★★ज्योतिष(वेदाङ्ग)★★
★★ज्योतिष(वेदाङ्ग)★★
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इसके अन्तर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद ज्योतिष ये तीन ग्रन्थ माने जाते हैं । प्रथम के सङ्ग्रहकर्ता लगध नाम के ऋषि हैं, इसमें ३६ कारिकाएँ हैं । यजुर्वेद ज्योतिष में ४९कारिकाएँ हैं जिनमें ३६कारिकाएँ ऋग्वेद वाली हैं । अथर्व ज्योतिष में १६२श्लोक हैं । तीनों में फलित की दृष्टि से अथर्व ज्योतिष महत्वपूर्ण है । इसी में कहा है __
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा । तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम् ॥ यह प्रारम्भिक स्थिति है ॥
★१-ऋग्वेदीय ज्योतिष --
वैदिकज्योतिष की प्रधान रचना जिसमें प्रतिपाद्य विषय --
पञ्चसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् ।
दिनर्त्वयनमासाङ्गं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥१॥
ज्योतिषामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
सम्मतं ब्राह्मणेन्द्राणां यज्ञकालार्थसिद्धये ॥२॥
यहाँ मुख्य उद्देश्य यज्ञकाल की सिद्धि है । जन्मपत्र या फलित से कोई प्रयोजन नहीं है । यहाँ धनिष्ठा नक्षत्र के साथ सूर्य-चन्द्र योग होने पर अर्थात् माघ शुक्ल प्रतिपदा को युगारम्भ होता है । आश्लेषार्ध में दक्षिणायन तथा धनिष्ठादि मे उत्तरायण माना गया है ।
पञ्चसंवत्सरीय युग में अयन व्यवस्था --
प्रथम अयन माघ शुक्ल प्रतिपदा धनिष्ठानक्षत्र से,
द्वितीय श्रावण शुक्ल सप्तमी चित्रानक्षत्र, तृतीय माघ शुक्ल त्रयोदशी आर्द्रानक्षत्र, चतुर्थ श्रावणकृष्ण चतुर्थी पूर्वाभाद्रपदनक्षत्र, पाँचवाँ माघ कृष्ण दशमी अनुराधा नक्षत्र, छठा श्रावण शुक्ल प्रतिपदा आश्लेषानक्षत्र, सातवाँ माघ शुक्ल सप्तमी अश्विनीनक्षत्र, आठवाँ श्रावण शुक्ल त्रयोदशी पूर्वाषाढनक्षत्र, नौवाँ माघ कृष्ण चतुर्थी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, तथा दसवाँ अयन श्रावण कृष्ण दशमी रोहिणी नक्षत्र से माना गया है ।
इस एक युग में ६० सौर मास, ६१ सावन मास, ६७ नक्षत्र मास अथवा १८०० सौर दिन, १८३० सावन दिन और १८६०(- क्षयदिन ३०) चान्द्रदिन बतलाये गये हैं । दिनमान की व्याख्या में उसकी हानि_वृद्धि का कारण और प्रमाण भी कहा गया है ।
यहाँ इसमें नक्षत्रोदय रूप लग्न का उल्लेख है पर ग्रहों और राशियों का स्पष्ट व्यवहार नहीं मिलता । अतः केवल यज्ञादि काल के ज्ञान हेतु नक्षत्र,पर्व, अयनादि विधान बताया गया है । गणित-विधान विशेष नहीं है ॥
★२-यजुः तथा अथर्ववेदीय ज्योतिष --
* यजुः तथा ऋग्वेदीय एक जैसा है ।
*अथर्ववेदीय में फलित का समावेश है--
तिथिरेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रं च चतुर्गुणम् ।
वारश्चाष्टगुणः प्रोक्तः करणं षोडशान्वितम् ॥९०॥
द्वात्रिंशद्गुणो योगस्तारा षष्टिसमन्विता ।
चन्द्रः शतगुणः प्रोक्तस्तस्माच्चन्द्रबलाबलम् ॥९१॥
समीक्ष्य चन्द्रस्य बलाबलानि ग्रहाः प्रयच्छन्ति शुभाशुभानि ।...
इत्यादि प्रकार से तिथ्यादि का बलाबल निरूपित किया है ।
आदित्यः सोमो भौमश्च तथा बुधबृहस्पती ।
भार्गवः शनैश्चरश्चैव एते सप्त दिनाधिपाः ॥९३॥
वार कथन भी किया है ॥
इसमें जातक के जन्मनक्षत्र से फलनिरूपण एवं ग्रह, उल्का, विद्युत्, भूकम्प, दिग्दाह आदि का फल संक्षेप में कहा गया है । ग्रहों का फलादेश भी है जैसे-- "न कृष्णपक्षे शशिनः प्रभावः" इत्यादि ।
★३-सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थ में समस्त ज्योतिष के सिद्धान्त निरूपित हैं ।
★४-सूर्यसिद्धान्त के विषय सहित यही ज्योतिष नारद-पुराण में तीन अध्यायों (त्रिस्कन्ध रूप) में वर्णित है ।
★५-अग्निपुराण में भी इस त्रिस्कन्ध-ज्योतिष का विवरण दिया है ॥ ॐ ॥
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा ।। आनन्द वर्द्धन दुबे ; कान्यकुब्ज (कन्नौज) ।।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की वेद में वर्ण व्यवस्था अपने लिए कर्म वर्ण करने का अधिकार था। वह जन्म के आधार पर किसी के ऊपर कोई कर्म जबरी थोपने की व्यवस्था नहीं थी। नैतिकतापूर्वक किए गए सभी कर्म महान थे कोई कर्म हेय या निम्न नहीं था। सब का समान आदर था सभी मिलकर संपूर्ण समाज के लिए संपूर्ण देश की उन्नति के लिए संपूर्ण मानवता के लिए कार्य करते थे। जिसे सहयज्ञ कहा जाता था। यह कर्म ही यज्ञ था जिसे हम यहां वर्णन कर रहे हैं पूरा लेख पढ़ कर आपको वैदिक सामाजिक व्यवस्था की महनीयता का ज्ञान पैदा होगा।
चारों वर्णों के द्वारा मिलकर, समाज की उन्नति के लिए किया जाने वाला सत्कर्म ही, मूलतः चतुष्टोम या ज्योतिष्टोम यज्ञ होता है, जैसा कि इस ऐतरेय श्रुति में वर्णित है-
"ज्योतिष्टोम एवाग्निष्टोमः स्याद् । ब्रह्म वै स्तामानां त्रिवृत्, क्षत्रं पञ्चदशः, ब्रह्म खलु वै क्षत्रात्पूर्व, ब्रह्म पुरस्तान्म उग्रं राष्ट्रमव्यध्यमसदिति, विशः सप्तदशः शौद्रोवर्ण एकविंशो, विशं चैवास्मै तच्छौद्रञ्च वर्णमनुवर्त्यानी कुर्वन्ति ।
अथ तेजो वै स्तामानां त्रिवृत्, वीर्यं पञ्चदशः, प्रजातिः सप्तदशः, प्रतिष्ठैकविंशः । तदेनं तेजसा वीर्येण प्रजात्या प्रतिष्ठयाऽन्ततः समर्द्धयति । तस्माज्ज्योतिष्टोमः स्यात्। "ऐतरेय ब्रा. ३६/४।
ज्योतिष्टोम एव अग्निष्टोमः स्यात्- ज्योतिष्टोम ही अग्निष्टोम होता है। ब्रह्म वै स्तोमानां त्रिवृत् - ब्रह्म अर्थात् ज्ञान ही इन स्तोमों का त्रिवृत् है।
मीमांसा- ज्ञान ही मानव समुदाय के विकास के लिए समर्पित कर्मों का त्रिवृत् स्तोम होता है। स्तोम का अर्थ स्तुति है, राष्ट्र की, समाज की प्रथम आवश्यकता सभी बालक-बालिकाओं को ज्ञान-सम्पन्न बनाने की होती है। इस ज्ञान-सम्पन्न बनाने के कर्म में लगा हुआ शिक्षक-ब्राह्मण अपने विद्यार्थियों-ब्रह्मचारियों को पढ़ाता है। प्रथम बार पढ़ाने के बाद कुछ छात्रों की समझ में न आने पर दुबारा पढ़ाता है। फिर भी कुछ की समझ में विषय स्पष्ट न होने पर, उनकी समझ को दृढ़ करने के लिए तिबारा भी पढ़ाता है। इस प्रकार वह छात्रों के एक समूह को तीन बार पढ़ाने के बाद, उनके ज्ञान सम्पत्र होने पर अपने शिक्षा देने के कार्य से विराम नहीं लेता। बल्कि उसके बाद आने वाले ब्रह्मचारी समूह को, उसी प्रकार तीन-तीन बार में शिक्षा देता रहता है। यह शिक्षा-दान की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। इसी निरंतरता का प्रतीक है वृत्त, इसलिए श्रुति ने इसे त्रिपाठ न कहकर त्रिवृत् स्तोम कहा। इस प्रकार त्रिवृत् स्तोम का अर्थ हुआ शिक्षण रूप में राष्ट्र व समाज रूपी परमात्मा की त्रिवृत् स्तुति।
क्षत्रं पञ्चदशः प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा समाज, राष्ट्र का संरक्षण ही पंचदश स्तोम है।
मीमांसा- समाज की दूसरी प्रमुख आवश्यकता, न्यायपूर्वक समाज
के नैतिक लोगों की रक्षा करना एवं समाज में न्याय, नैतिकता और सदाचरण की स्थापना करना है। इसलिए राष्ट्राध्यक्ष राजा, प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकारियों को, और इस कार्य में लगे हुए समूह को, श्रुति क्षत्रिय कहती है। दुष्टों और अपराधियों से राष्ट्र की और राष्ट्र के निवासियों की रक्षा में लगा हुआ प्रशासनिक राजन्य-क्षत्रिय अपनी पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्च कर्मेन्द्रियों और अपने पञ्च प्राणों से पूर्ण सचेत होकर सन्नद्ध रहता है। आवश्यकतानुसार राष्ट्र की, व रक्षणीय की, दुष्टों व अपराधियों से रक्षा के लिए, अपने प्राणों को भी समर्पित कर देता है। इसी प्रकार न्यायाधीश भी, पूर्ण सचेत होकर ही सही न्याय कर पाता है। श्रुति कह रही है कि अपनी पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्च कर्मेन्द्रियों और पञ्च प्राणों के द्वारा इन प्रशासनिक अधिकारियों अर्थात् क्षत्रियों के द्वारा इस राष्ट्र व समाजरूप परमात्मा की सेवा करना ही, पञ्चदश स्तुति है। यही क्षत्रियों का अर्थात प्रशंसकों का पञ्चदश स्तोम है।
ब्रह्म खलु वै क्षत्रात्पूर्वम् - निश्चय ही प्रशासनिक सामर्थ्य का उपयोग करने से पूर्व, ज्ञानात्मक विमर्श करना अत्यन्त आवश्यक है। ज्ञानपूर्वक ही सामर्थ्य का सदुपयोग होता है।
ब्रह्म पुरस्तान्म उग्रं राष्ट्रमव्यथ्यमसदिति- ज्ञानपूर्वक सामर्थ्य का सदुपयोग करता हुआ हमारा राष्ट्र, हमारा समाज, उग्र और व्यथित न हो।
मीमांसा - यहाँ स्पष्ट है कि, ज्ञान रहित शक्ति का केवल दुरुपयोग हो सकता है। उसका सदुपयोग तो ज्ञानपूर्वक ही होगा। ज्ञानरहित शक्ति का दुरुपयोग होने पर, राष्ट्र व्यथित होकर उग्र हो जायेगा। समाज में अव्यवस्था फैल जायेगी। इसलिए ज्ञानपूर्वक ही, सामर्थ्य का उपयोग, करने का उपदेश श्रुति द्वारा किया गया है।
विशः सप्तदशः - कृषि वाणिज्यात्मक वैश्य कर्म ही सप्तदश स्तोम
है। मीमांसा- लोक और राष्ट्र के विकास के लिए, उन्नत कृषि और नैतिक वाणिज्य कर्म में लगे लोगों का "सप्तदश स्तोम है।" बारह महीने और पाँच ऋतुयें मिलकर, सप्तदश अर्थात् सत्रह होते हैं। ऋग्वेद में पाँच ऋतुओं की ही प्रमुखता मानी गयी है। वहीं यह स्पष्ट किया गया है कि, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर इन छः ऋतुओं में से शिशिर के २० दिन जिनमें ठण्डी बनी रहती है, उन्हें हेमन्त में जोड़ देने से और शेष ४० दिन समशीतोष्ण होने से, वसंत में जोड़ देने से, मुख्यतः ५ ऋतुये ही होती हैं। इस प्रकार १२ महीने और ५ ऋतुयें मिलकर सप्तदश होते हैं। सम्पूर्ण कृषि, ऋतु आश्रित होती है, और वाणिज्य कर्म कृषि के अनुसार चलता है। इस प्रकार ये दोनों ही मूलतः आर्तव महीनों और ऋतुओं पर आश्रित हैं। इस कर्म में लगे हुए लोगों को सावधानीपूर्वक, ऋतुओं का ध्यान रखते हुए, तद्नुसार अपने कर्म का क्रियान्वयन करते हुए ही, सफलता प्राप्त होती है। पूरी निष्ठा और नैतिकतापूर्वक, इस कर्म में लगे लोगों द्वारा, यह राष्ट्र की १२ महीने और ५ ऋतुओं में निरन्तर गतिमान सेवा ही, राष्ट्ररूप परमात्मा की सप्तदश स्तुति है। यही इस वैश्य वर्ण का सप्तदश स्तोम है। शतपथ में स्पष्ट रूप से बताया गया है *आद्याहीमाः प्रजाः विशः*अर्थात आदिकाल में यह संपूर्ण प्रजा कृषक ही थी खेती ही करती थी उसी में से योग्यता और कौशल के आधार पर विविध प्रकार के कर्मों का उदय हुआ जिन्हें बाद में चार प्रमुख बड़े विभागों के रूप में चातुर्वर्ण्य कहा गया। उन्हीं की यहां श्रुति चर्चा कर रही है।
शौद्रोवर्ण एकविंशः- लोक में, राष्ट्र में, विविध शिल्पों के विकास के लिए, और प्रत्येक कार्य की सम्यक् उन्नति के लिए, किया जाने वाला तप-श्रम रूप शौद्रवर्णात्मक सत्कर्म ही, एकविंश स्तोम है।
मीमांसा- बारह महीने, पाँच ऋतुयें, मन, बुद्धि, चित्त और आत्मा मिलकर एकविंश (२१) इक्कीस होते हैं। विविध शिल्पों में लगे हुए लोगों को, ऋतुओं के साथ-साथ, मन, बुद्धि, चित्त और आत्मा को भी, अपने इस कर्म में समर्पित करना होता है। जैसे कुम्हार को उचित मिट्टी की उपलब्धता, उसे अपने कार्य के योग्य बनाना, फिर उसे चाक चलाकर, पूर्ण सावधानी से बुद्धिपूर्वक चेतना में जागृत कल्पना को, मूर्त रूप देना होता है इसी प्रकार बढ़ई, लोहार, स्वर्णकार, कलवार आदि विविध शिल्पों में लगे हुए लोग, अपने इस समर्पित कर्म के द्वारा राष्ट्ररूपी, समाजरूपी परमात्मा की एकविंश स्तुति में लगे हुए हैं। उनकी समर्पित बुद्धि कौशलपूर्ण सन्नद्धता से ही, नित्य नव-नव शिल्पों का विकास होता रहता है। आज की सम्पूर्ण तकनीकी शिक्षा, इस शूद्र वर्ण का ही उत्कृष्ट विकास है जिसे आधुनिक भाषा में इंजीनियरिंग कहते हैं। दुर्भाग्य से जन्मना इस वर्ग को हेय बनाने के कुप्रयास ने, हमारी इस क्षेत्र में प्रगति को बहुत पीछे कर दिया। इतना ही नहीं, वेदों में महनीय रूप में वर्णित इस वर्ग को, जिसमें शिक्षा का प्रमुख महत्व था, शिक्षा से दूर कर हमने न केवल इस वर्ग को क्षति पहुँचायी, बल्कि इस राष्ट्र को भी बहुत ही क्षति पहुँचायी है। हमारे पूर्वज पारद्रष्टा ऋषियों ने, यह कल्पना भी कभी नहीं की होगी, कि हमारी सन्तानें, इस निम्न स्तर की घटिया सोच से युक्त हो जायेंगी। इस वैदिक मंत्र के आलोक में, हमें अपने सम्पूर्ण कलुषित विचारों का परित्याग कर एकजुट हो, समाज रूपी परमात्मा की उपासना में संलग्न हो जाना चाहिए। आज भी लोक-व्यवहार में जहाँ जिस व्यक्ति में श्रम का उत्कर्ष दिखाई देता है, उसके विषय में वेद की इस श्रुति के अनुवाद रूप में, यह लोकोक्ति
प्रसिद्ध है- "उन्नीस नहीं इक्कीस है।"
विशं चैवास्मै तच्छौद्रञ्च वर्णमनुवर्मानौ कुर्वन्ति ।
अस्मैः - इस राष्ट्र के और मानव समष्टि के विकास के लिए, विशम्- कृषकात्मा, च और शौद्रम् श्रमिकात्मा तत्-वह सम्पूर्ण प्रजा ही वर्णमनुवर्मानौ कुर्वन्ति- विविध वर्णों के रूप में अनुवर्तन करती हुई व्यवहृत होती है।
मीमांसा- तथ्य यह है कि, मूलतः सम्पूर्ण प्रजा कृषक और श्रमिक है। इस कृषक और श्रमिक रूप मूल प्रजा में से ही, ज्ञान देने की योग्यता और क्षमता के आधार पर ब्राह्मण तथा ठीक इसी प्रकार इस मूल प्रजा में से ही, ज्ञान की प्रशासनिक योग्यता और क्षमता के आधार पर क्षत्रिय वर्ण का निर्धारण होता है, अर्थात् इन्हीं में से चयन किया जाता है। इस प्रकार मूल रूप से कृषक एवं श्रमिक रूप ये जनसमुदाय ही, इन चारों वर्णों में योग्यता और क्षमता के आधार पर अनुवर्तन करता रहता है। किसान एवं श्रमिक से शिक्षा देने की योग्यता के आधार पर शिक्षण कार्य में लगकर ब्राह्मण होता हुआ. प्रशासनिक क्षमता के कार्यों में लगकर क्षत्रिय होता हुआ, अन्यथा अपने मूल कृषि कार्य में लगा हुआ वैश्य या श्रम एवं शिल्प की योग्यता के आधार पर विविध श्रम शिल्पात्मक शूद्र वर्ग में अनुवर्तन करता रहता है। अर्थात् एक से दूसरे में आता जाता रहता है। इसलिए श्रुति आगे कह रही है-
अथ तेजो वै स्तोमानां त्रिवृत्- अब इसीलिए इस प्रकार ज्ञान का लेज, ज्ञान प्राप्त कर उसको अन्यों में भी प्रकाशित कर देने का तेज, राष्ट्रात्मा परमात्मा की स्तुति का त्रिवृत्त स्तोम है, अर्थात् ब्राह्मण वर्ण है।
वीर्य पञ्चदश :- इसी प्रकार ज्ञान-कौशल से शक्ति का उपयोग करते हुए, प्रजा की अन्याय और अपराध से रक्षा करना, एवं उनमें न्याय नैतिकता पर चलने की सुनिश्चित व्यवस्था करने की सामर्थ्य ही, राष्ट्रात्मा परमात्मा की स्तुति का पञ्चदश स्तोमात्मक क्षत्रिय वर्ण है।
प्रजातिः सप्तदश :- १२ महीनों एवं ५ ऋतुओं की प्रकृति को ठीक-ठीक समझते हुए, कृषि में अधिक से अधिक उत्पादन करना ही, राष्ट्रात्मा परमात्मा का सप्तदश स्तोम रूप वैश्य वर्ण है।
प्रतिष्ठैकविंशः - जीवन की विभिन्न आवश्यकतायें, भोजन बनाने के लिए बर्तन, कृषि के लिए हल, फाल, कुदाल आदि, रहने के लिए घर और उसमें अपेक्षित लकड़ी के दरवाजे आदि के निर्माण की कला के साथ, उन उन कार्यों में दक्षतापूर्ण श्रम करता हुआ अथवा अपेक्षित कार्यों की कलाओं को न जानते हुए, उन-उन कलाओं को जानने वालों के निर्देशन में श्रम करता हुआ, शिल्पी एवं श्रमिक वर्ग ही, राष्ट्र को अपने श्रम पर प्रतिष्ठा प्रदान करता हुआ, राष्ट्र के विकास का मूलभूत आधार बना हुआ, समाज की प्रतिष्ठा रूप एकविंश २१ स्तोमात्मक शूद्र वर्ण ही राष्ट्र विकास की प्रतिष्ठा है।
तद् – इस प्रकार वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र रूप चारों वर्ण ही एनम् - इस समाज को, इस राष्ट्र को क्रमशः
तेजसा - ज्ञान के तेज के द्वारा
वीर्येण - ज्ञानयुक्त प्रशासनिक सामर्थ्य के द्वारा
प्रजात्या - उन्नत कृषि से प्रकृष्ट उत्पादन के द्वारा
प्रतिष्ठया - उक्त तीनों के विकास के आधारभूत अपेक्षित शिल्पों, तकनीकियों, तकनीकी संसाधनों का विकास करते हुए, उनमें श्रम करते
हुए, विकास की प्रतिष्ठा के द्वारा अन्ततः समर्द्धयति - अन्तिम रूप से उत्कर्ष के शिखर तक समृद्ध
करते हैं।
तस्मात् - इसीलिए इस चातुर्वर्ण्य के द्वारा, राष्ट्र के, समाज के, विकास के लिए किया जा रहा यह कर्म ही
ज्योतिष्टोमः स्यात् - ज्योतिष्टोम याग होता है।
चातुर्वर्ण्य के द्वारा मिलकर लोक की, समाज की सम्यक् उन्नति के लिए, किया जाने वाला ज्योतिष्टोम यागात्मक यह सत्कर्म ही चातुर्वर्ण्य का चतुष्टोम याग होता है, जैसा कि श्रुति स्वयं स्पष्ट करती है-
"चतुष्टोमो भवति। प्रतिष्ठा वै चतुष्टोमः प्रतिष्ठित्यै ।"ताण्ड्य.६/१/१६।
चतुष्टोमो भवति - इस प्रकार इस लोक की, समाज की, राष्ट्र की
उन्नति के लिए चातुर्वर्ण्य के द्वारा सत्यनिष्ठापूर्वक किया जा रहा यह सत्कर्म ही चतुष्टोम याग हो रहा है। स्वयं की और स्वयं के साथ-साथ समाज की, राष्ट्र की, इन चारों वर्णों द्वारा की जा रही प्रतिष्ठा ही, चतुष्टोम है। क्योंकि इन सबकी प्रतिष्ठा के लिए ही चतुष्टोम किया जाता है, इसलिए यह सर्वश्रेष्ठ चतुष्टोम है। निश्चित रूप से स्वयं की, समाज की और राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए ही यह, चातुर्वर्ण्य व्यवस्था मनीषियों, महर्षियों ने बनायी।
२-वर्णों में सहयोगात्मक और समानता विधायक रथाश्वरूपक
सामवेदीय ताण्ड्य महाब्राह्मण में उपर्युक्त चारों वर्णों के द्वारा मिलकर लोक की समुन्नति के लिए किये जाने वाले सत्कर्म रूप चतुष्टोम याग के
विषय में एक बहुत सुन्दर रूपक है-
"यद्वै राजानोऽध्वानं धावयन्ति। ये अश्वानां वीर्यवत्तमास्तान्युञ्जन्ते । त्रिवृत्पञ्चदशः सप्तदश एकविंश एते वै स्तोमानां वीर्यवत्तमास्तानेव युङ्त्ते स्वर्गस्य लोकस्य समष्टट्यै। "ताण्ड्य महाब्रा.६/४/१५
यद्वै राजानोऽध्वानं धावयन्ति-जब राजा लोग मार्ग में प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में नियम पूर्वक प्रतिस्पर्धा करते हैं, तब वे
*ये अश्वानां वीर्यवत्तमास्तान्युञ्जन्ते*
अपने रथों में जो घोड़े सर्वश्रेष्ठ सामर्थ्य वाले होते हैं, उनको संयुक्त करते त्रिवृत्पञ्चदशः सप्तदश एकविंश एते वै स्तोमानां वीर्यवत्तमास्तानेव युङ्त्ते स्वर्गस्य लोकस्य समष्टचै- उसी प्रकार राष्ट्र के, लोक के, समाज के आनन्द की समष्टि के लिए, इस राष्ट्र रूपी रथ में शिक्षक, प्रशासक, कृषक और बनिक, तथा श्रमिक व शिल्पी के रूप में ये 4 श्रेष्ठतम अश्व संयुक्त किये गये हैं। तीन-तीन बार शिक्षार्थियों को शिक्षा देने में निरन्तर लगा हुआ त्रिवृत्त् स्तोम रूप, शिक्षक वर्ग रूप ब्राह्मण वर्ण। पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्च कर्मनेन्द्रियों और पञ्च प्राणों से पूर्ण सावधानीपूर्वक यम, नियम, सत्य, न्याय, निष्ठा इत्यादि की राष्ट्र में स्थापना करता हुआ और अन्याय, अपराध, छल, कपट, धूर्तता आदि से रक्षा करता हुआ, पञ्चदश स्तोम रूप प्रशासनिक वर्गात्मक क्षत्रिय वर्ण, बारह महीनों और पाँच ऋतुओं का भलीभाँति ध्यान रखता हुआ, कृषि कार्यों में पूर्ण सावधानी से लगा हुआ, कृषक समुदायात्मक सप्तदश स्तोम रूप वैश्य वर्ण। बारह महीनों, पाँचों ऋतुओं में अपेक्षित आवश्यकता अनुरूप तकनीकी संसाधनों का निर्माण करता हुआ, और उन संसाधनों से उन-उन अपेक्षित कार्यों में सन्नद्धतापूर्वक, मन, वाणी, शरीर और आत्मा से लगा हुआ, एकविंश स्तोम रूप श्रम शिल्प वर्गात्मक शूद्र वर्ण कहे जाने वाले ये चारों वर्ण ही इस लोकरथ, राष्ट्ररथ के सर्वोत्तम चार घोड़े हैं। समाज को, लोक को, राष्ट्र को सर्वसुख सम्पन्न आनन्द की समग्रता रूप उन्नति के परम वैभव तक पहुंचाने के लिए, ये सर्वोत्तम अश्व हैं। इसलिए राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाने के लिए राष्ट्ररूपी रथ में ये चातुर्वर्ण्य रूप चार अश्व संयुक्त करना अति आवश्यक है।
मीमांसा - यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि, रथ को आगे ले जाने में सभी अश्वों का समान योगदान होता है। सब साथ मिलकर ही वेगपूर्वक रथ को आगे ले जाते हैं। उस समय उन सबकी दौड़ भी समान होती है। तभी समान वेग से रथ दौड़ता है। उनमें आपस में आगे बढ़ने के लिए समान प्रेम होता है। यदि इन घोड़ों में एक दूसरे से अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए झगड़ा शुरू हो जाये, तो रथ नहीं चलेगा, अपितु टूट जायेगा। इसी प्रकार लोक को, अपने समाज को, स्वर्ग की समष्टि अर्थात् परम वैभव तक ले जाने के लिए, राष्ट्र ही रथ है। और उसी प्रकार इस भारत राष्ट्र रूपी रथ में जुड़े हुए यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रवर्ण रूप चार अश्व, इस राष्ट्र स्थ जुड़े इस राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने के लिए, राष्ट्रात्मा ऋषियों ने इसमें संयुक्त किये। इस राष्ट्र रथ में लगे हुए चातुर्वर्णात्मक ये चारों अश्व समान रूप से सर्वोत्कृष्ट है। किसी भी वर्ण कर्म का महत्व किसी अन्य वर्ण के कर्म-महत्व से थोड़ा भी कम नहीं है। ये सब अपने-अपने कर्म में दत्तचित्त हुए, अपने-अपने परस्पर सहयोगात्मक कर्म में, साथ-साथ लगे हुए, ही इस राष्ट्र रूपी रथ को परम वैभव तक पहुँचा सकते हैं। इसके विरुद्ध यदि इनमें अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ, अथवा दूसरों को अपने से हेय सिद्ध करने का विवाद शुरू होता है, तो यही इस राष्ट्र के पतन का कारण भी है। जैसा कि इस श्रुति के विरुद्ध, वर्तमान में स्वयंभू ब्राह्मणमन्य, कुछ ब्रह्म बन्धु सिद्ध करने में तत्त्पर हैं जो विकृत वर्णवाद की व्याख्या द्वारा, स्वयं की श्रेष्ठता स्थापन के कलह से, राष्ट्र के पतन में प्रयासरत हैं। इस प्रकार की कल्पना भी वेदों की एवं वैदिक ऋषियों की नहीं थी, अपितु वे तो चतुष्टोम याग रूप चातुर्वर्ण्य पक्षी को आनन्द के पुण्य लोकों में विचरण करता हुआ देख रहे थे।
३- वैदिक वर्ण समरसता ज्ञापक वैदिक चातुर्वर्ण्य पक्षी
अहो! यह श्रुति भावना कितनी अद्भुत है, जहाँ चारों वर्णों द्वारा अपनी-अपनी निष्ठा से किये जा रहे कर्म द्वारा समग्र मानवता के उत्कर्ष में संलग्नता ही, पवित्र चतुष्टोम यज्ञ है। वहाँ अपने अपने कर्म में सत्यनिष्ठा पूर्वक लगे हुए, ये चारों वर्ण ही उक्त ज्योतिष्टोम रूप चतुष्टोम यज्ञ को सम्पादित करते हुए, समग्र मानवता की उपासना में संलग्न भारतात्मा, राष्ट्रात्मा पक्षी रूप हैं। यह पक्षी ही उड़ता हुआ, समग्र मानवता के चरमोत्कर्ष रूप आनन्दमय पुण्यात्मक शिखरों पर संचरण करता है। जैसा कि श्रुति स्वयं वर्णन करती है-
"पक्षी वा एष स्तोमः ।
ताण्ड्य. १९/१०/११
अथवा यह चातुर्वर्ण्य के कर्म रूप चतुष्टोम-ज्योतिष्टोम यज्ञ को सम्पत्र करने में लगा हुआ, चातुर्वर्ण्य के कर्मों के सम्पादन में लगा हुआ, यह मानव समुदाय चातुर्वर्ण्य पक्षी है।
मीमांसा- राष्ट्र को भित्र-भित्र कर्मों के करने के लिए लोगों की योग्यता और रुचि के अनुरूप कार्यों का विभाजन करके, उन-उन कार्यों में संलग्न करना रूप वर्ण-व्यवस्था से युक्त करना, राष्ट्र को पंखों से युक्त करना है। ऐसा क्यों करना है? इस तथ्य को श्रुति अगले मंत्र में स्पष्ट कर रही है-
"न वा अपक्षः पक्षिणमाप्नोति । अथैष पक्षी पक्षिणि निधीयते। तस्मात्पक्षिणः पक्षैः पतन्ति। "ताण्ड्य १९/१०/२१
क्योंकि बिना पंखों वाला पंख वाले को ऊँचे-ऊँचे शिखरों तक उड़ने में नहीं पा सकता है। यह पक्षी पंखों में ही स्थित रहता है। इसलिए पंखों से ही उड़ता है।
मीमांसा- जिस प्रकार पंख वाले को बिना पंख वाला पक्षी उड़कर नहीं पा सकता है, उसी प्रकार लोगों की क्षमता एवं योग्यता के अनुसार, कर्म विभाग की व्यवस्था से सम्पन्न मानव समुदाय को, राष्ट्र को विकास की, उत्कर्ष की उड़ान में सभी लोगों को कर्म प्रदान करने वाले, कर्म विभाग व्यवस्था से रहित मानव समुदाय वाला राष्ट्र भी नहीं पा सकता है। क्योंकि सभी लोगों को उनकी योग्यता एवं क्षमता के अनुरूप कर्म प्राप्त होने पर और निष्ठापूर्वक उस कर्म करने में ही किसी मानव समुदाय की, राष्ट्र की उन्नति होती है। अपने-अपने कर्मों में लगा हुआ वह राष्ट्र, वह मानव समुदाय निरन्तर विकास एवं आनन्द के उत्कर्ष की ओर बढ़ता रहता है। पक्षी आकाश में उड़ता है, तो यह भारत राष्ट्रात्मा पक्षी कहाँ उड़ता है? ऐसी आकांक्षा का श्रुति स्वयं समाधान करती है-
"पक्षी ज्योतिष्मान् पुण्यान् लोकान् सञ्चरति । ताण्ड्य. १९/१०/४
यह भारत राष्ट्रात्मा पक्षी विकास के ज्योतिर्मय समस्त राष्ट्र के सुखदायी पुण्यलोकों में संचार करता है। अर्थात् सत्कर्मजन्य विकास के वैभव में उड़ता है।
मीमांसा- विदेशी इतिहासकारों ने इस भारत राष्ट्रात्मा पक्षी को, उम्रति के शिखरों पर परम वैभव में उड़ता हुआ देखा था। इसलिए उन्होंने उस समय, भारत को सोने की चिड़िया कहा था। और सारी दुनियों के विदेशी, कालांतर में जब उनका सम्बन्ध भारत से, प्रकृति की किन्हीं घटनाओं के कारण छूट गया, तो भारत की खोज करते रहे। दुनिया जानती है कि, भारत की खोज करता हुआ ही कोलम्बस अमेरिका पहुंच गया, और चिल्लाने लगा की भारत मिल गया, भारत मिल गया। किन्तु वहाँ उस समय वैसा उत्कर्ष न देखकर उन विदेशियों ने जाना कि अभी उन्हें भारत नहीं मिला है। इस कारण उन्होंने आगे भी भारत की खोज जारी रखी और अंत में इस खोज में विदेशी वास्कोडिगामा को सफलता मिली। वह भारत पहुँच गया। क्या इससे ही विश्व के प्राचीनतम वैभव सम्पन्न राष्ट्र भारत की महत्ता स्वयं स्पष्ट नहीं हो जाती? अपितु इसी से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि, कभी विश्व का केन्द्र भारत था और अयोध्या विश्व की प्रथम राजधानी व महाराज मनु सम्पूर्ण विश्व के प्रथम सम्राट थे। जैसा कि वाल्मीकि ने अपनी रामायण में बाली के प्रश्नों के उत्तर में राम द्वारा स्पष्ट
घोषित कराया है-
इक्ष्वाकूणामियं भूमिः सशैलवनकानना।
मृगपक्षिमनुष्याणां निग्रहानुग्रहेष्वपि ।।
तां पालयति धर्मात्मा भरतः सत्यवानृजुः । धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः ।।१
वाल्मीकि रामायण. किष्किन्धा. १८/६,७।
गिरि, पर्वत और जंगलों सहित, यह सम्पूर्ण धरती मनु पुत्र इक्ष्वाकुवंशियों की है। पशु, पक्षी और मनुष्यों को आवश्यकता अनुसार व्यवस्थित करने, अपराध पर दंड देने और सत्कर्मों के लिए पुरस्कृत करने का उनका अधिकार है।
इस समय सम्पूर्ण धरती के पालन का केन्द्र महाराज मनु की राजधानी
अयोध्या के सिंहासन का दायित्व सरल, सत्यनिष्ठा-सम्पन्न, धर्मात्मा भरत निर्वहन कर रहे हैं।
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इस भारत राष्ट्र आत्मा, चातुर्वर्ण्य पक्षी का, उक्त चातुर्वर्ण्य स्तोम का स्वरूप कैसा है? इस आकांक्षा का समाधान श्रुति आगे के मंत्र में कर
" त्रिवृत् शिरो भवति । ताण्ड्य.५/१/२।
भारत राष्ट्रात्मा पक्षी का शिर है। त्रिवृत् शिक्षण में लगा हुआ शिक्षण समुदायात्मक ब्राह्मण वर्ण
अन्नं वा अर्को वा ब्रह्मवर्चसं गायत्र्यन्नाचं चैवेभ्यो ब्रह्मावर्वसञ्च मुखतो दधाति
ताण्ड्य ५/१/९।
क्योंकि अन्न, जल और ज्ञान की तेजस्विता, यह भारत राष्ट्रात्मा पक्षी ज्ञान-विज्ञान का शब्दों से प्रकाश करने वाले, ज्ञानदाता मुख से ही प्राप्त करता है। इसलिए यह ब्रह्मकुल, ब्रह्मचारी, ब्रह्मचर्या और ब्राह्मण के आधुनिक रूप विश्वविद्यालय, शिक्षार्थी, शिक्षाचर्या और शिक्षक रूप में, ज्ञान की वृद्धि में संलग्न गतिमान ब्राह्मण वर्ण अर्थात शिक्षा कुल, अर्थात
इस देश का शिक्षा समुदाय ही इस भारत राष्ट्रात्मा पक्षी का मुख है। पञ्चदशसप्तदशौ पक्षौ भवतः । *पक्षाभ्यां वै यजमानो वयो भूत्वा स्वर्ग लोकमेति।"*
पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्च कर्मेन्द्रियों, पञ्चप्राणों की पूर्ण सन्नद्धता से, राष्ट्र की प्रशासनिक एवं रक्षा सेवा में लगा हुआ, पञ्चदश स्तोमरूप प्रशासक कार्यात्मक क्षत्रिय वर्ण, और बारह महीनों व पाँच ऋतुओं में पूर्ण सावधानी से जागृत, देश के कृषि एवं वाणिज्य में लगा हुआ, कृषक एवं वाणिज्य समुदायात्मक वैश्य वर्ण ही, इस भारत राष्ट्रात्मा चातुर्वर्ण्य पक्षी के दोनों पंख हैं। क्योंकि प्रशासन एवं कृषि वाणिज्य समुदायात्मक, इन दोनों पंखों के द्वारा ही, यह मानव समुदाय उन्नति के मूर्तिमान पंखों द्वारा, सम्पूर्ण समाज के परम वैभव तक पहुँचने के परम आनन्द को प्राप्त करता है। श्रुति चातुर्वर्ण्य के चतुर्थ वर्ण का महत्व दर्शाते हुए कहती है-
"एकविंशः पुच्छं भवति। "ताण्ड्य ५/१/१६
बारह महीनों और पाँच ऋतुओं में मन, वाणी, कर्म और आत्मा से पूर्ण तल्लीनतापूर्वक, स्वयं को, समाज को और राष्ट्र को, आधारभूत रूप से सक्षम बनाने में लगा हुआ, एकविंश स्तोम रूप, कृषि, वाणिज्य, रक्षण प्रशासन आदि सभी कर्मों के लिए, अपेक्षित संसाधनों, उपकरणों , तकनीकी यंत्रों के निर्माण में लगा हुआ, शिल्पी समुदाय, साथ ही सभी प्रकार के कर्मों में अपेक्षित, अतिरिक्त श्रम के लिए, श्रम करने में लगा हुआ श्रमिक वर्ग ही, अर्थात एकविंश स्तोमरूप शूद्र वर्ण ही, भारत राष्ट्रात्मा इस पक्षी का पुच्छ है।
"एकविंशो वै स्तोमानां प्रतिष्ठा, तस्माद्वयः पुच्छेन प्रतिष्ठायोत्पतति, पुच्छेन प्रतिष्ठाय निषीदति।'' ताण्ड्य.५/१/१७।
यह शूद्र वर्णात्मक, शिल्प श्रमात्मक, एकविंश स्तोम ही, चातुवार्य के अपने सत्कर्मों के द्वारा संपादित किये जा रहे ज्योर्तिमय विकाशात्मक चतुष्टोम याग का मूल आधार है। क्योंकि सभी वर्ण विभागों के, अपने- अपने कर्मों का सम्पादन भी, श्रम के बिना सम्भव नहीं है, श्रम ही सभी कर्मों की प्रतिष्ठा है। सभी वर्णों का अवलम्बन करने वाले, श्रमपूर्वक ही अपने-अपने कार्यों को सम्पन्न कर स्थापित होते हैं। जिस प्रकार पक्षी अपनी पूँछ के सहारे ही उड़ता है व पूँछ के सहारे ही उतरता है, उसी प्रकार से सभी वर्णों का उपकारक, श्रम शिल्पात्मक एकविंश स्तोम रूप शूद्र वर्ण है।
"पक्षी वा एतच्छन्दः, पक्षी ज्योतिष्मान् पुण्यान् लोकान् सञ्चरति । य एवं वेद।
ताण्ड्य. १९/११/१८
निश्चय ही चतुष्टोम यज्ञात्मक, चातुर्वर्ण्य रूप, यह भारत राष्ट्रात्मा पक्षी ही, ज्ञानात्मा वेद है। अर्थात् यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था भलीभाँति ज्ञान- पूर्वक चिंतन से निर्धारित की गयी है। ज्ञान से ही सभी वर्ण अपने-अपने कर्मों में दक्षता प्राप्त करके, अपने अपने कर्मों की भली भाँति शिक्षा ग्रहण करके, प्रत्यक्ष जीवन में उन्हीं कर्मों के द्वारा सफलता प्राप्त करते हैं। यह वेद ज्ञान विरचित, चतुष्टोम यागात्मक चातुर्वर्ण्य पक्षी ही, ज्योतिर्मय विकास के, जीवन आनन्द के, राष्ट्र के परम वैभवात्मक पुण्यात्मक लोकों में संचार करता है। जो इस रहस्य को इस प्रकार जानते हैं, वे ही वेद के रहस्य को जानते हैं। वे ही इस वेदात्मा भारत राष्ट्रात्मा पक्षी की रक्षा करतेहैं।