ज्येष्ठा नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

 ज्येष्ठा नक्षत्र सम्पूर्ण विवेचन एवं गृह स्थित फल

ज्येष्ठा नक्षत्र-ज्येष्ठा नक्षत्र भचक्र पर अनुराधा नक्षत्र से अगले 13-20’ क्षेत्र में पूर्णतः वृश्चिक राशि क्षेत्र में स्थित है। इस नक्षत्र के 3 तारे मिल-जुलकर कुंडल के समान एक आकृति बनाते हैं। इस नक्षत्र के स्वामी बुध हैं। जबकि इस नक्षत्र के देवता इन्द्र हैं।

     ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न पुरुष जातक प्रेमी, धनी, परोपकारी तथा बहुत से मित्रों वाला होता है या मधुरभाषी, सम्मानित तथा समाज में विशिष्ट पहचान वाला या अग्रिम श्रेणी का व्यक्ति (नेतृत्व करने वाला) होता है।

     ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मी स्त्री जातक सुंदर, सखियों/स्त्रियों से घिरी रहने वाली, दृढ़ किन्तु मनोहर वचन बोलने वाली, धन-पुत्र एवं सत्य से युक्त, सुभगा एवं भाइयों को प्रिय होती है। ऐसा जानकारों का मत है।

     विशेष-ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न स्त्रीध्पुरुष को ज्येष्ठा (धर में सबसे बड़े/पहले) पुरुष/स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए तथा ज्येष्ठ मास में विवाह नहीं करना चाहिए। अथवा ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या को ऐसे पुरुष से विवाह नहीं करना चाहिए जिसका बड़ा भाई जीवित हो (यानी जो बाद में उसका श्जेठश् बन सकता हो)। ऐसा मुहूर्त मार्तण्ड तथा मुहूर्त चिन्तामणि आदि मुहूर्त शास्त्रों का मत है। मेरे सुयोग्याचार्य श्री कौशिक के अनुसार ऐसा करने से त्रिखल दोष (तीन खलों/दुष्टों का एक स्थान पर एकत्रित हो जाना होता है। क्योंकि तीन ’ज्येष्ठ’/जेठ एकसाथ इकट्ठे हो जाते हैं। इसी प्रकार कृतिका/उ.फाल्गुनी/उ. आषाढ़ नक्षत्र में जन्म हो तथा सूर्य यदि कुंडली के प्रथम/दशम भाव में हो तो भी ’त्रिखल दोष’ होता है। क्योंकि इन नक्षत्रों का स्वामी (सूर्य) प्रथम/दशम भाव का कारक (सूर्य), तथा भाव में/राशि में स्थित ग्रह सूर्य-ये तीन सूर्य एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं। जो कि अच्छा नहीं होता।

     शकुन शास्त्र भी तीन/तिकड़ी की संख्या/संयोजन को शुभ नहीं मानता। जैसा कि कहा गया है-पिता पुत्रं न गच्छंति, न गच्छंति ब्राह्मण त्रयम्। (पिता, पुत्र व पौत्र को एक साथ नहीं जाना चाहिए, न ही तीन ब्राह्मणों को एक साथ जाना चाहिए)। लोकोक्ति के रूप में भी मशहूर है-’तीन तिगाड़ा-काम बिगाड़ा’। इसीलिए भोजन की थाली में भी तीन रोटियां परोसना अशुभ माना जाता है। तीन रोटियां श्राद्ध अथवा तेरहवीं आदि के भोजन में परोसी जाती हैं। आयुर्वेद में भी त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) की विकृति/ संतुलन ही रोगों का आधार माना गया है। बहरहाल यह विवेचन काफी लम्बा और वैज्ञानिक है परन्तु यहां चर्चा के योग्य नहीं है, अतरू किसी और शीर्षक से इसे विस्तार से लेंगे। यहां त्रिखल दोष का महत्व दर्शाने के लिए कुछ संक्षिप्त उदाहरण पाठकों के समक्ष रख दिए हैं।

 

ब्रम्हाण्ड में कोई भी तारा स्थिर नही है, सभी चलायमान है। इनकी गति तीन प्रकार की होती है। 1 अग्रगमन, 2 नियमित गति, 3 किरण गति।

नियमित गति - यह तारो की नियमित गति है जिसे स्वगति कहते है। 1778 मे यह देखा गया की टॉलमी द्वारा निर्धारित स्थान से स्थिर तारो के स्थान में कुछ परिवर्तन आ गया है, यही से यह प्रतिपादित हुआ की स्थिर तारो की भी अपनी स्वगति है। भू केंद्र से स्थिर तारे अत्यंत दूर और वेगवान है परन्तु इनकी गति अत्यंत अल्प है। अनुपात एक परिमाण वाले तारे की गति 0 . 25 विकला, और छह परिमाण वाले तारे की गति 0 . 04 विकला प्रतिवर्ष है।

किरण गति - यह नई खोज है। यह एक प्रकार की नियमित गति ही है। इसके अनुसार निकट आने वाले और दूर जाने वाले स्थिर तारो के कारण वर्ण क्रमदर्शी रेखा के स्थान में परिवर्तन आने लगता है, जिससे उनका वेग मापा जाता है। पृथ्वी के सबसे निकट आने वाले µ केसिओपिया तारे का वेग 61 मील प्रतिसेकन्ड है।

अग्रगमन गति - देखे पुनर्वसु नक्षत्र।

ज्येष्ठा नक्षत्र

राशि चक्र मे। 22640 से 24000 अंश विस्तार का क्षेत्र ज्येष्ठा नक्षत्र कहलाता है। अरब मंजिल में इसे अल कलब यानि बिच्छू का दिल, ग्रीक मे इसे ऐन्टारेस और चीन सियु मे सिन कहते है।

देवता इन्द्र, स्वामी ग्रह बुध, राशि वृश्चिक 1640 से 3000 भारतीय खगोल का यह 18 वा गण्ड और तीक्ष्ण संज्ञक नक्षत्र है। इसके तीन तारे है। इनसे कुण्डल के आकार की आकृति या गोलाकार या छतरी जैसी आकृति बनती है। ज्येष्ठा का अर्थ है बड़ा, वरिष्ठ, पद मे ऊँचा होता है। इसे इन्द्र की पत्नी माना जाता है। यह रोहिणी के विपरीत है। यह अशुभ, क्षय कारक, तामसिक, स्त्री नक्षत्र है। इसकी जाति कृषक, योनि मृग, योनि वैर श्वान, गण राक्षस, नाड़ी अन्त्य है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है।

इन्द्र

प्रतीकवाद - ज्येष्ठा के देवता इन्द्र है। ये 12 आदित्यो मे 5 वे आदित्य है। इन्द्र की माता अदिति और पिता कश्यप है। इनकी पत्नी सचि, निवास अमरावती, वाहन ऐरावत हाथी, शस्त्र वज्र है। इनके सिद्ध अंगीरा, यश स्त्रोत, गन्धर्व विश्वावसु, अप्सरा प्रम्लोचा, रक्षा वार्या, नाग लापेत्रा है। इंद्र को वर्षा, तूफान और युद्ध का देवता भी कहते है। पौराणिक कथाओ मे इन्द्र एक कामुक, ढीट, वीर चरित्र है। बौद्ध परम्परा इन्हे शक्र कहा है। हिन्दुओ में इन्हे देवताओ का राजा माना जाता है। पौराणिकता अनुसार इन्द्र ने महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या से जिनाह किया, इस कारण गौतम के अभिशाप से इंद्र के वृषण (अंडकोष) नष्ट हो गये। अग्नि की सहायता से इन्द्र ने मेढ़े के अंडकोष पुनः प्राप्त किये थे। ऋग्वेद की लगभग 250 ऋचाओ मे इन्द्र का उल्लेख है।

विशेषताएं - इसके स्वामी बुध ग्रह विष्णु की प्रतिछाया है। चन्द्रमा इस नक्षत्र में कभी-कभी गरीबी और दुःख का कारक है। जातक अल्प मित्रवान, एकन्तप्रिय, शक्तिशाली, आकर्षक होता है। ज्येष्ठा की प्राथमिक प्रेरणा अर्थ या सामग्री की सृमद्धि है। यह भी एक गण्डान्त नक्षत्र है।

ज्येष्ठा नक्षत्र विभूतियां

वैज्ञानिक अलबर्ट आईस्टीन का चंद्र इस नक्षत्र में था।

अटल बिहारी वाजपेयी (भारत रत्न, पूर्व प्रधान मन्त्री, भारत) का चन्द्र इस नक्षत्र मे था।

विंस्टन चर्चिल (नोबल पुरस्कृत पूर्व प्रधान मन्त्री इंग्लॅण्ड) का सूर्य इस नक्षत्र मे था।

एल्विस प्रिस्ले (हॉलीवुड अभिनेता) का ज्येष्ठा जन्म नक्षत्र था।

ज्येष्ठा नक्षत्र फलादेश

ज्येष्ठा एक मूल नक्षत्र है। इस 18 वे चन्द्र भवन का एक तारा एंटारेस मंगल का प्रतिद्वंदी है, दोनो मिलकर शक्ति, स्व निर्भरता, स्वतंत्रता, खतरे के आभास के द्योतक है। यह नक्षत्र परिवार मे बड़ा, महा शक्तिशाली, प्रशंशा के योग्य होने से भी बड़ा है। विद्जन इसे चन्द्रमा की महारानी भी मानते है।

जातक मे जीवन मे ऊँचा स्थान पाने और चीजों को कुशलता से पूरा करने की क्षमता होती है यदि रचनात्मक प्रतिभा पीड़ित हो, तो जातक निर्धन, अनुग्रह से पतित होता है। जातक अल्प मित्र वाला, तनहा, तनहाई की इच्छा रखने वाला, गुप्त या पाखण्डी, धार्मिक प्रथाओ मे शामिल लेकिन भौतिकवादी गतिविधियो मे लिप्त होता है। जातक प्रधान, कवि, दानी, विद्वान, धार्मिक और शूद्र जनो से पूजित होता है। जातक योद्धा, नियमित व्यायामी, मजबूत दिमाग और दृढ़ विचार वाला, नीरस अच्छे और बुद्धिमानो से घिरा हुआ, यदा-कदा बेईमान होता है। मूल रूप से शुद्ध आत्मा. बुद्धिमान, बौद्धिक होता है।

पुरुष जातक - जातक बलिष्ठ, सुगठित, ताकतवर, शक्तिशाली देह वाला होता है। इसके दांतो में किसी न किसी प्रकार की खराबी या विकृति (अपंक्तिबद्धता, छितरे, बेतरतीब. रंगहीन आदि) होती है। जातक हठी, क्रोधी, आक्रामक होता है। ये विचारो के पक्के और नही झुकने वाले, अधीर, बिना सोचे-विचारे त्वरित निर्णय लेने वाले होते है। जातक दिखावट रहित, निःसारतावादी, घमंड रहित, सीधा-सादा होता है। यह अपने और दूसरो की बात गुप्त नही रख सकता है और नही बता सकने के कारण बेचैन हो जाता है।

जातक स्वतंत्र, छोटी उम्र से ही अर्थ कमाने वाला, स्व उन्नत, व्यवसाय मे सहायता नही लेने वाला, भाग्य से सम्पत्तिवान होता है। परिवार से दूर रहकर ही उन्नति करता है। 18 से 26 वर्ष तक जीवन अत्यंत कठिन और बाद मे 50 वर्ष तक धीमी रफ़्तार से उन्नत्ति होती है। जातक अकेला चलने वाला, परिवार से अलग, माता, पिता भाई बहनो के सहयोग से रहित स्व निर्भर होता है। पत्नी ख़ुशी और परम सुख देने वाली होती है।

स्त्री जातक - स्त्री जातक दृढ़ व प्रभावी असरदार वक्तित्व वाली , मांसल देह, लम्बी भुजाऐ, सामान्य कद, चौड़ा लघु मुखड़ा, घुंगराले बाल वाली होती है। यह एक ओर नरम स्वभावी अंदर से अति भावुक, स्नेही और दूसरी ओर निर्दयी, कठोर लोगो द्वारा गलत समझे जाने वाली होती है। ये ईर्ष्यालु, सच्चा गहन प्यार करने वाली, व्यव्हार मे स्वेच्छाचारी, दृढ़ विचारी, परिस्थिति अनुसार ढलने मे कमजोर होती है।

पुरुष जातक की भांति यह अपने और दूसरो की बाते गुप्त नही रख सकती है। यदि रखना पड़ा तो बेचैन हो जाती है। दाम्पत्य जीवन अशांत, सुसरो से अनबन, पड़ोसियो से सतर्क, संतान से उनके बचपन मे कठोर रहने के कारण युवावस्था मे संतान इसकी विरोधी होती है।

आचार्यो अनुसार ज्येष्ठा फलादेश

यह एक गण्ड नक्षत्र है। इसमे अन्य गण्डमूल नक्षत्र के फल का भी समन्वय करना चाहिये। शास्त्रो में कहा गया है कि इसकी शांति करने से दोष दूर होता है।

इन लोगो को क्रोध अधिक आता है और ये महत्वाकांक्षी होते है। अपनी आय को बढ़ा-चढ़ाकर बताने मे इन्हे सुख मिलता है। खर्चीले होते है। इनमे काम वासना अधिक तथा झूठ बोलना इनकी आदत होती है। रूपया-पैसे के मामले मे अविश्वनीय होते है। संघर्ष कर स्थापित होते है। - नारद

धार्मिक विचारधारा भी ये लोग रखते है। प्रायः अपनी स्थिति से संतुष्ट रहते है। यदि चन्द्रमा प्रथम या पंचम भाव में हो, तो ये कभी संतुष्ट नहीं रहते है। - वराहमिहिर

इन लोगो में बड़प्पन का भाव अधिक होता है। यदि शुभ पक्ष बलि चन्द्रमा हो या शुभ युक्त या शुभ दृष्ट हो, तो अपनी बिरादरी और मित्रो में अच्छी प्रशंसा प्राप्त करते है। - पराशर

यदि ऐसे चन्द्रमा का बुध या मंगल के साथ दृग योग हो, तो लक्ष्मी हमेशा इनके साथ निवास करती है।

चंद्र - चंद्र यदि इस नक्षत्र मे हो, तो जातक वरिष्ठपन और विशिष्टपन का आभासी, परिवार रक्षक और मुखिया, विद्वान, वहमी, मनोशक्तिवान, साहसी होता है। जीवन मे अनेक कष्ट झेलने पड़ते है।

जातक प्रभावी लेकिन चिड़चिड़ा, संगीत प्रिय, दुर्दम, ताकतवर, व्यवसाय मे परिवर्तनशील, प्रारम्भिक जीवन मे कष्ट, महा अमीर या महा गरीब होता है।

वराहमिहिर अनुसार चंद्र प्रभाव से डरावना चेहरा, कामी, जबाबदार जातक होता है।

सूर्य - सूर्य इस नक्षत्र में हो, तो प्रसिद्धि प्राप्त, निर्जनता चाहने वाला, महत्वाकांक्षी, कर्मठ, उच्च सामाजिक स्तर वाला, अच्छे कार्य करने में सक्षम, परिवार कृत्यज्ञ होता है।

लग्न - लग्न इस नक्षत्र मे हो, तो आदरणीय, स्व धर्मरत, लेखक, सम्मानीय, चरित्रहीन, कामुक, मित्रवान, शिशु प्रेमी होता है।

ज्येष्ठा चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। वृश्चिक 22640 से 23000 अंश। नवमांश धनु। यह वित्त, परिवार, अत्यावश्यक आर्थिक परिस्थिति का द्योतक है। जातक ऊँची सुन्दर नाक, अल्प केश, पतली भौंहे, धूर्त, सुबुद्धि, गंभीर साहसी, निपुण होता है। जातक ठिठोलिया, परिहास जनक, कामातुर, स्त्री की तरफ आकर्षित होने वाला, धार्मिक पुस्तको के विचार मे मग्न, सबका चहेता होता है।

जातक बुद्धिमान, उच्च शिक्षा प्राप्तक, बुद्धि से सफल होता है। आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहने से रातो की नींद हराम होती है। खतरो से खेलना आदत होती है। मतभेद से पैतृक सम्पदा प्राप्त होती है।

पुरुष जातक कृष्ण वर्णी, कमजोर हाथ पैर वाला, ईर्ष्यालु, प्रतिकारी होता है। 7, 8, 27, 28 वर्ष में गंभीर रोग या मशीनी दुर्घटना में टांग नष्ट हो सकती है। दुखद पारिवारिक जीवन, अल्प मित्र वाला, पत्नी से प्रभावित होता है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। वृश्चिक 23000 से 23320 अंश। नवमांश मकर। यह जबाब दारिया, ललकारना, स्वार्थता, रक्षा, भौतिकवाद का कारक है। जातक विदीर्ण मुख, स्थिर अंग, चौड़े दांत, चौड़ा सर, जुड़े अंग वाला, छोटा पेट, बड़े नेत्र, यौन दुर्बल या नपुसंक होता है।

जातक पूर्णतया प्रयोगिक, स्वार्थी, अनुशासित, छोटी उम्र मे परिपक्व और जबाबदार, लक्ष्य पाने हेतु कर्मठ, स्वरोजगारी, अपना भाग्य स्वयं बनाने वाला होता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी शनि है। इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। वृश्चिक 23320 से 23640 अंश। नवमांश कुम्भ। यह मानवता, सेवा, पागलपन, झक्कीपन के यौन दौरे या यौन विकृता का द्योतक है। जातक नासिका के चौड़े अग्र भाग वाला, काले अंग, विभाजित घने बाल वाला, परितक्य बुद्धि वाला, काल और विपत्ति युक्त होता है। जातक व्यावसायिक विकास की ओर अग्रसर, अच्छा नागरिक, जरुरत मंदो विशेषकर वृद्धो का मददगार होता है।

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। वृश्चिक 23640 से 24000 अंश। नवमांश मीन। यह भावना, प्रचुरता या स्वतंत्रता, भौतिकता का द्योतक है। जातक गौर वर्ण, मृग सामान नेत्र, सुन्दर पुष्ट देह वाला, भूरे केश, दृढ़, शांतचित्त, गुरुजनो द्वारा सम्मानित होता है।

जातक अत्यंत भावुक, आर्थिक विकासवान, इछाओ की पूर्ति करने वाला होता है। ये प्रेम प्रसंगो और यौन क्रियाओ मे युवावस्था से ही सलग्न हो जाते है। ये मनमौजी अपने प्रेमी या प्रेमिका को येन-केन प्रकारेण प्राप्त करने वाले होते है यदि अविभावक विवाह के लिए मना करते है, तो घर से भाग जाते है।

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है परन्तु अंतर बहुत है।

यवनाचार्य - ज्येष्ठा के प्रथम चरण मे क्रूर, द्वितीय मे भोगवान, तृतीय मे विद्वान, चतुर्थ मे पुत्रवान होता है।

मानसागराचार्य - ज्येष्ठा के पहले चरण मे धन-धन्योपार्जक दूसरे मे विद्वान, तीसरे मे राजमान्य, चौथे मे यशस्वी होता है।

भारतीय मत से सूर्य बुध शुक्र की आपस मे पूर्ण या पाद दृष्टि नही होती है क्योकि बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नहीं हो सकते है।

सूर्य :

ज्येष्ठा सूर्य चंद्र से दृष्ट हो, तो जातक याचको के प्रति दयालु मगर क्रूर होगा।

ज्येष्ठा सूर्य मंगल से दृष्ट हो, तो जातक दुर्जन, रक्त वर्ण नेत्रो वाला होगा।

ज्येष्ठा सूर्य गुरु से दृष्ट हो, तो जातक दानी, प्रशासक, धनवान, राजनीतिज्ञ होगा।

ज्येष्ठा सूर्य शनि से दृष्ट हो, तो जातक गरीब, काहिल, रोगी होगा। यदि शनि की दशम दृष्टि हो, तो अमीर, बुद्धिमान, सरकार मे शक्तिशाली होगा।

ज्येष्ठा सूर्य चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक प्रसिद्ध, ताकतवर, जीवन के प्रारम्भ में कष्ट उठाने वाला, उच्च सामाजिक स्तर वाला, अपने मे संतुष्ट, कर्मठ अच्छे कार्य करने वाला होता है।

चतुर्थ चरण मे सूर्य अशुभ ग्रहो से घिरा हो और मृगशीर्ष 4 चरण या आर्द्रा मे शनि मंगल हो, तो जातक के जन्म लेते ही पिता की मृत्यु हो सकती है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक व्यवसाय मे परिवर्तन शील, संगीत प्रिय, महत्वाकांक्षी, अच्छा कार्य करने में सक्षम, परिवार का एहशान मंद, अमीर या गरीब, क्रोधी, सहानुभूति रहित, अधीर, आय से अधिक व्यय करने वाला होता है।

चन्द्र :

ज्येष्ठा चंद्र सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक याचको के प्रति दयालु होगा लेकिन क्रूर होगा, सरकार से प्राप्त अधिकारो और शक्तियो का उपयोग करेगा।

ज्येष्ठा चंद्र मंगल से दृष्ट हो, तो जातक कुछ वर्गों पर आश्रित होगा।

ज्येष्ठा चंद्र बुध से दृष्ट हो, तो जातक जीवन के सभी सुख प्राप्त करेगा।

ज्येष्ठा चंद्र गुरु से दृष्ट हो, तो जातक अति विद्वान और ज्ञान देने वाला होगा।

ज्येष्ठा चंद्र शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक धनी और अच्छी स्त्रियो की संगति मे रहेगा।

ज्येष्ठा चंद्र शनि से दृष्ट हो, तो जातक कठोर, अस्वस्थ होगा, संतान नेक नही होगी ।

ज्येष्ठा चंद्र चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण- जातक विशिष्ट और वरिष्ठ पन का आभास करने वाला, परिवार रक्षक, महत्वाकांक्षी, जीवन मे कष्ट सहन करने वाला, अमीर या गरीब बिरादरी और मित्रो मे प्रशंसित होता है।

चतुर्थ चरण मे हस्त नक्षत्र लग्न हो तथा गुरु की युति हो, तो जातक अति शिक्षित, डाक्टर या वैज्ञानिक होगा। जीवन साथी से विछोह होगा और संतान से परेशानी होगी।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक मनोशक्ति वाला, विद्वान, आविष्कारक, प्रभावी किन्तु चिड़चिड़ा, अपनी स्थति से संतुष्ट रहता है। किन्तु प्रथम या पंचम भाव मे चन्द्रमा हो, तो जीवन में कभी संतुष्ट नही होता है। यदि चन्द्रमा का दृग्योग मंगल या बुध से होता है तो लक्ष्मी सदा साथ बनी रहती है।

तृतीय चरण मे शनि की युति हो, तो जातक बड़ी उम्र की स्त्रियो का शौकीन, शस्त्रो मे निपुण, माता-पिता की निंदा करने वाला, सम्पत्ति हीन होता है। जातक की स्त्री चरित्रहीन होती है।

मंगल :

ज्येष्ठा मंगल सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक आज्ञाकारी, धनवानो मे मान्य होगा।

ज्येष्ठा मंगल चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक क्रूर, दुष्ट, स्त्री गामी चरित्र का होगा।

ज्येष्ठा मंगल बुध से दृष्ट हो, तो जातक चंद्र की दृष्टि की भांति स्त्री गामी चरित्र वाला, दिखावे बाज, दूसरो की सम्पत्ति हड़पने वाला होता है। कुछ मामलो मे वह नामी चोर या तस्कर होगा। यदि बुध पर गुरु की दृष्टि हो, तो यह परिणाम नही होगा।

ज्येष्ठा मंगल गुरु से दृष्ट हो, तो जातक धनी लेकिन क्रूर, परिवार मे वरिष्ठ होगा।

ज्येष्ठा मंगल शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक खान-पान मे अरुचि वाला, पर स्त्री गामी, परिवार पोषक होगा।

ज्येष्ठा मंगल शनि से दृष्ट हो, तो जातक परिवार से दूर, माता के स्नेह से वंचित, परिवार विरोधी कार्यकलापो मे लिप्त, कृश शरीरी होगा।

ज्येष्ठा मंगल चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक परिवार मे वरिष्ठ, निडर, साहसी, क्रोध मे स्वयं और दूसरो का अहित करने वाला, महत्वाकांक्षी, आय और व्यय को बढ़ा-चढ़ा कर बताने वाला, अहमवादी, अपनी प्रभुसत्ता कायम रखने वाला, समाज मे उच्च पद पर होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक झूठ बोलने की आदत वाला, दोगला, संघर्ष से स्थापित होने वाला, रुपये पैसे के मामले मे अविश्वनीय, अनेक उतार चढ़ाव देखने वाला, अपने बड़प्पन मे मदहोश, सरकार से अप्रत्याशित रूप से लाभी, मायावादी होता है।

तीसरा चरण लग्न हो और मंगल, बुध, शुक्र, शनि स्थित हो, तो जातक कुबेर की विशेष कृपा से विश्व प्रसिद्ध महा धनवान होगा।

बुध :

ज्येष्ठा बुध चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक की संगीत और ललित कला से आजीविका होगी ।

ज्येष्ठा बुध मंगल से दृष्ट हो, तो जातक राजनीतिज्ञो से स्वार्थ पूर्ति करेगा ।

ज्येष्ठा बुध गुरु से दृष्ट हो, तो जातक परिवार, धन-संपत्ति से युक्त होगा।

ज्येष्ठा बुध शनि से दृष्ट हो, तो जातक समाज की भलाई करने वाला, विवाद प्रिय, मजबूत होगा।

ज्येष्ठा बुध चरण फल

प्रथम और चतुर्थ चरण - जातक संघर्ष शील, झूठ बोलने वाला, जीवन मे अनेक उतार-चढ़ाव देखने वाला, परिवार और समाज में मुखिया, धार्मिक होता है। यदि प्रथम चरण लग्न हो, तो संगीत और कला मे प्रवीण होगा।

द्वितीय और तृतीय चरण - जातक अपनी आय-व्यय को बड़ा चढ़ा कर बताने वाला, महत्वाकांक्षी, बहुत ज्यादा गुस्सा करने वाला और गुस्से मे बेकाबू हो जाने वाला, बड़प्पन के भाव से भरा हुआ, काम वासना युक्त होता है।

द्वितीय चरण मे सूर्य से युत होने पर मृदुभाषी, अभिजात, अनेक आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने वाला, शासकीय सेवा मे होगा। मंगल के साथ होने पर पत्नी अभागी होगी और हर मामले मे दखल देने के कारण जातक दयनीय और निर्धन होगा। यदि यह संयोजन शुक्र से दृष्ट हो, तो सोना या मूल्यवान धातु व्यवसायी होगा और पत्नी अभागी नही होगी।

गुरु :

ज्येष्ठा गुरु पर सूर्य की दृष्टि होने पर जातक धार्मिक विचार वाला, वैध कार्यकारी होगा।

ज्येष्ठा गुरु पर चन्द्र की दृष्टि होने पर जातक धन, नाम, प्रसिद्धि, अर्जित करेगा।

ज्येष्ठा गुरु पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक दूसरो का अहंकार तोड़ने वाला होगा।

ज्येष्ठा गुरु पर बुध की दृष्टि होने पर जातक दुर्व्यवहारी, झगडा करने की आदत वाला होगा।

ज्येष्ठा गुरु पर शुक्र की दृष्टि होने पर जातक प्रसाधन और सौन्दर्य की वस्तुओ का व्यवसायी होगा।

ज्येष्ठा गुरु पर शनि की दृष्टि होने पर जातक पारिवारिक सुखो से वंचित, क्रूर होगा।

ज्येष्ठा गुरु चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक दयालु, क्रोधी, परिवार मुखिया, महत्वाकांक्षी, अपनी आमद व खर्च को बहुत अधिक बताने वाला, अपने बड़प्पन का अभिमानी, सलीके के वस्त्र धारण करने वाला, धार्मिक विचार वान होता है। शनि, मंगल से युति हो, तो बेरहम, नीच, धायल होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक एक की बात दूसरे को कहने वाला, कभी-कभी झूठ बोलने वाला, नए-नए कार्य करने की इच्छा रखने वाला, आय-व्यव का हिसाब किताब रखने वाला, पर स्त्री गामी, मुद्रा के मामले में अविश्वनीय, अपनी स्थति से असंतुष्ट, धमंडी होता है। यदि मंगल, सूर्य से युत हो, तो धनी, सुखी, स्त्रियो का चहेता, कलाविद, मन्त्री होता है।

शुक्र :

ज्येष्ठा शुक्र पर चन्द्र की दृष्टि होने पर जातक समाज मे उच्च पद पर लेकिन स्त्रियो से सम्बन्धो के कारण आलोचना का पात्र होगा।

ज्येष्ठा शुक्र पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक कुरूप और निर्धन होगा।

ज्येष्ठा शुक्र पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक आकर्षक, सुभार्या वाला, सभी सुख युक्त होगा।

ज्येष्ठा शुक्र पर शनि की दृष्टि होने पर जातक शांति प्रिय, दयालु, कला धन युक्त्त होगा।

ज्येष्ठा शुक्र चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक महत्वाकांक्षी, आय-व्यय को अधिक दिखाने वाला, प्रदर्शनकारी, अपने बड़प्पन पर गर्व करने वाला, ईर्ष्यालु, पर स्त्री रत, धर्म को आडम्बर कहने वाला होता है।

प्रथम चरण मे मंगल से युत होने पर गणित मे कुशल, प्रसिद्ध ज्योतिषी लेकिन जुआरी और सटोरिया होगा।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक अपने धर्म में आस्थावान, आध्यात्मिक, कामुक, प्रेम मे सफल, अपने वरिष्ठ पन के अनुकूल आचरण करने वाला, विद्वान, घर परिवार का मुखिया, धार्मिक विचारो से ओत-प्रोत, धर्म प्रमुख व धर्म प्रवर्तक होता है।

शनि :

ज्येष्ठा शनि पर सूर्य की दृष्टि होने पर जातक मवेशियो व दुग्ध उत्पादन से कमायेगा, अच्छे कार्य करेगा।

ज्येष्ठा शनि पर चन्द्र की दृष्टि होने पर जातक दुष्ट लोगो की विचार धारा का अनुशरण करेगा और स्वयं भी क्रूर तथा धूर्त होगा।

ज्येष्ठा शनि पर मंगल की दृष्टि होने पर जातक बड़बोला और किसी की मदद नही करेगा।

ज्येष्ठा शनि पर बुध की दृष्टि होने पर जातक अनैतिक कार्यकारी, परिवार से दुःखी होगा।

ज्येष्ठा शनि पर गुरु की दृष्टि होने पर जातक शासन मे ऊँचे पद पर होगा, प्रचुर मात्रा मे धन अर्जित करेगा।

ज्येष्ठा शनि पर शुक्र की दृष्टि होने पर जातक बहुत यात्राए करेगा, उसका व्यक्तित्व प्रभावी नही होगा तथा काम क्रियाओ मे लिप्त रहेगा।

ज्येष्ठा शनि चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सुन्दर सुख वैभव युक्त्त, अपने खर्च और आय को अधिक बताकर खुश रहने वाला, पैसो का लालची, धार्मिक परम्परा को मानने वाला, अपनी स्थति से संतुष्ट, खर्च पर लगाम रखने वाला, सुमित्रवान, धनवान, भोग विलासी होता है।

द्वितीय व चतुर्थ चरण - जातक महा क्रोधी, गुस्सा होने पर जल्दी शांत नही होने वाला, अपनी स्थति से संतुष्ट, तुनक मिजाज, धार्मिक परम्परा पर विश्वास नही करने वाला, अपने बड़प्पन पर अभिमानी, परिवार मे अपनी चलाने वाला, कामुक, निंदक होता है।

ज्येष्ठा राहु चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - धननाश, स्त्री पुत्र को कष्ट, चोर, परिजनो से त्यक्त, रोगी, धोखेबाज, होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण - जातक क्रूर, धोखेबाज होगा, यहाँ तक माता-पिता तक को धोखा देने में नही चुकेगा, रोगी होने के बावजूद वैश्याओ से सम्बन्ध रखेगा।

ज्येष्ठा केतु चरण फल

प्रथम व चतुर्थ चरण - जातक सरकारी नौकर, विभिन्न प्रशिक्षिणी, प्रसन्नचित, व्यापारी होता है।

द्वितीय व तृतीय चरण- जातक वाहन व्यवसाय से लाभ प्राप्त करने वाला, खेल व मनोरंजन प्रतियोगिता आयोजक, मित्रवान होगा।

जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो।

 

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