इसलामी एवं रोमन कैलेण्डर का स्रोत...
इसलामी एवं रोमन कैलेण्डर का स्रोत...
६२२ ईसवीमें हजरत मुहम्मदके मक्का मदीना हिजरत (प्रवास, हटना) के उपलक्ष्यमें हिजरी साल आरम्भ किया गया, किंतु यह कार्य हजरत मुहम्मदने नहीं, उक्त घटनाके १६-१७ वर्षोंके पश्चात् खलीफा उमरने किया।
हिजरी साल चान्द्रमासपर आधारित है। इसका एक वर्ष १२ चान्द्रमासोंका होता है, जो लगभग ३५४ सौर दिनोंके तुल्य है। फलस्वरूप सौरवर्ष और हिजरी चान्द्रवर्षमें लगभग ११ दिनोंका अन्तर रहता है। यही कारण है कि इसलामी व्रतों और त्यौहारोंकी तिथि सौर कैलेण्डरकी तुलना में प्रत्येक वर्ष ११ दिनोंकी गतिसे पीछे खिसकती रहती है।
खलीफा उमरके कार्यकालमें बसराके प्रशासक (गवर्नर) अबू मूसा अल-अशरीने उमर इब्न-अल खत्तबको पत्र लिखा कि खलीफाके आदेशोंमें दिनांक नहीं रहनेके कारण किस क्रममें उन्हें लागू किया जाय ? यह पता करना सम्भव नहीं रहता। इस शिकायत के बाद खलीफा उमरने मुसलिम विद्वानोंकी बैठक बुलायी। सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मुसलमानोंका अपना कैलेण्डर होना चाहिये, किंतु इस विषयपर न तो कुरानमें कोई निर्देश था और न ही हजरत मुहम्मदने स्पष्ट तौरपर कुछ कहा था। अतः मुसलिम कैलेण्डर कबसे आरम्भ हो, इसपर बहुत वाद-विवाद हुआ। तीन प्रमुख प्रस्ताव आये- हजरत मुहम्मदके जन्मदिनसे मुसलिम कैलेण्डरकी वर्षगणना आरम्भ की जाय, उनकी मृत्युसे वर्षगणना आरम्भ हो या फिर मक्का मदीना उनके और समस्त अनुयायियोंके हिजरतसे वर्षगणना आरम्भ की जाय । अलीद्वारा प्रस्तावित तीसरे प्रस्तावको स्वीकृति मिली। हिजरतसे मुसलिम कैलेण्डर आरम्भ होनेके कारण इसका नाम 'हिजरी' रखा गया।
फिर प्रश्न उठा कि हिजरी कैलेण्डरका वर्षारम्भ किस माससे हो? एक प्रस्ताव था कि रबी-अल अव्वलसे वर्षका आरम्भ हो, दूसरा प्रस्ताव रजब मास का
था, तीसरा प्रस्ताव धू अल हिज्ज और चौथा प्रस्ताव रमदान ( रमजान) - के पक्षमें था। उध्मान (उस्मान) - ने मुहर्रम मासका प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
हजरत मुहम्मदका हिजरत रबी-अल-अव्वल मास की आठवीं तिथिमें हुआ था, फिर भी हिजरी कैलेण्डरका वर्षारम्भ उससे दो मास पहले मुहर्रमकी पहली तिथिसे माना गया, शुक्रवार १६ जुलाई सन् ६२२ ईसवी (जूलियन कैलेण्डर) -से । हिजरी कैलेण्डरसे पहले अरबोंमें कौन-सा कैलेण्डर प्रचलित था और वर्षका पहला मास कौन-सा था— इसपर उस समयके अरब लेखक कुछ नहीं बताते। इसलामसे पहलेकी सारी बातोंको मिटानेके लिये यह भी आवश्यक था कि उनकी चर्चा ही नहीं की जाय। वर्षका पहला मास कौन-सा था, इसपर हम आगे प्रकाश डालेंगे।
हिजरी कैलेण्डर अरबमें आकाशसे अकस्मात् नहीं टपका। अरबोंमें पहलेसे जो प्रथाएँ प्रचलित थीं, उन्हींके आधारपर हिजरी कैलेण्डर बनाया गया। इसमें मासोंके नाम इसलामकी उत्पत्तिसे बहुत पहलेसे ही अरबोंमें प्रचलित थे। कई मासोंके नाम ऋतुओं और उनसे सम्बद्ध परिघटनाओंपर आधारित हैं। किंतु ऋतुओंका सम्बन्ध सौरवर्षसे रहता है, चान्द्रवर्षसे नहीं। चान्द्रवर्षपर आधारित हिजरी कैलेण्डरका मासनाम भले ही ऋतुओंसे सम्बन्ध रखते हों, पर चान्द्रवर्षपर आधारित इसलामी कैलेण्डरमें मासोंका ऋतुओंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहा। परंतु हिजरी कैलेण्डर आरम्भ होनेसे पहले अरबोंमें सौरवर्षका प्रचलन था, यह मासनामोंके अर्थोंसे स्वतः स्पष्ट है।
हिजरी कैलेण्डरका पहला मास है मुहर्रम-उल हरम, इसीका संक्षिप्त नाम है मुहर्रम यह 'हराम' शब्दसे सम्बद्ध है, जिसका अर्थ है वर्जित, खास तौरपर हिंसावर्जित। इसलामसे पहले अरबोंमें वर्षके चार मास पवित्र माने जाते थे, जिनमें युद्ध वर्जित थे, किंतु कौन कौनसे मास पवित्र माने जायँगे, यह प्रत्येक वर्ष बदलता रहता था। इनमें वर्जित मासोंमें पहला था मुहर्रम। इसकी विशेष पवित्रताके लिये ही इसे हिजरी वर्षका पहला मास माना गया।
हिजरी कैलेण्डरका दूसरा मास है शफर-पूरा नाम शफर-उल-मुजफ्फर इसी माससे अरब कबीलोंमें युद्धका समय आरम्भ होता था। इसे पहले अशुभ मास माना जाता था, किंतु इसलाममें इसे सामान्य मास माना गया। हिजरी कैलेण्डरके तीसरे और चौथे मास हैं रबी अल-अव्वल और रबी-अल-आखिर/थानी, जिनके अर्थ हैं वसन्तका पहला और वसन्तका आखिरी (दूसरा) मास। नामकरणके समय निश्चित ही वसन्तका समय रहा होगा।
हिजरी कैलेण्डरके पाँचवें और छठे मास हैं जमादि या जुमाद-अल-अव्वल और जमादि या जुमादि अल-आखिर या जुमादि, अल थानीका अर्थ है ग्रीष्मका पहला और ग्रीष्मका आखिरी (दूसरा) मास गुमादा जुमादाका अरबी भाषामें अर्थ है शुष्क। अरबीकी पूर्वी बोलियोंमें थानीका उच्चारण सानी है, अतः भारत-जैसे देशोंमें जुमादि अल थानीको जुमादि अस्-सानी कहते हैं, जिसका प्रचलित रूप है जमादि उस्सानी (उर्दूमें यही उच्चारण प्रचलित है)।
हिजरी कैलेण्डरका सातवाँ मास है रजब, पूरा नाम रजब-अल-मुजरब, अर्थात् आदर करना, जिसका पूरा नाम था 'रजब-अल-फर्द', फर्द का अर्थ है अकेला। चार पवित्र मासोंमेंसे एक यह भी था, जिनमें इसलामसे पहले युद्ध वर्जित था, किंतु अन्य तीन पवित्र मास एकके बाद एक लगातार थे, जबकि यह मास अकेला था, अतः इसे फर्द कहा गया। बोलचालमें यह रज्जब कहलाता है।
हिजरी कैलेण्डरका आठवाँ मास है शवान, पूरा नाम शबान-उल-मुअज्जम निर्बाध वृद्धि।
नौवाँ मास है रमदानु, जो पूर्वी अरबमें रमजान कहलाता है, पूरा नाम है रमदान -उल-मुबारक। यह नाम रमदासे बना है, जिसका अर्थ है तीव्र गर्मी।
दसवाँ मास है शव्वाल, पूरा नाम है शव्वाल उल-मुकर्रम अर्थात् टूटना या उठना।
हिजरी कैलेण्डरका ग्यारहवाँ मास है धू-अल किदाह, जो कादा शब्दसे बना है, जिसका अर्थ है बैठना। युद्ध-वर्जनाके मासोंमें यह तीसरा मास था। इस मासमें क्रियाकलापोंपर विराम लगाकर लोग हज्जके लिये बैठकर तैयारी करते थे। यह एक पवित्र मास भी था। धू-अल-किदाहको पूर्वी अरबीमें जुल्काद और उर्दूमें जिल्काद कहते हैं। धूको कहीं थू तो कहीं जू या जि पढ़ा जाता है।
हिजरी कैलेण्डरका बारहवाँ मास है-धू-अल हिज्जाह, जो युद्ध -विरामवाला अन्तिम पवित्र मास था। इसी मासमें इसलामसे पहलेके अरब लोग मक्काकी हज यात्रा करते थे, जिसपर इसका नाम पड़ा है। उर्दूमें धू-अल-हिज्जाहका अपभ्रंश है जेलहिज या जिलहिज ।
मासोंके नामोंकी जाँचमें हम पाते हैं कि इसलामसे पहले भी अरबोंमें सौरवर्षपर आधारित कैलेण्डर प्रचलित था; क्योंकि ऋतुओंपर आधारित मासनाम चान्द्रवर्षके कैलेण्डरमें सम्भव ही नहीं है। इतना ही नहीं, मासनामोंकी अरबी पद्धति वैदिक पद्धतिसे साम्य रखती है। उदाहरणार्थ, हिजरी कैलेण्डरके तीसरे और चौथे मास हैं रबी अल-अव्वल और रबी अल- आखिर, जिनके अर्थ हैं वसन्तका पहला और वसन्तका आखिरी (दूसरा) मास इस प्रकार पाँचवें और छठे मास हैं जुमादि या जुमाद-अल-अव्वल और जुमादि-अल आखिरका अर्थ है-ग्रीष्मका पहला और ग्रीष्मका आखिरी (दूसरा) मास।
अतः वसन्त-१, वसन्त- २, ग्रीष्म-१, ग्रीष्म-२ जैसे मासनाम प्रचलित थे। तैत्तिरीय संहिता (४|४|१४ तथा ४|४|११ ) - में मासोंके नाम दो दोके जोड़ेमें हैं। वसन्तमें मधु और माधव, ग्रीष्ममें शुक्र और शुचि, वर्षामें नभस् और नभस्य, शरदमें इष और ऊर्ज, हेमन्तमें सहस् और सहस्य, तथा शिशिरमें तपस् और तपस्य प्रारम्भिक अरबों में मासनामोंके बदले ऋतुनाममें 'प्रथम' एवं 'अन्तिम' लगाकर मासका बोध कराया जाता था। यह वैदिक परिपाटी ही थी। यजुर्वेदके साक्ष्य देखें...
मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतू नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावृतू इषश्चोर्जश्च शारदावृतू सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकावृतू तपश्च तपस्यश्च शैशिरावृतू (तैत्ति०सं० ४ । ४ । ११), मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू (वाजसनेयीसं० १३ ।२५), नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावृतू (वाजसनेयीसं० १४ । १५) ।
किंतु वैदिक पद्धतिसे अरबी परम्पराका कई महत्त्वपूर्ण बिन्दुओंपर अन्तर भी था। इसलामसे पहले चार पवित्र मास परिवर्तनशील थे, किंतु कुरानके आदेशके बाद मासोंके क्रमको स्थिर कर दिया गया। जकात, हज्ज, रमदान / रमजान, विधवाका शोककाल आदि इसलामी पर्व और प्रथाओंका कैलेण्डरसे सम्बन्ध होनेके कारण मासोंको स्थिर किया गया और मलमास हटाया गया। चार पवित्र मासोंके अन्तिम रूपसे नियमित किये जानेके बादका हिजरी मासोंका क्रम इस लेखमें दिया गया है। इसलामसे पहलेके कालमें पवित्र मासोंका क्रम कैसा था, इसके पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। बादमें रमदान / रमजानको पवित्रतम मास माना जाने लगा, इसलामपूर्वके पवित्र मासोंका महत्त्व घट गया। किंतु अनुमान निकाला जा सकता है निम्नोक्त मासक्रमकी जाँच करें तो इसलामसे पहले का कुछ
१- मुहर्रम .....युद्धवर्जित पवित्र मास
२- शफर ..... हवाकी आवाज / सीटी
३-रबी'-अल-अव्वल .....वसन्त- १
४- रबी'-अल-आखिर .....वसन्त-२
५- जुमाद'-अल-अव्वल .....ग्रीष्म- १
६- जुमादि' - अल-आखिर.... ग्रीष्म-२
७- रजब..... आदर करना, अकेला पवित्रमास
८-श' बा'न ....वृद्धि या शाखाओं में बँटना
९ रमजान .....गर्म मास
१० .शव्वाल.... उठना / टूटना
११-धू- अल-किदाह (जिल्काद).... बैठनेका पवित्र मास
१२-धू-अल-हिज्जाह (जेल्हिज)...
हज्जका पवित्र मास
जिल्काद (११ वाँ), जेल्हिज (१२ वाँ) और मुहर्रम (पहला मास) - तीन पवित्र मास लगातार क्रमसे हैं। रजब एकमात्र ऐसा पवित्र मास है, जो अन्य पवित्र मासोंसे अलग-थलग पड़ा है। रजबसे पहलेके मासोंके नाम ऋतुओं पर आधारित हैं, जिससे निष्कर्ष निकलता है कि रजब अरबोंमें इसलामसे पहलेके कालमें वर्षाका पहला मास था अर्थात् सौरमानका श्रावणमास रजब कहलाता था। सौरमासीय श्रावण अरबोंका अकेला पवित्र मास था, जिस कारण इसे रजब फर्द (अकेला आदरवाला मास) भी कहते थे। अन्य पवित्र मास हर वर्ष बदलते रहते थे, इस प्रक्रियाको हजरत मुहम्मदने स्थिर किया। वर्षाकारी श्रावणको पवित्र माननेकी प्रथाका ऐसे क्षेत्रमें विशेष महत्त्व होना स्वाभाविक ही था, जो बूँद-बूँदके लिये तरसता हो।
अकबरने जब भारतमें हिजरी वर्षमें मलमास जोड़कर फसली साल आरम्भ किया तो इसका वर्षारम्भ श्रावण ही रखा गया। आज भी मिथिलाके बहुत-से हिन्दू ऐसे हैं, जो हिन्दू वर्षका आरम्भ चैत्रके बदले श्रावणसे बननेवाले अकबरी फसली पंचांगके ही समर्थक हैं।
हिजरी कैलेण्डरमें मुहर्रमसे वर्षका आरम्भ था। कुरान (सूरा-९ अत् तौबा, आयत ३६ ) - में मलमासका निषेध है। हजरत मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाकी मृत्यु ८ जून सन् ६६२ ईसवीको हुई। उनके जीवनके अन्तिम वर्षमें चान्द्रमासवाले हिजरी वर्षका आरम्भ वासन्त मेषारम्भ ( १९ मार्च, सन् ६३२, १६:०६ मक्का समय) के पास पड़ा था (सूर्यसिद्धान्तीय अमावस, मक्का समयानुसार १५:४८ बजे, २६ मार्च सन् ६३२ ईसवी)। उससे पिछले वर्षतक अरबोंमें मलमासका प्रचलन था। इससे निष्कर्ष निकलता है कि उससे पहले सौरवर्षका प्रचलन रहनेके कारण अरबोंका वर्षारम्भ वासन्त मेषारम्भके पासवाले अमावससे ही आरम्भ हुआ करता था। यह विशुद्ध भारतीय पद्धति है।
उपर्युक्त गणना सूर्यसिद्धान्तीय पद्धतिद्वारा की गयी है, यदि आधुनिक विज्ञानके सूत्रोंद्वारा दृक्पक्षीय गणना करें तो तिथियोंमें नगण्य अन्तर मिलेगा, किंतु स्पष्टसूर्य और स्पष्टचन्द्रमें कुछ अन्तर दिखेगा। भौतिक पिण्डोंकी आकाशीय स्थितिके लिये दृक्पक्ष उचित है, किंतु फलितकी दृष्टिसे सूर्यसिद्धान्तीय पद्धति सर्वत्र श्रेष्ठ सिद्ध होती है। अतः यहाँ हम सूर्यसिद्धान्तीय पद्धतिका ही आश्रय ले रहे हैं, जिसका प्रमाण आगे स्वतः स्पष्ट होगा।
हजरत मुहम्मदने अरब कैलेण्डरमें जो परिवर्तन किये, उन्हें हटाकर हम प्राचीन अरब कैलेण्डर बना सकते हैं। पहला परिवर्तन यह करना है कि मलमासोंको सम्मिलित किया जाय। दूसरा यह कि वर्षका आरम्भ सदैव मेषारम्भके पासकी अमावास्यासे किया जाय। मेषारम्भ सायन लें कि निरयन इसपर बहस हो सकती है, लेकिन सायन कैलेण्डर आधुनिक वैज्ञानिकोंकी जिद है, प्राचीन समाजोंपर इसे थोपना अनुचित है। प्राचीन अरबोंमें सूर्यसिद्धान्तीय निरयन पद्धति शतप्रतिशत लागू थी।
प्रायः सारे अरबक्षेत्र रोमन साम्राज्यके अंग थे, अतः मुहर्रमसे वर्षका आरम्भ माननेकी जो प्रथा रोमनोंमें थी, वहीं अरबोंमें भी हो तो आश्चर्यकी बात नहीं। इन सबका मूल स्रोत प्राचीन सुमेरकी सभ्यतामें था, जहाँ सौरवर्ष और चान्द्रमासपर आधारित कैलेण्डर प्रयोगमें थे, और जिनके मासनामोंका वही अर्थ था, जो भारतीय ज्योतिषमें बारह राशियोंका है।
अरबमें चान्द्रमासकी प्रणाली और ईदकी प्रथा भी रोमनोंसे ही उधार ली गयी थी। प्राचीनतम रोमन मास चान्द्रमास थे और सभी मासोंकी १५ तारीखको ईदपर्व (ides, प्राचीन उच्चारण idus) मनाया जाता था, जो पहले पूर्णिमाकी तिथिको ही कहते थे। प्राचीनतम रोमन कैलेण्डर में मार्चसे वर्षका आरम्भ माना जाता था। मासोंके नाम थे-Martius (३१ दिन), Aprillis (३० दिन), Maius (३१ दिन), lunius (३० दिन), Quintilis (३१ दिन), Sextilis (३० दिन), September (३० दिन), October (३१ दिन), November (३० दिन) December (३० दिन)। पाँचवेंसे दसवें मासोंके नाम संख्यावाचक थे। यह सूची उस कालकी है, जब मासोंके मान चान्द्रमासके नहीं रह गये थे, किंतु प्रारम्भिक कालमें रोमन मास चान्द्रमास ही थे। बादमें पाँचवें और छठे मासोंके नाम रोमन सीजरोंके नामपर क्रमशः जुलाई और अगस्त कर दिये गये। उपर्युक्त सूचीके अनुसार दस मासोंमें ३०४ दिन ही थे, जनवरी और फरवरीकी गणना वर्षमें नहीं थी। आधुनिक यूरोपीय विद्वानोंकी यही मान्यता है कि प्रारम्भिक रोमन वर्षमें दस मास ही थे, जिसमें रोमन राजा नूमा पोम्पिलियसने ईसापूर्व ७१३ में कैलेण्डरके अन्तमें जनवरी और फरवरी जोड़े। रोमनोंमें समसंख्यावाले मासको अशुभ माना जाता था। अतः नूमा पोम्पिलियसने मासोंके मान २९ और ३१ दिनके कर दिये, और चान्द्रवर्षसे मेल बिठानेके लिये कुछ मासोंमें दिन घटा दिये - Marius (३१ दिन), Aprilis (२९ दिन), Maius (३१ दिन), lunius (२९ दिन), Quintilis (३१ दिन), Sextilis (२९ दिन), September (२९ दिन), Oc tober (३१ दिन), November (२९ दिन), De cember (२९ दिन), Januarius (२९ दिन), Februarius (२८ दिन)। फरवरीको दो भागों में बाँटा गया, प्रथम भाग २३ दिनोंका था और दूसरा भाग ५ दिनोंका था; क्योंकि २४ फरवरीसे धार्मिक वर्षका आरम्भ माना जाता था। सौर वर्षसे चान्द्रमासका मेल बिठानेके लिये फरवरीके प्रथम भागके बाद अर्थात् धार्मिक वर्षके अन्तमें २७ दिनोंका मलमास जोड़ा जाता था और फरवरीके दूसरे भागके ५ दिन मलमासमें ही सम्मिलित कर लिये जाते थे।
यूरोपीय विद्वानोंकी इस मान्यतामें त्रुटि यह दिखती है कि प्राचीन रोमनोंका धार्मिक वर्षारम्भ फरवरीमें था, किंतु फरवरी मासका पहले अस्तित्व ही नहीं था । आधुनिक यूरोपीय और अमेरिकी विद्वान् प्राचीन समाजोंकी धार्मिक मान्यताओंको समझनेमें रुचि नहीं रखते, जिस कारण प्राचीन लोगोंके बारेमें भ्रान्त धारणाओंको ऐतिहासिक तथ्यका रूप दे दिया जाता है।
सायन वर्षका आरम्भ २२ मार्चसे होता है। जूलियन और वर्तमान मानक कैलेण्डरमें १३ दिनोंका अन्तर है। जूलियन कैलेण्डरके अनुसार सायन वर्षारम्भ ९ मार्चसे होना चाहिये। २४ फरवरीसे वर्षारम्भका सीधा अर्थ है कि वर्षका आरम्भ और वर्षका मान सायन नहीं था। मलमासद्वारा रोमके लोग चान्द्रमासोंका सौरमाससे मेल बिठाते थे, अतः वर्षमान सौर था, चान्द्र नहीं । यह सौरवर्ष सायन नहीं था, यह तय है, अतः इसके निरयन होनेकी सम्भावना है, जिसपर आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् विचार ही नहीं करना चाहते।
ईसापूर्व पाँचवीं शताब्दीसे ही रोमनोंमें चान्द्रमासका प्रयोग बन्द करनेके प्रयास आरम्भ हो गये थे। किंतु व्यवहारमें चान्द्रमासों और मलमासका प्रयोग होता रहा ।
रोमनोंने १ जनवरीको बादमें वर्षका आरम्भ बना दिया, जो आजकल सूर्यसिद्धान्तीय गणनानुसार निरयन उत्तरायणका आरम्भ है, ग्रेगोरियन संशोधनके बाद १३ दिन जुड़नेसे अब यह १४ जनवरीको पड़ता है। इसलामपूर्व अरबोंमें वर्षमान और सौरवर्षका आरम्भ मुहर्रम था, जो वसन्तारम्भसे दो मास पहले था, अर्थात् वैदिक शिशिरका प्रथम मास सौर मुहर्रम था। आजसे ६२२ ईसवीमें निरयन मेषारम्भ जूलियन २० मार्चको था । शुक्रवार १६ जुलाई सन् ६२२ ईसवी (जूलियन कैलेण्डर) को हिजरीका पहले सालका पहला दिन था और निरयन सूर्य कर्कमें २३ अंशपर थे, किंतु परिभाषाके अनुसार तब शिशिरका आरम्भ होना चाहिये। अतः अरबी मासोंका नामकरण इसलामसे बहुत पहले हुआ था।
#shulba #कालचिन्तन