विवाह के लिए कुंडली मिलान सीखे
विवाह के लिए कुंडली मिलान सीखे
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भारतीय हिन्दू परिवारों में यह माना जाता है कि लड़के या लड़की के विवाह से पूर्व किसी ज्योतिषी से कुण्डली जरूर मिलवा लेनी चाहिए। ज्यादातर भारतीय हिन्दू परिवार ज्योतिषी के पास अपने पुत्र या पुत्री के विवाह के लिए कुंडली मिलवाने या जन्मपत्रिका मिलान के लिए इसलिए जाते हैं, ताकि विवाहित होने वाला जोड़ा किसी प्रकार के दुर्भाग्य का शिकार न हो, और अपनी जिंदगी हंसी खुशी से काट सके। लोग ये विश्वास रखते हैं कि विवाह के बाद एक दूसरे के भाग्य एवं दुर्भाग्य का असर अपने साथी पर पड़ता है तो क्यों नहीं पहले ही ये जान लिया जाए कि क्या उनका भाग्य आपस में अच्छा तालमेल रखता है। या नहीं, इसलिए ज्योतिष अनुरूप कुण्डली मिलान करके गुण दोष का विवाह पूर्व पता लगाया जाता है।
मेलापकः वर-वधू की कुंडली मिलाना
मेलापक
यह पहले ही लिखा जा चुका है कि ज्योतिष शास्त्र-सूचक है। विवाह के पूर्व वर-कन्याकी जन्मपत्रियों को मिलाने का आशय केवल परम्परा का निर्वाह नहीं है, किन्तु भावी दम्पतीके स्वभाव, गुण, प्रेम और आचार व्यवहार के सम्बन्ध में ज्ञात करना है। जवतक समानआधार-व्यवहारवाले वर-कन्या नहीं होते तब तक दाम्पत्यणीवन सुखमय नहीं हो सकता है।जन्मपत्रियों की मेलनपद्धति वर-कन्या के स्वभाव, रूप और गुणों को अभिव्यत्त करती है।भारतीय संस्कृति में प्रेमपूर्वक विचाह कल्याणकारी नहीं माना गया है किन्तु दो अपररिचितव्यक्तियों का जीवन-भर के लिए गठबन्धन कर दिया जाता है। यदि ऐसी परिस्थिति में उनदोनों के स्वभाव के बारे में सूचक ज्योतिष द्वारा कुछ जान लिया जाये तो अत्यन्त उपकारउन व्यक्तियों का हो सकता है। अतागव इस वैज्ञानिक मेलन-पद्धति की उपेक्षा करना नितान्ततअनुचित है। ज्योतिष नक्षत्र, योग, ग्रह राशि आदि के तत्त्वों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव,गुण का निश्चय करता है। वह बतलाता है कि अमुक नक्षत्र, ग्रह और राशि के प्रभाव सेउत्पन्न पुरुष का अमुक नक्षत्र, ग्रह व राशि के प्रभाव से उत्पन्न नारी के साथ सम्बन्धकरना अनुकूल है। या प्रभाव-शामक सामंजस्य के होने से दोनों के स्वभाव-गुण में समानताहै। अतएव मेलन-पद्धति द्वारा वर-कन्या की जन्मपत्रियों का विचार करना चाहिए। यहाँज्योतिष शास्त्र में स्त्रीनाशक और पतिनाशक योग बताये गये हैं, जिनमें अधिकांशजन्मकुण्डली में १।४।७।८।१२वें भाव में पापग्रहों का होना पति या पत्नीनाशक कहागया है। इन स्थानों में पुरुष की कुण्डली में मंगल होने से समंगल और स्त्री की कुण्डलीमें मंगल होने से मंगली संज्ञक योग होते हैं। समंगल पुरुष का मंगली स्त्री के साथ सम्बन्धकरना ठीक कहा जाता है, इसी प्रकार मंगली स्त्री का समंगल पुरुष के साथ सम्बन्ध होनाअच्छा होता है। ज्योतिष में उपर्युक्त स्थानों में स्थित मंगल सबसे अधिक दोषकारक, उससेकम शनि और शनि से कम अन्य पापग्रह बताये गये हैं। इस योग को चन्द्रमा, शुक्र औरसप्तमेश से भी देख लेना चाहिए। स्त्री की कुण्डली में सप्तम और अष्टम स्थान में शनिऔर मंगल इन दोनों का रहना बुरा माना है। सप्तमेश में अष्टमेश का एक साथ रहना पति,या पत्नी की कुण्डली में अनिष्टकारक होता है। यदि यही योग दोनों की कुण्डली में हो सर्वप्रथम ग्रह मिलाने की विधि लिखी जाती है।का उल्लेख तृत्तीय अध्याय में किया जा चुका है।तो अच्छा होता है।
ज्योतिष शास्त्र में एक मत यह है कि वर की कुण्डली में लग्न और शुक्र एवं कन्या की कुण्डली में लग्न व चन्द्रमा से १।४।७।८।१२वें स्थान के पापग्रहों का विचार करते हैं।वर व कन्या के अनिष्टकारी पापग्रहों की संख्या समान या कन्या से वर के ग्रहों की संख्याअधिक होनी चाहिए। कन्या का ७वाँ और ८वाँ स्थान विश्षेष रूप से देखना चाहिए।
वर की कुण्डली में लग्न से ६टे स्थान में मंगल, ७वें में राहु और ८वें में शनि होतो भार्याहन्ता योग होता है, इसी प्रकार कन्या की कुण्डली में यही योग पतिहन्ता होता है।
सौभाग्य विचार-सप्तम में शुभग्रह हों तथा सप्तमेश शुभग्रहों से युत या दृष्ट होतो सौभाग्य अच्छा होता है। अष्टम स्थान में शनि या मंगल का होना सौभाग्य को विगाड़ताहै। अष्टमेश स्वयं पापी हो या पापी ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो सौभाग्य को खराब करताहै। सौभाग्य का विचार वर वं कन्या दोनों की कुण्डली में कर लेना चाहिए। यदि कन्याका सौभाग्य वर के सौभाग्य से यथार्थ न मिलता हो तो सम्बन्ध नहीं करना चाहिए।
कुण्डली मिलाने के अन्य नियम-१. वर के सप्तम स्थान का स्वामी जिस राशिमें हो, वही राशि कन्या की हो तो दाम्पत्य-जीवन सुखमय होता है।
२. यदि कन्या की राशि वर के सप्तमेश का उच्च स्थान हो तो दाम्पत्य-जीवन मेंप्रेम बढ़ता है। सन्तान की प्रांप्ति और सुख होता है।
३. वर के संप्तमेश का नीच स्थान यदि कन्या की राशि हो तो भी वैवाहिक जीवन
सुखी रहता है।४. वर का शुक्र जिस राशि में हो, वही राशि यदि कन्या की हो तो विवाह कल्याणकारीहोता है।
५. वर की सप्तमांश राशि यदि कन्या की राशि हो तो दाम्पत्य-जीवन सुखकारक होताहै। सन्तान, ऐश्वर्य की बढ़ती होती है।
. ६. वर का लग्नेश जिस राशि में हो, वही राशि कन्या की हो या वर के चन्द्रलग्नसे सप्तम स्थान में जो राशि हो वही राशि यदि कन्या की हो तो दाम्पत्य-जीवन प्रेम और
सुखपूर्वक व्यतीत होता है।
७. वर की राशि से सप्तम स्थान पर जिन-जिन ग्रहों की दृष्टि हो, वे ग्रह जिन-जिनराशियों में बैठे हों, उन राशियों में से कोई भी राशि कन्या की जन्मराशि हो तो दम्पतीमें अपूर्व प्रेम रहता है।
८. जिन कन्याओं की जन्मराशि वृष, सिंह, कन्या या वृश्चिक होती है, उनको सन्तान
कम उत्पन्न होती है।
९. यदि पुरुष की जन्मकुण्डली की षष्ठ और अष्टम स्थान की राशि कन्या की
जन्मराशि हो तो दम्पती में परस्पर कलह होता है।
१०, वर-कन्या के जन्मलग्न और जन्मराशि के तत्त्वों' का विचार करना चाहिए। यदि
दोनों की राशियों के एक ही तत्त्व हों तो मित्रता होती है। अभिप्राय यह है कि कन्या की
जन्मराशि या जन्मलग्न जलतत्त्ववाली हो और वर की जन्मराशि या जन्मलग्न जल या
पृथ्वीत्त्वाली हो तो मित्रता और प्रेम समझना चाहिए। तत्त्चों की मित्रता निम्न प्रकार है :
पृथ्वीतत्त्व की मित्रता जलतत्त्व के साथ, अग्नित्त्व की मित्रता वायुतत्त्व के साथ तथापृथ्वीत्त्व की मित्रता अग्नितत्त्व के साथ होती है। जलतत्त्व की अग्नित्त्व के साथ औरजलतत्त्व की वायुतत्त्व के साथ शत्रुता होती है। तत्त्व के इस विचार को जन्मलग्न औरजन्मराशि के साथ अवश्य देख लेना चाहिए।
११. वर-कन्या के लग्नेश और राशीशों के तत्त्वों की मित्रता भी देख लेनी चाहिए।यदि दोनों के लग्नेश एक ही तत्त्व या मित्रत्त्व के हों अथवा दोनों राशीश भी लग्नेश केसमान एक ही तत्त्व या मित्रत्व के हों तो दाम्पत्य-जीवन दोनों का सुख-शान्तिपूर्वक व्यतीतहोता है। अन्यथा कलह, झगड़ा और अशान्ति रहती है।
१२. वर और कन्या की कुण्डली में सन्तान भाव का विचार अवश्य करना चाहिए।सन्तान योग तृतीय अध्याय में बताये गये हैं।
ज्योतिष में लग्न को शरीर और चन्द्रमा को मन माना गया है। प्रेम मन से होताहै, शरीर से नहीं। इसीलिए आचार्यों ने जन्मराशि से मेलापक विधि का ज्ञान करना बतायाहै। गुण-मिलान द्वारा वर और कन्या की प्रजनन शक्ति, स्वास्थ्य, विद्या एवं आर्थिक परिस्थितिका ज्ञान करना चाहिए। इस गुण मिलान-पद्धति में निम्न बातें होती हैं-१. वर्ण, २. वश्य,३. तारा, ४. योनि, ५. ग्रहमैत्री, ६. गणमैत्री, ७. भकूट और ८. नाड़ी। इनमें एक-एक अधिकगुण माने गये हैं। अर्थात् वर्ण का १, वश्य का २, तारा का ३, योनि का ४, ग्रहमैत्री का५, गणमैत्री का ६, भकूट का ७ और नाड़ी का ८ गुण होता है। इस प्रकार कुल ३६ गुणहोते हैं। इसमें कम से कम १८ गुण मिलने पर विवाह किया जा सकता है, परन्तु नाड़ीऔर भकूट के गुण अवश्य होने चाहिए। इनके गुण बिना १८ गुणों में विवाह मंगलकारीनहीं माना जाता है।
विवाह के लिए कुंडली मिलाना भी एक समस्या है जो आम आदमी के सामने रहती है। प्रायः इस मामूली से काम के लिए ज्योतिषियों को मोटी रकम देने के बाद भी लोग तलाक/असफल गृहस्थ के रूप में दुष्परिणाम भोगते हैं और बाद में ज्योतिषी के स्थान पर ज्योतिष को गालियां देते हैं। अतः संक्षेप में हम यहां मेलापक विधि का वर्णन भी पाठकों के लाभार्थ करेंगे।
मेलापक विधि-मेलापक गुण 36 होते हैं। इनमें से कम से कम 18 गुण मिलने चाहिए। जितने अधिक गुण मिलते हों उतना ही आदर्श जोड़ा माना जाता है। भगवान राम व सीता के 32 गुण मिलते थे। मंगली आदि दोषों को भी इस मिलान के अलावा विचारते हैं। इन अंकों की निर्धारण व्यवस्था इस प्रकार है
वर्णों वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम्।
गणमैत्रं भकूटं च नाड़ी चैते गुणाधिकाः॥
-मुहूर्त चिन्तामणि
कुंडली मिलान और गुण गणना भारत में बहुत प्रचलित प्रथा है। यहां सामान्य लोग जानते हैं की वैवाहिक बंधन में बंधने के लिए कितने गुणों की आवश्यकता होती है। कुछ ज्योतिषी कुंडली मिलाने के परंपरागत तरीकों का ही अनुसरण करते हैं।
सामान्यतः उत्तर और दक्षिण भारत में कुंडली मिलाने का तरीका एक जैसा है। फिर भी कुछ बातें दक्षिण भारत में थोड़ी अलग हैं। कुंडली मिलाते समय आठ मुख्य चीजें उत्तर और दक्षिण भारत में एक सामान रूप से देखी जाती हैं । ये हैं-
इनके क्रमांक ही इनके गुणांक है
1.वर्ण -1अंक
2.वश्य-2अंक
3.तारा या दिन-3अंक
4. योनि-4अंक
5.ग्रह मैत्री-5अंक
6.गण-6अंक
7.भकुट-7अंक
8.नाड़ि-8अंक
हर घटक को एक निश्चित अंक दिया गया है जो इस तरह हैं-
वर्ण को1 अंक , वैश्य को 2, दिन को 3, योनी को 4, ग्रह मैत्री को 5, गण को 6, भकूट को 7 और नाड़ी को 8 अंक दिया गया है । सबका जोड़ कुल 36 अंक होते हैं।
इस मानदंड के आधार पर, दो संभावित लोगों की कुंडली को मिलाना और उसके फल की गणना करना ही गुण मिलान - कहलाता है.
36 में 18 अंक 50 % हुआ जिसे औसत माना जाता है और 28 अंक मिले तो संतोषजनक मानते हैं। कुंडली मिलाने के समय कम से कम 18 अंक मिलने चाहिए।
यदि होनेवाले दूल्हा दुल्हन एक ही नाड़ी के हों तो यह नाड़ी दोष कहलाता है। उदहारण के लिए, यदि दोनों की मध्य नाड़ी हो तो इस नाड़ी दोष से बच्चे के जन्म में समस्या आती है। इस तरह के मामले में बच्चे के जन्म की सम्भावना नहीं के बराबर रहती है। इसमें शामिल युगल का रक्त समूह से सीधा संबंध रहता है।
यह एक गहन अध्ययन का विषय है और संवादिता की गणना के दौरान केवल इन्ही कारकों को क्यों देखा गया । फिर भी इसकी वैधता पर सवाल नहीं किये जा सकते।
उदहारण के लिए, यदि लड़की श्वान योनी (श्वान -कुत्ता) में पैदा हुई और लड़का मंजर योनी (मंजर- बिल्ली) का है, तो ऐसी स्थिति में लड़की हमेशा लड़के पर हावी रहेगी। यह भविष्यवाणी कुत्ता बिल्ली के स्वाभाव के आधार पर की जा सकती है।
उतर भारतीय प्रचलित वर वधु कूट मिलाप :-
वर्ण
वर्ण-जातक की जन्मराशि यदि मीन, वृश्चिक, कर्क हो तो ब्राह्मणय मेष, धनु, सिंह हो तो क्षत्रियय वृष, कन्या, मकर हो तो वैश्य तथा मिथुन, तुला, कुम्भ हो तो शूद्र होती है।
अष्ट कूटो में प्रथम कूट वर्ण माना गया हैं इसके आधार पर कार्य क्षमता का मूल्यांकन किया जाता हैं ज्योतिष शास्त्र और भारतीय संस्कृति में चार वर्ण माने गये हैं। इनकी परस्पर कार्य क्षमता भी अलग अलग मानी गयी हैं। कन्या से वर का वर्ण उत्तम या परस्पर एक ही हो तो दंपत्ति अपने जीवन का निर्वाह भली प्रकार से कर पाएंगे इसका मिलान होने पर एक गुण मिलता हैं।मेलापक में वधू का वर्ण वर के वर्ण से उत्तम नहीं होना चाहिए (समान हो सकता है)। यदि ऐसा है तो पूरा एक अंक प्राप्त होगा। ऐसा नहीं है तो शून्य।
वश्य
वश्य पांच प्रकार के माने गए हैं। चतुष्पद ,द्विपद ,जलचर ,वनचर और किट। मेष ,वृषभ ,सिंह, धनु का उत्तरार्ध और मकर का पूर्वार्ध चतुष्पद माने गये हैं। इनमे से सिंह राशी चतुष्पद होते हुए भी वनचर मानी गयी हैं। मिथुन ,कन्या ,तुला ,धनु का पूर्वार्ध और कुम्भ राशी द्विपद मानी गयी हैं। मकर का उत्तरार्ध और कर्क राशी को जलचर माना हैं , इसमे कर्क राशी को जलचर होते हुए भी किट माना हैं। वश्य के द्वारा स्वभाव और परस्पर सम्बन्ध के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती हैं यदि वश्य एक ही अथवा परस्पर मित्र हैं तो सम्बन्ध अच्छा बना रहेगा परन्तु वश्य परस्पर शत्रु हैं तो दोनों में शत्रुता की भावना सामान्य बात पर भी हो जाएगी। भक्ष्य होने पर एक दुसरे का ख्याल रखने पर भी ऐसे विचार आएंगे की मेरा जीवन साथी मुझे किसी भी प्रकार से दबाना चाहता हैं। मेरी भावनाओ की कोई क़द्र नहीं हैं। ऐसे विचार आपके प्रेमी को भी आ सकते हैं इसका शुभ मिलान होने पर दो गुण प्राप्त होते हैं।
वश्य-सभी जलचर राशियां (सिंह को छोड़कर) नर राशि (यानी द्विपद राशि) के वश में होती हैं। वृश्चिक को छोड़कर अन्य सभी राशियां सिंह राशि के वश में होती हैं। अतः सिंह राशि की शत्रु वृश्चिक राशि है। इसी प्रकार लौकिक व्यवहार में शत्रु राशि से (यानी जो जिसका भक्ष्य है वह उसका शत्रु है) सम्बन्ध न करें। शत्रु सम्बन्ध में अंक शून्य तथा मित्र होने पर 2 अंक प्राप्त होंगे। पाठकों की सुविधा के लिए स्पष्ट कर दें कि 3, 6, 7, 11 व 9 राशियों का पूर्वार्ध ’नरराशि’ है। 2,1,9 का उत्तरार्ध तथा 10 का पूर्वार्ध ’चतुष्पद’ है। 4,10 का उत्तरार्ध तथा 12 ’जलचर’ है। 8 ’कीट’ है तथा 5 ’वनचर’ है।
तारा
जन्म नक्षत्र के आधार पर तारा ९ प्रकार की मानी गयी हैं। जन्म ,संपत ,विपत ,क्षेम ,प्रत्यरी ,साधक ,वध , मित्र और अतिमित्र। तारा का मिलान होने पर दोने में परस्पर एक दुसरे को समझने की शक्ति प्राप्त होती हैं इसके लिए वर या पुरुष के जन्म नक्षत्र से गिनकर कन्या के नक्षत्र पर जाये और प्राप्त संख्या में ९ का भाग देवे इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर या पुरुष के नक्षत्र पर जाकर गिनने पर प्राप्त संख्या में ९ का भाग देवे। इससे प्राप्त शेष संख्या से तारा जानी जाती हैं। तीसरी विपत , पांचवी प्रत्यरी और सातवी वध अपने नाम के अनुसार अशुभ हैं ,शेष शुभ हैं। इसका मिलान होने पर तीन गुण प्राप्त होते हैं।तारा-कन्या के जन्म नक्षत्र से वर का जन्म नक्षत्र गिनें तथा वर के जन्म नक्षत्र से कन्या का गिनें। दोनों में जो-जो संख्या आए उनमें 9 का भाग दें। जो शेष रहे वह ’तारा’ कहा जाएगा। यदि यह तारा-3, 5 या 7 हो तो शुभ नहीं होती। यदि दोनों की तारा शुभ हों तो 3 अंक, यदि एक की शुभ व दूसरे की अशुभ हो तो 1) अंक तथा दोनों की ही अशुभ हो तो 0 अंक मिलता है।
योनी
योनी चौदह मानी गयी हैं। अश्व ,गज ,मेष ,सर्प ,मार्जार मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल और सिंह । इसके द्वारा निर्णय लेने की क्षमता ,परस्पर संतुलन और विवेक का विचार किया जाता हैं। इसके द्वारा किसी कार्य को करते समय विचारो का मिलना जाना जाता हैं। विचार अलग होने पर अर्थात योनी अलग होने पर कार्य में बाधा आती हैं इसके मिलने पर चार गुण प्राप्त होते हैं। समान योनी होने पर चार गुण ,मित्र योनी होने पर तीन गुण ,सम योनी होने पर दो गुण और शत्रु योनी होने पर शून्य गुण प्राप्त होता हैं।
योनि-योनी का विचार जन्म नक्षत्र से करते हैं।
अश्विन-अश्व/घोड़ा विशाखा-व्याघ/बाघ
भरणी-हाथी/हस्ती अनुराधा,ज्येष्ठा-मृग/हिरण
कृतिका-मेढ़ा/मेष
मूल-श्वान/कुत्ता
रोहिणी व मृगशिरा-सर्प/सांप पूर्वाषाढ़ा-वानर/बंदर
आर्द्रा-श्वान/कुत्ता
उत्तराषाढ़, अभिजत-नेवला
पुनर्वसु-मार्जार/बिल्ला श्रवण-वानर/बंदर
पुष्य-मेष/मेढ़ा धनिष्ठा-सिंह/शेर
अश्लेषा-मार्जार शतभिषा-घोटक (घोड़ा)
मघा व पू. फाल्गुनी-मूषक/चूहा पूर्वाभाद्रपद-सिंह/शेर
उत्तराफाल्गुनी-गौ/गाय उत्तराभाद्रपद-गौ/गाय
हस्त-महिष/भैंसा रेवती-हस्ती/हाथी
चित्रा-व्याघ्र/बाघ
स्वाति-महिषी/भैंस
उपरोक्त नक्षत्रों की उपरोक्त योनि हैं।
सिंह व हाथी, भैंसा व घोड़ा, मार्जार व चूहा, कुत्ता व हिरण, वानर व मेष, गौ तथा व्याघ्र, नेवला व सर्प-इनमें प्राकृतिक वैर होता है। अतः यह देखना चाहिए कि वर-वधू के नक्षत्रों/योनियों में शत्रुता न हो (यह विचार सेवक तथा मालिक में भी नौकरी के समय करते हैं)।
वर-वधू दोनों की एक ही योनि हो तो 4 अंक, दोनों मित्र हों तो 3 अंक, स्वाभाविक गुण वाले हों तो 2 अंक, शत्रु हों तो 1 अंक तथा महाशत्रु हों तो 0 अंक मिलता है। जैसे सिंह की हाथी से महाशत्रुता है पर हिरण/गौ से भी शत्रुता है, किन्तु व्याघ्र से स्वाभाविक गुण हैं आदि।
ग्रह मैत्री
रह मैत्री के द्वारा परस्पर स्वभाव और उनकी प्रकृति के बारे में जाना जाता हैं। ग्रहों में परस्पर नैसर्गिक रूप से तीन प्रकार के सम्बन्ध बनते हैं। यदि दोनों के राशी स्वामी परस्पर मित्र अर्थात एक ही हो तो परस्पर प्रेम रहता हैं परन्तु शत्रु होने पर विरोध रहता हैं। दोनों के राशी स्वामी परस्पर सम हो तो कभी ख़ुशी कभी गम की स्थिति बनती हैं। इसका मिलान होने पर पांच गुण प्राप्त होते हैं।
ग्रहमैत्री-सूर्य के गुरु, मंगल व चंद्र मित्र हैं। शुक्र, शनि शत्रु तथा बुध सम है। चन्द्रमा के बुध व सूर्य मित्र हैं। शत्रु कोई नहीं, शेष ग्रह सम हैं। मंगल के सूर्य, गुरु, चन्द्र मित्र हैं। बुध शत्रु है तथा शुक्र, शनि सम हैं। बुध के मित्र शुक्र व सूर्य हैं। चन्द्रमा शत्रु तथा गुरु, शनि, मंगल सम हैं। गुरु के सूर्य, मंगल, चंद्र मित्र हैं। बुध, शुक्र, शत्रु तथा शनि सम है। शुक्र के बुध, शनि मित्र हैं। चन्द्र, सूर्य, शत्रु तथा गुरु, मंगल सम हैं। शनि के मित्र बुध व शुक्र हैं। चन्द्र, सूर्य, मंगल शत्रु तथा गुरु सम हैं।
इस आधार पर वर व वधू की जन्मराशियों के स्वामियों का सम्बन्ध विचारते हैं। यदि दोनों के राशीश समान हों अथवा मित्र हों तो 5 अंक। यदि एक का सम व दूसरे का शत्रु हो तो ) अंक। एक का सम व दूसरे का मित्र हो तो 4 अंक। दोनों के सम हों तो 3 अंक। एक का मित्र व एक का शत्रु हो तो 1 अंक तथा दोनों के ही शत्रु हों तो 0 अंक मिलता है।
गण
गण तीन होते हैं देव , मनुष्य और राक्षस। गण के द्वारा शालीनता ,उदारता ,सहृदयता सुशीलता का विचार किया जाता हैं। देव गण में उत्तपन जातक उदार ,दयालु ,दानी और आत्म विश्वासी होते हैं। मनुष्य गण में उत्त्पन्न जातक चतुर ,स्वार्थी और स्वाभिमानी होते हैं। राक्षस गण में उत्त्पन्न जातक क्रोधी ,जिद्दी ,लापरवाह ,निर्दयी होते हैं। गण मिलान होने पर ६ गुण मिलते हैं।
गणमैत्री-गणों को भी जन्म नक्षत्रों द्वारा विचारा जाता है। मघा, अश्लेषा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, कृतिका, चित्रा, विशाखा-इन 9 नक्षत्रों का गण राक्षस होता है। तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, भरणी व आर्द्रा इन 9 नक्षत्रों का गण मनुष्य होता है। अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, श्रवण, रेवती, स्वाति तथा लघु संज्ञक इन शेष 9 नक्षत्रों का गण देव होता है। वर तथा वधू का गण समान हो तो उनमें अच्छी पटती है। दोनों विरोधी हों तो क्लेश रहता है। महाशत्रु हो तो एक की मृत्यु हो जाती है।
देवता तथा मनुष्य में मध्यम प्रीति होती है। देवता तथा राक्षस में वैर रहता है। देवता तथा मनुष्य हो तो एक की मृत्यु हो जाती है। अतः समान गण देखना चाहिए।
वर-वधू दोनों के गण समान हों तो 6 अंक। मध्यम प्रीति वाले हों तो 5 अंक। वैर वाले हों तो एक अंक तथा महाशत्रु हों तो 0 अंक मिलता है।
भकूट
भकूट छः प्रकार के होते हैं। वर की राशी से कन्या की राशी एवम कन्या की राशी से वर की राशी तक गिनने पर इसकी जानकारी प्राप्त होती हैं। षडाष्टक ,द्विद्वादश ,नव पंचम अदि अशुभ हैं। षडाष्टक में दोनों के राशी स्वामी एक हो या परस्पर मित्र हो तो प्रीति षडाष्टक शुभ होता हैं। शेष मिलान शुभ हैं। इसका मिलान होने पर अधिकतम ७ गुण प्राप्त होते हैं।
भकूट-भकूट दोष का विचार जन्मराशि से होता है। यदि वर तथा वधू की राशियां एक-दूसरे से द्विद्वादश (2,12) हों तो निर्धनता रहती है। यदि षडाष्टक (6,8) हों तो एक की मृत्यु होती है अथवा कलह खूब रहती है। नव पंचम (9,5) हों तो संतान की हानि होती है। इससे भिन्न हो तो शुभ रहता है।
दुष्ट भकूट में अंकों का विचार विभिन्न तालमेला के हिसाब से किया जाता है। उन सबका वर्णन पाठकों के लिए ’कन्फ्यूजिंग’ हो सकता है। (क्योंकि विस्तार तथा उलझाव काफी है) अतः संक्षेप में इतना ही समझें कि षडाष्टक, द्विद्वादश या नव पंचम बिल्कुल न हो। यह एक अति महत्त्वपूर्ण गुण है। अतः इसे विशेष रूप से देख लेना चाहिए। अन्यथा वैवाहिक जीवन ’महाभारत’ या ’नरक’ में भी बदल सकता है।
नाड़ी
नाड़ी-नाड़ी का विचार जन्मनक्षत्र के द्वारा होता है। आदि, मध्य व अन्त्यज तीन नाड़ियां होती हैं। वर या वधू की नाड़ी समान कभी नहीं होनी चाहिए। यदि समान नाड़ी हो तो 0 अंक मिलता है। यदि नाड़ी असमान हो तो पूर्ण 8 अंक मिलते हैं। इसी बात से नाड़ी का महत्त्व सिद्ध हो जाता है। यह मेलापक विचार से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
ज्येष्ठा, मूल, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, अश्विनी नक्षत्रों की आदि नाड़ी मानी गई है। पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, भरणी, धनिष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वा फाल्गुनी तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों की मध्य नाड़ी कही गई है तथा स्वाति, विशाखा, कृतिका, रोहिणी, अश्लेषा, मघा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण नक्षत्रों की अन्त्यज नाड़ी मानी जाती है।
विशेष-वर-वधू एक ही नाड़ी के हों तो विवाह अति अशुभ होता है। यदि दोनों मध्य नाड़ी के हों तो मृत्यु होती है। अतः मध्य नाड़ी दोनों की हरगिज नहीं होनी चाहिए।
यह कुल मिलाकर 32 गुण मेलापक में मिलाए जाते हैं। इनमें 16 तक अंक (गुण) मिलें तो विवाह निन्दित होता है। 20 तक मिले तो मध्यम कहा जाता है। इससे अधिक मिलें उतना ही श्रेष्ठ है (जैसा कि कहा जा चुका है राम व सीता के 32 गुण मिलते थे)। 18 से कम गुण मिलें तो विवाह नहीं करना चाहिए।
यद्यपि नाड़ी आदि दोष होने पर नाम बदलवा देना आदि बहुत से परिहार (उपाय) भी प्रचलित हैं। परन्तु सुरक्षा इसी में है कि 18 गुण से कम में विवाह किया ही न जाए।
क्योंकि, जैसा कि कहा गया है
राश्यैक्ये चेद्भिन्नमृक्षं द्वयोः स्यान्नक्षत्रैक्ये राशियुग्मं तथैव।
नाडीदोषो नो गणानांच दोषो नक्षत्रैक्ये पाद भेदे शुभं स्यात्॥
-मुहूर्त चिन्तामणि
अर्थात् वर-कन्या दोनों की एक ही जन्मराशि हो किन्तु जन्मनक्षत्र भिन्न हों अथवा एक ही नक्षत्र हो किन्तु राशियां दो (भिन्न) हों तो नाड़ी और गण दोष नहीं होता। यदि दोनों का नक्षत्र एक ही हो किन्तु नक्षत्र के चरण अलग-अलग हों तो भी विवाह शुभ होता है। अतः यदि नक्षत्र एक ही हो तो जन्मराशि व नक्षत्रों के चरण भी विचारें। उनमें भी साम्यता होगी तभी दोष माना जाएगा। अन्यथा नहीं।
इस सूत्र को आधार मानकर कन्या का नाम बदलवा दिया जाता है। ताकि उसकी राशि भिन्न हो जाए।
सरल विधि-यह पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए संक्षेप में मेलापक विधि कही है। इस सब झमेले में जाने की वैसे आवश्यकता नहीं होती। भकूट के अलावा शेष सभी जानकारी कम्प्यूटराइज्ड जन्मपत्री के प्रथम पृष्ठ पर ही उपलब्ध होती है और स्वयं कम्प्यूटर से भी 5 मिनट में मेलापक कुंडली बनाई जा सकती है। तथापि यदि कम्प्यूटर उपलब्ध न हो और इस झमेले से बचना हो तो मेलापक की एक सरल किन्तु सटीक विधि पाठकों को बताते हैं। यह मेलापक विधि शास्त्रोक्त विधि है। जो सरल विधि पाठकों के सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूं वो मेरे सुयोग्य आचार्य श्री अरुण कुमार गुलाटीजी ने कृपा कर मुझे बताई थी। मेरा अपना मानना है कि मेलापक कुंडली बनाने या मिलाने के बाद तथा 18 से अधिक गुण मिल जाने के बाद भी इस विधि से विचार अवश्य कर लेना चाहिए।
नाडीया तीन होती हैं आदि ,मध्य और अन्त। इनमे दोनों की एक ही नाड़ी अशुभ हैं अलग अलग नाड़ी होना शुभ हैं। इनका मिलान होने पर आठ गुण प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यदि दिल मिलाने के उपरांत भी गुण मिलान नहीं हो रहा हो तो किसी न किसी कारणवश परस्पर वैचारिक मतभेद ,सामंजस्य का अभाव होने से उनमे अपनत्व की भावना कमजोर रहती हैं। इसलिए दिल मिलाने से ज्यादा जरुरी गुण मिलान को कहा जा सकता हैं।
विवाह और नाड़ी मिलान
विवाह में वर-वधू के गुण-मिलान में नाड़ी का महत्व इसी से ज्ञात होता है कि 36 गुणांक में 8 गुणांक नाड़ी के होते हैं। दो अपरिचितों की मनःस्थिति और शारीरिक सामंजस्य की जानकारी नाड़ियों के मिलान से की जाती है। भावी संतान सुख की जानकारी भी नाड़ी से ही मिलती है।
वर-कन्या के जन्म नक्षत्र एक ही नाड़ी के नहीं होने चाहिए। दोनों की नाड़ियाँ भिन्ना होना शुभ माना जाता है। वर-कन्या की यदि नाड़ियाँ आद्य-आद्य या अन्त्य-अन्त्य हैं तो अच्छा मिलान नहीं माना जाता है, परंतु दोनों की यदि मध्य नाड़ियाँ हैं तो अति अशुभ माने जाने से यदि नाड़ी दोष का परिहार न हुआ हो तो विवाह करना उचित नहीं होता है।
नाड़ियाँ तीन- आद्य, मध्य और अन्त्य मानी गई हैं, जो नक्षत्रानुसार इस प्रकार होती हैं- अश्वनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, पू. फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पू. भाद्र की आद्य नाड़ी, भरणी, मृगशिरा, पुष्य, उ. फाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पू.षा. घनिष्ठा, उ. भाद्र की मध्य नाड़ी और कृतिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उ.षा., श्रवण, रेवती की अंत्य नाड़ी होती है।
गण दोष, योनि दोष, वर्ण दोष और षड़ाष्टक ये चारों दोष वर-कन्या में गुण ग्रहमैत्री होने पर दोष नहीं रहते परंतु नाड़ी दोष बना रहता है। नाड़ी दोष का विचार ब्राह्मणों में विशेष रूप से करने का उल्लेख है।
नाड़ी दोष परिहार
निम्नांकित परिस्थितियों में नाड़ी दोष परिहार स्वतः ही हो जाता है। (उद्धरण चिह्न) राश्यैक्ये चेद्भिन्नामृक्षं द्वियों स्वान्नाक्ष त्रैम्ये राशि युग्मं तथैव। नाड़ी दोषो नो गणानां च दोषो नक्षत्रैक्ये पाद भेदे शुभं स्यात। अर्थात (1) एक ही राशि हो, परंतु नक्षत्र भिन्ना हों, (2) एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो, (3) एक नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों। (4) नक्षत्र एवं चरण एक होने पर भी भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, विशाखा, श्रवण, घनिष्ठा, पू. भाद्र, उ. भाद्र एवं रेवती में जन्म होने पर नाड़ी दोष नहीं रहता है। (5) कन्या के नक्षत्र से मध्य नाड़ी नहीं है तो पार्श्व नाड़ी पर दोष नहीं रहता है।
एक राशि-नक्षत्र होने पर गुण मिलान में 36 में से 28 गुणों का मिलान हो जाता है और नाड़ी दोष का परिहार होने पर विवाह विचारणीय होता है। नाड़ी से भावी संतान सुख ज्ञात किया जाता है। इसलिए नाड़ी दोष होने पर भी यदि वर-कन्या दोनों की जन्म कुंडलियों के पंचम भाव में शुभ ग्रह है, शुभ ग्रहों से दृष्ट है तथा पंचमेश की शुभ स्थिति है तो विवाह विचारणीय हो सकता है।
विवाह में कोई बाधा नहीं है। पहले चिकित्सा सुविधाएँ नहीं होने से नाड़ी मिलान की संतान सुख की दृष्टि से उपयोगिता रही है। जाँच के परिणाम निर्दोष हों तो नाड़ी दोष होने पर भी विवाह किया जा सकता है। नाड़ी के संबंध में आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर केवल नाड़ी दोष देखकर विवाह को अविचारणीय मान लेना भूल होगी।
संभावित दूल्हा और दुल्हन के मध्य संवादिता सुनिश्चित करने के लिये उनकी कुडली का मिलान करना ही एक विकल्प है। विवाह के बाद युगल एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और उनकी कुंडली का सम्मिलित असर उनके भविष्य पर होता है। एक बार विवाह हो जाये उसके पश्चात उनकी कुडली जीवन भर के लिये उनके भविष्य और जीवनप्रणली को सामुहिक रूप से प्रभावित करती है।
नोट-उपरोक्त में ’नाड़ी’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है तथा उसके बाद ’भकूट’ व ’गण’।
पूरे भारत में कुंडली मिलाते समय मंगल दोष को गंभीरता से लिया जाता है जबकि ज्योतिषी शनि दोष को उतना गंभीर नहीं मानते हैं।
कुंडली मिलाते समय राशि यानि चन्द्र राशि का सही तरीके से मिलान और उसके फल पर विचार करना चाहिए। कुंडली मिलाते समय लग्न का भी उतना ही महत्त्व है।
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इस विधि के अनुसार कन्या तथा वर की कुंडली में निम्नलिखित ग्रहों की तुलना अवश्य करें। क्योंकि ये विवाह के सम्बन्ध में अति महत्वपूर्ण हैं। (वैसे तो सभी ग्रह मिलाकर देखे जाने चाहिए। परन्तु निम्नलिखित तो अनिवार्य ही हैं)
1. वर के लग्न से कन्या के लग्न की राशि गिनें।
2. वर के चन्द्र से कन्या के चन्द्र को गिनें।
3. वर के सूर्य से कन्या के सूर्य को गिनें।
4. वर के शुक्र से कन्या के शुक्र को गिनें।
5. वर के गुरु से कन्या के गुरु को गिनें।
निष्कर्ष-किसी भी गणना का फल ‘षडाष्टक’ (6/8) ’द्विद्वादश’ (2/12) अथवा ’नवपंचम’ (9/5) नहीं होना चाहिए। (यहां ध्यान रखें कि फलित में ’नवपंचम’ अच्छा है। किन्तु मेलापक में ’नवपंचम’ होना त्याज्य माना गया है।) इनसे भिन्न कुछ भी हो तो कुंडली मेल खाती है। ’समसप्तक’ (7/7) जन्म राशि या चन्द्र न हो। यह भी ध्यान रखें। अन्यथा सदैव वैचारिक मतभेद बना रहेगा।
कुण्डली गुण मिलान एक अद्भुत एवं कठिन कार्य है जिसमें कई ज्योतिष संयोग और नियमों को परखा जाता है। गुण मिलान की प्रक्रिया दो तरह से की जा सकती है। केवल प्रचलित नाम के उपयोग से, या जन्मपत्री के द्वारा जो कि जन्म तारीख के आधार पर बनाई जाती हैं। जन्मपत्री में जन्म राशि का उपयोग करके गुण मिलान किया जाता है। अगर किसी की जन्म तारीख पता नहीं हो तो फिर उसके नाम के पहले अक्षर से गुण मिलान करते हैं। ज्यादातर ज्योतिषी अष्टकूट चक्र या अवकहडा चक्र का उपयोग लड़के और लड़की के गुण दोष मिलान के लिए करते हैं।
कुंडली मिलान के माध्यम से वर-वधु की कुंडलियों का आकलन किया जाता है ताकि वह जीवनभर एक-दूसरे के पूरक बने रहें. लेकिन वर्तमान समय में केवल यह देखा जाता है कि यह मेरे लिए फायदेमंद रहेगा या नहीं। दुनिया भर के प्रश्न व्यक्ति एक ज्योतिषी के समक्ष रख देते हैं जबकि कुण्डली मिलान में वर-वधु का आपसी सामंजस्य, विवाह का मांगलिक सुख तथा आने वाला दशाक्रम देखा जाना चाहिए. लेकिन लगता है कि इन सब बातों को आम व्यक्ति की तरह ज्योतिषी भी शायद भूल गये हैं।
कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक सरसरी निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह पैमाना बिलकुल गलत हैैं। कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ। सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढऩा चाहिए।
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आजकल आँख मूंदकर यही देखा है कि गुण कितने मिल रहे हैं और जातक मांगलिक है या नहीं. बस इसके बाद सब कुछ तय हो जाता है. यदि हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो अधिकतर कुंडलियों में गुण मिलान दोषों या मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है अर्थात अधिकतर दोष कैंसिल हो जाते हैं लेकिन इतना समय कौन बर्बाद करें. आइए आपको कुछ दोषों के परिहार के विषय में जानकारी देने का प्रयास करते हैं।
अन्य-लड़के की कुंडली में शुक्र बारहवें भाव में हो तो ैम्ग् की दृष्टि से उत्तम है। परन्तु कन्या की कुंडली में उतना अच्छा नहीं है। तब कन्या की ैम्ग्न्।स् क्म्ड।छक्ै अधिक होती हैं।
ऽ लड़के की कुंडली में शुक्र छठे भाव में तथा कन्या की कुंडली में आठवें भाव में नहीं होना चाहिए। न ही लड़के की कुंडली के बारहवें भाव में शुक्र उच्च स्थिति में मंगल के साथ होना चाहिए।
ऽ लड़के की कुंडली में अन्य भावों में मंगल-शुक्र साथ हों या एक-दूसरे को देखें तो कन्या को जीवनभर पूर्ण ैम्ग् सुख लड़के से मिलता है तथा गृहस्थ सफल रहता है।
ऽ लड़के की कुंडली में शुक्र शनि से प्रभावित हो तो भी अच्छा है किन्तु बुध के साथ शुक्र की युति दोनों कुंडलियों में शुभ नहीं है। विशेषकर लड़के के सातवें और बारहवें भाव में।
ऽ लड़के का लग्नेश भी (लग्न के अतिरिक्त और कहीं) बुध के साथ नहीं होना चाहिए।
ऽ यह भी ध्यान देना चाहिए कि लड़के या लड़की के पांचवें भाव में या सातवें भाव में केतु न हो। अथवा उनके पांचवें भाव में गुरु अकेला न हो या सिंह राशि में न हो। यदि हों तो शुभ ग्रहों से दृष्ट अवश्य हों अन्यथा सन्तान प्राप्ति में बाधा पड़ती है।
ऽ कन्या की कुंडली में सूर्य या केतु आठवें भाव में भी न हो। अथवा लग्न में न हो तथा कोशिश करें कि कन्या का लग्न श्सिंहश् न हो (जिन भावों में मंगल मंगली दोष बनाता है। उन्हीं भावों में चन्द्र, शनि, केतु व सूर्य भी मंगली दोष बनाते हैं अतः उन सबसे बचना चाहिए)।
मेलापक से भिन्न-इनके अतिरिक्त कुछ और बातों का भी ध्यान रखें-
ऽ ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न जातक का विवाह ज्येष्ठा में ही उत्पन्न जातक से न करें। ज्येष्ठ मास में भी न करें। ऐसे घर में भी न करें जहां विवाह के बाद कन्या का कोई ज्येष्ठ (जेठ) बन जाए। अन्यथा ’त्रिखलदोष’ होता हो जो ’जेठ’ के लिए विशेषरूप से हानिकारक माना गया है
ऽ प्रथम गर्भ से उत्पन्न कन्या व लड़के (बड़ा लड़का व बड़ी लड़की) का विवाह उनके जन्म मास, जन्म नक्षत्र तथा जन्म तिथि में करना शुभ नहीं होता। (कम से कम ज्येष्ठ मास में तो बिल्कुल ही न करें। यद्यपि कुछ विद्वान मानते हैं कि ज्येष्ठ मास में तब तक न करें, जब तक सूर्य कृतिका नक्षत्र पर रहे। इसके बाद ज्येष्ठ मास में भी कर सकते हैं।)
ऽ पुत्र के विवाह से 6 महीनों तक अपनी कन्या का विवाह भी न करें (न केवल आप अपितु पूरा कुल)। दो सगे भाइयों का विवाह दो सगी बहनों से न करें। अपने कुल में विवाह के 6 मास तक मुंडन भी न करें।
ऽ यह ध्यान दें कि कन्या व वर का जन्म नक्षत्र अश्लेषा, मूल तथा ज्येष्ठा अथवा विशाखा न हो। क्योंकि अश्लेषा में उत्पन्न कन्या या लड़का विवाहोपरांत अपनी सास का नाश करते हैं (सास मर जाती है)। मूल में जन्मे कन्या/वर अपने ससुर का नाश करते हैं। ज्येष्ठा में जन्मी कन्या अपने जेठ का तथा विशाखा में जन्मी कन्या अपने देवर का नाश करती है। अतः यदि विवाह करना ही हो तो अश्लेषा में उत्पन्न जातक का विवाह उससे करें जिसकी माता का देहांत हो चुका हो, मूल में उत्पन्न जातक का विवाह उससे करें जिसके पिता का देहांत हो चुका हो तथा ज्येष्ठा एवं विशाखा में जन्मी कन्या का विवाह उससे करें जिसका क्रमशः बड़ा व छोटा भाई न हो अथवा पहले ही मर चुका हो। (विशाखा का अंतिम तथा अश्लेषा का प्रथम चरण हो तो ऐसा खतरा नहीं होता। मूल का भी अंतिम चरण निरापद होता है। परन्तु ज्येष्ठा में चारों चरण छोड़ देने चाहिए।)
ऽ विवाह में लग्न, चन्द्र व नवमांश तीनों कुंडलियां मिलानी चाहिए। क्योंकि विवाह सम्बन्ध में नवमांश कुंडली अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है (पुरुष कुंडली में पत्नी का कारक शुक्र है। स्त्री कुंडली में पति का कारक गुरु है। अतः इन्हें विशेष रूप से देखें।) गुरु व शुक्र अस्त हों, सन्धिकाल में हों, पंचक हों या गुरु सिंह राशि के नवमांश में हों तब विवाह का मुहूर्त नहीं निकलता।
अद्भुत एवं कठिन कार्य है गुण मिलान
दक्षिण भारत में कुंडली मिलाते समय इन 10 कारकों पर विचार किया जाता है-
धिना- सितारों के आधार पर होनेवाले दूल्हा दुल्हन के दापंत्य जीवन की आयु के आधार पर गणना की जाती है।
गण – सुखी जीवन और सामान्य भलाई का प्रतिनिधित्व करता है।
महेंद्र- बच्चे के जन्म की संभावना से संबंधित है।
स्त्री दीर्घा-यह भी सुखी और सामान्य जीवन के लिए होता है।
योनी-आनंददायक और संतुलित वैवाहिक जीवन के लिए देखा जाता है।
राशि-यह संतान तथा उनकी खुशी के लिए होता है।
रहस्याधिपति- यह भी वंश और धन के बारे में होता है।
वैस्य- यह विवाह से मिलने वाले प्यार और खुशियों के लिए होता है।
रज्जू- यह लम्बे वैवाहिक जीवन के लिए कात्वपूर्ण है और साथ ही साथ दूल्हा दुल्हन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
वेधई -यदि वेधई शून्य हो तो वैवाहिक जीवन, सभी तरह की विपदाओं से बचा रहता है।
पाश्चात्य ज्योतिषियकॉम्पोसाईट चार्ट
कुंडली मिलाने के दौरान पाश्चात्य ज्योतिषिय अवधारणाओं पर अमल करते हैं। यह तरीका कॉम्पोसाईट चार्ट कहलाता है। कुंडली मिलाने में पारंपरिक तरीके के अलावा कॉम्पोसाईट चार्ट भी सफल वैवाहिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कॉम्पोसाईट चार्ट एक विधि है जिसमें एक कुंडली के प्रभाव की तुलना को दूसरे की कुंडली से की जाती है। जैसे- दूल्हे का लग्न तुला है और दुल्हन का मकर, ऐसे में वैवाहिक गठबंधन नहीं होना चाहिए क्योंकि दोनों एक दूसरे के वर्ग में हैं। इस कारण दोनों में विचारक मतभेद और संघर्ष होता रहेगा। दूसरी ओर अगर दूल्हा तुला लग्न में और दुल्हन कुंभ में हो तो उनका जीवन बहुत ही आनंदमय बितेगा क्योंकि दोनों की राशि में एक ही तत्व है -वायु। दूसरी स्थिति में यदि दूल्हा अपना व्यवसाय करता है और दूल्हन का राहू और शनि दूल्हे के तीसरे घर को प्रभावित करता है तो शादी के बाद दूल्हे को व्यवसाय में हानि उठानी पड़ेगी।
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गुणमिलान के बाद लड़के लड़की की लग्न, चंद्र, सूर्य, नवमांश, कुंडली में ग्रहो की व्यवस्था दृस्टि और विशेष करके 7, भाव और उसके पति या उसपर आसीन ग्रहो की स्थिति साथ में 12 भाव और 10, 4 भाव आसीन गृह और पति की क्या व्यवस्था है देखे , मंगल 1,2,4,7,8,10,12 में मांगलिक बनाता है किन्तु मांगलिक न हो और सूर्य, शनि, राहु केतु जैसे गरम और पृथकता जनक गृह भी मांगलिक जैसा योग निर्माण करते है, नीच का शुक्र, बृहस्पति, दुर्बल चंद्र और ख़राब सांगत का बुद्ध भी हानि कारक है l
क्या होते हैं दोष?
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कुंडली मिलान के मुख्य दोष इस प्रकार हैं-
गण दोष:-
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यदि किन्हीं जन्म कुंडलियों में गण दोष मौजूद है तब सबसे पहले कुछ बातों पर ध्यान दें -
चंद्र राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता या राशि स्वामियों के नवांशपति में भिन्नता होने पर भी गणदोष नहीं रहता है।
ग्रहमैत्री और वर-वधु के नक्षत्रों की नाडयि़ों में भिन्नता होने पर भी गणदोष का परिहार होता है। यदि वर-वधु की कुंडली में तारा, वश्य, योनि, ग्रहमैत्री तथा भकूट दोष नहीं हैं तब किसी तरह का दोष नहीं माना जाता है।
भकूट दोष का परिहार-
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भकूट मिलान में तीन प्रकार के दोष होते हैं- जैसे षडाष्टक दोष, नव-पंचम दोष और द्वि-द्वादश दोष होता है। इन तीनों ही दोषों का परिहार भिन्न-भिन्न प्रकार से हो जाता है।
षडाष्टक परिहार-
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यदि वर-वधु की मेष/वृश्चिक, वृष/तुला, मिथुन/मकर, कर्क/धनु, सिंह/मीन या कन्या/कुंभ राशि है तब यह मित्र षडाष्टक होता है अर्थात इन राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र होते हैं. मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ माना जाता है।
यदि वर-वधु की चंद्र राशि स्वामियों का षडाष्टक शत्रु वैर का है तब इसका परिहार करना चाहिए।
मेष/कन्या, वृष/धनु, मिथुन/वृश्चिक, कर्क/कुंभ, सिंह/मकर तथा तुला/मीन राशियों का आपस में शत्रु षडाष्टक होता है इनका पूर्ण रुप से त्याग करना चाहिए।
यदि तारा शुद्धि, राशियों की मित्रता हो, एक ही राशि हो या राशि स्वामी ग्रह समान हो तब भी षडाष्टक दोष का परिहार हो जाता है।
नव-पंचम का परिहार-
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नव पंचम दोष का परिहार भी शास्त्रों में दिया गया है. जब वर-वधु की चंद्र राशि एक-दूसरे से 5/9 अक्ष पर स्थित होती है तब नव पंचम दोष माना जाता है. नव पंचम का परिहार निम्न से हो जाता है।
यदि वर की राशि से कन्या की राशि पांचवें स्थान पर पड़ रही हो और कन्या की राशि से लड़के की राशि नवम स्थान पार पड़ रही हो तब यह स्थिति नव-पंचम की शुभ मानी गई है।
मीन/कर्क, वृश्चिक/कर्क, मिथुन/कुंभ और कन्या/मकर यह चारों नव-पंचम दोषों का त्याग करना चाहिए।
यदि वर-वधु की कुंडली के चंद्र राशिश या नवांशपति परस्पर मित्र राशि में हो तब नव-पंचम का परिहार होता है।
द्वि-द्वादश योग का परिहार-
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लड़के की राशि से लड़की की राशि दूसरे स्थान पर हो तो लड़की धन की हानि करने वाली होती है लेकिन 12वें स्थान पर हो तब धन लाभ कराने वाली होती है।
द्वि-द्वादश योग में वर-वधु के राशि स्वामी आपस में मित्र हैं तब इस दोष का परिहार हो जाता है।
मतान्तर से सिंह और कन्या राशि द्वि-द्वादश होने पर भी इस दोष का परिहार हो जाता है।
नाड़ी दोष का परिहार-
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नाड़ी दोष का कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है-
वर तथा वधु की एक ही राशि हो लेकिन नक्षत्र भिन्न तब इस दोष का परिहार होता है।
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चंद्र राशि भिन्न हो तब परिहार होता है।
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चरण भिन्न हों तब परिहार होता है।
शास्त्रानुसार नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गणा दोष वैश्यों के लिए और योनि दोष शूद्र जाति के लिए देखा जाता है।
ज्योतिष चिन्तामणि के अनुसार रोहिणी, मृृगशिरा, आद्र्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण, रेवती तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र होने पर नाड़ी दोष नहीं माना जाता है।
कुंडली मिलान और दोष : कारण और परिहार
कम्पयूटर का कार्य है सिर्फ गणित(Calculations) करना, जन्मकुंडली देखने का कार्य ज्योतिष के ज्ञाता का है कम्पयूटर मानव कार्यों का एक सर्वोतम सहायक जरूर है, परंतु मानव नहीं इसलिए कम्पयूटर का उपयोग करें तो सिर्फ जन्मकुंडली निर्माण हेतु न कि कम्पयूटर द्वारा दर्शाई गई गुण मिलान संख्या को आधार मानकर कोई अंतिम निर्णय लिया जाए कुंडली मिलान और भकूट दोष : कारण और परिहार Kundali milan aur bhakut dosh parihar
कुंडली-मिलान में दोषों का परिहार (काट) कैसे होती है,
मांगलिक दोष, गण दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष, मंगल दोष आदि ज्योतिष में महादोष कहे गए हैं, कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह पैमाना बिलकुल गलत है, कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ, सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढ़ना चाहिए |
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आजकल आँख मूंदकर यही देखा है कि गुण कितने मिल रहे हैं और जातक मांगलिक है या नहीं बस इसके बाद सब कुछ तय हो जाता है
यदि हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो अधिकतर कुंडलियों में गुण मिलान दोषों या मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है अर्थात अधिकतर दोष कैंसिल हो जाते हैं लेकिन इतना समय कौन बर्बाद करें,
मैने अपनी ज्योतिष की प्रैक्टिस के दौरान कुंडली मिलान के ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही 25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले। अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक, मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम।
कुंडली मिलान और भकूट दोष:
भकूट दोष दाम्पत्य जीवन की जीवनश्ौली, सामाजिकता, सुख-समृद्धि, प्रेम-व्यवहार, वंशवृद्धि आदि को प्रभावित करता है। परन्तु इसका शास्त्र सम्मत परिहार (काट) यदि वर वधू की कुंडली में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.
दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.
तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।
वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि
राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है |
अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है
भकूट दोष का प्रभाव
भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है।
द्विद्वार्दश भकूट में विवाह करने सेे निर्धनता होता है।
नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के कारण कष्ट होता है।
षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ शारीरिक कष्ट की संभावना होती है।
भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है।
इन स्थितियों में भकूट दोष नहीं लगता है:—–
1. यदि वर-वधू दोनों के राशीश आपस में मित्र हों।
2. यदि दोनों के राशीश एक हों।
3. यदि दोनों के नवमांशेश आपस में मित्र हों।
4. यदि दोनों के नवमांशेश एक हो।
परिहार (काट) यदि वर-वधू की कुंडली में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।
• मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
• वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,
• जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है।
विवाह के वक्त यदि कुंडली में भकूट दोष हो तो भावी दम्पति का गुण मेलापक मान्य नहीं होता है, इसका मुख्य कारण यह है कि 36 गुणों में से भकूट के लिए 7 गुण निर्धारित हैं।
भकूट दोष का प्रभाव
द्विर्द्वादश भकूट में विवाह करने का फल निर्धनता होता है।
नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के कारण कष्ट होता है।
षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ शारीरिक कष्ट की संभावना होती है।
भकूट के आधार पर विवाह की शुभाशुभता शुद्ध भकूट और नाड़ी दोष रहित 18 से अधिक गुण हों तो विवाह शुभ मान्य होता है।
अशुद्ध भकूट (द्विर्द्वादश, नवपंचम, षड़ाष्टक) होने पर भी यदि मित्र भकूट की श्रेणी में हो तो 20 से अधिक गुण होने पर विवाह श्रेष्ठ होता है।
शत्रु षड़ाष्टक (6-8) भकूट दोष होने पर विवाह नहीं करें। दाम्पत्य जीवन में अनिष्ट की संभावना रहेगी।
मित्र षड़ाष्टक भकूट दोष में भी पति-पत्नी में कलह होती रहती है। अत: षड़ाष्टक भकूट दोष में विवाह करने से बचना चाहिए।
नाड़ी दोष के साथ यदि षड़ाष्टक भकूट दोष (चाहे मित्र षड़ाष्टक हो अथवा दोनो की राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो) भी हो तो, विवाह कदापि नहीं करें। शुद्ध भकूट से गण दोष का परिहार स्वत: हो जाता है।
भकूट दोष परिहार
वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही हों या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो गणदोष एवं दुष्ट भकूट दोष नगण्य हो जाता है।दोनों की राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो अथवा उनके राशि स्वामियों में मित्रता होने पर विवाह की अनुमति दी जा सकती है।
वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही ग्रह हों, राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता हो, परस्पर तारा शुद्धि हो,
राशि सबलता हो,
नवमांश पतियों में मित्रता हो तो
यह पांच प्रकार के परिहार भी दुष्ट भकूट दोष निवारक हैं। परन्तु इनमें परस्पर नाड़ी शुद्धि होना चाहिए।
नवपंचम व द्विर्द्वादश दुष्ट भकूट होने पर वर की राशि से गणना करने पर कन्या की राशि 5वीं हो तो अशुभ किन्तु 9वीं शुभ तथा वर से कन्या की राशि गणना में 2 हो तो अशुभ परन्तु 12वीं शुभ होती है। ऎसे में भकूट दोष होने पर भी विवाह श्रेष्ठ होता है।
मेष राशि
इस राशि के जातकों को वृष, मीन राशि से द्विर्द्वादश भकूट, सिंह, धनु से नव-पंचम और कन्या, वृश्चिक राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
वृष राशि
इस राशि के जातकों को मिथुन, मेष राशि से द्विर्द्वादश, कन्या, मकर से नव-पंचम और तुला, धनु राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
मिथुन राशि
इस राशि को कर्क, वृष राशि से द्विर्द्वादश, तुला, कुंभ से नव-पंचम और वृश्चिक, मकर राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कर्क राशि
इस राशि के जातकों को सिंह, मिथुन राशि से द्विर्द्वादश, वृश्चिक, मीन से नव-पंचम और धनु, कुंभ राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
सिंह राशि
इस राशि को कन्या, कर्क राशि से द्विर्द्वादश, धनु, मेष से नव-पंचम और मकर, मीन राशि के जातकों के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कन्या राशि
इस राशि के जातकों को तुला, çंसंह राशि से द्विर्द्वादश, मकर, वृष से नव-पंचम और कुंभ, मेष राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
तुला राशि
इस राशि के जातकों को वृश्चिक, कन्या राशि से द्विर्द्वादश, कुंभ, मिथुन से नव-पंचम और मीन, वृष राशि वाले जातकों के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य होगा।
वृश्चिक राशि
इस राशि के जातकों को धनु, तुला राशि से द्विर्द्वादश, मीन, कर्क से नव-पंचम और मेष व मिथुन राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
धनु राशि
इस राशि के जातकों को मकर, वृश्चिक राशि से द्विर्द्वादश, मेष, सिंह से नव-पंचम और वृष व कर्क राशि वालों के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य रहेगा।
मकर राशि
इस राशि के जातकों को कुंभ, धनु राशि से द्विर्द्वादश, वृष, कन्या से नव-पंचम और मिथुन व सिंह राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कुम्भ राशि
ऎसे जातकों को मीन, मकर राशि से द्विर्द्वादश, मिथुन, तुला से नव-पंचम और कर्क व कन्या राशि के जातक के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य रहेगा।
मीन राशि
इन्हें मेष, कुंभ राशि से द्विर्द्वादश, कर्क, वृश्चिक से नव-पंचम और सिंह व तुला राशिं के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
उक्त वर्णित राशिगत भकूट दोष के परिहार स्वरूप यदि वर-कन्या दोनों का राशि स्वामी एक हो या दोनों के राशि स्वामियों में मैत्री भाव हो तो भकूट दोष समाप्त हो जाएगा और उनका मिलान शास्त्र सम्मत शुभ होता है।
कुंडली मिलान में एक से चार नंबर तक के दोषों का कुछ विशेष परिहार नहीं है, मुख्य रुप से गण मिलान से परिहार आरंभ होता है-
गण दोष का परिहार | Cancellation of Gana Dosha
यदि किन्हीं जन्म कुंडलियों में गण दोष मौजूद है तब सबसे पहले कुछ बातों पर ध्यान दें :
चंद्र राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता या राशि स्वामियों के नवांशपति में भिन्नता होने पर भी गणदोष नहीं रहता है.
ग्रहमैत्री और वर-वधु के नक्षत्रों की नाड़ियों में भिन्नता होने पर भी गणदोष का परिहार होता है.
यदि वर-वधु की कुंडली में तारा, वश्य, योनि, ग्रहमैत्री तथा भकूट दोष नहीं हैं तब किसी तरह का दोष नहीं माना जाता है.
भकूट दोष का परिहार | Cancellation of Bhakut Dosha
भकूट मिलान में तीन प्रकार के दोष होते हैं. जैसे षडाष्टक दोष, नव-पंचम दोष और द्वि-द्वार्दश दोष होता है. इन तीनों ही दोषों का परिहार भिन्न – भिन्न प्रकार से हो जाता है.
षडाष्टक परिहार | Cancellation of Sashtak
यदि वर-वधु की मेष/वृश्चिक, वृष/तुला, मिथुन/मकर, कर्क/धनु, सिंह/मीन या कन्या/कुंभ राशि है तब यह मित्र षडाष्टक होता है अर्थात इन राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र होते हैं. मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ माना जाता है.
यदि वर-वधु की चंद्र राशि स्वामियों का षडाष्टक शत्रु वैर का है तब इसका परिहार करना चाहिए.
मेष/कन्या, वृष/धनु, मिथुन/वृश्चिक, कर्क/कुंभ, सिंह/मकर तथा तुला/मीन राशियों का आपस में शत्रु षडाष्टक होता है इनका पूर्ण रुप से त्याग करना चाहिए.
यदि तारा शुद्धि, राशियों की मित्रता हो, एक ही राशि हो या राशि स्वामी ग्रह समान हो तब भी षडाष्टक दोष का परिहार हो जाता है
नव पंचम का परिहार | Cancellation of Navpanchak
नव पंचम दोष का परिहार भी शास्त्रों में दिया गया है. जब वर-वधु की चंद्र राशि एक-दूसरे से 5/9 अक्ष पर स्थित होती है तब नव पंचम दोष माना जाता है. नव पंचम का परिहार निम्न से हो जाता है.
यदि वर की राशि से कन्या की राशि पांचवें स्थान पर पड़ रही हो और कन्या की राशि से लड़के की राशि नवम स्थान पार पड़ रही हो तब यह स्थिति नव-पंचम की शुभ मानी गई है.
मीन/कर्क, वृश्चिक/कर्क, मिथुन/कुंभ और कन्या/मकर यह चारों नव-पंचम दोषों का त्याग करना चाहिए.
यदि वर-वधु की कुंडली के चंद्र राशिश या नवांशपति परस्पर मित्र राशि में हो तब नव-पंचम का परिहार होता है.
द्वि-द्वार्दश योग का परिहार | Cancellation of Dwi-Dwardasha Dosha
लड़के की राशि से लड़की की राशि दूसरे स्थान पर हो तो लड़की धन की हानि करने वाली होती है लेकिन 12वें स्थान पर हो तब धन लाभ कराने वाली होती है.
द्वि-द्वार्द्श योग में वर-वधु के राशि स्वामी आपस में मित्र हैं तब इस दोष का परिहार हो जाता है.
मतान्तर से सिंह और कन्या राशि द्वि-द्वार्दश होने पर भी इस दोष का परिहार हो जाता है.
नाड़ी दोष का परिहार |
Cancellation of Nadi Dosha
नाड़ी दोष का कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है. आइए विस्तार से जानें :-
वर तथा वधु की एक ही राशि हो लेकिन नक्षत्र भिन्न तब इस दोष का परिहार होता है.
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चंद्र राशि भिन्न हो तब परिहार होता है.
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चरण भिन्न हों तब परिहार होता है.
शास्त्रानुसार नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गणा दोष वैश्यों के लिए और योनि दोष शूद्र जाति के लिए देखा जाता है.
ज्योतिष चिन्तामणि के अनुसार
रोहिणी, मृ्गशिरा, आर्द्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण, रेवती तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र होने पर नाड़ी दोष नहीं माना जाता है.
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विवाह में वर-वधू के गुण मिलान में नाड़ी का सर्वाधिक महत्त्व को दिया गया है। 36 गुणों में से नाड़ी के लिए सर्वाधिक 8 गुण निर्धारित हैं। ज्योतिष की दृष्टि में तीन नाडियां होती हैं – आदि, मध्य और अन्त्य। *इन नाडियों का संबंध मानव की शारीरिक धातुओं से है।* वर-वधू की समान नाड़ी होने पर दोषपूर्ण माना जाता है तथा संतान पक्ष के लिए यह दोष हानिकारक हो सकता है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि: “नाड़ी दोष केवल ब्रह्मण वर्ग में ही मान्य है।”
“समान नाड़ी होने पर पारस्परिक विकर्षण तथा असमान नाड़ी होने पर आकर्षण पैदा होता है।” आयुर्वेद के सिद्धांतों में भी तीन नाड़ियाँ – वात (आदि ), पित्त (मध्य) तथा कफ (अन्त्य) होती हैं। शरीर में इन तीनों नाडियों के समन्वय के बिगड़ने से व्यक्ति रूग्ण हो सकता है।
भारतीय ज्योतिष में नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं।
9-नौ नक्षत्रों की एक नाड़ी होती है।
जो इस प्रकार है।
आदि नाड़ी अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद ।.
मध्य नाड़ी👉 भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद
अन्त्य नाड़ी कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती ।
नाड़ी के तीनों स्वरूपों आदि, मध्य और अन्त्य ..आदि नाड़ी ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। यही नाड़ी मानव शरीर की संचरना की जीवन गति को आगे बढ़ाने का भी आधार है।
सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी और ब्रह्म नाड़ी” जिसे इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा के नाम से भी जानते हैं। कालपुरुष की कुंडली की संरचना बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों तथा योगो करणों आदि के द्वारा निर्मित इस “शरीर में नाड़ी का स्थान सहस्रार चक्र के मार्ग पर होता है।” यह विज्ञान के लिए अब भी “पहेली”-बना हुआ है कि नाड़ी दोष वालों का ब्लड प्राय: ग्रुप एक ही होता है । और “ब्लड ग्रुप” एक होने से रोगों के “निदान, चिकित्सा, उपचार” आदि में समस्या आती हैं।
इड़ा, पिंगला, और सुसुम्णा*
हमारे मन मस्तिष्क और सोच का प्रतिनिधित्व करती है ।
यही सोच और वंशवृद्धि का द्योतक “नाड़ी” हमारे दांपत्य जीवन का आधार स्तंभ है। अत: नाड़ी दोष को आप गंभीरता से देखें। यदि एक नक्षत्र के एक ही चरण में वर कन्या का जन्म हुआ हो तो नाड़ी दोष का परिहार संभव नहीं है।
और यदि परिहार है भी तो जन मानस के लिए असंभव है। ऐसा देवर्षि नारदने भी कहा है।
एक नाड़ी विवाहश्च गुणे:
सर्वें: समन्वित: l
वर्जनीभ: प्रयत्नेन
दंपत्योर्निधनं ll
अर्थात वर -कन्या की नाड़ी एक ही हो तो उस विवाह वर्जनीय है। भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।
पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही “कुण्डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्त सुखमय गृहस्थ जीवन व्यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इन में से एक ..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।
ऐसी लोक चर्चा है कि वर कन्या की नाड़ी एक हो तो पारिवारिक जीवन में अनेक बाधाएं आती हैं और संबंधों के टूटने की आशंका या भय मन में व्याप्त रहता है. कहते हैं कि यह दोष हो तो संतान प्राप्ति में विलंब या कष्ट होता है, पति-पत्नी में परस्पर ईर्ष्या रहती है और दोनों में परस्पर वैचारिक मतभेद रहता है.*
नब्बे प्रतिशत लोगों का एकनाड़ी होने पर ब्लड ग्रुप समान और आर एच फैक्टर अलग होता है यानि एक का पॉजिटिव तो दूसरे का ऋण होता है. हो सकता है इसलिए भी संतान प्राप्ति में विलंब या कष्ट होता है।
चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक शोधों में भी समान ब्लड ग्रुप वाले युवक युवतियों के संबंध को स्वास्थ्य की दृष्टि से अनपयुक्त पाया गया है। चिकित्सकों का मानना है कि यदि लड़के का आरएच फैक्टर RH+ पॉजिटिव हो व लड़की का RH- आरएच फैक्टर निगेटिव हो तो विवाह उपरांत पैदा होने वाले बच्चों में अनेक विकृतियाँ सामने आती हैं, जिसके चलते वे मंदबुद्धि व अपंग तक पैदा हो सकते हैं। वहीं रिवर्स केस में इस प्रकार की समस्याएँ नहीं आतीं, इसलिए युवा अपना रक्तपरीक्षण अवश्य कराएँ, ताकि पता लग सके कि वर-कन्या का रक्त समूह क्या है।* चिकित्सा विज्ञान अपनी तरहसे इस दोष का परिहार करता है, लेकिन “ज्योतिष” ने इस समस्या से बचने और उत्पन्न होने पर नाड़ी दोष के उपाय निश्चित किए हैं । इन उपायों में जप-तप, दान पुण्य, व्रत, अनुष्ठान आदि साधनात्मक उपचारों को अपनाने पर जोर दिया गया है ।
शास्त्र वचन यह है कि-
*एक ही नाड़ी होने पर
“गुरु और शिष्य”*
“मंत्र और साधक”
“देवता और पूजक” में भी क्रमश: †ईर्ष्या, †अरिष्ट और †मृत्यु” जैसे कष्टों का भय रहता है l*
देवर्षि नारद ने भी कहा है :-
वर-कन्या की नाड़ी एक ही हो तो वह विवाह वर्जनीय है. भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से तो पति-पत्नी के स्वास्थ्य और जीवनके लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है ।
ll वेदोक्त श्लोक ll
〰〰〰〰〰
अश्विनी रौद्र आदित्यो,
अयर्मे हस्त ज्येष्ठयो l
निरिति वारूणी पूर्वा
आदि नाड़ी स्मृताः ll
भरणी सौम्य तिख्येभ्यो,
भग चित्रा अनुराधयो l
आपो च वासवो धान्य
मध्य नाड़ी स्मृताः ll
कृतिका रोहणी अश्लेषा,
मघा स्वाती विशाखयो।
विश्वे श्रवण रेवत्यो,
*अंत्य नाड़ी* स्मृताः॥
आदि नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम: 01, 06, 07, 12, 13, 18, 19, 24, 25 वें नक्षत्र आते हैं।
—+—+—+—
मध्य नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम : 02, 05, 08, 11, 14, 17, 20, 23, 26 नक्षत्र आते हैं।
—+—+—+—
अन्त्य नाड़ी* के अंतर्गत क्रम : 03, 04, 09, 10, 15, 16, 21, 22, 27 वें नक्षत्र आते हैं ।
—+—+—+—
गण :-
〰〰〰
अश्विनी मृग रेवत्यो,
हस्त: पुष्य पुनर्वसुः।
अनुराधा श्रुति स्वाती,
कथ्यते *देवता-गण* ॥
त्रिसः पूर्वाश्चोत्तराश्च,
तिसोऽप्या च रोहणी ।
भरणी च मनुष्याख्यो,
गणश्च कथितो बुधे ॥
कृतिका च मघाऽश्लेषा,
विशाखा शततारका ।
चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठा,
च मूलं रक्षोगणः स्मृतः॥
*देव गण- नक्षत्र :- 01, 05, 27, 13, 08, 07, 17, 22, 15*
*मनुष्य गण-नक्षत :- 11, 12, 20, 21, 25, 26, 06, 04.*
*राक्षस गण- नक्षत्र क्रम:- 03, 10, 09, 16, 24, 14, 18, 23, 19.*
*स्वगणे परमाप्रीतिर्मध्यमा देवमर्त्ययोः।
*मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देव रक्षसोः॥
*”संगोत्रीय विवाह” को कराने के लिए कर्म कांडों में एक विधान है, जिसके चलते संगोत्रीय लड़के का दत्तक दान करके विवाह संभव हो सकता है ।
इस विधान में जो माँ-बाप लड़के को गोद लेते हैं। विवाह में उन्हीं का नाम आता है।
वहीं ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष के अनुरूप यदि एक ही रक्त समूह वाले वर-कन्या का विवाह करा दिया जाता है तो उनकी होने वाली संतान विकलांग पैदा हो सकती है।*
अत: नाड़ी दोष का विचार ही आवश्यक है.*
एक नक्षत्र में जन्मे वर कन्या के मध्य नाड़ी दोष समाप्त हो जाता है लेकिन नक्षत्रों में चरण भेद आवश्यक है.
ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनसे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।
जैसे दोनों की राशि एक हो लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों.
वर-कन्या का नक्षत्र एक हो और चरण अलग-अलग हों.
उदाहरण:-
वर-ईश्वर (कृतिका द्वितीय),
वधू-उमा (कृतिका तृतीया)
दोनों की अंत्य नाड़ी है। परंतु कृतिका नक्षत्र के चरण भिन्नता के कारण शुभ है।
एक ही नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों:– यह निम्न नक्षत्रों में होगा l*
आदि नाड़ी
*वर*- आर्द्रा, (मिथुन),
*वधू*- पुनर्वसु, प्रथम, तृतीय चरण (मिथुन),
*वर* उत्तरा फाल्गुनी (कन्या)- *वधू*- हस्त (कन्या राशि).
*मध्य नाड़ी *वर*- शतभिषा (कुंभ)- *वधू*- पूर्वाभाद्रपद प्रथम, द्वितीय, तृतीय (कुंभ)
*अन्त्य नाड़ी: *वर*- कृतिका- प्रथम, तृतीय, चतुर्थ (वृष)-
*वधू*- रोहिणी (वृष)
*वर*- स्वाति (तुला)- *वधू*-विशाखा- प्रथम, द्वितीय, तृतीय (तुला)
*वर*- उत्तराषाढ़ा- द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ (मकर)- *वधू*- श्रवण (मकर) —-
*एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो*
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
जैसे *वर अनिल*- कृतिका- प्रथम (मेष) तथा *वधू इमरती*-
कृतिका- द्वितीय (वृष राशि)। दोनों की अन्त्य नाड़ी है परंतु राशि भिन्नता के कारण शुभ पाद-वेध नहीं होना चाहिए.
वर-कन्या के नक्षत्र चरण “प्रथम और चतुर्थ” या
“द्वितीय और तृतीय” नहीं होने चाहिएं.
*उक्त परिहारों में यह ध्यान रखें कि वधू की जन्म राशि, नक्षत्र तथा नक्षत्र चरण, वर की राशि, नक्षत्र व चरण से पहले नहीं होने चाहिए।* “अन्यथा नाड़ी दोष परिहार होते हुए भी शुभ नहीं होगा ।”
*उदाहरण देखें :-*
1.वर- कृतिका- प्रथम (मेष), वधू- कृतिका द्वितीय (वृष राशि)-
2.शुभ वर- कृतिका- द्वितीय (वृष),
वधू-कृतिका- प्रथम (मेष राशि)- *अशुभ*
*वैसे तो वर कन्या के राशियों के* *स्वामी आपस में मित्र हो तो वर्ण दोष, वर्ग दोष, तारा दोष, योनि दोष, गण दोष भी …नष्ट हो जाता है.
*वर और कन्या की कुंडली में राशियों के स्वामी एक ही हो या मित्र हो* अथवा D-9 नवांश के स्वामी परस्पर मित्र हो या एक ही हो तो सभी “कूट-दोष” समाप्त हो जाते हैं.*
*नाड़ी दोष हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए. इससे दांपत्य जीवन में आ रहे सारे दोष समाप्त हो जाते हैं.*
नाड़ी दोष का उपचार:-
पीयूष धारा के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.
दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.
तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।
वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि
राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है |
अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है
पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही “कुण्डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्त सुखमय गृहस्थ जीवन व्यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इन में से एक ..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।
Mangalik dosh/Mangal dosh/Muja dosh
मांगलिक दोष
मांगलिक दोष को कुज दोष या मंगल दोष भी कहा गया है।
हिन्दू धर्म में विवाह के संदर्भ में यह दोष बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। सुखद विवाह के लिए अमंगलकारी कहे जाने वाले मंगल दोष के विषय में ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति कि कुंडली में मंगल दोष हो उसे मंगली जीवनसाथी की ही तलाश करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि यदि युवक और युवती दोनों की कुंडली में मंगल दोष की तीव्रता समान है तो ही दोनों को एक दूसरे से विवाह करना चाहिए। अन्यथा इस दोष की वजह से पति-पत्नी में से किसी एक की मृत्यु भी हो सकती है।
किसी भी स्त्री या पुरुष के मांगलिक होने का मतलब यह है कि उसकी कुण्डली में मंगल ग्रह अपनी प्रभावी स्थिति में है। विवाह के लिए कुंडली मिलान करते समय मंगल को 1, 4, 7वें, 8वें और 12वें भाव पर देखा जाता है। यदि कुंडली में मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो जातक को मंगल दोष लगता है। जबकि सामान्य तौर पर इन सब में से केवल 8वां और 12वां भाव ही खराब माना जाता है।
पहला स्थान अर्थात लग्न का मंगल किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को और ज्यादा तेज बना देता है, चौथे स्थान का मंगल किसी जातक की पारिवारिक जीवन को मुश्किलों से भर देता है। मंगल यदि 7वें स्थान पर हो तो जातक को अपने साथी या सहयोगी के साथ व्यव्हार में कठोर बना देता है। 8वें और 12वें स्थान पर यदि मंगल है तो यह शारीरिक क्षमताओं और आयु पर प्रभाव डालता है। यदि इन स्थानों पर बैठा मंगल अच्छे प्रभाव में हो तो जातक के व्यवहार में मंगल ग्रह के अच्छे गुण आएंगे और यदि यह खराब प्रभाव में हैं तो जातक पर खराब गुण आएंगे।
मांगलिक दोष के प्रकार
उच्च मंगल दोष – यदि मंगल ग्रह किसी जातक के जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली में 1, 2, 4, 7, 8वें या 12वें स्थान पर होता है, तो इसे “उच्च मांगलिक दोष” माना जाएगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
निम्न मंगल दोष – यदि मंगल ग्रह किसी जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली में से किसी एक में भी 1, 2, 4, 7, 8वें या 12वें स्थान पर होता है, तो इसे “निम्न मांगलिक दोष” या “आंशिक मांगलिक दोष” माना जाएगा। कुछ ज्योतिषियों के अनुसार 28 वर्ष की आयु होने के बाद यह दोष अपने आप आपकी कुंडली से समाप्त हो जाता है।
मांगलिक व्यक्ति का स्वभाव
मांगलिक व्यक्ति के स्वभाव में आपको कुछ विशेषताएं देखने को मिल सकती हैं, जैसे इस तरह के व्यक्ति दिखने में कठोर निर्णय लेने वाले और बोली में भी कठोर होते हैं। ऐसे लोग लगातार काम करते रहने वाले होते हैं, साथ ही यह किसी भी काम को योजनाबद्ध तरीके से करना पसंद करते हैं। मांगलिक लोग अपने विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होते हैं। ये लोग कठोर अनुशासन बनाते हैं और उसका पालन भी करते हैं। मांगलिक व्यक्ति एक बार जिस काम में जुट जाये उसे अंत तक पूरा कर के ही दम लेता है। ये न तो लड़ाई से घबराते हैं और न ही नए अनजाने कामों को हाथ में लेने से। अपनी इन्हीं कुछ विशेषताओं की वजह से गैर मांगलिक व्यक्ति ज्यादा समय तक मांगलिक व्यक्ति के साथ नहीं रह पाता है।
मंगल दोष से जुड़े मिथक
मंगल दोष के विषय में ज्यादा जानकारी न होने के कारण कई लोग अनेकों तरह की बातें करते हैं, जिसकी वजह से समाज में मंगल दोष से जुड़े कुछ मिथक भी हैं।
यदि मांगलिक और अमांगलिक की शादी कराई जाती है तो उनका तलाक निश्चित है। यह एक ऐसा मिथक है जो अक्सर सुनने में आता है, जबकि हम सभी जानते हैं कि किसी भी शादी को चलाने की ज़िम्मेदारी लड़का और लड़की की समझदारी और उनके के विचारों के मेल-जोल पर निर्भर करती है।
मंगल दोष से जुड़ा एक मिथक यह भी है कि यदि आप एक मांगलिक हैं, तो आपको पहले किसी पेड़ से विवाह करनी होगी। मंगल दोष से छुटकारा पाने के अनेकों उपाय हैं और वह उपाय आपकी कुंडली की सही गणना करने के बाद ही बताये जा सकते हैं इसीलिए यह जरूरी नहीं कि सभी मांगलिक युवक/युवतियों को पेड़ से ही शादी करनी पड़े।
कुछ लोग यह समझते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मंगलवार को पैदा हुआ है तो वह पक्का मांगलिक हैं जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। मंगल दोष का पता कुंडली देखने के बाद ही लगाया जा सकता है। इसका किसी भी दिन पैदा होने से कोई संबंध नहीं होता है।
मंगल दोष का निवारण
यदि किसी जातक की कुंडली में मांगलिक दोष के लक्षण मिलते हैं तो उन्हें किसी अनुभवी ज्योतिषी से सलाह करके ही मंगल दोष के निवारण की पूजा करनी चाहिए। अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) में मंगल दोष की पूजा का विशेष महत्व है। यदि यह पूजा अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की जाये तो यह जातक पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है। मंगल दोष निवारण के लिए ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसे नियम बताए गए हैं जिससे शादीशुदा जीवन में मांगलिक दोष नहीं लगता है।
वट सावित्री और मंगला गौरी का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला होता है। अगर अनजाने में किसी मांगलिक कन्या का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति हो जाता है जो दोष रहित हो तो दोष निवारण के लिए इन दोनों व्रत का अनुष्ठान करना बेहद लाभदायी होता है।
यदि किसी युवती की कुंडली में मंगल दोष पाया जाता है तो अगर वह विवाह से पहले गुप्त रूप से पीपल या घट के वृक्ष से विवाह कर लेती है और उसके बाद मंगल दोष रहित वर से शादी करती है तो किसी प्रकार का दोष नहीं लगता है।
प्राण प्रतिष्ठित किये हुए विष्णु प्रतिमा से विवाह के बाद अगर कन्या किसी से विवाह करती है, तब भी इस दोष का परिहार मान्य होता है।
ऐसा कहा जाता है कि मंगलवार के दिन व्रत रखने और हनुमान जी की सिन्दूर से पूजा करने और उनके सामने सच्चे मन से हनुमान चालीसा का पाठ करने से मांगलिक दोष शांत होता है।
कार्तिकेय जी की पूजा करने से भी इस दोष से छुटकारा मिलता है।
लाल रंग के वस्त्र में मसूर दाल, रक्त पुष्प, रक्त चंदन, मिष्टान और द्रव्य को अच्छी तरह लपेट लें और उसे नदी में प्रवाहित करने दे। ऐसा करने से मांगलिक दोष के लक्षण खत्म हो जाते हैं।गर्म और ताजा भोजन मंगल मजबूत करता है साथ ही इससे आपकी मनोदशा और पाचन क्रिया भी सही रहती है, इसीलिए अपने खान-पान की आदतों में बदलाव करें।मंगल दोष से निबटने का सबसे आसान उपाय है, हनुमान जी की नियमित रूप से उपासना करना। यह मंगल दोष को खत्म करने में सहायक होता है।कई लोग मंगल दोष के निवारण के लिए मूँगा भी धारण करते हैं। रत्न जातक की कुंडली में मंगल के प्रभाव के अनुसार पहना जाता है
किसी भी युवक या युवती की कुंडली में मंगल दोष का पता लगने पर घरवाले अनगिनत पंडितों के चक्कर में पड़ न जाने कितने उपाय करते हैं जिससे वे अपने पैसे और समय दोनों का नुक्सान करते हैं। यहाँ-वहां भटकने की जगह ज़रूरत होती है तो किसी अनुभवी ज्योतिष से परामर्श लेकर उपाय करने की। किसी मांगलिक व्यक्ति को एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जीने के लिए मंगल दोष की शांति करना बेहद जरूरी होता है।
कुण्डली में दोष विचार-
विवाहके लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए.
कन्या की कुण्डली में वैधव्य योग , व्यभिचार योग, नि:संतान योग, मृत्यु योग एवं दारिद्र योग हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.
इसी प्रकार वर की कुण्डली में अल्पायु योग, नपुंसक योग, व्यभिचार योग, पागलपन योग एवं पत्नी नाश योग ..रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.
हालाँकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है।
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Kundali milan कुंडली मिलान में दोषों का परिहार (काट) गण दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष, मंगल दोष Manglik dosha cancellation, Nadi dosha cancellation, Bhakoot dosha cancellation
कुंडली-मिलान में दोषों का परिहार (काट) कैसे होती है, मांगलिक दोष, गण दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष, मंगल दोष आदि ज्योतिष में महादोष कहे गए हैं, कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह…
Mangalik Dosh Upay Remedies (मंगल दोष के सही और लाभकारी उपाय)
: मंगल दोष :कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल होता है तब मंगलिक दोष लगता है, इस दोष को विवाह के लिए अशुभ माना जाता है, अगर किसी जातक की कुंडली में मंगल दोष है तो उसकी शादी मांगलिक से ही करनी चाहिए। ऐसा संभव ना होने पर ‘पीपल' विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके जातक की शादी अच्छे ग्रह योगों वाले जातक से करा देनी चाहिए। मंगल दोष में भी लग्न और अष्टम भाव का दोष ज्यादा गंभीर होता हैमंगल दोष की मान्यताएं –वैवाहिक जीवन में एक व्यक्ति मंगली हो और दूसरा न हो तो दूसरे की मृत्यु तक हो सकती है,पति-पत्नी के बीच में हिंसा हो सकती है, पति-पत्नी में से कोई एक मंगली हो तो दूसरा
कुंडली मिलान और दोष : कारण और परिहार
कम्पयूटर का कार्य है सिर्फ गणित(Calculations) करना, जन्मकुंडली देखने का कार्य ज्योतिष के ज्ञाता का है कम्पयूटर मानव कार्यों का एक सर्वोतम सहायक जरूर है, परंतु मानव नहीं इसलिए कम्पयूटर का उपयोग करें तो सिर्फ जन्मकुंडली निर्माण हेतु न कि कम्पयूटर द्वारा दर्शाई गई गुण मिलान संख्या को आधार मानकर कोई अंतिम निर्णय लिया जाए कुंडली मिलान और भकूट दोष : कारण और परिहार Kundali milan aur bhakut dosh parihar
कुंडली-मिलान में दोषों का परिहार (काट) कैसे होती है,
मांगलिक दोष, गण दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष, मंगल दोष आदि ज्योतिष में महादोष कहे गए हैं, कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह पैमाना बिलकुल गलत है, कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ, सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढ़ना चाहिए |
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आजकल आँख मूंदकर यही देखा है कि गुण कितने मिल रहे हैं और जातक मांगलिक है या नहीं बस इसके बाद सब कुछ तय हो जाता है
यदि हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो अधिकतर कुंडलियों में गुण मिलान दोषों या मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है अर्थात अधिकतर दोष कैंसिल हो जाते हैं लेकिन इतना समय कौन बर्बाद करें,
मैने अपनी ज्योतिष की प्रैक्टिस के दौरान कुंडली मिलान के ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही 25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले। अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक, मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम।
कुंडली मिलान और भकूट दोष:
भकूट दोष दाम्पत्य जीवन की जीवनश्ौली, सामाजिकता, सुख-समृद्धि, प्रेम-व्यवहार, वंशवृद्धि आदि को प्रभावित करता है। परन्तु इसका शास्त्र सम्मत परिहार (काट) यदि वर वधू की कुंडली में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.
दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.
तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।
वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि
राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है |
अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है
भकूट दोष का प्रभाव
भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है।
द्विद्वार्दश भकूट में विवाह करने सेे निर्धनता होता है।
नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के कारण कष्ट होता है।
षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ शारीरिक कष्ट की संभावना होती है।
भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है।
इन स्थितियों में भकूट दोष नहीं लगता है:—–
1. यदि वर-वधू दोनों के राशीश आपस में मित्र हों।
2. यदि दोनों के राशीश एक हों।
3. यदि दोनों के नवमांशेश आपस में मित्र हों।
4. यदि दोनों के नवमांशेश एक हो।
परिहार (काट) यदि वर-वधू की कुंडली में उपलब्ध हो तो दोष का निवारण हो जाता है।
• मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
• वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,
• जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है।
विवाह के वक्त यदि कुंडली में भकूट दोष हो तो भावी दम्पति का गुण मेलापक मान्य नहीं होता है, इसका मुख्य कारण यह है कि 36 गुणों में से भकूट के लिए 7 गुण निर्धारित हैं।
भकूट दोष का प्रभाव
द्विर्द्वादश भकूट में विवाह करने का फल निर्धनता होता है।
नव-पंचम भकूट में विवाह करने सेे संतान के कारण कष्ट होता है।
षडाष्टक भकूट दोष के कारण विविध प्रकार के कष्टों के साथ शारीरिक कष्ट की संभावना होती है।
भकूट के आधार पर विवाह की शुभाशुभता शुद्ध भकूट और नाड़ी दोष रहित 18 से अधिक गुण हों तो विवाह शुभ मान्य होता है।
अशुद्ध भकूट (द्विर्द्वादश, नवपंचम, षड़ाष्टक) होने पर भी यदि मित्र भकूट की श्रेणी में हो तो 20 से अधिक गुण होने पर विवाह श्रेष्ठ होता है।
शत्रु षड़ाष्टक (6-8) भकूट दोष होने पर विवाह नहीं करें। दाम्पत्य जीवन में अनिष्ट की संभावना रहेगी।
मित्र षड़ाष्टक भकूट दोष में भी पति-पत्नी में कलह होती रहती है। अत: षड़ाष्टक भकूट दोष में विवाह करने से बचना चाहिए।
नाड़ी दोष के साथ यदि षड़ाष्टक भकूट दोष (चाहे मित्र षड़ाष्टक हो अथवा दोनो की राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो) भी हो तो, विवाह कदापि नहीं करें। शुद्ध भकूट से गण दोष का परिहार स्वत: हो जाता है।
भकूट दोष परिहार
वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही हों या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो गणदोष एवं दुष्ट भकूट दोष नगण्य हो जाता है।दोनों की राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो अथवा उनके राशि स्वामियों में मित्रता होने पर विवाह की अनुमति दी जा सकती है।
वर-कन्या के राशि स्वामी एक ही ग्रह हों, राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता हो, परस्पर तारा शुद्धि हो,
राशि सबलता हो,
नवमांश पतियों में मित्रता हो तो
यह पांच प्रकार के परिहार भी दुष्ट भकूट दोष निवारक हैं। परन्तु इनमें परस्पर नाड़ी शुद्धि होना चाहिए।
नवपंचम व द्विर्द्वादश दुष्ट भकूट होने पर वर की राशि से गणना करने पर कन्या की राशि 5वीं हो तो अशुभ किन्तु 9वीं शुभ तथा वर से कन्या की राशि गणना में 2 हो तो अशुभ परन्तु 12वीं शुभ होती है। ऎसे में भकूट दोष होने पर भी विवाह श्रेष्ठ होता है।
मेष राशि
इस राशि के जातकों को वृष, मीन राशि से द्विर्द्वादश भकूट, सिंह, धनु से नव-पंचम और कन्या, वृश्चिक राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
वृष राशि
इस राशि के जातकों को मिथुन, मेष राशि से द्विर्द्वादश, कन्या, मकर से नव-पंचम और तुला, धनु राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
मिथुन राशि
इस राशि को कर्क, वृष राशि से द्विर्द्वादश, तुला, कुंभ से नव-पंचम और वृश्चिक, मकर राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कर्क राशि
इस राशि के जातकों को सिंह, मिथुन राशि से द्विर्द्वादश, वृश्चिक, मीन से नव-पंचम और धनु, कुंभ राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
सिंह राशि
इस राशि को कन्या, कर्क राशि से द्विर्द्वादश, धनु, मेष से नव-पंचम और मकर, मीन राशि के जातकों के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कन्या राशि
इस राशि के जातकों को तुला, çंसंह राशि से द्विर्द्वादश, मकर, वृष से नव-पंचम और कुंभ, मेष राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
तुला राशि
इस राशि के जातकों को वृश्चिक, कन्या राशि से द्विर्द्वादश, कुंभ, मिथुन से नव-पंचम और मीन, वृष राशि वाले जातकों के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य होगा।
वृश्चिक राशि
इस राशि के जातकों को धनु, तुला राशि से द्विर्द्वादश, मीन, कर्क से नव-पंचम और मेष व मिथुन राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
धनु राशि
इस राशि के जातकों को मकर, वृश्चिक राशि से द्विर्द्वादश, मेष, सिंह से नव-पंचम और वृष व कर्क राशि वालों के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य रहेगा।
मकर राशि
इस राशि के जातकों को कुंभ, धनु राशि से द्विर्द्वादश, वृष, कन्या से नव-पंचम और मिथुन व सिंह राशि के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
कुम्भ राशि
ऎसे जातकों को मीन, मकर राशि से द्विर्द्वादश, मिथुन, तुला से नव-पंचम और कर्क व कन्या राशि के जातक के साथ षडाष्टक भकूट दोष मान्य रहेगा।
मीन राशि
इन्हें मेष, कुंभ राशि से द्विर्द्वादश, कर्क, वृश्चिक से नव-पंचम और सिंह व तुला राशिं के साथ षडाष्टक भकूट दोष लगेगा।
उक्त वर्णित राशिगत भकूट दोष के परिहार स्वरूप यदि वर-कन्या दोनों का राशि स्वामी एक हो या दोनों के राशि स्वामियों में मैत्री भाव हो तो भकूट दोष समाप्त हो जाएगा और उनका मिलान शास्त्र सम्मत शुभ होता है।
कुंडली मिलान में एक से चार नंबर तक के दोषों का कुछ विशेष परिहार नहीं है, मुख्य रुप से गण मिलान से परिहार आरंभ होता है-
गण दोष का परिहार | Cancellation of Gana Dosha
यदि किन्हीं जन्म कुंडलियों में गण दोष मौजूद है तब सबसे पहले कुछ बातों पर ध्यान दें :
चंद्र राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता या राशि स्वामियों के नवांशपति में भिन्नता होने पर भी गणदोष नहीं रहता है.
ग्रहमैत्री और वर-वधु के नक्षत्रों की नाड़ियों में भिन्नता होने पर भी गणदोष का परिहार होता है.
यदि वर-वधु की कुंडली में तारा, वश्य, योनि, ग्रहमैत्री तथा भकूट दोष नहीं हैं तब किसी तरह का दोष नहीं माना जाता है.
भकूट दोष का परिहार | Cancellation of Bhakut Dosha
भकूट मिलान में तीन प्रकार के दोष होते हैं. जैसे षडाष्टक दोष, नव-पंचम दोष और द्वि-द्वार्दश दोष होता है. इन तीनों ही दोषों का परिहार भिन्न – भिन्न प्रकार से हो जाता है.
षडाष्टक परिहार | Cancellation of Sashtak
यदि वर-वधु की मेष/वृश्चिक, वृष/तुला, मिथुन/मकर, कर्क/धनु, सिंह/मीन या कन्या/कुंभ राशि है तब यह मित्र षडाष्टक होता है अर्थात इन राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र होते हैं. मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ माना जाता है.
यदि वर-वधु की चंद्र राशि स्वामियों का षडाष्टक शत्रु वैर का है तब इसका परिहार करना चाहिए.
मेष/कन्या, वृष/धनु, मिथुन/वृश्चिक, कर्क/कुंभ, सिंह/मकर तथा तुला/मीन राशियों का आपस में शत्रु षडाष्टक होता है इनका पूर्ण रुप से त्याग करना चाहिए.
यदि तारा शुद्धि, राशियों की मित्रता हो, एक ही राशि हो या राशि स्वामी ग्रह समान हो तब भी षडाष्टक दोष का परिहार हो जाता है
नव पंचम का परिहार | Cancellation of Navpanchak
नव पंचम दोष का परिहार भी शास्त्रों में दिया गया है. जब वर-वधु की चंद्र राशि एक-दूसरे से 5/9 अक्ष पर स्थित होती है तब नव पंचम दोष माना जाता है. नव पंचम का परिहार निम्न से हो जाता है.
यदि वर की राशि से कन्या की राशि पांचवें स्थान पर पड़ रही हो और कन्या की राशि से लड़के की राशि नवम स्थान पार पड़ रही हो तब यह स्थिति नव-पंचम की शुभ मानी गई है.
मीन/कर्क, वृश्चिक/कर्क, मिथुन/कुंभ और कन्या/मकर यह चारों नव-पंचम दोषों का त्याग करना चाहिए.
यदि वर-वधु की कुंडली के चंद्र राशिश या नवांशपति परस्पर मित्र राशि में हो तब नव-पंचम का परिहार होता है.
द्वि-द्वार्दश योग का परिहार | Cancellation of Dwi-Dwardasha Dosha
लड़के की राशि से लड़की की राशि दूसरे स्थान पर हो तो लड़की धन की हानि करने वाली होती है लेकिन 12वें स्थान पर हो तब धन लाभ कराने वाली होती है.
द्वि-द्वार्द्श योग में वर-वधु के राशि स्वामी आपस में मित्र हैं तब इस दोष का परिहार हो जाता है.
मतान्तर से सिंह और कन्या राशि द्वि-द्वार्दश होने पर भी इस दोष का परिहार हो जाता है.
नाड़ी दोष का परिहार |
Cancellation of Nadi Dosha
नाड़ी दोष का कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है. आइए विस्तार से जानें :-
वर तथा वधु की एक ही राशि हो लेकिन नक्षत्र भिन्न तब इस दोष का परिहार होता है.
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चंद्र राशि भिन्न हो तब परिहार होता है.
दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चरण भिन्न हों तब परिहार होता है.
शास्त्रानुसार नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गणा दोष वैश्यों के लिए और योनि दोष शूद्र जाति के लिए देखा जाता है.
ज्योतिष चिन्तामणि के अनुसार
रोहिणी, मृ्गशिरा, आर्द्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण, रेवती तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र होने पर नाड़ी दोष नहीं माना जाता है.
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विवाह में वर-वधू के गुण मिलान में नाड़ी का सर्वाधिक महत्त्व को दिया गया है। 36 गुणों में से नाड़ी के लिए सर्वाधिक 8 गुण निर्धारित हैं। ज्योतिष की दृष्टि में तीन नाडियां होती हैं – आदि, मध्य और अन्त्य। *इन नाडियों का संबंध मानव की शारीरिक धातुओं से है।* वर-वधू की समान नाड़ी होने पर दोषपूर्ण माना जाता है तथा संतान पक्ष के लिए यह दोष हानिकारक हो सकता है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि: “नाड़ी दोष केवल ब्रह्मण वर्ग में ही मान्य है।”
“समान नाड़ी होने पर पारस्परिक विकर्षण तथा असमान नाड़ी होने पर आकर्षण पैदा होता है।” आयुर्वेद के सिद्धांतों में भी तीन नाड़ियाँ – वात (आदि ), पित्त (मध्य) तथा कफ (अन्त्य) होती हैं। शरीर में इन तीनों नाडियों के समन्वय के बिगड़ने से व्यक्ति रूग्ण हो सकता है।
भारतीय ज्योतिष में नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं।
9-नौ नक्षत्रों की एक नाड़ी होती है।
जो इस प्रकार है।
आदि नाड़ी अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद ।.
मध्य नाड़ी👉 भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद
अन्त्य नाड़ी कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती ।
नाड़ी के तीनों स्वरूपों आदि, मध्य और अन्त्य ..आदि नाड़ी ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। यही नाड़ी मानव शरीर की संचरना की जीवन गति को आगे बढ़ाने का भी आधार है।
सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी और ब्रह्म नाड़ी” जिसे इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा के नाम से भी जानते हैं। कालपुरुष की कुंडली की संरचना बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों तथा योगो करणों आदि के द्वारा निर्मित इस “शरीर में नाड़ी का स्थान सहस्रार चक्र के मार्ग पर होता है।” यह विज्ञान के लिए अब भी “पहेली”-बना हुआ है कि नाड़ी दोष वालों का ब्लड प्राय: ग्रुप एक ही होता है । और “ब्लड ग्रुप” एक होने से रोगों के “निदान, चिकित्सा, उपचार” आदि में समस्या आती हैं।
इड़ा, पिंगला, और सुसुम्णा*
हमारे मन मस्तिष्क और सोच का प्रतिनिधित्व करती है ।
यही सोच और वंशवृद्धि का द्योतक “नाड़ी” हमारे दांपत्य जीवन का आधार स्तंभ है। अत: नाड़ी दोष को आप गंभीरता से देखें। यदि एक नक्षत्र के एक ही चरण में वर कन्या का जन्म हुआ हो तो नाड़ी दोष का परिहार संभव नहीं है।
और यदि परिहार है भी तो जन मानस के लिए असंभव है। ऐसा देवर्षि नारदने भी कहा है।
एक नाड़ी विवाहश्च गुणे:
सर्वें: समन्वित: l
वर्जनीभ: प्रयत्नेन
दंपत्योर्निधनं ll
अर्थात वर -कन्या की नाड़ी एक ही हो तो उस विवाह वर्जनीय है। भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।
पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही “कुण्डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्त सुखमय गृहस्थ जीवन व्यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इन में से एक ..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।
ऐसी लोक चर्चा है कि वर कन्या की नाड़ी एक हो तो पारिवारिक जीवन में अनेक बाधाएं आती हैं और संबंधों के टूटने की आशंका या भय मन में व्याप्त रहता है. कहते हैं कि यह दोष हो तो संतान प्राप्ति में विलंब या कष्ट होता है, पति-पत्नी में परस्पर ईर्ष्या रहती है और दोनों में परस्पर वैचारिक मतभेद रहता है.*
नब्बे प्रतिशत लोगों का एकनाड़ी होने पर ब्लड ग्रुप समान और आर एच फैक्टर अलग होता है यानि एक का पॉजिटिव तो दूसरे का ऋण होता है. हो सकता है इसलिए भी संतान प्राप्ति में विलंब या कष्ट होता है।
चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक शोधों में भी समान ब्लड ग्रुप वाले युवक युवतियों के संबंध को स्वास्थ्य की दृष्टि से अनपयुक्त पाया गया है। चिकित्सकों का मानना है कि यदि लड़के का आरएच फैक्टर RH+ पॉजिटिव हो व लड़की का RH- आरएच फैक्टर निगेटिव हो तो विवाह उपरांत पैदा होने वाले बच्चों में अनेक विकृतियाँ सामने आती हैं, जिसके चलते वे मंदबुद्धि व अपंग तक पैदा हो सकते हैं। वहीं रिवर्स केस में इस प्रकार की समस्याएँ नहीं आतीं, इसलिए युवा अपना रक्तपरीक्षण अवश्य कराएँ, ताकि पता लग सके कि वर-कन्या का रक्त समूह क्या है।* चिकित्सा विज्ञान अपनी तरहसे इस दोष का परिहार करता है, लेकिन “ज्योतिष” ने इस समस्या से बचने और उत्पन्न होने पर नाड़ी दोष के उपाय निश्चित किए हैं । इन उपायों में जप-तप, दान पुण्य, व्रत, अनुष्ठान आदि साधनात्मक उपचारों को अपनाने पर जोर दिया गया है ।
शास्त्र वचन यह है कि-
*एक ही नाड़ी होने पर
“गुरु और शिष्य”*
“मंत्र और साधक”
“देवता और पूजक” में भी क्रमश: †ईर्ष्या, †अरिष्ट और †मृत्यु” जैसे कष्टों का भय रहता है l*
देवर्षि नारद ने भी कहा है :-
वर-कन्या की नाड़ी एक ही हो तो वह विवाह वर्जनीय है. भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से तो पति-पत्नी के स्वास्थ्य और जीवनके लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है ।
ll वेदोक्त श्लोक ll
〰〰〰〰〰
अश्विनी रौद्र आदित्यो,
अयर्मे हस्त ज्येष्ठयो l
निरिति वारूणी पूर्वा
आदि नाड़ी स्मृताः ll
भरणी सौम्य तिख्येभ्यो,
भग चित्रा अनुराधयो l
आपो च वासवो धान्य
मध्य नाड़ी स्मृताः ll
कृतिका रोहणी अश्लेषा,
मघा स्वाती विशाखयो।
विश्वे श्रवण रेवत्यो,
*अंत्य नाड़ी* स्मृताः॥
आदि नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम: 01, 06, 07, 12, 13, 18, 19, 24, 25 वें नक्षत्र आते हैं।
—+—+—+—
मध्य नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र
क्रम : 02, 05, 08, 11, 14, 17, 20, 23, 26 नक्षत्र आते हैं।
—+—+—+—
अन्त्य नाड़ी* के अंतर्गत क्रम : 03, 04, 09, 10, 15, 16, 21, 22, 27 वें नक्षत्र आते हैं ।
—+—+—+—
गण :-
〰〰〰
अश्विनी मृग रेवत्यो,
हस्त: पुष्य पुनर्वसुः।
अनुराधा श्रुति स्वाती,
कथ्यते *देवता-गण* ॥
त्रिसः पूर्वाश्चोत्तराश्च,
तिसोऽप्या च रोहणी ।
भरणी च मनुष्याख्यो,
गणश्च कथितो बुधे ॥
कृतिका च मघाऽश्लेषा,
विशाखा शततारका ।
चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठा,
च मूलं रक्षोगणः स्मृतः॥
*देव गण- नक्षत्र :- 01, 05, 27, 13, 08, 07, 17, 22, 15*
*मनुष्य गण-नक्षत :- 11, 12, 20, 21, 25, 26, 06, 04.*
*राक्षस गण- नक्षत्र क्रम:- 03, 10, 09, 16, 24, 14, 18, 23, 19.*
*स्वगणे परमाप्रीतिर्मध्यमा देवमर्त्ययोः।
*मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देव रक्षसोः॥
*”संगोत्रीय विवाह” को कराने के लिए कर्म कांडों में एक विधान है, जिसके चलते संगोत्रीय लड़के का दत्तक दान करके विवाह संभव हो सकता है ।
इस विधान में जो माँ-बाप लड़के को गोद लेते हैं। विवाह में उन्हीं का नाम आता है।
वहीं ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष के अनुरूप यदि एक ही रक्त समूह वाले वर-कन्या का विवाह करा दिया जाता है तो उनकी होने वाली संतान विकलांग पैदा हो सकती है।*
अत: नाड़ी दोष का विचार ही आवश्यक है.*
एक नक्षत्र में जन्मे वर कन्या के मध्य नाड़ी दोष समाप्त हो जाता है लेकिन नक्षत्रों में चरण भेद आवश्यक है.
ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनसे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।
जैसे दोनों की राशि एक हो लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों.
वर-कन्या का नक्षत्र एक हो और चरण अलग-अलग हों.
उदाहरण:-
वर-ईश्वर (कृतिका द्वितीय),
वधू-उमा (कृतिका तृतीया)
दोनों की अंत्य नाड़ी है। परंतु कृतिका नक्षत्र के चरण भिन्नता के कारण शुभ है।
एक ही नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों:– यह निम्न नक्षत्रों में होगा l*
आदि नाड़ी
*वर*- आर्द्रा, (मिथुन),
*वधू*- पुनर्वसु, प्रथम, तृतीय चरण (मिथुन),
*वर* उत्तरा फाल्गुनी (कन्या)- *वधू*- हस्त (कन्या राशि).
*मध्य नाड़ी *वर*- शतभिषा (कुंभ)- *वधू*- पूर्वाभाद्रपद प्रथम, द्वितीय, तृतीय (कुंभ)
*अन्त्य नाड़ी: *वर*- कृतिका- प्रथम, तृतीय, चतुर्थ (वृष)-
*वधू*- रोहिणी (वृष)
*वर*- स्वाति (तुला)- *वधू*-विशाखा- प्रथम, द्वितीय, तृतीय (तुला)
*वर*- उत्तराषाढ़ा- द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ (मकर)- *वधू*- श्रवण (मकर) —-
*एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो*
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
जैसे *वर अनिल*- कृतिका- प्रथम (मेष) तथा *वधू इमरती*-
कृतिका- द्वितीय (वृष राशि)। दोनों की अन्त्य नाड़ी है परंतु राशि भिन्नता के कारण शुभ पाद-वेध नहीं होना चाहिए.
वर-कन्या के नक्षत्र चरण “प्रथम और चतुर्थ” या
“द्वितीय और तृतीय” नहीं होने चाहिएं.
*उक्त परिहारों में यह ध्यान रखें कि वधू की जन्म राशि, नक्षत्र तथा नक्षत्र चरण, वर की राशि, नक्षत्र व चरण से पहले नहीं होने चाहिए।* “अन्यथा नाड़ी दोष परिहार होते हुए भी शुभ नहीं होगा ।”
*उदाहरण देखें :-*
1.वर- कृतिका- प्रथम (मेष), वधू- कृतिका द्वितीय (वृष राशि)-
2.शुभ वर- कृतिका- द्वितीय (वृष),
वधू-कृतिका- प्रथम (मेष राशि)- *अशुभ*
*वैसे तो वर कन्या के राशियों के* *स्वामी आपस में मित्र हो तो वर्ण दोष, वर्ग दोष, तारा दोष, योनि दोष, गण दोष भी …नष्ट हो जाता है.
*वर और कन्या की कुंडली में राशियों के स्वामी एक ही हो या मित्र हो* अथवा D-9 नवांश के स्वामी परस्पर मित्र हो या एक ही हो तो सभी “कूट-दोष” समाप्त हो जाते हैं.*
*नाड़ी दोष हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए. इससे दांपत्य जीवन में आ रहे सारे दोष समाप्त हो जाते हैं.*
नाड़ी दोष का उपचार:-
पीयूष धारा के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.
दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.
तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।
वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि
राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है |
अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है
पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही “कुण्डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्त सुखमय गृहस्थ जीवन व्यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इन में से एक ..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।
Mangalik dosh/Mangal dosh/Muja dosh
मांगलिक दोष
मांगलिक दोष को कुज दोष या मंगल दोष भी कहा गया है।
हिन्दू धर्म में विवाह के संदर्भ में यह दोष बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। सुखद विवाह के लिए अमंगलकारी कहे जाने वाले मंगल दोष के विषय में ऐसी मान्यता है कि जिस व्यक्ति कि कुंडली में मंगल दोष हो उसे मंगली जीवनसाथी की ही तलाश करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि यदि युवक और युवती दोनों की कुंडली में मंगल दोष की तीव्रता समान है तो ही दोनों को एक दूसरे से विवाह करना चाहिए। अन्यथा इस दोष की वजह से पति-पत्नी में से किसी एक की मृत्यु भी हो सकती है।
किसी भी स्त्री या पुरुष के मांगलिक होने का मतलब यह है कि उसकी कुण्डली में मंगल ग्रह अपनी प्रभावी स्थिति में है। विवाह के लिए कुंडली मिलान करते समय मंगल को 1, 4, 7वें, 8वें और 12वें भाव पर देखा जाता है। यदि कुंडली में मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो जातक को मंगल दोष लगता है। जबकि सामान्य तौर पर इन सब में से केवल 8वां और 12वां भाव ही खराब माना जाता है।
पहला स्थान अर्थात लग्न का मंगल किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को और ज्यादा तेज बना देता है, चौथे स्थान का मंगल किसी जातक की पारिवारिक जीवन को मुश्किलों से भर देता है। मंगल यदि 7वें स्थान पर हो तो जातक को अपने साथी या सहयोगी के साथ व्यव्हार में कठोर बना देता है। 8वें और 12वें स्थान पर यदि मंगल है तो यह शारीरिक क्षमताओं और आयु पर प्रभाव डालता है। यदि इन स्थानों पर बैठा मंगल अच्छे प्रभाव में हो तो जातक के व्यवहार में मंगल ग्रह के अच्छे गुण आएंगे और यदि यह खराब प्रभाव में हैं तो जातक पर खराब गुण आएंगे।
मांगलिक दोष के प्रकार
उच्च मंगल दोष – यदि मंगल ग्रह किसी जातक के जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली में 1, 2, 4, 7, 8वें या 12वें स्थान पर होता है, तो इसे “उच्च मांगलिक दोष” माना जाएगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
निम्न मंगल दोष – यदि मंगल ग्रह किसी जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली में से किसी एक में भी 1, 2, 4, 7, 8वें या 12वें स्थान पर होता है, तो इसे “निम्न मांगलिक दोष” या “आंशिक मांगलिक दोष” माना जाएगा। कुछ ज्योतिषियों के अनुसार 28 वर्ष की आयु होने के बाद यह दोष अपने आप आपकी कुंडली से समाप्त हो जाता है।
मांगलिक व्यक्ति का स्वभाव
मांगलिक व्यक्ति के स्वभाव में आपको कुछ विशेषताएं देखने को मिल सकती हैं, जैसे इस तरह के व्यक्ति दिखने में कठोर निर्णय लेने वाले और बोली में भी कठोर होते हैं। ऐसे लोग लगातार काम करते रहने वाले होते हैं, साथ ही यह किसी भी काम को योजनाबद्ध तरीके से करना पसंद करते हैं। मांगलिक लोग अपने विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होते हैं। ये लोग कठोर अनुशासन बनाते हैं और उसका पालन भी करते हैं। मांगलिक व्यक्ति एक बार जिस काम में जुट जाये उसे अंत तक पूरा कर के ही दम लेता है। ये न तो लड़ाई से घबराते हैं और न ही नए अनजाने कामों को हाथ में लेने से। अपनी इन्हीं कुछ विशेषताओं की वजह से गैर मांगलिक व्यक्ति ज्यादा समय तक मांगलिक व्यक्ति के साथ नहीं रह पाता है।
मंगल दोष से जुड़े मिथक
मंगल दोष के विषय में ज्यादा जानकारी न होने के कारण कई लोग अनेकों तरह की बातें करते हैं, जिसकी वजह से समाज में मंगल दोष से जुड़े कुछ मिथक भी हैं।
यदि मांगलिक और अमांगलिक की शादी कराई जाती है तो उनका तलाक निश्चित है। यह एक ऐसा मिथक है जो अक्सर सुनने में आता है, जबकि हम सभी जानते हैं कि किसी भी शादी को चलाने की ज़िम्मेदारी लड़का और लड़की की समझदारी और उनके के विचारों के मेल-जोल पर निर्भर करती है।
मंगल दोष से जुड़ा एक मिथक यह भी है कि यदि आप एक मांगलिक हैं, तो आपको पहले किसी पेड़ से विवाह करनी होगी। मंगल दोष से छुटकारा पाने के अनेकों उपाय हैं और वह उपाय आपकी कुंडली की सही गणना करने के बाद ही बताये जा सकते हैं इसीलिए यह जरूरी नहीं कि सभी मांगलिक युवक/युवतियों को पेड़ से ही शादी करनी पड़े।
कुछ लोग यह समझते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मंगलवार को पैदा हुआ है तो वह पक्का मांगलिक हैं जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। मंगल दोष का पता कुंडली देखने के बाद ही लगाया जा सकता है। इसका किसी भी दिन पैदा होने से कोई संबंध नहीं होता है।
मंगल दोष का निवारण
यदि किसी जातक की कुंडली में मांगलिक दोष के लक्षण मिलते हैं तो उन्हें किसी अनुभवी ज्योतिषी से सलाह करके ही मंगल दोष के निवारण की पूजा करनी चाहिए। अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) में मंगल दोष की पूजा का विशेष महत्व है। यदि यह पूजा अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की जाये तो यह जातक पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है। मंगल दोष निवारण के लिए ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसे नियम बताए गए हैं जिससे शादीशुदा जीवन में मांगलिक दोष नहीं लगता है।
वट सावित्री और मंगला गौरी का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला होता है। अगर अनजाने में किसी मांगलिक कन्या का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति हो जाता है जो दोष रहित हो तो दोष निवारण के लिए इन दोनों व्रत का अनुष्ठान करना बेहद लाभदायी होता है।
यदि किसी युवती की कुंडली में मंगल दोष पाया जाता है तो अगर वह विवाह से पहले गुप्त रूप से पीपल या घट के वृक्ष से विवाह कर लेती है और उसके बाद मंगल दोष रहित वर से शादी करती है तो किसी प्रकार का दोष नहीं लगता है।
प्राण प्रतिष्ठित किये हुए विष्णु प्रतिमा से विवाह के बाद अगर कन्या किसी से विवाह करती है, तब भी इस दोष का परिहार मान्य होता है।
ऐसा कहा जाता है कि मंगलवार के दिन व्रत रखने और हनुमान जी की सिन्दूर से पूजा करने और उनके सामने सच्चे मन से हनुमान चालीसा का पाठ करने से मांगलिक दोष शांत होता है।
कार्तिकेय जी की पूजा करने से भी इस दोष से छुटकारा मिलता है।
लाल रंग के वस्त्र में मसूर दाल, रक्त पुष्प, रक्त चंदन, मिष्टान और द्रव्य को अच्छी तरह लपेट लें और उसे नदी में प्रवाहित करने दे। ऐसा करने से मांगलिक दोष के लक्षण खत्म हो जाते हैं।गर्म और ताजा भोजन मंगल मजबूत करता है साथ ही इससे आपकी मनोदशा और पाचन क्रिया भी सही रहती है, इसीलिए अपने खान-पान की आदतों में बदलाव करें।मंगल दोष से निबटने का सबसे आसान उपाय है, हनुमान जी की नियमित रूप से उपासना करना। यह मंगल दोष को खत्म करने में सहायक होता है।कई लोग मंगल दोष के निवारण के लिए मूँगा भी धारण करते हैं। रत्न जातक की कुंडली में मंगल के प्रभाव के अनुसार पहना जाता है
किसी भी युवक या युवती की कुंडली में मंगल दोष का पता लगने पर घरवाले अनगिनत पंडितों के चक्कर में पड़ न जाने कितने उपाय करते हैं जिससे वे अपने पैसे और समय दोनों का नुक्सान करते हैं। यहाँ-वहां भटकने की जगह ज़रूरत होती है तो किसी अनुभवी ज्योतिष से परामर्श लेकर उपाय करने की। किसी मांगलिक व्यक्ति को एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जीने के लिए मंगल दोष की शांति करना बेहद जरूरी होता है।
कुण्डली में दोष विचार-
विवाहके लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए.
कन्या की कुण्डली में वैधव्य योग , व्यभिचार योग, नि:संतान योग, मृत्यु योग एवं दारिद्र योग हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.
इसी प्रकार वर की कुण्डली में अल्पायु योग, नपुंसक योग, व्यभिचार योग, पागलपन योग एवं पत्नी नाश योग ..रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.
हालाँकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है।
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Mangalik Dosh Upay Remedies (मंगल दोष के सही और लाभकारी उपाय)
: मंगल दोष :कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल होता है तब मंगलिक दोष लगता है, इस दोष को विवाह के लिए अशुभ माना जाता है, अगर किसी जातक की कुंडली में मंगल दोष है तो उसकी शादी मांगलिक से ही करनी चाहिए। ऐसा संभव ना होने पर ‘पीपल' विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके जातक की शादी अच्छे ग्रह योगों वाले जातक से करा देनी चाहिए। मंगल दोष में भी लग्न और अष्टम भाव का दोष ज्यादा गंभीर होता हैमंगल दोष की मान्यताएं –वैवाहिक जीवन में एक व्यक्ति मंगली हो और दूसरा न हो तो दूसरे की मृत्यु तक हो सकती है,पति-पत्नी के बीच में हिंसा हो सकती है, पति-पत्नी में से कोई एक मंगली हो तो दूसरा…
मांगलिक कुंडली का निर्णय बारिकी से किया जाना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में मांगलिक दोष निवारण के तरीके उपलब्ध हैं।
शास्त्रवचनों के जिस श्लोक के आधार पर जहां कोई कुंडली मांगलिक बनती है, वहीं उस श्लोक के परिहार (काट) के कई प्रमाण हैं। ज्योतिष और व्याकरण का सिध्दांत है कि पूर्ववर्ती कारिका से परवर्ती कारिका (बाद वाली) बलवान होती है। दोष के सम्बन्ध में परवर्ती कारिका ही परिहार है, इसलिये मांगलिक दोष का परिहार मिलता हो तो जरूर विवाह का फैसला किया जाना चाहिए। परिहार नहीं मिलने पर भी यदि मांगलिक कन्या का विवाह गैर मांगलिक वर से करना हो तो शास्त्रों मे विवाह से पूर्व “घट विवाह” का प्रावधन है। मांगलिक प्रभाव वाली कुंडली से भयभीत होने कि जरूरत नहीं है।
मुहूर्त दीपक', 'मुहूर्त पारिजात' तथा अन्य मानक ग्रंथों में मंगली योग या दोष के कुछ आत्म कुंडलीगत तथा कुछ पर कुंडलीगत परिहार बताए हैं। यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो और अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्न प्रकार हो, तो कुजदोष स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है :-
* यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो।
* यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो।
* यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो।
* मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो।
* यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो।
* यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा परकुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। कहा गया है -
शनि भौमोअथवा कश्चित् पापो वा तादृशो भवेत्।
तेष्वेव भवनेष्वेव भौम-दोषः विनाशकृत्॥
इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो कुजदोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।
सौभाग्य की सूचिका भी है मंगली कन्या?
कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्यभार्या तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।
ऐसा होने से नहीं लगता है वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष
1. मंगल दोष के परिहार स्वयं की कुंडली में (मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा)—जैसे शुभ ग्रहों का केंद्र में होना, शुक्र द्वितीय भाव में हो, गुरु मंगल साथ हों या मंगल पर गुरु की दृष्टि हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है।
2. वर-कन्या की कुंडली में आपस में मांगलिक दोष की काट- जैसे एक के मांगलिक स्थान में मंगल हो और दूसरे के इन्हीं स्थानों में सूर्य, शनि, राहू, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो दोष नष्ट हो जाता है।
3. मेष का मंगल लग्न में, धनु का द्वादश भाव में, वृश्चिक का चौथे भाव में, वृष का सप्तम में, कुंभ का आठवें भाव में हो तो भौम दोष नहीं रहता।
4. कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है।
5. सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है।
6. कन्या की कुंडली में गुरू यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।
7. यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है।
8. कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है।
9. वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है।
10. जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व, उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का, वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा।
11. यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता।
मंगल के साथ चन्द्र गुरु शनि में से कोई भी एक ग्रह हो अथवा शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो ऐसी कुंडली में मंगल दोष किंचित मात्र भी नहीं रहता है।
मेष का मंगल लग्न में हो, वृश्चिक का चौथा, मीन का 7वां, कुंभ का 8वां, धनु का 12वां हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
यदि केंद्र त्रिकोण में गुरु हो या केंद्र में चन्द्रमा हो या 6-11वें भाव में राहु हो, मंगल के साथ राहु अथवा मंगल को गुरु देखता हो अथवा मंगल से दूसरा शुक्र हो तो मंगल शुभ होकर समृद्धिकारक हो जाता है।
गुरु बलवान हो, शुक्र लग्न अथवा 7वां हो, मंगल वक्री नीच या शत्रु के घर का हो या अस्त हो तो दोष नहीं होता है
मंगल दोष के उपाय
1. सबसे सरल उपाय है हनुमान जी की नियमित उपासना। यह मंगल के हर तरह के दोष तो खत्म करने में सहायक है।
2. हर मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाएं। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें।
3. लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है।
4. कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है।
5. सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है।
6. कन्या की कुंडली में गुरू यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मांगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।
7. यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है।
8. कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है।
9. वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है।
10. जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व, उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का, वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा।
11. यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता।
विवाह मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है।
माता-पिता के पश्च्यात व्यक्ति का निकटतम सम्बन्ध पत्नी या पति के साथ रहता है, इस सम्बन्ध का प्रभाव केवल मनुष्य के जीवन तक ही नहीं, बल्कि उसके वंश की आगामी कई पीढ़ियों तक चलता है, क्यों की संतान परम्परा में पूर्वजों के गुण-दोष किसी न किसी रूप में विद्दमान रहते है।
दो युगलों की कुंडली की ग्रह स्थिति और जन्मनक्षत्र के आधार पर उनकी प्रकृति एवं अभिरुचि में समानता तथा पूरक तत्व का विचार ही मेलापक कहा जाता है।समान स्वभाव एवं समान रूचि के लोगों में सहज ही प्रेम होता है। जो लोग एक दूसरे के पूरक होते हैं, अथवा यह कह सकते हैं कि एक-दूसरे पर आश्रित रहते हैं, उनका साथ लंबे समय तक चलता है। मेलापक में इसी समानता एवं पूरक तत्व का विचार किया जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि मेलापक ज्योतिष शास्त्र की वह रीति है, जिसके द्वारा किसी अपरिचित युगल की प्रकृति एवम् अभिरुचि की समानता तथा जीवन के विविध पहलुओं में उनके पूरक तत्व का विचार किया जाता है।
अतः विवाह संस्कार में बंधने से पूर्व वर एवं कन्या के जन्मकुण्डली के अनुसार गुण मिलान करके की परिपाटी है। गुण मिलान नहीं होने पर सर्वगुण सम्पन्न कन्या भी अच्छी जीवनसाथी सिद्ध नहीं होगी। गुण मिलाने हेतू मुख्य रूप से वर्णा आदि.. अष्टकूटों का मिलान किया जाता है।
इनके साथ-साथ लड़के की कुंडली से उसके स्वास्थ्य, शिक्षा, भाग्य, आयु, चरित्र एवं सन्तानोत्पादक-क्षमता का भी विचार करना आवश्यक है, वहीँ लड़की की कुण्डली से उसका स्वास्थ्य, स्वभाव, भाग्य, आयु, चरित्र एवं प्रजनन क्षमता का विचार करना भी आवश्यक होता हैं।
नक्षत्र मेलापक में प्रमुख रूप से निम्नलिखित 8 अष्टकूटों का विचार किया जाता है_
जैसे- (1) वर्ण, (2) वश्य, (3) तारा, (4) योनि, (5) ग्रह मैत्री, (6) गण, (7) भकूट एवं (8) नाड़ी। इन वर्ण आदि आठों अष्टकूटों के गुण या पूर्णाक भी क्रमशः 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 एवं 8 होते हैं। इनका कुल योग 36 होता है
जैसे_
अष्टकूट गुण
वर्ण 1
वश्य 2
तारा 3
योनि 4
ग्रह मैत्री 5
गण 6
भकूट 7
नाड़ी 8
_________________________
कुल योग= 36
_________________________
कुंडली में वर्ण विचार
ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियों को ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों में बांटा गया है। वर्ण के मिलान को व्यक्ति के विकास एवं जातीय कर्म का मापदंड माना जाता है। इससे व्यक्ति के वैवाहिक जीवन का विकास जाना जाता है। वैदिक ज्योतिष में 12 राशियों को कुल 4 वर्णो में समान रूप से विभाजित किया गया है जिसके कारण प्रत्येक वर्ण से संबंधित 3 राशियां होतीं हैं जो इस प्रकार हैं।
* ब्राह्मण वर्ण- कर्क,वृश्चिक तथा मीन राशि.
* क्षत्रिय वर्ण- मेष, सिंह तथा धनु राशि.
* वैश्य वर्ण- वृष, कन्या तथा मकर राशि.
* शुद्र वर्ण- मिथुन, तुला तथा कुंभ राशि.
इन सभी वर्णों में ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ तथा शूद्र सबसे निम्न माना जाता है। गुण मिलान के नियम के अनुसार यदि वर की चन्द्र राशि का वर्ण वधू की चन्द्र राशि के वर्ण से श्रेष्ठ अथवा समान हो तो वर्ण मिलान का 1 में से 1 अंक प्रदान किया जाता है तथा यदि वर की चन्द्र राशि का वर्ण वधू की चन्द्र राशि के वर्ण से निम्न हो तो वर्ण मिलान को अशुभ मानते हुए 1 में से 0 अंक प्रदान किया जाता है जिसके कारण वर्ण दोष बन जाता है जिसके कारण ऐसे वर वधू को वैवाहिक जीवन का सुख प्राप्त नहीं हो पाता जिसके पीछे वैदिक ज्योतिषियों की यह धारणा है कि वर का वर्ण वधू से श्रेष्ठ होने की स्थिति में ही वह अपनी वधू को नियंत्रित करने में तथा उसका मार्गदर्शन करनें में सफल हो पाता है।
कुंडली में वश्य विचार
जन्मकुण्डली में वश्य से यह जाना जाता है कि जातक के जीवन में परस्पर कितना प्रेम और आकर्षण होगा।
वश्य पाँच प्रकार के होते हैं_ (1)द्विपद, (2)चतुष्पद, (3)कीट, (4)वनचर तथा (5)जलचर ।
इन वश्यों को भी वर्णों की भांति ही श्रेष्ठता से निम्नता का क्रम दिया गया है। वर एवं कन्या की राशियों से उनके वश्य का निश्चय करके फिर उनके स्वभाव के अनुसार उनमें वश्यभाव, मित्रभाव, शत्रुभाव या भक्ष्य भाव पर ध्यान देना चाहिए।
गुण मिलान के नियम के अनुसार यदि वर की चन्द्र राशि का वश्य वधू की चन्द्र राशि के वश्य से श्रेष्ठ है तो वश्य मिलान के 2 में से 2 अंक प्रदान किये जाते हैं तथा वर का वश्य वधू के वश्य से निम्न होने की स्थिति में ये अंक उसी अनुपात में कम होते जाते हैं जिस अनुपात में वर का वश्य कन्या के वश्य से निम्न होता जाता है तथा इस क्रम में वर का वश्य कन्या के वश्य से बहुत निम्न तथा निम्नतम होने की स्थिति में वश्य मिलान के लिए क्रमश आधा तथा 0 अंक प्रदान किया जाता है जिसके कारण वश्य दोष बन जाता है जिसके कारण ऐसे वर वधू के वैवाहिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं आतीं हैं।
* मेष, वृ्ष, सिंह व धनु का उत्तरार्ध तथा मकर का पूर्वार्द्ध चतुष्पाद संज्ञक होते हैं।
सिंह राशि चतुष्पाद होते हुए भी वनचर मानी गई है।
* मिथुन, कन्या, तुला, धनु का पूर्वार्द्ध तथा कुंभ राशि द्विपद या मानव संज्ञक मानी गई हैं।
* मकर का उत्तरार्द्ध, मीन तथा कर्क राशि जलचर होती हैं। इनमे कर्क राशि जलचर होते हुए भी किट मानी गई है।
इस प्रकार वर एवं कन्या के वश्य का निर्धारण उनकी राशि से कर लेना चाहिए।
कुंडली में तारा विचार
वर एवं कन्या की जन्मकुण्डली मिलाते समय तारा से भाग्य के बारे में जाना जाता है।
तारा नौ प्रकार की होती हैं।
जैसे- (1) जन्म, (2) सम्पत्, (3) विपत्, (4) क्षेम, (5) प्रत्यरि, (6)
साधक, (7) वध, (8) मित्र एवं (9)अतिमित्र
* इनके मिलान से 3 अंक प्राप्त होता है। तारा के शुभ-अशुभ की जानकारी के लिए वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनकर प्राप्त संख्या में 9 का भाग दें जो संख्या शेष बची उस की तारा होगी, इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गिनकर तारा संख्या प्राप्त करें. कन्या के जन्म नक्षत्र से वर के जन्म नक्षत्र तक तथा वर के जन्म नक्षत्र से कन्या के जन्म नक्षत्र तक गिनें और दोनों संख्याओं को अलग -अलग 9 से भाग दें अगर शेष 3,5,7 हो तो तारा अशुभ अन्यथा शुभ होगी।
* ताराओं के नाम के अनुसार ही इनके फल हैं.(३) विपत्,(5)प्रत्यरि एवं (7) वध अपने नाम के अनुसार अशुभ है, तथा बाकी की तारा शुभ कही गई हैं। पहले वर एवं वधु की ताराओं का निर्धारण कर लेना चाहिए।
यदि दोनों प्रकार से तारा विपत, प्रत्यरि एवं वध ना हो तो तारा शुभ होती है तथा उसके पूरे तीन अंक माने जाते हैं. दोनों तारा अशुभ हो तो 0 गुण , दोनों शुभ हों तो 2 गुण ,एक अशुभ व दूसरी शुभ हों तो 1 गुण होता है ।
kundali milan
कुंडली में योनि विचार
योनि से वर-वधू की शारीरिक समानता के बारे में जाना जाता है (योनि का विचार न केवल वर-वधू के मेलापक में ही विचारणीय होता है, बल्कि यह साझेदारी, मालिक, नौकर एवं रजा तथा मंत्री के परस्पर मेलापक में भी विचारणीय है)।
जन्मकुण्डली के मिलान में योनि मिलान को 4 अंक प्राप्त हैं. शास्त्रों में लिखा है कि हम जब जन्म लेते हैं, तब किसी ना किसी योनि को लेकर आते हैं. व्यक्ति के स्वभाव तथा व्यवहार में उसकी योनि की झलक अवश्य दिखाई देती है. नक्षत्रों के आधार पर व्यक्ति की योनि ज्ञात की जाती है। कई योनियाँ एक-दूसरे की परम शत्रु होती हैं. जैसे मार्जार (बिल्ली) और मूषक (चूहा), गौ और व्याघ्र यह आपस में महावैर रखते हैं. इनका आपसी तालमेल कभी भी सही नहीं हो सकता है.इसलिए कुण्डली मिलाते समय हमें कोशिश करनी चाहिए कि वर तथा कन्या की योनियों का महावैर नहीं हो।
योनि विचार में पूर्ण शुभता के 4 अंक होते हैं।
समान योनि होने पर 4 अंक
मित्र योनि होने पर 3 अंक
समयोनि के 2 अंक
शत्रु योनि का 1 अंक अतिशत्रु योनि का 0 अंक माना जाता है।
योनियाँ 14 प्रकार की होती हैं ,
(1) अश्व, (2) गज, (3) मेष, (4) सर्प, (5) श्वान, (6) मार्जार, (7) मूषक, (8) गौ, (9) महिष, (10) व्याघ्र, (11) मृ्ग, (12) वानर, (13) नकुल एवं (14) सिंह।
योनि विचार में नक्षत्रों की संख्या 28 मानी गई हैं. इसमें अभिजित नक्षत्र को भी शामिल किया गया है. व्यक्ति के जन्म नक्षत्र के आधार पर उसकी योनि का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए. योनि विचार में समान योनि शुभ मानी गई हैं. मित्र योनि और भिन्न योनि भी ले सकते हैं परन्तु वैर (शत्रु योनि) योनि सर्वथा वर्जित है।
कुंडली में ग्रहमैत्रि विचार
मेलापक में ग्रहमैत्री का काफी महत्त्व है। जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में होता है, वह राशि तथा उसका स्वामी ग्रह ये दोनों व्यक्ति के सहज स्वभाव के परिचायक होते हैं। चंद्रमा मन का प्रतिनिधि ग्रह है। यह जन्मकाल में जिस राशि में स्थित होता है, व्यक्ति की मनोवृत्ति एवं स्वभाव भी वैसा ही बन जाता है। अनजान व्यक्तियों में मित्रता रहेगी या शत्रुता ? इसकी जानकारी ज्योतिष शास्त्र में उन व्यक्तियों के राशि स्वामियों की मित्रता या शत्रुता से जानी जाती है। एक ही राशि होने पर आपस में विचारों में भिन्नता नहीं रहती है. जीवन की गाडी़ सुचारु रुप से चलाने में सफलता मिलती है. कलह – क्लेश कम होते हैं. दोनों की चन्द्र राशियों के स्वामी यदि आपस में शत्रु भाव रखते हैं तब पारीवारिक जीवन में तनाव रहने की अधिक संभावना रहती है। यही कारण है कि वर-वधू के मेलापक में ग्रहमैत्री को इतना महत्त्व दिया गया है।
* जब वर तथा वधु की एक राशि हो या दोनों के राशि स्वामी मित्र हों तब पूरे पाँच अंक मिलते हैं।
* यदि एक का राशि स्वामी मित्र तथा दूसरे का सम है तब चार अंक मिलते हैं. दोनों के राशि स्वामी सम है तब तीन अंक मिलते हैं. एक की राशि का स्वामी मित्र तथा दूसरे का शत्रु है तब एक अंक मिलता है। एक सम और दूसरा शत्रु है तब आधा अंक मिलता है. यदि दोनों के राशि स्वामी आपस में शत्रु है तब शून्य अंक मिलता है।
कुंडली में गण विचार
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार हमारे गण का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है अर्थात जिस नक्षत्र में हमारा जन्म होता है उसके अनुसार हमारा गण निर्घारित होता है।
(1) देव गण_ अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण तथा रेवती
* स्वभाव
देवगण में उत्त्पन्न व्यक्ति स्वभावतः सात्विक होता है। इसमें भावुकता, उदारता, सहनशीलता, प्रेम, उपकार, दया, धैर्य, आत्मविश्वास, बन्धुत्व एवं लोकप्रियता पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है।
(2) मनुष्य गण_ भरणी, रोहिणी, आर्द्र, पूर्व फाल्गुणी, उत्तर फालगुणी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वभाद्रपद तथा उत्तरभाद्रपद
* स्वभाव
मनुष्य गण में उत्पन्न व्यक्ति चतुर, चैतन्य, दूरदर्शी, स्वाभिमानी, साहसी, अपने हित का चिंतक तथा अपने हित की रक्षा करने वाला, सौंदर्य प्रेमी, व्यवहार कुशल, सामाजिक कार्यकर्त्ता, प्रभावशाली, प्रतिष्ठा तथा यश चाहने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति भोगोपभोग, प्रभाव एवं प्रतिष्ठा को सर्वाधिक महत्व देने वाला होता है।
(3)राक्षस गण_ कृतिका, अश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा तथा शतभिषा
* स्वभाव
राक्षस गण में उत्पन्न व्यक्ति साहसी, क्रोधी, स्वार्थी, धूर्त, चालक, लोगों पे रौब ज़माने वाला, जिद्दी, लापरवाह, क्षणिक मति बलवान्, अभिमानी, कठोर एवं दृढ़भाषी, परनिंदक, उग्र, दृढ निश्चयी, एकाधिकार में विश्वास रखने वाला तथा अपनी इच्छा या अपने हित के लिए किसी को भी हानि पहुँचाने वाला होता है
इन गणों में से वर-वधू के गणों का परस्पर मिलान किया जाता है तथा इस मिलान के आधार पर इनको अंक प्रदान किये जाते हैं।
इस मिलान का विवरण इसप्रकार है।
* यदि वर तथा वधू दोनों के गण समान देव-देव, मानव-मानव अथवा राक्षस-राक्षस हों अथवा वर का गण देव तथा कन्या का गण मनुष्य हो तो ऐसे गण मिलान को उत्तम माना जाता है तथा इसके लिए 6 में से 6 अंक प्रदान किये जाते हैं। तो विवाह के लिए बहुत ही उत्तम स्थिति होती है।
* गण समान होने पर अगर आप शादी करते हैं तो पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम और तालमेल बना रहता है। गण मिलान में अगर एक का गण देव आता है और दूसरे का मनुष्य तब भी वैवाहिक सम्बन्ध हो सकता है इसमें भी विशेष परेशानी नहीं आती है इसे सामान्य की श्रेणी में रखा गया है। शास्त्रों के अनुसार देव और मनुष्य में सम्बन्ध बन सकता है।
यदि वर वधू दोनों के गण क्रमश: मनुष्य-देव हों तो ऐसे गण मिलान को सामान्य माना जाता है तथा इसके लिए 6 में से 5 अंक प्रदान किये जाते हैं।
यदि वर वधू दोनों के गण क्रमश: देव-राक्षस अथवा राक्षस-देव हों तो ऐसे गण मिलान को अशुभ माना जाता है तथा इसके लिए 6 में से 1 अंक प्रदान किया जाता है।
यदि वर वधू दोनों के गण क्रमश: मानव-राक्षस अथवा राक्षस-मानव हों तो ऐसे गण मिलान को अति अशुभ माना जाता है तथा इसके लिए 6 में से 0 अंक प्रदान किया जाता है। परंतु इनके लिए राक्षस गण वाले से विवाह को अशुभ बताया गया है। अगर आपकी कुण्डली में गणकूट राक्षस है तो राक्षस गणकूट वाले व्यक्ति से ही विवाह करने की सलाह दी जाती है ।
आइये जानते हैं गण मिलान में कैसे अंक प्राप्त होते हैं।
* वर-वधू दोनों के गणकूट देव -देव गण हों तो गुणांक 6-मिलता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर मनुष्य -मनुष्य हों तो गुणांक 6-प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर राक्षस-राक्षस हों तो गुणांक 6 प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर मनुष्य -देव हों तो गुणांक 5 प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर देव – मनुष्य हों तो गुणांक 5 प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर मनुष्य – राक्षस हों तो गुणांक 1 प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर राक्षस – मनुष्य हों तो गुणांक1 प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर देव – राक्षस हों तो गुणांक 0 प्राप्त होता है।
* वर-वधू दोनों के गणकूट अगर राक्षस – देव हों तो गुणांक 0 प्राप्त होता है।
गण दोष परिहार _
* दोनों के राशीश परस्पर मित्र हों।
* दोनों के राशीश एक हों।
* दोनों के नवमांशेश परस्पर मित्र हों।
* दोनों के नवमांशेश एक हो।
वर तथा वधू दोनों की चन्द्र राशि एक ही होने की स्थिति में गण दोष का परिहार माना जाता है जैसे कि यदि वर का जन्म नक्षत्र उत्तरफाल्गुनी है तथा वधू का नक्षत्र चित्रा है तथा दोनों की ही जन्म राशि अर्थात चन्द्र राशि कन्या है तो इस स्थिति में बनने वाला गण दोष प्रभावी नहीं माना जाता।
कुंडली में भकूट विचार
भकूट का तात्पर्य वर-वधू की राशियों के आपसी अंतर से है। भकूट अशुभ होने से वह जीवन में धन, संतान और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
यह 6 प्रकार का होता है।
(1) प्रथम- सप्तम
(2) द्वितीय-द्वादश / द्विर्द्वादश
(3) तृतीय-एकादश
4. चतुर्थ-दशम
5. पंचम-नवम / नवपंचम
6. षडाष्टक
इनमे द्विर्द्वादश, नवपंचम् एवं षडाष्टक ‘दुष्ट भकूट’ तथा शेष भकूट कहलाते हैं ।इनके रहने पर भकूट दोष माना जाता है।
भकूट की जानकारी का सीधा तरीका यह है कि वर की राशि से कन्या की राशि तक तथा कन्या की राशि से वर की राशि तक गिनती कर लेनी चाहिए। यदि इन दोनों की राशि आपस में दूसरे एवं बारहवें पड़ती हो तो द्विर्द्वादश भकूट होता है। यदि 9वीं या 5वीं पड़ती हो तो नव पंचम भकूट होता है और यदि छठे एवं 8वें पड़ती हो षडाष्टक भकूट होता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार
द्विर्द्वादश भकूट का दोष होने पर क्यों की दूसरा भाव धन का तथा बारहवां भाव खर्च का होता है जिससे की वर-वधू के खर्चे को बहुत बढ़ा देगा जिससे आर्थिक असंतुलन विगड़ा रहेगा। नव-पंचम भकूट दोष होने से दोनों को संतान पैदा करने में मुश्किल होती है या फिर सतान होती ही नहीं। षडाष्टक भकूट दोष होने पर वर-वधू के भावी जीवन में शत्रुता, विवाद, कलह एवं रोजाना के झगड़े-झंझट होते रहते हैं। न केवल जातक बल्कि नव-दंपत्ति में से किसी एक की हत्या या आत्महत्या होने की आशंका रहती है।
भकूट दोष निम्नलिखित स्थितियों में भंग माना जाता है_
* यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो भकूट दोष खत्म हो जाता है। जैसे कि मेष-वृश्चिक तथा वृष-तुला राशियों के एक दूसरे से छठे-आठवें स्थान पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि मेष-वृश्चिक दोनों राशियों के स्वामी मंगल हैं तथा वृष-तुला दोनों राशियों के स्वामी शुक्र हैं। इसी प्रकार मकर-कुंभ राशियों के एक दूसरे से द्वी-द्वादश स्थानों पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनताक्योंकि इन दोनों राशियों के स्वामी शनि हैं।
* यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों के स्वामी आपस में मित्र हैं तो भी भकूट दोष खत्म हो जाता है जैसे कि मीन-मेष तथा मेष-धनु में भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों ही उदाहरणों में राशियों के स्वामी गुरू तथा मंगल हैं जो कि आपसे में मित्र माने जाते हैं।
शुभ भकूट का फल_
मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,
जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है।
कुंडली में नाड़ी विचार
जैसे शारीर के वात, पित्त एवं कफ इन तिन दोषों की जानकारी नाड़ी स्पन्दन द्वारा होती है। ठीक उसी प्रकार दो अपिरिचित व्यक्तियों के मन की जानकारी आदि, मध्य एवम् अन्त नाड़ियों से की जा सकती है।संकल्प, विकल्प एवं क्रिया-प्रतिक्रिया करना मन के सहज कार्य हैं। इन तीनो की परिचायक उक्त तिन नाड़ियाँ होती है।
नाड़ियाँ 3 होती हैं_ आदि, मध्य एवम् अन्त्य
1- आदि नाड़ी-
अश्विनी, आर्द्रा पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी,हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पुर्वाभाद्रपद।
2- मध्य नाड़ी-
भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पुर्वाफाल्गुनी,चित्रा, अनुराधा, पुर्वाषाढा, धनिष्ठा, उत्तरासभाद्रपद।
3-अन्त्य नाड़ी- कृतिका, रोहिणी, अश्लेशा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा, श्रवण, रेवती आदि मध्य व अन्त्य नाड़ी का यह विचार सर्वत्र प्रचलित है, लेकिन कुछ स्थानों पर चर्तुनाड़ी एवं पंचनाड़ी चक्रभी प्रचलित है, लेकिन व्यावहारिक रुप से त्रिनाड़ी चक्र ही सर्वथा उपयुक्त जान पड़ता है।
नाड़ी दोष को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है, इसके बारे मे जानकारी हेतू त्रिनाड़ी स्वभाव की जानकारी होनी आवश्यकत है।आदि नाड़ी वात् स्वभाव की मानी गई है, मध्य नाड़ी पित स्वभाव की मानी गई है, जबकि मध्य नाड़ी पित् प्रति एवं अन्त्य नाड़ी कफ स्वभाव की। यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक ही हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि वात् स्वभाव के वर का विवाह यदि वात् स्वभाव की कन्या से हो तो उनमे चंचलता की अधिकता के कारण समर्पण व आकर्षण की भावना विकसित नहीं होती।
नाड़ी दोष होने पर यदि अधिक गुण प्राप्त हो रहें हो तो भी गुण मिलान को सही माना जा सकता, अन्यथा उनमें व्यभिचार का दोष पैदा होने की सभांवना रहती है। मध्य नाड़ी को पित स्वभाव की मानी गई है। इस लिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमे परस्पर अंह के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते। उनमें विकर्षण कि सभांवना बनती है। परस्पर लड़ाई -झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है। विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है।
इस प्रकार की स्थिति मे प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें, जिस प्रकार वात प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए वात नाड़ी चलने पर, वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है, अथवा कफ प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए कफ नाड़ी के चलने पर कफ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार मेलापक में वर-वधू की एक समान नाड़ी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मकताल-मेल में हानिकारक होने के कारण वर्जित किया जाता है।
लड़का- लड़की की एक समान नाड़ियां हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें आपसी सामंजस्य होने की संभावना न्यूनतम और टकराव की संभावना अधिकतम पाई जाती है, इसलिए मेलापक में आदि नाड़ी के साथ आदि नाड़ी का, मध्य नाड़ी के साथ मध्य का और अंत्य नाड़ी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है। जब कि ल़ड़का-लड़की की भिन्न-भिन्न नाड़ी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है। यदि वर एवं कन्या कि नाड़ी अलग-अलग हो तो नाड़ी शुद्धि मानी जाती है। यदि वर एवं कन्या दोनों का जन्म यदि एक ही नाड़ी मे हो तो नाड़ी दोष माना जाता है। सामान्य नाड़ी दोष होने पर ये उपाय दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।
विवाह के पश्चात् उत्पन्न संतान मे भी वात सम्भावना रहती है। इसी आधार पर आद्य नाड़ी वाले वर का विवाह आद्य नाड़ी की कन्या से वर्जित माना गया है, अन्यथा उनमें व्याभिचार का दोष पैदा होने की संभावना रहती है। मध्य नाड़ी को पित् स्वभाव की मानी गई है, इसलिए मध्य नाड़ी के वर का विवाह मध्य नाड़ी की कन्या से हो जाए तो उनमें परस्पर अहं के कारण सम्बंन्ध अच्छे नहीं बन पाते, उनमें विकर्षण की सम्भावना बनती है। परस्पर लड़ाई-झगड़े होकर तलाक की नौबत आ जाती है।
विवाह के पश्चात् संतान सुख कम मिलता है। गर्भपात की समस्या ज्यादा बनती है अन्त्य नाड़ी को कफ स्वभाव की मानी गई है, इसलिए अन्त्य नाड़ी के वर का विवाह यदि अन्त्य नाड़ी की महिला से हो तो उनमें कामभाव ( सेक्स )की कमी पैदा होने लगती है। शान्त स्वभाव के कारण उनमे परस्पर सामंजस्य का अभाव रहता है। दांपत्य मे गलतफहमी होना भी स्वभाविक होती है। एक नाड़ी होने पर विवाह न करना ही उचित माना जाता है। लेकिन नाड़ी दोष परिहार की स्थिति में यदि कुण्डली मिलान उत्तम बना रहा है, तो विवाह किया जा सकता है।
नाड़ी दोष परिहार
(1) वर-वधू की एक राशि हो, लेकिन जन्म नक्षत्र अलग-अलग हों या जन्म नक्षत्र एक ही हों परन्तु राशियां अलग हो तो नाड़ी नहीं होता है, यदि जन्म नक्षत्र एक ही हो, लेकिन चरण भेद हो तो अति आवश्यकता अर्थात् सगाई हो गई हो, एक दूसरे को पंसद करते हों तब इस स्थिति मे विवाह किया जा सकता है।
(2) विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवति, हस्त, स्वाति, आद्र्रा, पूर्वाभद्रपद इन 8 नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र मे वर कन्या का जन्म हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है।
(3) उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विषाख, आद्र्रा, श्रवण, पुष्य, मघा, इन नक्षत्र में भी वर कन्या का जन्म नक्षत्र पड़े तो नाड़ी दोष नही रहता है। उपरोक्त मत कालिदास का है।
(4) वर एवं कन्या के राशिपति यदि बुध, गुरू, एवं शुक्र में से कोई एक अथवा दोनों के राशिपति एक ही हो तो नाड़ी दोष नहीं रहता है।
(5) ज्योतिष के अनुसार-नाड़ी दोष विप्र वर्ण पर प्रभावी माना जाता है। यदि वर एवं कन्या दोनो जन्म से विप्र हो तो उनमें नाड़ी दोष प्रबल माना जाता है। अन्य वर्णो पर नाड़ी पूर्ण प्रभावी नहीं रहता। यदि विप्र वर्ण पर नाड़ी दोष प्रभावी माने तो नियम का हनन होता हैं। क्योंकि बृहस्पति एवं शुक्र को विप्र वर्ण का माना गया हैं। यदि वर कन्या के राशिपति विप्र वर्ण ग्रह हों, तो इसके अनुसार नाड़ी दोष नहीं रहता। विप्र वर्ण की राशियों में भी बुध व शुक्र राशिपति बनते हैं।
(6) सप्तमेश स्वगृही होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो एवं वर कन्या के जन्म नक्षत्र चरण में भिन्नता हो तो नाड़ी दोष नही रहता है। इन परिहार वचनों के अलावा कुछ प्रबल नाड़ी दोष के योग भी बनते हैं, जिनके होने पर विवाह न करना ही उचित हैं।
(7) यदि वर एवं कन्या की नाड़ी एक हो एवं निम्न में से कोई युग्म वर कन्या का जन्म नक्षत्र हो तो विवाह न करें ।
(8) आदि नाड़ी- अश्विनी-ज्येष्ठा, हस्त- शतभिषा, उ.फा.-पू.भा. अर्थात् यदि वर का नक्षत्र अश्विनी हो तो कन्या नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार कन्या नक्षत्र अश्विनी हो तो वर का नक्षत्र ज्येष्ठा होने पर भी प्रबल नाड़ी दोष होगा। इसी प्रकार आगे के युग्मों से भी अभिप्राय समझें।
(9) मध्य नाड़ी – भरणी-अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी-उतराफाल्गुनी, पुष्य-पूर्वाषाढा, मृगशिरा-चित्रा,चित्रा-धनिष्ठा,मृगशिरा-धनिष्ठा।
(10) अन्त्य नाड़ी – कृतिका-विशाखा, रोहिणी-स्वाति, मघा-रेवती; इस प्रकार की स्थिति में प्रबल नाड़ी दोष होने के कारण विवाह करते समय अवश्य ध्यान रखें।
सामान्य नाड़ी दोष होने पर किस प्रकार के उपाय करने चाहिए।
* वर एवं कन्या दोनों मध्य नाड़ी मे उत्पन्न हो तो पुरुष को प्राण भय रहता है। इसी स्थिति मे पुरुष को महामृत्यंजय जाप करना यदि अतिआवश्यक है। यदि वर एवं कन्या दोनो की नाड़ी आदि या अन्त्य हो तो स्त्री को प्राणभय की सम्भावना रहती है, इसलिए इस स्थिति मे कन्या महामृत्युजय अवश्य करे।
* नाड़ी दोष होने पर संकल्प लेकर किसी ब्राह्यण को गोदान या स्वर्णदान करना चाहिए 3- अपनी सालगिराह पर अपने वजन के बराबर अन्न दान करें, एवं साथ मे ब्राह्मण भोजन कराकर वस्त्र दान करें
* नाड़ी दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए अनुकूल आहार दान करें। अर्थात् आयुर्वेद के मतानुसार जिस दोष की अधिकतम बने उस दोष को दूर करने वाले आहार का सेवन करें * वर एवं कन्या मे से जिसे मारकेश की दशा चल रही हो उसको दशानाथ का उपाय दशाकाल तक अवश्य करना चाहिए।