वृषभ राशि का विवेचन Nature व्यक्तित्व

 वृषभ राशि का विवेचन Nature व्यक्तित्व


राशिचक्र में यह दूसरी राशि है और इसका निर्देशांक 2 है।नक्षत्र कृतिका नक्षत्र के अंतिम 3 चरण रोहिणी नक्षत्र के चारों चरण एवं मृगशिरा नक्षत्र के।,2 चरणों से मिलकर वृषभ राशि बनती है।वृषभ राशि की आकृति बैल जैसी है।

विशेषताएं

इसे अंग्रेजी में Taurus कहते हैं। यह राशि लघुकाय, स्त्रीलिंगी, दक्षिण दिशा में पर्वत पर, खेती की जमीन, गोशाला या मन में निवास करती है। यह कोमल, शांत, स्थिर स्वभावी, युवा, गौरवर्णी, पृथ्वी तत्त्व की, रात्रि बली, लंबे शरीर की, वैश्य जाति की पृष्ठोदय समराशि है। पशुपालक, काश्तकार, चतुष्पाद, ग्रामचारी एवं रजोगुणी वात प्रकृति की इस राशि का निवास स्थान कर्नाटक प्रदेश है। इसका स्वामी शुक्र, दिन शुक्रवार एवं अंक 6 है। शरीर में चेहरे, जीभ, कपोल, कंठ पर इसका प्रभाव रहता है। काव्य, खेती, खरीद-फरोख्त एवं संपत्ति का आधिपत्य वृषभ राशि के अधीन ह। वन-जंगलों मेंउत्पन्न होनेवाले फल, पुष्प, श्वेत गेहूं, चावल, शक्कर, दूध-घी, बैल, सफेद

वस्त्र, सूत, जूट, कपास एवं मुद्रा इत्यादि इस राशि के द्रव्य हैं।

मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में आयरलैंड, हिरोशिमा, हॉलैंड, रूस, जार्जिया देशों

की प्रतिनिधि वृषभ राशि मानी गई है।

जातकों का भविष्य

वृषभ राशि के पुरुषों की चाल स्थिर रहती है। बुद्धि श्रेष्ठ, आकर्षक व्यक्तित्व,

भौतिक भोग-उपभोग संपन्न, हमेशा सत्कार्यों में रुचि रखनेवाले होते हैं। ये खेती

विषयक कार्य अच्छी तरह से संपन्न कर सकते हैं। इनका चेहरा एवं जांचें कुछ

बड़ी होती हैं। जीवन का पूर्वार्ध दुख में किंतु उत्तरार्ध सुख में बिताते हैं। गोधन का सुख प्राप्त होता है। इनकी पीठ या चेहरे पर मस्सा' या 'लहसुन' का दाग रहता है।

जान-बूझकर किसी को धोखा देने की भावना नहीं रहती। बेपरवाह एवं आलसी

होते हैं। बोलचाल में अल्हड़ता व कामशक्ति प्रबल रहती है। खाने-पीने के

शौकीन होते हैं। दुख में आनंद मनाने का स्थायी भाव इनमें रहता है।

वृषभ राशि की महिला की नाक एवं होंठ कुछ बड़े रहते हैं। स्वधर्म की

अपेक्षा अन्य धर्मों पर आस्था अधिक रहती है। संतान सुख अल्प रहता है। सभी

काम करने की क्षमता एवं समर्थता रहने पर भी स्वजनों के ऊपर आए संकटों के

समय ये धीरज खो बैठती हैं। जलभय एवं शूलरोग से कष्ट रहता है।

जातककाभरण के अनुसार

जन्मकुंडली में वृषभ राशि में चंद्र हो तो जातक अल्प तेजस्वी रहता है। उसमें

विश्वसनीयता भी कम होती है। ऐसा जातक सत्यभाषी, धनवान, कामासक्त, पत्नी

पर शासन करनेवाला होता है। दीर्घजीवी, शरीर पर कम बाल, माता-पिता एवं

गुरुजनों का भक्त, राज्याधिकारी, धनी एवं विद्वानों का मित्र रहता है। सभा-सोसायटी

में अपनी चतुरता दिखानेवाला, अल्प साधनों से सुखी होने पर भी अधिक साधन संपन्नता प्राप्त होती है।

बचपन में आयु का पहला वर्ष कष्टकारक रहता है। तीसरे वर्ष अग्नि का भय,

7वें वर्ष हैजा, प्लीहा रोग का भय, नौवें वर्ष में अनेक प्रकार के कष्ट, दसवें वर्ष में

अतिसार या खून की उल्टी होने का डर रहता है, 12वें वर्ष में पेड़ से या ऊंचाई से

गिरने का डर रहता है।

16वें वर्ष में सर्पभय, जहरीले जंतु से जख्म, 19वें वर्ष में अनेक प्रकार की

पीड़ाएं सहनी पड़ती हैं। 25वें वर्ष में पानी से भय रहता है। 30 एवं 32वें वर्ष में शारीरिक अरिष्ट का डर रहता है। जन्मकुंडली में वृषभ राशि के चंद्र के ऊपर यदि बुध, बृहस्पति एवं चंद्र की दृष्टि हो तो 96 वर्ष की आयु प्राप्त होती है। चंद्र पर पाप ग्रहों की दृष्टि होने पर अकाल मृत्यु हो सकती है।

अनुभवसिद् फलित

किसी भी हालत में जय, यश, भोग एवं श्रीप्राप्ति की लालसा वृषभ राशि के

व्यक्तियों में बनी रहती है। ये गोरे या गेहुएं रंग के होते हैं। तेजस्वी चेहरा, मध्यम

उंचाई का कद, कांतियुक्त मनमोहक व्यक्तित्व रहता है। शत्रुहंता, माता-पिता की स्थिति साधारण, अल्प सुखी जीवन, खर्चीला स्वभाव, अत्यधिक कामुक, वसीयत से संपत्ति का उपभोग प्राप्त होना, स्त्री प्रेम एवं विलास की वस्तुओं की चाह,कन्या संतान से साधारण सुख तो पुत्र सुख में बाधा, खेतीबाड़ी, पशु-पक्षी पालका शौक, जन्म समय सुखदायी तो मध्य एवं अंत समय दुखदायी, प्रारब्ध एवं प्रयत्न का समन्वय साधकर आगे बढ़ने की वृत्ति ऐसे व्यक्तियों में पाई जाती है। सुख में सब कुछ भूलनेवाले तो दुख का ढिंढोरा पीटनेवाले, मधुमेह, शीतज्वर,

गुप्तेंद्रियों के रोगों का कष्ट सहन करना होता है। जन्मस्थान से दूर रहकर जिंदगी

बितानी पड़ती है। पति-पत्नी में आमतौर पर झगड़ा रहता है और एक-दूसरे से

बोलचाल तक बंद हो जाती है।

प्रतिकूलता

प्रतिवर्ष नवंबर महीना।

हर महीने की 5, 15,20 तारीखें।

हर सप्ताह का शनिवार।

लाल रंग के वस्त्र एवं अन्य चीजें।

जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएं

आयु के 14 से 21 या 25 से 29वें वर्ष में विवाह योग। आमतौर पर दो विवाहों

का योग बनता है।

आयु के 7 एवं 28 से 35वें वर्ष में पूरे परिवार में रोग, ऋण, दुखों का अतिरेक

होता है। आर्थिक नुकसान, परिवार में झगड़े, माता-पिता को कष्ट, मकान से दूर

या शहर से स्थानांतरण, कर्ज का बोझ बढ़ाना, शारीरिक कष्ट होते हैं।

आयु के 8 से 16 एवं 36 से 47वां वर्ष भी अनेक दृष्टियों से प्रतिकूल रहता

है। बदनामी, चोरी जैसी घटनाएं घटित होती हैं। साथ ही कुछ महत्त्वपूर्ण भाग्यवर्धक

घटनाएं भी होती हैं।

आयु के 46 से 51वां वर्ष अति सावधानी बरतने का रहेगा। इस समय में हर

निर्णय विचारपूर्वक जांच-परखकर करना होगा। परिवार में से किसी की मृत्यु हो

सकती है।

आयु का 52वां वर्ष मृत्युसम पीड़ा का रहेगा। संभल जाने पर 78 वर्ष तक का

जीवन रहेगा।

पैरों पर या कमर के नीचे काला तिल या गहरे जख्म का दाग हो तो शुभ

समझना चाहिए। जीवन में तीन स्त्रियों से गहरी दोस्ती रहेगी। इनमें से किसी एक

स्त्री के कारण बदनामी मिल सकती है। शुक्रवार को जो कार्य करेंगे उसमें यश

मिलेगा। वृषभ, मिथुन, मकर एवं कुंभ राशि के व्यक्तियों के साथ किए गए

व्यवहारों में सफलता मिलेगी।

विशेष उपासना

वृषभ राशि या वृषभ लग्न के व्यक्तियों को स्त्री प्रेत से काष्ट होते हैं। आँखी

एवं कानों में विकृति आती है। ज्वरादि पीड़ा हो भी कष्ट पहुंचता है। इन पीड़ाओं

को दूर करने के लिए दुर्गासप्तशती का पाठ करें। जप एवं हवन करें। साथ ही ॐ

गोपालाय उत्तरध्वजाय नम: मंत्र का प्रतिदिन कम से कम 108 बार जाप करें।

नारायण कवच सिद्ध करके धारण करें। शुक्रवार का व्रत रखें।

ॐ सर्वस्वरूपे सर्वशेष पर्व शक्ति सन्त्रिते।

भयेण्या प्याहिनो दैवि दुर्ग नमोस्तुते।।

उपरोक्त मंत्र का नित्य 108 बार जाप करें। हीरा या उसकी पर्यायी रल को

धारण करें।

★★★★वृषभ राशि★★★★

            

               "वृषभाय नमः।"


    √●प्रेम के उदय से अन्तः करण पवित्र होता है। भगवान् विष्णु के श्री विग्रह का ध्यान करने से चित्त शुद्ध होता है। तीर्थ स्नान करने से तन पावन होता है। तन की पावनता से बढ़ कर है, मन का पावन होना मन बनता है, अन्न से। जैसा अन्न वैसा मन। अन्न प्राप्त होता है, धन से धन मिलता है,। श्रम से  श्रम तीन तरह का होता है- सात्विक, राजसिक तामसिक । न्यायोपार्जित धन सात्विक है। अतः शुद्ध है। अहं भाव से स्वभोग एवं प्रतिष्ठा के लिये अदानपूर्वक इकट्ठा किया गया धन राजसिक है। दूसरों को सता कर, लूटकर, चुरा कर ठगकर अपहृत कर सञ्चित किया गया धन तामासिक होता है। राजसिक धन दान देने से शुद्ध होता है, किन्तु तामसिक धन दान से भी शुद्ध नहीं होता। सात्विक धन सदैव शुद्ध है। न्यायोपार्जित अन्न का दशांश ईश्वरार्पण करने से वह शुद्ध होता है। ऐसे व्यक्ति के घर का अन्न शुद्ध होता है। अर्थ की शुचिता ही वास्तविक शुचिता है। शरीर की शुद्धि मिट्टी (साबुन वा शैम्पू) एवं पानी से होती है, पर मन की शुचि अर्थ शुद्धि से होती है। हमारे पूर्वजों ने कहा है...


 "सर्वेषामेव शौचानम्, अर्थशौचं परं स्मृतम् । 

योऽर्थे शुचिः स हि शुचिः, न मृद्वारिशुचि शुचिः ॥"


√●आहार शुद्धि के विषय में यह वाक्य है...


 "आहार शुद्धी चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ।

 चित्त शुद्धी क्रमात् ज्ञानं त्रुदयन्ते प्रन्थयः स्फुटम् ॥"


√● इस संबंध में श्री रणछोड़दास जी महाराज ने एक कथा (घटना) बतायी है। इसका उल्लेख मैं यहाँ कर रहा हूँ। अब से ५०० पाँच सौ वर्ष पहले स्वामी रामानन्द का आविर्भाव हुआ था। ये महात्मा कबीर के गुरु थे। इनका एक शिष्य रविदास था। वह ब्राह्मण था एक बनिया ने आग्रह पूर्वक रविदास को अपने यहाँ भोजन कराया। रामानन्द इस बात को जान गये । उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि तुम अगले जन्म में चमार होओगे। क्योंकि जिसके घर का अन्न खाये हो, वह चमड़े का व्यापार करता है, चमारों का शोषण करता है, उन्हें दुःख दे कर धन इकट्ठा करता है। उस अन्न के संस्कार के प्रभाव से चमार परिवार में जन्म लेना ध्रुव है। इससे रविदास चिंतित हुए और उन्होंने योगबल से अपना प्राण, देह से बाहर निकाला। शरीर शव हो गया। वही ब्राह्मण रविदास राजस्थान के एक चमार परिवार में जन्मा उस समय वहीं श्री रामानन्द स्वामी का डेरा था। उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका शिष्य अमुक घर में पैदा हुआ है। वह नवजात शिशु अपनी माता का दूध नहीं पीता था, जिससे कि वह अपना पूर्व भोग पूरा कर मर जाय जन्म से छुटकारा पाना अपने वश में नहीं है। इसकी मा दूध न पीने से चिंतित थी। स्वामी रामानन्द आये। इस शिशु के कान में दूध पीने का आदेश दिये। इसका नाम पूर्वजन्म में जो था वही नाम रविदास पुनः रखे। माता अपढ़ थी। रविदास को रैदास कहने लगी। सन्त रैदास का नाम सब लोग जानते हैं। वे पूर्व जन्म के सिद्ध थे।


 √●इस लिये साधक महात्मा लोग सब का अन्न नहीं खाते। वे कुधान्य से बचते हैं। श्री पं. जी ने तो विद्यार्थी जीवन में ही राजान्न तक का त्याग कर दिया था। राजा का अन्न दूषित होता है, इसीलिये ऐसे श्री पंजी का स्मरण करने मात्र से सात्विक भावों की घटा हृदयाकाश में छा जाती है। सम्प्रति मन ब्रह्म विद्या के अरण्य में प्रवेश कर रहा है। उपनिषदों में कुछ वाक्य ऐसे हैं जो बार बार सोचने के लिये बाध्य करते हैं। 


√●योग्य शिष्य जब ब्रह्मनिष्ठ आचार्य के पास जाता है तो आचार्य उससे कहता है-'तत् त्वम् असि ।' तत् = वह (ब्रह्म, परमात्मा)। जो दूर है, अपने से अलग है, बाहर है-उसके लिये तत् का प्रयोग होता है। त्वम् = तुम (जीव, मुमुक्षु यहाँ त्वम् = त्वयि (सप्तमी) यहाँ त्वयि का स्थानापन्न त्वम् है। त्वम् का अर्थ है, तुम्हारे भीतर, तुझ में, हृदय में, अत्यन्त निकट। इस वाक्य के आशय को प्रकट करने वाला एक मंत्र है...


"तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥"

( ईशावास्योपनिषद् ५ ।)


√●तद् दूरे = वह (ब्रह्म) दूर (बाहर) है।


√●तद् उ अन्तिके = वह (ब्रह्म) उ अन्तिके (अत्यन्त समीप भीतर) है। 


√●इस प्रकार, तत्वमसि = तदेतदिति ।


        ( कठोपनिषद् २। ३ । १४)


 = [तद् एतद् इति, यहाँ भी एतद् = एतस्मिन् । 


√●अर्थात्, तद् (वह ब्रह्म) एतद् (इस जीव में, भीतर, हृदय में) है, ऐसा व्यवहार में कभी भी जीव, ब्रह्म नहीं हो सकता। जीव, जीव है। ब्रह्म ब्रह्म है। परमार्थ में तो सब एक है।


√●जिज्ञासु के कानों में जब यह वाक्य पड़ता है 'तत्वमसि' तो वह आश्चर्य करता है कि जिसको ढूंढने के लिये मैं तीर्थस्थलों में भटका, बाहर खोजा, वह मेरे अन्दर है वह विचार करने लगता है-'सोऽहं ।' अर्थात् सः अहम् । वह ब्रह्म मेरे भीतर है। यहाँ सः वह (ब्रह्म) अहं मयि (सप्तमी) मुझ में वह बा मैं हूँ-ऐसा अर्थ करना व्यवहार में अनर्थ है, अनुचित है, अहंकार का पोषक है, श्रेय से च्युत करने वाला है। पारमार्थिक स्तर पर, जब इस वाक्य 'सोऽहं' की अनुभूति होती है तो वाक् अवरुद्ध हो जाती है। वहाँ 'मैं' रहता नहीं। किन्तु जब तक 'मैं' है तब तक सोऽहं का अर्थ यही है-वह मेरे भीतर विद्यमान है। हमें बहिर्मुखता से हट कर अब अन्तर्मुखी होना है। क्यों कि वह हृदय के आकाश में सतत विद्यमान रहता है। उपनिषद् कहता है...


 "स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । 

 तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । 

अमृतो हिरण्यमयः ॥"


      (तैत्तियोपनिषद् ०६)


 √●सः (वह ब्रह्म), यः (जो), एषः (यह) अन्तः हृदय आकाशः (हृदय के भीतर का आकाश) है, तस्मिन् (उसमें), अयम् (यह) हिरण्यमयः (प्रकाशवान्) मनोमयः (सूक्ष्म) अमृतः (अविनाशी) पुरुष: (ईश्वर) है। 'सोऽहं' का आशय यही है। ईश्वर में पडैश्वर्य है, मुझ में कुछ भी नहीं। फिर में कैसे ईश्वर वा ब्रह्म हो सकता हूँ ? उसके सान्निध्य से अस्थायी ईश्वरत्व मुझ में आ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे धधकती हुई आग में रखा हुआ लौह पिण्ड भी अग्निवत् लाल हो जाता है। आग से बाहर होते ही पुनः काला लोहा। जीव का ब्रह्म होना भी ऐसे ही है। शाश्वत समधि में जीव, जीव नहीं रहता। तब सोऽहं की अनुभूति भी नहीं होती।जीव=ब्रम्हा= एक ।


√●साधक 'सोऽहं' का विचार करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुँचता है-'अहं ब्रह्मास्मि। अहं ब्रह्म अस्मि । यहाँ भी अहं मयि (अधिकरण) । ब्रह्म = ईश्वर ।अस्मि= अस्ति। मुझ में परमात्मा का सतत वास हैं। इस लिये मैं ब्रह्म (श्रेष्ठ) हूँ, बड़प्पन युक्त हूँ, ऐश्वर्यशाली हूँ, तुच्छ नहीं हूँ। ऐसा इस वाक्य का अर्थ है। मैं ब्रह्म हूँ ऐसा कहने से कोई ब्रह्म नहीं हो जाता। जो ब्रह्म होता है, वह ऐसा कहता नहीं कोई व्यक्ति 'मैं धनी हूँ' ऐसा कहते-कहते अथवा सोचते-सोचते धनी नहीं बनता। जो धनी होता है, वह अपने मुख से कभी धनी नहीं कहता। सूर्य अपने को कभी नहीं कहता कि मैं प्रकाशवान् हूँ। जो है, सो है। स्वयं कहने की आवश्यकता नहीं। सत्य प्रकट है, अपरोक्ष है। देखने के लिये आँख चाहिये। अन्तर्चक्षु वाला सब देखता है। जो देखता है, वहीं जानता है। सुनने से नहीं आता। कहकर नहीं बताया जा सकता। यह ज्ञान ऐसा ही है। 


"तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि । 

योऽसावसी पुरुषः सोऽहमस्मि ॥"

( यजुर्वेद अध्याय ४०, मंत्र १६ । )


√●इस मन्त्र में, सोऽहमस्मि = अहं ब्रह्मास्मि ।


 √●यहाँ, सः अहं अस्मि = अहं ब्रह्म अस्मि । सः पद हर विभक्ति का बोधक है।

√● सः = तम् । अहं तं समर्पयामि । सः = तेन । अहं तेन अस्मि (उसके कारण वा उससे मेरा अस्तित्व है)। सः = तस्मै । मैं वा मेरा सब कुछ उसके लिये है। सः = तस्मात्। उससे मैं पैदा हुआ हूँ। सः= तस्य। मैं उसी का हूँ। तस्मिन् मैं उसी में सतत हूँ। ऐसा अर्थ बोध होने से साधक का पतन नहीं होता। ऐसे ही 'अहं ब्रह्मास्मि' का तात्पर्य है। अहं ब्रह्मास्मि अब्रह्मार्ण ब्रह्मणा ब्रह्मणे ब्रह्मणः ब्रह्मणि अस्मि । मैं ब्रह्म को प्राप्त हूँ। मैं ब्रह्म से अस्तित्ववान् हूँ। मैं ब्रह्म के लिये / निमित्त हूँ। मैं ब्रह्म से जायमान हूँ। मैं ब्रह्म का हूँ। मैं ब्रह्म में सतत स्थित हूँ। यह व्यावहारिक अर्थ निःश्रेयस है। सः = सब से अन्त में मोक्षार्थी यह अनुभव करने लगता है 'सर्वं खल्विदं ब्रहा।' [सर्वम् खलु इदम् ब्रह्म ।


 √●खलु (निश्चय ही) इदम् (यह) सर्व (सब) ब्रह्म (परमात्मा) है। परमात्मा के अतिरिक्त है ही क्या ? सब कुछ वहाँ है। वहीं द्रष्टा है, वही दृश्य है। अपने भीतर से वह जगत् को प्रकट करता है। पुनः उसी में प्रविष्ट हो कर वह सतत रहता है। यह जगत् उसका शरीर है। वही इस जगत का आत्मा है। प्रकृति भी वही है, पुरुष भी वही है। जीव वही है, ईश्वर वही है। वह एक मात्र एक है। सब कुछ उसी में है। अन्तर्यामी रूप से वह सब में है। केवल एक की ही सत्ता है। वह विश्वरूप है, पञ्चभूतरूप जगत् के रूप में प्रकट है, अपने अन्तश्चित में स्थित है। वही स्तुतियोग्य है, उपास्य है।

 कहा गया है 


"तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं

 देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ।"

      (श्वेताश्वतरोपनिषद् ६५)


√●उपनिषद् के ये चार वाक्य तत्वमसि सोऽहं अहं ब्रह्यारिम् सर्वं खल्विदं ब्रह्म का चिन्तन करते हुए मैं अपनी प्रसन्नता के लिये ज्योतिष का पाठारंभ करता हूँ।


      ★★★अथ वृषराशिः★★★


 √●वृष राशि के संबंध में एक श्लोक है...


"वृषाकृतिस्तु कथितो द्वितीयः सवक्त्रकण्ठायतनं विधातुः । वनाद्रिसानद्विपगोकुलानां कृषीवलानामधिवासभूमिः ॥"


 √●राशि चक्र को दूसरी राशि वृष है। इसकी आकृति बैल सदृश होती है। कालपुरुष विधाता की देह में मुख से कण्ठ तक इसका स्थान है। जंगल पहाड़ शिखर टापू गोशाला कृषकों का स्थान (ग्राम) इसका वासस्थान है।


 √●यह स्त्री राशि स्थिर संज्ञक, भूमि तत्व, शीतल स्वभाव, कांति रहित, दक्षिण दिशा की स्वामिनी है। यह बात प्रकृति, रात्रि बली, चार चरण वाली, श्वेतवर्ण, महाशब्दकारी है। यह पृष्ठोदयी, मध्यमसंतति, शुभकारक, वैश्यवर्ण, शिथिलशरीर है। यह अर्धजल राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव स्वार्थी, समझबूझ कर काम करने वाली और सांसारिक कार्यों में दक्ष है। इसके द्वारा कण्ठ, मुख, कपोल का विचार किया जाता है। 


√●यह अचर, चतुष्पद, खेत निवास, ह्रस्व आकार, दशम स्थान बली है। यह स्त्री, सौम्य, नकारात्मक सत्ता, स्निग्धकांति, दक्षिण दिशा बली है। यह मूल कारक सुदृढ़ पुष्टता, धवलाभायुक्त, आग्न्येय ओर प्लवत्व है। यह रजोगुण, मुख अवयव, सम, शुष्क, बहिः राशि है।


 √●उद्भिद संबंधी पदार्थ, परस्त्री संबंध, सामान्य स्त्री उपसंबंध का विचार इससे किया जाता है। यह दिन में अंधी है। प्रश्न लग्न से गाय, भैंस पशुचिन्ता का बोध होता है।


√●इसका उदयमान १ घण्टा ५७ मिनट है।


√● इसका मृत्युप्रद चन्द्रांश २५° है । 


√●वृष राशि के ३° पर चन्द्रमा परमोच्च होता है।


√● वृष राशि के ४° से लेकर ३०° तक चन्द्रमा मूल त्रिकोण होता है।


√● वृष राशि का अधिपति शुक्र है यह शुक्र ग्रह के गुणों से ओतभोत है।


 √●इसका विस्तार ३१° से ६०° तक है।


 √●अब वृष शब्द के अर्थ का विचार करता हूँ।


 √●वृष = वृष् + क।

 वृष् धातु भ्वादि परस्मै वर्षति बरसना, वर्षाना, अनुदान देना, अर्पण करना, करना, आर्द्र करना, पैदा करना, सर्वोपरि शक्ति रखना, प्रहार करना, चोट करना मारना अर्थवाली है। पुनः वृष धातु चुरादि आत्मने वर्षयते सर्वशाक्ति शाली वा प्रमुख होना, उत्पन्न करने की शक्ति रखना, अर्थ रखती है।

 

√●इस प्रकार, वृष का अर्थ हुआ जल की वर्षा करने वाला मेघ वा इन्द्र, वीर्य की वर्षा करने वाला विष्णु, रति की वर्षा करने वाला कामदेव, सगुणों वा कल्याण की वर्षा करने वाला शिव, उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखने वाला ब्रह्मा । न्याय करने वाले सर्वशक्तिशाली यम को वृष कहते हैं। सामान्य रूप से वृष को बैल वा साँड़ कहते हैं। साँड़ में जितने गुण हैं, वे सब वृष राशि में पाये जाते हैं। वृष राशि से कालपुरुष के मुँह का बोध होता है। मुख से भोजन किया जाता है। यह भोगी राशि है। स्वादेन्द्रिय/रसेन्द्रिय का इससे विचार किया जाता है। चुम्बनादि क्रिया भी मुख से की जाती है। इस लिये वृष राशि स्नेह परक किंवा काम परक है। मुख से वाकू व्यापार किया जाता है। इसलिये यह राशि वाणी की कारक है। इससे ज्ञान की वर्षा की जाती है। इस लिये वृष को गो कहते हैं। गो शब्द पर विचार अब आगे करता हूँ। चलनार्थक 'गम्' गच्छति से गो शब्द बना है। गम् + डो=गो यही गो संस्कृत में संज्ञा है, अंग्रेजी में क्रिया है। गो का अर्थ जाना है। जितनी भी चलने वाली वस्तुएँ हैं, वे सब गो हैं। इस प्रकार गो के निम्नलिखित अर्थ हुए।


√● गो = यान, उपग्रह, विमान, खग, वाण, रजस् (इलेक्ट्रान) ।


 √●गो = युग वर्ष अयन मृतु मास पक्ष वार होरा लग्न घटी पल विपल क्षण प्राण। 


√●गो = आत्मा, बुद्धि (महत्तत्व), मन, आँख, जिहा, श्वाँस, शब्द, वायु, उष्मा, जल, गन्ध, रस। वाणी में गति है, शरीर गतिशील है, पशु (पश्यतीति) में गति है ज्ञान में गति है। अतः


√● गो = वाणी, पशु, देह, वेद, वेद वाक्य, शास्त्र वचन ।

 इन्द्रियाँ चंचल (चर्यमाण) हैं, लक्ष्मी चंचल है, धनैश्वर्य भी चंचल है। अतः


 √●गो = इन्द्रिय, लक्ष्मी, धन, गुण, ऐश्वर्य । प्रकाश की किरणे गतिशील हैं, चमक गतिशील है। अतः प्रकाशवान् पदार्थ गो हुए। 


√●गो = प्रकाश, रश्मि, आभा, प्रभा, ज्योति, किरण, विद्युत् इसी प्रकार,


 √●गो = रत्न, तडित्, दीप, ज्वाला, अग्नि ।


 √●गो = राशि, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, पृथ्वी। गो केश, रोम, नख, वृक्ष, वनस्पति ।


 √●प्रकृति परिवर्तन शील है, माया गतिशीला है। दिशाएँ परिवर्तनशील हैं। क्योंकि, जिस ओर हमारा मुँह होगा वही पूर्व दिशा होगी। पीठ की ओर पश्चिम, बायें हाथ की ओर उत्तर तथा दाहिनी ओर दक्षिण दिशा होती है। अतः


 √●गो = प्रकृति, माया, दिशा। 

गंगा में गति है, गीता में ज्ञान है गोरी में तेज है। इसलिये,


√● गो = गंगा (नदी), गीता (मन्थ), गौरी (ब्रह्मविद्या) ।

 गो का रुढ अर्थ है पशुविशेष गाय। इससे प्राप्त होने वाले दिव्य पदार्थ भी गो हैं। अतः


 √●गो = गाय का दूध, दही, घृत, मूत्र, गोबर । गो शब्द से गौः पद बनता है (प्र.एक व)। 

    गौः = स्तोतृ नाम निघण्टु ३ | १६ |  


√●गो युक्त सभी शब्द ज्ञान वाची हैं। इन का कारक वृष राशि का स्वामी शुक्र है। शुक्र कवि(सर्वज्ञ)है।


√●●अब, विभिन्न भावों में गोराशि के फल का कथन करता हूँ। इस राशि की प्रतीक संख्या २ है । 


√●लग्न में २...

 भोगी, धैर्यवान् पुष्टकाय, वाक्पटु । 


√●धन में २ ...

 चौपायों एवं खेती से धन प्राप्त । 


√●बल में २...

 विद्वान् कवि विप्रानुरागी, राजमित्र, धनी।


 √●सुख में २ ...

अनेक नियम व्रत करने से सुख।


√●सुत में २ ...

स्त्री रूपवती भाग्यवती, संतति कष्ट ।


√●रिपु में २ ...

कुटुंबी स्त्रियों से भोग के कारण संबंधियों से वैर ।


 √●जाया में २...

 अति रूपा, नम्रभाषी सद्गुणी सुलक्षणी पत्नी।


√● रंध में २...

 कफ प्रकोप से घर में मृत्यु ।


 √●धर्म में २...

 दानी, धर्मात्मा, लोकोपकारी । 


√●कर्म में २...

 स्थिर कर्मों में प्रवृत्ति बहु आयामी, मान्य।


 √●लाभ में २ ...

सत्पुरुषों स्त्रियों एवं कृषि से लाभ ।


√●हानि में २...

 स्त्रियों के निमित्त बहुत खर्च, प्रदर्शन की प्रवृत्ति ।


√● गो राशि में विभिन्न महों के रहने से जो फल होता है, वह निम्न है।


√● २ में सूर्य...

 स्त्री द्वेषी, जल से डरने वाला, हितोपदेशक, सन्मित्र ।


√● २ में चन्द्र ...

विलासी उत्तमबुद्धि, गंभीर, अनुशासनप्रिय कुटुम्बी।


 √●२ में मंगल ...

 स्त्री के वशीभूत, इन्द्रजाली, डरपोक, स्नेहहीन । 


√●२ में बुध ...

गुणवान् कलाविद्, कामी, दानी, उदार ।


√● २ में गुरु ...

 उदार, सत्पुत्रयुक्त, स्वस्थ, सुखी, ऐश्वर्यवान् प्रिय । 


√●२ में शुक्र...

 गौरवान्वित, बहुसंतति, विख्यात निर्भय, धनी, सुख एवं विलास की सामग्री से युक्त ।


√●२ में शनि ...

ऐश्वर्यहीन, स्त्रीहीन, अगम्या से गमन, दुस्संग । 


√●२ में राहु ...

बहुखी, पत्नी रोगिणी, अल्पभाषी ।


 √●२ में केतु ...

स्त्री हानि, कठोर वाकू विविध कष्ट ।


√●वृष राशि में, सुख की प्राप्ति, शुभ ग्रहों के होने से होती है। अशुभ ग्रह वृष राशि में होते हैं तो दुःख की वर्षा करते हैं। वृष राशि चन्द्रमा की उच्च एवं मूलत्रिकोण राशि है तथा शुक्र की स्वगृह राशि है। इस प्रकार इस राशि का चन्द्रमा एवं शुक्र से अति निकट का संबंध है। ये दोनों ग्रह इस राशि में आकर प्रसन्न होते हैं। इस राशि में इन ग्रहों के होने से तथा गुरु की दृष्टि पड़ने से, पाप प्रभाव रहित दशा में सर्व शुभता की वर्षा होती है। ऐसा जातक महाविद्वान् वेदज्ञ, ऐश्वर्यवान्, चतुर, वाकपटु, स्त्रियों को मोहने वाला, प्रचुरसंतति सुख से युक्त, अपराजित, सुदर्शन तथा सरल होता है। ऐसे जातक के पास संजीवनी विद्या होती है। यदि वृष राशि, राहु मंगल शनि के पाप प्रभाव में है तथा शुभ ग्रहों के प्रभाव से मुक्त है। तो जातक दुःशील होता है, निम्न कोटि की मनोवृत्ति एवं क्रियाओं से अपयश और दुःख का भागी होता है। वृषभाय नमः ।


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