गोचर-विचार

    गोचर-विचार
    प्रकरण १
    प्रस्तावना
    प्रत्येक मानव को अपनी जन्मकुंडली से भावी समय में होनेवालीघटनाएं तथा उन घटनाओं का निश्चित समय जानने की प्रबलइच्छा होती है। प्रत्येक ज्योतिषी जन्मकुंडली के बारह स्थानों के ग्रह,उनके परस्पर योग तथा षड्वर्गबल आदि का विचार कर उस मनुष्यको जीवन में कैसे फल मिलेंगे इस की रूपरेखा बना लेता है। फिर येफल जीवन में कब किस समय मिलेंगे यह बतानेका प्रयत्न करता है।फलज्योतिष शास्त्र में सबसे कठिन किन्तु महत्वपूर्ण बात काल निर्णयकी ही होती है। भविष्य की बातें ठीक बतलाना बड़ा कठिन है। इसविषय में टॉलेमी का कथन विचार करने योग्य है-Judgementmust be regulated by thyself as well as by science;for it is not possible that particular forms of eventsshould be declared by any person however scientific;science the understanding conceives only a certaingeneral idea of some sensible events and not itsparticular form. It is therefore necessary for him whopractices herein to adopt inference. They only whoare inspired by the deity can predict particulars.
    अर्थात किसी भी विषय का निर्णय शास्त्र के अनुसार उसी प्रकारतुम्हारी बुद्धि के अनुसार भी होना चाहिए। कोई मनुष्य कितना भीशास्त्रज्ञ हो उसके लिए भावी घटना के विशिष्ट स्वरूप या समय कावर्णन बतलाना संभव नही है। शास्त्र से किसी स्थूल बात की साधारणकल्पना मालूम होती है--इस का विशिष्ट स्वरूप मालूम नही होता।इसलिए जो भविष्य बतलाता है उसके लिए जरूरी है की वह अनुमान का सहारा ले। किसी घटना का विशिष्ट स्वरूप या समय वहीबतला सकता है जिसको कुछ दैवी प्रेरणा मिली हो। इस प्रकारज्योतिष में काल निर्णय ही सब से कठिन है। इसको साध्य करने केलिए ज्योतिषियों ने कई दृष्टियों से प्रयत्न किये है। हमारे पुरातनआचार्योंने ४२ प्रकार की दशाओं का वर्णन किया है, गोचर ग्रहों काफल बतलाया है, ताजिक, मुंथा, अंगिरस पद्धतियां बताई है। ग्रहों केभ्रमण (जन्मस्थ शनि से गोचर शनि कौनसे स्थानपर है, जन्मस्थ गुरसे गोचर गुरू कौनसे स्थान पर है इत्यादि) के फल बतलाये है। इनपर से कालनिर्णय करते है। पश्चिमी ज्योतिषी कई नई पद्धतियों काप्रयोग करते है। प्राईमरी डाईरेक्शन, सेकंडरी डाइरेक्शन, रैडिक्स,सिस्टिम, कार्टर की द्वादशांश पद्धति फ्रेकलन्ड की सप्तमांश पद्धतितथा एलन लिओ के प्रोग्रेस्ड होरोस्कोप (चतुर्थ भाग) की बहुतपद्धतियाँ इनका प्रयोग कालनिर्णय के लिए किया जाता है। महाराष्ट्रके ज्योतिषीयों की चर्चा-गोष्ठियों में भी गोचर पद्धति तथा पाश्चात्यदिनवर्षपद्धति का समन्वय करना चाहिए-इस के फल सही बताये जासकते है ऐसा विचार-प्रवाह है। इस प्रकार गोचर पद्धति का महत्वसभी को मान्य है। इसी विषय पर इस पुस्तक में अपने विचार प्रगटकरेंगे।
    प्रकरण २
    गोचर ग्रह राशि में गिनना चाहिए या लग्न से ?
    गोचर शब्द का अर्थ भ्रमण करेनवाले ग्रह ऐसा है। गो याने ग्रहऔर चर याने भ्रमण करेनवाले। ग्रह जिस राशि में भ्रमण करते हैउस के अनुसार मनुष्य को जीवन में कब कैसे फल मिलेंगे यह सूचितकिया जाता है। पुराने आचार्योंने जन्मकुण्डली में चन्द्र जिस राशि मेंहो उस रुशि को प्रधान माना है। तथा उस राशि से भ्रमण करनेवालेग्रह कितनै क्रमांक के स्थान पर है यह देख कर उस समय का     फलादेश निश्चित बताया जाता है। इसी लिए पत्रिका में जन्मकुण्डलीलिखने की पद्धति भी सैकडों वर्षों से चल रही है। यहां यह बातविचार करने योग्य है कि जन्म कुण्डली से पूरे जीवन में जन्म सेमृत्यु तक जो फल मिलेंगे उन्हे स्थूलतः जाना जाता है। जन्म के समयआकाश में कौनसे ग्रह कहां थे तथा उन का परस्पर संबंध क्या थातथा उन के कैसे फल मिलते है यह सब इस जन्मकुण्डली से ज्ञातहोता है। इस में प्रत्येक स्थान के जो निश्चित फल मालूम होते है वैसेराशि कुण्डली से नही मालूम होते है। अतः राशिकुण्डली का महत्त्वदूसरे दर्जे का है। समाज में बहुतसे लोगों को अपनी जन्म कुण्डलीमालूम नही होती। केवल नाम से राशि मालूम कर लेते है या कुण्डलीमें से सिर्फ राशि मालूम होती है। ऐसे लोगों का भविष्य जन्मकुण्डलीके फलादेश के समान ठीक ठीक नही बताया जा सकता। राशि सेबतलाये गए फल थोडे सही उतरते है--गलत ज्यादा सिद्ध होते है।समाचार पत्रों में जो राशि भविष्य छपते है उन का अनुभव ऐसा हीहै। इस का कारण यही है कि सिर्फ राशि से मूल जन्मकुण्डली केविभिन्न ग्रहयोगों का पता नही चलता। जन्मकुण्डली के अनुसारफलादेश अलग होता है तथा राशि के अनुसार फलादेश अलग होताहै। एक उदाहरण देखिए। मेष लग्न की किसी कुण्डली में चन्द्रमिथुन में है तथा शनि सिंह में है। अब गोचर शनि भी यदि सिंह मेंआता है तो केवल राशि से देखने पर यह शनि मिथुन राशि से तीसरेस्थान में है अतः शुभ फल मिलने चाहिये । तथा लग्न से पांचवे स्थानमें गोचर शनि है इस का फल अशुभ होता है। इन दोनों का प्रत्यक्षअनुभव यही देखने में आता है कि राशि से तृत्तीय शनि के शुभ फलकी अपेक्षा लग्न से पंचम शनि के अशुभ फल ही प्रभावी हुए। सबप्रकार से विचार करने पर केवल चन्द्र राशि से गोचर ग्रहों के फलठीक नही उतरते । जन्मकुण्डली से ही गोचर ग्रहों का विचार अनुभवसे सही मालूम पडता है।
    प्रकरण ३
    प्राचीन ग्रन्थों में गोचर प्रकरण
    ग्रह गोचर दर्पण, जातकाभरण, फलदीपिका आदि पुराने ग्रन्थों मेंइस विषय में बहुत संक्षिप्त अतएव पूरी तरह संतोष न देनेवाला वर्णनपाया जाता है। इस अध्याय में उसी का विवरण देते है।
    गोचर रवि फल
    सहज ३ दशम १० पष्ठे ६ लाभगे ११ याति सूर्ये।धनयशनृपमान्यं सर्वकार्येषु सिद्धिः ॥
    शुभमतिमखिलार्थ बन्ध्ुवर्गेउपि सौख्यम् ।उत सुखधनलाभ पुण्यवृद्धि करोति
    गोचर रवि ३-६-१०-११ इस स्थानों में होता है उस समय धन,कीर्ति, राजदरबार में सन्मान, सब कार्यों मे सफलता, अच्छी बुद्धि,स्वजन-संबंधियों का सुख तथा पुण्य की वृद्धि ये फल प्राप्त होते है।जन्मान्त्य १-१२ सप्ताश्वि ७-२ चतुर्थ ४ संस्थः ।पंचाष्टके ५-८ च नवमेपि ९ भानुः ॥।रोगं च शोकं भयमग्निपीडां।व्याधिं प्रवासौ कुरुतेऽरये हानिम् ॥
    गोचर रवि १-२-४-५-७-८-९-१२ इन स्थानों में हो तो रोग,शोक, भय, अग्नि से कष्ट, चिंता, प्रवास, धन की हानि ये फल प्राप्तहोते है।
    गोचर चन्द्र के फल
    जन्म १ त्रि ३ सप्ताश्वि ७-२ दशाय १०-११ संस्थः ।
    षष्ठो ६ विधुशचापि करोति लाभम् |।
    द्रव्यागम मित्रसमागमं च।
    सद्बुद्धि वृद्धि द्विजदेव भक्तिम्॥

    गोचर विचार
    (९)
    'गोचर चन्द्र १-२-३-६-७-१०-११ इन स्थानों में हो तो लाभहोता है, धन मिलता है, मित्रों से भेट होती है, बुद्धि अच्छी बढ़ती हैतथा देव-ब्राह्मणों की भक्ति होती है।
    धर्माब्धिगश्च ९-४ सुत ५ रन्धर ८ गतो व्ययस्थः १२।
    द्रव्यार्थहानिमखिलं कुरुतेऽपि चन्द्रः ।
    चौराग्निभीतिवधबन्धयुतं करोति।
    हानिर्वियोगभयदुःखयुत करोति
    गोचर चन्द्र ४, ५, ८, ९, १२ इन स्थानों में हो तो धन हानि,चोर या आग से भय, मारपीट या कारावास, नुकसान, वियोग, भय,दुःख ये फल मिलतें है।
    गोचर मंगल के फल
    त्रि ३ षष्ठे ६ चलाभे ११ धरणीसुतः स्यात्।गोभूहिरण्याम्बर लाभकारी॥शत्रुक्षयं राजकृपां विधत्ते।
    आरोग्यसौख्यं विविधं करोति॥
    मंगल ३-६-११ इन स्थानों में भ्रमण कर रहा हो तो गाय, भूमि,सोना, वस्त्र आदि का लाभ होता है, शत्रु नष्ट होते है, राजा की कृपाऔर आरोग्य का सुख मिलता है। जन्म १ चतुर्थ ४ पंचम, ५ द्वादश१२ सप्ताष्टमे ७-८ नवमे ९ द्वितीये २ दशमेपि १० व्याधि विदेशगमनंमित्र विरोधं कुज; कुरुते ।
    गोचर मंगल १-२-४-५-७-८-९-१० इन स्थानों में हो तोरोग, परदेश में प्रवास, मित्रों से झगडा ये फल मिलते है।
    गोचर बुध के फल
    लाभे ११ द्विषष्ठे २-६ दशमे १० चतुर्थे ४।
    रन्धे ८ बुधश्चापि करोति लाभम् ॥
    सौभाग्यसौख्यं मनसोऽपि हर्ष।
    अर्थागमं संपद् वर्धन च॥
    गोचर बुध २-४-६-८-१०-११ इन स्थानों में हो तो लाभभाग्योदय सुख, मन को आनन्द, धनलाभ, संपत्ति की वृद्धि ये फल
    मिलते है।
    जन्म१ द्वादश १२ पंचमेऽपि ५ नवमे ९ धूने ७ तृतियेऽपि ३ वा।सौख्यस्थापि विनाशन प्रकुरुते द्रव्यार्थहानि बुधः ।।भरातुश्चापि विरोधशोकसुभयं चांगेपि कष्टं महत् ।नानाशत्रुभयं सदैवमसुखं व्याधि वियोग तथा।।
    गोचर बुध १-३-५-७-९-१२ इन स्थानों में भ्रमण करतां हो तो।सुख नष्ट होता है, धन की हानि होती है, भाईबन्दो से विरोध, शोक,भय, शरीरकष्ट, शत्रुओं का डर, दुःख, रोग, वियोग ये फल मिलते है।(हमारे विचार से बुध के फल सौम्य होते है, इतने तीव्र फल मंगल,राहु या शनि के ही हो सकते है ) ।
    गोचर गुरू के फल
    द्वि २ धर्मे ९ च लाभे ११ सुते ५ सप्तमे ७ स्याद्।गुरूर्लाभकारी क्रये विक्रयेऽपि।।प्रतिष्ठाविवृद्धि तथा बुद्धिवृद्धि।करोत्यर्थलाभ सुखं संपदश्च।।
    गोचर गुरू २-५-७-९-११ इन स्थानों में भ्रमण करता हो तोखरीद-बिक्री में लाभ, प्रतिष्ठा में वृद्धि, बुद्धि में वृद्धि, धनलाभ, मुखऔर संपत्ति ये फल मिलते है।
    द्वादश १२ दशम १० चतुर्थे ४ जन्मनि १षष्ठाष्ठमे ६-८ तृतिये ३ च।
    व्याधि विदेशगमन मित्रविरोधं सुरगुरूः कुरुते ।
    गोचर गुरू १-३-४-६-८-१०-१२ इन स्थानों में भ्रमण करताहो तो रोग, विदेश में प्रवास, मित्रों से झगडा ये फल मिलते है।

    गोचर शुक्र के फल
    द्वि २ धर्म ९ लाभाष्टमे ११-८ सुते ५ स्याद् ।
    द्वयाद्य १२ वन्हि ३ प्रथमेऽपि १ शुक्रः ।।
    चतुर्थगश्चापि ४ समागम च।
    सत्युत्रवर्गादि सुखं कारोति।।
    गोचर शुक्र १-२-३-४-५-८-९-११-१२ इन स्थानों में भ्रमणकरता हो तो स्वजनों से मिलना, पुत्र कुटुंब में सुख आदि के फलमिलते है।
    कर्म १० सप्त ७ रिपुगः ६ शुभः स्मृतः ।
    रोगशोकमपि दत्तवान भृगुः॥
    कार्यनाशनमथो महापदं।
    स्रविरोधमपि रोगितां सदा।।
    गोचर शुक्र ६-७-१० इन स्थानों में भ्रमण करता हो तो अशुभहोता है। यह रोग, शोक, काम बिगडना, बडी विपत्ति, स्त्री सेविरोध तथा बीमारी ये फल देता है।
    गोचर शनि के फल
    त्रि ३ षष्ठे ६ च लाभे ११ शनिश्चापि सौख्यं।ततो लाभकारी हिरण्याम्बराणि।।
    नृपान्मित्रपक्षाञ्जयं चार्थलाभ।
    कारोत्यर्थलाभ सुखं सपदंच
    गोचर शनि ३-६-११ इन स्थानों में हो तो सुख, सुवर्ण, वस्त्रआदि का लाभ होता है, राजा से या मित्रों से विजय मिलती है, धनऔर संपत्ति मिलती है।
    जन्म १ चतुर्थ ४ पंचम ५ द्वादश १२ सप्ताष्ट ७-८नवम ९ द्वितीय २ दशमेपि १० स्वजनेनापिकलहं द्रव्यार्थ हानिमर्कजः कुरुते ।।
    गोचर शनि १-२-४-५-७-८-९-१०-१२ इन स्थानों में हो तोअपने संबंधियों से भी झगडा होता है, धन और संपत्ति का नुकसान
    होता है।
    गोचर राहु के फलउपचये ३-६-१०-११ प्रथमे १ नवमे ९ तमो।दिशति पुत्रकलत्र धनागमम् ।।द्वितीय २ पंचम ५ रंध ८ मुनि ७ स्थितो।
    हिबुक ४ रिफ १२ गतो मरण ध्रुवम् ।।
    गोचर राहु १-३-६-९-१०-११ इन स्थानों में श्रमण करता हो तोविवाह होता है अगर दुसरों की स्त्री मिलती, पुत्र की प्राप्ति, धन लाभये फल मिलते है। यह २-४-५-७-८-१२ इन स्थानों में भ्रमणकरता हो तो मृत्यु संभव होता है।
    पनोती व पंचमी शनि
    हिन्दी प्रदेशों में गोचर शनि के १-२-४-८-१२ इन स्थानों केभ्रमण को पनोती कहा जाता है। कर्नाटक में चौथे और पांचवे स्थानमें श्रमण करनेवाले शनि को पंचमी कहते है। कर्नाटक में साढ़ेसातीसे भी अधिक डर पंचमी शनि का होता है। साढ़ेसाती से चतुर्थ वपंचम स्थान के शनि के फल अधिक अशुभ मानते है। कन्नड भाषामें अनुभवसिद्ध कहावत है-"पंचमी शनि हँचिन्याग उणसतान"अर्थात चतुर्थ व पंचम शनि फूटे मटके में खाना खिलाता है, तात्पर्म--उससमय व्यवसाय में नुकसान होता है, दिवाला निकलता है, कर्ज होताहै जायजाद नष्ट होती है, प्रियजनोंकी मृत्यु होती है, गांव छोडनापड़ता है, पत्नीपुत्रों का वियोग होता है। हिन्दी प्रदेशों में पनौती काफल इस प्रकार बतलाते है-कल्पाणं खलु यच्छति रविसुतौ राशौचतुर्धाष्ट में । व्याधिं बनधुविरोधदेशगमनं क्लेशंच चिन्ताधिकम् । राशौद्वादशशीर्षजन्महृदये पादी द्वितीये शनिर्नानाक्लेशकरोउपि दुर्जनभय पुत्रान्
    पशूनपीडनम्॥ हानिःस्यान्मरण विदेशगमन सौख्यं च साधारणम्रामारिद्वचविनाशन प्रकुरूते तुर्याष्टमें वाथवा। अर्थात राशि के चौथेया आठवे स्थान में शनि आने पर रोग, भाईयों से झगडा, विदेश मेंप्रवास, कष्ट, चिन्ता ये फल मिलते है। बारहवें, पहले या दूसरे स्थानका शनि हृदय, सिर, पैर में पीडा होती है, दुष्टों से भय होता है, पुत्रोंऔर पशुओं को कष्ट होता है।
    जातकाभरण के अनुसार द्वादश भावोंमें ग्रह भ्रमण फलरवि के फल
    गतिर्भयं श्रीर्व्यसनंच दैन्यं शत्रुक्षयो यानमतीव पीडा।कान्तिक्षयोऽभीष्ट वरिष्ठसिद्धिलाभो व्ययोर्कस्य फलं क्रमेण।।
    चन्द्र से प्रथम स्थान में गोचर सूर्य हो तो प्रवास, दुसरे में भय,तीसरे में धनलाभ, चौथे में व्यसन, पांचवे में दरिद्रता, छठे में शत्रुओंका नाश, सातवें में प्रवास, आठवे में पीडा, नौवे में कांति कम होना,दसवे में इच्छित की प्राप्ति, ग्यारहवे में लाभ तथा बारहवें में खर्च येफल मिलते है।
    चन्द्र के फल
    सदन्नसमर्थक्षयमर्थलाभं कुक्षिव्यथां कार्यविधातलाभम् ।वित्रं रुजं राजभयं सुखंच लाभंच शोक कुरुते मृगांकः ।।
    जन्मराशि से प्रथम स्थान में गोचर चन्द्र उत्तम अन्न देता है,दूसरे में धनहानि, तीसरे में धनलाभ, चौथे में पेटदर्द, पांचवे में काममें सफलता, छठे में काम बिगडना, सातवें में लाभ, आठवें में रोग,नौवे में राजा का भय, दसवे में सुख, ग्यारहवें में लाभ और बारहवेंमें शोक ये फल मिलते है। पुत्रधरमंधनस्थस्य चन्द्रस्योक्तमसत् फलम् ।कलाक्षये परिज्ञेयं कलावृद्धौ तु साधुत् । । दुसरे, पांचवे तथा नौवेंस्थान में चन्द्रका जो अशुभ फल बतलाया है वह चन्द्र के कलाक्षय के
    समय का अर्थात कृष्णपक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की पंचमी तक केसमय के चन्द्र का है। शेष तिथियों के चन्द्र के उक्त स्थानों के फलबहुत शुभ होते है क्यों की उस समय चन्द्र की कलाएं अधिक होती है।
    मंगल के फल
    भीति क्षतिं वित्तमरिप्रवृद्धिमर्थ प्रणाश धनमर्थनाशम्।शस्त्रोपघातं च रूजं च रोगं लाभव्यये भूतनयस्तनोति।
    प्रथम स्थान में भय, दूसरे में नुकसान. तीसरे में धनलाभ, चौथेमें शत्रु बढ़ना पांचवे में धनहानि, छठे में धनलाभ, सातवे मेंधनहानि, आठवे में शस्त्रों से आघात, नौवे व दसवें में रोग, ग्यारहवेंमें लाभ तथा बारहवे में खर्च ये-गोचर मंगल के फल है।
    बुध के फलबन्धुं धन वैरिभयं धनार्प्ति पीडां स्थितिं पीडनमर्थलाभम्।खेद सुखं लाभमयार्थ नाशं क्रमात् फल यच्छति सोमसूनुः॥
    गोचर बुध पहले स्थान में बन्धु लाभ, दूसरे में धनलाभ, तीसरेमें शत्रुओं का डर, चौथे में धनलाभ, पांचवे में कष्ट, छठे में स्थिरता,सातवे में पीडा आठवें में धनलाभ, नौवे में खेद, दसवे में सुख, ग्यारहवेमें लाभ तथा बारहवे में धनहानि ये फल देता है।
    गुरू के फल
    भीति वित्त पीडनं वैरिवृद्धिं सौख्यंशोक राजमानंच रेगम्।सौख्यं दैन्यं मानवित्तंच पीडादते जीवोजन्मराशेः सकाशात्ः।
    जन्मराशि से गुरू का परिश्रमण भय उत्पन्न करता है, दूसरेस्थान में धन, तीसरे में पीडा, चौथे में शत्रुओं की वृद्धि, पांचवे मेंसुख, छठे में शोक, सातवें में सरकारी सन्मान, आठवें में रोग, नौवेमें सुख या दीनता दसवे में सन्मान, ग्यारहवें में धन, बारहवें में पीडाये फल मिलते है।
    शुक्र के फल
    रिपुक्षयं वित्तमतीव सौख्यं वित्तं सुतप्राप्तिमाख्िवृद्धिम्शोक धनाप्तिं वरवस्त्रलाभं पीडां स्वमर्थच ददाति शुक्रः ।।
    जन्मराशि में गोचर शुक्र शत्रुओं का नाश करता है, दूसरे स्थानमें धन, तीसरे में सुख, चौथे में धन, पांचवे में पुत्रप्ाप्ति, छठे मेंशत्रुओं की वृद्धि, सातवे में शोक, आठवे में धनलाभ, नौवे में उत्तमवस्त्रों का लाभ, दसवे में पीडा, ग्यारहवें तथा बारहवें में धनलाभ येफल देता है।
    शनि के फल
    भ्रशं क्लेशं शं च शत्रुप्रवृद्धि पुत्रात् सौख्यं सौख्यवृद्धिंच क्रोधम् ।पीडां सौख्यं निर्धनत्वं धनाप्तिं नानानर्थ भानुसूनुस्तमोति।।
    जन्मराशि में गोचर शनि स्थान से गिराता है, दूसरे स्थान मेंकष्ट, तीसरे में कल्याण, चौथे में शत्रु बढ़ना, पांचवे में पुत्र से सुख,छठे में सुख, सातवे में क्रोध, आठवे में पीडा, नौवे में सुख, दसवे मेंनिर्धनता, ग्यारहवें में धनलाभ तथा बारहवे में अनेक प्रकार के अनर्थये फल देता है।
    राहु के फल
    हानि नैःस्वं स्वं च वैर च शोक वित्त वादंपीडनं चापि पापम् ।वैर सौख्यं द्रव्यहानि प्रकुर्याद राहुः पुंसां गोचरो केतुरेव ॥
    जन्मराशि में गोचर राहु या केतु हानि करते है, दुसरे स्थान मेंनिर्धनता, तीसरे में धनप्राप्ति, चौथे में वैर, पांचवे में शोक, छठे मेंधनलाभ, सातवे में वादविवाद, आठवे में पीडा, नौवें में पाप, दसवें मेंवैर, ग्यारहवें में सुख तथा बारहवें में धनहानि ये फल देते है।
    ग्रहं के वेध
    गोचर ग्रहों कॉ दूसरे गोचर ग्रहीं का वैध निष्फत बना देता है।ग्रहों को वेध कब और कहां लगता है इस का विवरण मन्त्ेश्वर केग्रन्थ में पाया जाता है वह इस प्रकार है--
    रवि-३-६-१०-११ स्थानों में शुभ फल देता है किन्तु यदि उसीसमय अन्य ग्रह ४-५-९-१२ इन स्थानों में हो तो उन का वैध लगकर रवि निष्फल होगा। केवल शनि का वैध यहा नही माना जाताक्यों कि शनि यह रवि का पुत्र कहा गया है।
    चन्द्र-१-३-६-७-१०-११ स्थानों में शुभ फल देता है किन्तु२-४-५-८-९-१२ स्थानों में अन्य ग्रह हो तो उन के वेध से चन्द्रनिष्फल होगा। केवल बुध का देध यहां नहीं माना जाता क्यों किबुध चन्द्र का पुत्र कहा गया है।
    मंगल-३-६-११ स्थानों में शुभ फल देता है किन्तु उसी समय५-९-१२ स्थानों में अन्य ग्रह हो तो उन के वेध से मंगल निष्फलहोता है। यही बात शनि की भी है। सिर्फ रवि का वेध शनि को नहीमाना जाता। (हमारे विचार से रवि का वेध शनि को नही लगताकिन्तु शनि का वेध रवि को तीव्रता से लगता है क्यों कि शनि रवि काशत्रु है।)
    बुध-२-४-६-८-१०-११ स्थानों में भ्रमण करते समय शुभ फलदेता है किन्तु १-३-५-८-९-१२ स्थानों में अन्य ग्रह उसी समय होंतो उनके वेध से बुध निष्फल होता है। केवल चन्द्र का वेध बुध कोनही माना जाता।
    गुरू-२-५-७-९-११ स्थानों में भ्रमण करते समय शुभ फल देताहै। इस के वेध से ३-४-८-१०-१२ स्थानों के ग्रह निष्फल होते है।(तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि गुरू को अन्य ग्रहों के वेध नहीलगते।)
    शुक्र-१ से ५ व ८-९-११-१२ स्थानों में भ्रमण करते समय शुभफल देता है। किन्तु १-३-५-६-७-८-१०-११ स्थानों में उसी समयअन्य ग्रह हों तो उन के वेध से शुक्र निष्फल होता है।राहू-केतु-के वेध रवि जैसै होते है।
    स्थानानुसार ग्रहश्रमणफल (मन्त्रेश्वर का मत)
    रवि-जन्मचन्द्र से रवि के भ्रमण के समय शारीरिक थकावट,धनहानि, चिडचिडाहट, रोग, इच्छा के विरूद्ध कष्टदायक प्रवास येफल मिलते है। दूसरे स्थान में द्रव्यहानि और सुखनाश होता है।तीसरे स्थान में अधिकारपद की प्राप्ति, धन, सुख, आरोग्य, शत्रुनाशये फल मिलते है। चौथे स्थान में रोग, स्त्रीसुख में बाधा ये फल होतेहै। पांचवें स्थान में मन में क्षोभ, आरोग्य में बिघाड, सुसाध्य काम मेंबाधाएं आकर वह काम कठिन हो जाना ये फल मिलते है। छठे स्थानमें आरोग्य ठीक रहता है, शत्रु का नाश होता है, दुःख व चिन्ताएं दूरहोती है। सातवें स्थान में पेट में या गुप्त स्थानों में रोग होते है,अपमान होता है, कष्टदायक प्रवास होते है, आठवे स्थान में मन मेंभय्र रोग, वैयक्तिक झगडे होते है, राजकीय कष्ट होता है, उष्णता सेशरीर कष्ट होता है। नौवें स्थान में भय, अपमान, स्त्री-पुत्रों सेवियोग, सब तरह से निराशा ये फल मिलते है। दसवें स्थान में बड़ेकाम हाथ में लिये जाते है, सफलता मिलती है, नया अधिकार औरसम्मान मिलता है, धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है। ग्यारहवें स्थानके फल दसवे के समान है। बारहवें स्थान में दुःख देनेवाली घटनाएँहोती है, धनहानि, मित्रों से झगडा बुखार से कष्ट होता है।
    चचन्द्र-जन्मराशि से चन्द्र का भ्रमण भाग्योदय कराता है। दुसरेस्थान में धनहानि, तीसरे में किसी भी कार्य में सफलता, चौथे में भय,पांचवे में दुःख, छठे में आरोग्य, सातवे में सुख, आठवें में प्रतिकूल     घटनाएं, नौवे में रोग, दसवे में इच्छित बातों में सफलता, ग्यारहवें मेंआनन्द और बारहवें में खर्च ये फल मिलते है।
    मंगल-जन्मराशि में मंगल का परिश्रमण मन में खेद उत्पन्नकरता है, स्वजनो से वियोग, रक्त दूषित होने से रोग, पित्त का कष्ट,उष्णता बढने से शरीर कष्ट होता है, दूसरे स्थान में भय उत्पन्न होताहै, कठोर बोलना पड़ता है, धनहानि होती है। तीसरे स्थान में सबकार्यों में सफलता मिलती है, सुवर्ण या अलंकारो का लाभ होता है।चौथे स्थान में परिस्थिति में उतारचढाव होता है, पेट में रोग-रक्त केसाथ मल जाना या संग्रहणी-होते है। पांचवे स्थान में बुखार, अनिष्टइच्छाएं, पुत्रों के संबंध में मन मे चिन्ता, स्वजनो से झगडा ये फलहोते है। छठे स्थान में शत्रु पराजित होते है, रोग दूर होते है, धनऔर सफलता मिलती है। सप्तम स्थान में पत्नी से गलतफहमी केकारण झगडा होता है, आंखों के रोग या पेट में तकलीफ होती है।अष्टम में ज्वर, व्रण, पीप बहना, धनहानि, ये कष्ट होते है। नवममें अपमान, धनहानि, शरीर में दुर्बलता होती है। दशम में व्यवहारबिगड़ता है, किसी काम में प्रयत्न पूरी तरह नही कर सकते। ग्यारहवेमें धनलाभ, जायदाद में वृद्धि होती है। बारहवे में धनहानि, उष्णताबढने से अस्वस्थता होती है।
    बुध-जन्मराशि में बुध का भ्रमण धनहानि करता है। दूसरेस्थान में धनलाभ, तीसरे में शत्रु से कष्ट, चौथे में बारबार धनलाभ,पांचवे में स्त्री-पुत्रों से झगडे, छठे में किसी भी काम में सफलता,सातवे में गलतफहमी, आठवे में पुत्रप्राप्ति, धनप्राप्ति, नौवे में बाधाएं,दसवे में सब प्रकार से सुख, ग्यारहवे में भाग्योदय, बारहवे में अपमानका डर ये फल देता है।
    गुरू-जन्मराशि में गुरू का श्रमण जन्मभूमि का त्याग करता है,खर्च बहुत होता है, दूसरों को कष्ट देने की प्रवृत्ति रहती है। दूसरेस्थान में बहुत धन मिलता है, कुटुम्ब का सुख मिलता है, जो कहें वही     बात पूरी हो जाती है। तीसरे स्थान में स्थिति बिगडती है, मित्रों सेवियोग, व्यवसाय में बांधाएं तथा रोगों से कष्ट होता है। चतुर्थ स्थानमें स्वजनों की मृत्यु से दुख होता है, अपमान होता है, पशुओं से भयहोता है। पंचम स्थान में पुत्रप्राप्ति, अच्छे लोगों से संपर्क, राजदरबारकी अनुकुलता होती है। छठे स्थान में स्वजनो और शत्रुओं से कष्ट,रोग से पीडा होती है। सप्तम स्थान में अच्छे काम के लिए यात्रा होतीहै, स्त्रीपुत्रों का सुख मिलता है। अष्टम स्थान में शारीरिक कष्ट,यात्रा में कष्ट, धनहानि, दुर्भाग्य का अनुभव होता है। नवमस्थान मेंभाग्योदय होता है। दशम स्थान में जायदाद व अधिकार को खतरापैदा होता है। सन्तति के बारे में चिंता होती है। ग्यारहवे स्थान में पुत्रप्राप्ति, अधिकार प्राप्ति, सम्मान, कई तरह से लाभ होता है। बारहवेंस्थान में जायदाद के संबंध में भय व दुःख होता है।
    शुक्र-जन्मराशि से शुक्र का भ्रमण सब प्रकार का सुख देता है,दूसरे स्थान में धनलाभ, तीसरे स्थान में भाग्यवृद्धि, चौथे स्थान मेंमित्रलाभ व सुख, पांचवे स्थान में संतति प्राप्ति, छठे स्थान मेंदुराचरण, सातवे में पत्नी को कष्ट, आठवे में धनलाभ, नौवे में सुख,दसवे में झगडे, ग्यारहवे में सुरक्षा, बारहवे में धनलाभ ये फल मिलतेहै।
    शनि-जन्मराशि से शनि का भ्रमण शरीर मे रोग उत्पन्न करताहै, बहुतसे लोगों की मृत्यु देखनी पडती है। दूसरे स्थान में धनहानिव संततिहानि होती है। तीसरे स्थान में अधिकार या व्यवसाय मेंतरक्की होती है, नौकर चाकर मिलते है, धनलाभ होता है। चौथेस्थान में स्वजनों को या स्त्री को बहुत कष्ट (मृत्यु भी संभव है) होताहै तथा धनहानि होती है। पंचमस्थान में धनहानि, संततिहानि होकरमन में सन्देह बना रहता है। छठे स्थान में सब तरह से सुख मिलताहै। सातवें में पत्नी को बहुत कष्ट होता है, प्रवास व भय बहुत होताहै। अष्टम में सन्तति, संपत्ति, मित्र, पशु सब की हानि होती है, रोग     होते है। नवम में दरिद्रता, अच्छे कामों में रुकावटे, बड़े बूढ़ों कावियोग ये फल मिलते है। दशम में बुरे काम होते है, अपमान, रोग सेकष्ट होता है। ग्यारहवें में सब प्रकार से सुख, संपत्ति, सम्मान मिलताहै। व्यय स्थान में निर्थक उद्योगों से कष्ट, शत्रुओं के कारणधनहानि, स्त्री-पुत्रों की बीमारी से कष्ट होता है।
    राहु-देहक्षयं वित्तविमाशसौख्ये दुःखार्थनाशौ सुखनाशमृत्यू।हानिं च लाभं सुभगं व्ययं च कुर्यात तमो जन्मगृहात् क्रमेण।।जन्मराशि में भ्रमण करनेवाला राहु स्वास्थ बिघडाता है, दुसरे स्थानमें धनहानि, तीसरे में सुख, चौथे में दुख, पांचवे में धनहानि, छठे मेंसुख, सातवे में नुकसान, आठवे में मृत्यु (या अतिकष्ट), नौवे मेंहानि, दसवे में लाभ, ग्यारहवे में भाग्योदय तथा बारहवें में खर्च ये फलदेता है।
    विशेष फलप्राप्ति का समय
    क्षितितनयपतगौ राशि पूर्व त्रिभागेसुरपतिगुरूशुक्रौ राशिमध्यत्रिभागे।।तहिनकिरणमन्दौ राशिपाशचात्यभागे।
    शशितनयभुजंगौ पाकदौ सर्वकालम्।।
    रवि और मंगल राशि के पहले तृतीयांश (द्रेष्काण) में अपना फल(विशेष रूप से) देते है, गुरू और शुक्र राशि के मध्य तृतीयांश मेंअपना फल देते है, चन्द्र और शनि राशि के अन्तिम द्रेष्काण में अपनाफल देते है, बुध और राहू का फल राशि के सभी अंशो में फल देतेहै।
    इसप्रकार पुराने भारतीय आचार्यों के मत बतलाये। कई बार इनका अनुभव अच्छा प्रतीत होता है।

    अंगेजी ज्योतिष में गोचर विचार
    प्रसिद्ध पाश्चात्य ज्योतिषी एलन लिओं के दि प्रोग्रेस्ड होरोस्कोपनामक ग्रन्थ के १८ वें भाग में गोचर प्रकरण दिया है। उस का सारांशयहाँ देते है।
    जन्मकुण्डली में किसी विशेष फल का कालनिर्णय करने के लिएवर्षकुण्डली बनानी पडती है। वर्षफल की विभिन्न रीतियों में दिनवर्षपद्धति मुख्य और सही फल बतलानेवाली है। दिनवर्षपद्धति में भीगोचर ग्रहों का विचार करनाही पडता है। ग्रहों के दृष्टीयोग अच्छे होंऔर गोचर ग्रह भी अच्छे हों तो शुभफल निश्चय से मिलते है।दृष्टियोग अच्छे हों किन्तु गोचर ग्रह अनिष्ट हों तो दृष्टियोगों के शुभफल उतने नही दिखाई पडेंगे, गोचर ग्रहों के अशुभ फलों का अनुभवअधिक आयेगा।
    गोचर ग्रहों के विचार में जन्मकालीन ग्रहों के साथ गोचर ग्रहों केसभी दृष्टीयोगों का विचार जरूरी नही है। इन में युति और प्रतियोगोंका विशेष महत्व है। ९० और १२० अंशों के दृष्टियोगों का फल कममात्रा में मिलता है। अन्य योगों का फल प्रतीत नही होता। युति केपरिणाम विशेष रूप से होते है।
    जन्मकुण्डली में कुछ स्थान विशेष महत्व के होते है, इन स्थानोंसे रवि, शनि, गुरु, मंगल का भ्रमण होते समय कुछ न कुछ स्पष्टदिखने वाले फल मिलते है। जन्मलग्न का आरंभस्थान, दशमस्थानका मुख्य अंश, जन्मकालीन रवि, गुरु और चन्द्र ये महत्वपूर्ण अंश है।इन स्थानों से गोचर ग्रहों के युति-प्रतियोग महत्त्वूर्ण फल देते है।
    चन्द्र प्रत्येक मास में बारहों राशियों में भ्रमण कर लेता है अतःसाधारण: गोचर चन्द्र के विशेष फल अनुभव में नही आते। किन्तु
    बीमारी के समय या किसी विपत्ति के समय गोचर चन्द्र का काफीमहत्त्व होता है। जन्मकुण्डली में गुरू पंचम, नवम, दशम या लाभस्थान में हो तो उस गुरु से मोचर चन्द्र का भ्रमण धनलाभ के लिएशुभ होता है, ये दिन सुख और सफलता देनेवाले होते है। जन्मकालीनशनि से चन्द्र का भ्रमण असफलता और कष्ट का कारण बनता है।अन्य ग्रहों से चन्द्र का भ्रमण तभी फलदायक होगा जब मूल कुण्डलीमें वे ग्रह बलवान होंगे। चन्द्रका भ्रमण किसी भी राशि में २। दिनही रहता है।
    रवि,का दशमस्थान से भ्रमण महत्त्वपूर्ण रहता है। रवि जिसस्थान से भ्रमण करता है उस स्थान के फल उत्तेजित होते है। जन्ममास से ५-९-१० ये मास साधारणत: शुभ और हितकर रहते है। इनमें स्वास्थ अच्छा रहता है। जन्मस्थ शनिपर से रवि का भ्रमण जबहोता है वे २-४ दिन असफलता और कष्ट के होते है। प्रत्येक वर्षमें ये तारीखें निश्चित होती है अत: इन का ध्यान रखना चाहिए।जन्म मास से सातवां मास दुर्भाग्यपूर्ण रहता है।
    शुक्र का भ्रमण-१-२-५-७-९ इन स्थानोंमें शुभ फल देता है।अन्य स्थानों में इस का महत्व नही है। लग्न में गोचर शुक्र मन कोशांति देता है, स्वास्थ अच्छा रहता है, ये दिन आनन्द और मनोरंजनके होते है। दुसरे स्थान में शुक्र परिवार के लोगों से संपर्क कराता है,धन के व्यवहार अच्छे चलते है। संगीत आदि सें मनोरंजन होतारहता है। पंचम स्थान में शुक्र ऐहिक सुख देता है। सप्तम स्थानपत्नी का है, यहाँ शुक्र का भ्रमण वैवाहिक सुख अच्छी तरह देता है।नवम में शुक्र का भ्रमण नौकरी या व्यवसाय में सफलता देता है।
    इन तीन ग्रहों से मंगल के परिणाम अधिक तीव्र होते है। मंगलएक राशि में १॥ मास रहता है, वक्री होने पर ५ मास तक एक राशिमें रहता है। वक्री मंगल ६-८-१२ इन अनिष्ट स्थानों में हो या इनस्थानों में शनि, शुक्र, राहू या हर्षल के पास हो तो इन स्थानों के     अनिष्ट फलों का अनुभव मिलता है। गुरु, शनि व चन्द्र जितना मंगलका श्रमण महत्त्वपूर्ण नही है।
    लग्नस्थान में से मंगल का भ्रमण काम करने का उत्साह बढ़ाताहै, गुस्सा जल्द ही आता है। जन्मस्थ रवि लग्न में हो और उसपरगोचर मंगल शरीर उष्णता बढ़ाता है। जन्मस्थ शनि लग्न में हो तोशरीर को कष्ट होता है। जन्मस्थ गुरु लग्न में हो तो मंगल का लग्नमें भ्रमण आरोग्य देता है। जन्मस्थ चन्द्र लग्न में हो तो झगडे होतेहै। मकर या मेष लग्न हो तो गोचर मंगल लग्न में आने पर प्रवासहोगा, वृश्चिक लग्न हो तो आरोग्य अच्छा रहेगा, कर्क लग्न हो तोरोग होंगे।
    द्वितीय स्थान में से मंगल का भ्रमण खर्च बढाता है। जन्मस्थशनि इस स्थान में हो तो कर्ज होता है, आर्थिक नुकसान होता है।यहां मेष, वृश्चिक या मकर राशि हो तो मंगल का भ्रमण आमदनीबढाता है।
    तीसरे स्थान में से मंगल का भ्रमण प्रवास के लिए बुरा होता है।यहाँ धनु राशि हो तो इसमे मंगल भ्रमण के समय की गई यात्रा मेंकष्ट होता है, दुर्घटना संभव होती है। मेष, कर्क, तुला या मकर राशितृतीय में हो तथा गुरु द्विस्वभाव का जल राशि में हो तो मंगल केतृतीय में से भ्रमण नौकरीपेशा लोगों का स्थानान्तर कराता है। यहाँवृश्चिक राशि हो तो मंगल का भ्रमण कुछ बाते इच्छानुसार पूरी होतीहै। अन्य राशियों में कुछ उतावलापन स्वभाव में आता है।
    चतुर्थ स्थान में से मंगल का भ्रमण गृहसुख अच्छा नही देता।जन्मस्थ शनि, राहु या मंगल यहाँ हो तो घर के काम की कुछ ना कुछचिन्ता रहती है। किसानों के लिए चतुर्थ में वृषभ, कर्क, कुम्भ या तुलाराशि हो तो मंगल के भ्रमण के समय खेती के बैल आदि अच्छे नहीमिलते, उस संबंध में कुछ नुकसान होता है। मेष, मकर, वृश्चिक     राशि चतुर्थ में हो तो मंगल का भ्रमण अनिष्ट नही होता। इस स्थानके मंगल भ्रमण को खास महत्त्व नही है।
    पंचम स्थान में मंगल का भ्रमण खर्च बढाता है, संतान काआरोग्य ठीक नही रहता। शनि, मंगल, हर्षल या राहु इस स्थान मेंहो तो सन्तान के स्वास्थ के बारे में चिंता होती है। कर्क, मिथुन, तुलाया कुंभ राशि पंचम में हो तो व्यापारी लोगों को मंगल भ्रमण के समयसट्टा या वायदा व्यवहार में नुकसान होता है। इन राशियों में शनि होतो यह विशेष रुप से अनुभव में आता है। पंचम में मंगल का भ्रमणसाधारणतः कामुकता बढ़ाता है।
    षष्ठ स्थान में से मंगल का भ्रमण सभी राशियों में अशुभ होताहै। थकावट बहुत होती है, स्वास्थ ठीक नही रहता, नौकर अच्छेनही मिलते। इस स्थान में शनि या हर्षल हो तो मंगल भ्रमण के समयनिश्चित रूप से अस्वस्थता रहती है। सिंह या धनु राशि यहाँ हो तथागोचर गुरु या शनि अनिष्ट हो तो इस स्थान में मंगल का भ्रमण चोरोंसे या आग से नुकसान कराता है।
    सप्तम स्थान में से मंगल का भ्रमण कोर्ट के कामों तथा साझेदारीके व्यापार के लिए अशुभ होता है। साझेदारों में झगडा होता है,शत्रुओंसे कष्ट होता है। सप्तम में जन्मस्थ शुक्र हो तो नैतिक दृष्टिसे गलत काम होते है। जन्मस्थ शनि सप्तम मे हो तो यहा मंगल काभ्रमण स्त्री का स्वास्थ बिघाडता है। हर्षल से मंगल का भ्रमणअकस्मात झगडे तथा साझेदारों से मतभेद कराता है।
    अष्टम स्थान में से मंगल का भ्रमण विशेष महत्त्व का नहीहोता। किन्तु यदि पहले से कोई बीमारी हो तो इस भ्रमण में वह ठीकनही होती, उलटे तीव्र हो जाती है।
    नवम में मंगल का भ्रमण उद्योगी प्रवृत्ति बढ़ाता है। यहाँ मकर,कर्क या मेष राशि हो तो प्रवास होता है। जन्मस्थ शनि नवम में हो
तो इस पर से भंगल का भ्रमण बदनामी का कारण बनता हैं, सार्वजनिक कामों भे निंदा होती है। यहाँ वृश्चिक राशिं हो तो उद्योग-व्यवसाय बढ़ता है। 

दशम स्थान में अनुकूल राशि हो तो मंगल का भ्रमण व्यापार उद्योग बढ़ाता है, आढ़त का काम अच्छा चलता है। नौकरों के लिए ऊपर के अधिकारी अनुकूल रहते है। काम सुचारू रूप से होते है। यहाँ प्रतिकूल राशि हो और जन्मस्थ शनि, हर्षल या राहु दशम में हो ते मंगल का भ्रमण नौकरी में संकट पैदा करता है, बेइज्जती के प्रसंग होते है, जन्मस्थ ग्रह अनिष्ट हो तो इस समय नौकरी में वेतन कम होना, व्यापार में साख कम होना, हुंडियों का भुगतान न कर पाना आदि संकट आते है। . 

एकादश स्थान में से मंगल का भ्रमण परिणामकारक नही होता। यहाँ वृषभ या तुला राशी हो तो कुछ आमदनी बढती है। शत्रु राशि से यां शत्रु ग्रह पर से यह भ्रमण हो तो मित्रों या परिचितों से कष्ट होता है, खर्च ज्यादा होता है। 

व्ययस्थान में से मंगल के भ्रमण के समय गुप्त शत्रु पैदा होते है। यहाँ जन्मस्थ शनि बुध या हर्षल से अथवा कर्क, वृषभ, तुला, धनु राशिसे मंगल का भ्रमण बहुत अशुभ होता है। इस समय सरकारी मामलों में झंझटों से कष्ट होता है। 

जन्मग्रहों पर ग़ोचर गुरू का परिभ्रमण फल 

जन्मस्थ रविसे गोचर गुर का परिभ्रमण आर्थिक उन्नति कराता है, सब कार्यों मे सफलता मिलती है, अफसरों की मेहरबानी रहती है, उद्योग धन्धे मे तरक्की होती है, जेष्ठ संबंधियों से लाभ होता है। स्वास्थ अच्छा रहता है। 

जन्मस्थ चन्द्र से गोचर गुर का भ्रमण सामाजिक और पारिवारिक सुख देता है, सार्वजनिक कामों मै सफलता और सम्मान मिलते है। स्‍त्री ध्त मित्र सकता है। जम्मकुण्डली में योग हो तो इस समय सुखकर प्रवास होता है। 

जन्मस्थ बुध से गोचर गुह के भ्रमण के समय परीक्षा में तथा लेखन व्यवसाय में सफलता मिलती है। दस्तावेज, प्रमाणपत्र आदिके व्यवहार अच्छे होते है। मन की चिन्ताएं दूर होकर शांति मिलती है। 

जन्मस्थ शुक्रसे गोचर गुर गुरू का भ्रमण होतेसमय स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। स्नेह बढ़ाने तथा ललित कलाओं का अध्ययन करने के लिए अनुकूलता रहती है, नाटक, सिनेमा, सर्कस आदि मनोर॑जत की संस्थाएं इस समय स्थापन हो तो सफल होती है। 

जन्मस्थ मंगल से गोचर भ्रमण व्यवसाय में तरक्की कराता है। बहुत काम मिलते है। व्यापार में लाभ होता है। यह भ्रमण लग्न, तृतीय, सप्तम या नवम स्थानों में हो तो नौकरी पेशा लोगों का स्थानान्तरण होता है। व्यापारियों को काम के लिए प्रवास करना होता है। जन्मस्थ मंगल नीच राशि में या पापग्रह से दृष्ट हो तो इस समय आर्थिक नुकसान होता है। खर्च अधिक होता है। 

जन्मस्थ शनि से गुरु का गोचर भ्रमण होते समय परिवार के बड़े लोगों से या वरिष्ठ अधिकारियों से लाभ होता है। जन्मस्थ शनि बलवान हो तो इस समय स्थावर जायजाद मिलने की संभावना होती है। 

जत्मस्थ हर्षल से गुरु का गोचर भ्रमण होते समय शास्त्रीय विषयों 

के अध्ययन में ठचि होती है। ज्योतिष या अन्य गूढ़ विद्याओं के प्रति 

झुकाव होता है। धर्म के बारे में मत बदलता है। सार्वजनिक कामों में 

नेतृत्व मिलता है। अधिकार बढ़ता है। जन्मस्थ हर्षल निर्वल हो या पापग्रहों ते दुष्ट हो तो ये फल नहीं मिलेंगे। 

जत्मस्थ नेपच्यूत से गोचर गुर के भ्रमण के समय संगीत व नाटक में रुचि होती है। समय धुल से बीतता है। 

(हमारे विचार से गुर के सभी शुभ फल मही मिलते। जत्मस्थ गुरु व अन्य ग्रह बलवान हो तो ही मे फल मिलेंगे।) 

जन्मस्थ ग्रहों पर से शुक्र के भ्रमण के फल 

जन्मस्थ रवि से गोचर शुक्र का भ्रमणकाल यश देता है, अच्छे लोगों की संगति होती है, अपने से वरिष्ठ लोगों की मुलाकात होती है ॥ 

जन्मस्थ चन्द्र से गोचर शुक्र का भ्रमण स्त्रीसुख की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है। इस समय वासना बढती है। साधारणत: सब कामों में सफलता मिलती है। 

जन्मस्थ बुध से गोचर शुक्र का भ्रमण लेखन व्यवसाय के लिए अच्छा होता है, प्रवास होता है, व्यापार अच्छा चलता है, मित्रों से सुख मिलता है। 

जन्मस्थ शुक्र से गोचर शुक्र का परिभ्रमण शुक्र जिन विषयोंका कारक है उन की रुचि उत्पन्न करता है। शुक्र जिन स्थानों का स्वामी होगा उनके अनुरूप फल मिलेंगे। जन्मकृण्डली में शुक्र अनुकूल हो तो ये फ़ल प्रतीत होंगे, अन्यथा नही। 

जन्मस्थ मंगल से गोचर शुक्र का भ्रमण बेकार खर्च बढ़ाता है, चैनी मिजाज व आलसीपन से आर्थिक नुकसान होता है। जन्मकुण्डली मैं मंगल मेष, सिंह, वृश्चिक, धनु या मकर में १-३-९-१२ इन स्थानों प्रें हो तो यह गोचर शुक्र का भ्रमण फायदा कराता है व्यापारियों को साहसपूर्ण व्यवहारों में अच्छा लाभ होता है। नौकरोंका काम मेहनतसे व अच्छी तरहसे होने से बड़े अधिकारी खुश होते है। 

जन्मस्थ गुर से शुक्र का भ्रमण प्रगतिकारक होता है। लोकप्रियता, घरका सुख इस समय अच्छा मिलता है। जन्मकुण्डली में गुरु के साथ मंगल, शनि, राहु या हर्षल हो अथवा इन की गुरु पर अशुभ दृष्टी हो तो ये शुभ फल बहुत कम होंगे। 

जन्मस्थ शनि बलहीन हो तो उस से गोचर शुक्र के भ्रमण का कोई परिणाम नहीं दिखाई देगा। जन्मस्थ शनि बलवान हो तो गोचर शुक्र का उस से भ्रमण व्यवसाय के लिए साधारण अच्छा रहेगा। 

जन्मस्थ हर्षल से गोचर शुक्र का भ्रमण हर्षल जिनका कारक है उन विषयों मे यश देता है। किन्तु यह भ्रमण विशेष महत्व का नहीं है। 

जन्मस्थ नेपच्यून से गोचर शुक्र का भ्रमण सामाजिक कार्योमें रुचि उत्पन्न करता है, मित्रोंसे लाभ होता है। जन्मकुण्डली मे नेपच्यून 

वक्री हो या अशुभ स्थान में हो लोगों में निंदा, निराशा, आर्थिक नुकसान आदि कष्ट होते है। 

जन्मस्थ ग्रहों पर से मंगल के भ्रमण के फल 

जन्मस्थ रवि से मंगल का भ्रमण जिस स्थान में हो उसके अनुसार फल मिलते है-लग्न मे हों तो शरीर में उष्णता बढेगी, उत्साह बढ़ेगा, नये काम करने की इच्छा होगी। धनस्थान में हो तो आर्थिक व्यवहार बढेंगे, आंखो में कष्ट होगा। तृतीय स्थान में चर राशि में यह योग हो तो प्रवास होगा। चतुर्थ में मानसिक चिन्ता रहेगी। पंचम में रवि शुक्र सहित हो तो उस पर मंगल का भ्रमण गर्भधारणा के अनुकूल होगा। षष्ठ में शत्रुग्रह की राशि में रवि हो तो मंगल का उस पर भ्रमण रोग उत्पन्न करेगा। इसी प्रकार अन्य स्थानों का विचार करना चाहिए। जिनकी कुण्डली में मंगल शुभ हो उन्हें ये शुभ फल मिलेंगे। जो मंगल के कारकत्व के व्यवसाय करते है उन्हें फायदा होगा। अन्य लोगों के लिए जन्मस्थ रवि और गोचर मंगल का योग अशुभ होता है, इस समय रोग होते है, झगड़े होते है, दुर्घटनाएं 
होती है (रवि धनु राशि में हो तो यह संभावना विशेष रुप से होती है। 

। जन्मस्थ बुध से गोचर मंगल का भ्रमण होते समय साधारण अच्छे फल मिलते है। मन उद्योग प्रिय होता है। कल्पनाशक्ति बढ़ती है। किन्तु दूसरों की आलोचना करने की प्रवृत्ति से बोलने या लिखने के कारण लोगों से शत्रुता हो जाती है या कोर्टकचहरी के मामले उठ सड़े होते है। जन्मस्थ बुध यदि मेष, कर्क, वृश्चिक या धनु या मीन में हो तो इस समय मानसिक कष्ट या आधे सिर में दर्द होता है। 

जन्मस्थ चन्द्र से गोचर मंगल का भ्रमण होते समय स्त्रियों से कलह, अविचार के काम होते है। जन्मकुण्डली में चन्द्र बलवान हो तो इस समय उद्योग व्यवसाय मे सफलता मिलती है, यात्रा होती है। 

जन्मस्थ शुक्र से गोचर मंगल का भ्रमण साधारणत: अच्छा होता है समाजिक सन्‍मान या घर का सुख अच्छा मिलता है। जन्मकुण्डली में शुक्र अशुभ हो तो इस समय नुकसान होगा। 

जन्मस्थ मंगल से गोचर मंगल का भ्रमण जिस स्थान में हो उस के अनुरोध से फल मिलते है। 

जन्मस्थ गुरु से गोचर मंगल का भ्रमण काफी अच्छा होता है। उद्योग व्यवसाय मे सफलता या नौकरी में तरक्की मिलती है। जन्मकुण्डली में गुरु शत्रुग्रह की राशि में या नीच राशि में हो तो अदालती मामलों मे या साझेदारी में नुकसान होगा। यह बारहवे स्थान में हो तो आर्थिक नुकसान तथा छठवें स्थान में हो तो शत्रुओं से कष्ट होगा। 

जन्मस्थ शनि से गोचर मंगल का भ्रमण हमेशा अशुभ फल देता है। दुर्घटना, व्यापार में असफलता, वरिष्ठ अधिकारियों या बडे रिश्तेदारों में झगडा, रोग, पिता के स्वास्थ में बिगाड़ ये फल मिलते है। 

जन्मसस्थ नेपच्यून् से गोचर मंगल का भ्रमण व्यसनों में आसक्ति खढ़ाता है ॥ 

जन्मस्थ छर्घल से गोचर मंगल का भ्रमण अचानक संकट पैदा करत्ता है, दुर्घटना या अविचार के काम हो जाते है ॥ 

स्थानतानुसार गुरू के भ्रमण के फल 

शुरू के गोचर का कुछ ना कुछ शुभ फल मिलता है ॥ जिस मात्रा में जन्मकुण्डली अच्छी हो उसी मात्रा में गुरु के भ्रमण के फल मिलते है ॥ नवम और दशम स्थान में गुरु का परिभ्रमण प्रगति का मौका देता है, इस समय धार्मिक उन्नति, पुण्यकर्म होते है। मन की भावनाएं और विकार जागृत होते है ।॥. लग्न में गुरु का भ्रमण स्वास्थ में सुधार करता है, मन आनन्दित रखता है, आशाजनक विचार मन में आते है, समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है, बुद्धि तीत्र होती है । द्वितीय स्थान में गुठ के अमण के समय आर्थिक उन्नति होना प्राय: निश्चित है ॥ मासिक आय बढ़ती है तथा स्थावर जायजाद मे वृद्धि होती है या कर्ज से मुक्ति मिलती है॥ तीसरे स्थान में गुरु का भ्रमण मानसिक उन्नति करता है, आन्ंदपूर्वक यात्रा होती है, भाईबन्दों और रिश्तेदारों से सम्बन्ध दृढ और फायदेमन्द होते है । महत्त्वपूर्ण पत्रव्यवहार तथा लेखन व्यवसाय के लिए यह समय अनुकूल रहता है। चौथे स्थान में गुरु का भ्रमण कौट्म्बिक सुख देता है, महत्त्वपूर्ण कामों की समाप्ति इस समय होने पर अनुकूल होती है। पंचम स्थान में गोचर गुरु आय बढाता है, धघत का सदुपयोग होता है, लेनेदेने के व्यवहार फायदेमन्द होते है ऐलिक सुख और मनोरंजन की दृष्टि से यह समय उत्तम होता है। चष्ठ स्थान में गोचर गुरु स्वास्थ अच्छा रखता है, नौकर विश्वस्त मिलते है, उनसे आराम मिलता है, व्यापार में एजंटो की सार अच्छी रहती है, मासा, फूफा आदि रिश्तेदारों से लाभ होता है, समारोहों का आयोजन सुखकर होता है। सप्तम स्थान में गोचर गुरु विवाह, प्रेमसम्बन्ध, साझेदारी, कचहरी के काम, यात्रा आदि के लिए अनुकूल होता है, इस समय न्याय के लिए या अच्छे उद्देश से किये गये काम सफल होते है, अष्टम स्थान में गोचर गुरु अध्यात्म वेदान्त या दर्शन के अध्ययन में अनुकूल होता है। जन्मकुण्डली में अकस्मात लाभ या विरासत से लाभ का योग हो तो वह इसी समय होता है। सत्पुरुषों के लिए इस वर्ष में सूचक स्वप्न, भविष्य के ज्ञान के संकेत आदि मिलते है। इस समय मृत्युयोग होने पर वह शान्तिपूर्वक होता है। नवम _ स्थान में गोचर गुरु मानसिक उन्नति कराता है। इस समय प्रवास होते है। दशम स्थान में गुरु के भ्रमण से इज्जत और अधिकार बढ़ता है। वरिष्ठ अधिकारी प्रसन्न रहते है। ग्यारहवे स्थान में गुरु के भ्रमण से मित्रों से सुव मिलता है, मन शांत और आनन्दित रहता है, धर्म के विषय में रुचि उत्पन्न होती है। बारहवें स्थान में गुरु का भ्रमण शत्रुओं पर-विजय दिलाता है, इस समय गुप्त, साहसी काम अच्छी तरहसे पूरे होते है, यह समय आर्थिक नुकसान का होता है। 

उपर्युक्त वर्णन से ऐसा लगता है गुरु का भ्रमण प्रत्येक स्थान में शुभ ही है, प्रत्येक मनुष्य को गुरु हमेशा अनुकूल ही प्रतीत होगा, किन्तु उपर्युक्त फल उन्ही को मिलेंगे जिनकी जन्मकुण्डली में गुरु बलिष्ठ हो। बहुतसे लोगों की कुण्डलियों मे गुरु निष्फल भी होता है। _ जन्मस्थ गुढ २-४-७-९-१०-११ इन स्थानों में शुभ राशिमें हो तो उसके शुभ फल मिलेंगे। सप्तम में भी गुरुके फल कम ही मिलते है। १-२-५-९-१० ये स्थान गुरु के लिए उत्तम है। बुद्धिमान व विद्वान लोगों को गुरु के शुभ फल जिस तरह सुखकर प्रतीत होंगे उसी तरह अज्ञानी मंदबुद्धि लोगों को नहीं प्रतीत होते। धन धनवान के पास जलदी जाता है उसी प्रकार ग्रहों के फल भी भाग्यवान व विद्वान लोगों के जीवन में अधिक प्रकट होते है। 

रवि और चन्द्र से गुरु के भ्रमण का शुभ फल प्राय: प्रत्येक मनुष्य को अवश्य अनुभव में आता है। इस समय आर्थिक स्थिति में सुधार के अवसर आते है, उनका उपयोग किया तो स्थिती अच्छी हो जाती है। गुरु प्रत्येक स्थान में एक वर्ष रहता है। जन्मस्थ रवि के और चन्द्र के अंशों में से गुरु का भ्रमण जिस महीने में होगा वे ध्यान में रखने योग्य दिन होंगे। यदि जन्मकुण्डली में रवि या चन्द्रकी गुरुपर शुभ दृष्टि हो तो गोचर गुरु के शुभ फल विशेष रुप से मिलते है। 

शनि के विभिन्न स्थानोंमें भ्रमण के फल 

लग्न स्थान में शनि के भ्रमण के समय निराश प्रवृत्ति होती है, उदासिनता रहती है। जन्मकुण्डली अच्छी हो और उसमें शनि अनुकूल हो तो इस समय नये कामों को स्वीकार करने और उन्हें पूरा करने की चिन्ता रहती है। इस समय शांत स्वभाव, दक्षता, दूरदर्शी दृष्टि की आवश्यकता होती है। 

द्वितीय स्थान में शनि के भ्रमण से आय कम होती है। जन्मकुण्डली में आर्थिक संकट का योग हो तो इस समय पैसे का बड़ा संकट उत्पन्न होता है, कर्ज लेना पडता है सर्च मे बहुत ध्यान रखना पडता है, लेनदेन में नुकसान होता है, उदारता बरतना संभव नहीं होता। 

तीसरे स्थान में शनि का भ्रमण प्रवास में निराशा और अडचने पैदा करता है, भाईबंदोसे झगडा होता है, जन्मस्थ शनि शुभ हो तो इस समय मन में गंभीर विचार आते है, शास्त्रीय विषयों में रुचि रहती है, साहित्यसेवा होती है, गूढ शास्त्रों का अध्ययन होता है। 

चतुर्थ स्थान में गोचर शनि घर में चिन्ता उत्पन्न करता है, परिवार में किसी की मृत्यू होती है, अनपेक्षित व अनिष्ट परिवर्तन होते है। जन्मत: शीन बलवान हो तो इस समय विश्राम की जरूरत होती है। वृद्ध आयु हो तो कारोबार समेटने की चिन्ता करनी चाहिए तथा कुछ परलोक की चिन्ता करनी चाहिए। जन्मत: शनि, मंगल या हर्षल चतुर्थ में हो तो यहां शनि का भ्रमण बहुत कष्ट देता है। माता 
के जीवन को खतरा रहता है। स्थावर जायदाद के बारे मे झगडे होते है। जन्मस्थ रवि से शनि का भ्रमण व्यवसाय में असफलता देता है। जन्मस्थ शुक्र से शनि का भ्रमण फायदेमन्द होता है। 

पंचम स्थान में शनि का भ्रमण सन्ततिपर प्रभाव डालता है। इस समय सन्‍तति हो सकती है। यहां मेष, कर्क, सिंह या वृश्चिक राशि हो तो इस समय व्यापार में नुकसान होता है। व्यापारियों को इस समय 

सट्टा नही खेलना चाहिए। तुला, मकर व कुम्भ राशियाँ शनि को अनुकूल होती है। 

षष्ठ स्थान में शनि के भ्रमण के समय स्वास्थ ठीक नही रहता नौकरों से कष्ट होता है। जन्मकुण्डली में षष्ठस्थान दूषित हो तो इस समय जहरीलें जानवरों से या बुखार से कष्ट होता है। जन्मकुण्डली 

का षष्ठस्थान दुर्बल होने पर इस समय स्वास्थ के लिए जलवायु बदल कर दुसरे स्थान में रहना अच्छा होता है। 

सातवें स्थान में शनि का भ्रमण स्त्री सुख के लिए शुभ नही होता। कुण्डली में इस स्थान में मंगल, रवि, राहु या हर्षल हो तो पत्नी को शरीर कष्ट रहता है। कुण्डली में द्विभार्या योग हो तो उस का फल इस समय मिलकर पहली पत्नी का अन्त हो सकता है। मेष, 

कर्क, सिंह व वृश्चिक राशि यहां हो तो शनि का भ्रमण अनिष्ट होगा, अदालती मामलों में नुकसान होगा। 

अष्टम स्थान में गोचर शनि साझेदारी में नुकसान कराता है स्वास्थ बिघडता है। 

नवमस्थान में शनि के भ्रमण से धर्म में श्रद्धा बढ़ती है, महत्वाकांक्षा बढ़ती है, तीर्थयात्रा होती है। यहां शनि की शत्रुराशि हो तो बदनामी होगी, कानूनी कामों में कठिनाई होगी, साथियों से झगड़े होंगे। 

दशम स्थान में शनि का भ्रमण शत्रु राशि में या शत्रु ग्रह पर से हो तो व्यवसाय में गहरा धक्का लगता है, बेइज्जती और बदनामी 
होती है, साख नष्ट हो कर प्रतिष्ठा कम होती है। नौकरों पर वरिष्ठ अधिकारी नाराज होते है। जन्मकुण्डली में दशम में मंगल, शनि या हर्षल वक्री हो तो इस स्थान से शनि का भ्रमण अनिष्ट होगा। यहां वृषभ, मिथुन, तुला, मकर या कुंभ राशि हो तो इस समय प्रतिष्ठा बढती है, व्यवसाय में तरक्की होती है। 

ग्यारहवे स्थान में गोचर शनि आशाओं और इच्छाओं को दूर करता है। शास्त्रीय विषयों के अध्ययन और खोजबीन के लिए अनुकूल समय रहता है। यहां जन्मकुण्डली में मंगल या हर्षल हे तो शनि के भ्रमण के समय मित्र या परिचितों के विश्वासघात से नुकसान होगा। स्वगुष में या मित्रग्रह की राशि में यह भ्रमण हो तो शुभ फल मिलेगाl

बारहवें स्थान में शनि का भ्रमण हमेशा अशुभ होता है, दु:खदायक घटनाएं होती है। जन्मकुण्डली में मंगल या शनि इस स्थान में हो तो इस समय राजकीय संकट से कारावास होता है। खर्च अधिक होता है। कर्ज लेना पडता है। 

जन्म-ग्रहों से शनि के भ्रमण के फल 

शनि का भ्रमण हमेशा आरोग्य, व्यवसाय या नौकरी के बारे में कष्टकर होता है। शनि शीतस्वभावी है; इस का कार्य आकुंचन है। अत: इस का भ्रमण व्यवसाय को कम करता है, व्यापार में आय कम होती है, मजदूरों को काम नही मिलता। कुछ न कुछ विपत्ति आती है। लग्न स्थान में शनि के भ्रमण से जीवनशक्ति कम होती है। रवि या चन्द्र ले शनि का भ्रमण शीत से होनेवाले रोगों संधिवात आदि का कारण बनता है। लग्नस्थान, रवि या चन्द्र से शनि के भ्रमण के समय यदि चन्द्र का अशुभ दृष्टियोग हो तो आपत्ति या दुर्घटनाएं होने की संभावना होती है। चन्द्र का दृष्टियोग शुभ हो तो अशुभ फल कम होते है। जन्मस्थ रवि से शनि के भ्रमण के समय नौकरी में बदनामी या वरिष्ठ अधिकारियों से अनबन होती है। पिता जीवित हो तो उन से कलह होता है। आर्थिक नुकसान व बेइज्जती होती है। स्वास्थ ठीक नही रहता। पतिपत्नी में झगड़ा या वियोग होता है। 

जन्म चन्द्र मे शनिका भ्रमण गृहसौस्य के लिए अशुभ होता है। जायदाद व घर के बारे में झंसटें होती है, पत्नी कां स्वास्थ ठीक नहीं रहता। कुण्डली में द्विभार्या योग हो तो इंस समय पत्नौकों जीवत का संकट होता है। माता का स्वास्थ बिगडता है। मत उदास रहता है। 

जन्मस्थ बुध से शनि का भ्रमण लेखन के लिए अंशुभ होता है। इस समय विद्यार्थियों की परीक्षा में सफलता नही मिलती। मन चिन्तित 

रहता है। 

जन्मस्थ झुक्र से शनि का भ्रमण स्त्रीसुख में विध्न पैदा करता है । 

शुक्र के कारकत्व की वस्तुओं के व्यापार में नुकसान होता है। इस 

समय चन्द्रका दृष्टीयोग अशुभ हो तो बदनामी होगी, गन्दी अफवाहों 

से कष्ट होगा। जन्मकुण्डली में शुक्र वृषभ, तुला, मीन या धनु में तथा 

१-२-४-५-७-८-१० इन स्थानों में कही हो तो व्यापार या नौकरी में तरक्की होती है। ह 

जन्मस्थ मंगल से शनि का भ्रमण झगड़ा या यात्रा में दुर्घटना कराता है। साहस के काम तथा आकस्मिक विपत्ति के प्रसंग आते है । 

जन्मस्थ गुरु से शनि का भ्रमण होते समय यदि कुण्डली में गुरु बलवान हो तो व्यवसाय में प्रगति हो कर धन का संग्रह होता है। बचत से पैसे इकठठे होते है। अदालती मामलों में सफलता मिलती है। र्मगुरुओं को इस समय अच्छा दान मिलता है। किन्तु कुण्डली में गुरु शुभ हो तो /|इस शति के भ्रमण से नुकसान होगा। 

जन्मस्थ शनि से गोचर के भ्रमण के फल कुण्डली में शनि शुभ तो शुभ मिलेंगे, अशुभ हो तो अशुभ मिलेंगे। 
जन्मस्थ हर्षल से गोचर शनि का भ्रमण कई तरह से कष्टदायक होत है। इस समय वरिष्ठ अधिकारियों से अनबन, बेइज्जती, प्रतिष्ठा में कमी ये बाते होती है। हर्षल कुम्भ, मिथुन, कन्या या तुला में शुभ स्थान में हो तो वह जिस स्थान में हो उस स्थान के कारकत्व से फायदा होता है, नई खोजें होती है, सार्वजनिक कामों में सम्मान मिलता है। ह 

जन्मस्थ नेपच्यून से शनि का भ्रमण दुर्भाग्यपूर्ण होता है। नेपच्यून जिस स्थान में हो उस स्थान के अनुसार इस के अशुभ फल होते है। 

हर्षल के जन्मग्रहों सें भ्रमण के फल 

गोचर हर्षल का भ्रमण बहुधा कष्टदायक होता है। इस से बहुतसे परिवर्तन होते है। जिस ग्रह से हर्षल का भ्रमण हो वह यदि बलवान हो तो हर्षल का भ्रमण लाभदायक होता है। लग्न, दशम, जन्मस्थ रवि व चन्द्र से हर्षल का भ्रमण विशेष कष्टदायक होता है। जन्मकृण्डली मे जो ग्रह. अनिष्ट हो वहां से हर्षलका भ्रमण बहुत कष्ट देता है। 

. जन्मस्थ रवि से हर्षल के भ्रमणके समय व्यवसाय में नुकसान, वरिष्ठ अधिकारियोंसे परेशानी, पिता से तकलीफ, स्त्रियों के लिए पति से तकलीफ कीर्ती को धक्का लगना, स्वास्थ बिगडना ये फल मिलते है। ह 

चन्द्र से हर्षल के भ्रमण के समय यात्रा, घर बदलना, गृहसौख्य में कमी, पत्नी के स्वास्थ में बिगाड, ये फल मिलते है। चन्द्र लग्न में या षष्ठ में हो तो इस समय आरोग्य ठीक नही रहता। 

बुध से गोचर हर्षल का भ्रमण ज्ञान प्राप्ति के लिए अच्छा होता है, इस समय शास्त्रीय विषयों में रुचि रहती है। बुध -यदि शनि या मंगल के साथ या श॒त्रुग्रह के राशि में हो तो इस समय दस्तावैजोंके मामलों में झंझटे होती है। यह भ्रमण लग्न, षष्ठ या अष्टम स्थान में हो तो मज्जातन्तुओं के रोग होते है। 

शुक्र से हर्षल का भ्रमण प्रेम के मामलों में निराशा पैदा करता : है। स्त्रीसुख नही मिलता। मित्रों से कष्ट होता है। सामाजिक प्रतिष्ठा कम होती है। नीतिमत्ता के बारे में लोग आलोचना करते है। 

मंगल से हर्षल का भ्रमण झगड़े कराता है। यात्रा में दुर्घटना व कामों मे असफलता ये फल मिलता है। जिस स्थान में यह भ्रमण हो उस स्थान के विषयों में कष्ट होता है। सरकारी मामलों में कष्ट होता है, फौजदारी मामलों में उलझना पड़ता है। 

गुरु से हर्षल के भ्रमण के समय साधुओं का दर्शन होता है, गुरुओं के उपदेश सुनने का अवसर मिलता है, धार्मिक उन्नति होती है। कुण्डली में गुरु अशुभ स्थान में हो तो इस समय आर्थिक नुकसान होता है। | 

शनि से हर्षल के भ्रमण. के समय पिता आदि बड़े रिश्तेदारों से "झगडा होता है, जायजाद के संबंध में झंझटे होती है। 

जन्मस्थ हर्षल से गोचर हंर्षल का भ्रमण बहुत कष्ट देता है। कुण्डली मे हर्षल मंगल, रवि या चन्द्र के साथ हो तो इस समय मृत्यु का योग होता है। कुण्डली मे हर्षल स्वगृह में या शास्त्रक़ारक राशि में हो तो अधिकार बढ़ता है, कीर्ति, प्रतिष्ठा, सम्मान में वृद्धि होती है। 

नेपच्यून से हर्षल का भ्रमण धार्मिक मतों में परिवर्तन तथा व्यवसाय में नुकसान कराता है। . 

जन्मग्रहों से नेपच्यून के भ्रमण के फल 

नेपच्यून के भ्रमण के समय कई परिवर्तन होते है। व्यापार में उतार चढाव होते है। मन में चिन्ता, हानि और बहुतसी अडचने उत्पन्न होती है। राशि के जिस आंश में ही न हो वहाँ कुण्डली में पापग्रह हो या उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तो विशेष अशुभ फल-जैसे नौकरी छूटनां या व्यापार बदलना मिलते है। 

रवि से नेपच्यून का भ्रमण वरिष्ठ अधिकारियोंसे कष्ट, बदनामी स्त्रियों के लिए वैधव्य या पति से झगड़ा, बेइज्जती आदि फल देता है। कुण्डली में रवि बलवान हो तो ये अशुभ फल नही मिलेंगे किन्तु स्वास्थ ठीक मही रहेगा। 

कुण्डली में बुध मिथुन, कन्या, तुला या कुम्भ में हो तो यहां से नेपच्यून के भ्रमण के समय विचारों में क्रान्ति होती है, नई आदते लगती है। 

शुक्र से नेपच्यून के भ्रमण से सामाजिक सुखों में बाधा आती है। फ्त्नी और उसके संबंधियों के लिए पैसे करना पडता है। मन में चिन्ता रहती है। 

मंगल से नेपच्यून के भ्रमण के समय झगडे, दुर्घटनाएं, बुखार, संक्रामक रोग आदि से कष्ट होता है। खर्च ज्यादा होता है। कर्ज लेना पडता है। 

गुरु से नेपच्यून का भ्रमण प्रगतिकारक होता है। प्रतिष्ठा बढ़ती है। धार्मिक कार्य होते है। कुण्डली में गुरु शुभस्थान में हो तो दानधर्म, देवालय या धर्मशालाओं का निर्माण व अन्य लोकोपयोगी काम होते है। 

शनि से नेपच्यून के भ्रमण से बदनामी, बेइज्जती, नुकसान प्रतिष्ठा में कमी इत्यादि अशुभ फल मिलते है। 

हर्षल से नेपच्यून के भ्रमण के समय शास्त्रीय शोध, नई कल्पनाएं यंत्रोके आविष्कार, सार्वजनिक कार्य में सफलता ये फल मिलते है। स्पष्ट है की ये फल विशेष योग्य विद्वानों को ही मिल सकते है। साधारण लोगों को इस भ्रमण का कोई परिणाम नही दिखाई देता है। कुण्डली में हर्षल दूषित हो तो इस समय शत्रु बढ़ते है। असफलता, वरिष्ठ अधिकारीयों की नाराजी आदि से कष्ट होता है। 

ग्रहों के स्थानानुसार परिभ्रमण के फल 

तनुस्थान व दशमस्थान में ग्रहों के भ्रमण विशेष महत्व के होते है। कुण्डली में रवि और चन्द्र जिस स्थान में हों वहां ग्रहों के भ्रमण भी उन स्थानों के अनुसार फल देते है। लग्न और दशम के बाद चतुर्थ और सप्तम स्थानों का महत्त्व है अन्य स्थानों में चन्द्र, बुध, शुक्र व मंगल के भ्रमण का कोई विशेष परिणाम देखने में नही आता। कुण्डली के रिक्त स्थान से ग्रहों के भ्रमण की अपेक्षा जिस स्थान में कोई ग्रह है वहां से गोचर ग्रहों के भ्रमण के परिणाम अधिक दिखते है। बुध, शुक्र व रवि हमेशा निश्चित क्रम से तथा काफी जलदी कुण्डली के सभी स्थानों से भ्रमण कर लेते है। अत: केवल गोचर पद्धति से इन के फलों का विशेष अनुभव नही आता। बुध व॑ शुक्र का भ्रमण जिस स्थान में हो वहां के फल कुछ उत्तेजित होते है। क्लर्क, कारीगर, लेखक, वक्ता इन लोगों की कुण्डली के लग्न या दशम स्थान से बुध का परिभ्रमण नये विचार, लेखन कार्य आदि के लिए अच्छा होता है। स्फूर्ति देनेवाले लेख लिखे जाते है। शिक्षकों का अध्यापन अच्छा होता है। इस से कम परिणाम सप्तम व चतुर्थ स्थान में मिलते है। शुक्र का दशम स्थान व लग्न मे से परिभ्रमण स्त्रीसुख, अन्य ऐहिक सुख, आराम की दृष्टिसे अच्छा होता है। इस समय यात्रा, अधिकारियों से मुलाकात, मित्रों से मिलना आदि मे सफलता मिलती है.। चन्द्रदर्शन के समय (शुक्ल प्रतिपदां व द्वितिया को) चन्द्र जिस स्थान में हो वहां के शुभ फल उस महीने में मिलेंगे। इस समय चन्द्र जिस राशि में हो वही यादि कुण्डली में लग्न में है तो उस मास में शरीरसुख, घर का मुख, व्यवसाय में सफलता, लेन देन में लाभ आदि शुभ फल मिलेंगे। इसी प्रकार अन्य स्थानों के बारे मे समझना चाहिए। रवि कुण्डली में पापग्रह जिस स्थान में हों वहां से भ्रमण करते समय सात-आठ दिन अशुभ फल देता है। रवि का भ्रमण प्रत्येक राशि में हर वर्ष निश्चत तारीसों को होता है। इस लिए हर वर्ष उन तारीखों को अशुभ फल मिलना कुछ लोगों को असंभव प्रतीत होगा। किन्तु यह अनुभव आता है कि प्रत्येक वर्ष में कुछ महीने अशुभ सिद्ध होते है-ये दिन वे होते है जब रवि कुण्डली के पापग्रहयुक्त स्थानों से भ्रमण करता है। वार्षिक कुण्डली में किसी महीने में अच्छी डाइरेक्शन हो तो ही रवि के इस भ्रमण के अशुभ परिणाम नहीं होते, अन्यथा अवश्य होते है। जन्मकुण्डली में रवि जिस राशि में हो उस पर गोचर रवि की दृष्टि के समय अर्थात जन्ममास से सातवें महीने में कुछ न कुछ अस्वस्थता-सर्दी, जुकाम, दुर्बलता-रहती है। लग्न स्थान दूषित होनेपर यह अनुभव अवष्य आता है। 

आचार्य वराहमिहिर कक संहिता के अध्याय १०४ में गोचर ग्रहों के फल इस प्रकार है-जन्म राशि से ३-६-१० स्थानों मे रवि, ३-६ स्थानों में मंगल, २-४-६-८ इन स्थानों में बुध, २-५-७-९ स्थानों में गुरु, ६-७-१० स्थानों में शुक्र तथा ३-६ स्थानों में शनि का भ्रमण सिंह के समान भय उत्पन्न करता है। 

रवि भ्रमण के फल 

जन्मचन्द्र की राशी से सूर्य का भ्रमण मनको खेद, धनहानि, पेट के रोग व यात्रा ये फल उत्पन्न करता है। दूसरे स्थान में धनहानि, मन में दु:ख, संकट, आंखो के रोग ये फल मिलते है। तीसरे स्थान में जायदाद मिलना, धन का संग्रह, शुभकार्य, मन में आनन्द, शत्रुका ताश ये फल मिलते है। चतुर्थ स्थान में रोग व जायदाद के बारे में कष्ट होता है। पंचम स्थान में रोग व शत्रुओंसे कष्ट होता है। षष्ठ स्थान में स्वास्थलाभ, शोक से छुटकारा, शत्रुनाश ये फल मिलते है। सप्तम स्थान में प्रवास तथा पेट में कष्ट होता है। अष्टम में रोग, खासी आदि, पत्नीसे झगड़ा ये फल मिलते है। नवम में धनप्रापति में अडचने, रोग, दीनता, संकट ये फल मिलते है। दशम स्थान में सब कार्यो में सफलता मिलती है। एकादश में सब कार्य सुगम होते है। 
बारहवे स्थान में कामों में गड़बड़ पैदा होती है। अन्द्र भ्रमण फल 

जन्मराशि से चन्द्र का भ्रमण अन्न-वस्त्र अच्छा देता है। धनस्थान में मानहानि, धन की कमी, विध्नों की उत्पति होती है । तृतीय में वस्त्र, सत्रीसुख व धन मिलता है। चतुर्थ में लोगों का भरोसा नही रहता। पंचम मे दीनतां, रोग, शोक, यात्रा में कष्ट होते है। षष्ठ में धन व सुख मिलते है। सप्तम में अन्न, धन, वाहन, सम्मान सुख . की नींद का लाभ होता है। अष्टम में. सर्प आदि से भय होता है। 'नवम में उदासी, बंधन, मेहनत, पेट मे दर्द होते है। दशम में सब काम सफल होते है। एकादश मे निकट संबंधियों से आनंद मिलता है। बारहवें में आय से अधिक खर्च होता है। मदोन्मत्त बैल जैसी विपत्तिकर घटनाएं होती है।

मंगल भ्रमण फल
जन्मराशि से मंगल का भ्रमण उपद्रव देता है। दूसरे स्थान में शारीरिक या मन के कष्ट, शत्रुओं का कष्ट सरकारी मामलो में कष्ट, बलवान होने पर भी पित्त रोग से कष्ट, आग व चोरों से कष्ट थे फल मिलते है। तीसरे स्थान में भूख बढती है, तेज बढता है, लोगों पर हुकूमत चलाता है, धन व ऊनी वस्त्र, खदानों से धातु आदि का लाभ होता है। चतुर्थ में बुखार, पेट दर्द, रक्त के रोग, जुल्म से या बुरे लोगों की संगति से नुकसान होता है। पंचम में लोगोंसे शत्रुता, रोग, पुत्र आदि से दु:ख चंचल बुद्धि से कष्ट होता है। षष्ठ में शत्रुओं का भय नही रहता, झगड़े नही होते, धन मिलता है, दूसरों का मुंह नही देखना पडता। सप्तम में पत्नी का स्वास्थ ठिक नही रहता, स्वयं के आंखों में व पेट में कष्ट रहता है। अष्टम में रक्त दूषित होकर 

फोडे-फुन्सी होते है, खर्च बहुत होता है। गवम में अपमान, धनहानि, शरीर की अस्वस्थता, धातुक्षय आदि से गति मन्द होती है। दशम में सब तरह से धनलाभ, ग्यारहवे में विजय तथा अधिकार की प्राप्ति एवं बारहवें में बहुत खर्च, संकटो से संताप, अपने उच्चता का घमंड, घर में स्‍त्री का क्रोध, पित्त विकार, आंखो में कष्ट आदि से दु:ख होता है। 

बुध भ्रमण फल 

जन्मचन्द्र से बुध के भ्रमण के समय लोगों की चुगली से कष्ट होता है। सरकारी मामालों में जायदाद नष्ट होकर बन्धन योग होता है, लोग दूर रहना चाहते है। दूसरे स्थान में धनलाभ होता है। किन्तु सम्मान नही मिलता। तृतीय में मित्र मिलते है किन्तु राजा व शत्रुओं के भय से, मित्रोंओं से दुराव रहता है। अपना आचरण बिगडने से लोगों से दूर रहना चाहते है। चतुर्थ में रिश्तेदार व परिवार के लोगों ' में वृद्धि हो कर धनलाभ होता है। पंचम में स्त्री-पुत्रों से झगडा होता है, सत्रीसमुख नही मिलता। षष्ठ में सौभाग्य, विजय, उन्नति की प्राप्ती होती है। सप्तम में कष्ट और असफलता मिलती है। अष्टम में पुत्रप्राप्ति विजय, धन व वस्त्र का लाभ होता है, बुद्धि तेज होती है। नवम में विघ्त आते है। दशम में शत्रुनाश, धनलाभ, सुंदर घर में स्त्रीसुख की प्राप्ति होती है। ग्यारहवें में धन, सुख, स्त्री, पुत्र, मित्र, वाहन आदि के लाभ से संतोष, उत्साह रहता है लोग प्रोत्साहन देते है। व्यय स्थान में शत्रुओं से पराजय, रोग, स्त्रीसुख में बाधा आदि स्ले कष्ट होता है। 

गुरु भ्रमण का फल 

जन्मराशि से गुरु के भ्रमण के समय घनहानि, पद से हटना, कष्ट, बुद्धि में मंदता ये फल मिलते है। दूसरे स्थान में शत्रु नष्ट हो कर धन व स्त्रीसुख मिलता है। तृतीय में अस्थिरता, कामों में अडचने रहती है। चतुर्थ में भाई बन्धुओं से कष्ट के कारण घर छोडने की इच्छा होती है, मत अशान्त रहता है। पंचम में पुत्र प्राप्ति रिश्तेदारों से मेल, कल्याण होता है, घर, वस्त्र, पशु आदि की प्राप्ति, सत्रीसूख ये फल मिलते है। षष्ठ में स्त्री के दूर्व्ययहार से झगड़े, असन्तोष बने रहते है। सप्तम में स्त्रीसुख, धन, भोजन, वाहन, बुद्धि में कविता की ओर प्रेरणा आदि का लाभ होता है। अष्टम में बन्धन, रोग, शोक, यात्रा में कष्ट, मरण जैसी शारीरिक वेदना होती है। नवम में कुशलता, सन्तत्ति, लोगों में प्रभाव, धन, स्त्री सुख आदि का ताभ होता है। दशम में स्थान नष्ट होता है, धतहानि, अकल्याण होता है। एकादश में सब शुभ कार्य होते है। बारहवें मे यात्रा में बाधाएं आती है। - 

शुक्र भ्रमण फल 

जन्मराशि से शुक्र के भ्रमण के समय शुंगारं, विलास, भोजन बिस्तर, स्त्री आदि का उत्तम. सुख मिलता है। दूसरे स्थान में स्त्री पुत्र, धन, धान्य, राजमान्यता, परिवार, आदि का सुख मिलता है हितकारी कार्य होते है। तीसरे स्थान में धन, मान, पुत्र, वस्त्र शत्रुनाश आदि का लाभ होता है।-चतुर्थ में अच्छे मित्र मिलते है शक्ति बढती है। पंचम में सन्‍्तोष मिलता है, संबंधियों से मुलाकाते होती है, पुत्र धन और मित्रों की मदद की प्राप्ति होती है। किन्तु शत्रुओं का कष्ट कम नही होता। षष्ठ में रोग, संताप, पराभव होते है। सप्तम में स्त्री के विषय में अशुभ फल मिलता है। अष्टम में वस्त्र व घर का लाभ होता है, संपन्न स्त्री का लाभ होता है। गवम में धर्मकार्यों का लाभ, स्त्रीसुख, धन तथा वस्त्रों का लाभ प्राप्त होता है। दशम में अपमान, झगड़े, लोगों द्वारा तीखी बाते सुनना आदि से कष्ट होता है। लाभस्थान मे मित्र मिलते है, धन मिलता है अन्नदान करते है। व्ययस्थान में धन वं वस्त्रों का लाभ होता है किन्तु यदि शुक्र स्तम्भित हो तो ये शुभ फल नही मिलते। 
शनि भ्रमण फल 

जन्मराशि से शनि का भ्रमण विष, आग, स्वजनों का वियोग, बन्धन आदि कष्ट देता है, यह मृत्यु भी करा सकता है। विदेश जाना पडता है, मित्रों की सलाह से लडकों से शत्रुता होती है, धन नष्ट हो कर भटकना या भीख मांगना पडता है। दूसरे स्थान में सुख व शरीर की शक्ति नष्ट होती है अपने स्वांभाविक गुणों के बल पर धन मिला भी तो वह टिक नही पाता। तीसरे स्थान में धन मिलता है, नोकर-चाकर रहने से आराम मिलता है, पशु मिलते है, घर तथा संपत्ति मिलती है, सुख व आरोग्य मिलता है, स्वयं डरपोक हो तो भी अपने वीर मित्रों से शुत्रुओं को दण्ड देता है। चतुर्थ में मित्र, घन व पत्नी का वियोग होता है, सर्प जैसी दुष्ट प्रवृत्ती रहती है। पंचम में धन व पुत्र का वियोग हो कर कष्ट होता है। षष्ट में शत्रु व रोग नष्ट होते है, स्त्रीसुख मिलता है। सप्तम में व्यर्थ भटकना पडता है। अष्टम में स्त्री व पुत्रों का वियोग होता है, दीनता प्राप्त होती है। नवम में शत्रुता बन्धन, हृदयरोग से कष्ट होता है, कोई भी व्यवस्थित कार्य नही हो सकता। दशम में अच्छे कार्य होते है, किन्तु धन किर्ति व ज्ञान की हानि होती है। लाभस्थान में बहुत (स्त्री व धन का) लाभ होता है। व्यग्रस्थान में बहुत प्रकार से शोक होता है। 

प्रकरण ५ गोचर ग्रहों के फल के विषय में हमारा अनुभव 

गोचर ग्रह का फल देखते समय पहले कुण्डली में वह ग्रह शुभ है या अशुभ यह समझ लेना चाहिए। अनुभव ऐसा है कि कुण्डली मे प्रथमत: जो ग्रह शुभ दिखता है उस का फल कभी कभी बिलकुल नहीं मिलता क्‍यों कि वह ग्रह उस कुण्डली में वास्तव में शुभ नही होता। उदाहरणार्थ-किसी मनुष्य की कण्डली में वषभ लग्न है तथा दशम में गुरु है, यहां सर्व साधारण ज्योतिषी मानता है कि दशमस्थ गुरु शुभ होता है अत: इस के शुभ फल मिलने चाहिये, किन्तु अनुभव में शुभ फल नही मिलते। यहां जातकचन्द्रिका ग्रंथ के कर्ता बतलाते है कि वृषभ लग्न के लिए गुरु अष्टमेश व लाभेश है; अत: इस के अशुभ 

' फल मिलते है; या वह निष्फल होता है। इसी प्रकार अन्य लानों के 

लिए भी ग्रहों का विचार करना पड़ता है। इस लिए प्रथम हम जातकचन्द्रिका के अनुसार बारह लग्नों के लिए शुभाशुभ ग्रह बतलाते 

है (इस ग्रन्थका विशेष विवेचन हमारे शुभाशुभ ग्रह-निर्णय विचार ग्रन्थ में देखना चाहिए) ' 

मेष लग्न के लिए-रवि, गुरू, शुभ तथा शनि, शुक्र, बुध अशुभ होते है। | 

वृषभ लग्न के लिए-शनि, बुध, शुभ तथा गुरु, शुक्र, चन्द्र अशुभ होते है। ' 

मिथुन लग्न के लिए-शुक्र, बुध शुभ तथा मंगल, गुर, रवि (दुसरे मत से चन्द्र) अशुभ होता है। 

कर्क लग्न के लिए-मंगल, गुरु, शुभ तथा शुक्र, शनि, बुध अशुभ होते है। .: 

सिंह लग्न के लिए-मंगल, गुरु शुभ तथा शुक्र, शनि, बुध अशुभ होते है। ' 

कन्या लग्न के लिए-शुक्र, बुध शुभ तथा मंगल, गुरु, चन्द्र अशुभ होते है। ' ह । 

तुला लग्न के लिए-शनि, बुध शुभ तथा रवि, गुर, मंगल अशुभ 

वृश्चिक लग्न के लिए-रवि, चन्द्र विशेष शुभ गुंढ शुभ, बुध शुक्र, शनि अशुभ होते है। 
घनु लग्न के लिए-शुक्र अशुभ, बाकी सब ग्रह शुभ होते है। 

मकर लग्न के लिए-बुध, शुक्र शुभ तथा मंगल, गुरु, चन्द्र अशुभ होते है। 

कुम्भ लग्न के लिए-शुक्र शुभ तथा मंगल, गुरु, चन्द्र अशुभ होते है। 

मीन लग्न के लिए-चन्द्र, मंगल, गुर शुभ तथा रवि, बुध, शुक्र शनि अशुभ होते है। 

उपर्युक्त शुभाशुभ ग्रह देखकर ही गोचर ग्रहों के फल निर्धारित करने चाहिए। अब कुण्डली के स्थानों के क्रम से हमारा अनुभव बतलाते है। ' 

लग्न स्थान 

| “रवि-उष्णता रहती है, मनकी स्वस्थता बिगडती है, घरमें झगड़े होते है, व्यवसाय में मन नही लगता। यही कुण्डली में शुभ हो तो यह मास अच्छा जाता है, हाथ में पैसा आते रहता है, अच्छे काम होते है। 

चन्द्र-शुभ हो तो विचार अच्छे रहते है, किसी की मदद जरुरी हो तो तुरन्त मिलती है, ये दो दिन अच्छे जाते है। अशुभ हो तो मन अस्वस्थ रहता है, पैसा बहुत खर्च होता है किन्तु व्यर्थ खर्च होता है। 

मंगल-शुभ हो तो काम जलदी होते है, यात्रा बहुत होती है, व्यवसाय से लाभ होता है, वरिष्ठो से अनबन होती है किन्तु जलदी ही संबंध सुधर जाते है। अशुभ हो तो पित्त के विकार होते है, आरोग्य ठिक नहीं रहता, अपमान सहन नही होता, क्रोध बहुत आता है, पैसे समय पर नहीं मिलते, पत्नी से अनबन होती है, सब कामों में अडचने आती है। 

बुध-विचार अच्छे आते है किन्तु चंचलता रहती है, लेखन अच्छा हो सकता है। यह अशुभ हो तो अविचार से ऐसा काम हो जाता है जिस के लिए बाद में पछताना पडता है, धोखा देनवाले 'मित्र” मिलते है। 

गुरु-शुभ हो तो शान्ति और समाधान मिलता है, पत्नी गर्भवती होती है या प्रसुत होती है। अधिकार बढ़ता है। होशियारी से मौको पर काम बन जाते है। मित्र बहुत मिलते है। शुभ कार्य होते है। प्रवास होता है। धन मिलता है। स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। छात्रों को परीक्षा में सफलता मिलती है। शिक्षा के प्रारंभ या पूर्णता में अडचन नही होती। उत्साह बना रहता है घर में कोई बीमार हो तो वह ठीक हो जाता है। सम्मान  मिलता है। लोगों के विवाहादि कार्यो में मदद करने का अवसर आता है। यह गुरु कुण्डली में अशुभ हो तो इस समय बडे लोगों में अपमान होता है, मन उदास रहता है, खर्च बहुत 

होता है, स्त्री व पुत्र बीमार होते है, वरिष्ठों से अनबन होती है, धन नष्ट होता है। ह 

शुक्र-शुभ हो तो स्त्री सुख अच्छा मिलता है। मन में स्त्री विषयक विचार अधिक आते है। काफी धन मिलता है। व्यवसाय में लाभ होता है। नये लोगों से परिचय होता है। यह शुक्र कुण्डली में अशुभ हो तो स्त्री सुख नही मिलता। परस्त्रियों से संपर्क हो कर धन “ खर्च होता है। बुरी आदते लगती है। 

शनि-शुभ हो तो हर एक काम अडचनो के बाद विलम्ब से किन्तु अच्छी तरह होता है। इस से आत्मविश्वास बढ़ता है। लोगों में प्रभाव बढ़ता है। मित्र मिलते है, उन के स्नेह से मदद होती है। कीर्ति बढती है, उत्तरदायित्व निभाने योग्य बड़ा पद मिलता है। व्यवसाय बढ़ता है। व्यवसाय के लिए बहुत प्रवास होता है। विदेश यात्रा भी हो सकती है। बड़े कामों के विचार मन में आते रहते है। लोगों के काम मुफ्त में करता है। शनि अशुभ हो तो इस समय अपने पर भरोसा नहीं रहता, कही भाग जाने का या आत्महत्या का विचार मन में आता है। 
पिता वा पत्नी बीमार रहती है। कुण्डली में द्विभार्यायोग हो तो यह समय पत्नी के लिए घातक होता है। सन्‍तान का भी वियोग हो सकता है। स्वयं बीमार रहता है। व्यवसाय ठप्प होता है। नौकरी छूटती है। परीक्षा में असफल होता है। शिक्षा में रूकावट आती है। भटकना पडता है। धन नही मिलता, कर्ज होता है। किसी को पैसे दे कर भूत जाने से या कही गुम जाने से या साझेदारी में विश्वासधात से नुकसान होता है। बुरे स्थानों में तबादला होता है, मित्र दूर जाते है, अपमान होता है, कचहरी के मामलों में उलझता है। 

राहु-इस का विवरण हमारे ग्रहण विचार में देखता चाहिए। 

धनस्थान 

रवि-शुभ हो तो पैसा काफी मिलता है, काम अचानक पूरे होते है, लोगों पर प्रभाव पडता है, मन प्रसन्न रहता है, कामुकता बढ़ती हैं किन्तु घर में अडचने रहती है। अशुभ हो तो धन नही मिलता, मिला भी तो टिकता. नही। खर्च के मौके पहले आते है, धन बाद में मिलता है। इस समय सट्टा नही खेलना चाहिए-नुकसान होता है। आँखो में कष्ट होता है। लोगों से झगडे होते है। घर में अव्यवस्था रहती हैं, कर्ज होता है, व्यवसाय में ध्यान नही रहता। 

चन्द्र-धन मिलता है, समाधान रहता है, किन्तु सोचा हुआ काम समय पर नही होता, साधारणत: ये दो दिन अच्छे जाते है। 

मंगल-कुण्डली में शुभ हो या अशुभ-इस समय ध्वन नही मिलता, खर्च के मौके बहुत आते है, बहुत तंगी रहती है, मन स्वास्थ नहीं रहता, झगड़े होते है, बीमारियां होती है, सट्टे में नुकसान होता है, लोगों के अपशब्द सुनना पडता है। शरीर में उष्णता और कामेच्छा बहुत बढती है। व्यवसाय में रुकावटे आती है। 

बुध-मन में स्वस्थता रहती है, लेखन कार्य अच्छा होता है। यह अशुभ हो तो अदालत के लिए जरुरी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने में सावधानी रखनी चाहिए अन्यथा फौजदारी मामलों में उलझना पडता है। 

गुरु-शुभ हो तो पूर्वार्जित जायदाद में वृद्धि होती है। मासिक आमदनी बढ़ती है, पद में वृद्धि होती है। व्यवसाय मैं तरक्की होती है। परिवार का सुख अच्छा मिलता है। प्रवास बहुत होता है। यह अशुभ हो तो इस समय जायदाद के मामलों में झंझटे आती है, कर्ज लेना पडता है। जायदाद गहन रखनी पडती है। नौकरी या व्यवसाय में हानि होती है। घर में कोई बीमार रहता है। कुल मिलाकर समय ठीक नही होता। 

शुक्र-शुभ हो तो भोजन, वस्त्र, धन अच्छा मिलता है। अशुभ हो तो सट्टे में नुकसान होता है, कर्ज होता है। 

शनि-शुभ हो तो आय बढती है, पूर्वार्जित जायदाद बढ़ती है। कर्ज से छुटकारा मिलता है। बडे व्यवसाय की योजनाए मन में आती है। इमारते बनवा कर किराये की आमदनी प्राप्त करने की कोशिश होती है। अदालती और अन्य मामलों में भी सफलता मिलती है। यह अशुभ हो को घर में प्रमुख व्यक्ति अथवा किसी स्त्री की मृत्यु होती है। स्थावर जायदाद में झंझटे हो कर नुकसान होता है। अदालती मामलों में हानि होती है। स्वयं अथवा स्त्री या पुत्र बीमार रहते है। लम्बी बिमारियां चलती है। नौकरी से सस्पेण्ड होना या पद से कमी होना जैसे अपमान के प्रसंग आते है या नौकरी छुट जाती है। व्यवसाय में नुकसान होता है। बेइज्जती होती है। यदि इसी समय गुरु का शुभ भ्रमण हो रहा हो तो उसके शुभ फल भी इस शनि के अशुभ भ्रमण से समाप्त हो जाते है। छात्र परीक्षा में असफल होते है, शिक्षा छोड़कर कमाई की फिकर करनी पडती है। सब मिलाकर यह समय दु:खदायी होता है। 

त्रितीय स्थान 

रवि-शुभ हो तो अच्छे काम होते है। काम जलदी पूरे होते है। अधिकार मिलता है, लोगों पर प्रभाव पडता है। बेकारों को नौकरी मिलती है या व्यवसाय शुरू होता है। धनार्जन शुरू होता है। प्रवास होते है। यह अशुभ हो तो भाई-भाई अलग होते है; यद्यपि झगडा अदालत त्तक नही जाता। वरिष्ठों से अनबन रहती है।॥ मित्रों का संपर्क टुटता है। 

च्वन्द्र-यह समय साधारण ठीक होता है। मित्र मिलते है, उनके साथ चायपानी, सिनेमा आदि में पैसे खर्च होते है ॥ 

मंगल-शुभ हो तो प्रगति और कीर्ति की प्राप्ति होने के लिए सहायक घटनाएँ होती है। साहस बढ़ता है ॥ प्रवास होता है ॥ सट्टे या व्यापार में अंदाज से अधिक फायदा होता है। स्वयं को लाभ होता हैं किन्तु भाई कष्ट में रहते है। यह अशुभ हो तो संतान को कष्ट होता है। भाईयों से झगडा होता है। मन में अस्वस्थता रहती है ॥ स्वभाव गरम रहता है। लोग संदेह की निगाह से देखते है॥ नौकरों के तबादले होते है। 

बुघ-शुभ हो तो बुद्धि शांत और स्थिर रहती है ॥ प्रवास होता है हर एक काम सावधानता से व्यवस्थित होता है ॥ लेखन अच्छा होता है । यह अशुभ हो तो कामों में अव्यस्थता रहती है ॥ व्यवहार में आलस और सफाई का अभाव रहता है। 

गुरु-शुभ हो तो शान्ति और समाधान रहता है ॥ अधिकारियों के तबादले नही होते । चर में मंगल कार्य होते है । पद में वस्धि होती है। व्यापार में परिवर्तन नही होता, लाभ साधारण होता है किन्तु कर्ज नही होता, विवाह और पुत्रप्राप्ति का संभव होता है। लेखन अच्छा होता है। वरिष्ठ अधिकारी प्रसन्न रहते है। छात्र उत्तीर्ण होते है ॥ यह गुरु अशुभ हो तो गर्भपात या सन्‍तान की मृत्यु होती है ॥ पत्नी अस्वस्थ     रहती है। धन हाथ में नही रहता कर्ज होता है। आमदनी से खर्चअधिक होता है। भाइयों से झगडे होते है। छात्र उत्तीर्ण नही होते ।नौकरी छुटती है या व्यवसाय बंद पड़ता है। भाग्य की उतरती स्थितीहोती है।
    शुक्र-शुभ हो तो स्त्रीसुख मिलता है। अशुभ हो तो धनलाभ नहीहोता, स्त्रीसुख में बाधा आती है।
    शनि-शुभ हो तो मन शान्त व समाधानी रहता है। उत्साह वसाहब बढ़ता है। कर्तृत्व बढता है। व्यवसाय में आत्मविश्वास बढ़ताहै। तरक्की होती है। प्रवास बहुत होता है। लोगों के विवाहकार्य मेंमदद करता है। धन मिलता है। मित्र, भाई मदद करते है। अदालतीमामलों में सफलता मिलती है। यह अशुभ हो तो मन में उदासी रहतीहै, काम करने की इच्छा नही होती, आलस बढता है। अनपेक्षिततबादले बुरी जगह होते है। नौकरी का स्थान अच्छा नही मिलता।भाईयों में अदालती मामलों तक झगडे होते है। भाई, बहनोई यासन्तान का मृत्युयोग होता है। बेकार रहना पडता है। सब ओरअपमान के मौके आते है।
    चतुर्थ स्थान
    रवि-शुभ हो तो मेहमान बहुत आते है, घर का सुख ठीक मिलताहै। घर की दुरुस्ती में खर्च होता है। अशुभ हो तो स्वास्थ ठीक नहीरहता, दिमाग को तकलीफ होती है, मन अस्वस्थ रहता है।
    चन्द्र-शुभ हो तो ये दो दिन धनलाभ के होते है, मन प्रसन्न रहताहै। अशुभ हो तो मन अस्वस्थ रहता है।
    मंगल-शुभ हो तो नये व्यवसायोंकी कल्पना मन में आति है।वरिष्ठ अधिकारी प्रसन्न रहते है। उत्साह व साहस बढता है। कामजलदी पूरे होते है। जायदाद के सम्बन्ध में अदालती मामलों का     निर्णय अपने पक्ष में होता है अशुभ हो तो टाइफाईड, अपेंडिसाइटीसजैसी खतरनाक बीमारिया होती है। जायदाद के मामले अदालत मेंजाते है।
    गुरु-शुभ हो तो स्थावर जायदाद मिलती है। तबादला अच्छीजगह होता है। माता का स्वास्थ ठीक रहता है। मित्र मदत करते है।अध्ययन के लिए समय ठीक रहता है। खेतीबाडी से अच्छी आमदनीहोती है। पेन्शन का समय हो तो यह धन मिलने में दिक्कत नहीहोती। गुरु अशुभ हो तो-खासकर मेष लग्न वालों के लिए कुण्डली मेंभी चतुर्थ में गुरु हो तो यह समय स्थावर जायदाद के नष्ट होने काहोता है। दरिद्री हो जाता है। माता बीमार रहती है। पिता का वियोगहो सकता है। तबादला बुरी जगह हो जाता है। तरक्की रुक जाती है।लोगों में निन्दा होती है। जायदाद के बारे में अदालती मामले चलतेहै, निर्णय विरुद्ध होता है। मन में स्वस्थता नही रहती।
    शुक्र-शुभ हो तो व्यवसाय में फायदा होता है, धन मिलता है, स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। अशुभ हो तो व्यवसाय में नुकसान होता है,स्त्री सुख में बाधा आती है, पैसा नही मिलता।
    शनि-शुभ हो तो जायदाद बढती है, व्यवसाय में फायदा होता है।किसी रिस्तेदार की मृत्यु से वारिस के रुप में धन मिलता है। बड़ेकाम होते है। तबादला और तरक्की होती है। यदि यहाँ ३६ वाँ वर्षपुरा हो रहा हो तो भाग्योदय की शुरूआत होती है। यह शनि अशुभहो तो पेन्शन में दिक्कत आती है (अतः इस शनि के भ्रमण के पहलेपेन्शन लेना संभव हो तो एक-दो-साल पहले ही लेनी चाहिए।) पिताया घर के किसी वरिष्ठ व्यक्ति की मृत्यु होती है। माता बीमार रहतीहै। पत्नीकी मृत्यु संभव होती है। (कुण्डली में द्विभार्या योग हो तो।)व्यवसाय बन्द पड़ता है। बुरी जगह तबादले होते है। बेइज्जती होतीहै। पत्नी-पुत्र इच्छा के विरुद्ध व्यवहार करते है। पूर्वार्जित जायदादके संबंध में भाइयों में झगडे होते है। 
    पंचम स्थान
    रवि-शुभ हो तो बुद्धि स्थिर रहती है। अच्छे काम होते है।प्रारंभ किये काम में सफलता मिलती है। स्वास्थ ठीक रहता है।उत्साह बढ़ता है। अगुभ हो तो पुत्रों का स्वास्थ बिगडता है, दवादारमें बहुत खर्च होता है, मन अस्वस्थ रहता है। स्वयं की और पटनी की
    उष्णता बढ़ती है।
    चन्द्र-ये दो दिन अच्छे जाते है। मन प्रसन्न रहता है। धनमिलता है। अशुभ हो तो मन उदास रहता है, काम में मन नहीं

मंगल-शुभ हो तो व्यापार या सट्टे में लाभ होता है। सांहस,उत्साह बढ़ता है। तरक्की होती है। अच्छी जगह तबादले होते है।मेहनत की परवाह न कर के काम करता है। अशुभ हो तो सन्तानोंका स्वास्थ ठीक नही रहता। सट्टे में नुकसान होता है। आमदनी सेखर्च अधिक होता है। व्यर्थ प्रवास करना पडता है। पत्नीका स्वास्थबिगड़ता है। मन अस्वस्थ रहता है। हर काम में असफलता मिलती

बुध-शुभ हो तो बुद्धि तेज होती है, विचारशील होता है, छोटीबाते भी ध्यानपूर्वक देखता है। शेयर-व्यवहार में लाभ होता है। लेखनकार्य, छात्रो का अध्ययन अच्छा होता है। अशुभ हो तो पढ़ाई में ध्यान

गुरु-शुभ हो तो परीक्षा में सफल होता है, शिक्षा पूर्ण होती है।सन्तान प्राप्ति या उसकी संभावना प्रकट होती है। नौकरी मिलती है।धनलाभ साधारण होता है। किर्ती बढ़ती है। अशुभ हो तो शिक्षाअधुरी रहती है या परीक्षा में उत्तीर्ण नही होता। बेकार रहना पड़ताहै या नौकरी में बहुत कम वेतन मिलता है। मन असन्तुष्ट रहता है।
शुक्र-शुभ हो तो यह मास उत्तम जाता है। मित्रोंसे मदद मिलती है l     है। सब सुख मिलता है। परस्त्री में संपर्क होता है। मन प्रसन्न रहताहै। अणुभं हो तो पत्नी की बीमारी से स्त्रीसुख में बाधा पड़ती है। पुत्रभी बीमार रहते है।
    शनि-शुभ हो तो सन्तान (विशेष कर कन्या) होती है। शिक्षापूरी होती है। काम सफल होते है। अधिकार मिलता है। तरक्की होतीहै। शेयर, सट्टे के व्यवहार में लाभ होता है। किर्ती बढती है। मित्रोंसे मदद मिलती है। विदेश यात्रा हो सकती है। जायदाद मिलती है याखरीदी जाती है। अशुभ हो तो सट्टे और शेयर व्यापार में नुकसानहोता है। दीवाला निकल सकता है। कर्ज होता है। बेकारी, बेइज्जती,सन्तान की मृत्यु, पत्नी की बीमारी, स्वयं की बीमारी, आमदनी सेअधिक खर्च, खाने की मुश्किल, दूसरों से भीख मांगने जैसी हालत,मित्रों से दुराव, अपमान, जायदाद या व्यापार के लिये झगडे, नौकरीमें सस्पेण्ड होना या किसी मामले में कारावास आदि दुःखदायक बातेहोती है।
    षष्ठ स्थान
    रवि-शुभ हो तो आरोग्य उत्तम रहता है। मन स्वस्थ रहता है।काम सफल होते है। शत्रु पराजित होते है। अशुभ हो तो उष्णताबढ़ती है, काम सफल न होने से मन उदास रहता है।
    चन्द्र-शुभ हो तो कुछ धन मिलता है, मन संतुष्ट रहता है।अशुभ हो तो धन नही मिलता तथा मन में समाधान नही रहता।
    मंगल-शुभ हो तो व्यवसाय के लिए प्रवास होता है। सफलताकष्ट से मिलती है। रिश्वत दे कर अदालती काम करवाने पडते है।स्त्री सुख अच्छा मिलता है। अशुभ हो तो फौजदारी मामलों मेंउलझना पड़ता है, लोगों से झगडे होते है, अदालत के निर्णय विरोधमें होते है। व्यर्थ ही पैसा खर्च होता है, कर्ज होता है। बवासीर,बद्धकोष्ठ आदि से कष्ट होता है। बुरी जगह तबादला होता है।

    नौकरी में पद कम होने की संभावना होती है। वरिष्ठ अधिकारी सेझगडा होता है।
    बुध-शुभ हो या अशुभ बुद्धि को स्थिर रखता है। परिस्थिति मेंकोई हलचल नही होती। कार्यक्रम शान्ति से चलता रहता है।
    गुरु-शुभ हो तो शत्रु दबे रहते है या पराजय स्वीकार करते है।चुनाव में बड़े प्रतिस्पर्धी का भी पराजय कर सकता है। स्वास्थसाधारण ठीक रहता है। कर्ज चुकाने का इन्तजाम होता है। अच्छेस्वप्न दिखते है। अशुभ हो तो कर्ज होता है, स्वास्थ ठीक नही रहता,काम सफल नही होते, मन में स्वस्थता नही रहती, परीक्षा में उत्तीर्णनही हो सकते, बुरी जगह तबादला होता है। काम से कष्ट होता है।मामा या मौसी से तकलीफ होती है। अदालत का निर्णय विरूद्ध होताहै।
    शुक्र-शुभ हो या अशुभ कामवासना बहुत बढ़ती है, स्त्रीसुखअच्छा मिलता है।
    शनि-शुभ हो तो नया व्यवसाय शुरू होता है, शत्रु से कष्ट दूरहोता है, स्वास्थ ठीक रहता है, कर्ज चुका दिया जाता है, मित्र मददकरते है, तरक्की होती है। अधिकार मिलता है। वरिष्ठों से संघर्ष करके प्रगति होती है। वरिष्ठ प्रभावित होते है। अशुभ हो तो रक्तक्षय,पाण्डुरोग आदि से कष्ट होता है, मृत्यु भी संभावित है। असफलतामिलती है। अदालत के निर्णय विरुद्ध होते है। कारावास हो सकताहै। तरक्की नहीं मिलती। बार बार तबादले होते है। रहने की जगहबदलनी पडती है।
    सप्तम स्थान
    रवि-शुभ हो तो तरक्की होती है, वरिष्ठों पर प्रभाव पडता है।इच्छानुसार काम होते है। पत्नी स्वस्थ रहती है, स्त्रीसुख अच्छामिलता है। प्रवास की संभावना होती है। अच्छे स्थान पर तबादला     होता है। व्यवसाय में लाभ होता है। अशुभ हो तो स्त्रीसुख नहीमिलता, पत्नी व पुत्र बीमार रहते है। स्वयं बीमार रहता है। व्यवसायमें नुकसान, वरिष्ठों से झगडे, बुरी जगह तबादले होते है।
    चन्द्र-ये दो दिन मन को कष्ट ही होता है।
    मंगल-शुभ हो तो व्यवसाय, सट्टा, शेयर आदि में फायदा होताहै। अदालत के निर्णय अनुकूल होते हैं। वरिष्ठों से संघर्ष कर केप्रगति होती है। वरिष्ठ प्रभावित होते है। तबादले नही होते । अशुभहो तो चुनाव में बड़ी प्रतिस्पर्धा और बहुत खर्च करना पड़ता है,साझेदारी तथा अदालती मामलों में नुकसान होता है। साझेदारी केव्यवसाय बन्द करने पडते है। स्त्री-पुत्र बीमार रहते है। झगड़ेमारपीट तक पहुंचतें हैं।
    बुध-शुभ हो तो व्यापार, शेअर आदि में लाभ होता है। नयेव्यवसाय या चालु व्यवसाय बढ़ाने की बात मन में आती रहती है।छात्रों के लिए पढ़ाई अच्छी होने का समय रहता है, मन प्रसन्न रहताहै। अच्छे विषयों पर चर्चा, लेखन आदि काम अच्छे होते हैं। अशुभहो तो बुद्धि में व्यग्रता रहती है। बोलने व लिखनेमें गलतियाँ होने सेलोगों को गलतफहमी होती है। छात्रों और लेखकों को यह समय बुराहोता है। काम में नुकसान होता है।
    गुरु-शुभ हो तो व्यवसाय उत्तम व लाभदायक रहता है। परिवारके लोगों का स्वास्थ्य उत्तम रहता है। चुनाव में जीत होती है। बड़ेलोगों से परिचय होता है। काम सफल होते हैं। छात्र परीक्षा में उत्तीर्णहोते हैं। लेखन प्रकाशित होता है। वरिष्ठ प्रसन्न रहते हैं। तरक्कीहोती है। शेयर या सट्टे में लाभ नही होता। सन्तान की संभावना याजन्म होता है। विवाह होता है। पुत्र आदि के मंगल कार्य होते हैं।विवाह कार्यों में मदद देनी पड़ती है। अदालती मामलों में समझोताहोने से फायदा होता है। अशुभ हो तो व्यवसाय बन्द करना पड़ता है,     स्त्री-पुत्र बीमार रहते है, मित्र धोखा देते हैं। काम असफल होते हैं।परीक्षा, अदालती मामले, तरक्की आदि में विरुद्ध निर्णय होते है।कुण्डली में द्विभार्या योग हो तो इस समय पत्नी की मृत्यु संभावितहोती है।
    शुक्र-शुभ हो तो कामवासना कम होती है, स्त्रीसुख अच्छामिलता है। व्यवसाय ठीक चलता है, धन मिलता है। अशुभ हो तोपरस्त्री से संपर्क होता है। धन नही मिलता, अड़चनें आती है,व्यवसाय मन्द होता है।
    शनि-शुभ हो तो धन अच्छा मिलता है। विदेशयात्रा की संभावनाहोती है। व्यवसाय अच्छा चलता है। नया व्यवसाय शुरू हो सकताहै। अदालती मामलों में निर्णय अनुकूल होते हैं। जायदाद के पुरानेमामलोंमें लाभ होता है। कुण्डली में किसी नष्ट व्यक्ति का धनमिलनें का योग हो तो वह इस समय मिलता है। विधवा से पुनर्विवाहसंभव होता है। तरक्की मिलती है। किन्तु वरिष्ठों से संघर्ष होता है।स्त्री-पुत्रों का स्वास्थ्य सुधारता है। कन्या या पुत्र के विवाह की बातचलती है। अन्य सम्बन्धियों के विवाह कार्यों में मदद देनी पडती है।शेअर-सट्टा आदि में लाभ होता है। अशुभ हो तो व्यवसाय, साझेदारीआदि में नुकसान होता है। कुण्डली में द्विभार्ययोग हो तो पत्नी केमृत्यु की संभावना होती है। सन्तान का वियोग होता है। अदालत केनिर्णय विरुद्ध होते हैं। हाथ में पैसा नही रहता। नौकरी छूटने यासस्पेण्ड होने का योग होता है। वरिष्ठों से झगडे होते हैं। काम सफलनही होते । छात्र परिक्षेमें नहीं बैठ पाते या असफल होते है। माता यापिता का वियोग होता है। चुनाम में हार होती है। जायदाद बेचनीपड़ती है, कर्ज होता है, अन्न की मुश्किल पडती है। घोखा दिये जानेसे नुकसान होता है। जायजाद के मामले अदालत में जाते है।धनवान परस्त्री से संपर्क होता है। 
    अष्टम स्थान
    इस स्थान में शनि और गुरु के सिवाय अन्य ग्रहों के भ्रमण कामहत्त्व नही है।
    रवि-शुभ हो या अशुभ इस मास में स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।वरिष्ठ लोग बार बार नाराज होते हैं।
    चन्द्र-मन प्रसन्न रहता है। इन दो दिनों में सुख की नींद मिलती
    है।
    संगल-मलेरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियाँ होती है। अवस्थाछोटी हो तो चेचक, खसरा जैसे रोग होते हैं। धन नही मिलता, खर्चबहुत होता है। नौकरी में छुट्टी लेकर बैठना पडता है। ऊंचाई सेगिरने का डर रहता है।
    बुध-लिखने में गलतियाँ होती है। इस से वरिष्ठ अधिकारी सेडांट खानी पडती है। कागज रखने में अव्यवस्था हो जाती है। बुधशुभ हो तो इस के उलटे फल मिलेंगे।
    गुरु-शुभ हो तो अकस्मात धन मिलता है। किसी की धरोहर मिलजाती है-धरोहर रखनेवाले की अकस्मात मृत्यु हो जाती है इस लिएवह लौटांने की जरूरत नही रहती। गुप्त बातों के ज्ञान की रचिरहती है। यह अशुभ हो तो व्यवसाय बन्द पड़ता है, कर्ज होता है,खाना मिलने में अडचन पडती है, बहुत कष्ट का समय होता है।
    शुक्र-शुभ हो तो स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। परस्त्री से संपर्कहोता है, उसी से धन भी मिलता है। व्यवसाय ठीक चलता है, फायदाहोता है। अशुभ हो तो पैसा खर्च होकर भी स्त्रीसुख नही मिलता,व्यवसाय में लाभ नही होता।
    शनि-कुण्डली में शनि कैसा भी हो -शुभ हो या अशुभ हो-इसस्थान में भ्रमण के समय अशुभ फल देता है। नौकरी छुटना,कारावास की संभावना, सस्पैण्ड होना, व्यवसाय बन्द पँडना,धनहानि, स्त्री-पुत्रों की बीमारीयां, प्रवास, कामों में असफलता, अदालत     के मामलों में विरुद्ध निर्णय, लोगों में निन्दा-इस प्रकार शारीरिक,आर्थिक, मानसिक सब प्रकार के कष्ट होते है। मन विरक्त होनेलगता है।
    नवम स्थान
    रवि-शुभ हो तो व्यवसाय के लिए प्रवास होता है, व्यवसायअच्छा चलता है, हाथ में पैसा रहता है, भाग्योदय की आशा रहती है,काम सफल होते है। अशुभ हो तो पुत्र या भाई बीमार रहते है। धनबहुत खर्च होता है, मन में स्वस्थता नही रहती।
    चन्द्र-मन अस्वस्थ रहता है, हाथ में पैसा नही रहता, निन्दअच्छी नही आती।
    मंगल-शुभ हो तो व्यवसाय में उत्साह रहता है। थोडे समय काप्रवास होता है। लोगों पर प्रभाव पडता है। अच्छे स्थान में तबादलेहोते है। तरक्की होती है। सट्टा-शेयर में लाभ होता है। अशुभ हो तोपुत्र या भाई बीमार रहते है। मित्र, भाई धोखा देते है। बुरे स्थान मेंतबादले होते है।
    बुध-शुभ हो तो लेखन, प्रकाशन, पुस्तक विक्री के लिए यह समयअच्छा होता है। अन्य व्यवसाय साधारण ठीक चलते है। शेअर-व्यापारमें लाभ होता है। हाथ में पैसे रहते है। अशुभ हो तो बुद्धि अस्थिरहोती है, व्यर्थ ही भटकने की इच्छा होती है।
    गुरु-शुभ हो तो शिक्षा पूरी होती है। शिक्षा क्षेत्र में या सरकारीनौकरी मिलती है। विवाह तथा सन्तान प्राप्ति का योग होता है।परीक्षा में सफलता मिलती है। प्रवास, लेखन अच्छा होता है। शिक्षक,प्राध्यापक, संपादक, प्रकाशक आदि के लिए यह समय अच्छा होता है,इनकी कीर्ति बढती है। धन कम मिलता है। भाई या बहन का विवाहहोता है। अशुभ हो तो शिक्षा अधूरी रहती है। परीक्षा में सफल नहीहोते। शाला-कॉलेज छोड़ना पड़ता है। बहन को वैधव्य का दुःख     सहना पडता है या उसकी दुराचार की ओर प्रवृत्ति होती है। सन्तान
    के लिए यह समय घातक होता है। बदनामी होने जैसी घटनाएं होतीरहती है।
    शुक्र-कुण्डली में शुभ हो या अशुभ-इस स्थान में भ्रमण का
    मध्यम सुखदायी फल देता है। यह विशेष रूप से कवियों के लिए उत्तमहोता है-उन्हें काव्य की प्रेरणा विशेष मिलती है।
    शनि-शुभ हो तो कीर्ति बढती है। धन मिलता रहता है। नयेउद्योगों के विचार आते रहते है। प्रवास होता है। तरक्की मिलती है।अच्छे स्थान पर तबादला होता है। सन्तान प्राप्त होती है। अशुभ होतो इसका भाई -बहनों पर बड़ा अशुभ प्रभाव पडता है। भाई या बहनका मृत्यु या वैधव्य योग होता है या उनके पालन पोषण की जिम्मेदारीउठानी पडती है। सन्तान की मृत्यु या गर्भपात की संभावना होती है।भाई धोखा देते है। व्यवसाय में दिक्कते आती है। धन की तंगी रहतीहै। तरक्की रक जाती है।
    दशम स्थान
    रवि-शुभ हो तो सम्मान, तरक्की, धन, कामों में सफलता,अच्छी बुद्धि ये फल देता है। अशुभ हो तो असफलता, पिता से झगडा,नौकरी में कष्ट, नुकसान होकर भटकना, व्यवसाय में हानी ये फलदेता है।
    चन्द्र-ये दो दिन सन्तोष से बीतते है।
    मंगल-शुभ हो तो हर एक काम में सफलता जलदी मिलती है।कीर्ति बढ़ानेवाले काम पूरे होते है। व्यापार, सट्टा, शेयर में लाभ होताहै। तरक्की होती है। वरिष्ठ अधिकारी प्रसन्न रहते है। अपने अधीननौकारों पर प्रभाव पड़ता है। नये मित्र मिलकर उन से लाभ होताहै। उत्साह व सामर्थ्य बढता है। अशुभ हो तो व्यवसाय में नुकसान,वरिष्ठों से झगडा, आलस, सन्तान की बीमारी आदि से कष्ट हौता है।काम में मन नही लगता।
    बुध-शुभ हो तो ऑफिस के काम व्यवस्थित होते है। नये लोगोंसे परिचय होता है। लेखन अच्छा होता है। शेयर में लाभ होता है।अशुभ हो तो लेखन या जमाखर्च में गलतियाँ होती है। अधिकारियों सेडांट खानी पडती है। लेखक व ज्योतिषियों के लिए यह समय ठीकनहीं होता।
    गुरु-शुभ हो तो भाग्योदय कराता है। धन मिलता है। तरक्कीहोती है। व्यापार में बहुत लाभ होता है। बड़े लोगों से परिचय होताहै परिवार का सुख ठीक मिलता है। चुनाव में जीत होती है। कीर्तिमिलती है। अच्छे कामों के लिए यात्रा होती है। अदालत के निर्णयअनुकूल होते है। अशुभ हो तो व्यापार में नुकसान, पिता या पुत्रों कीकठिन बीमारी या मृत्यु, नौकरी में सस्पेण्ड होना या तबादला होना,नौकरी छूटने का डर बना रहना आदि अशुभ फल मिलते है।
    शुक्र-शुभ हो तो मित्र बहुत मिलते है, उन से मदत मिलती है।व्यवसाय ठीक चलता है, धन मिलता है। अशुभ हो तो स्त्रीसुख नहीमिलता व्यवसाय में दिक्कते आती है। धन नही मिलता।
    शनि-शुभ हो तो कीर्ति बढती है। तरक्की, व्यवसाय में लाभ,चुनाव में जीत आदि शुभ फल मिलते है। विदेश यात्रा की संभावनाहोती है। नौकरी या व्यवसाय में परिवर्तन होता है। अदालत केनिर्णय अनुकूल होते है धन मिलता है। बडे लोगों से परिचय होता है।सट्टा शेयर में लाभ होता है। अशुभ हो तो बदनामी होती है। बुरीजगह तबादले होते है। वरिष्ठों से कहासुनी, तरक्की रुक जाना,परिवार में माता, पिता या सन्तान की मृत्यु, कज होना, स्त्रीपुत्रों सेदूर रहना आदि अशुभ फल मिलते है। बेकार रहना पड़ता है। यहसमय सब प्रकार से अशुभ जाता है।
    एकादश स्थान
    इस स्थान में शनि और गुरु के सिवाय अन्य ग्रहों का भ्रमणविशेष परिणामकारक नही होता।
    गुरु-शुभ हो तो दिवाह, सन्तान होना या उसकी संभावना होना,व्यवसाय में थोडा लाभ, सट्टा-शेयर आदि में लाभ, तरक्की ये शुभ फलमिलते है। यह गुरु सन्तति और सम्पत्ति में एक फल देता है-धनमिला तो सन्तान नही होती, सन्तान हुई तो धन नहीं मिलता। अशुभहो तो विवाह की बात पक्की नही हो पाती, विवाह हो कर सन्तान हुईहो तो उसके वियोग की सम्भावना होती है। व्यवसाय, सट्टा, शेयरआदि में नुकसान होता है। नौकरी में तरक्की नही मिलती।
    शनि-शुभ हो तो व्यवसाय ठिक चलता है। तरक्की होती है।तबादले के लिए प्रयत्न करने पर सफलता मिलती है। अकस्मात धनमिलता है। अशुभ हो तो सन्तान की मृत्यु, स्त्री की बीमारी, धन कीहानि आदि से कष्ट होता है।
    व्ययस्थान
    इस स्थान में किसी भी ग्रह का भ्रमण विशेष शुभ नही होता।साधारण अशुभ फल ही मिलते है। रवि, चन्द्र, बुध, शुक्र का विशेषपरिणाम नही होता। मंगल, गुरु व शनि के अशुभ फल तीद्र होते है।कुण्डली में ये शुभ हो या अशुभ इस स्थान में भ्रमण के फल शुभ नहीहोते।
    मंगल-धन नही मिलता, खर्च अधिक होता है, कर्ज होता है।कुण्डली में शनि अशुभ हो तथा मंगल से अशुभ योग करता हो तो इससमय कारावास हो सकता है। स्वास्थ ठीक नही रहता। कष्ट होतारहता है।
    गुरु-व्यवसाय में दिक्कतें आती है। पैसे की तंगी रहती है। मनमें स्वस्थता नही रहती।
    शनि-नौकरी छूटना, तरक्की रूकना, किसी कारण से कारावास,विदेशयात्रा, व्यवसाय बन्द होना, पत्नी की मृत्यु ये अशुभ फल मिलते     है। सिर्फ जन्मकुण्डती में शनि व्ययस्थान में और मकर राशि में होतो इस के कुछ अच्छे फल मिलते है। फिर भी पतनी दूर रहती है,स्त्रीसुख में बाधा आती है।
    प्रकरण ६
    ग्रहों पर से ग्रहों के भ्रमण के फल
    रवि का अन्य ग्रहों पर से भ्रमण
    रवि पर से या उस से सप्तम स्थान से रवि का भ्रमण कष्ट देताहै। धन मिलता है किन्तु खर्च हो जाता है-टिकता नही। स्वास्थ ठीकनही रहता। उष्णता या पित्त के विकार होते है। बद्धकोष्ठ से कष्टहोता है। व्यवसाय बन्द पडता है।
    चन्द्र पर से या उस से सप्तम स्थान से-यदि रवि अशुभ स्थानका स्वामी हो तो इस समय मन को कष्ट होता है, धन खर्च होता है,व्यवसाय में कष्ट होता है, लाभ कम होता है। शुभस्थान का स्वामीहो तो व्यापार में लाभ होता है तथा मन प्रसन्न रहता है।
    मंगल पर से या उससे सप्तम स्थान से-झूट बोलना, झुठे,व्यवहार, लोगों में गलतफहमी फैलाना आदि से कष्ट होता है। धननही मिलता, कर्ज होता है। टाइफाइड या मलेरिया होता है। कुछदिन व्यवसाय बन्द होता है। शुभ हो तो व्यवसाय में उत्साह व शक्तिबढ़ती है। कर्ज चुका दिया जाता है।
    बुध पर से या उस से सप्तम से-बुद्धि तेज होती है, साधारणतःगलतियां नही होती, काम जल्दी हो जाते है।
    गुरु पर से या उस से सप्तम से-यह समय शुभ नही होता। घरके लोग बीमार रहते है, धनहानि होती है। व्यापार ठीक नही चलता।नौकरी में कष्ट होता है। 
शुक्र पर से था उस से सप्तम से-इस समय स्त्रीसुख नहीं मिलता, बाधाएं आती है। मेहमान आते है। 

शनि पर से या उससे सप्तम से-यह समय कष्टपूर्ण होता है। प्रवास, आर्थिक अड्चने, असफलता, मन की अस्वस्थता, कुछ शारीरिक अस्वस्थता आदि से कष्ट होता है। 

चन्द्र का भ्रमण 

रवि से या उस के सप्तम से-कुण्डली में चन्द्र अशुभ स्थान में हो तो इस समय मन अस्वस्थ रहता है, धन नही मिलता, काम नहीं होते । 

चन्द्र से या उस के सप्तम से-चन्द्र शुभ हो तो ऐश-आराम में ये दो दिन बीतते है, खुशी के समाचार मिलते है। अशुभ हो तो समाधान नही रहता। 

मंगल से या उस के सप्तम से-कहासुनी, मारपीट की घटनाएं होती है। दिमाग गरम रहता है। धन मिलता है, काम होते है। खर्च काफी होता है। 

बुध से या उस के सप्तम से-मन अस्वस्थ रहता है, लिखने में गलतियां होती है, अजीब समाचार मिलते है। 

गुरु से या उस के सप्तम से-काम नही होते, धन नहीं मिलता, कष्ट होता है, मन स्वस्थ नहीं रहता। 

शुक्र से या उसके सप्तम से-स्त्रीसुख मिलता है, मन प्रसन्न रहता है, ऐश आराम में ये दो दिन बीतते है। धन मिलता है। 

शनि से या उस के सप्तम से-धन मिलता है। किन्तु सब सर्च हो कर बाकी कुछ नही बचता, कर्ज भी होता है। मन अस्वस्थ रहता है। कहासुनी की घटनाएं होती है। सभी काम असफल होते है। 
मंगल का भ्रमण 

रवि से यथा उस के सप्तम से-टाइफाइड, मलेरिया, खवासीर आदि रोगों से कष्ट होता है। आमदनी से खर्च अधिक होता है। व्यवसाय कुछ समय के लिए बंद पडता है। लोगों की तीखी बाते सुननी पडती डै॥ आफिस में वरिष्ठ अधिकारी कष्ट देते है। तबादला होने की संभावना होती है। सट्टा-शेयर में नुकसान होता है। 

चन्द्र से या उसके सप्तम से-रवि से भ्रमण के समान ही फल मिलते है। किन्तु कुण्डली में ये दोनों ग्रह शुभ हो तो कुछ शुभ फल भी पाये जाते है-उत्साह व शक्ति बढ़ती है, काम जल्दी पूरे होते है। साहस से व्यवसाय बढ़ता है तथा लाभ होता है। वरिष्ठ अधिकारी प्रसन्न रहते है ॥ सट्टा-शेअर में लाभ होता है। 

संगल से या उसके सप्तम से-कुण्डली में मंगल २-४-७-५-७-८-११-१२ इन में से किसी स्थान में हो तो इस भ्रमण के समय बहुत अशुभ फल मिलते है। धनहानि, कर्ज, व्यवसाय में नुकसान, सट्टा-शेयर में हानि गर्भपात, सन्‍तान को कष्ट, अस्वस्थता आदि से तकलीफ होती है ।॥ अन्य स्थानों में मंगल हो तो उन्‍त स्थानों के अनुख्प कुछ शुभ फल मिलते है। रवि, चन्द्र और मंगल पर गोचर मंगल का अ्रमण छोटे बच्चों की कुण्डली में हो उस समय चेचक, खसरा, फोडे, फुन्सी, सुखा, अतिसार; टाइफाइड आदि से कष्ट होता है। 

बुध से या उसके सप्तम-से झूठी गवाह देने या जाली हस्ताक्षर करने से, दस्तावेज चुराये जाने या गुम जाने से तकलीफ होती है। लोग निन्‍दा करते है। लिखने-पढने में गलतिया होने से वरिष्ठ अधिकारी नाराज होते है। 

बुद् से या उसके सप्तम से-अधिकार बढता है, तरक्की होती है। सट्टामें लाभ होता है। सन्‍तान को कष्ट होता है। 

शुक्र से-विषयवासना बढती है, स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। इसके सप्तम से-पत्नी के बीमार रहने या मायके जाने से स्त्रीसुख में बाधा आती है। जितनी आमदनी हो उतना खर्च होने से घत बचता नहीं है। 

शनि से या उस के सप्तम से-कुण्डली में शति ३-४-७-८-१०-१२ इन में से किसी स्थान में अशुभ हो तो मंगल के भ्रमण के फल बहुत अशुभ मिलते है। धनहानि, असफलता, आमदनी से अधिक बहुत सर्च, बेइज्जती, फौजदारी मामले, चोरी, तरक्की रुक जाता, बुरी जगह तबादला होना, पत्नी की बीमारी आदि से कष्ट होता है। यदि कुण्डली में शनि और मंगल दोनों शुभ हो तो विशेष नुकसान नहीं होता और यह समय कुछ आराम से बीतता है। 

बुध का भ्रमण 

इस ग्रह का भ्रमण मंगल व शनि पर से ही कुछ महत्व का होता है-अन्य ग्रहों पर इसके भ्रमण के विशेष फल अनुभव में नही आते। मंगल व शनि पर से या इन के सप्तम से बुध के भ्रमण के समय बुद्धि व्यग्र रहती है, अपनी वस्तुएं कही भूल आने से नुकसान होता है। लिखने में गलतियां होती है। दस्तावेज व गवाहियां झुठी सिद्ध होने से कष्ट होता है मन अस्वस्थ रहता है। लोगों से कहासुनी या समाचार पत्रों में उलटे सीधे झगडे होते है। लेखन गन्दा होता है। शिक्षक, प्राध्यापक, हिसाब जांचनेवाले अधिकारी, क्लर्क आदि लोगों के लिए यह समय अशुभ होता है। प्रवास होता है। 

गुरु का भ्रमण 

रवि से या उस के सप्तम से-कुण्डली में रवि और गुरु १,२,३,४,७,८,१२ इन में से किसी स्थान में हो तो इस समय अशुभ फल बहुत मिलते है। कठिण बीमारी तथा तक की सम्भावना होती है व्यवसाय बन्द पड़ना, धनहानि, झूटना, सस्पेण्ड होना, अपमान, भाईयों मे बटवारा, अदालत के निर्णय विरूद्ध होना, पिता की बीमारी या मृत्यु आदि अशुभ फल मिलते है। रवि ५, ६, ९, १० ११ इन स्थानों में हो तो यह गुरु का भ्रमण कुछ सुखदायक होता है। 

चन्द्र से या उस के सप्तम से-कुण्डली में चन्द्र ३, ६, ७, ८, ११, १२ इन स्थानों में हो तो इस भ्रमण के समय बहुत अशुभ फल मिलते है। माता की बीमारी पिता का वियोग, व्यवसाय बन्द होना, कुछ समय के लिए , धनहानि, कर्ज होना सन्‍तान का वियोग, स्वयं की लम्बी बीमारी, कष्टदायक प्रवास, नौकरी में सस्पेण्ड होना आदि से तकलीफ होती है। चन्द्र १, २, ४, ५, ९, १० इन स्थानों में हो तो इन फलों में सौम्यता आती है। 

मंगल से या उस के सप्तम से-कुण्डली में मंगल व गुरु दोनों शुभ हो तो इस समय अधिकार बढता है। तरक्की होती है। वरिष्ठ अधिकारी प्रसन्न रहते है। उत्साह व शक्ति बढती है। स्वयं का और स्त्री-पुत्रों का स्वास्थ अच्छा रहता है। सट्ठा-शेयर में लाभ, अच्छे स्थान में तबादला होता है। कुण्डली में मंगल व गुरु अशुभ हो तो गर्भपात, सन्‍्तान की मृत्यु, अधिकार कम होना, तरक्की रुकना, अधिकारियों में गलतफहमी, व्यापार में नुकसान, संचित पैसा खर्च हो जाना, कर्ज होना आदि अशुभ फल मिलते है। 

बुध से या उस के सप्तम से-ये दोनों ग्रह शुभ हो तो बुद्धि स्थिर व मन शान्त रहता है, न्‍्याय-अन्याय का निर्णय ठीक हो सकता है। लेखन अच्छा होता है, दस्तावेज ठीक रहते है। ये दोनों अशुभ हो तो घर, जायदाद, खेती आदि के दस्तावेजों में कुछ धोखाधडी से नुकसान होता है। 

गुरु से या उस के सप्तम से-कुण्डली में गुरु ३, ६, ७, ८, १२ इन स्थानों में हो तो भाग्य में उतार की दशा होती है। धनहानि, व्यवसाय बन्द होना, दरिद्र हो जाना, व्यर्थ भटकना, अपमान, कर्ज, स्त्री-पुत्रों का विरोध ये अशुभ फल मिलते है। शुभ स्थान में हो तो ये फल सौम्य हो जाते है। 

शुक्र से या उस के सप्तम से-कण्डली में शुक्र १, ३, ६, ७, ८, १२ इन में से किसी स्थान में हो तो इस भ्रमण के समय झगडे, मैर बढ़ता, जिद से झगड़ा करना, अदालत के लिर्णय विरूद्ध होता, बहुत घनहानि, अपना कमाया हुआ सथा पूर्वार्जित घन भी नष्ट होता, कर्ज होना, बुरी आदते लगना, व्यवसाय बन्द पडता, बेइज्जती, किसी से मदद ना मिलना, गाँव छोडना, स्त्री-पुत्रों का वियोग, बेकारी, अदालती मामलों मे फँसना, चिन्ता, मन की अस्वस्थता, स्त्री-पुत्रों तथा निकट संबंधियो का विरोध, आशा इच्छा समाप्त हो जाना, नौकरी में सस्पेण्ड होना, रिश्वत खाने के आरोप, समय से पहले ही पेन्शन लेने से कष्ट आदि अशुभ फल मिलते है। यहां स्त्री-पुत्रों के वियोग होनेपर शेष अशुभ फल सौम्य हो जाते है। शुक्र व गुरु दोनों शुभ हो ठो सौम्य फल मिलते है। 

शन्ति से या उस के सप्तम से-कुण्डली में शनि १, ३, ५, ७, १०, १२ इन में से किसी स्थान में तथा शुभ हो तो नष्ट हुआ घन वापस मिलता है, अदालत के निर्णय अनुकूल होते है, पुराने दस्तावेज मिलने से लाभ होता है॥ सन्‍तान होती है, किन्तु दुर्बल तथा बहुत रोने से कष्ट देनेवाली होती है। नौकरी या व्यवसाय में परिवर्तन होने की संभावना रहती है। शनि जिस स्थान में छो उस स्थान के फल उत्तेजित होते है ॥ कुण्डली में २, ४, ६, ८, ९, ११ इन स्थानों में से कहीं शनि हो तो इस भ्रमण के समय आर्थिक स्थिति बिगडती है, सन्‍तान का वियोग होता है, व्यवसाय ठीक नही चलता, उत्तार चढाव आते रहते है, नौकरी में भी अस्थिरता रहती है॥ 

शुक्र का ऋसण 

कुण्डली में शुक्र ३, ६, ७, ८, १० इन में से किसी स्थान में हो तो इस का भावों में भ्रमण सुखदायक नही होता। मंगल व चन्द्र के सिवाय अन्य ग्रष्टों पर इस के भ्रमण के विशेष फल चयही मिलते ॥ २, ४, ५, १, ९, १२ इन में से किसी स्थान में शुक्र हो तो इस का मंगल व चन्द्र पर से भ्रमण शुभ होता है। 

चन्द्र से या उस के सप्तम से-शुक्र शुभ हो तो इस समय संगीत, नृत्य की रुचि होती है, खाना, पीना, कपडे अच्छे मिलते है। मित्र मदद करते है। व्यवसाय करने की इच्छा होती है। स्त्रीसुख अच्छा मिलता है। नाटक, सिनेमा में रुचि रहती है। स्वयं नट बनने की इच्छा होती है। ऐश आराम की प्रवृत्ति रहती है, तथा उसके लिए साधन भी मिलते है, कामुकता बढती है। अशुभ हो तो स्त्री की बीमारी, मायके जाना या झगडे होना, आदि से स्त्रीसुख नही मिलता। किसी कारण से व्यवसाय बन्द होता है। 

मंगल से या उस के सप्तम से-शुक्र शुभ हो तो इस के फल मंगल के शुक्र पर भ्रमण के समान होंगे। अशुभ हो तो पतिपत्नी में झगडे होते है, विभकत रहने तक बात बढती है। परस्त्रियों में धन खर्च करना पडता है। हाथ में पैसा नही रहता। 

शनि का भ्रमण । 

रवि से या उस के सप्तम में-कुण्डली में २, ४, ५, ८, १०, १२ इन में से किसी स्थान में रवि हो तो इस पर शनि का भ्रमण बहुत अशुभ होता है। माता-पिता का वियोग, व्यवसाय बन्द होना, कर्ज होना, खाना मिलने की भी मुश्किल होना, अपमान, भाई या निकट संबंधियों से विरोध, बंटवारा आदि से कष्ट होता है। मित्र भी शत्रु 

' जैसे हो जाते है, कोई मदद नही करता। कर्ज-वसूली के लिए बारबार 

साहुकार तंग करते है। फौजदारी मामलों में फंसने की संभावना रहती है। घर छोड़कर भाग जाने की इच्छा या आत्महत्या की इच्छा होती है। अप्रिय व्यक्ति से भी कर्ज मांगने का मौका आता है। स्त्री बीमार रहती है। पागल होना, देश से निर्वासित होना, नौकरी छूटना, बदनामी होना, सट्टा-शेयर में नुकसान, आदि सब तरह के अशुभ फल मिलते है। कुण्डली में रवि उपर्युक्त स्थानों से भिन्न स्थान में हो तो फलों में सौम्यता आती है। माता पिता या स्त्री-पुत्रों में से किसी के वियोग होने पर शनि के बाकी अशुभ फलों का अनुभव नहीं आता। 

चन्द्र से या उस के सप्तम से-यह सब को परिचित-साढ़ेसाती का समय होता है, इस के अशुभ फल सुप्रसिद्ध है। चन्द्र के स्थान से ४५ अंश पहले शनि का आगमन होते ही साढ़ेसाती शुरू होती है तथा इस स्थान के बाद ४५ अंश तक शनि के भ्रमण का समय कष्टकर होता है। 

मंगल से या उसके सप्तम से-कुण्डली में मंगल १, २, ४, ५, ७, ८, ११, १२ इन में से किसी स्थान में हो तो इस पर शनि के भ्रमण के अशुभ फल मिलते है-व्यापार बन्द होता है, कर्ज होता है, लोग धोखा देते है, कामों मे गलतियाँ होती है। छोटी आयु में यह योग होने पर चेचक, खसरा, फोडे-फुत्सी, टाइफाइड, मलेरिया आदि रोग होते है। भाई या पिता द्वारा जायदाद गहन रखी गई हो तो अदालत तक झगड़ें हो कर वह सम्पत्ति हाथ से जाती है। स्वयं तथा स्त्री-पुत्रों का स्वास्थ ठीक नही रहता। फौजदारी मामले कारावास तक आगे बढते है। अत्य ग्रह व महादशा अनुकूल हो तो ही इस से छुटकारा मिलता है। नौकरी छूटना या सस्पेण्ड होना, बुरे स्थान पर तबादला होना, रिश्वत लेने का आरोप आना, सट्टा-शेअर में नुकसान, अपमान, देश छोड़ने या आत्महत्या की इच्छा, स्त्री-पुत्र व निकट संबंधियों का विरोध, मित्रों द्वारा सन्देहपूर्ण व्यवहार तथा मदद न करना आदि अशुभ फल मिलते है। कुण्डली में दोनों ग्रह शुभ हो तो फलों में सौम्यता आती है। ३, ६, ९ इन में से किसी स्थान में मंगल हो तो इस पर शनि के भ्रमण से सन्‍तति या भाई का वियोग होता है, फिर धनहानि नही होती। 
बुध से या उस के सप्तम से-कुण्डली में बुध ३, ५, ७, १०, १२, ८ इन में से किसी स्थान में हो तो तथा अशुभ स्थान का स्वामी हो तो इस भ्रमण के समय बुद्धी अस्थिर रहती है, छात्र परीक्षा में सफल नही हो पाते, गवाही या दस्तावेज झूठे साबित होते है। जमाखर्च, घर आदि के बारे में कागजपत्र, ऋणपत्र आदि झूठे सिद्ध हो कर फौजदारी सामले डो सकते है॥ संतान का स्वास्थ ठीक नही रहता। बुध शुभ हो तो बुद्धि तेज और स्थिर रहती है। दस्तावेजों का समय पर अच्छ्ठा उपयोग होता है।॥ छात्र पास हो जाते है। अंदाज सही सिद्ध होते है । 

गुरु से या उसके सप्तम से-गुरू जिस स्थान में हो उस स्थान के संबंध के अशुभ फल मिलते है। बुध और गुरु से शनि के भ्रमण का यह समय बुछ्धिजीवी, लोग-लेखक,ऋ प्राध्यापक, शिक्षक, ज्योतिषी, संपादक, अनुवादक, वकील, जज, क्लर्क, हिसाब जांचनेवाले अधिकारी, गायक आदि के लिए साधारण अशुभ होता है। छात्र परीक्षामें सफल नही होते सन्‍तान को कष्ट होता है। 

शुक्र से या उस के सप्तम से-कुण्डली में शुक्र १, २, ४, ५९, ७, १०, १२ इस स्थानों में से किसी में हो तो इस पर शनि का भ्रमण पत्नी के लिए घातक होता है (कुण्डली में द्विभार्या योग हो तो) ॥ स्वयं और सन्‍तान की बीमारियां चलती रहती है॥ व्यवसाय मन्द या बन्द हो जाता है ॥ पैसे की तंगी रहती है ॥ कर्ज होता है। बेइज्जती होती है । गांव छोडकर जाना पडता है। साहुकारो द्वारा मालिश का डर बना रहता है। यह शनि शुक्र के स्थान को छोड कर जब तक नही जाता तब तक व्यवसाय फिर जम नही पाता। व्यवसाय में परिवर्तन का संभव होता है। अपने द्वारा दिया ऋण वापस नही मिलता, लिया हुआ ऋण चुकाना पडता है। कुण्डली में शुक्र ३, ६, ९, ११ इन मे से किसी स्थान में हो तो सौम्य फल मिलते है। 

शनि से या उस के सप्तम से-कुण्डली में शनि शुभ हो तो या अशुभ -इस भ्रमण के समय आर्थिक, शारीरिक, मानसिक कष्ट होता ही है। व्यवसाय बदलता है पहले स्वतंत्र ही तो दूसरे के आधीत हो जाता है, पराधीन हो तो स्वतंत्र हो जाता है। स्त्री-पुत्रों को मायके भेजना पड़ता है। यह समय जीवन में क्राम्ति करनेवाला होता है। भाग्योदय इसी समय सै प्रारंभ होता है। 

प्रकरण ७ 

उपसंहार 

पिछले प्रकरण में गुर और शनि के भ्रमण रवि, चन्द्र, मंगल व शुक्र पर से अशुभ होते है ऐसा बतलाया है। इस से प्रश्न होता है कि क्या इन चार ग्रहों पर से गुरु का भ्रमण भी अशुभ तथा शनि का भ्रमण भी अशुभ होता है ? इस का विचार करते समय कुछ साधारण बातें ध्यान में रखनी चाहिए। मनुष्य के जीवन में अत्यन्त कष्टकारक समय दो बार आता है। साधारणत: यह शनि की साढ़ेसाती का समय होता है-एक साढेसाती समाप्त होन के साढ़ेंबाईस वर्ष बाद दूसरी साढ़ेसाती शुरू होती है। किसी व्यक्ति को साढ़ेसाती के अशुभ फल उतने नही मिलते-चतुर्थ व पंचम शनि के फल तीव्र मिलते है अथवा गुरु के अशुभ फल तीव्र मिलते है। रवि, चन्द्र, मंगल व शुक्र में किसी अशुभ ग्रह के साथ अशुभ गुरु का भ्रमण अधिक कष्ट कर होता है। यदि क॒ण्डली में शनि का इन ग्रहों से शुभ योग हो। इसी प्रकार इन ग्रहों के साथ कुण्डली में गुद का शुभ योग हो तथा शनि का अशुभ योग हो तो गुढ के भ्रमण के अशुभ फल नहीं मिलेंगे-शनि के भ्रमण के अशुभ फल मिलेंगे। इसी प्रकार कुछ अन्य बाते भी ध्यान में रखनी पढ़ती है-

(१) किसी कारणवश जो व्यक्ति जीवनभर अविवाहित रहते है उन के लिए गोचर गुर का त्रिकोण में से भ्रमण भी निष्फल होता है, इन की कुण्डली में शुक्र के साथ गोचर गुरु या शनि के योग व्यर्थ होंगे। 
(२) जिन्हें वीर्यदोष हो या जित की पत्ती वस्ध्या हो उन के लिए भी त्रिकोण में गुरु का भ्रमण व्यर्थ होता है। अक्सर सन्‍तति प्रतिबन्धक रोगों के कारण ऐसे लोगो को बताया हुआ सस्तानप्राप्ति का भविष्य झूठ साबित होता है। 

(३) किन्‍ही कारणों से जो जम्मदरिद्री होता है उसे गुढ, शति अथवा राहु त्रिकोण में कितने भी शुभ योग के साथ भ्रमण करे उतका कल नहीं मिलता। अब गोचर ग्रहों के भ्रमण-फल के कुछ उदाहरण देते है । 

एक-श्ष जन्म ता. २६-७-१९०८ को विदर्भ में सूर्योदय के समय -कुण्डली में कर्क लग्न, लग्न में रवि, मंगल, गुरु, षष्ठ में हर्षल, केतु, नवम में वक्री शनि, व्यय में शुक्र, नेपच्यून, चन्द्र, राहू तथा बुध है। सन १९३८ तक ये एक एडवोकेट के अटर्नी थे। इन्हें दो पुत्र और तीन कन्याएं है। सन १९३८ मे १५ अगस्त को पिता की हुई-इस समय गुरु कुंभ राशि में, शनि मीन में तथा राहु तुला में था। इनके छोटे भाई की कुण्डली में धन स्थान में मीन में रवि था, उस पर से शनि से भ्रमण के समय पिता की मृत्यु हुई। इन के नवम स्थान में शनि के भ्रमण के समय १४-१-१९३९ को इन के एक छोटे भाई ने विष खा कर आत्महत्या की। जन्मस्थ शनि से गोचर शनि का तथा चतुर्थ में राहु का भ्रमण हो रहा था तब यह घटता हुई। तवम स्थान से छोटे भाई का विचार होता है। सग १९३९ में नौकरी छोडकर साड़ियों की दुकान साझेदारी में शुरू की। जन्मस्थ शनि से गुरु के भ्रमण के समय यह व्यवसाय-परिवर्तन हुआ, इस समय शनि का भ्रमण दशम में तथा राहु का भ्रमण चतुर्थ में हो रहा था। २९-१२-४२ को माता की मृत्यु हुई, इस समय गुरु मिथुन (व्यय) में शत्रि वृषभ में तथा राहु सिंह राशि में से भ्रमण कर रहा था। एक मित्र की मदद से नया व्यवसाय शुरू किया किन्तु नुकसान हुआ, बेइज्जती का प्रसंग उपस्थित हुआ। इस समय जन्मस्थ चन्द्र व शुक्र पर से गुरु का भ्रमण हो रहा था। २९-११-४३ को पत्नी कौ मृत्यु हुई, इस समय जन्मस्थ चन्द्र व शुक्र पर व्यय में गोचर शनि का भ्रमण हो रहा था, राहु कर्क में तथा गुरु सिंह में था, इसी समय इनके एक पुत्र की आंख रोगग्रस्त हो गई। सन १९४४ में एप्रिल से जूत त्तक साहूकारों के तकाजे, फौजदारी का डर, गांव छोडना, अफवाहें आदि से बहुत कष्ट हुआ, इस समय राहु, गुरु कर्क में लग्न में तथा शनि व्यय में भ्रमण कर रहा था अर्थात जन्मस्थ रवि से गोचर गुरु का जे जन्मस्थ चन्द्र, शुक्र से शनि का भ्रमण हो रहा था। 

दूसरा उदाहरण लेखक स्व. काटवे की स्वयं की कुण्डली का है-

2८ दिसम्बर सन १९१५ कों इनकी पत्नी की मृत्यु हुई, उस समय शनि मिथुन में तथा गुरु कुम्भ में शुक्र के पीछे था। तब से गुरु का भ्रमण त्रिकोण स्थानों में से होने पर भी दूसरा विवाह नही हुआ क्यों कि मूल कुण्डली में इस का योग नही है। १५ अप्रैल १९१५ को पिता ने इन्हें नोटिस दे कर व्यापार से अलग कर दिया-इस समय मिथुन में शीन तथा कुम्भ में गुरु व राहु का भ्रमण शुक्र पर से हो रहा था। सन १९२१ से २३ तक कन्या में शनि, राहु, गुरु का दशम स्थान में भ्रमण होते समय येरवडा (पुना) कारागृह में रहना पडा। १९३३-३४ में धनस्थान में रवि पर शनि का भ्रमण होते समय पिता, भाई, माता की मृत्यु हुई, भाई द्वारा किये गये कर्ज से घर से हाथ धोना पडा। पिता की मृत्यु ता. ९-१-३३ को हुई, तब रवि पर शनि का, कुम्भ में राहु का तथा दशम में कन्या राशि में गुरु का भ्रमण हो रहा था। भाई की मृत्यू ता. ३-९-३३ को हुई, इस समय भी गोचर ग्रह मुख्य रूप से वैसे ही थे। इसी शनि में ३-४-३३ को घर का अधिकार समाप्त हुआ। इस समय गुरु सिंह मे तथा राहु कुम्भ में धा-इन का फल नहीं मिला। माता की मृत्यु ता. १५-८-१९३४ को हुई-उस समय गुर दशम में कन्या में, शनि कुम्भ में तथा राहु मकर में था-इस समय गुर के भ्रमण का फल। इनका पहला ज्योतिष ग्रन्थ जनवरी सन १९२८ में प्रकाशित हुआ। इस समय व्यय में शति, मंगल तथा चतुर्थ में गुरु का भ्रमण हो रहा था। दैवविचार यह ग्रन्थ २-१०-३१ को प्रकाशित हुआ; उस समय शनि लग्न में गुरु सप्तम में, राहु मेष में था। १९३२ में राहु विचार यह पुस्तक प्रकाशित हुई, उस समय शनि मकर में, गुरु सिंह में तथा राहु कुम्भ में था। इस प्रकार इस कुण्डली में ग्रन्थों के बारे में गुरु-राहु के एवं अन्य बातों में शनि के फल विशेष दृष्टिगोचर हुए। २७-१-१९३९ में शनि चन्द्र युति के समय धूडगूस नामक पुस्तक लिखी गई थी, तृतीय में गुरु के प्रभाव से यह छप तो गई किन्तु शनिचन्द्र युति से उसकी बिक्रीपर पाबन्दी लग गई-एक तरह से इस ग्रन्थ रूपी पुत्र की मृत्यु हो गई। इन दो कुण्डलियों से उदाहरणों का अवलोकन कर आगे के अभ्यास और अनुभव से अपना ज्ञान बढ़ाना चहिए। 

- अन्त में गोचर ग्रहों के फल बतलाने के कुछ विशेष मार्गदर्शन 

तत्व बतलाते है-

(१) कुण्डली में शनि व गुरु दो में से एक ग्रह प्रभावी तथा दूसरा निष्फल होता है। मेष, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक लग्न के लिए गुरु निष्फल होता है। वृषभ, मिथुन कर्क लग्न के लिए शनि निष्फल होता है। मकर व कुम्भ लग्न हो तो राहु निष्फल होता है। धनु व मीन 

लग्न के लिए कोई ग्रह निष्फल नही होता। (२) वृषभ, कत्या, मकर लग्नों के लिए शनि की साढ़ेसाती में विशेष कष्ट नही होता इन्हें पंचम शनि कष्ट देता है। 

(३) मेष व सिंहमें रवि, वृषभ व कर्क में चन्द्र, मेष, वृश्चिक व प्रकर में मंगल, मिथुन व कत्या में बुध, धनु मीन व कर्क में गुरु तथा कर, कुम्भ व तुला में शनि-तात्पर्य-अपने स्वगृह व उच्च राशि में ब ग्रहों का भ्रमण कष्टदायक होता है। 

(४) शति २, ४, ८, १२ तथा गुर ३, ६, ८, १२ हन स्थानों कष्टदायक होता है। (५) ग्रहों के फल विशेषत: उन लोगों के अनुभव में आते है जीन का जीवन स्वतन्त्र वृत्ति का हो। शिक्षक, प्राध्यापक, क्लर्क, जागीरदार, केवल पैतृक सम्पत्ति पर जीविका चलानेवाले आलसी लोग आदि वेतन भोगी या निश्चित आयवाले लोगों के जीवन में ग्रहों के फल अनुभव में नही आते क्‍यों कि उन के जीवन में ही सक्रियता नही होती। 

(६) गोचर शनि जिस राशि में हो उसी राशी में अन्य गोचर ग्रह आने पर उन अन्य ग्रहों का फल नही मिलता। 

इस प्रकार गोचर ग्रहों के फलों के विषय में प्राचीन, अर्वाचीन ग्रन्थों के मतों तथा मेरे गुरु द्वारा बताये गये ज्ञान एवं मेरे अनुभव के आधार पर विवेचन किया। विद्वान ज्योतिषी इस का यथोचित उपयोग करें यही विनम्र निवेदन है। 

-समाप्त







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