड़ा देने वाली स्थाई व्याधि) से पीड़ित होकर भौतिक दुःख प्राप्त करते समाप्त होने का संकेत है।।६।। पाद टिप्पणी- मकर राशि के स्त्री-पुरुषों को जल और जलाशय अधिक प्रिय होता है, किन्तु अधिक (सर्दी) और ताप इन्हें बरदाश्त भी नहीं होता। कमर, घुटना, पैर और नाभिशूल से अधिकांश पीड़ित होकर इन्हें शरीर कष्ट भोगना पड़ता है। उपरोक्त प्रमाण के अनुसार जन्म से ५, , १०, १२, १५, २०, २५ और ३५ वाँ वर्ष शरीर और आयु को दुष्प्रभाव-ग्रस्त करनेवाला है। (उससे अधिक ५२ और ६२ वर्ष की आयु के मध्य शारीरिक यातनायें झेलनी पड़ती हैं।) इनकी अधिकतम आयु ६० वर्ष पहुँचती है, परन्तु ६६, ६६, ७३, ७६, ८१, ८५ और ८७ वर्ष की आयु में उत्तरोत्तर बलवान कष्टप्रद योग बनते हैं, उन अरिष्टकारी वर्षों में जीवन शक्ति की रक्षा होने पर ही ६० वर्ष का दीर्घ जीवन इन्हें प्राप्त हो सकता है। और अब, ग्रहपीड़ा के मकरे ह्यतिकलोत्था बहवो दोषाश्च विज्ञेयाः । की चोट का भय व २० वें वर्ष में ज्वरपीड़ा से कष्ट पाने का लक्षण पीड़ा से विशेष कष्ट का सुयोग बनता है॥७॥ शूल अर्थात् पंचत्रिंशत्समाकाले वामांगेऽग्निभयं दिशेत् । अब्दानां नवतिर्नूनमायुस्तस्य प्रकीर्तितम् ॥८॥ ३५ वर्ष की आयु में शरीर के बायें अंग में जलने का अर्थात् अग्निभय होता है। (अथवा लकवा (फाजिल) जैसे संक्रामक रोग के आक्रमण का भय बनता है।) ऐसे जातकों की पूर्णायु ६० वर्ष कही गई है।।८।। श्रावणस्य सिते पक्षे दशम्यां भौमवासरे। ज्येष्ठायां निधनं नूनं चन्द्रे मकरसंस्थिते ॥६॥ उपरोक्त प्रमाण के अनुसार श्रावण महीना का शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को मंगलवार का दिन, ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग होने पर जीवन -यन्त्र धारण करना श्रेष्ठ होता हवन करना कराना तथा विशिष्ट शूलिनी- निम्नलिवित मन्व का १०८ बार ( एक माला ) जप कर -1॥१ ॥ है । दैनिक मंगलमय जीवन को चाहने वाले लोग प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन श्रीवत्सलाय वत्सराजाय नमः ॥११ ॥ आतिधेय भिक्षुक अथवा भडुरी को या पीपलवृक्ष के समीप निम्नलिकित मकर राशिगत जातकों को प्रत्येक रविवार के दिन या कभी - कभी मन्त्र का १२ बार उचारण करत हुए लाहपात्र में तिल का तेल भरकर आपका व्यावहारिक सिद्धान्त अत्यन्त कठोर , स्वाभिमानी तथा लोगों के लिए अरुचिकर होगा । स्वाध्याय एवं विद्यार्जन तथा अपने हाथ की कलाओं Technical Work में आप विशेष ख्याति प्राप्त करेंगे । स्त्री के स्वास्थ्य में कभी - कभी ढीलापन तथा शारीरिक स्थूलता से कष्ट होगा । प्रमाण के लिए- मृगश्च : क्ष्माद्वैरवोशायमाण स्वीपिंगरुक्षः शुभ- चाहिए ॥११॥ 1॥१२॥ और उसमें अपनी छाया देखकर दान-कर्म करना मन्त्र- ॐ तिलैस्तु निर्मितं तेलं ह्यन्धकारनिवारणम् । सर्वपापविनिर्मुक्तं तैलं दानेन केशव मकर राशि का स्वानुभूत जीवन-फल भूमिशीतः। स्वल्पप्रजासंगसमीररात्रिरादौ चतुष्पाद् विषयोदयो आपका जीवन एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व से भरा हुआ है। सारी सफलताएँ आपके हाथ में हैं, मगर कुछ खास कठोर आदतों की वहन से अपने कार्य में पूरी-पूरी सफलता नहीं पायेंगे। शारीरिक स्वास्थ साधारणतः सुन्दर रहेगा। कार्यभार की अधिकता हमेशा स्वस्थ नहीं रहने देगी और चेन से कभी किसी क्षण बैठ नहीं सकेंगे। आलस्य और ज्यादा मेहनत की शक्ति दोनों पूर्ण रहेगी। आप देखेंगे कि वायु-पित्त, पेट, पैर, आँख सम्बन्धी रोग आपको ज्यादा परेशान करेंगे। आप कुछ विवादास्पद विषयों में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। आपका दिमाग हमेशा अभीष्ट- सिद्धि में लगा रहेगा, अभी कुछ सोचेंगे-थोड़ी देर बाद कुछ और सोचेंगे। कारोबार या नौकरी के क्षेत्र में एक जगह स्थाई नहीं रह सकेंगे। काली एवं हल्की नीली वस्तु ज्यादा प्रिय होगी। स्वामी शनि, वैश्य वर्ण, पृथ्वी तत्व, चर-संज्ञा, शीतल-स्वभाव, वायु-प्रकृति, पारिवारिक मन-मुटाव, स्वी की आज्ञा मानने वाले, विद्वान्, संगीत-गायन-वादन में अभिरुचि, स्वार्थी, लालची, गुप्त निवास करनेवाले, माता के प्रिय, धनवान, पुत्र वा कन्याएँ ज्यादा, धनी, कंजूस, त्यागी, अधिक बोलने वाले, बहुतेरे मित्रों वाले, सुख और धन प्राप्ति का निरन्तर चिन्तन और सोच-विचार करनेवाले एवं अति-शीघ्र नाराज हो जाने वाले व्यक्ति आप होंगे। इन समयों में अण्डवृद्धि (Hydrocele) अतिसार (Diarrhoea) खून की -दर्पण से वर्ष की उम्र तक विवाह के योग पाये जाते हैं अथवा २६, २१ - स्थाई सम्पत्ति का उपभोग सुन्दर होगा, पारिवारिक वातावरण शान्त और स्नेह-स्निग्ध रहेगा। खर्च करने की स्थिति कृपणता के साथ प्रबल रहेगी। से ३२ वर्ष तक शादी होगी। सन्तान-सुख के सम्बन्ध में प्राय: निराशा आपमें स्वाभिमान और विद्वत्ता का गर्व भी बना रहेगा। ५० और ५१ वाँ वर्ष महान् शारीरिक असाध्य रोगों से ग्रसित कराने वाला समय है। ही हाथ लगेगी, यदि सन्तान हो भी जाय तो उनसे किसी प्रकार के सुख- स्वार्थ की आशा नहीं रखनी चाहिए। माता-पिता एवं भाई-बन्धुओं की ओर से प्रायः सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक मतभेद बना रहेगा। आप किसी भी बात पर बड़ी गम्भीरतापूर्वक दार्शनिक पद्धति से काफी सोच-विचार कर उचित निर्णय लेने वाले अध्ययन-प्रिय व्यक्ति हैं। कागज, कपड़ा, लेखन, भाषण, पुस्तक प्रकाशन या विक्रय अथवा न्यायिक निर्णय देनेवाले वकील-जज-मजिस्ट्रेट-कमीश्नर या अन्य सरकारी नौकरियों में प्रायः अच्छे पद पर रहने वाले व्यक्ति आप हैं। कृषि, स्वयं हाथ की कलाकारी या फिल्म क्षेत्र में दिलचस्पी भी रख सकते हैं। आप या तो बहुत धनी होंगे अथवा बिल्कुल गरीबी और सादगी के साथ जीवन व्यतीत करनेवाले होंगे। अपने आप उन्नति की चरम सीमा तक पहुँच कर अथवा बहुत बड़ी दौलत प्राप्त करने का शुभ अवसर नष्ट कर देंगे। आपके लिए शनिवार का दिन सर्वश्रेष्ठ है। दक्षिण दिशा की यात्रायें करते रहें तो लाभ होता रहेगा। जुलाई का महीना, ,१२,२२,३० तारीखें और मंगलवार का दिन आपके लिए हमेशा घातक है। मन में सोची हुई कामनायें आप बड़ी चालाकी और धीरज से स्वयं पूरा कर लेते हैं। ज्यादातर दूसरों की मदद लेने-देने की आवश्यकता आपको नहीं पड़ेगी। एकान्तवास एवं धन-संग्रह में ज्यादा दिलचस्पी रक्खेंगे। जन्म से १६ वर्ष तक एवं ३३ से ४६ वर्ष तक का समय अत्यधिक आनन्द, सुख-वैभव-सम्पत्ति प्राप्त करने वाला है, किन्तु इन्हीं अवस्थाओं में माता-पिता के लिए मृत्युकारक योग भी प्राप्त होंगे। कुछ चिन्तित भी रहना पड़ेगा। १७ से २० वर्ष की उम्र तक धन कमाने का अच्छा अवसर मिलेगा। व्यवासाय-नौकरी में भरसक पूरी सफलता मिलेगी। आपके व्यक्तित्व, प्रतिभा और कार्य-प्रणाली में नया चमक आयेगा। सभी लोग वाह-वाही करेंगे। जमीन-जायदाद की वृद्धि तथा देश-विदेश की यात्रायें भी ज्यादा होंगी। आपकी व्यवहार-कुशलता - दुष्ट लोगों को ज्यादा प्रिय रहेगी। बड़े-बड़े लोगों से प्रेम सम्पर्क बनेगा। कमी, (Anaemia) ज्वर (Fever) सिरदर्द (Headache), तथा शारीरिक सूजन (Swelling the body) के रोगों से परेशान हो सकते हैं। संभवतः चीर-फाड़ Operation की भी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, यदि इससे बच गये तो ५२ से ७७ वर्ष तक आनन्दपूर्वक सुखी समय व्यतीत करते हुए ७८ वर्ष ७ मास २६ दिन की अवस्था में मृत्युपद प्राप्त करेंगे। जहाँ तक हो सके- अधिक से अधिक गरीब ब्राह्मणों की मदद किया करें और श्रीशिवजी की सादर आराधना सदैव करते रहें। मकर राशि वाली स्त्रियाँ बहुत ज्यादा सौभाग्य-शालिनी, पतिव्रता, व्रत-पूजा-तीर्थयात्रा में अनुरक्त, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेवाली, बहुत तगड़ा खर्च करने में निपुण और पति-सन्तान से प्रेम सम्बन्ध बनाये रखनेवाली होती हैं। तेजस्विनी, मनमोहिनी, बुद्धिमती, शिल्प-संगीत-नृत्यादि विविध कलाओं में निपुण तथा अपनी सुन्दरता का प्रर्दशन करनेवाली होती हैं। राजनीति में भी अच्छी रुचि होती है। यदि आपकी मकरराशि है तो आप अपने कर्तव्य के प्रति वफादार रहेंगे। धार्मिक वृत्ति, प्रेमालु अन्तःकरण, भोजनप्रेमी, यात्रा की प्रबल जिज्ञासा, लिखा-पढ़ी और रचनात्मक कार्यों का विशेष शौक, पति- पत्नी का सुखमय दाम्पत्य जीवन, परन्तु सन्तानसुख से हीन होना अथवा रोगी पुत्र-कन्या सन्तान का सुख होना, अपने शरीर से कृशित, खासतौर से गलत लोगों के दुराचरण पर चिड़चिड़ा मिजाज, वायुरोग से पीड़ित, चंचल मन, दूर के प्रवास में रुचि, स्वार्थसाधना में अग्रगण्य, वनभ्रमण और पर्वतारोहण का शौक, बुद्धि तेज, विद्याध्ययन कमजोर और शिव-दुर्गा की भक्ति मकरराशि का लक्षण है। आपकी कर्मशक्ति आपत्तिरूपी समुद्र को पार करनेवाली नौका है। भाग्य भरोसे न रहकर धर्म को ही विशेष महत्त्व देना उचित है। सर्वज्ञ ईश्वर की शरणागति का आपके जीवन में विशेष महत्त्व है। अपने तपोबल और आत्मबल को जगतकल्याण के निमित्त उपयोग करेंगे। खेती-खदान-मजदूरी- सेवावृत्ति सरकारी नौकरी, ग्रन्थ-अध्ययन, ग्रन्थनिर्माणादि का योग आपके भाग्य में है। ऊँची श्रेणी के सार्वजनिक कार्यों में निरन्तर विघ्न, विद्याध्ययन में बाधा और स्वार्थभावना की प्रबलता रहेगी। आपके शरीर में घुटने का रोग, हड्डियों के जोड़ में दर्द, पेशाब सम्बन्धी रोग, गर्मी की अधिकता, घाव, फोड़ा, फुन्सी आदि से कभी-कभी पीड़ित रहना पड़ेगा। प्रतिवर्ष जुलाई मास, प्रतिमास ६-१२-२२-३० तारीखें, मंगलवार का दिन, मेष-सिंह-धनुराशिवाले व्यक्ति, सफेद व लाल रंग के वस्त्रादि पदार्थ कुम्भ राशि के अन्तर्गत धनिष्ठा नक्षत्रान्त का २ चरण, शतभिषा नावन-भविष्य-दर्पण आपके लिए ठीक नहीं हैं। आपके स्वभाव में वेश्यवृत्ति की प्रधानता १२७ पुण्यात्मा है। व्यावसायिक कार्यों में आप बहुत चतुर होंगे। आपकी राशि का स्वामी शनि ऐसा ग्रह है जो बहुधा प्रसन्न, सुखी, तेजस्वी, विपरीत प्रभाव देखने में आता है तो फिर लक्षाधीश को दरिद्रनारायण विघ्नविच्छेदहेतुर्जयति बटुकनाथ: सिद्धिदः साधकानाम् ।। पाणिस्तरुणतिमिरनीलव्यालयज्ञोपवीती। क्रतुसमयसपर्या नक्षत्र का ४ चरण और पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रारम्भ का ३ चरण आता है। और शत्रुओं पर विजयी बनाने में समर्थ है, किन्तु जब शनि का बनने में देर नहीं लगती। सभी जानते हैं कि भगवान् राघवेन्द्र को बनवास, लंकेश रावण को सीताहरण की दुर्बुद्धि, महर्षि वशिष्ठ के १०० पुत्रों का नाश, भगवान् श्रीकृष्ण को स्यमन्तक कलंक, सत्याभिमानी राजा विक्रमादित्य को असह्य दण्ड, पाण्डवों का वनवास, कौरवों का नाश केवल इसी शनि ने ही किया है। शनि ऋणी तो केवल हनुमानजी का है। हनुमानजी की उपासना से शनिदेव हमेशा शान्त रहते हैं। शनि के प्रसन्नार्थ वट-वृक्ष का नित्य पूजन, सूर्यास्तकाल में तैल-दीप- दान, शनिरत्न नीलम या सर्वोतम उपाय यह है कि अनाहत चक्र- जागृत पंचमुखी हनुमान श्रीकवच निर्माण करके आप निश्चित रूप से धारण कर लें। अपने जन्मदिन या विवाह तिथि पर एक अंजलि नमक प्रातःकाल लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराभिमुख किसी नदी-ताबाल-कूप या जलाशय में डाल देने से वर्षपर्यन्त आरोग्यता एवं निर्विघ्नता प्राप्त होती है।। मन्त्र- ॐ क्षीरोदकसमुद्भुतं लवणं पापनाशनम् । सर्वरससमुद्भूतं मत्तः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥१३॥ आप अपने जीवन-कल्याणार्थ प्रतिदिन २१ बार निम्नोक्त गणेश- बटुक ध्यानमन्त्र का पाठ करें- ॐ सर्वस्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं, प्रस्यन्दमन्दगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् । दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकर, वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥१४॥ ॐ वं वटुकाय नमः॥ ॐ करकलितकपालः कुण्डलीदण्ड-पाणिहस्तरुणतिमिर्नीलव्याल्यज्ञोपवीती ll क्रतुसमयसपारर्या विघ्न्विच्छेधेतुर्जायती बटुकनाथ: सिद्धिद: साधकानाम ll

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