वृषभ लग्न का स्वाभाव सम्पूर्ण विवेचन विश्लेषण वर्णन
सौभाग्यशाली, क्षमाभावना से युक्त, तीव्र भूख का अनुभव करने वाला, स्त्रियों से
विशेष अनुराग रखने वाला या स्त्रियों का प्रिय, पक्की मित्रता रखने वाला, मध्यावस्था व वृद्धावस्था में विशेष सुख पाने वाला होता है। वृषे विलग्ने तु नरः प्रसूतो मित्रं क्षमी हास्यरतः सुवाक्यः |
विज्ञानयुक्तो गुरुलोकभातः शूरः प्रधानः सुतालसश्च॥2॥
वृद्धयवनजातक अ. 24/श्लो. 2/पृ. 286
यदि वृषलग्न में जन्म हो तो मनुष्य मित्रता निभाने वाला, क्षमावान हास्य में रत रहने वाला, सुन्दर वाक्य बोलने वाला, विशिष्ट ज्ञान से युक्त, पूर्वजों व अग्रजों का सत्कार करने वाला, शूरवीर, प्रधानता पाने वाला एवं बेटे की इच्छा करने वाला होता
गोमान् देवगुरुद्विजार्च्चनरतः स्वल्पात्मजः शांतषी
विद्यावादरतोऽटनश्च सुभगो गोलग्नजः कामुकः 12॥
-जातक पारिजात श्लो. 2/पू. 678
वृष गौ आदि पशुओं से युक्त, देवता, गुरु और ब्राह्मणों की पूजा (सत्कार)
में रत, थोड़े पुत्र वाला, शांत बुद्धि, विद्यावाद (शास्त्रार्थ) में संलग्न, घूमने फिरने या यात्रा करने वाला, देखने में सुंदर, कामुक (कामवासना प्रधान) ।
प्रियपानभोज्यनारीवियोगतप्तो वृषभ पूर्वाशे ।
वस्त्रालङारयुतो युवतिप्रकृतानुसारी स्यात् ॥
-सारावली पृ. 466/श्लो. 10
में यदि जन्म लग्न में वृषलग्न में वृष राशि का प्रथम द्रेष्काण हो तो जातक खाने पीने का शौकीन, नारी (स्त्री) के वियोग से पीड़ित, वस्त्र व भूषणों से युक्त तथा स्त्री की प्रकृति स्वभाव के अनुरूप कार्य करने वाला होता है।
वृषलग्ननोभवो बाल्ये गुरुभक्तः प्रियंवदः ।
गुणीकृती धनी लुब्धः शूरः सर्वजनप्रियः ॥
-मानसागरी
वृषलग्न वाले जीव मानव धर्म आस्थाशील, गुणी जनों का प्रेमी, प्रियवादी गुणशील, बुद्धिमान, धनवान, लोभी, पराक्रमी तथा जनसमाज का स्नेहभाजन एवं स्वकार्य कुशल होता है।
वृष लग्न तब होगा जब लग्न में वृष राशि हो। वृष राशि का स्वामी क्योंकि शुक्र है। अत: वृष लग्न का स्वामी लग्नेश भी शुक्र ही होगा। इसलिए यहां वृष राशि के स्वामी (शुक्र) और वृष (सांड़) जो इस राशि के प्रतीक हैं-दोनों की विशेषताओं का ध्यान रखना चाहिए। शुक्र जहां वैभव, ऐश्वर्य और काम (SEX का कारक है, वहीं सांड़ भी पौरुष (कामशक्ति), सामर्थ्य तथा मस्ती (लापरवाह अपनी ही मौज में रहने वाला) का प्रतीक है। वृषभ लग्न का स्वामी शुक्र है, शुक्र ऐश्वर्यशाली व विलासपूर्ण ग्रह है। इस लग्न वाले जातक प्राय: गौरवर्ण के, दिखने में सुन्दर व आकर्षक व्यक्ति होते हैं, इस लग्न का चिन्ह वृषभ (बिना जोता हुआ बैल) होने से शरीर पुष्ट, मस्त चाल, मजबूत जंघाएं, बैल के समान नेत्र, स्वाभिमान एवं स्वच्छंद विचरण एवं शीतल स्वभाव इनकी प्रमुख विशेषता कही जा सकती है।
यह स्थिर स्वभाव की राशि होती है और इसी कारण इस राशि में ठहराव देखने को मिलता है। इस लग्न के लोगों को जल्दबाजी पसंद नहीं होती है। यह पृष्ठोदय राशि है अर्थात आगे से उठने वाली राशि है। यह राशि पृथ्वी तत्व के अन्तर्गत आती है।
आपको अपने जीवन में बहुत जल्दी-जल्दी बदलाव पसंद नहीं होगा। इसलिए आप आसनी से स्थान परिवर्तन नहीं करते हैं। एक ही जगह पर बहुत समय तक बने रहते हैं। शुक्र का प्रभाव होने से आप सौन्दर्य प्रेमी होते हैं। आपको सुंदर और कलात्मक चीजें पसंद होती है। आप स्वभाव से रोमांटिक भी होते हैं।
वैसे तो आपको क्रोध कम आएगा लेकिन जब आएगा तब अत्यधिक आएगा, तब आपको शांत करना सरल नही होगा। आप स्वभाव से उदार हृदय होते हैं लेकिन आप एकांतप्रिय होंगे। आपको ज्यादा भीड़ भाड़ कम ही पसंद होगी। आप जीवन में धन कमाने की इच्छा रखते हैं और धन एकत्रित करने में सफल भी होते हैं।
इस राशि के अंतर्गत जन्म लेने वाले लोग अव्यवहारिक होने के कारण नए लोगों को नहीं भाते हैं। ऐसे लोग अपने शांत और अंतर्मुखी व्यवहार, के कारण नए लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते हैं जिसके कारण नए लोगो से घुलमिल नहीं पाते। अगर उनके साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जाता और उन्हें नहीं समझा गया तो उनमें दूसरों के प्रति आक्रोश और रूढिवादी भावना उत्पन्न हो सकती है। उन्हें अक्सर नए दोस्त बनाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है जिसके कारण नए लोगों से मिलने में संकोच करते हैं। वे विश्वसनीय और व्यवहारिक होते है जिसके कारण अक्सर कारोबार में वे अच्छी तरह से सफल होते हैं। ऐसे प्रकृति के लोगों को कामुक व्यक्तित्व के होते है सभी क्षेत्रों में भौतिक सुख के लिए प्रयासरत होते हैं और वे काफी उद्यमी होते है और अपने कार्यों को अपने अनुसार निश्चित समय में पूरा करते है। वे दूसरे लोगों द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना भी करते है और उनके प्रतिभा की भी खुलकर तारीफ करते हैं। उस समये उनका व्यवहार बॉस की तरह भी हो सकता है। वृषभ राशि के लोगों को आसानी से आकर्षित नहीं किया जा सकता और अगर ऐसा किया भी जाता है तो उसे काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। वृषभ राशि के लोग अपने मूल्य और सिद्धांत के प्रति काफी अडिग होते हैं, और उनके दृष्टिकोण को बदलना आसान नहीं होता है। जबकि इस प्रवृति के लोग काफी लुभावने, सच्चाई का प्रशंसक और लुभावने व्यक्तित्व वाला होता है यही उनका गुण दूसरों को आकर्षित करता है। ऐसे प्रकृति के लोग आवेगी नहीं होते है लेकिन अगर उनके साथ जबदस्ती किया गया तो वे उग्र हो सकते हैं। कई बार वे पूर्वाग्रही और जिद्दी हो सकते है। वे काफी सावधानी से अपने दोस्तों का चयन करते हैं। वे झूठ बोलने पसंद नहीं करते हैं हालांकि उन्हें आसानी से मनाया जा सकता है।
सामान्यतः वृषभ लग्न में उत्पन्न जातक सुंदर, उदार स्वाभाव के होते हैं, उनकी वाणी में भी मधुरता का भाव विद्यमान रहता है। साथ ही व्यक्तित्व भी आकर्षक होता है तथा अन्य जनों को प्रभावित करने में वे समर्थ रहते हैं। शारारिक रूप से वृषभ लग्न के लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा परिश्रम करने की उनकी अपूर्व क्षमता रहती है जिससे जीवन में उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने तथा सुखैश्वर्य एवं वैभव अर्जित करने में प्रायः सफल रहते हैं।क्रुद्ध अवस्था में आक्रामक, विकट तथा उन्मत्त क्रोधांध हो जाना किन्तु सम शान्तावस्था में विरक्त तथा अपनी ही धुन या मस्ती में खोए रहना सांड़ का स्वभाव है। इसीलिए यह महादेव शिव का वाहन माना गया है, जो सदा योग/ध्यानमग्न रहते हैं परन्तु क्रुद्ध होने पर जब उनका तीसरा नेत्र खुलता है तब प्रलय आ जाती है। उनका क्रोध किसी को भी सहनीय नहीं होता है। अत: यह सहज ही कहा जा सकता है कि वृष लग्न के जातकों में इन गुणों का पाया जाना स्वाभाविक है। मेरा अपना दृष्टिकोण व अनुभव यह है कि वृष लग्न वाले प्रवल अहंकारी होते हैं। खुश हो जाएं तो जरा-सी बात पर सबकुछ न्यौछावर कर दें। नाखुश हो जाएं तो वर्षों तक जीवन भर बात तक न करें। ऐसे जातक एक नम्बर के जिद्दी और मूडी होते हैं। अगर कहीं ऐसे जातक के लग्न में सूर्य विद्यमान हो तब तो ये अपनी बात पर अड़ जाने वाले हो जाते हैं। परस्पर वार्तालाप में भी अपनी बात मत को नोचा नहीं पड़ने देते। अनावश्यक बहस कर येन-केन-प्रकारेण अपनी बात मनवा लेने का प्रयास करते हैं। अपनी बात मानने व तारीफ करने वालों से ये बहुत प्रसन्न रहते हैं। किन्तु आलोचना करने वालों से शीघ्र ही रुट हो जाते हैं। ऐसे जातक किसी को पसंद करें तो वैश्या के समान उससे बहुत घनिष्ट हो जाते हैं। नापसंद करें तो छूत की बीमारी की तरह उससे कन्नी काटने लगते हैं।
दरअसल, शिव (महादेव) योगी ही नहीं, भोले भंडारो ही नहीं, पशुपति भी कहे जाते हैं।इसका अर्थ यह नहीं कि वे जानवरों के स्वामी या भगवान हैं। इसका अर्थ यह है कि वे पशुओं के स्वामी हैं। पशु का अर्थ है तभोगुणी। पशु का अर्थ है अहंकारी। पशु का अर्थ है उच्छंखल व मनमौजी। पशु का अर्थ है शक्ति या सत्ता के मद में डूबा, जड़त्व बुद्धि को प्राप्त हो गया, प्रबल अहं का मारा हुआ जीव।पशुओं में सर्वाधिक मनमौजी (अनियंत्रित/मूडी उचखल जालमस्त) तथा पौरुष व शक्ति के अहंकार में सर्वाधिक चूर रहने वाला सांड़ ही होता है। शिव का वाहन होने से शिव ऐसे अहंकारियों को नियंत्रित करने वाले, उन पर सवार होने वाले,उनके स्वामी होने से 'पशुपति' कहे गए हैं। यह इसका प्रमाण है कि वृष (सांड़)लग्न वाले जातकों में अन्य विशेषताओं के साथ अहंकार भी प्रबल रूप में रहता है और अपने इस अहं/दर्प का टूटना वे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करते। अगर गलती से ही सही उन्होंने दिन को रात कह दिया है तो वे चाहते हैं कि सामने वाला भी दिन को रात ही माने। न माने तो वे उसे मनवाने की जो तोड़ कोशिश करते हैं।फिर भी न माने तो उसके विषय में ये जातक अपनी राय बदल लेते हैं और उससे रुष्ट हो जाते हैं। ऐसे जातकों को इनकी भावनाओं के विपरीत छोड़ दिया जाए तो ये रुष्ट होकर सारा बना-बनाया काम बिगाड़ देते हैं, उस बच्चे की भांति डिसेन खिलाया जाए तो वह सबका खेल बिगाड़ देता है।
पाराशरी ज्योतिष, लाल किताब तथा मेरे गुरुओं, आचार्यों एवं ज्योतिर्विदों के अनुसार वृष लग्न वाले जातक के चारित्रिक गुणावगुणों तथा स्वभाव एवं प्रकृति
का विश्लेषण इस प्रकार है-
वृष लग्न के जातक को बात को ध्यान से न सुनो, या उपेक्षा करो तो वे आक्रामक/कुद्ध हो जाते हैं। अपनी उपेक्षा इनको बर्दाश्त नहीं होती। यद्यपि क्रोध पीने की क्षमता वृष लग्न वालों में मेष लग्न वालों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। परन्तु अभिमान की मात्रा भी इनमें अधिक होती है। अपने आइडियाज, अपने सिद्धांत ही इनको प्रिय होते हैं। मनोरंजन के शौकीन ऐसे जातक मनोरंजन या गया में लग जाएं तो समय का इन्हें बिल्कुल ध्यान नहीं रहता। ऐसे जातकों के होंठ प्राय: मोटे व शरीर वर्गाकार और छोटा होता है। आम आदमी की अपेक्षा ये मोटे होते हैं। चेहरा सुन्दा, नेत्र व नस्तक बड़े, छाती चौड़ी (विशेष कर कंधे)। ये घोर परिश्रमी/कर्मठ और बहुत सहनशील भी होते हैं। प्राय: बच्चों से ये खुश नहीं रहते (उनसे इन्हें शिकायत बनी रहती है)। भावुक होते हैं परन्तु जिद्दी भी। लग्न पर टुष्प्रभाव हो तो 50 वर्षों के बाद इन्हें प्राय: नाड़ी तंत्र को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं।
शनि वृष लग्न वालों को योगकारक होता है। अपनी दशा, अन्तर्दशा में शनि इन्हें अच्छा फल देता है। किन्तु वृष राशि क्योंकि पृथ्वी तत्त्व राशि है। अत: वावजूद कर्मठ होने के ये जातक मूड न हो तो आलसी, प्रमादी व काम टालने वाले बने रहते हैं। परन्तु जब मूड आ गया तो दिन-रात, आंधी-बारिश कुछ नहीं देखते। यानी ये मूडी अथवा सांड़ की तरह स्वेच्छाचारी/मनमौजी होते हैं। स्थूल शरीर, काले बाल, आंखों में चमक व चौड़े कंधों वाले ये जातक सामान्यत. सज्जन व शांत प्रकृति के होते हैं। किन्तु इनके साथ छेड़खानी की जाए तो ये पूरी शक्ति से अड़ जाते हैं। ये वासना प्रधान होते हैं। अपने अपमान/विरोधाउपेक्षा को ये कभी नहीं भूलते। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा अपनी बातों को गुप्त रखने में ये माहिर होते हैं। ये ईर्ष्यालु होते हैं। मित्रों व सम्बन्धियों की सहायता से इनको प्राय: सफलता प्राप्त होती है। वृष लग्न वाले जातक स्वयं के कारोबार में अधिक सफल होते हैं। कन्या व वृश्चिक लग्न वाले जातकों से मित्रता इन्हें शुभ रहती है। यदि लग्न पाप पीड़ित हो तो इनको गले के रोग सम्भावित होते हैं। वृष लग्न के जातक अपनी आर्थिक सफलताओं से कभी संतुष्ट नहीं होते। इनके लिए धन मात्र जरूरतें पूरी करने का माध्यम नहीं अपितु जीवन का आधार होता है। आजीवन ये धनोपार्जन के ही प्रयास को जीवन का अंतिम लक्ष्य मानकर उसमें रमे रहते हैं। किन्तु फिर भीधर्मकर्म/कर्मकांडाजप उपासना आदि के कार्यों में इनकी रुचि होती है। ये नकेवल आस्तिक होते हैं बल्कि अध्यात्म व संसार को साथ लेकर चलने की कोशिश करने वाले होते हैं। यदि इनको ज्ञान हो जाए और ये धन की भूख पर
अंकुश लगाकर आध्यात्मिक क्षेत्र में ही जुट जाएं तो ज्ञान के शिखर पर पहुंचते या आध्यात्मिक उन्नति भी करते हैं। परन्तु ऐसे लाखों में कोई एक ही होते हैं। अन्यथा अधिकांश वृष लग्न के जातक खाने-पीने और भोगने को ही जीवन समझकर श्रेष्ठतम ज्ञान/अध्यात्म से वंचित रह जाते हैं। कोल्हू के बैल की भांति धनोपार्जन में जुटे रहते हैं।
शुक्र बृहस्पति से शुभ योग करता हो अथवा बृहस्पति उच्च राशि का हो तो वृष लग्न के जातक भी कृष्ण व बुद्ध की भांति आध्यात्मिक उन्नति कर पाते।अन्यथा इनकी उपासना कोरा कर्मकांड/आडम्बर बनकर रह जाती है। चुनौती सामने हो या कार्य रुचि के अनुकूल हो तो वृष लग्न के जातकों का
उत्साह व शक्ति दोनों ही बढ़ जाते हैं । अन्यथा इनकी सुस्ती व आलस्य भी देखते ही बनते हैं। प्रायः ये जोश दिलाए जाने पर फूंक पर चढ़ जाने वाले व चापलूसी पसंद करने वाले होते हैं। लग्न पर शुभ प्रभाव हो तो ऐसे जातक गायक भी होसकते हैं। कभी-कभी वृष लग्न वालों की गर्दन भी मोटी पाई गई है।
वृष लग्न के जातक अतिथिसेवी/अच्छे मेहमाननवाज होते हैं। घर आए मेहमानों की खातिरदारी से इन्हें विशेष खुशी मिलती है। किन्तु ये परिवर्तन से बहुत भय खाते हैं । प्राय: ये एक ढर्रे पर जीना पसंद करते हैं (कोल्हू के बैल की भांति)। इनके मित्रों का दायरा विस्तृत नहीं होता किन्तु जिनको ये नजदीकी स्थिति में लेआते हैं, उनसे प्रायः जीवन भर सम्बन्ध बनाए रखते हैं। आमतौर पर ये जातक स्पष्टवादी तथा साफ दिल होते हैं। फिर भी अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते/नहीं करते। वृष लग्न वाले जातक अपने जीवनसाथी को जरूरत से ज्यादा अच्छा मानते हैं। उनमें जो गुण नहीं भी होते, वे गुण भी वृष लग्न के जातक खामख्वाह ढूंढ़ निकालते हैं और दूसरों के सामने उसकी तारीफ करते नहीं अघाते। प्रायः ये संचयी व मितव्ययी होते हैं। यदि बलिष्ठ वृष लग्न में शुक्र लग्नस्थ हो तो ऐसे जातक गोरे, सुडौल,रूपवान, सुशील, बुद्धिमान, कवि तथा विद्वान होते हैं। वैद्यक के जानकार हो सकते हैं। शृंगारप्रिय होते हैं परन्तु प्राय: दो विवाह करते हैं। रतिप्रिय व रसिक होते हैं। यदि शुक्र उच्च का (ग्यारहवें घर में) हो तो गुण, विद्या, धन एवं प्रतिष्ठा और भी बढ़ते हैं। रोग ज्योतिष के अनुसार वृष लग्न वाले जातकों का शुक्र यदि निर्बल या पाप प्रभाव में हो तो उनको मूत्र रोग, गुप्त रोग, वीर्य रोग, यौन रोग आदि विशेष रूप से सम्भावित होते हैं। विशेषकर तब जब सप्तम भाव भी पापाक्रांत हो अथवा छठा भाव पाप प्रभाव में हो। ऐसे जातकों का यदि दूसरा या बारहवां भाव पाप प्रभाव में हो तो उनको नेत्र रोगों की भी तीव्र सम्भावना होती है। लग्नेश बारहवें स्थान में हो तो कामेच्छा/कामाग्नि अतितीव्र हो जाती है। मंगल से युति भी हो तो जातक बलात्कारी अथवा जंगली/वहशी ढंग से सहवास करने वाला होता है।
वृष लग्न में जन्मे जातक आभूषण, सुगन्धित पदार्थ, संगीत कला, भवन निर्माण, बैंकिंग, विज्ञापन अथवा प्रचार व्यवसाय में अधिक सफलता प्राप्त करते हैं। कन्या अथवा वृश्चिक लग्न वाले जातकों के साथ यदि ये साझीदारी में व्यापार करें तो सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक कभी खाली नहीं बैठ सकते ये किसी न किसी रूप में स्वमं को व्यस्त रखते हैं एवं निरन्तर कोई न कोई योजना बनाकर उसे शीघ्र अमलीजामा पहनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। इस लग्न में जन्मे जातक अपनी शोध प्रवृत्ति के कारण नित नवीन खोज में लगे रहते हैं। अड़ियल स्वभाव का होने के कारण ये यदि किसी कार्य को करने की एक बार मन में ठान लें तो, कर के ही दम लेते हैं। शासन करने की क्षमता इनमें स्थित होती है। यदि भूलवश इनसे कोई अनुचित कार्य हो जाता है तो उसके लिए घंटों पछतावा करते हैं। ऐसे व्यक्ति मेहनती, स्थिर विचार वाले, स्वभाव से सज्जन, धीर किन्तु शान्त प्रवृत्ति वाले, स्वार्थी, काम सम्बन्ध में रूचि रखने वाले, अपनी इच्छानुसार कार्य करने वाले, दूसरों से ईर्ष्या रखने वाले, तीव्र स्मरण शक्ति से युक्त, काव्य के प्रति रूचि रखने वाले, चतुर नीतिज्ञ एवं सम्बन्धियों एवं मित्रों की सहायता से धन अर्जित करने वाले होते हैं। वृष लग्न में जन्मे जातकों का भाग्योदय 25, 28, 36 एवं 42 वें वर्ष में होता है।
वृष लग्न में जन्मे जातक छोटे कद के होते हैं। इनकी देह पुष्ट एवं स्थूल होती है। वृषभ अर्थात बैल की भाँती ये शारीरिक रूप से बलिष्ट, आत्मविश्वास के धनी, कर्मप्रधान एवं पुरुषार्थ से भरपूर होते हैं। ये गौर अथवा गेहुँए वर्ण के होते हैं। इनके होंठ कुछ मोटे अथवा स्थूल होते हैं एवं कान व गर्दन कुछ लम्बी होती है। इनकी आँखों में तेज दीखता है एवं इनके गाल मोहक होते हैं।
इनका व्यक्तित्व आकर्षक एवं चुम्बकत्व के गुण लिए होता है। अनायास ही लगभग सभी व्यक्ति इनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। इनका स्वभाव कुछ गम्भीरता लिए होता है। काम शब्दों में अपनी बात को ये बड़े ही सटीकता से सबके सम्मुख रखते हैं। ऐसे जातकों का संगीत एवं सौन्दर्य के प्रति विशेष लगाव व झुकाव रहता है। ये अपनी सन्तान की ओर से प्रायः दुखी व असंतुष्ट रहते हैं। रोग एवं बीमारियाँ इन्हे सरलता से पकड़ नहीं पाते।
वृषलग्न का स्वामी शुक्र है। शुक्र ऐश्वर्यशाली व विलासपूर्ण ग्रह है। इस राशिवाले जातक प्राय: गौरवर्ण के, दिखने में सुन्दर व आकर्षक व्यक्ति होते हैं। इस राशि का चिन्ह वृषभ (बिना जोता हुआ बैल) होने से पुष्ट शरीर, मस्त चाल, मजबूत जंघाएं, बैल के समान नेत्र, स्वाभिमान एवं स्वच्छंद विचरण एवं शीतल स्वभाव इनकी प्रमुख विशेषता कही जा सकती हैं।
सामान्यतया वृषलग्न में उत्पन्न जातक सुंदर उदार तथा सहिष्णु स्वभाव के होते हैं। उनकी वाणी में भी मधुरता का भाव विद्यमान रहता है। साथ ही व्यक्तित्व भी आकर्षक होता है तथा अन्य जनों को प्रभावित करने में वे समर्थ रहते हैं। शारीरिक रूप से उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। तथा उनको मानसिक संतुष्टि भी बनी रहती है। ये अत्यधिक परिश्रमी जातक होते हैं तथा परिश्रम करने की उनकी अपूर्व क्षमता रहती है जिससे जीवन में उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने तथा सुखैश्वर्य एवं वैभव अर्जित करने में वे प्राय: सफल रहते हैं। शांति एवं सहिष्णुता के साथ इनमें साहस तथा पराक्रम का भाव भी विद्यमान रहता है।
अतः इसके प्रभाव से आपका व्यक्तित्व आकर्षक रहेगा तथा सभी लोग आपसे
प्रभावित रहेंगे। अपने वाकचातुर्य से शुभ एवं महत्वपूर्ण सांसारिक कार्यों को सिद्ध करने में भी सफल होंगे। आपका शारीरिक कद मध्यम होगा परन्तु स्वरूप सुंदर व आकर्षक होगा। आप में सहनशीलता का भाव भी विद्यमान होगा।
आप एक परिश्रमी पुरुष होंगे तथा अपनी योग्यता एवं परिश्रम से किसी उच्च
पद या समाज में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करेंगे साथ ही अपने सद्गुणों के द्वारा श्रेष्ठ जनों को संतुष्ट करने में सफल होंगे। आप एक विद्वान पुरुष होंगे तथा विभिन्न विषयों कला, साहित्य एवं संगीत का आपको उचित ज्ञान रहेगा तथा इस क्षेत्र में प्रसिद्धि भी प्राप्त होगी। आप में दानशीलता का भाव भी विद्यमान होगा तथा समय समय पर जरूरतमन्दों को दान देने में तत्पर रहेंगे। आप एक बुद्धिमान पुरुष होंगे तथा आपके कार्य कलापों पर बुद्धिमत्ता की स्पष्ट छाप होगी।
धर्म के प्रति आप श्रद्धालु रहेंगे तथा अवसरानुकूल धार्मिक अनुष्ठानों तथा कार्य कलापों को सम्पन्न करेंगे। धार्मिक क्षेत्र में आप किसी संस्था से संबंधित हो
सकते हैं तथा इस क्षेत्र में आपको कोई विशिष्ट सफलता या प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो सकती है
आपमें उदारता तथा सहनशीलता का भाव भी विद्यमान रहेगा तथा अवसरानुकूल समाज सेवा के लिए भी उद्यत रहेंगे आपकी प्रवृत्ति सात्विक होगी तथा विचार भी उत्तम होंगे। साथ ही परोपकार की भावना भी विद्यमान होगी। इसके अतिरिक्त कई शास्त्रों का आपको ज्ञान होगा, जिससे आपको सामाजिक मान प्रतिष्ठा तथा प्रसिद्धि प्राप्त होती रहेगी। इस प्रकार आप स्वस्थ सुंदर आकर्षक व्यक्तित्व वाले विद्वान एवं साहसी पुरुष होंगे तथा आपका जीवन प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत होगा।
वृष राशि भूमि तत्त्व प्रधान है। इसलिए ऐसे जातक मशीनरी व भूमि संबंधी
कारोबार में विशेष रुचि लेते देखे गये हैं। इनकी इच्छा शक्ति बड़ी प्रबल होती है। ये बड़े धैर्यवान होते हैं। इनकी उन्नति प्रायः धीमी गति से होती है। यदि आपका जन्म ‘रोहिणी नक्षत्र' में है तो केवल एक ही प्रकार का कार्य करने से आपको सफलता कम मिलेगी। आप अपनी बहुमुखी प्रतिभा को बढ़ायें। आपकी उन्नति तभी संभव है। जब आप एक से अधिक कार्य हाथ में लें
वृषलग्न की जातिका का संपूर्ण प्रभाव
उभरे उन्नत स्तनोंवाली, मोटी, गोल, चौड़ी सत्य बोलने वाली, मन की बात जानने वाली, रहस्यवेत्ता अच्छे और विनम्र ढंग से काम करने वाली, पति को प्यारी और सभी कलाओं में चतुर तथा अपने परिवार का हित चाहने वाली तथा ब्राह्मण व गुरु देव की पूजक होती है। सभी का आदर भी करती है, खरीद फरोख्त में होशियार होती है।
वृष राशि के स्वभाव के कारण शुक्र+सूर्य+ चंद्र+मंगल के मिश्रित प्रभाव से
इसकी जितनी सुंदर आकृति होती है उतना ही अच्छा पति भी प्राप्त होता है। वृष का चंद्र 3 अंशों तक परमोच्च हाता है। आगे भी उच्च का तो रहता ही है। यह परस्पर बहुत प्रेम दर्शाती है। इसके स्थूल होंठ और नाक होते हैं। कफ प्रकृति बनती है।धनवती और बहुत खर्च वाली होती है। यह दूसरे धर्मों का बहुत आदर करती है। और उन्हें मानती भी है। वृषलग्न में वृष के चंद्र को भी संघर्षप्रद माना गया है। इसके फल अच्छे कम हैं। अतः यह सब प्रकार के काम करने में कुशल होती है। लेकिन अपने परिवार वालों की कोई चिन्ता नहीं करती है। इसके सीमित संतान होती है।
वृषभ लग्न की कन्या
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वृषभ लग्न में जन्मी कन्या का चेहरा भरा हुआ सुगठित होता है,इनका कद मध्यम, गोरा बदन,संतुलित एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाली, घने काले बाल,गोल बड़ी एवं चमकीली आँखे होती है।इनके होठ अपेक्षाकृत कुछ मोटे होते है।इस लग्न की जातिका में एक विलक्षण प्रकार का सौंदर्य होता है।
शुक्र के प्रभाव के कारण इस लग्न की जातिकाये परिश्रमी,स्वाभिमानी, सहनशील, मधुरभाषी, स्वाभाविक लज्जाशील, परंतु व्यवहार कुशल, हंसमुख एवं सौम्य प्रकृति की होती है।यदि कु डली में शुक्र और बुध शुभ हो तो जातिका बुद्धिमान,उच्चशिक्षित, विशेषकर कंप्यूटर, कामर्स, फैशन-डिजायिनिग, गणित, ब्यूटी पार्लर,आदि सम्बंधित कार्यो में रूचि रखने वाली एवं संगीत-सिनेमा, साहित्य, सुगन्धित पदार्थ आदि का भी शोक रखने वाली होती है।
यदि इनकी कुंडली में चंद्र भी शुभस्त हो तो ये स्वतंत्र विचारो वाली, उच्चाभिलाषी, अपने निश्चय एवं हठ पर कायम रहने वाली,समझदार होते हुए भी चालाक नहीं होती है।
उच्चाकांशी प्रकृति होने के कारण वृष लग्न की जातिका सुन्दर सुसज्जित आवास,खूबसूरत सुन्दर वस्त्र,उच्चस्तरीय सवारी,सौंदर्य एवं गृह सजावट तथा भौतिक सुख-सम्पति की और विशेष आकर्षित होती है इन्हें पाने के लिए ये कठोर परिश्रम भी करने को तैयार रहती है, बुध के प्रभाव से ये उच्च व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करती है।
व्यवहार कुशल एवं मिलनसार प्रकृति की होने पर भी अपनी प्रतिष्ठा का विशेष ध्यान रखती है।ये अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध किसी भी प्रकार का समझोता नहीं करती है।
यदि चंद्र शुभ हो तो नए-नए प्राकृतिक स्थानों पर घूमने का शौक रखती है।
ये जिनके साथ प्रेम करती है उसे पूरी ईमानदारी एवं समर्पण और निष्ठां के साथ
प्रेम करती है।प्रेम में धोखा किसी के साथ नहीं करती है और ना ही किसी से धोखा सहन करती है।
ऐसी जातिका अतिथि सत्कार करने में विशेष कुशल होती है।इनकी नए एवं अच्छे लोगो से सम्बन्ध स्थापित करने में विशेष रूचि होती है ये तीर्थ एवं पर्वतीय स्थानो पर यात्रा करने की शौक़ीन होती है।
जीवनसाथी तथा सुख👉 वृष लग्न की जातिका की कुंडली में यदि मंगल शुभ हो तो विवाह उच्च प्रतिष्ठित चुस्त एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाले जातक के साथ होता है।गृहस्थ जीवन में इस लग्न की जातिका गंभीर,वफादार, परिश्रमी, ईमानदार तथा परिस्तिथि के अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाली होती है।ये अपने पति एवं परिवार में सौहार्द कायम करने में पूरा सहयोग प्रदान करती है।ये जिसको दिल से चाहे उसपर सर्वस्व न्योछावर कर सकती है।
गृहस्थ जीवन के अतिरिक्त आर्थिक एव सामाजिक क्षेत्र में भी अपने पति का पूर्ण सहयोग करती है।रसोई कार्य में भी दक्ष होती है।
इस लग्न की जातिका प्रायः अपने पति से भी ज्यादा परिवार के प्रति समर्पित होती है।
आरोग्य👉 यदि इनकी कुंडली में शुक्र एवं मंगल अशुभ हों तो जातिका कुछ जिद्दी एवं चिड़चिड़े स्वाभाव की होती है।इन्हें गले एवं टॉन्सिल सम्बंधित,नेत्र रोग, पायरिया, जननेंद्रिय सम्बन्धित गुप्त रोग एवं सिर सम्बंधित रोग का भय अधिक रहता है इसलिए इन्हें अपने आहार और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है।
जीवन साथी का चुनाव👉 वृष लग्न के जातक या जातिका को अपने जीवन साथी के चुनाव के लिए वृष, मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर अथवा कुम्भ राशि या लग्न वाले जातक या जातिका के साथ वैवाहिक सम्बन्ध शुभ होता है अन्य के साथ कठिनता से निर्वाह होता है।
🙏वृषभ लग्न/राशि में उत्त्पन्न स्त्री वैसे तो चंचल स्वभाव की होती है परन्तु जहां परिवार की बात आए तो पूरे परिवार को साथ ले के चलना पसंद करती है और यदि जेष्ठ हो चाहे पिता घर या पति के घर तो इन्हीं के आचरण व्यवहार और योगदान से ही परिवार उन्नत होता है।😊
🙏इनको गुस्सा जब भी आए तो बच के रहेना चाहिए नही तो इनके हाथ में रहे बेलनास्त्र और झाड़ूअस्त्र से खतरा उत्तपन्न हो सकता है
🙏इनके हर कार्य मे व्यापारिक नाप तोल देखने को मिलता है और ये स्त्रियां सुन्दर ,वात–कफ प्रधान,चटपटे खाने में रूचि रखने वाली ,सदा सुख में आसक्त ,सौम्य दृष्टि,तेज से पुष्ट ,रजोगुणी ,आराम पसंद, काले घुंघराले केशों वाली,कामुक,गेहूवे गोरे रंग की हो सकती है।
🙏इनकी सुंदरता और आकर्षण से सम्मोहित होकर लोग उसकी ओर खिंचे चले आते हैं तथा विशेष रूप से विपरीत लिंग के लोग। शुक्र के प्रबल प्रभाव वाली स्त्री जातक शेष सभी ग्रहों के जातकों की अपेक्षा अधिक सुंदर होती हैं। शुक्र के प्रबल प्रभाव वालीं महिलाएं अति आकर्षक होती हैं तथा जिस स्थान पर भी ये जाती हैं, पुरुषों की लंबी कतार इनके पीछे पड़ जाती है।
🙏वैसे तो इन महिलाओं की पाचन शक्ति ठीक ठाक होती है सुस्वादु भोजन खाने और खिलाने की शौकीन होती है ये। पर इन्हें हार्मोनल प्रॉब्लम, मूत्र विकार, कफ की अधिकता, पेट व लीवर की तकलीफ और कानों की तकलीफ,तथा गुप्त रोग इत्यादि सामान्य रोग है।
🙏सामान्यतः इनकी बुद्धि में जड़ता देखने को मिलती है ,हर जगह अपने को बड़ा बनाने के फिराक में रहती है स्वयं की आलोचना जल्दी से सहन नही कर पाती है। गीत संगीत कार्यक्रमों और ग्रुपबाजी में इनको अव्वल पाया गया है।
🙏यदि किसी महिला के वृष लग्न के सप्तम भाव में शुक्र हो तो भैया कईयों से i phone प्राप्त करती है😊😃उनकी कामना को कामदेव ही पूरा कर सकते है पतिदेव के बस की बात नही, है।
🙏इनके चौथे भाव में बैठा शुक्र इनका जीवन सुख से गुजार देता है। लेकिन वही यदि चौथे भाव में शुक्र के साथ शनि भी हो तो फिर अनेक पुरुषो से धन की प्राप्ति करा देते है बाकी आप समझदार हो ही की मैं क्या कहना चाहता हु😃😊😃😊
शुक्र और मंगल समसप्तक हो तो भी काम वासना में वृद्धि कर देते है।
🙏वृष लग्न में जन्मी महिलाए मित्र धर्म का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करती है।इनपर विश्वास किया जा सकता है,प्रोपकारी वृत्ति की होती है अंग्रेज और अंग्रेजी में विशेष रुचि होती है भौतिकता और पाश्चात्य संस्कृति से अभिभूत होती है।यदि पंचम स्थान में चंद्र शनि से दृष्ट हो तो कन्या की अधिकता रहती है। घूमने फिरने,और शॉपिंग के शौकीन होती है तथा स्वभाव से थोड़ी लोभी होती है।
🙏वृष लग्न की स्त्रियां कर्मठ और परिश्रमी होती है इसी कारण वे गरीबी भले जन्मी हो पर गरीबी में मरती नहीं है।बुध शुक्र की युति या दृष्टि संबंध इनको समाज में सम्मानित पद प्राप्त कराती है।
🙏वृष लग्न की स्त्री पति को प्रिय,सत्य का आग्रह रखने वाली,सभी कलाओ में चतुर परिवार का हित चाहने वाली,मोलभाव में होसियार,तथा आस्तिक होती है।लग्न सप्तम में पाप ग्रह,शनि,राहु,केतु,सूर्य,यदि लग्न में ही विराजमान हो तो ऐसे महिलाओं के वैवाहिक जीवन को नर्क बनाने की कोशिश करते है।वैवाहिक सुख में कमी करते है ।
🙏 वृषलग्न वाली स्त्रियों के जीवन में 3बार भारी पीड़ा आती है जन्म से 7वे वर्ष जल से भय 10वे वर्ष अग्नि से और 16वे वर्ष वात कफ जनित रोगों से भय रहता है।अगर मारक ग्रह की अरिष्ट्ता से बच जाए तो लंबा जीवन जीती है।
🙏वृष लग्न में लग्न में मंगल शारीरिक रूप से पुष्ट बनाता है पर स्वभाव से महाकंजुस बनाता है इसी स्त्रियां मोदी जी के सूत्र को अपना लेती है "ना खाऊंगी ना खाने दूंगी😃
लग्न में चंद्रमा पति के साथ वैचारिक मतभेद खड़ा करके वैवाहिक जीवन नष्ट करा सकता है।इस पति यदि अपना वैवाहिक जीवन बचाना चाहते है तो पत्नी के कार्यों में उंगली न करे तो उनके लिए ठीक रहेगा😆
लग्न में शुक्र गोरे,विलासी,धनवान उत्तम पति की प्राप्ति करते है बस लग्नेश स्वयं पाप प्रभाव से बचे रहे तब।
लगनस्थ चंद्र पर सूर्य बुध की दृष्टि जातिका को विद्वान बनाती है।लगनस्थ गजकेशरी योग ऐसी स्त्रियों को राजनीति के रास्ते संसद में ले जा। सकती है परंतु गुरु और चंद्र दोनो युवा होने चाहिए।
लग्न में राहु चंद्र का ग्रहण योग पति के जीवन का ग्रहण बन सकता है,एक्सीडेंट में पतिदेव का गमन हो सकता है वो भी विवाह के कुछ दिनों में ही इस लिए जिन स्त्रियों के कुंडली में ऐसा योग हो उन्हे विवाह के पूर्व ग्रहण दोष की शांति अवश्य करा लेनी चाहिए।
लग्न से सप्तम राहु पति पत्नी के संबंध में अकारण बात बात पे झगड़ा कराता रहता है अच्छा इस जातिका का सारा झगड़ा सूर्यास्त तक ही रहता है सूर्यास्त के पहले कट्टी और सूर्यास्त के बाद मिल्ली 😃😆
🙏वृष लग्न में पाप ग्रस्त शुक्र आजीवन बीमारी से भर देता है।
लगनस्थ सूर्य विवाह में देरी,किसी एक अंग में पीड़ा देता है तथा
अति स्वाभिमानी बनाता है।क्रूर ग्रहों का लग्न में होना उसे क्रूर बनाती है।चंद्र मंगल की लग्न में युति उसे वहेमी और शक्की बना सकते है।
🙏 वृष लग्न में जन्मी महिलाओं की मृत्यु गुप्त रोग , सर्प दंश, कीट पशु और दवा के रिएक्शन से हो सकती है इस लिए इन्हें इन बातो का विशेष ध्यान रखना चाहिए। वैसे तो इनकी ओसत आयु 85वर्ष होती है परंतु 3,5,6,8,13,17,20,21,28,33,42,52,62,63,71,78, इन वर्षों में शारीरिक rogo ka भय बना रहता है।परंतु तुला का चंद्रमा पूर्ण स्वस्थ आयुष्य देता है।
धनु राशि में चंद्र शनि की युति इसे स्त्री को दूसरे के द्वारा किए गए अभिचार कर्म द्वारा अकाल मृत्यु प्राप्त करा सकता है तो इस योग वाली स्त्रियां सावधान हो जाए और जल्द से जल्द शांति करा ले।
अपने समान स्त्री से सदा बैर भाव रखती है इनके नेत्र पाव और गर्दन में पीड़ा रहती है। कार्तिक का मास इसके लिए विशेष शुभ रहता है। अपने सभी महत्वपूर्ण कार्य इसी मास में करें तो श्रेष्ठ फल प्राप्त होगा। इनको जीवन में 3 बार विशेष खतरा उठाना होता है। 7 वें वर्ष में जल भय रहता है। दसवें वर्ष में अग्नि से, 16 वें वर्ष में वात, कफ रोग का भय रहता है। अपघात व मृत्यु भूख, परिश्रम या जल तथा शूल रोग से बनती है। अगर काई अन्य मारक योग न बने तो आयु 78 वर्ष तक होती है।
गुरु, शुक्र और चंद्रमा ये वृषलग्न के लिये अशुभ हैं। इलिए उनको मारक लक्षण प्राप्त होता है तो अर्थात् मारक स्थानों से उनका जिस प्रकार का और जब संबंध आएगा इस प्रमाण से वे मारक बनते हैं। (दिवाकरी)
जीवशुक्रादयः पापाः शुभौ शनिशशीसुतौ ।
राजयोगकरः साक्षादेक एवं रवेः सुतः ॥4॥
जीवादयो ग्रहाः पापाः संति मारकलक्षणाः।
बुधस्तत्र फलान्येवं ज्ञेयानि वृषजन्मनः ॥5॥
वृषलग्न के लिये गुरु और चंद्रमा अशुभ फल देते हैं। शनि और रवि (चन्द्र)
ये शुभ फल देते हैं। शनि अकेला ही राजयोग कारक है। वृषलग्न के लिए शनि भाग्य और दशम स्थानों का त्रिकोणाधिपति है इसलिए दोनों शुभ हुए। नवम और दशम स्थान के स्वामियों का राजयोग होता है, ऐसा इस श्लोक पर से सिद्ध होता है। इस पर से गुरु शनि का योग मेषलग्न के लिये शुभ फल दायक होना चाहिए था परन्तु ये ग्रह 11/12 स्थानों के स्वामी होते हैं इसलिए नियमों के अनुसार गुरु शनि का योग यहां पर शुभ नहीं होता। (परन्तु कुछ ग्रंथों में गुरु तथा शनि का योग मेष लग्न के लिए राजयोग माना है।) गुरु शनि योग शुभ नहीं होता। ऐसा जो उपरोक्त श्लोक में कहा गया है, इतना ही नहीं तो गुरु शनि योग होने से गुरु प्रत्यक्ष रुप से अशुभ होता है कारण गुरु के दोनों स्थानों में से नवम शुभ और द्वादश अशुभ और शनि के दोनों स्थानों में से दशम स्थान शुभ और एकादश स्थान अशुभ होते हैं। परन्तु गुरु निसर्गत: शुभ ग्रह होने के कारण से उसे शनि इस पाप ग्रह का योग अधिक बाधक होता है। और शनि नैसर्गिक पाप ग्रह (क्रूर ग्रह) होने से उसको गुरु इस शुभ ग्रह का योग अधिक बनाता है। और इस प्रकार शनि का अशुभत्व कम हो जाता है इसलिए गुरु शुभ नहीं है। शुक्र 2/7 स्थानों का स्वामी होता है। अर्थात् मारक स्थानों का स्वामी होता है परन्तु वह नैसर्गिक शुभ ग्रह होने से स्वयं मारक नहीं बनता। उसके साथ दूसरा पाप ग्रह हो तो शुक्र उसे मारकत्व का काम सौंप देता है।
(इस प्रकार 11/12 स्थानाधिपतियों को बहुत गौणत्व प्रदान किया गया है यह
दिखाई पड़ता है।) उसी प्रकार श्लोक 9 में कहे अनुसार मंगल अष्टम स्थान का
स्वामी भी होता है। परन्तु अष्टम स्थान का स्वामी लग्नेश भी होने के कारण से वह अशुभ नहीं होता। इसके सिवाय अष्टमस्थ या लग्नस्थ हुआ तो शुभ होता है। चंद्रमा यदि क्षीण हो तो वह पापी होता है और पापी ग्रह केन्द्र का स्वामी होने से अशुभ फल नहीं देता। श्लोक के अनुसार मंगल और चंद्रमा ये सम होते हैं। सूर्य गुरु का योग इस लग्न को शुभ होता है, कारण सूर्य पंचमेश और गुरु नवमेश-द्वादशेश है। परन्तु श्लोक के अनुसार गुरु स्वयं दोष युक्त (द्वादश का स्वामी होने से) होने पर भी सूर्य से युक्त होने के कारण गुरु का दोष नष्ट होता है और वह राजयोग होता है।
"वृषभ लग्न शारीरिक विशेषता
शारीरिक रूप से, वृषभ लग्न के जातक संपन्न होते हैं। आप शुडौल व एक गठीले शरीर के धनी होते हैं। कई वृष राशि वाले भी औसत कद और सुडौल शरीर वाले होते हैं। उनके पास आकर्षक चेहरे की विशेषता और अच्छी त्वचा होती है। इनका गर्दन मजबूत दिखने वाला होता है। एक बैल के बारे में सोचें, तो आपको इस बात का उचित अंदाजा होगा कि वृषभ के लोगों के पास इतनी मजबूत शारीरिका ढांचा क्यों है।
वृषभ लग्न मानसिक विशेषता
आप कला, प्रकृति, संगीत, फैशन, सजावट और निश्चित रूप से सुंदरता से प्यार करते हैं (यह स्वामी शुक्र सुंदरता और सौंदर्यशास्त्र का प्रतिनिधित्व करता है)। आप अक्सर एक दयालु, सुंदर और कोमल स्वभाव के होते हैं।
वृषभ लग्न प्रेम और संबंध विशेषता
वृषभ लग्न अन्य पृथ्वी या जल, वायु तत्व वाले राशियों के साथ अनुकूल रहते हैं। विशेषकर वृषभ, कन्या, मकर, कर्क, वृश्चिक, और मीन लग्न वालों के साथ इनकी अच्छी तरह से बनती है। इस चिन्ह के लिए प्रेम की सफलता पत्रिका में बुध और मंगल की स्थिति पर निर्भर करती है।
वृषभ लग्न स्वास्थ्य विशेषता
वृषभ राशि गले के संबंधित विकारों का प्रतिनिधित्व करता है। आप आसानी से एक संक्रमित गले के साथ जुखाम व खासी से पीड़ित हो सकते हैं। अन्य स्वास्थ्य समस्याएं गुर्दे और प्रजनन अंगों से संबंधित हो सकती हैं।"
वृषलग्न के लिए शुभाशुभ योग
शुभ योग- शनि नवम् (त्रिकोण) और दशम (केन्द्र) स्थानों का स्वामी होने से श्लोक 7 के अनुसार स्वयं अकेला ही राजयोग कारक है और उसमें यदि उसका योग शुभ ग्रहों से होता हो तो अतिश्रेष्ठ राजयोग के फल प्राप्त होते है। "भावार्थ रत्नाकर'' नामक ग्रंथ में वृषलग्न को शनि अकेला राजयोग
करता ऐसा कहा हुआ है।
शुभ योग-बुध द्वितीय स्थान का (मारक स्थान का) स्वामी होकर पंचम
(त्रिकोण) स्थान का अधिपति होने से श्लोक के अनुसार शुभ है। यह मध्यम
योग है। "शनिशशीसुतौ" और "शनिदिवाकरौ" पाठान्तर बराबर दिखाई
पड़ता है। बुध के बारे में ऊपर कह चुके हैं। रवि चतुर्थ केन्द्र का स्वामी होने
से श्लोक के अनुसार शुभ होकर शुभ फल करने वाला है। रवि शनि का शत्रु
है और इनका योग उत्कृष्ट राजयोग नहीं कर सकेगा। इसकी जगह बुध-शनि
यह उत्कृष्ट राजयोग बन सकता है।
वृषलग्न के लिए अशुभयोग
अशुभयोग- गुरु अष्टम स्थान का स्वामी तथा एकादश स्थान का स्वामी होने
से श्लोक 9 और 6 के अनुसार अशुभ होता है और मृत्युकारक अशुभ फल
देने वाला होता है।
अशुभ योग-शुक्र षष्ठ का अधिपति होने से श्लोक 7 और 10 के अनुसार
अशुभ होकर अशुभ फल देने वाला (मृत्यु कारक) होकर अशुभ फल देने
वाला होता है।
अशुभ योग-चंद्रमा तृतीय स्थान का स्वामी होने से श्लोक 6 के अनुसार अशुभ
(मृत्यु कारक) होकर अशुभ फल देने वाला होता है।
अशुभ योग-मंगल सप्तम स्थान (केन्द्र स्थान) का स्वामी है, और श्लोक 7
के अनुसार शुभों में उसकी गणना की गयी है, परन्तु वह मारक स्थान का
स्वामी और द्वादश स्थान का स्वामी होने से अशुभ माना गया है और वह
अशुभ फलदायक होता है।
वृषलग्न के लिए निष्फल योग
1. शुक्र-बुध, 2. मंगल बुध
वृषलग्न के लिए सफल योग
1. शुक्र-शनि, 2. सूर्य-बुध, 3. सूर्य-शनि, 4. मंगल-शनि (निकृष्ट और
सदोष) कारण मंगल द्वादश स्थान का स्वामी होने से दूषित है और सप्तम स्थान का स्वामी होने से कष्टदायक है। 5. शनि स्वयं अकेला राजयोग कारक है और श्रेष्ठ फल दायक योग करता है। 6. शनि-बुध यह श्रेष्ठ योग है। शनि नवम और बुध पंचम स्थान का स्वामी है। ये दोनों त्रिकोण के स्वामी हैं और शनि दशम बलवान केन्द्र का स्वामी भी होने से इनका योग श्लोक 20 के अनुसार श्रेष्ठ राजयोग होता है।
वृष राशि व लग्न में स्थित ग्रहों के योग
→ यदि लग्न में मंगल है तो शरीर पुष्ट होगा, परन्तु मांगलिक दोष बनेगा। व्यक्ति महान कंजूस होगा। चोट भी लग सकती है।
लग्न में चंद्र विशेष धन योग नहीं करता। संसार में कम सुख मिलेगा। विवाह
में बाधा आएगी।
लग्न में शुक्र 'मालव्य योग' करेगा, श्रेष्ठ फल होगा। शुक्र पाप प्रभावी होगा
तो गले में कष्ट रहेगा।
लग्नेश शुक्र शरीर से सुंदर होगा। रंग यदि गोरा हो तो गैर से संपर्क भी कर
सकता है। यदि रंग कुछ काला भी हो तो पति गौर वर्ण का मिलेगा,
विलासनी होगी।
लग्न में गुरु शुभ फल नहीं करेगा, वह शत्रुक्षेत्री होकर निर्बल रहेगा।
लग्न के चंद्र पर सूर्य या बुध की दृष्टि हो तो उत्तम विद्यायोग बनेंगे।
लग्नेश शुक्र की दशा भी अशुभ फल प्रदान करेगी।
लग्न में गुरु+ चंद्र दोनों हों, चुनाव में विजय होगी
पृथ्वी तत्त्व शनि लग्न में घमंडी बनायेगा, नीच व दुष्ट स्वभाव देगा। शनि से
भी मांगलिक तुल्य बनेगी। विचार शून्य हो, नौकारी में सुख मिलेगा।
लग्न में राहु+चंद्र हो तो विवाह तो जल्दी हो पर विधवा शीघ्र हो या विवाह
के तीसरे दिन ही पति का एक्सीडेंट हो और धन हानि खूब होगी।
लग्न में केतु हो तो पति पत्नी में झगड़ा बन रहेगा। यह भी मांगलिक तुल्य
योग है।
लग्न में शुक्र पाप पीड़ित हो तो शरीर प्राय: अस्वस्थ रहेगा।
लग्न में सूर्य हो तो यह भी मांगलिक तुल्य दोष देता है। विवाह में देरी होती
है या बाधा आती है। शरीर के किसी अंग में पीड़ा रहती है। सूर्य और शुक्र
शत्रु हैं। अत: पेट या गले में विकार भी संभव है। पृथ्वी तत्व है और उसी
तत्त्व का सूर्य होने से जातिक अति विश्वासी होगी। दृढ़ निश्चयवाली हो, उद्धार
हो। ऊंचे विचारों के होने पर स्वाभिमानी हो। हल्के काम का तिरस्कार करने
वाली, कुछ कठोर व न्याय चाहने वाली प्रमाणिक
हो।.
→ सूर्य+मंगल+शनि+राहु या केतु ये 5 ग्रह भौम पंचक दोष वाले हैं। इनमें से
चार ग्रह साथ रह सकते हैं तब प्रबल मांगलिक बनेगी। गुरु दृष्ट हो तो ठीक
हैं वरना गृहस्थ सुख का प्रायः अभाव रहेगा। ऐसी कन्या का विष्णु से घट
विवाह करके विवाह करना उत्तम फलदायक होगा।
→ क्रूर ग्रह लग्न में हो तो दुष्ट कर्म करेगी यदि शुभ दृष्टि हो तो स्थिर बुद्धि
होगी।
चंद्र+मंगल लग्न में हो वह अंधी बनेगी। हठीली होगी और दुबली-पतली
रहेगी।
→ वृषलग्न चंद्र रोहिणी नक्षत्र के तीसरे चरण 16-40 से 20-0 मध्य स्वग्रही पर
मिथुन नवांश में जाने से प्रेम विवाह देकर तलाक बनायेगा। मृगशिरा में 2 चरण
26-40 से 30-0 में शुक्र कन्या नवांश में जाकर विलम्ब से विवाह योग देगा,
इतर यौन सम्बन्ध भी करेगा।
सूर्य+चंद्र व पाप ग्रह लग्न में हो तो जातिक का चरित्र दूषित हो सकता है।
लग्नेश शुक्र, बुध, गुरु और सूर्य 4 ग्रह लग्न में हो तो सुखी रहेगी।
लग्न में गुरु+शनि युति हो तो भी ठीक योग नहीं होता। शनि के साथ अष्टमेश
का योग है। घरेलू जीवन ठीक नहीं रहेगा।
यदि आपका जन्म 13 मई व 14 जून के बीच में हुआ है तो निश्चय ही आपका
भाग्योदय 24 वर्ष की अवस्था से प्रारंभ हो जाता है। बचपन बड़े ही आराम से
व्यतीत होता है। यौवन काल में आपको भविष्य संवारने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ेगा।
आपकी प्रकृति स्वार्थी है। अर्थात् आप अपने कार्य के प्रति पूर्णरूपेण, सजग
व सचेत रहेंगे। आप कोरी भावनाओं में बह जाने वाले व्यक्ति नहीं हैं। खाली ख्याली घुलाव व कल्पना लोक में विचरण करने वाले व्यक्तियों में आपका नाम नहीं। आप कर्मठ कार्यकर्त्ता एवं स्पष्टवादी हैं राजनीतिक, सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय भाग लेने से आपको बहुमूल्य जायदाद प्राप्त हो सकती है। मित्र व संबंधियों के स्नेह से आपकी आर्थिक उन्नति भी संभव है।
प्राय: वृषलग्न वाले जातक को व्यापार में रुचि रहती है, ऐसे जातक कुशल
व्यापारी होते देखे गये हैं। नित नई, वेशभूषा पहनने व सुंदर ढंग से अलंकृत रहने का शौक इनको कुछ विशेष ही होता है। ये श्रृंगार प्रिय तथा कला मे रुचि लेने वाले
व्यक्ति होते हैं। उत्तम व मिष्ठान भोजन के शौकीन होते हुए भी खुशबूदार वस्तुओं के बड़े रसिक होते हैं, कला की कद्र करना तथा किसी भी व्यक्ति के गुण अवगुण को परखने की कला इनमें खूब होती है। कुल मिलाकर ये शौकीन मिजाज तो होतेही हैं, इसके साथ वस्तु की बारीकी को पकड़ना व कार्य की गहराई में उतरना इनकी मौलिक विशेषता कही जा सकती है। शुक्र एक विलासी, शीतल व सौम्य ग्रह है। यह रात्रि को हल्की श्वेत झलकदार किरणें बिखेरता है। अतः श्वेत रंग व साफ-सुथरी एवं ऐश्वर्य प्रधान वस्तुओं का व्यापार आपके अनुकूल कहा जा सकता है। आपका अनुकूल रत्न "हीरा" है।
विशेष (रोग)- स्वास्थ्य - वृषभ लग्न के प्रति
हालांकि वृष मूल रूप से एक अच्छे स्वास्थ्य के संकेत की ओर इशारा करता है, लेकिन उनको कुछ शारीरिक ससम्याओं से जिंदगीभर जूझना पड़ता है, वे अक्सर तंत्रिका तंत्र से संबंधित बीमारियों से ग्रस्त होते हैं। उनमें से कई जिनका जन्म मई मास में होता है वे अधिक वजन की समस्या का समाना करते हैं, साथ ही वे यौन रोग के शिकार होते है और ग्रीवा कशेरुक, निचले जबड़े और दांत, ठोड़ी और तालु की समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। इनमें गुर्दे, गुप्तांग और मूत्राशय, गर्दन, और गलेमें कोई समस्या पाई जाती है।वृष लग्न यदि पाप ग्रहों से युत व शुक्र निर्बल हो अथवा वृष लग्न में क्षीण चन्द्र पाप ग्रहों से दृष्ट होकर लग्नस्थ हो तो जातक सदा रोगी रहते हैं। शुक्र बृहस्पति से शुभ योग करता हो अथवा बृहस्पति उच्च राशि का हो तो वृष लग्न के जातक भी कृष्ण व बुद्ध की भांति आध्यात्मिक उन्नति कर पाते।
अन्यथा इनकी उपासना कोरा कर्मकांड/आडम्बर बनकर रह जाती है। चुनौती सामने हो या कार्य रुचि के अनुकूल हो तो वृष लग्न के जातकों का उत्साह व शक्ति दोनों ही बढ़ जाते हैं । अन्यथा इनकी सुस्ती व आलस्य भी देखते ही बनते हैं। प्रायः ये जोश दिलाए जाने पर फूंक पर चढ़ जाने वाले व चापलूसी पसंद करने वाले होते हैं। लग्न पर शुभ प्रभाव हो तो ऐसे जातक गायक भी हो सकते हैं। कभी-कभी वृष लग्न वालों की गर्दन भी मोटी पाई गई है। वृष लग्न के जातक अतिथिसेवी/अच्छे मेहमाननवाज होते हैं। घर आए मेहमानों की खातिरदारी से इन्हें विशेष खुशी मिलती है। किन्तु ये परिवर्तन से बहुत भय खाते हैं । प्राय: ये एक ढर्रे पर जीना पसंद करते हैं (कोल्हू के बैल की भांति)।
इनके मित्रों का दायरा विस्तृत नहीं होता किन्तु जिनको ये नजदीकी स्थिति में ले आते हैं, उनसे प्रायः जीवन भर सम्बन्ध बनाए रखते हैं। आमतौर पर ये जातक स्पष्टवादी तथा साफ दिल होते हैं। फिर भी अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते/नहीं करते। वृष लग्न वाले जातक अपने जीवनसाथी को जरूरत से ज्यादा अच्छा मानते हैं। उनमें जो गुण नहीं भी होते, वे गुण भी वृष लग्न के जातक खामख्वाह ढूंढ़ निकालते हैं और दूसरों के सामने उसकी तारीफ करते नहीं अघाते। प्रायः ये संचयी व मितव्ययी होते हैं।
यदि बलिष्ठ वृष लग्न में शुक्र लग्नस्थ हो तो ऐसे जातक गोरे, सुडौल, रूपवान, सुशील, बुद्धिमान, कवि तथा विद्वान होते हैं। वैद्यक के जानकार हो सकते हैं। शृंगारप्रिय होते हैं परन्तु प्राय: दो विवाह करते हैं। रतिप्रिय व रसिक होते हैं। यदि शुक्र उच्च का (ग्यारहवें घर में) हो तो गुण, विद्या, धन एवं प्रतिष्ठा और भी बढ़ते हैं।रोग ज्योतिष के अनुसार वृष लग्न वाले जातकों का शुक्र यदि निर्बल या पाप प्रभाव में हो तो उनको मूत्र रोग, गुप्त रोग, वीर्य रोग, यौन रोग आदि विशेष रूप से सम्भावित होते हैं। विशेषकर तब जब सप्तम भाव भी पापाक्रांत हो अथवा छठा ।भाव पाप प्रभाव में हो। ऐसे जातकों का यदि दूसरा या बारहवां भाव पाप प्रभाव में हो तो उनको नेत्र रोगों की भी तीव्र सम्भावना होती है। लग्नेश बारहवें स्थान में होतो कामेच्छा/कामाग्नि अतितीव्र हो जाती है। मंगल से युति भी हो तो जातक बलात्कारी अथवा जंगली/वहशी ढंग से सहवास करने वाला होता है। विशेष (रोग)-वृष लग्न यदि पाप ग्रहों से युत व शुक्र निर्बल हो अथवा वृष लग्न में क्षीण चन्द्र पाप ग्रहों से दृष्ट होकर लग्नस्थ हो तो जातक सदा रोगी रहते हैं। वृष लग्न में गुरु यदि लग्न में हो और शुक्र आठवें भाव में हो तथा लग्न प्रभाव में हो तो जातक वावजूद खूब इलाज के भी सदा रोगी ही रहते हैं। वृष लग्न में शुक्र चौथे या बारहवें भाव में मंगल व बुध के साथ युति करे तो जातक को कुष्ठ रोग संभव होता है। स्वयं शुक्र लग्नस्थ होकर पापदृष्ट हो तो नेत्र रोगों की तीव्र सम्भावना होती है (सूर्य-चन्द्र भी निर्बल/पीड़ित हों तो जातक अंधा भी हो सकता है)।वृष लग्न में शनि व चन्द्र दोनों छठे भाव में हों तो भी कुष्ठ रोग सम्भावित होता है। यदि सूर्य, गुरु व शुक्र की युति दुःस्थानों में हो रही हो तो वाहन दुर्घटना मृत्यु होती है।वृष लग्न में चौथे भाव में पापग्रह हों तथा शुक्र व चतुर्थेश पापग्रहों केमध्य हों तो जातक हृदय रोगी होता है। अथवा वृश्चिक का सूर्य पापग्रहों के मध्य व पाप दृष्ट हो तो जातक को मृत्यु का कारण तीव्र हार्ट अटैक होता है। यदि चौथेभाव में राहू अन्य पाप ग्रहों से दृष्ट हो तथा लग्नेश (शुक्र) निर्बल हो तो भी तीव्रहार्ट अटैक होता है।वृष लग्न में चौथे, पांचवें भाव में पापग्रह हों तथा सूर्य नीच का हो तो जातक हृदय रोगी होता है। अथवा सिंह का शनि चौथे, सूर्य व अष्टमेश (गुरु) पापग्रहों के मध्य हों तो भी जातक को हृदय रोग होता है। वृष लग्न के जातक प्रायः धन सम्पन्न होते हैं। किन्तु मेरी दृष्टि में वृष लग्न की कुछ कुंडलियां ऐसी भी आई हैं, जिनमें जातक नितांत अभावग्रस्त और बर्बाद स्थिति में हैं। अतिविशेष-प्राय: देखने में आया है कि वृष/तुला लग्न में यदि शुक्र व बुध की युति (लग्न के अलावा कहीं भी हो तो जातक संतानोत्पत्ति में असमर्थ होता है)।
वृषलग्न में शुक्रदेव के फल:
वृष लग्न की कुण्डली में शुक्र लग्नेश पहले और छठे भाव का स्वामी होने के कारण वह कुण्डली का सबसे योग कारक माना जाता है l तीसरे, पांचवें (नीच राशि), छठे, आठवें और 12वें भाव में यदि शुक्रदेव पड़े हैं तो वह अपने अंश मात्र बलाबल अनुसार अशुभ फल देंगे क्योँकि इन बुरे भावों में होने के कारण वह अपनी योगकारिता खो देते हैं l यदि शुक्र देव अस्त अवस्था में किसी भी भाव में पड़े हों तो उनका रत्न धारण किया जा सकता है और उनसे लाभ लिए जा सकता है l
वृष लग्न में बुध देव के फल:
वृष लग्न की कुण्डली में बुध देव दूसरे भाव के स्वामी है तथा पाँचवें भाव के स्वामी हैं l पंचमेश होने के कारण बुध देव इस लग्न कुण्डली में योगकारक ग्रह माने जाते हैं lपहले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, सातवें, नौवें और दसवें भाव में यदि बुध देव पड़े हों तो अपने अंशमात्र बलाबल के अनुसार शुभ फल देते हैं l 11वें भाव में बुध देव अशुभ हो जातें है क्योँकि यह उनकी नीच राशि है l
इस कुण्डली में किसी भाव में बुध देवता यदि सूर्य के साथ अस्त अवस्था में पड़े हों तो उनका रत्न पन्ना पहनकर बुध देवता का बल बढ़ाया जाता है l बुध देवता यदि तीसरे, छठे, आठवें, 11वें और 12वें भाव में उदय अवस्था में पड़े हो तो उनका दान करके उनकी अशुभता कम की जाती है l
वृष लग्न में चंद्र देव के फल:
इस कुण्डली में चंद्र देवता सभी भावों में अशुभ फल देंगे l इस लग्न कुण्डली में मोती कभी नहीं पहना जाता l
वृष लग्न में सूर्य देवता के फल:
वृष लग्न में सूर्य देवता सम ग्रह माने जाते हैं l वह चौथे भाव के स्वामी हैं परन्तु लग्नेश शुक्र के शत्रु हैंl इस कुण्डली में सूर्य देवता अपनी स्थिति और बलाबल के अनुसार अच्छा और बुरा फल देते हैं l पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और 11वें भाव में पड़े सूर्य देवता अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं l तीसरे, छठे, आठवें, और 12वें भाव में सूर्य देव पड़े हैं तो उनका दान और सूर्य को जल चढ़ाकर उनकी अशुभता को दूर किया जाता है l इस अवस्था में सूर्य का रत्न माणिक नहीं पहना जाता है l
वृष लग्न में मंगल देवता के फल:
मंगल देवता वृष लग्न की कुण्डली में मारक ग्रह हैं l सातवें और 12वें भावों के स्वामी होने के कारण मंगल देवता लग्नेश शुक्र के विरोधी दल के हैं इस लग्न कुण्डली में मंगल देवता सभी भावों में अशुभ फल देंगे l परन्तु 6th, 8th, 12th भावों में यदि मंगल विपरीत राजयोग में हैं और लग्नेश शुक्र बलि और शुभ हैं तो वह शुभ फल देंगे l मंगल देवता की दशा/अन्तर्दशा में उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता कम की जाती है lइस लुंडली में मंगल का रत्न मूंगा कभी नहीं पहना जाता l
वृष लग्न कुण्डली में बृहस्पति देवता के फल:
बृहस्पति देव इस लग्न कुण्डली में एक मारक ग्रह हैं l आठवें और 11वें भाव के स्वामी होने के साथ – साथ वह लग्नेश शुक्र के विरोधी दल के ग्रह हैं l बृहस्पति देवता छठे, आठवें और 12वें भाव में पड़े हैं तो वह शुभ फलदायक भी होते हैं परन्तु इसके लिए शुक्र का बलि और शुभ होना अनिवार्य है l इस लग्न कुण्डली में बृहस्पति देवता सभी भावों में अपनी दशा/अन्तर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार अशुभ फल देते हैं l इस कुण्डली में सदा ही बृहस्पति देवता के दान किये जाते हैं l उनका रत्न पुखराज इस कुण्डली में कभी भी नहीं पहनना चाहिए l
वृष लग्न कुण्डली में शनि देव के फल:
वृष लग्न की कुण्डली में शनि देव नौवें और दसवें भावों के स्वामी होने के कारण अति योग कारक ग्रह हैं l पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें दसवें, 11वें भावों में शनि देव अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमतानुशार शुभ फल देते हैं l इस कुण्डली में किसी भी भाव में यदि शनि देव सूर्य के साथ अस्त अवस्था में पड़े हैं तो उनका रत्न नीलम पहन कर उनके बल को बढ़ाया जाता है l यदि शनि देव तीसरे, छठे, आठवें, और 12वें भाव में उदय अवस्था में पड़े हैं तो उनका रत्न नीलम कभी भी नहीं पहनना चाहिए बल्कि दान और पाठ करके शनि देव की अशुभता दूर की जाती है l
वृष लग्न कुण्डली में राहु के फल:
राहु देवता की अपनी राशि नहीं होती है l मित्र राशि और शुभ भाव में बैठ कर वह शुभ फल देते हैंl इस कुण्डली में राहु देवता पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें, दसवें भाव में शुभ फल देते हैं क्योँकि यह उनकी मित्र राशि है lतीसरे, चौथे, छठे, सातवें, आठवें, 11वें और 12वें भाव में राहु अशुभ फल देते हैं क्योँकि यह उनकी शत्रु राशि है l सातवें और आठवें भाव में राहु देव नीच राशि में आ जाते हैं l
वृष लग्न कुण्डली में केतु देव के फल:
केतु देवता की भी अपनी कोई राशि नहीं होती है l अपनी मित्र राशि और शुभ भाव में ही वह शुभ होते हैं l वृष लग्न कुण्डली में केतु पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें भावों में शुभ फल देतें हैं क्योँकि यह उनकी मित्र राशि है l पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों में केतु मारक ग्रह बन जातें हैं अशुभ फल देते हैं क्योंकि पहले और दूसरे भावों में केतु देव नीच राशि में आ जाते हैं l
वृषभ लग्न के जातकों के लिए पूजा व रत्नों के बारे में बता दें कि उनके लिए क्या उचित रहेगा। आपके लिए श्री दुर्गा जी की पूजा करना अत्यंत लाभदायक होगा। आपको नियमित रुप से माता दुर्गा जी की पूजा करनी चाहिए। इसके लिए आप श्री दुर्गा चालीसा आदि का पाठ कर सकते हैं। आपकी जन्म कुंडली में बुध पांचवें भाव का स्वामी होता है और पांचवां भाव त्रिकोण भाव है। इस भाव से हम संतान, शिक्षा व प्रेम संबंध देखते हैं। इसलिए आपको श्री गणेश जी का पूजन और श्री गणेश स्त्रोत का पाठ करना आपके लिए शुभ होगा।
वृष लग्न
सूर्य : अंक 1 पाप ग्रह जब केंद्रों के स्वामी हों,ल देते हैं। सूर्य वृष लग्न में चतुर्थेश होकर योग कारक बन गया है। इसकी दशा में भूमि और भवन से लाभ, सुख की प्राप्ति, रोगों और ऋणों से मुक्ति मिलती है।
मानक 1 मुखी रुद्राक्ष सांड को आटा लाया खिलावे शिव मंदिर में चाँदी का नंदी भेट करे l बेल की जड़ी पहने ॐ घृणिः सूर्याय नमः
चंद्रमा : अंक2वृष लग्न में चंद्रमा की दशा साधारणतया उन लोगों को नए अवसर प्रदान करती है, जो कि किसी प्रकार के सृजन कार्यों में रत हों। वृष लग्न के लिए चंद्रमा की दशा नए संबंधों को बनाती है। चंद्र अशुभ रहेगा तो दान करे, मोती न पहने चावल दान करे
मंगल : अंक 9 सप्तमेश और द्वादशेश होने से मंगल सर्वदा अपकारक है। सर्वदा अशुभ त्रिकोण खाद्य पदार्थ ∆ का दान करे मूंगा न पहने मंगल का दान करे
बृहस्पति : अंक 3 अष्टमेश और एकादशेश होने से बृहस्पति की महादशा का पूर्वार्ध अनिष्टकारी होता है। यद्यपि बृहस्पति की मूल त्रिकोण राशि एकादश भाव में होती है, जिसके कारण बृहस्पति की महादशा का परिणाम श्रेष्ठ होता है। सर्वदा अनिष्टकारी अशुभ बृहस्पति के दान करे
शनि : अंक 8 वृष लग्न के लिए यह श्रेष्ठ दशा है, क्योंकि शनि नवमेश और दशमेश होकर केंद्र त्रिकोण का स्वामी हो गया है। सर्वदा शुभ नीलम धारण करे काल भैरव शिव कृष् को पूजे बिच्छू की जड़ पहने 7 मुखी रुद्राक्ष पहने
बुध : अंक 5 बुध द्वितीय और पंचम भाव का स्वामी होने से प्रायः शुभ फल ही देता है। हालांकि इसकी स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बुध द्वितीयेश होने से साधारण मारकेश बन जाता है। सर्वदा शुभ धन सिद्धि कारी
पन्ना पहने, पेरिडॉट पहने, विदारा जड़ी पहने, 4 मुखी रुद्राक्ष पहने
शुक्र : अंक 6 लग्नेश होने से शुक्र की शुभता में कोई संशय नहीं है, लेकिन अकसर देखा जाता है कि यदि शुक्र की महादशा जीवन की प्रौढ़ावस्था के बाद आती है, तो शुभ फल न्यूनतम मिलते हैं। वैसे भी वृष लग्न में शुक्र षष्ठेश भी है, जो कि रोग, शत्रु और ऋणों में वृद्धि का संकेत देता है।
सर्वदा शुभ लाभ कारी सफ़ेद स्फटिक पुखराज पहने हीरा पहने, सर्पोखे की जड़ी पहने, 6 मुखी रुद्राक्ष पहने
राहु 3,6,10,11 भाव में ही शुभ
केतु अशुभ
2. वृषभ लग्न के इष्ट- मंत्र-
वृषभ राशि लग्न: इस राशि के जातक हरे हरिद्रा रक्त गणेश शिवशक्ति हरिहर दुर्गा भगवती षोडशी-श्री विद्या की साधना करें या माता ब्रह्मचारिणी की।
ॐ वं विघ्नेश्वराय नमः
ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवायै च नमः शिवाय
ॐ ऐंश्रींश्रींयै नमः
ॐ दं वैष्णवे नमः
वृषभ राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।
ॐ गंहौंदंदूंक्रींभ्रंऐंह्रींक्लींश्रींमहामात्रे नमः|
ॐ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:
षोडशी श्री विद्या मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'
या
ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:
इसके अलावा ये गृह आपके अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे इनकी दशा में जप करावे
शुक्र मंत्र- 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:'।
शुक्र का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शुं शुक्राय नम:'।
बुध मंत्र- 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:'।
बुध का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ बुं बुधाय नम:'।
शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनम:'।
शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'
भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।
भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।
वृषभ राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप
वृष लग्न के लिए शनि, शुक्र, बुध, मंगल , रूद्र, वरुण योग कारक हैं इसलिए , नीलम, हीरा, पन्ना, मूंगाR, सफ़ेद मूंगा, माणक, पहनना, आपके लिए शुभ है। 1,3,4,6,7,9 मुखी रूद्राक्ष धारण करें।
अशुभ गृह :
गुरु अंक 3, मंगल अंक 9, चंद्र अंक 2 [मीठे (मंगल), पीले (गुरु ), चावल (चंद्र)] (विणज) का गौशाला में दान
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गुरु के दान की सामग्री अंक 3
3gm सोने की गिन्नी, पित्तल के,5 मुखी रुद्राक्ष, भारंगी की जड़, 11 बर्तन 3अलग ,8अलग धार्मिक, पुखराज, पुस्तकें, केसर, हल्दी, पीताम्बर, च दाल, पीले मपीले पुष्प, पीला वस्त्र, शक्कर, घोड़ा (लकड़ी या खिलौना घोड़ा), चने की दाल, हल्दी, ताजे फल, पके केले नमक, स्वर्णपत्र, कांस्य, पीतल, कपास, पीला गुड़, पीली गेंद, बेसन की सेवे, बेसन के नमकीन, बेसन के बने व्यंजन, मक्की, अध्यन सामग्री, अध्यन के लिए स्टेशनरी का सामान, किताब, कॉपी कलम, कागज़, ग्रन्थ, भगवा वस्त्र,
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दान मंगल के 9 का अंक
ताम्बा, गुलाब जामुन, सिकी हुई, माटी, ईट, चूल्हा, अगरबत्ती,लाल शरबत जूस, लाइटर, गैस लैंप, स्टोव, गुलाब शरबत, सेब, मिठाई, गुलाल,लाल रंग के पुष्प, टमा सिन्दूर, मूंगा, त्रिकोण वस्तुवे, आतिश बाज़ी , अग्नि की वस्तुवे, क़ुमकुम, शहद , मसूर दाल , खजूर , मिठाई सिका हुवा मावा रबड़ी बेसन के लड्डू पकोड़े ,समोसे, तिकोण पुरिया बिंगो, पेटीज़, सैंडविच, मालपुवे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए। इसके अलावा योग्य ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को गेहूं, गुड़, माचिस,लाइटर, गैस, चूल्हा, ताम्बा, स्वर्ण, दुधारू गौ, मसूर की दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्ठान्न एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष दूर होता है।
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चंद्र: सफ़ेद रंग की वस्तुवे, सफ़ेद फूल, कैल्शियम, नदी स्नान, केवड़ा सफ़ेदवस्त्र,दूध,पानी मोती, मूंस्टोंन, चाँदी चावल, लौकी जल पेठा, खीर, मावा, खील, बताशे,खरबूजा,ककड़ी, अनानास, रसीलेफल, अंगूर, भांग, शलजम, सिंघाड़े, खस, केवड़ा, ठंडाई, बर्फ,गोला, सीताफल, नारियलपानी,पोदीना, शरबत, ओला,शकरगोला, मिश्री, मक्खन,
मैदा, छाछ, नारियल तेल
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Combo उपाय
मीठे+पीले+चावल गायी को खिलावे
मंगल+गुरु+चन्द्रमा
राहु + केतु मंगल+गुरु+चन्द्रमा
जौ+बाजरी+मसूर+रागी+चनादाल+मक्का+चावल @ 9,18,27,54,81,108,kg
गुड़ की पेटी और मुफ़ली तेल का एक कैन गौशाला में देवे हर अमावस्या को
गणेश मंदिर : बुद्धवार
लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE
में लगावे वी दुर्गा मंदिर
/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच
सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे
काली मंदिर : शनिवार चढ़ावे :
मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे 108 बार मंत्र बोले
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए
भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड, उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः
भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे
कृष्ण: मासिक जन्मास्टमी का व्रत रखे, काले रंग की कृष्ण मूर्ति श्रीनाथ जी, वृन्दावन मथुरा गिरिराज जी द्वारिका, नाथद्वारा में दुग्धाभिषेक करावे ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का जाप करे, माखन मिश्री का भोग इलाइची लगावे
शिव मंदिर : काले शिवलिंग की पूजा कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र, व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार), पान, गन्ने का रास दीप, पान
मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च
ह्रौं नमः शिवाय ,पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में मृत
इमरती का दान करे