आदित्य हृदय स्तोत्र:

"आदित्य हृदय स्तोत्र: संपूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित
आदित्य हृदय स्तोत्र: सनातन धर्म वर्तमान में सबसे अधिक वृद्धि करने वाला धर्म है| इस धर्म में सभी देवी-देवताओं के साथ ही प्रकृति में सभी मूर्तियों को पूजनीय माना जाता है| इसके अलावा हिंदू धर्म में सभी देवी-देवताओं को समर्पित करने के लिए प्रत्येक के लिए कोई ना कोई मंत्र, चालीसा, व अनेक प्रकार के पाठों का निर्माण किया गया है|

जैसे कि हनुमान जी को आकर्षित करने के लिए हनुमान चालीसा और भगवान श्री राम को आकर्षक बनाने के लिए रामायण का पाठ किया जाता है| उसी प्रकार जिस स्तोत्र के बारे में हम बात करेंगे| इसे भगवान सूर्य देव को आकर्षक बनाने के लिए बनाया गया था| इसका नाम आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ है|



हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अपनी कुंडली में सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya Stotra in Hindi) पाठ को सबसे बेहतर बताया गया है| इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने से मनुष्य के जीवन में सभी नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं और सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं|

इस जातक के जीवन में पूर्व से भिन्न प्रभाव देखने को मिलता है| इस पाठ को करने से भक्तों को बहुत अधिक लाभ होता है| ऐसा माना जाता है कि यह ग्रन्थ वाल्मिकी जी द्वारा लिखी गई रामायण के युद्धकाण्ड का एक सौवाँ सर्ग है|

ऐसा कहा जाता है कि रामायण में जब भगवान श्री राम रावण से युद्ध करने जा रहे थे| तब वहां उपस्थित ऋषि अगस्त्य ने उन्हें इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए कहा था| आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना ऋषि अगस्त्य के द्वारा ही की गयी थी|

भगवान सूर्य देव को समर्पित यह आदित्य हृदय स्तोत्र मनुष्य के अंदर शक्ति, ऊर्जा और बुद्धि का संचार करता है| आदित्य हृदय स्तोत्र के बारे में और जानने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें| 

आदित्य हृदय स्तोत्र क्या है?
यह आदित्य हृदय स्तोत्र ( Aditya Hriday Stotra in Hindi ) भगवान सूर्य देव को समर्पित किया गया है| हिन्दू धर्म में सूर्य देव को प्रसन्न करने और कुंडली में सूर्य देव के प्रभाव को कम करने के लिए ज्योतिष शास्त्र का प्रयोग किया जाता है आदित्य हृदय स्तोत्र के बारे में पौराणिक वाल्मिकी जी द्वारा लिखित रामायण में है|

ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र के बारे में ऋषि अगस्त्य ने भगवान श्री राम के बारे में बताया था सहायता सहायता से उसने रावण पर विजय प्राप्त की| हिन्दू धर्म में आदित्य हृदय स्तोत्र को पढ़ना काफी माना गया है| इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने की विधि से ही मनुष्य के सभी पाप, कष्ट और दु:ख सभी तुरंत नष्ट हो जाते हैं|

ज्योतिषशास्त्र में भी आदित्य हृदय स्तोत्र का बहुत महत्व है| माना जाता है कि इस आदित्य हृदय स्तोत्र के नियमित पाठ से मनुष्य के सभी कष्ट और दर्द दूर हो जाते हैं| जैसा कि हमने आपको बताया कि यह आदित्य हृदय स्तोत्र भगवान सूर्य देव को समर्पित है और सूर्य देव को सभी राशियों के राजा या अधिपति के रूप में भी जाना जाता है|

इसलिए जिस व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह का प्रभाव बहुत अधिक होता है| उन लोगों को इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए| 

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ -आदित्य हृदय स्तोत्र हिंदी में

विनियोग :
ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरानुष्टुपच्छंद:, आदित्येहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता दर्शनेशविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोग: || 

ध्यानम् – 

नमस्वित्रे जागेक चक्षुसे,
जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे,
वृद्धि नारायण शंकरात्मने ||

|| अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम् ||

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम् ||
दैवतैश्च समागम्य दृष्टुभ्यगतो रंम्।
उपगम्यब्रवीद् राममगरत्यो भगवानस्तदा ||

अर्थ – इधर भगवान श्री राम थककर चिंता में लीन हुए रणभूमि में बने हुए| उसी समय रावण भी युद्ध के लिए रणभूमि में आ गया था| यह सब देखकर ऋषि अगस्त्य भगवान श्री राम के दर्शन हुए और ऐसे बोले| 

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वारिन वत्स स्मरे विजयिष्यसे ॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयवाहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ||

अर्थ - सबके हृदय में बसने वाले हे महाबाहो श्री राम! यह विश्वास स्तोत्र सुनो| इस चमत्कारी स्तोत्र के जप करने से आप ही अपने शत्रु पर विजय पा लोगे| यह आदित्य हृदय स्तोत्र सबसे पवित्र और सभी शत्रुओं का नाश करने वाला स्तोत्र है| इसका जप करने से सदैव विजय की प्राप्ति होती है| यह अत्यंत ही युवा स्तोत्र है| 

सर्वमंगलमंगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिंताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूज्यस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनम् ॥ 

अर्थ - यह स्तोत्र सभी ग्रहों में मंगल, पापों का नाश करने वाला है| इसी के साथ चिंता और शौक भी दूर होता है और इंसान की उम्र भी बढ़ती है| जो कि अनंत किरण से शोभायमान है, नित्य उदय होने वाली है, देवों और असुरों को नमस्कार है| आप इस संपूर्ण विश्व में प्रकाश फैलाने वाले संसार के स्वामी भगवान सूर्य देव की पूजा करो| 

सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाळलोकान् पति गभस्तिभिः ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
मचो धनदाः कालो यमः सोमो ह्यपं पतिः ॥ 

अर्थ - महर्षि अगस्त्य कहते हैं कि सभी देवता एक रूप में हैं| सूर्य देव अपने प्रकाश की किरणों से इस जगत को स्फूर्ति प्रदान करते हैं| सूर्यदेव ही अपनी ऊर्जा के माध्यम से ही इस सृष्टि में देवतागण और असुरों दोनों का पालन करते हैं| यही वह है जो ब्रह्मा, स्कंद, शिव, इंद्र, कुबेर, प्रजापति, समय, काल, यम, चंद्रमा और वरुण आदि प्रकट होते हैं|



पित्रो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्नहि प्रजाः प्राण ऋतुमकर्त्ता मालदीवः ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः॥  

अर्थ – ये पितरों, वसु, साध्य, अश्विनीकुमारों, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण और ऋतुओं को जन्म देने वाले प्रभा के पुंज हैं| राक्षस अलग – अलग नक्षत्र से – आदित्य, सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग, पूषा, गभस्तिमान, भानु, हिरण्येता, दिवाकर और 

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोण्मथनः शम्भूस्तष्टा मर्दण्डकोंऽशुमान् ॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ॥ 

अर्थ - हरिदश्व, सहस्त्रार्चि, सप्तसप्ति (सत गोदो वाले), मरीचिमान (किरणों सेशोभित), तिमिरोमंथन (अंधकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तंडक, हिरण्यगर्भ, शिशिर (स्वभाव से सुख प्रदान करने वाले), तपन (गर्मी उत्पन्न करने वाले), भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, आद्यपुत्र, शंख, शीत का नाश करने वाले। 

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसम्पारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यावीथीप्लवंगमः ॥
अतपि मंडली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महतेजा रक्तः सर्वोद्भवः ॥ 

अर्थ - व्योमनाथ, तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के सिद्धांत, धन वृष्टि, अपाम मित्र, विंध्यावीथिप्लवंग (आकाश में तीव्र गति से चलने वाले), अतिपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभावोद्भव है|

नक्षत्रग्रहतारणमधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन नमोऽस्तु ते ॥
नमः पूर्वाय गिरिये पश्चिमायद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दीनाधिपतये नमः ॥  

अर्थ – नक्षत्र, ग्रह और मठ के अधिपति, विश्वभवन (विश्व की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी बुढ़ापे और द्वादशात्मा को नमस्कार है| पूर्वगिरि उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है| ज्योतिर्गनों के एवं स्वामी दिवस के अधिपति को नमस्कार| 

जयाय जयभद्राय ह्र्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नमः॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तुते ॥ 

अर्थ - जो जय के रूप में है, विजय के रूप में है, हरे रंग के रथों से युक्त रथ वाले भगवान को नमस्कार है| सहस्त्रों किरण से प्रभावन आदित्य को बारम्बार नमस्कार| पराक्रमी, वीर और सारंग भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है| कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेज वालेत मर्दण्ड को नमन है| 

ब्रह्मेषानाच्युतेषाय सुरा यिदत्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायमितात्मने।
कृतघ्नघनाय देवाय ज्योतिषं पतये नमः॥ 

अर्थ – आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीर्थ के स्वामी हैं| सूर आपका उपयोग है| यह सूर्यमंडल आपका बहुत तेज़ है| आप प्रकाश से सुसज्जित हैं| सार्वजनिक स्वाहा: करने वाली अग्नि के स्वरूप है| रौद्र रूप में आपको नमस्कार है| अज्ञान, अंधकार के नाइक, स्वास्थ्य के निवारक और शत्रु के नाश आपका रूप अप्रमेय है| 

तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिने॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ 

अर्थ – आपका प्रभा तप्त वर्ण के समान है| आप ही हरि (अज्ञान को हरने वाले), ब्रह्माण्ड (संसार की रचना करने वाले), तम या अँधेरे के नायक, प्रकाशरूप और जगत के साक्षी आपको हमारा नमस्कार है| हे रघुनन्दन, भगवान सूर्य देव ही सभी भूतों के संहार, रचना और पालन करने वाले हैं| यही अपनी किरण से गर्मी और बारिश होती है| 

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिणितः।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ||
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
अर्थात कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः || 

अर्थ - यह देव सभी भूतों में अन्तर्स्थित हैं, उन्हें सो जाने पर भी जागते हैं, यही अग्निहोत्री कहलते हैं| यही वेद, यज्ञ और यज्ञ से मिलने वाले फल है| यह संपूर्ण देव लोक की क्रिया का फल देने वाला है| 

अन्मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तरेषु भयेषु च।
कीर्तनयन् पुरुषः कश्चिन्नवसीदति राघव ॥
पूज्यस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवेषु युद्धिष्ति ॥ 

अर्थ – महर्षि में अगस्त्य भगवान श्री राम से कहा गया है कि राघव! किसी विपत्ति में, कष्ट में, कठिन मार्ग में और किसी भय के समय जो भी सूर्यदेव का कीर्तन करता है या उन्हें याद करता है| उसे किसी भी प्रकार का दुःख या पीड़ा सहना नहीं पड़ता| आप एकाग्रचित देवादिदेव सूर्यदेव का पूजन करो, इस आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार लगातार जप करने से आपको युद्ध में ही विजय की प्राप्ति होगी| 

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगम स यथागतम् ॥
एतच्छृत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघः प्रयतात्मवान् ॥  

अर्थ – हे महाबाहो इस क्षण आप रावण का वध कर पायेंगे| इस प्रकार ऋषि अगस्त आये थे वही प्रकार वापियाँ लौट आये| उस समय ऋषि अगस्त्य का यह उपदेश सुनकर महातेज स्वामी भगवान श्री राम का सर्वथा शोक दूर हो गया| आकर्षक और प्रयासशील प्रयास |

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्तवेदं परं हर्षमवाप्त्वान्।
त्रिराचाम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥
रावणं प्रेक्षय हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् || 

अर्थ - परम हर्षित और शुद्धचित्त भगवान श्री राम ने सूर्य देव के दर्शन किये और तीन बार आदित्य हृदय स्तोत्र का जाप किया| उनके बाद श्री राम जी ने धनुर्धर युद्ध के लिए आये रावण को देखा और उसके युद्ध की पुष्टि की| 

अथ रविरवदन्निरिक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमानः।
निशिचरपतिसंक्षायं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वाचस्त्वरेति || 

अर्थ - तब सभी देवताओं के बीच में भगवान सूर्य देव ने भगवान श्री राम की तरफ देखा और राक्षस रावण का अंत का समय निकट आ गया, संप्रदाय ने कहा "अब जल्दी करो" 

|| इत्यारशे श्रीमद्रामयेन वाल्मिक्ये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पश्चाधिक शतम् सर्ग: || 

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ की विधि
सूर्यदेव की पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले स्नान स्नान आदि करें| इसके बाद भगवान सूर्य देव के दर्शन करें ॐ घृणि सूर्याय नमः , इस मंत्र का जाप करें - भगवान सूर्य देव को जल दें | 
सूर्य देव को जल चढ़ाते समय गायत्री मंत्र का भी जाप किया जा सकता है और इसके अलावा सूर्यदेव के निकटतम आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए| 
इस पाठ को शुक्ल पक्ष के रविवार को पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है| इस दिन यह पाठ करने वाले भक्तों की सभी भावनाएं पूर्ण होती हैं| 
इस पाठ का संपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए आपको यह पाठ नित्य रूप से सूर्योदय के समय ही करना अच्छा माना गया है|


इस पाठ के अंत के बाद आपको भगवान सूर्य देव का ध्यान करना चाहिए और उनकी प्रार्थना करनी चाहिए| 

यदि यह पाठ किसी जातक के लिए प्रतिदिन करना संभव नहीं है तो वह इस पाठ को प्रत्येक रविवार के दिन पढ़ सकता है| 

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जब भी आप यह पाठ करें तो उस दिन मांसाहारी भोजन और तेल से बने भोजन से बचें| अगर हो सके तो इस दिन नमक का सेवन करने से भी बचना चाहिए|

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ से लाभ
जो भी व्यक्ति आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ नियमित रूप से जपता है तो उस व्यक्ति के लक्ष्य में वृद्धि होती है और वह व्यक्ति अपने शिष्य में भी अच्छा प्रदर्शन करता है| 

यदि किसी व्यक्ति में किसी व्यक्ति की कमी है तो उस व्यक्ति को नियमित रूप से या प्रत्येक रविवार को आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना चाहिए|

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से लोगों के मन से भय दूर होता है और सभी प्रकार के नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है|

सरकारी बसुली के मामले में भी आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से बहुत जल्दी लाभ मिलता है| और सरकारी अधिकारियों का सहयोग भी है| 

भगवान सूर्य देव को पिता का कारक भी माना जाता है| आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से पुत्र और पिता के संबंध अच्छे होते हैं| 
 
बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न
Q. आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ करने से क्या होता है?

A. इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने से मनुष्य के जीवन में सभी नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं और सकारात्मक अंगों को प्राप्त होता है|

Q. आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

A. इस पाठ में शुक्ल पक्ष के रविवार को पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है| इस दिन यह पाठ करने वाले भक्तों की सभी भावनाएं पूर्ण होती हैं|

Q. आदित्य हृदय स्तोत्र दिया गया था?

A. आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना ऋषि अगस्त्य के द्वारा ही की गयी थी| 

Q. आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

A. इस पाठ को प्रतिदिन 1 बार अवश्य करना चाहिए| इसे सूर्य देव का आशीर्वाद है|

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