नक्षत्र विवेचन
नक्षत्र ...
'यं न क्षीयते तं नक्षत्रम्' जो क्षीण नहीं होते हैं उनको नक्षत्र कहते हैं।
"णक्षगतौ"(पाणिनीय धातुपाठभ्वादि ४४२) धातु से 'अमिनक्षियजिवधिपतिभ्योऽत्रन्' इस उणादि सूत्र से अत्रन् प्रत्यय करके नक्षत्र शब्द बनता है।
'न क्षीयते क्षरते वा इति नक्षत्रम्' अर्थात् जो क्षीण नहीं होते अथवा क्षरित नहीं होते उन्हें नक्षत्र कहते हैं। इस विग्रह में नत्र और क्षत्र पद में समास करके..
'न भ्राण्नपान्नवेदा'(पाणिनीय अष्टा० ६/३/७५) सूत्र से नञ् का प्रकृतिभाव हो गया। 'नक्षत्राणि नक्षतेर्गतिकर्मणः "(निरुक्त ३/२०) गति और कर्म से क्षीण न होने के कारण नक्षत्र कहे जाते हैं। इन्हीं तथ्यों को श्रुति भी प्रमाणित करती है "तन्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वं यन्न क्षियन्ति ।"(गोपथ उत्तर ब्राम्हण १/८) नक्षत्रों का वही नक्षत्रत्व है, कि वह क्षीण नहीं होते। "न वै तानि क्षत्राणि अभूवन्निति तद्वै नक्षत्राणां नक्षत्रत्वम्।"(शतपथ ब्रा० २/२/१९) निश्चय ही वे कभी क्षीण नहीं होते, यही है उन नक्षत्रों का नक्षत्रत्व |
नक्षत्र सूर्य के समान स्वयं प्रकाश रूप हैं, जैसा कि श्रुति कहती है...
"भाकुरयो ह नामैते भाँ हि नक्षत्राणि कुर्वन्ति ।"(शतपथ ब्रा ९/४/१) ये भा-प्रकाश करने वाले हैं, इसलिए प्रकाशरूप होने से इनका नाम 'भा' है। "नक्षत्राणि वै रोचना दिवि ।"(यजुर्वेद मां.सं. २३/५) निश्चय ही नक्षत्र ही द्युलोक में— अर्थात् आकाश में प्रकाशक हैं। जबकि ग्रह पृथ्वी के समान प्रकाशहीन पिण्ड हैं, ग्रहों के ऊपर जो सूर्य की किरणें पड़ती हैं, वे किरणें ही उन्हें प्रकाशित करती हैं। उन ग्रहों पर पड़ने वाली किरणें ही उनसे प्रत्यावर्तित होकर हमें उन ग्रहों को प्रदर्शित करती हैं। जैसा कि श्रुति स्पष्ट करती है— "सूर्यस्यैव हि चन्द्रमसो रश्मयः ।"(शतपथ ब्रा. ९/४/१/९) निश्चय ही चन्द्रमा की रश्मियाँ सूर्य की ही हैं। अर्थात् वे सूर्य से निकलकर चन्द्रमा पर पड़ती हैं और चन्द्रमा से प्रत्यावर्तित होकर हमें चन्द्रमा की रश्मियों के रूप में दिखाई पड़ती हैं।
नक्षत्र सूर्य के समान ज्वलनशील पिण्ड हैं। जैसा कि श्रुति कहती है...
'नक्षत्राणां वा एतद्रूपं यल्लाजाः।"(शतपथ ब्रा. १३/२/१/५) निश्चय ही जलता हुआ रूप नक्षत्रों का है। जबकि ग्रह ऊष्णता से रहित हैं, उनमें शीतलता सूर्य की दूरी के क्रम से और सूर्य की किरणों के अभाव से होती है। उन ग्रहों में जो कुछ ऊष्णता प्राप्त होती है, वह सब की सब उन्हें सूर्य से प्राप्त होती है। भी ग्रहों का प्रकाश स्थिर और उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। इसके विपरीत स्वयं जल रहे नक्षत्रों का प्रकाश कम्पित होता हुआ दिखता है। 'ज्योतिर्वै नक्षत्राणि "(कौषीतकी ब्रा. २७/६) निश्चय ही नक्षत्र ज्योति ही हैं।
आवश्यक नक्षत्र ज्ञान...
पृथ्वी की दो प्रकार की गति, सूर्य की स्थिति और खगोल में ग्रहों, उपग्रहों की गति के ज्ञान के लिए, सभी नक्षत्रों के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। पृथ्वी के झुकाव के कारण, सूर्य खगोल में क्रान्ति वृत्ताकार पथ में, ८° अंश दूरी के अंतर से, क्रान्ति वृत्त के दोनों ओर वर्ष भर में चलता हुआ दिखाई देता है। इसलिए ग्रहों की स्थिति जानने के लिए, चन्द्रमा और सूर्य की स्थिति जानने के लिए एवं कालचक्र के सम्यक् ज्ञान के लिए इस १६° अंश व्यापिनी मेखला में, दिखाई पड़ने वाले नक्षत्रों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। यह मेखला ही नक्षत्र मंडल, भ चक्र और मध्यकालीन ज्योतिषियों द्वारा राशि चक्र के नाम से कही जाती है।
वेदों में इस नक्षत्र मंडल अर्थात् भ चक्र को समानकोणात्मक २७ भागों में बाँटा गया है। इन २७ समान विभाग वाली दूरी में स्थित नक्षत्रों के द्वारा प्रतीत होने वाली आकृति के अनुसार ही वेदों में इनका नामकरण किया गया है। इन्ही समान विभाग में तारा युतियों के द्वारा कल्पित २७ आकृतिओं को ही श्रुतिओं में २७ नक्षत्र कहा गया है। २८ नक्षत्रों के नाम भी वेदों में दिये गये हैं। किन्तु परिगणना के समय २७ भागों को ही ग्रहण किया गया है, जैसा कि ब्राह्मण श्रुतियों में वर्णित है ...
"सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि ।" (ताण्डय.म.ब्रा.२३/२३/३) २७ नक्षत्र हैं। "तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि ।" वही यह २७ नक्षत्र हैं, मध्य आकाश की १६° अंश चौड़ी वृत्ताकार विषुव मेखला में स्थित नक्षत्रों का २७ विभाग पूर्णतया वैदिक व्यवस्था में विद्यमान है। वेदों में ही वर्णित २८ नक्षत्रों का भी परिगणन इस नक्षत्र मेखला के भीतर ही किया जाता है। अट्ठाइसवाँ नक्षत्र अभिजित नक्षत्र है। उसके सहित नक्षत्र निम्नलिखित हैं।...
१. कृत्तिका, २. रोहिणी, ३. मृगशीर्ष या इन्वका, ४. आर्द्रा या बाहू, ५. पुनर्वसु, ६. तिष्य या पुष्य, ७. आश्लेषा, ८. मघा, ९. पूर्वा फल्गुनी, १०. उत्तरा फल्गुनी, ११. हस्त, १२. चित्रा, १३. स्वाति या निष्ट्या, १४. विशाखा, १५. अनुराधा, १६. ज्येष्ठा, १७. मूल या विचृति या मूलवर्हिणी, १८. पूर्व- अषाढ़ा, १९. उत्तर अषाढ़ा, २०. अभिजित, २१. श्रोणा या श्रवण, २२. श्रविष्ठा या धनिष्ठा, २३. शतभिषक्, २४. पूर्व प्रोष्ठपदा या पूर्व भाद्रपद, २५. उत्तर प्रोष्ठपदा या उत्तर भाद्रपद २६. रेवती, २७. अश्विनी, २८. भरणी । वेद में इन २८ नक्षत्रों का वर्णन ....
यजुर्वेद में नक्षत्रों का ज्ञान अथवा भगण विज्ञान...
कालचक्र सम्बन्धी विज्ञान का मूल आधार नक्षत्रों का ज्ञान है। ऋग्वेद में विविध स्थलों में नक्षत्रों के नाम उल्लिखित हैं। नक्षत्रों के माध्यम से ही अपने अक्ष पर घूमती हुई और सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथ्वी का गतिविषयक ज्ञान भी होता है, जैसा कि यजुर्वेद में स्पष्ट है "प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शम् "(यजुर्वेद ३०/१०) इन सभी मंत्रों में 'आलभते' जो इस अध्याय के इस प्रकरण की समाप्ति पर आया है, अर्थ करने में जुड़ेगा अर्थात् मंत्र अर्थ करने के समय इस प्रकार होगा। 'प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शम्-आलभते ।' अब मंत्रार्थ इस प्रकार होगा- कालचक्र के प्रकृष्ट ज्ञान के लिए राष्ट्राध्यक्ष राजा या उसके द्वारा इस कार्य के निमित्त स्थापित की गयी चयन समिति, नक्षत्र विज्ञान वेत्ता नक्षत्र द्रष्टा को, सम्पूर्ण राष्ट्र से प्राप्त कर नियुक्त करें। "दिवे खलतिम्"(यजुर्वेद ३०/२१) दिन में दैनिक आर्तव ताप को जानने के लिए खलतिम्-खगोल वैज्ञानिक को सम्पूर्ण राष्ट्र से प्राप्त कर राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करे। अर्थात् प्रतिभा परीक्षण के द्वारा राष्ट्राध्यक्ष या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त सभा राष्ट्र व्यवस्था में ऐसे खगोल वैज्ञानिकों को नियुक्त करें। "सूर्याय हर्यक्षम् " (यजुर्वेद ३०/२१) सूर्य के विज्ञान को जानने के लिए राष्ट्राध्यक्ष राजा सूर्य की किरणों के दोष के प्रतिरोधक हरितवर्णात्मक आँखों के रक्षण में समर्थ यंत्र विज्ञान वेत्ताओं को प्रतिभा परीक्षण के द्वारा राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करें। 'नक्षत्रेभ्य किर्मिरम्"(यजुर्वेद ३०/२१) नक्षत्रों की स्थिति को जानने के लिए किरणों के ज्ञाता अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को प्रतिभा-परीक्षण के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र प्राप्त कर राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करें। अर्थात् प्रतिभा परीक्षण के द्वारा राष्ट्राध्यक्ष या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त सभा नक्षत्र वेधी यंत्रों के द्वारा नक्षत्रों की सम्यक् स्थिति को जानने वाले नक्षत्र वेत्ता खगोल वैज्ञानिकों को राष्ट्र व्यवस्था में नियुक्त करें। "चन्द्रमसे किलासम्”(यजुर्वेद ३०/२१) चन्द्रमा की स्थिति, चन्द्रमा की कलाओं, और चन्द्र सूर्य ग्रहण को जानने के लिए चन्द्र विज्ञान वेत्ताओं को प्रतिभा परीक्षण के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र से चयनित कर राष्ट्र व्यवस्था में राष्ट्राध्यक्ष राजा या तदर्थ सभा नियुक्त करे। अनन्त आकाश में अनन्त नक्षत्र हैं जैसा कि श्रुति कहती है " यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्ता यावन्तो लोमगर्तास्तावन्तः सहस्त्रसंवत्सरस्य मुहूर्ताः । " जितने ये आकाश में नक्षत्र हैं, उतने शरीर में रोयें हैं। अर्थात् जिस प्रकार से शरीर में रोयें अनगिनत हैं, अनन्त हैं, उसी प्रकार आकाश में नक्षत्र अनगिनत हैं, अनन्त हैं। जैसे शरीर के रोवों का परिगणन सम्भव नहीं, वैसे ही अनन्त आकाश के अनगिनत नक्षत्रों का परिगणन सम्भव नहीं। जितने शरीर में रोयें हैं, उतने हजार संवत्सर के मुहूर्त हैं। जब शरीर के रोवों का परिगणन ही संभव नहीं है तो उतने संवत्सरों की परिगणना कैसे संभव हो सकती है और फिर उन संवत्सरों की मुहूर्तों की परिगणना की कल्पना भी नहीं हो सकती। जिस प्रकार यह परिगणना असम्भव है उसी प्रकार आकाश में स्थित नक्षत्रों के परिगणन की कल्पना भी असम्भव है।
अथर्ववेद में नक्षत्रों का वर्णन...
नक्षत्राणि अथर्ववेद सूक्त १९/७, ऋषि:-गार्ग्यः, देवता-नक्षत्राणि -
चित्राणि साकं दिवि रोचनानि सरीसृपाणि भुवने जवानि ।
तुर्मिशे सुमतिमिच्छमानो अहानि गीर्भिः सपर्यामि नाकम् ॥ १॥
चित्राणि = चित्र-विचित्र अनेक प्रकार के, साकं दिवि रोचनानि =साथ साथ द्युलोक में प्रकाशित होने वाले, सरीसृपाणि= आकाश में सरकते हुए से सदा गतिशील दिखने वाले, भुवने जवानि= भुवन-ब्रह्माण्ड में वेगवान्, अ- हानि= कभी भी नष्ट न हाने वाले, तुर्मिशं सुमतिं इच्छमानः = अनिष्टनाशक उत्तम बुद्धि की इच्छा करता हुआ, मैं नाकम् - स्वर्गचारी अर्थात् आकाश में चलने वाले नक्षत्रों की, गीर्भिः सपर्यामि=अपनी वाणियों से सपर्या करता हूँ अर्थात् स्तुतिपूर्वक शरणापत्र होता हूँ।
सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शमार्द्रा ।
पुनर्वसू सूनृता चारु पुष्यो भानुराश्लेषा अयनं मघा मे || २ ||
अग्ने - हे अग्ने-परमात्मन्!, कृत्तिका रोहिणी च सुहम् मे अस्तु कृत्तिका और रोहिणी मेरे लिए विनम्रता देने वाले हों, मृगशिरः भद्रं मे अस्तु मृगशिर नक्षत्र मेरे कल्याण के लिए हो, आर्द्रा शं मे अस्तु - आर्द्रा नक्षत्र मेरे लिए शान्ति देने वाला हो, पुनर्वसु सूनृता मे अस्तु पुनर्वसु नक्षत्र मेरे लिए उत्तम सत् वाक्शक्ति देनेवाला हो, पुष्यः चारु मे अस्तु पुष्य नक्षत्र मेरे लिए उत्तम हो, आश्लेषा भानुः मे अस्तु - आश्लेषा नक्षत्र मेरे लिए सूर्य के समान प्रकाशक हो, मघा अयनं मे अस्तु - मघा नक्षत्र मेरे लिए मार्ग देने वाला हो।
पुण्यं पूर्वा फल्गुन्यौ चात्र हस्तश्चित्रा शिवा स्वाति सुखो मे अस्तु ।
राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्ट मूलम् ॥ ३ ॥
पूर्वा फल्गुन्यौ पुण्यं मे अस्तु - पूर्वा फाल्गुनी के दोनों नक्षत्र मेरे लिए पुण्यकारक हों, अत्र हस्तः चित्रा शिवा मे अस्तु यहाँ हस्त और चित्रा मेरे लिए कल्याणकारी हों, स्वाति सुखः मे अस्तु स्वाती नक्षत्र मेरे लिए सुखदायी हो, राधे विशाखे सुहवा मे अस्तु हे राधा और विशाखा तुम दोनों मेरे लिए उत्तम विनम्रता प्रदान करने वाले होवो, अनुराधा ज्येष्ठा मूलं नक्षत्रं अरिष्ट में अस्तु-अनुराधा, ज्येष्ठा और मूल ये नक्षत्र मेरे लिए विनाशक न हों। अन्नं पूर्वा रासतां मे अषाढा ऊर्जं देव्युत्तरा आ वहन्तु । अभिजिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम् ॥४॥ पूर्वा अषाढ़ा मे अन्न रासतां - पूर्वा अषाढ़ा नक्षत्र मेरे लिए अन्न देवे, उत्तरा देवी उर्ज आ वहन्तु उत्तरा अषाढ़ा नक्षत्र उत्तम बल देवे, अभिजित् पुण्यं रासतां एव- अभिजित् नक्षत्र मुझे पुण्य ही देवे, श्रवणः श्रविष्ठाः सुपुष्टि कुर्वतां श्रवण और श्रविष्ठा धनिष्ठा मेरे लिए उत्तम पुष्टि देवें। यहाँ अभिजित् नक्षत्र के प्रति प्रार्थना करते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह अभिजित् नक्षत्र मुझे पुण्य ही देवे पुण्यमेव रासतां। जिस प्रकार से केवल अभिजित् के लिए 'पुण्यं एव' कहा गया है। उस प्रकार किसी अन्य नक्षत्र के प्रति की गयी प्रार्थना में नहीं कहा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मूलतः यह नक्षत्र पुण्यकाल के रूप में ही मंत्र में प्रयुक्तः है। नक्षत्र मंडल के २७ समान विभागों में इसका अलग से परिगणन नहीं किया जाता है।
आ मे महच्छतामिषग्वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म ।
आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयि भरण्य आ वहन्तु ।। ५ ।।
महत् शतभिषक् - बड़ा शतभिषक् नक्षत्र, मे वरीयः आ मेरे लिए श्रेष्ठता लावे, द्वया प्रोष्ठपदा मे सुशर्म आ दोनों प्रोष्ठपदा भाद्रपद नक्षत्र मुझें उत्तम आवास से सम्पन्न करें, रेवती अश्वयुजौ च मे भगं आ - रेवती और अश्युज अश्विनी नक्षत्र मेरे लिए ऐश्वर्य लावें, और भरण्यः मे रयि आ वहन्तु भरणी नक्षत्र मेरे लिए सम्पत्ति ले आवे।
नक्षत्राणि अथर्ववेद सूक्त १९/८, ऋषिः - गार्ग्यः, देवता-नक्षत्राणि, ब्रह्मणस्पति।
यानि नक्षत्राणि दिव्यन्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु ।
प्रकल्पयंश्चन्द्रमा यान्येति सर्वाणि ममैतानि शिवानि सन्तु । । १ ।।
यानि नक्षत्राणि - जो नक्षत्र, दिवि अन्तरिक्षे द्युलोक में, अन्तरिक्ष में, अप्सु भूमौ - जलों में, भूमि पर, यानि नगेषु दिक्षु- जो पर्वतों पर तथा दिशाओं में हैं, चन्द्रमा यानि प्रकल्पयन् एति- चन्द्रमा जिनके साथ चलता हुआ दिखता है। सर्वाणि एतानि मम शिवानि सन्तु- ये सभी नक्षत्र मेरे लिए कल्याणकारी हों,
अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं च भजन्तु मे ।
योगं प्रपद्ये क्षेमच क्षेम प्र पद्येयोगं च नमोऽहोरात्राभ्यामस्तु ।। २ ।।
अष्टाविंशानि - अट्ठाईस नक्षत्र, शिवानि शग्मानि कल्याणकारी और सुखदायी हों, में सह योगं भजन्तु च और मेरे साथ योग प्राप्त करें, योगं प्रपद्ये अच्छी तरह योग प्राप्त हो, क्षेमं प्र पद्ये-अच्छी तरह क्षेम प्राप्त हो, क्षेमं च प्रपद्ये योगं च और इस प्रकार भलीभाँति क्षेम और योग प्राप्त हो, अहोरात्राभ्यां नमः अस्तु- दिन और रात्रि के लिए मैं नमन करता हूँ।
स्वस्तितं मे सुप्रातः सुसायं सुदिवं सुमृगं सुशकुन मे अस्तु ।
सुवमग्ने स्वस्त्यमर्त्य गत्वा पुनरायाभिनन्दन || ३ ||
मे सु-अस्तितं- मेरे लिए अस्तकाल सुन्दर शुभ हो, सुप्रभात: सु सुन्दर प्रातः काल हो, सुसायं- सुन्दर सायं काल हो, सुदिवं- दिन सुन्दर हो, सुमृगं- पशु सुखकारक हों, सुशकुनं मे अस्तु मेरे लिए पक्षी सुन्दर शुभ हों, सुहवं स्वस्ति- मेरी विनम्रता कल्याणकारी हो, अमर्त्यं गत्वा- अमरत्व को प्राप्त होकर, पुनः सब तरफ से आनन्दित होते हुए, आ अय-आओ।
अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम् । सर्वैमें रिक्तकुम्भान्परा तान्सवितः सुव ।। ४ ।।
सवितः - हे सविता- हे सबके प्रेरक परमात्मन्, अनुहवं- स्पर्धा, परिहवं- संघर्ष, परिवादं निंदा, परिक्षवं घृणा या छींक आदि, सर्वै: मे रिक्त कुंभान् – इन सब से मेरे घड़े खाली रहें, तान् परा सुव- उन सब स्पर्धा, संघर्ष, निन्दा, घृणा आदि सबको मुझसे दूर करें।
अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम् ।
शिवा ते पाप नासिकां पुण्यगश्चाभि महताम् ।। ५ ।।
अपपापं परिक्षवं पाप और छींक दूर हो, पुण्यं क्षवं मक्षीमहि पुण्यकारक अन्न हम भक्षण करेंगे, पाप- हे पाप!, शिवा पुण्यगः च कल्याण करने और पुण्य मार्ग में बाधक, ते नसिकां अभि मेहतां तेरी नाक को चारों तरफ से मेहित करें, अर्थात् तेरा अपमान करते हुए परित्याग करें।
इमा या ब्राह्मणस्पतेविषूचीर्वात ईरते ।
यघ्रीचीरिन्द्र ताः कृत्वा मह्यं शिवतमास्कृधि ।। ६ ।।
ब्रह्मणस्पते इन्द्र हे ज्ञानपते परमात्मन्!, इमाः याः विषूची: जो इन नाना दिशाओं में, वातः ईरते वायु चलती है, ताः सध्रीची: कृत्वा उनको योग्य मार्ग से चलने वाला करके, मह्यं शिवतमाः कृषि मेरे लिए अतिशय कल्याणकारी करें।
स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमोऽहोरात्राभ्यामस्तु ।। ७ ।।
नः स्वस्ति अस्तु- हमारा कल्याण हो, नः अभयं अस्तु हमें अभय प्राप्त हो, अहोरात्राभ्यां नमः अस्तु- दिन और रात्रि के लिए नमस्कार हो।
कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता में नक्षत्र वर्णन(कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय संहिता ४/४/१०)...
'इन नक्षत्रों का वर्णन इस प्रकार है...
कृत्तिका नक्षत्रमग्निर्देवताऽग्ने रुचः स्थ प्रजापतेर्धातुः ।
सोमस्यर्चे त्वा रुचे त्वा द्युते त्वा भासे त्वा ज्योतिष त्वा ।। १ ।।
कृत्तिका नक्षत्र का अग्नि देवता । हे अग्ने ! यह नक्षत्र प्रजापति धाता के द्वारा स्थापित अपनी दीप्ति में स्थित रहे। यह तुम सब मनुष्यों / प्राणियों के लिए चन्द्रमा को दिखाने वाला, तुम सबको द्योतित करने वाला, तुम सबको प्रतिभा-सम्पन्न बनाने वाला, तुम सबको सूक्ष्म ज्ञान देने वाला हो। इस मंत्र की प्रथम पंक्ति में नक्षत्र के देवता को सम्बोधित कर उससे प्रार्थना की गयी है कि "यह नक्षत्र प्रजापति धाता के द्वारा स्थापित अपनी दीप्ति में स्थित रहे।" इतना अंश सभी नक्षत्रों के देवता के सम्बोधन के साथ जुड़ता रहेगा। और साथ ही सम्पूर्ण द्वितीय पंक्ति भी सभी नक्षत्रों के वर्णन में अनुवर्तित होती रहेगी। तदनुसार ही आगे के सभी नक्षत्रों के अर्थ में यह इतना अर्थ अनुवर्तित होगा - "यह आप सब के लिए चन्द्रमा को दिखाने वाला, आपको द्योतित करने वाला, आपको प्रतिभा सम्पन्न बनाने वाला, आपको सूक्ष्म ज्ञान देने वाला हो।"
रोहिणी नक्षत्रं प्रजापतिर्देवता ||२||
मृगशीर्ष नक्षत्रं सोमो देवता ॥ ३ ॥ आर्द्रा नक्षत्रं रुद्रो देवता ।।४।।
पुनर्वसू नक्षत्रमदितिर्देवता।।५।।
२.रोहिणी नक्षत्रं प्रजापतिर्देवता- रोहिणी नक्षत्र का प्रजापति देवता। हे प्रजापते! यह नक्षत्र प्रजापति धाता के द्वारा स्थापित अपनी दीप्ति में स्थित रहे। यह आप सब के लिए चन्द्रमा को दिखाने वाला, आपको द्योतित करने वाला, आपको प्रतिभा सम्पन्न बनाने वाला, आपको सूक्ष्म ज्ञान देने वाला हो
३.मृगशीर्ष नक्षत्रं सोमो देवता- मृगशीर्ष नक्षत्र का सोम देवता । हे सोम ! यह नक्षत्र...
४.आर्द्रा नक्षत्रं रुद्रो देवता- आर्द्रा नक्षत्र का रुद्र देवता । हे रुद्र! यह नक्षत्र...
५.पुनर्वसू नक्षत्रमदितिर्देवता- पूनर्वसू नक्षत्र का अदिति देवता । हे अदिते! यह नक्षत्र.........
तिष्यो नक्षत्रं बृहस्पतिर्देवता ॥ ६ ॥ आश्लेषा नक्षत्रं सर्पा देवता ॥७॥
मघा नक्षत्रं पितरो देवता ॥८ ॥
फल्गुनी नक्षत्रमर्यमा देवता ॥९॥ फल्गुनी नक्षत्रं भर्गो देवता ॥ १० ॥
हस्तो नक्षत्रं सविता देवता ॥ ११ ॥
६.तिष्यो नक्षत्रं बृहस्पतिर्देवता- तिष्य नक्षत्र का बृहस्पति देवता । हे बृहस्पते ! यह नक्षत्र ..........
७.आश्लेषा नक्षत्रं सर्पा देवता- आश्लेषा नक्षत्र का सर्पगण देवता । हे सर्पगण! यह नक्षत्र........
८.मघा नक्षत्रं पितरो देवता- मघा नक्षत्र का पितर देवता । हे पितर! यह नक्षत्र...
९.फल्गुनी नक्षत्रं मर्यमा देवता- पूर्व फल्गुनी नक्षत्र का अर्यमा देवता । हे अर्यमन ! यह नक्षत्र .....
१०. फल्गुनी नक्षत्रं भर्गो देवता- उत्तर फल्गुनी नक्षत्र का भग देवता हे भग! यह नक्षत्र ......
११. हस्तो नक्षत्रं सविता देवता- हस्त नक्षत्र का सविता देवता। हे सविता! यह नक्षत्र..
चित्रा नक्षत्रमिन्द्रो देवता ॥१२॥
स्वाती नक्षत्रं वायुर्देवता ।।१३।।
विशाखे नक्षत्रमिद्राग्नी देवता ।।१४।। अनुराधा नक्षत्रं मित्रो देवता ।।१५।।
१२. चित्रा नक्षत्रमिन्द्रो देवता- चित्रा नक्षत्र का इन्द्र देवता । हे इन्द्र! यह नक्षत्र...
१३. स्वाती नक्षत्रं वायुर्देवता- स्वाति नक्षत्र का वायु देवता । हे वायो! यह नक्षत्र...
१४. विशाखे नक्षत्रमिद्राग्नी देवता- दोनों विशाखा नक्षत्र का क्रमशः इन्द्राग्नी देवता । हे इन्द्राग्नि ! यह नक्षत्र ......
१५. अनुराधा नक्षत्रं मित्रो देवता- अनुराधा नक्षत्र का मित्र देवता । हे मित्र ! यह नक्षत्र.......
रोहिणी नक्षत्रमिन्द्रोदेवता ।।१६।। विचृतौ नक्षत्रं पितरो देवता ।।१७।। अषाढ़ा नक्षत्रमापो देवता ।।१८।। अषाढ़ा नक्षत्रं विश्वेदेवा देवता ।। १९ ।।
१६ .रोहिणी नक्षत्रमिन्द्रोदेवता- रोहिणी ज्येष्ठा नक्षत्र का इन्द्र देवता। हे इन्द्र ! यह नक्षत्र ....
१७. विचृतौ नक्षत्रं पितरो देवता- विचृति नक्षत्र का पितृ देवता । हे पितर! यह नक्षत्र........
१८. अषाढ़ा नक्षत्रमापो देवता- अषाढ़ा नक्षत्र का जल का अधिष्ठाता आप वरुण देवता। हे आप! - हे वरुण! यह नक्षत्र ............ विश्वेदेवा
१९ .अषाढ़ा नक्षत्रं विश्वेदेवा देवता- उत्तर अषाढ़ा नक्षत्र का देवता। हे विश्वदेव! यह नक्षत्र .........
श्रोणानक्षत्रं विष्णुर्देवता ॥२०॥
श्रविष्ठा नक्षत्रं वसवो देवता ।।२१।। शतभिषङ्नक्षत्रमिन्द्रो देवता ॥ २२॥ प्रोष्ठपदा नक्षत्रमज एकपाद्देवता ।।२३।।
२०. श्रोणानक्षत्रं विष्णुर्देवता- श्रोणा श्रवण नक्षत्र का विष्णु देवता । हे विष्णो! यह नक्षत्र....
२१. श्रविष्ठा नक्षत्रं वसवो देवता- श्रविष्ठा नक्षत्र का वसुगण देवता । हे वसुगण ! यह नक्षत्र ...
२२. शतभिषङ्नक्षत्रमिन्द्रो देवता- शतभिषा नक्षत्र का इन्द्र देवता । हे इन्द्र ! यह नक्षत्र....
२३. प्रोष्ठपदा नक्षत्रमज एकपाद्देवता- प्रोष्ठ पदा नक्षत्र का अज एकपाद देवता। हे अज, एक पाद ! यह नक्षत्र ....
प्रोष्ठपदा नक्षत्रमहिर्वृध्नियो देवता ॥२४॥
रेवती नक्षत्रं पूषा देवता ॥२५॥
अश्वयुजौ नक्षत्रमश्विनौ देवता ॥ २६ ॥ अपभरणी नक्षत्रं यमो देवता ।। २७ ।।
२४. प्रोष्ठपदा नक्षत्रमहिर्वृध्नियो देवता- प्रोष्ठपदा नक्षत्र का अहिर्बुध्नय देवता। हे अहिर्बुध्निय! यह नक्षत्र..
२५. रेवती नक्षत्रं पूषा देवता- रेवती नक्षत्र का पूषा देवता । हे पूषन् ! यह नक्षत्र...
२६. अश्वयुजौ नक्षत्रमश्विनौ देवता- अश्विनी नक्षत्र का अश्विनौ देवता। हे अश्विनौ! यह नक्षत्र....
२७ .अपभरणी नक्षत्रं यमो देवता- अपभरणी नक्षत्र का यम देवता । हे यम! यह नक्षत्र...
"पूर्णापश्चाद्यन्ते देवा अदधुः ।" ( तैतिरीयसंहिता ४/४/१०/)
इस प्रकार आदि से अन्त तक देवताओं ने इन्हें धारण किया है। चूँकि सम्पूर्ण नक्षत्र मंडल वृत्ताकार है, कोई भी वृत्त ३६०° अंश का ही होता है। इस ३६०° अंश के २७ समान विभागों को २७ नक्षत्र कहा गया है। इन्हीं २७ नक्षत्रों में उन्नीसवें उत्तर अषाढ़ा नक्षत्र की चार घटी और श्रोणा या श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी कुल २९ घटी का अभिजित् नक्षत्र होता है। लेकिन जब नक्षत्र मंडल के समान २७ विभाग करते हैं, तो इसे अलग से नहीं गिनते, यह उन्हीं में अन्तर्निहित होता है। इसी तथ्य को श्रुति स्पष्ट करती है...
"सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि"(जैमिनीय ब्रा ३/८६) २७ दिव्य नक्षत्र हैं। मीमांसा - यहाँ २७ दिव्य नक्षत्र कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि काल परिगणना के लिए नक्षत्र मंडल के २७ विभाग ही किये गये हैं। इसलिए वह दिव्य है। "संवत्सरस्य नक्षत्राणि प्रतिष्ठा"(तैतरिय ब्रा ३/११/१/१३) नक्षत्र संवत्सर की प्रतिष्ठा हैं।
तानि वाऽ एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः ।
सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते ।(शतपथ ब्रा. २०/५/४/५)
वे यह निश्चय ही २७ नक्षत्र हैं। उन मुख्य नक्षत्रों के पीछे २७-२७ उपनक्षत्र एक-एक नक्षत्र के पश्चात् स्थित हैं। एक-एक नक्षत्र के पीछे क्रमशः उसके बाद वाले नक्षत्र, नक्षत्र मंडल में स्थित हैं। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि मूलतः विभागात्मक नक्षत्र २७ ही हैं। उस एक-एक नक्षत्र विभाग में अनेक छोटे-छोटे नक्षत्र क्रमशः स्थित हैं। जिन्हें श्रुति ने यहाँ उपनक्षत्रों के नाम से कहा है । इन्हीं छोटे-छोटे नक्षत्रों के आधार पर बनने वाली काल्पनिक आकृतियों के दृष्टिगत इन नक्षत्रों का नामकरण किया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि नक्षत्र मंडल को २७ समान विभागों में बाँटकर आकृति-कल्पित नामों से उनका नामकरण किया जाना वेदों की ही देन है। उन्हीं में उत्तर अषाढ़ा और श्रवण नक्षत्र के बीच में अभिजित् की उपस्थिति भी वेदों में ही स्पष्ट है। गणना के लिए उनके २७ विभागों को ही अधिक महत्व दिया गया है।
√●●अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है।
√●सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित् का किया क्या जाय ? इसे मूहूर्त की संज्ञा देना अधिक उपयुक्त है। इसे जाति परिवर्तन वा धर्मान्तरण माना जाय। यह नक्षत्र मूहूर्त का आवरण डाल कर अहोरात्र में एक बार आता है। दिन के मध्यभाग मे इसकी उपस्थिति होती है। यह मुहूर्त रूप से मध्याह में १ घटी पर्यन्त रहता है। इस अभिजित मुहूर्त में पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ है। अभिजित् मुहूर्त जातक का फल ऐसा कहा गया है ...
"अतिसुललित कान्तिः सम्मतः सज्जनानां
ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः ।
द्विजवरसुरभक्तिर्व्यक्तवाद मानवः स्याद् अभिजिति यदि सूतिर्भूपतिः स स्ववंशे ॥"
(दुण्डिराज )
√●जिसका जन्म अभिजित मुहूर्त में होता है, वह अत्यन्त शोभायमान कान्ति से युक्त तथा सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित होता है। वह जातक निश्चय ही विनयी, सुन्दर कीर्तिमान, तथा सुरुपवान् होता है। वह द्विजश्रेष्ठ (ब्राह्मण) एवं देवता में भक्ति रखता है, प्रशस्त वक्ता होता है। वह अपने वंश में प्रमुख होता है।
√● दिन के मध्य में सूर्य दिग्बली होता है। सूर्य के बलवान् होने से जातक राजा वा राजतुल्य शासक/प्रशासक होता है। मेरा जन्म ज्येष्ठकृष्ण दशमी के दिन ठीक मध्याह्न काल (अभिजित मुहूर्त) में हुआ है। सूर्य के उच्चच्युत (वृष में प्रवेश) होने से इस मुहूर्त के सम्पूर्ण फल में हास स्पष्ट है। मध्याह्न जातक जातकों को मैंने शासन प्रशासन में प्रविष्ट होते हुए देखा है।
√●२७ नक्षत्रों की सरणी में सब लोग वह रहे हैं। मैं इस में स्नान कर रहा हूँ। इसमें १०८ घाट हैं। हर घाट अनोखा है। इन घाटों की सुषमा किश्चित कथ्य है। श्री १०८ को मेरा प्रणाम ।
√●१. अश्विनीनक्षत्र...
इसमें ३ तारे हैं। घोड़ा के मुख सदृश इस का आकार है। आश्विन मास की पूर्णिमा के आस पास चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है। यह लघु वा क्षित्र संज्ञक नक्षत्र है। अश्विनीकुमार इसके देवता हैं। मेष राशि के १३° अंश २०' कला तक इसका क्षेत्र है। शीर्ष एवं प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध पर इसका नियन्त्रण है। चिन्तन प्रक्रिया पर इसका विशेष प्रभाव होता है। आवेश में आना ऊहापोह, कल्पनाशीलता, तन्द्रा, तनाव, आत्मविस्मृति, अपस्मार, उपता, अनिद्रा, आसक्ति, अन्यमनस्कता, ऐंठन, अंगघात, लकवा, सिरपीड़ा का विचार इस नक्षत्र से किया जाता है।
√●इस नक्षत्र का स्वामी केतु है तथा यह नक्षत्र जिस राशि में पड़ता है, उसका स्वामी मंगल है। अतः अश्विनी नक्षत्र जात व्यक्ति के स्वभाव में केतु एवं मंगल की भूमिका का वर्चस्व होता है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का तथा शनि नीच का होता है। सूर्य इस नक्षत्र पर प्रतिवर्ष वैशाख के प्रारंभ में लगभग १३.१/४ दिन के लिये आता है, जब कि चन्द्रमा प्रति सत्ताइसवें दिन इस नक्षत्र का भोग करता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक विचारशील, अध्ययन शील, झगड़ालू, ज्योतिष वैद्यक में रुचि रखने वाले, भ्रमणप्रिय, चंचलस्वभाव, अर्शरोगी, बुद्धिमान, तथा महाकांक्षी होते हैं।
√★२. भरणी नक्षत्र...
इसमें छोटे-छोटे तारों से छोटा सा रिकोग बनता है। यह अश्विनी के आगे पूर्व की ओर है। ३ इसे योन्याकार बताया गया है। यह मेष राशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' तक फैला हुआ है। इस का स्वामी शुक्र है। प्रमस्तिष्कीय मध्य भाग तथा सिर इसका प्रभाव क्षेत्र है। भरणीजात व्यक्ति का मस्तिष्क शुक्र और मंगल के प्रभाव से युक्त होता है। मंगल तम्बाकू का कारक है तथा शुक्र मदिरा एवं रसीले पदार्थों का कारक है। अतः ऐसा जातक धूम्रपान, मदपान करता है, रसीले पदार्थों में रुचि रखता है। सुखानुभूति की विशेष चाह, रसिक स्वभाव, मांसाहारी होने पर अत्यधिक क्रूरता एवं आक्रामकता, नीच संगता, साहस, उद्देश्य प्राप्ति मे सफल, चातुर्य, सच्चाई, प्रासाद एवं रोग मुक्तता ऐसे जातक में सामान्यतः देखी जाती है।
√●इस नक्षत्र के दूषित होने पर, सिर के अग्रभाग में चोट रति रोग से अस्वस्थता, हड़बड़ी, सिर का नजला, कफ, जुकाम चक्षुपीडा, धमनीविकार, व्यसन चटोरेपन की प्रवृत्ति जातक में पायी जाती है।
√●इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक बलवान् विरोधियों को नीचा दिखाने वाले, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, धोखा देने वाले, निम्न स्तर के कार्यों में लगे रहने वाले, कलात्मक अभिरुचियों वाले, यात्री एवं चर प्रकृति के होते हैं।
√●३. कृत्तिका नक्षत्र...
यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है। कार्तिक के महीने में रात्र्यारंभ में यह पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसमें ६ तारे माने गये हैं। इसकी आकृति क्षुर सदृश कही गई है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर होता है। इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इसका प्रथम चरण मेष राशि के २६° ४०' से लेकर ३०° तक है। अन्य तीन चरण वृष राशि के १०° तक फैले हैं। इसके दूसरे चरण में चन्द्रमा उच्च का होता है।
√● सिर का अगला भाग, मस्तिष्क दृष्टि भाग, ललाट पर इसके प्रथम चरण का तथा मुख, कण्ठ, निम्नहनु,कपोल पर इसके अन्य तीन चरणों का प्रभाव रहता है। यह नक्षत्र मेष एवं वृष राशियों का योजक है। पहले चरण पर सूर्य एवं मंगल का प्रभाव तथा शेष तीन चरणों पर सूर्य एवं शुक्र का प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र पर दूषित प्रभाव होने से तीव्र ज्वर, मस्तिष्क ज्वर, चेचक, झाई, मुहासा, दृष्टिदोष, कण्ठावरोध, कण्ठ प्रदाह, विस्मृति, चेहरे पर धब्बा मस्सा होता है।
√●इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक हृष्टपुष्ट, युयुत्सु, श्रेष्ठ, प्रधान, तार्किक, विषयाकांक्षी, आसक्त, तीव्र, प्रसिद्ध, मैत्रीपरायण, सहृदयपूर्ण व्यवहार करने वाले, शांति के इच्छुक, द्यूतप्रिय, धनीएवं सामाजिक क्रिया कलापों में भाग लेने वाले होते हैं।
√●४. रोहिणी नक्षत्र...
इसमें ५ तारे माने जाते हैं। यह गाड़ी के सदृश होता है। कृत्तिका के कुछ दक्षिण में इस की स्थिति देखी जाती है। कहा जाता है जब शनि और मंगल रोहिणी के तारों के बीच से हो कर जाते हैं, (शकट भेदन) तो प्रलय होता है। केवल चन्द्रमा को इसका भेदन करते हुए देखा जाता है। इसी कारण चन्द्रमा को रोहिणी पति कहते हैं। यह नक्षत्र वृष राशि के १०° से लेकर २३° २०' रहता है। इसलिये रोहिणी जात जातक पर चन्द्र एवं शुक्र का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है। ऐसे जातक सौम्य प्रकृति, सुहासप्रिय, सौन्दर्य प्रेमी, संगीत में रुचि रखने वाले, ललित कला, सरस साहित्य, नाट्य शास्त्र, यात्रा एवं उत्सव प्रिय होते हैं। मातृस्नेह प्राप्त करने वाले, विपरीतयोनि के साथ सतत जीवन जीने वाले मृदु हृदय, मधुर भाषी, प्रियदर्शी, परोपकारी, शुद्धात्मा तथा स्थिर विचारों के होते हैं।
√★इस नक्षत्र के दूषित होने पर कण्ठ स्वर विकृत होता है, छाती में पीड़ा होती है, हृदय को ठेस पहुंचती है। तालु, ग्रीवा, जिह्वा, मुंह, शीर्ष प्रभाग, अनुमस्तिष्क पर इसका विशेष प्रभाव होता है।
√★इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक स्वच्छताप्रिय, असत्यवादी, चापलूस, संगीतज्ञ, समाजसेवी, यात्री प्रसन्नचित, अन्धविश्वासी, सत्यनिष्ठ तथा आस्तिक होते हैं।
√●५. मृगशिरा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग वृष राशि में तथा शेष आधा भाग मिथुन में होता है। वृष के २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा मिथुन राशि के ६° ४०' तक उत्तरार्धभाग का विस्तार है। मृगशिरा के उत्तरार्ध भाग में पैदा होने वाले मंगल और बुध के संयुक्त प्रभाव में होते हैं। इसके पूर्वार्ध में जो जातक पैदा होते हैं, उन पर मंगल और शुक्र का सम्मिलित प्रभाव होता है। मृगशिरा का स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के प्रभाव में सम्पूर्ण वाक् तन्त्र होता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर पर स्त्रियों को अनियमित मासिक सूजन, मूत्रकृच्छ्र, रतिपीड़ा, नाक से रक्त स्राव, दन्त शूल, प्रीवास्थिका विच्छेद, कन्धे में/ के आस पास पीड़ा, बाहु पीड़ा होती है।
√●इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले अधिकांश जातक धनवान् अनैतिक कार्यों से धनार्जन करने वाले, अविश्वासी, उन्नतिगामी, कार्यनिपुण, झूठे, आडम्बरी, पाखण्डी, प्रतिभाशाली तथा धर्म में पाखण्डी होते हैं। इसके उत्तरार्ध में उत्पन्न जातक साहसी उत्साही, विनोदी, उर्वर मस्तिष्क, वाक् पद्, सततसावधान एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व से सम्पन्न होते हैं। शीघ्र उत्तेजित होना, तुरन्त प्रत्युत्तर देना, वासनोन्मुख, स्वार्थपरता, उद्यमता, अस्थैर्य इनके स्वभाव का अंग होता है।
√●६. आर्द्रा नक्षत्र...
यह राहु का नक्षत्र है। मिथुन राशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक इसका विस्तार है। स्कन्ध, बाहु एवं हाथ पर इसका प्रभाव रहता है। श्वासनली, प्रसिका तथा कर्णेनली पर इसका नियन्त्रण हैं। यह नक्षत्र दूषित होने पर सूखी खाँसी, गले का सूखना, कान का जाम हो जाना, स्वर भंग, श्वसन क्रिया में पीड़ा करता है।
√●इस नक्षत्र में उत्पन्न हुआ जातक प्रखर प्रतिभावान् पूर्वानुमान में दक्ष, पूर्वाभासयुक्त, निष्पकट, किन्तु आलोचक, सच्चरित्र, शोधपरक मस्तिष्क से सम्पन्न होता है। इन्द्रजालिक एवं तात्रिक योग्यताओं का धनी होता है। निन्दित कार्य करने वाला कृतघ्न, विश्वासघाती, अभिचारकर्मक तथा मध्यवय में अत्यन्त कष्ट पाने वाला जातक इस नक्षत्र की देन है। यह नक्षत्र सन्तानोत्पादन मे निर्बल होता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक अल्पवीर्य एवं स्खलनरोगी होते हैं तथा गणित सांख्यिकी वाणिज्य में विशेषयोग्यता रखते हैं। बुध की राशि एवं राहु के इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अधिकतर मधुर वाक् तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं, वैद्य एवं मंत्रज्ञ होते हैं, मदसेवन करते हैं, घमण्डी, दम्भी एवं यायावर होते हैं, आडम्बर पूर्ण 'जीवन व्यतीत करते हैं।
√●७. पुनर्व नक्षत्र...
यह गुरु का नक्षत्र है। इसके तीन पाद मिथुन राशि में अंतिम चौथा पाद कर्क राशि में होता है। यह मिथुन में २०° से लेकर ३०° तथा कर्क में ३° २०' तक फैला हुआ है। कन्धे और गले से लेकर फेफड़े, अन्तः श्वासनली, प्रास-नली, छाती का ऊपरी भाग, स्तनाम पर्यन्त इसका प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गलगण्ड, श्वासनलीशोथ, कान की सूजन, रक्तविकार यक्ष्मा, शीतज्वर न्यूमोनिया छाती में जलन तथा हृदय प्रदाह होता है।
√●नक्षत्र स्वामी गुरु तथा राशि स्वामी बुध के प्रभाव से अधिकांश जातक विचार पूर्वक कार्य करने वाले मेधावी प्रज्ञावान् होते हैं। विस्तृत दृष्टिकोण तीव्रबुद्धि, अच्छी स्मरणशक्ति, पूर्वानुमान में कुशल, व्यावहारिक कार्य क्षमता से युक्त शुद्ध सत्यवादी उच्चविचारों वाले धार्मिक कार्यकता, दिव्यज्ञान सम्पन्न, धनी, आत्मकेन्द्रित होना इसके लिये सहज है।
√●चन्द्रमा की राशि तथा गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु में पैदा होने वाले जातक महत्वपूर्व जीवन जीने वाले, आचारविचार का ध्यान रखने वाले, सुन्दर कल्पनाशक्ति से युक्त, विश्वसनीय, क्षमाशील, सौन्दर्योपासक, प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत करने वाले, दानी, न्यायप्रिय, दयालु, धनाढ्य, शिक्षक, राजनेता, कवि एवं तीर्थयात्री होते हैं।
√●८. पुष्य नक्षत्र...
इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह कर्क राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। पौषमास में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर आता है। पूरा वक्षस्थल, हृदय, फुफ्फुस, यकृत, अग्न्याशय इस के प्रभाव में रहता है। इसके दूषित होने पर राजयक्ष्मा, अन्तः श्वसनीयप्रणाली में व्रण, पित्त अश्मरी, घृणा, जुगुप्सा, हिचकी, पौलिया, श्वास कास, तपेदिक ज्वर का उदय होता है। इसनक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मितव्ययी, बुद्धिमान, अल्पव्ययी (कंजूस भी), विवादी चिन्तनशील, सावधान, तत्पर, आत्मकेन्द्रित क्रमबद्ध, नियमबद्ध, सहनशील, उद्योगशील, स्पष्टभाषी एवं कार्य निपुण होते हैं। अधिकांश जातक बड़े परिवार वाले तथा बृहत् स्रोतों से युक्त होते हैं। इनका मन अस्थिर रहता है। ये भ्रमणशील प्रकृति के होते हैं। कठिन कार्यों को भी दक्षतापूर्वक निपटाने में सफल होते हैं। साधारण सी बात पर चिन्ता करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी ये साहस नहीं छोड़ते। इनकी आर्थिक स्थिति साधारण ही होती है। ये ईश्वर भक्त एवं दार्शनिक स्वभाव के होते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक दीर्घायु होते हैं तथा सांसारिक दृष्टि से सफल माने जाते हैं। जब भी शनि इस नक्षत्र पर आता है तो जातक आजीविका एवं सम्पत्ति द्वारा विशेष लाभ पाता है।
√●९. आश्लेषा नक्षत्र...
यह बुध का नक्षत्र है। कर्क राशि में १६° ४०' से लेकर ३०० तक इसका वर्चस्व है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अधोमासनली, हृदय महाशिरा पर इसका प्रभाव जाना जाता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर, श्वास कास वायुगोला आमवात गठिया मन्दाग्नि अपच का रोग होता है।
√●इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक बुध और चन्द्रमा के सम्मिलित प्रभाव से युक्त होते हैं। धैर्यहीनता, परिवर्तनशीलता, कल्पनाशीलता, वारियता इनका विशेष गुण होता है ये कार्यकुशल, अनर्गलवक्ता, बहुभाषी, विदूषक, विद्वान, विद्याव्यसनी, संगीत साहित्य कलाविद, स्वार्थी, प्रपञ्ची, मायावी एवं अविश्वसनीय होते हैं। स्वांगरचने, अभिनय करने में ये दक्ष होते हैं। दूसरों की भाषा आसानी से समझ लेते हैं। दूसरों की अनुकृति करने में पटु होते हैं। ये धनवान् यथार्थवादी, स्त्री में लीन, मृदुभोजी, सरस व्यञ्जन प्रिय, हँसमुख, सरल और धूर्त होते हैं।
√●१०. मघा नक्षत्र...
यह केतु का नक्षत्र है। सिंह राशि का प्रारंभ इसी से होता है। यह सिंह राशि के १३° २०' पर्यन्त फैला हुआ है। इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र पीठ, रीढ़ की हड्डी, हृदयस्पन्दन सुषुम्णा नाड़ी, आमाशय, महाधमनी एवं नाभि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर हृदरोग, हृदय में अत्यधिक एवं अचानक स्पन्दन, ठेस, पीठ में दर्द, उद्रिरण, आमाशयिक व्रण, मूर्छा, पागलपन, भ्रान्ति, शंसय, जठराग्निघ्नता एवं उदरपीड़ा होती है।
√● इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक स्पष्टवादी, युयुत्सु लड़ाकू, शक्तिशाली, निर्भीक, साहसी निर्लज्ज ढीठ, कामी, अनुरागी बैरागी, अभिमानी दानी, शीघ्रकोपी, शीघ्रतुष्टी, शीघ्रगामी, शीघ्रकर्मी, स्वार्यतत्पर, उच्चाभिलाषी, उष्णप्रकृति, औम, शीघ्रविश्वासी, धनी, कार्यपटु, उत्साही, अविलम्बी, अधिक श्रम न करने वाले, ईश्वरपरायण, न्याय प्रिय, गुप्त कार्यों के प्रति यत्नशील तथा संशयी होते हैं।
√●इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य और केतु का सम्मिलित प्रभाव काम करता है। ऐसे जातक अपने से बड़ों के प्रति आदर भाव रखते हैं, एकाएक चोट खाते हैं, उन्नति के मार्ग में बार बार बाधाओं का सामना करते हैं, तेज बोलने वाले एवं चिन्ताग्रस्त मनः स्थिति के होते हैं।
√★११. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र...
शुक्र का यह नक्षत्र सूर्य की राशि सिंह में १३° २०' से २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। हृदय रीढ रज्जु सुषुम्नानाडी तथा उदरभाग पर इसका विशेष प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दषित होने पर सन्तान कष्ट, विपरीत योनिपीड़ा, स्त्रियों को गर्भाशय का रोग, बार बार गर्भ स्राव, मृतसन्तान, अनियमित अतुधर्म (मासिकस्राव), प्रेम वैफल्य, हदपीड़ा, उदर विकार, अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय में सूजन व्रण तथा रक्तचापाधिक्य का रोग होता है।
√★इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक उदात्त हृदय, प्रगल्भमन, प्रियदर्शी, हँसमुख, विलासी और आरामप्रिय, कवि, उदार, दीनचित्त, सावधान, सत्यनिष्ठ, शुद्ध, सरल, विनोदी, क्रीडावान्, उद्यमशील, आत्मसंस्थ, भूषाप्रिय, सेनानी सभ्य और सुहृद होते हैं। ये जातक कोमल हृदय, अपराध से डरने वाले, करुणरस बहाने वाले, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाले, सुभाषित शस्त्र एवं शास्त्र वेत्ता, पशुपालक, सम्मान प्रिय, स्वाभिमानी, शुद्धाचारी एवं विपरीतयोनि की प्रशंसा करने वाले होते हैं। ऐसे जातक प्रेमपथिक तथा पाप से दूर रहते हैं। साहित्य एवं स्वच्छ राजनीति का क्षेत्र इन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।
√★१२. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र...
इस नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि में २६° ४०' से ले कर पूरा ३०° तक है। इसका शेषतीन चरण कन्या राशि में ०° से १०° तक व्याप्त है। इस नक्षत्र का अधिपति सूर्य है। इस का प्रभाव क्षेत्र रीढ रज्जु का अंतिम भाग, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र एवं कुक्षि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर उदरशूल, पीठदर्द, मस्तिष्कीय उद्घान्ति, मलावरोध, रक्तदूषण, त्वविकार, ज्वर, आत्रपुच्छशोथ का रोग होता है।
√●इस नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव होता है तथा इसके अन्य तीन चरणों में पैदाहोने वालों पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव रहता है। प्रथमपाद जात व्यक्ति आत्मबलसम्पन्न, उदार चेता, संकीर्णविचारों से दूर रहने वाले तथा नैतिक मापदण्डों पर चलने वाले होते हैं। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा ये अल्पभोजी एवं अल्प सन्तानवान् होते हैं। उच्चाभिलाषी, अधिकार प्राप्त, देश भक्त एवं हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य तीन पादों में पैदा होने पर बुध के प्रभाव से इनमें विद्याध्ययन की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये विषय विशेषज्ञ, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, गणितज्ञ, वाग्मी, मुखर, अभियन्ता, कूटनीतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, लेखक, व्यापार प्रवीण तथा निश्च्छल होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वालों का दाँत आगे निकला होता है।
√●१३. हस्त नक्षत्र ...
यह नक्षत्र कन्याराशि में १०° से लेकर २३° २०' तक विस्तार वाला है। इसका स्वामी चन्द्रमा है। छोटी आँत, वृक्क, मूत्राशय पर इसका वर्चस्व है। दूषित होने पर तत्संबंधी अंगों में विकार उत्पन्न होता है। उदर में वायु का भरना, आंतों का उतरना, आँतों में दर्द, आंतों में मल का रुकना, आँतों का शिथिल होना, आंतों में कीड़े पड़ना, अतिसार, आँव, मूत्ररोग, गुर्दे में पथरी होना, रोग इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक में सामान्यतः होते है। बुध की राशि एवं चन्द्रमा के नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक पर इन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। ऐसे जातक वेदज्ञ, सिद्धान्तशास्त्री, पौराणिक कथाकार, ज्योतिषी होते हैं। इनमें व्यापारिक बुद्धि होती है। ये उद्यमी, कार्यकुशल, चोर, शिल्पी, मद्यप, तरलपदार्थों के शौकीन होते हैं। ऐसे जातक अधिकांशतः कृतघ्नी, कपटी, असत्यवादी, अभिमानी, उत्तरदायित्व न निभाने वाले, गायन प्रेमी, लम्बे कद के होते हैं। ऐसे जातक अधिकतर साधारण जीवन जीने वाले होते हैं। इसमें पैदा हुआ जातक बुद्धिमान् होता है।
√★१४. चित्रा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग कन्या राशि में तथा शेष आधा भाग तुला राशि में पड़ता है। कन्या में २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा तुला में ०° से लेकर ६° ४०' तक उत्तरार्ध भाग फैला है। इस का नक्षत्र स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले जातकों पर मंगल एवं बुध का मिश्र प्रभाव रहता है। इसके उत्तरार्ध भाग में जायमान लोगों पर शुक्र एवं मंगल का मिश्र प्रभाव होता है।
√●इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र कटि है। इस के दूषित होने पर कमर का दर्द तथा कटिस्थ अंगों में विकार उत्पन्न होता है। मूत्र नलिका में जलन, वृक्क शैथिल्य, उत्तेजना, मस्तिष्क ताप, शिरपीडा, बुक्क अश्मरी, मूत्रावरोध, वस्तिशूल का रोग ऐसे जातकों को प्रायः होता है।
√● इसमें पूर्वार्धजात लोग हास्यप्रिय प्रयोगवादी शक्तिवन्त, तीक्ष्ण तर्कशील, असहनशील, साहसी, व्यापारी, उद्यमी वाकुशल, भव्य आकृति एवं बहुकम होते हैं। ऐसे जातक अद्भुतकर्मा, आक्रामक बलिष्ठ, दीर्घकाय तथा सामान्य आर्थिक स्थिति के नायक होते हैं। उत्तरार्धजात लोग श्रृंगारप्रिय, प्रत्यक्षानुमान एवं परीक्षण करने वाले, उत्कृष्ट अभिरुचिवाले आदर्शवादी, उत्तमकर्मक, संगीत प्रेमी तथा मृदुकटु स्वभावाले होते हैं। ये अतिकामुक तथा यौन रोगी होते हैं।
√★१५. स्वानी नक्षत्र...
राहु का यह नक्षत्र तुलाराशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक विस्तार वाला है। वस्ति भाग पर इस का पूरा नियन्त्रण है। मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय, गर्भाशय पर इसका विशेष प्रभाव है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गर्भाशय में व्रण गर्भस्खलन, बन्ध्यापन का दोष स्त्रियों में होता है। जननेन्द्रिय में अति उत्तेजना वा शिथलन पुरुषों में होता है। मलाशय दोष से शरीर पर चकते पड़ते हैं तथा कुष्ठ होता है।
√●इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक संवेदनशील, दयालु, मिलनसार, स्पष्ट भाषी, अन्तर्ज्यानी भविष्यवक्ता, समालोचक विनम्र, भावुक, मदिरादि सेवी, बातचीत के मर्म को समझने वाले तथ्य की गहराई में पहुँचने वाले, साधु, योगी, तपस्वी, यती, चरित्री होते हैं। इनकी अद्भुत स्मरणशक्ति होती है। ये आचारशील विवेकी शुद्धान्तःकरण के होते हैं। ये शीघ्ररुष्ट हो जाते हैं, घुमक्कड़ होते हैं। इन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है।
√★१६. विशाखा नक्षत्र...
इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण तुलाराशि में २०° से ३०° तक तथा अन्तिम चरण वृश्चिक राशि में ०° से ३° २०' तक फैले हुए हैं। इसका स्वामी गुरु है। जनन और उत्सर्जन अंग इसके अधिकार में हैं। इसके दूषित होने पर मधुमेह का रोग, जिससे चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, सुस्ती, आलस्य आता है। गर्भाशय एवं जननेन्द्रिय के रोग, पौरुष ग्रन्थि का शिथिलन, जलोदर, रक्त स्राव, उलझन, घबराहट एवं मोटापा होता है।
√●शुक्र की राशि एवं गुरु के नक्षत्र भाग में पैदा होने वाले जातक प्रसन्नवदन, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, नम्र, आस्थावान्, परम्परावादी, सभ्य, ईश्वर भक्त, न्यायप्रिय, विद्वान् वाक् कुशल, चमकदार एवं स्वच्छ वेश भूषा, लालची, ईर्ष्यालु, अभिमानी एवं शिक्षक होते हैं। ऐसे जातक मनोरंजन प्रिय, रतिप्रिय, सुखी, जीवन के उत्तरार्ध में सफल तथा विश्वसनीय होते हैं।
√★ मंगल की राशि वृश्चिक में विशाखा के चतुर्थचरण जात लोग उदार, दयालु अतिवादी स्पष्टवादी स्वच्छन्द उत्साही सादगीपसन्द, भद्र, गौरवान्वित अनियंत्रित इच्छाशक्तिवाले, शूर, कूटनीतिज्ञ होते हैं। व्यर्थदोषरोपण एवं छिद्रान्वेषण करते हैं। विचार एवं कार्य दोनों में प्रवीण होते हैं। गुरु के पीड़ित होने पर चोर तथा लड़ाकू होते हैं।
√★१७. अनुराधा नक्षत्र...
वृश्चिक राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' पर्यन्त इस का प्रस्तार है। इसका स्वामी शनि है। गुह्यांग पर इसका नियन्त्रण है। इसके दूषित होने पर स्त्रियों को मासिक कष्ट होते है। गुदा स्थान में मस्से उभरते हैं। कोष्ठबद्धता, काँच का निकलना, अर्श, वायु प्रकोप, सन्धिवात, सन्निपात तथा तीक्ष्ण दर्द होता है।
√★इस नक्षत्र में जयमान लोग दृढनिश्चयी, शुध्वमना, अभियकर, शक्तिवान् अधिकारपूर्ण वाणी से युक्त, स्वार्थी, हिंसात्मक प्रवृत्ति, क्रूर, बलशाली, नीच मनोवृत्ति, मलिन मन, प्रतिशोधी, आक्रामक, पराक्रमी, निर्भीक, शिवभक्त, धैर्यवान्, एकान्तप्रेमी रहस्यपूर्ण, शोधकर्ता, आविष्कारक प्रयोगवादी, गुप्तकार्यों मे लगे रहने वाले, चिन्तनशील, दुर्धर्ष, असामाजिक कृत्यों में लीन हरते हैं। ऐसे जातक स्वधर्म में स्थित तथा प्रशस्त विचार धारा के होते हैं। दर्शनशास्त्र, ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी कार्यों में रुचि रखते हैं। ये जातक अल्पसुखी, चतुराई से काम निकालने वाले तथा मनोश्लेषी होते हैं। आश्चर्यजनक कार्यों को करने वाले ऐसे जातक प्रायः सर्वभक्षी एवं दुःखी बचपन वाले होते हैं।
√★१८. ज्येष्ठा नक्षत्र....
यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में १६° २०' से ३०° पर्यन्त व्याप्त है। इसका स्वामी बुध है। मलद्वार वृषण, गुप्तांग डिम्बन्धि पर इसका वर्चस्व है। इसके दूषित होने पर गुदा विकृति, अर्शपीड़ा, स्त्रियों में अनियंत्रित मासिक रक्त स्राव, प्रदर कमर दर्द होता है। इस नक्षत्र में बृहस्पति के होने पर नितम्ब वा श्रोणि प्रदेश विस्तृत तथा भव्य होता है।
√★इसमें पैदा होने वाले जातक अध्ययन शील, अध्यवसायी, कार्यशील, क्रिया तत्पर, शोधकर्मी, निष्कपट, सरलचित, हास्यप्रधान, तीक्षणबुद्धि, कृच्छ्र स्वभाव, स्पष्टवादी, वाग्युद्धपटु, तर्कशास्त्री, विद्वान होते हैं। सतत काम में लगे रहने वाले प्रयोगवादी मस्तिष्क, वाक्चातुर्य युक्त, तीव्रता से कार्यों का निपटारा करते हैं। ऐसे जातक अतिशयता की सीमा छूने वाले, विकट क्रोधी, प्रख्यात, विजयी, उठाईगीर, ठग, चोर, लुच्चा, धूर्त होते. हैं। वैज्ञानिक रुचि एवं अस्थिर मान्यताओं से युक्त ये दूत का काम करने वाले वा सेनानी होते हैं। ये उच्चस्वर वाले अभिमानी तथा मित्रों के प्रति नम्र रहते हैं। ये कुलविरोधी एवं विघ्नों से सदा घिरे रहते हैं।
√★१९ मूल नक्षत्र...
इस नक्षत्र से धनुराशि का प्रारंभ होता है। यह ०° से १३° २०' धनु में फैला है। इसका स्वामी केतु है। दोनों जघन उर्वस्थि, श्रोणि मेखला, नितम्ब का अग्रभाग इसका प्रभाव क्षेत्र है। इसके दूषित होने पर जघन प्रदेश का सौन्दर्य क्षीण होता है। शुभप्रभाव में होने पर पुरुष मल्लयुद्ध के योग्य जंघा वाला तथा स्त्री सुरति प्रवीण होती है।
√★इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक उदार, सत्यवान्, आदरणीय, शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित, प्रसादचित्त, प्रगल्भ, उच्चाभिलाषी, प्रज्ञावान्, आस्थावान्, चिन्तनशील, देवपूजक, गुरुत्वयुक्त होते हैं। वे प्राचीनता के पोषक, उत्कर्षचेता आशावादी, मन्त्रशक्ति सम्पन्न, अच्छेपरामर्शदाता, क्षमी, लोक हितैषी, धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यय करने वाले, अभिमानी, दृढ निश्चयी तथा स्वस्थ होते हैं। मूलजातक सदैव समय का सदुपयोग करते है। गुप्त कार्यों में संलग्न रहते हैं, अभिचार कर्म में दक्ष एवं विरोधियों पर विजय पाने में समर्थ होते हैं।
√★२०. पूर्वाषाढ नक्षत्र...
यह धनुराशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। इसका अधिपति ग्रह शुक्र है। यह नक्षत्र जघनतट के सौन्दर्य एवं मादकता की कुञ्जी है। जाँघों की पुष्टता एवं मसृणता पर इसका अधिकार है। इस के दूषित होने पर जाँघें लोमयुक्त एवं अस्निग्ध होती हैं।
√★इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति दूसरों से सम्मानवाने वाले बलकामी, बहुयोनि भोगी, दुर्बलकाय, गायन-वादन-प्रेमी, नाट्यशास्त्री, अभिनेता, स्त्रियों से मान पाने वाले, मानसिक ऊहापोह से युक्त तथा शीघ्र सफलता पाने वाले होते हैं। ये मुक्तहस्त, आवश्यकता से अधिक दानी, भद्र, व्यापक दृष्टिकोण वाले, न्यायी, संवेदनशील, संतुलित, सहनशील, अनुचर, अपव्ययी, अत्याधुनिक, संग्रही, निर्बल हृदय, वचनबद्ध तथा स्वप्रशंसक होते हैं।
√★२१. उत्तराषाढ नक्षत्र...
सूर्य के स्वामित्व वाला यह नक्षत्र अपने प्रथम चरण से धनराशि को २६° ४०' से ३०° तक तथा अपने शेष तीन चरणों से मकरराशि को ०° से १०° तक व्याप्त किये है। इसका प्रभाव क्षेत्र जानु घुटना है। इसके दूषित होने पर घुटने का दर्द होता है। गठिया, संधिवात जानु अस्थिघात होता है। चक्षुपीड़ा, हृदय रोग, उदर रोग, फुफ्फुसरोग, शीतपित्त, छाती में दर्द, अस्थिज्वर, चर्मरोग, कुष्ठ एवं क्षय होता है। सूर्य का नक्षत्र होने से ये रोग सूर्य की निर्बलता के कारण होते हैं।
√★इसके प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातक सूर्य और गुरु के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील, कठिन विषयों के ज्ञाता, महत्वाकांक्षी जीवन के अभिलाषी, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त होते हैं। शेष तीन वरणों में पैदा होने वाले सूर्य और शनि के मिश्र प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ, निम्नस्तर का आचरण करने वाले, प्रशासन में दक्ष, योजनबद्ध ढंग से काम करने वाले, आलोचनाप्रिय एवं वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी होते हैं। ये आलसी और दीर्घसूत्र होकर भी दूसरों को उपदेश करते हैं।
√★२२. श्रवण नक्षत्र....
इसका स्वामी चन्द्रमा है। यह मकरराशि में १०° से लेकर २३°२०' तक व्याप्त है। जानु और उसकी गति का यह नियन्त्रक है। इसके दोष युक्त होने पर घुटने की गतिशीलता क्षीण होती है, सूजन आती है। चन्द्रमा का नक्षत्र होने से हाथी पाँव का रोग होता है। शनि की राशि में स्थित होने से सन्निपात, सन्धिपात, शीतज्वर, वायुगुल्म, क्षय का प्रकोप होता है। चित्तविक्षेप, स्मरण हास, गहन चिन्ता का रोग चन्द्रमा के निर्बल होने से होता है।
√★इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मनस्वी, महिमामय, घोर उदात्त, सचेत, अतिवादी, आशंकित, विनोदी, हास्य प्रिय, बुद्धिमान् एवं विचारशील होते हैं। इनमें साहस की कमी होती है, व्यर्थ के कार्यों में लगे रहते हैं, कार्यों को टालते रहते हैं तथा बाद में पश्चाताप करते हैं। ये सहनशील, विष्णु के भक्त, अद्भुत धारणाशक्ति रखते हैं, आश्चर्यचकित करने वाले कार्य करते हैं। ये प्रसिद्ध होते हैं तथा सुन्दर साथी का वरण करते हैं। ये चंचल, मातृपितृ पूजक, अच्छे भोजन के शौकीन तथा शरीर से स्वस्थ होते हैं। शनि के क्षेत्र में होने से श्रवणजात लोग लालची, नीचमनोवृत्ति दोषदर्शी, चिड़चिड़े होते हैं ये विद्वान् होकर भी दुःखी होते हैं।
√★२३. धनिष्ठा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का पूर्वार्ध मकर राशि में २३° २०' से लेकर ३०° तक तथा उत्तरार्ध कुम्भराशि में से ६° ४०' पर्यन्त फैला है। नक्षत्र स्वामी मंगल है। घुटना और उसके नीचे का भाग इसके प्रभाव क्षेत्र ० में है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर घुटने में व्रण बोट होने से लंगड़पन होता है। पूर्वार्धजात जातक अधिकांशतः अदूरदर्शी, उन्नति में व्यवधानपाने वाले शोचनीय आर्थिक स्थिति में रहने वाले श्रम एवं संघर्ष से उन्नति को प्राप्त होने वाले, स्त्री प्रेमी, क्रोधी, अभिमानी, लोहकर्मी, वाहन चालक, चालाक, घोर स्वार्थी, अवीर्यवान्, अपशब्दों का प्रयोग करने वाले, असंयत तथा पशुपालक होते हैं। उत्तरार्धजात जातक शीघ्रकोपी, शीघ्र उतेजित होने वाले वादविवाद करने वाले झगड़ालू, कार्य तत्पर, वैज्ञानिक मस्तिष्क, अनुसंधित्सु तकनीकी कार्यों में निपुण, परिश्रमी तथा तीव्र स्वरोच्चार करने वाले होते हैं। ये हृष्टपुष्ट, अध्यवसायी, व्यस्त मनोवृत्ति तथा गम्भीर होते हैं। अपने को धनी दिखाने की चेष्टा में ये दान भी देते हैं।
√★२४. शतभिषा नक्षत्र ...
इसका स्वामी राहु है। यह नक्षत्र कुम्भराशि में ६° ४०' से लेकर २०° पर्यन्त व्याप्त है। घुटने तथा ऐड़ी के बीच के भाग पर इसका प्रभाव आँका जाता है। इसके दूषित होने पर टाँगों में दर्द या टाँग की क्षति होती है। टोंग की पेशियाँ अशक्त वा ढीली पड़ जाती हैं।
√●इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर शनि और राहु का मिश्र प्रभाव होता है। ऐसे जातक अच्छी सूझबूझवाले तेजतर्रार मौलिक विचारधारा के धैर्यवान, अध्यवसायी, अतिवादी, उप, आलसी, अकर्मण्य, तंद्रिल, आरामपसन्द, सुस्त, ऐकान्तिक, प्राचीनता के पोषक, कूटनीतिज्ञ, छिद्रान्वेषी, भुलक्कड़, तृष्णालु होते हैं। अधिकतर ये सेवाकर्मी बिना सोचविचार के कार्य में जुट जाने वाले तथा मशीनी एवं तकनीकी कार्यों में रुचि लेने वाले होते हैं। ये प्रकृतितः उच्चविचार वाले, साधुसेवी, कट्टरपंथी, अहंकारी, हठी तथा अद्भुतकल्पनाशील होते हैं।
√★२५. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र...
इसनक्षत्र के प्रथम तीन चरण कुम्भराशि में २०° से ३०° पर्यन्त तथा शेष चौथा चरण मीन राशि में ०° से ३°२०' पर्यन्त व्याप्त रहता है। इस नक्षत्र का अधिपति गुरु है। टाँग का निचला भाग, टखने है एवं ऐड़ी का ऊपरी भाग इस के प्रभाव में रहते हैं। इसके दूषित होने पर रखने की हड्डी में मोच, सूजन तथा गतिविक्षेप होता है।
√●इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक शनि और गुरु के प्रभाव में रहते हैं। प्रथमतीन चरणों के अन्तर्गत जन्मने वाले अधिकांश लोग ईश्वरभक्त, स्त्रियों से संकोच करने वाले, आराम पसन्द, पूजापाठ में लीन रहने वाले होते हैं। ये अनायास सफलता प्राप्त करते हैं, वृद्धावस्था में अकस्मात् धन प्राप्त करते हैं। ये यात्राप्रिय, कवि, लेखक विधिज्ञ एवं सतर्क होते हैं। शिक्षण कार्य में विशेष रुचि होती है। ये मानवतापूर्ण व्यवहार करते हैं, आशावान् दार्शनिक ज्योतिषी वैयाकरण निस्स्वार्थी उदात्त हृदय शास्त्री एवं अनुशासित होते हैं। इस नक्षत्र पर बुरा प्रभाव होने पर ये नास्तिक, वेश्यागामी अशान्त एवं क्रूर जीवन जीते हैं। इस नक्षत्र के चौथे चरण में पैदा होने वाले दया की मूर्ति, महादानी, करुणासागर, ज्ञानी, सत्यव्रती, प्रियदर्शी, विनम्र, शुद्धात्मा तथा शान्तचित्त होते हैं। ये आजीविका के लिये सम्मानप्रद व्यवसाय का चयन करते हैं।
√★२६. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र...
इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह नक्षत्र मीन राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। इसका अधिकार पाँव के ऊपरी भाग पर है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर नक्षत्रस्वामी शनि से संबंधित शारीरिक विकृतियाँ प्रकट होती हैं। सन्धिवात, स्नायुदौर्बल्य, उदरवायु कोप, आंत्रच्युति, सूखारोग, शीत, नर्सों का उभरना तथा पाँव में चोट लगती है।
√●इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक शनि और गुरु के मिश्र गुणों से बने हुए होते हैं। अधिकांश जातक प्रसन्नचित्त, उन्नति के पथ पर अग्रसर होने वाले, स्त्रियों द्वारा मान पाने वाले, अकस्मात् हानि उठाने वाले, शत्रुओं से घिरे हुए, दैनन्दिन कार्यो में तन्द्रालु, विद्याव्यसनी, उच्चाचार युक्त एवं समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। ये दृढ़ चरित्र, उदार, मुक्तहस्त, सुरूप, निरपेक्ष चिन्तक, दीनसेवी होते हैं। धर्मशास्त्र के ज्ञाता, अर्थ सञ्चय में कुशल, बलिष्ठ और मध्यम काय होते हैं। पुरातात्विक खोजों में ये विशेषरुचि रखते हैं। ये शिथिल कर्मी तथा अभियन्त्रविद् होते हैं।
√●२७. रेवती नक्षत्र...
यह बुध का नक्षत्र है। मीनराशि में १६° ४०' से लेकर ३०° तक यह फैला है। इसका प्रभाव क्षेत्र पादतल, पादांगुलियाँ, पादांगुष्ठ एवं ऍड़ी का अधोभाग है। यह विकृत वा दूषित होने पर पादतल में बेवाई पैदा करता है, काँटे गड़ते हैं, पैर समाट होता है, जातक तेज दौड़ नहीं पाता। पाँव फूलता है, पाँव टेढ़ा होता है।
√● इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक बुध एवं गुरु के मिश्र प्रभाव के कारण सात्विक वृत्ति के होते हैं। सरल स्वभाव, विद्यावान् गुणवान् धनवान् चरित्रवान् तथा द्युतिमान् होते हैं। ये द्विस्वभावी द्वैधी वा संशयी होते हैं। इनमें आध्यात्मिक शक्ति का एकाएक वा शीघ्र प्रस्फुटन होता है। ये चतुरता निकालने वाले, परिपक्व विचार वाले, निर्णय लेने के पूर्व बारम्बार सोचने वाले, तथा शुभेच्छु होते हैं। स्वामीभक्त, राष्ट्र भक्त निर्लज्ज तथा पूर्वानुमान में कुशल होते हैं। लेखन क्रीडन प्रकाशन अध्यापन में इनकी वृत्ति सहज होती है।
••••••••••••नक्षत्र कारकत्व••••••••••••
√•वराहादि आचार्यों ने प्रत्येक नक्षत्र के अधीन पड़ने वाले पदार्थों को बताया है। जो नक्षत्र पीड़ित हो, तब उस नक्षत्र के अधीन आने वाले पदार्थ सामान्यतः पीड़ित होते हैं। अपि च जन्म कुण्डली में जो नक्षत्र पीड़ित हो, वह नक्षत्र जिस भाव में पड़े उस भाव की हानि होती है। हानि के कारणों का निर्णय कारकत्व के आधार पर करेंगे। रोजगार निर्णय में भी यह सहायक होता है।
√•1. अश्विनी का कारकत्व : घोड़ों से सम्बन्ध रखने वाले लोग, घुड़सवार, घोड़ों के व्यापारी, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वाहन सम्बद्ध लोग, सेनापति, यूथपति, शरीर की चिकित्सा करने वाले (PHYSICIAN) नौकर, सेवक, अधीन काम करने वाले लोग, रूपाजीवी अर्थात् सुन्दरता से रोजगार कमाने वाले, अभिनेता, मॉडल वगैरह, सलाहकारी का रोजगार करने वाले, कमीशन पर काम करने वाले, यात्रा आयोजित करने वाले, जेवरात या फैशन की वस्तुओं वाले, कृषिकर्म करने वाले आदि अश्विनी के अधीन हैं।
√•2. भरणी : रक्त व मांस से सम्बन्धित लोग, अर्थात् रक्तपरीक्षक, खून बहाने वार, हिंसक प्राणी या मनुष्य, हत्यारे, जल्लाद, कसाई, मांस काटने वाले, मारपीट, बदमाशी, आतंक, फैलाने वाले लोग, पुलिस, कस्टम आदि विभाग, भूसा, भूसे वाले अनाज, नीच कुल व स्वभाव के लोग, सर्वथा तमोगुणी लोग, क्रूर तान्त्रिक, शवसाधना करने वाले, शव परीक्षा करने वाले लोग भरणी के कारकत्व में हैं। शारीरिक कष्ट या हानि पहुँचाने वाले विषादि पदार्थ भी इसके अन्तर्गत होने से दवा आदि का विपरीत प्रभाव भी इसी के अन्तर्गत है। शस्त्र, अस्त्र, वकील, मुकद्दमा, कोर्ट-कचहरी, युद्ध भी इसी के अन्तर्गत हैं।
√•3. कृत्तिका : अग्नि कार्य करने वाले, सुनार, लुहार, ढाबा, रेस्तराँ, तन्दूर चलाने वाले, रंगरेज, कांच का काम करने वाले, ज्वलनशील पदार्थ, गैस, तेजाब आदि से काम करने वाले यज्ञ करने-कराने वाले, ईंधन व्यापारी, विशेषज्ञ, सलाहकार, सफेद फूलों वाले पदार्थ, खजाने में काम करने वाले, गुप्त धन, लॉकर रूम, बड़ी तिजौरी, भूगर्भगृह, सुरंग, सब-वे (Sub-way) गटर, मेनहॉल, कुआँ, गुफा, नाई, ब्यूटी सैलून, भाषा शास्त्री, व्याकरण जानने वाले, बर्तन बनाने वाले पुरोहित, ज्योतिषी, खान में काम करने वाले, खान प्रदेश, खुदाई करने वाले स्थान, श्मशान, रसोई आदि का कारकत्व कृत्तिका के अधीन है।
√•4. रोहिणी : वचन के पक्के लोग, सच्ची प्रतिज्ञा करने वाले, व्यापारी लोग, व्यापार स्थान, राजा या राज्य प्रबन्ध से युक्त बड़े अधिकारी, मेहनती व लगनशील लोग, योग साधना, ड्राइवर-गाड़ी चलाने वाले, ट्रासंपोर्टर, पशु, बड़े महत्वपूर्ण व शक्तिशाली लोग, पानी में रहने वाले जीव, खेती बाड़ी करने वाले, पर्वतीय या जंगली प्रदेश, बड़े धनाढ्य लोग, फैशन के कपड़े बनाने वाले लोग रोहिणी के अधीन हैं।
√•5. मृगशिरा : खुशबू, सेंट, परफ्यूम, वस्त्र, पानी से उत्पन्न पदार्थ, मोती, मूंगा, कमल आदि फूल, फल, रत्न, वनवासी लोगों का समुदाय, वन्य पदार्थ, पक्षी, पशु, शराब पीने पिलाने वाले व विक्रेता, संगीत कुशल लोग, गायक, गायन की समीक्षा करने वाले, कामुक लोग, सन्देश वाहक, नकल नवीस, लम्बी समुद्री या दूर प्रदेशों की यात्राएँ, भवन निर्माण, बड़े सुन्दर भवन, वास्तुविद्, अर्किटेक्ट, भवन निर्माण सामग्री आदि मृगशिरा के अधीन हैं।
√•6. आर्द्रा : उग्र स्वभाव, कठोर भाषण, दबंगपन, हेकड़ी से काम निकालने वाले, वधिक, परस्त्री लोलुप, स्त्री व्यवसायी, चतुर, चालाक, ठग, फूट डालने में कुशल, भूसा, भूसे वाले अनाज, गेहूँ चावल आदि। मन्त्र प्रयोग करने वाले, कार्य सिद्धि के लिए तान्त्रिक क्रियाएँ करने वाले, भूत प्रेत वश में रखने वाले, तिलिस्म, जादू, मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म करने वाले, शातिर व ठंडे बदमाश, हथियारों के व्यवसायी, सैनिक, अन्याय के विरोधी, योद्धा, घेराबन्दी करने वाले, सन्धि करने वाले, मध्यस्थ, रस पदार्थ अर्थात् फ्रूटजूस, शराब, आसव, स्क्वैश बनाने वाले, रसविक्रेता, पानी के व्यवसाय आदि आर्द्रा के अधीन हैं। अपि च वस्तु या वस्त्रादि को साफ करने वाले ड्राईक्लीनर, धोबी, शल्यचिकित्सक आदि भी इसी के अन्तर्गत हैं।
√•7. पुनर्वसु : केशसज्जा करने वाले, वास्तुकार, भेंट गिफ्ट बनाने वाले
या व्यवसायी, वाहन कारीगर, अनाज के उत्पादन बनाने वाले (Food- Producers) सत्यवादी, दानी, सच्चरित्र, परस्त्री या परधन से परहेज करने वाले, कुलीन, बुद्धिमान, यशस्वी, धनी, व्यापारी वर्ग, अच्छे पद पर कार्य करने वाले, दस्तकार या हाथ के कारीगर, चित्रकार, डिजायनर आदि पुनर्वसु के अधीन हैं।
√•8. पुष्य : जौ, गेहूँ, गुड़ चीनी के उत्पादन व व्यवसाय, जंगलातों का व्यवसाय, सचिव, सलाहकार, मन्त्री, मछुआरे, गोताखोर, राजनैतिक या प्रशासनिक क्षमता व पदवी वाले, प्रशासक, साधु लोग, यज्ञ व कर्मकाण्ड करने कराने वाले, रोजगार देने वाले, विवाह करवाने वाले, पुष्य के अन्तर्गत हैं।
√•9. श्लेषा : झूठे, जुआरी, वायदा व्यापारी, शेयर सट्टा करने वाले, ध ातु व्यवसायी, दवा निर्माण कार्य, कैमिस्ट, मुकद्मा, विवाह कराने वाले, व्यापारी, रत्न व्यवसायी, कृत्रिम वस्तुएं बनाने वाले, नकलची, फोटो व्यवसायी, फोटो स्टेट, जड़ी बूटी व्यवसाय, फल, सर्पपालक, सर्प साधने वाले, जहरीले जन्तुओं को पालने वाले, ठग, शल्य चिकित्सक, चिकित्सकीय जाँच करने वाले, मोटे अनाज के व्यवसायी आदि श्लेषा के अधीन हैं।
√•10. मघा : कृषि, व्यापार, पशुपालन, प्रसूतिशाला, परिवार नियोजन के शल्यचिकित्सक, बांझपन चिकित्सक, युद्ध का सामान बेचने वाले, गाने बजाने, नाचने वाले, बड़े ग्रामपति, बस्ती बसाने वाले, भूमि व्यवसायी, कॉलोनाइजर, स्त्रियों से द्वेष करने वाले, मांसभक्षी, मांस व्यवसायी इसके अधीन हैं।
√•11. पूर्वा फाल्गुनी : लोकप्रियता हासिल कराने वाले कार्य, गीतकार, संगीतकार, गायक, कवि, चित्रकार, व्यापारी, सूत की वस्तुएँ बनाने वाले, नमक बनाने या बेचने वाले, शहद, मुरब्बा बेचने वाले, तेल व्यवसाय, बालकों को शिक्षित करने वाले, मांस विक्रेता, वकील, फैसला करवाने वाले, अग्निकर्म करने वाले आदि लोग पूर्वा फाल्गुनी के अधीन हैं।
√•12. उत्तरा फाल्गुनी : वास्तुवेत्ता, भवननिर्माता, विवाह करवानेवाले,कर्मकाण्डी, विद्यार्थी, कोमल अन्न व्यवसायी, सच्चरित्र लोग, ईमानदार, राजा, धनाढ्य लोग, विद्या या धन का प्रदर्शन करने वाले लोग इस नक्षत्र के अधीन हैं।
√•13. हस्त : वस्त्र व्यवसाय, आभूषण व्यवसाय, चोरी के काम, बड़े वाहनों का व्यवसाय, चित्रकार या अन्य कारीगर, शिल्पी, व्यापारी, वेदज लोग, वास्तु व्यवसाय, धन का लेन-देन, चावल आदि अन्न, सूखे मेवे आदि हस्त के अधीन आते हैं।
√•14. चित्रा : मिस्त्री, कारीगर, दस्तकार, मरम्मत करने वाले, भवनबनाने वाले, रत्नों के पारखी, खुशबू बनाने वाले, लिपिकार क्लर्क, वस्त्र रंगने वाले, गणित या हिसाब किताब करने वाले, एकाउन्टेंट, शल्य चिकित्सक, जुलाहे, वस्त्र निर्माता, कीमती अनाज व्यवसाय, अमीरों का सामान विक्रय आदि चित्रा के अधीन हैं।
√•15. स्वाति : पशु, पक्षी, घोड़े, वाहन, गैस पंक्चर लगाना, पैट्रोलव्यवसाय, तपस्वी, कुशल व्यापारी, जंगली जानवरों को सधाना, कृषि, भण्डार करना, तेजी आने पर बेचना, हवाई यात्रा, वातानुकूलन, यात्रा करना आदि स्वाति के अधीन है।
√•16. विशाखा : लाल फूल, लाल फल, सेव, आलू बुखारा आदि, तिल, मूंग, दाल व्यवसाय, कपास या कपास से निर्मित पदार्थ, चना, भट्टी पर काम करने वाले, विवाद निपटाने वाले, लेखक, नृत्य-संगीत, वस्त्र-आभूषण व्यवसाय, धान्यसंग्रह आदि विशाखा के अधीन हैं।
√•17. अनुराधा : सन्धिविग्रह कराने वाले, वास्तुकर्म करने वाले, नेता, परिहास कुशल, मनोरंजक कार्य करने वाले, यात्राप्रिय, सर्दी में पैदा होने वाली फसलें, गुड़, चीनी आदि, पार्टीबन्दी करने वाले, यूनियन लीडर आदि अनुराधा के अधीन हैं।
√•18. ज्येष्ठा : संग्राम कौशल, मार्शल आर्ट सिखाना, परधन छीनने की कला, राजा लोग, सेनापति, पत्थर पर खुदाई करके उकेरने वाले, हथियार, डेयरी उद्योग, पानी के कार्य आदि इसके अधीन हैं। साथ ही वस्त्राभूषण, खुदाई, मेल-जोल व समझौता करवाना आदि भी इसी के अन्तर्गत हैं।
√•19. मूल : कृषि, व्यापार, युद्ध, चिकित्सा, लेखन, नृत्यकला, फल फूलों का व्यवसाय, बीजों का व्यवसाय, धन व्यवसाय, ब्याज के कार्य इसके अन्तर्गत हैं।
√•20. पूर्वाषाढ : समुद्री यात्रा, नाव, मर्चेण्ट नेवी, पानी के जन्तु, मछली आदि, पुल बनाना, पानी का व्यवसाय, कोल्ड ड्रिंक व्यवसाय, पानी में पैदा होने वाले पदार्थ, धन विनिवेश व्यवसाय, फूलों व फलों का व्यवसाय ये सब पूर्वाषाढ के अधीन हैं।
√•21. उत्तराषाढ : कुश्ती, द्वन्द्व युद्ध, हाथी घोड़ों का व्यवसाय, वाहनव्यवसाय, देवताभक्ति, पेड़ पौधों से प्राप्त पदार्थ, टिम्बर मर्चेण्ट, युद्धकलाएँ, फैशन के सामान, बड़े उद्योग चलाना आदि इसक अन्तर्गत हैं।
√•22. श्रवण :चालाकी, ठगी, भगवान की भक्ति, सलाहकारी, दवा बस्तियाँ बनवाना, विशेषज्ञ, अध्यापक, कानों की चिकित्सा, कथा वाचना प्रवाचक (Reader) प्राफेसर, वेद अध्यापन, शास्त्रों का अर्थ जानना धार्मिक कार्य आदि श्रवण के अन्तर्गत हैं।
√•23. धनिष्ठा : वाहन, वस्त्र, दवा व्यवसाय, सैक्स चिकित्सा, जनसेवक धनाढ्य लोग, केशसज्जा, गहने बेचना, फैशन के सामान, गृहसज्जा व सामान आदि धनिष्ठा के अधीन हैं।
√√24. शतभिषा : मछुआरे, पशु पकड़ने वाले, मोती व्यवसायी, मूंड या समुद्री पदार्थ (Sea-product) बेचने वाले, सूअर का मांस बेचना - उसके पदार्थ बेचना, धोबी, रंगरेज, शराब व्यवसाय, पक्षी पकड़ने वा या शकुन विचार करने वाले, चिकित्सा, घुड़सवारी आदि इसके अन्तग हैं।
√•25. पूर्वा भाद्रपद : पशुपालन, हिंसाकर्म, नीचकर्म, ठगी, युद्धविद्य सिखाना, मारपीट की शिक्षा देना, मांस विक्रय आदि पूर्वा भाद्रपद के अध् हैं।
√•26. उत्तरा भाद्रपद : वास्तुविद्या, यज्ञ, दान, तपस्या, सन्यास, राजप् चावल आदि या छिल्के के भीतर से निकलने वाले खाद्य पदार्थ, बाद काजू आदि का व्यवसाय, वाहन विद्या आदि इसके अधीन हैं।
√•27. रेवती : पानी से उत्पन्न पदार्थ, फूल, नमक, रत्न, शंख, मोती, सुगन्धित पदार्थ, व्यापार, नौका चालन, समुद्री यात्रा, मध्यम उद्योग आदि इसके अधीन हैं।
नक्षत्र
१. तारा तथा ब्रह्माण्ड-आकाश में अप् के विभिन्न स्तरों में जो सूर्य जैसे तारा, तारा समूह या तारा जैसे दीखने वाले बाहरी ब्रह्माण्ड नक्षत्र हैं। ये अप् में तैरते हैं, अतः तारा हैं-
सलिलं वा इदमन्तः (अन्तरिक्षे) आसीत्। यत् अतरन्, तत् तारकानां तारकत्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/२/५)
सृष्टि का मूल ब्रह्म रस रूप था-सर्वतः समान। उसमें तरंग होने से वह सलिल हुआ, तरंग एक आकार रूप लेने से सरिर् (शरीर) हुआ), उसमें तैरने वाले ब्रह्माण्ड। हमारे ब्रह्माण्ड के खाली जैसे स्थान् में अप् है, उसमें तरंग या शब्द होने से वह अम्भ (अम्ब) है। उसमें सूर्य जैसे अनेक तारा हैं।
तारा या दूर के ब्रह्माण्डों से प्रकाश (भा) निकलता है, अतः इनको भेकुर कहा गया है।
भेकुरयो ह नाम एते भां हि नक्षत्राणि कुर्वन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, ९/४/१/९)
संक्षेप में नक्षत्र या उसके आकाश को ’भ’ कहते हैं। आकाश में किसी पिण्ड के एक चक्र को भी भ कहते हैं तथा चक्रों की संख्या को भगण।
अप् में चलने के कारण वे अप्सरा हैं। अग्नि की अप्सरा ओषधि, सूर्य की अप्सरा उसकी मरीचि, चन्द्रमा की अप्सरा नक्षत्र, वात की अप्सरा अप्, यज्ञ की अप्सरा दक्षिणा तथा मन की अप्सरा ऋक्-साम हैं (वाज. यजु, १८/३८-४३, शतपथ ब्राह्मण, ९/४/१/७-१२)।
अप् वरुण का क्षेत्र है, उसकी प्रजा गन्धर्व हैं, जो गन्ध रूप हैं (भूमि तत्त्व का गुण गन्ध है, अर्थात् पदार्थ के सूक्ष्म कण) वरुण आदित्यो राजेत्याह तस्य गन्धर्वा विशः त इमे आसत, इति। (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/७)
योषित् कामा वै गन्धर्वाः (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/४/३, ३/९/३/२०)
अप्सरा क्षेत्र (स्त्री) है, गन्धर्व उस क्षेत्र के कण (पुरुष) हैं।
स्त्री कामा वै गन्धर्वाः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/२७, कौषीतकि ब्राह्मण, १२/३)
अतः ब्रह्माण्ड में मरने के बाद ७२ हूरों (अप्सरा) की कथा कुरान में है (२७ नक्षत्र, अरबी में २७ का उल्टा ७२)।
२. तारा संख्या-आकाश में ब्रह्माण्ड संख्या, या हमारे ब्रह्माण्ड में तारा संख्या उतनी ही है जितनी हमारे शरीर में कलिल संख्या है। शरीर के बाहरी चर्म पर जो केश हैं उनको लोम (रोम) कहते हैं। उनका आधार या गर्त कलिल हैं, अतः उनको लोमगर्त्त कहा है। मुहूर्त को ७ बार १५ से भाग देने पर १ सेकण्ड का प्रायः ६०,००० भाग होता है। १ संवत्सर में ऐसे जितने कालखण्ड हैं, उनकी संख्या उतनी ही है, जितना शरीर में लोमगर्त हैं। अतः इस काल मान को भी लोमगर्त हैं। जितने लोमगर्त हैं, उतने नक्षत्र।
एभ्यो लोमगर्त्तेभ्य ऊर्ध्वानि ज्योतींष्यान्। तद्यानि ज्योतींषिः एतानि तानि नक्षत्राणि। यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्त्ताः। (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/४/२)
पुरुषो वै सम्वत्सरः॥१॥ दश वै सहस्राण्यष्टौ च शतानि सम्वत्सरस्य मुहूर्त्ताः। यावन्तो मुहूर्त्तास्तावन्ति पञ्चदशकृत्वः क्षिप्राणि। यावन्ति क्षिप्राणि, तावन्ति पञ्चदशकृत्वः एतर्हीणि। यावन्त्येतर्हीणि तावन्ति पञ्चदशकृत्व इदानीनि। यावन्तीदानीनि तावन्तः पञ्चदशकृत्वः प्राणाः। यावन्तः प्राणाः तावन्तो ऽनाः। यावन्तोऽनाः तावन्तो निमेषाः। यावन्तो निमेषाः तावन्तो लोमगर्त्ताः। यावन्तो लोमगर्त्ताः तावन्ति स्वेदायनानि। यावन्ति स्वेदायनानि, तावन्त एते स्तोकाः वर्षन्ति। (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५)
लोमगर्त या तारा संख्या = १०८०० (वर्ष के मुहूर्त) x १५ (घात ७) = १८,४५,२८,१२,५०,००० = १८.४५ खर्व।
१ लोमगर्त समय = मुहूर्त (४८ मिनट) / (१५ घात ७) = ४८ x ६०/ (१५ घात ७) = १/५९,३२६.१७१९ सेकण्ड।
लोमगर्त का १५ भाग करने से स्वेदायन होता है।
१ स्वेदायन = १/ ८,८९,८९२.५७८ सेकण्ड।
इतने समय में प्रकाश किरण ३३७ मीटर दूरी तय करती है। वायु में वर्षा की बून्द (स्तोक) भी उतनी ही दूरी तय करती है। उसके बाद वह या तो टूट जायेगी या २ विन्दु मिलकर अन्य विन्दु बनायेंगे।
अन्य अर्थ है कि बड़े क्षेत्र में वर्षा होगी तो जल के इतने ही विन्दु गिरेंगे। ३ घनसेण्टीमीटर में प्रायः १०० जल विन्दु होते हैं। १००० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में यदि ५ सेण्टीमीटर वर्षा हुयी तो उसमें जल विन्दु संख्या
= १००० x १,००,००० x १,००,००० (वर्ग से.मी) x ५ (घन सें.मी) x ३३.३ = १.६६ x १० (घात १४)
एक सामान्य समुद्र में प्रायः इतने ही जल विन्दु हैं, अतः १० घात १४ को समुद्र कहा है।
२. तारा समूह-वेद, पुराण एवं ज्योतिष ग्रन्थों में अनेक तारा समूहों का उल्लेख है-सप्तर्षि मण्डल, शिशुमार चक्र, लुब्धक, कपर्दी, मृगव्याध, इषु त्रिकाण्डा, इल्वल, इन्वका आदि।
ज्योतिष गणना के लिए सौर मण्डल के ग्रहों कॆ कक्षा पथ के नक्षत्रों का ही प्रयोग है। पृथ्वी कक्षा या क्रान्ति वृत्त के अनुसार गणना होती है। अन्य ग्रह भी प्रायः इसी तल में हैं, २ अंश तक का झुकाव है। चन्द्र कक्षा प्रायः ५ अंश झुका हुआ है, अतः क्रान्तिवृत्त से उत्तर-दक्षिण ५-५ अंश चौड़ाई की पट्टी को नक्षत्र कक्षा कहते हैं।
पृथ्वी से कुछ तारा एक साथ किसी आकार में दीखते हैं, एक साथ रहने के कारण (नक्षति) वे नक्षत्र हैं। चन्द्र कक्षा के नक्षत्र २७ हैं क्योंकि चन्द्र २७ दिन में पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इनका बराबर क्षेत्र ३६०/२७ = १३ अंश २० कला है। एक अन्य विभाजन है। जिस भाग में कम तारा हैं, उस नक्षत्र को छोटा किया गया है, तथा खाली स्थानों को मिला कर ३ नक्षत्रों के पूर्व-उत्तर भाग किये गये हैं। २७.३ दिन में परिक्रमा होने के कारण एक छोटा अभिजित् नक्षत्र है जिसका क्षेत्र ०.३ दिन की गति के अनुसार है। मनुष्य ब्रह्मा के काल में उत्तरी ध्रुव इस दिशा में था। जब उत्तरी ध्रुव की दिशा इससे दूर होने लगी तब तत्कालीन ब्रह्मा (वाणी हिरण्य गर्भ के पुत्र अपान्तरतमा-महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय, ३४८-३४९) की सलाह से कार्त्तिकेय ने अभिजित् के बदले धनिष्ठा या माघ मास से संवत्सर का आरम्भ किया (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)।
माघशुक्ल प्रपन्नस्य पौषकृष्ण समापिनः।
युगस्य पञ्चवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते॥
(ऋग् ज्योतिष ५, याजुष ज्योतिष, ७)
नक्षत्र नाम के अन्य अर्थ भी हैं, प्रतिदिन चन्द्रमा एक नक्षत्र के साथ रहता है (नक्षति), अतः २७ नक्षत्रों को चन्द्र की पत्नी तथा दक्ष पुत्री कहा गया है। यहां दक्ष का अर्थ होगा चन्द्र का परिक्रमा पथ।
तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते (शतपथ ब्राह्मण, १०/५/४/५)
ब्रह्मणो वा अष्टाविंशो नक्षत्राणाम् (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/३/४) = अभिजित् नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा है।
अन्य अर्थ है कि तारा अपने स्थान से हिलते (क्षत्र) नहीं हैं (बहुत कम गति), अतः नक्षत्र हैं।
तत् नक्षत्राणां नक्षत्रत्वं यत् न क्षियन्ति (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, १/८)
पुराणों में कथा है कि चन्द्रमा का रोहिणी से समागम के कारण दक्ष ने उनको यक्ष्मा होने का शाप दिया।
या (प्रजापतेर्दुहिता) रोहित् सा रोहिणी अभूत् (ऐतरेय ब्राह्मण, ३/३३)
यमु हैव तत् पशवो मनुष्येषु कामं अरोहन् तमु हैष पशुषु कामं रोहति (शतपथ ब्राह्मण, २/१/२/६)
इसकी योनि अग्नि (कृत्तिका) में है (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/२/२/२७)
अतः कृत्तिका के मध्य विन्दु (३३ अंश) को फलित ज्योतिष में चन्द्र का उच्च स्थान कहा है।
बृहस्पति का भी पुष्य (तिष्य) नक्षत्र से सम्बन्ध है (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/१/२)। इसका आरम्भ (९५ अंश) बृहस्पति का उच्च मानते हैं।
नक्षत्र सूची वेद में बहुत विस्तार से है। नक्षत्रों की सूची, उनके स्वामी आदि की पूर्ण सूची अथर्व वेद (१९/७/१-५), तैत्तिरीय संहिता (४/४/१०), तैत्तिरीय ब्राह्मण (१/५/१, ३/१/२, ३/१/५) में है। ऋक् तथा वाज. यजु, साम वेद आदि में भी नक्षत्र नाम हैं, किन्त्तु क्रमबद्ध सूची नहीं है। तैत्तिरीय संहिता तथा ब्राह्मण में नामों की व्युत्पत्ति भी दी गयी है।
३. नक्षत्र कक्षा-सूर्य सिद्धान्त अध्याय १२ में २ प्रकार की नक्षत्र कक्षा है।
(१) ब्रह्माण्ड को आकाश कक्षा कहा गया है, जिसकी सीमा तक सूर्य एक सामान्य तारा की तरह दीख सकता है। इसे सूर्य रूपी विष्णु का परम पद भी कहा गया है। इसका आकार २ प्रकार से कहा गया है-
आकाश कक्षा = चन्द्र कक्षा x चन्द्र के कल्प भगण, या
= ग्रह कक्षा x कल्प में उसकी भगण संख्या।
कल्प को ब्रह्मा का दिन कहते हैं। सूर्य सिद्धान्त अनुसार इसका अर्थ हुआ कि पृथ्वी अपनी मध्यम कक्षा गति से ब्रह्माण्ड की जितने समय में परिक्रमा करेगी, वह ब्रह्मा का दिन हुआ।
कल्पोक्त चन्द्र भगणा गुणिताः शशिकक्षया। आकाशकक्षा सा ज्ञेया करव्याप्तिस्तथा रवेः॥८१॥
सैव यत् कल्प भगणैर्भक्ता तद् भ्रमणं भवेत्। कुवासरैर्विभज्याह्नः सर्वेषां प्राग्गतिः स्मृता॥८२॥
ख-वोम ख-त्रय ख-सागर षट्क् नाग व्योमाष्ट शून्य यम-रूप नगाष्ट चन्द्राः।
(१८,७१,२०,८०,८६,४०,००,००० योजन, भयोजन = भूयोजन x २७ = २१४ किमी.)
ब्रह्माण्ड संपुट परिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः॥९०॥
(सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १२) वेद की भाषा में इसे सूर्य रूपी विष्णु का परम पद कहा गया है।
तद् विष्णोः परमं पदम्, सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋक्, १/२२/२०)
वह विष्णु का परम पद है, जो सूर्यों के समूह रूप में दीखता है। (सूरयः = अनेक सूर्य। जितने सूर्य हैं, उतने ही मस्तिष्क में कलिल हैं, अतः सूरयः = विद्वान्। जैन मुनि को सर्वज्ञ या सूरि कहते हैं, सूरि का बहुवचन सूरयः। सूरदास का भी यही अर्थ है)। दिवि (आकाश) में चक्षु या दृष्टि का विस्तार है।
(२) अन्य नक्षत्र कक्षा सौर मण्डल के भीतर ही है जिसका आकार सूर्य कक्षा (अर्थात् पृथ्वी कक्षा) का ६० गुणा है।
भवेद् भ-कक्षा तिग्मांशोर्भ्रमणं षष्टि ताडितम्।
सर्वोपरिष्टाद् भ्रमति योजनैस्तैर्भमण्डलम्॥ (सूर्य सिद्धान्त, १२/८०)
सूर्य किरणों से जहां तक निर्माण या यज्ञ सम्भव है, वह क्रतु क्षेत्र है। उसकी सीमा पर छोटे ग्रह (बालखिल्य) हैं जो इसकी सन्तति कहे जाते हैं-
क्रतोश्च सन्ततिरार्या बालखिल्यानसूयत।
षष्टिपुत्र सहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।
अङ्गुष्ठ पर्वमात्राणां ज्वलद् भास्करतेजसाम्॥ (विष्णु पुराण, १/१०/११)
यह सूर्य से ६० ज्योतिषीय इकाई दूरी तक हैं जो नक्षत्र कक्षा के जैसा है। इनका आकार १ अंगुष्ठ = पृथ्वी का ९६ भाग (पुरुष = ९६ अंगुल) = १३५ किमी व्यास है।
इनको भी नक्षत्रों की तरह अप्सरा कहा गया है-
क्रतुस्थला चाप्सरसौ दृङ्क्ष्णवः पशवो हेतिः (वाज. यजु, १५/१५)
४. वेध और गणना-भारतीय ज्योतिष में कई प्रकार की द्वैत पद्धति हैं-
(१) वर्ष गणना-चन्द्र मन का कारक है। अतः हमारी पूजा चान्द्र तिथि के अनुसार होती है। इसके अनुसार समाज चलता है, अतः इसे संवत्सर (संवत्) कहते हैं। या अधिक मास जोड़ कर यह सौर वर्ष के अनुसार चलता है, इस अर्थ में भी संवत्सर है।
किन्तु तिथि दिन क्रम से नहीं होती है। ५ तिथि के बाद ५, ६, या ७ तिथि भी हो सकती है। अतः सौर वर्ष के अनुसार दिनों की गणना की जाती है, जिसे शक वर्ष कहते हैं। षच (सच) समवाये (धातु पाठ, १/७२३)। दिनों का समूह (अहर्गण) पद्धति को शक कहा गया है। पर्व निर्णय के लिए संवत् तथा गणना के लिए शक का प्रयोग है।
(२) ग्रह को पृथ्वी से देखते हैं, कितु गणना सूर्य केन्द्रित है।
(३) ग्रह स्थिति स्थिर नक्षत्रों के अनुसार देखते हैं। नक्षत्रों की सीमा पर कोई चिह्न या तारा नहीं है। हर नक्षत्र में एक योगतारा है, जिसकी स्थिति उस नक्षत्र में दी जाती है कि नक्षत्र आरम्भ विन्दु से कितनी दूरी पर है। ग्रह स्थिति देखने का एकमात्र साधन यही है, आंख से देखें या टेलीस्कोप से।
पर गणना उस विन्दु से करते हैं, जिस विन्दु पर उत्तरायण सूर्य विषुव वृत्त पर आता है। वहां पर क्रान्ति वृत्त (पृथ्वी कक्षा) तथा विषुव वृत्त दोनों परस्पर को काटते हैं, तथा कैंची (कृत्तिका) की तरह २ शाखायें निकलती हैं। वहां से गोलीय त्रिभुज आरम्भ होता है जिसकी गणना की जा सकती है। अतः कहा गया है कि कृत्तिका से गणना आरम्भ होती है। यह कृत्तिका स्थिर नक्षत्र वाला नहीं है, इसे गणितीय कृत्तिका कह सकते हैं। कृत्तिका के विपरीत विन्दु पर द्वि-शाखा मिलती हैं, अतः उसे विशाखा कहते हैं। विशाखा को इस अर्थ में नक्षत्रों की अधिपत्नी कहा गया है। मुख्यतः चन्द्र आकर्षण के कारण पृथ्वी का अक्ष विपरीत दिशा में घूम रहा है। अतः कटान विन्दु कृत्तिका से स्थिर नक्षत्र का शून्य विन्दु पीछे हट रहा है। अभी यह प्रायः २४ अंश पीछे है। अयन गति का चक्र २६,००० वर्षों का है जिसे ऐतिहासिक मन्बन्तर कहा गया है। गणना कृत्तिका विन्दु तथा स्थिर शून्य विदु के बीच की कोण दूरी को अयनांश कहते हैं। कृत्तिका के बाद १३ नक्षत्रों में सूर्य उत्तरायण में रहता है, अतः इनको देव नक्षत्र कहा गया है। इस अर्थ में कृत्तिका के बाद रोहिणी को चन्द्र का प्रिय कहा है और उसमें चन्द्र उच्च का होता है। विशाखा के बाद के नक्षत्रों में सूर्य दक्षिणायन में रहता है, अतः उनको असुर नक्षत्र कहा गया है।
मुखं वा एतत् नक्षत्राणा यत् कृत्तिकाः। एतद्वा अग्नेः नक्षत्रं यत् कृत्तिकाः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/२/१) = अग्नि का अर्थ अग्रि या अग्रणी भी है। प्रथम होने के कारण कृत्तिका अग्नि नक्षत्र है। या, संवत्सर की अग्नि इस नक्षत्र में (सूर्य आने पर) पूरी तरह प्रज्वलित हो जाती है।
कृत्तिका प्रथमं। विशाखे उत्तमं। तानि देव नक्षत्राणि। यानि देवनक्षत्राणि तानि दक्षिणेन परियन्ति। अनुराधाः प्रथमम्। अपभरणीरुत्तमम्। तानि यम नक्षत्राणि। यानि यम नक्षत्राणि तानि उत्तरेण (परियन्ति) (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/२/७)
संवत्सरोऽसि नक्षत्रेषु स्थितः। ऋतूनां प्रतिष्ठा। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/११/१/१३)
तन्नोदेवासोअनुजानन्तुकामम् .... दूरमस्मच्छत्रवोयन्तुभीताः।
तदिन्द्राग्नी कृणुतां तद्विशाखे, तन्नो देवा अनुमदन्तु यज्ञम्।
नक्षत्राणां अधिपत्नी विशाखे, श्रेष्ठाविन्द्राग्नी भुवनस्य गोपौ॥११॥
पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तात्, उन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय।
तस्यां देवा अधिसंवसन्तः, उत्तमे नाक इह मादयन्ताम्॥१२॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१/१)
= देव कामना पूर्ण करते हैं, इन्द्राग्नि (कृत्तिका) से विशाखा (नक्षत्रों की पत्नी) तक बढ़ते हैं। तब वे पूर्ण होते हैं, जो पूर्णमासी है। तब विपरीत गति आरम्भ होती है। यह गति नाक के चारो तरफ है।
इसे ब्रह्माण्ड पुराण में मन्वन्तर काल कहा है, जो इतिहास का मन्वन्तर है।
स वै स्वायम्भुवः पूर्वम् पुरुषो मनुरुच्यते॥३६॥
तस्यैक सप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/९/३७)
षड्विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु।
वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२९/१९)
पृथ्वी पर भी वार्षिक रास कार्त्तिक पूर्णिमा से आरम्भ होता है। यह ऋतु चक्र का वह समय है, जब सभी समुद्री तूफान शान्त हो जाते हैं और समुद्री यात्रा आरम्भ हो सकती है। अतः सोमनाथ के समुद्र तट पर कार्त्तिकादि विक्रम सम्वत् का आरम्भ हुआ था। गणित के अनुसार कार्त्तिक कृष्ण पक्ष आश्विन मास में होगा उसके बाद शुक्ल पक्ष से कार्त्तिक मास और कार्त्तिकादि वर्ष आरम्भ होगा। वर्ष और मास सन्धि पर दीपावली होती है।
••••••••••••नक्षत्र कारकत्व••••••••••••
√•वराहादि आचार्यों ने प्रत्येक नक्षत्र के अधीन पड़ने वाले पदार्थों को बताया है। जो नक्षत्र पीड़ित हो, तब उस नक्षत्र के अधीन आने वाले पदार्थ सामान्यतः पीड़ित होते हैं। अपि च जन्म कुण्डली में जो नक्षत्र पीड़ित हो, वह नक्षत्र जिस भाव में पड़े उस भाव की हानि होती है। हानि के कारणों का निर्णय कारकत्व के आधार पर करेंगे। रोजगार निर्णय में भी यह सहायक होता है।
√•1. अश्विनी का कारकत्व : घोड़ों से सम्बन्ध रखने वाले लोग, घुड़सवार, घोड़ों के व्यापारी, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वाहन सम्बद्ध लोग, सेनापति, यूथपति, शरीर की चिकित्सा करने वाले (PHYSICIAN) नौकर, सेवक, अधीन काम करने वाले लोग, रूपाजीवी अर्थात् सुन्दरता से रोजगार कमाने वाले, अभिनेता, मॉडल वगैरह, सलाहकारी का रोजगार करने वाले, कमीशन पर काम करने वाले, यात्रा आयोजित करने वाले, जेवरात या फैशन की वस्तुओं वाले, कृषिकर्म करने वाले आदि अश्विनी के अधीन हैं।
√•2. भरणी : रक्त व मांस से सम्बन्धित लोग, अर्थात् रक्तपरीक्षक, खून बहाने वार, हिंसक प्राणी या मनुष्य, हत्यारे, जल्लाद, कसाई, मांस काटने वाले, मारपीट, बदमाशी, आतंक, फैलाने वाले लोग, पुलिस, कस्टम आदि विभाग, भूसा, भूसे वाले अनाज, नीच कुल व स्वभाव के लोग, सर्वथा तमोगुणी लोग, क्रूर तान्त्रिक, शवसाधना करने वाले, शव परीक्षा करने वाले लोग भरणी के कारकत्व में हैं। शारीरिक कष्ट या हानि पहुँचाने वाले विषादि पदार्थ भी इसके अन्तर्गत होने से दवा आदि का विपरीत प्रभाव भी इसी के अन्तर्गत है। शस्त्र, अस्त्र, वकील, मुकद्दमा, कोर्ट-कचहरी, युद्ध भी इसी के अन्तर्गत हैं।
√•3. कृत्तिका : अग्नि कार्य करने वाले, सुनार, लुहार, ढाबा, रेस्तराँ, तन्दूर चलाने वाले, रंगरेज, कांच का काम करने वाले, ज्वलनशील पदार्थ, गैस, तेजाब आदि से काम करने वाले यज्ञ करने-कराने वाले, ईंधन व्यापारी, विशेषज्ञ, सलाहकार, सफेद फूलों वाले पदार्थ, खजाने में काम करने वाले, गुप्त धन, लॉकर रूम, बड़ी तिजौरी, भूगर्भगृह, सुरंग, सब-वे (Sub-way) गटर, मेनहॉल, कुआँ, गुफा, नाई, ब्यूटी सैलून, भाषा शास्त्री, व्याकरण जानने वाले, बर्तन बनाने वाले पुरोहित, ज्योतिषी, खान में काम करने वाले, खान प्रदेश, खुदाई करने वाले स्थान, श्मशान, रसोई आदि का कारकत्व कृत्तिका के अधीन है।
√•4. रोहिणी : वचन के पक्के लोग, सच्ची प्रतिज्ञा करने वाले, व्यापारी लोग, व्यापार स्थान, राजा या राज्य प्रबन्ध से युक्त बड़े अधिकारी, मेहनती व लगनशील लोग, योग साधना, ड्राइवर-गाड़ी चलाने वाले, ट्रासंपोर्टर, पशु, बड़े महत्वपूर्ण व शक्तिशाली लोग, पानी में रहने वाले जीव, खेती बाड़ी करने वाले, पर्वतीय या जंगली प्रदेश, बड़े धनाढ्य लोग, फैशन के कपड़े बनाने वाले लोग रोहिणी के अधीन हैं।
√•5. मृगशिरा : खुशबू, सेंट, परफ्यूम, वस्त्र, पानी से उत्पन्न पदार्थ, मोती, मूंगा, कमल आदि फूल, फल, रत्न, वनवासी लोगों का समुदाय, वन्य पदार्थ, पक्षी, पशु, शराब पीने पिलाने वाले व विक्रेता, संगीत कुशल लोग, गायक, गायन की समीक्षा करने वाले, कामुक लोग, सन्देश वाहक, नकल नवीस, लम्बी समुद्री या दूर प्रदेशों की यात्राएँ, भवन निर्माण, बड़े सुन्दर भवन, वास्तुविद्, अर्किटेक्ट, भवन निर्माण सामग्री आदि मृगशिरा के अधीन हैं।
√•6. आर्द्रा : उग्र स्वभाव, कठोर भाषण, दबंगपन, हेकड़ी से काम निकालने वाले, वधिक, परस्त्री लोलुप, स्त्री व्यवसायी, चतुर, चालाक, ठग, फूट डालने में कुशल, भूसा, भूसे वाले अनाज, गेहूँ चावल आदि। मन्त्र प्रयोग करने वाले, कार्य सिद्धि के लिए तान्त्रिक क्रियाएँ करने वाले, भूत प्रेत वश में रखने वाले, तिलिस्म, जादू, मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म करने वाले, शातिर व ठंडे बदमाश, हथियारों के व्यवसायी, सैनिक, अन्याय के विरोधी, योद्धा, घेराबन्दी करने वाले, सन्धि करने वाले, मध्यस्थ, रस पदार्थ अर्थात् फ्रूटजूस, शराब, आसव, स्क्वैश बनाने वाले, रसविक्रेता, पानी के व्यवसाय आदि आर्द्रा के अधीन हैं। अपि च वस्तु या वस्त्रादि को साफ करने वाले ड्राईक्लीनर, धोबी, शल्यचिकित्सक आदि भी इसी के अन्तर्गत हैं।
√•7. पुनर्वसु : केशसज्जा करने वाले, वास्तुकार, भेंट गिफ्ट बनाने वाले
या व्यवसायी, वाहन कारीगर, अनाज के उत्पादन बनाने वाले (Food- Producers) सत्यवादी, दानी, सच्चरित्र, परस्त्री या परधन से परहेज करने वाले, कुलीन, बुद्धिमान, यशस्वी, धनी, व्यापारी वर्ग, अच्छे पद पर कार्य करने वाले, दस्तकार या हाथ के कारीगर, चित्रकार, डिजायनर आदि पुनर्वसु के अधीन हैं।
√•8. पुष्य : जौ, गेहूँ, गुड़ चीनी के उत्पादन व व्यवसाय, जंगलातों का व्यवसाय, सचिव, सलाहकार, मन्त्री, मछुआरे, गोताखोर, राजनैतिक या प्रशासनिक क्षमता व पदवी वाले, प्रशासक, साधु लोग, यज्ञ व कर्मकाण्ड करने कराने वाले, रोजगार देने वाले, विवाह करवाने वाले, पुष्य के अन्तर्गत हैं।
√•9. श्लेषा : झूठे, जुआरी, वायदा व्यापारी, शेयर सट्टा करने वाले, ध ातु व्यवसायी, दवा निर्माण कार्य, कैमिस्ट, मुकद्मा, विवाह कराने वाले, व्यापारी, रत्न व्यवसायी, कृत्रिम वस्तुएं बनाने वाले, नकलची, फोटो व्यवसायी, फोटो स्टेट, जड़ी बूटी व्यवसाय, फल, सर्पपालक, सर्प साधने वाले, जहरीले जन्तुओं को पालने वाले, ठग, शल्य चिकित्सक, चिकित्सकीय जाँच करने वाले, मोटे अनाज के व्यवसायी आदि श्लेषा के अधीन हैं।
√•10. मघा : कृषि, व्यापार, पशुपालन, प्रसूतिशाला, परिवार नियोजन के शल्यचिकित्सक, बांझपन चिकित्सक, युद्ध का सामान बेचने वाले, गाने बजाने, नाचने वाले, बड़े ग्रामपति, बस्ती बसाने वाले, भूमि व्यवसायी, कॉलोनाइजर, स्त्रियों से द्वेष करने वाले, मांसभक्षी, मांस व्यवसायी इसके अधीन हैं।
√•11. पूर्वा फाल्गुनी : लोकप्रियता हासिल कराने वाले कार्य, गीतकार, संगीतकार, गायक, कवि, चित्रकार, व्यापारी, सूत की वस्तुएँ बनाने वाले, नमक बनाने या बेचने वाले, शहद, मुरब्बा बेचने वाले, तेल व्यवसाय, बालकों को शिक्षित करने वाले, मांस विक्रेता, वकील, फैसला करवाने वाले, अग्निकर्म करने वाले आदि लोग पूर्वा फाल्गुनी के अधीन हैं।
√•12. उत्तरा फाल्गुनी : वास्तुवेत्ता, भवननिर्माता, विवाह करवानेवाले,कर्मकाण्डी, विद्यार्थी, कोमल अन्न व्यवसायी, सच्चरित्र लोग, ईमानदार, राजा, धनाढ्य लोग, विद्या या धन का प्रदर्शन करने वाले लोग इस नक्षत्र के अधीन हैं।
√•13. हस्त : वस्त्र व्यवसाय, आभूषण व्यवसाय, चोरी के काम, बड़े वाहनों का व्यवसाय, चित्रकार या अन्य कारीगर, शिल्पी, व्यापारी, वेदज लोग, वास्तु व्यवसाय, धन का लेन-देन, चावल आदि अन्न, सूखे मेवे आदि हस्त के अधीन आते हैं।
√•14. चित्रा : मिस्त्री, कारीगर, दस्तकार, मरम्मत करने वाले, भवनबनाने वाले, रत्नों के पारखी, खुशबू बनाने वाले, लिपिकार क्लर्क, वस्त्र रंगने वाले, गणित या हिसाब किताब करने वाले, एकाउन्टेंट, शल्य चिकित्सक, जुलाहे, वस्त्र निर्माता, कीमती अनाज व्यवसाय, अमीरों का सामान विक्रय आदि चित्रा के अधीन हैं।
√•15. स्वाति : पशु, पक्षी, घोड़े, वाहन, गैस पंक्चर लगाना, पैट्रोलव्यवसाय, तपस्वी, कुशल व्यापारी, जंगली जानवरों को सधाना, कृषि, भण्डार करना, तेजी आने पर बेचना, हवाई यात्रा, वातानुकूलन, यात्रा करना आदि स्वाति के अधीन है।
√•16. विशाखा : लाल फूल, लाल फल, सेव, आलू बुखारा आदि, तिल, मूंग, दाल व्यवसाय, कपास या कपास से निर्मित पदार्थ, चना, भट्टी पर काम करने वाले, विवाद निपटाने वाले, लेखक, नृत्य-संगीत, वस्त्र-आभूषण व्यवसाय, धान्यसंग्रह आदि विशाखा के अधीन हैं।
√•17. अनुराधा : सन्धिविग्रह कराने वाले, वास्तुकर्म करने वाले, नेता, परिहास कुशल, मनोरंजक कार्य करने वाले, यात्राप्रिय, सर्दी में पैदा होने वाली फसलें, गुड़, चीनी आदि, पार्टीबन्दी करने वाले, यूनियन लीडर आदि अनुराधा के अधीन हैं।
√•18. ज्येष्ठा : संग्राम कौशल, मार्शल आर्ट सिखाना, परधन छीनने की कला, राजा लोग, सेनापति, पत्थर पर खुदाई करके उकेरने वाले, हथियार, डेयरी उद्योग, पानी के कार्य आदि इसके अधीन हैं। साथ ही वस्त्राभूषण, खुदाई, मेल-जोल व समझौता करवाना आदि भी इसी के अन्तर्गत हैं।
√•19. मूल : कृषि, व्यापार, युद्ध, चिकित्सा, लेखन, नृत्यकला, फल फूलों का व्यवसाय, बीजों का व्यवसाय, धन व्यवसाय, ब्याज के कार्य इसके अन्तर्गत हैं।
√•20. पूर्वाषाढ : समुद्री यात्रा, नाव, मर्चेण्ट नेवी, पानी के जन्तु, मछली आदि, पुल बनाना, पानी का व्यवसाय, कोल्ड ड्रिंक व्यवसाय, पानी में पैदा होने वाले पदार्थ, धन विनिवेश व्यवसाय, फूलों व फलों का व्यवसाय ये सब पूर्वाषाढ के अधीन हैं।
√•21. उत्तराषाढ : कुश्ती, द्वन्द्व युद्ध, हाथी घोड़ों का व्यवसाय, वाहनव्यवसाय, देवताभक्ति, पेड़ पौधों से प्राप्त पदार्थ, टिम्बर मर्चेण्ट, युद्धकलाएँ, फैशन के सामान, बड़े उद्योग चलाना आदि इसक अन्तर्गत हैं।
√•22. श्रवण :चालाकी, ठगी, भगवान की भक्ति, सलाहकारी, दवा बस्तियाँ बनवाना, विशेषज्ञ, अध्यापक, कानों की चिकित्सा, कथा वाचना प्रवाचक (Reader) प्राफेसर, वेद अध्यापन, शास्त्रों का अर्थ जानना धार्मिक कार्य आदि श्रवण के अन्तर्गत हैं।
√•23. धनिष्ठा : वाहन, वस्त्र, दवा व्यवसाय, सैक्स चिकित्सा, जनसेवक धनाढ्य लोग, केशसज्जा, गहने बेचना, फैशन के सामान, गृहसज्जा व सामान आदि धनिष्ठा के अधीन हैं।
√√24. शतभिषा : मछुआरे, पशु पकड़ने वाले, मोती व्यवसायी, मूंड या समुद्री पदार्थ (Sea-product) बेचने वाले, सूअर का मांस बेचना - उसके पदार्थ बेचना, धोबी, रंगरेज, शराब व्यवसाय, पक्षी पकड़ने वा या शकुन विचार करने वाले, चिकित्सा, घुड़सवारी आदि इसके अन्तग हैं।
√•25. पूर्वा भाद्रपद : पशुपालन, हिंसाकर्म, नीचकर्म, ठगी, युद्धविद्य सिखाना, मारपीट की शिक्षा देना, मांस विक्रय आदि पूर्वा भाद्रपद के अध् हैं।
√•26. उत्तरा भाद्रपद : वास्तुविद्या, यज्ञ, दान, तपस्या, सन्यास, राजप् चावल आदि या छिल्के के भीतर से निकलने वाले खाद्य पदार्थ, बाद काजू आदि का व्यवसाय, वाहन विद्या आदि इसके अधीन हैं।
√•27. रेवती : पानी से उत्पन्न पदार्थ, फूल, नमक, रत्न, शंख, मोती, सुगन्धित पदार्थ, व्यापार, नौका चालन, समुद्री यात्रा, मध्यम उद्योग आदि इसके अधीन हैं।