पुत्र प्राप्ति ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका

श्रेष्ठ पुत्र या पुत्री  प्राप्ति के लिए ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका
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जानिए अपनी जन्म कुंडली से गर्भाधान काल के योग—–

जन्म कुंडली में त्रिकोण भावों को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। लग्न व्यक्तित्व व व्यक्ति के स्वास्थ्य का भाव है। पंचम भाव बुद्धि, संतान तथा निर्णय क्षमता से संबंध रखता है। नवम भाव भाग्य का है। यह धर्म व चिंतन का भाव भी है। इन्हीं तीनों भावों को ‘त्रिकोण’ कहा जाता है। तंत्र-साहित्य में ‘त्रिकोण’ निर्माण तथा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है।
पंचम भाव संतान का है तथा इसका कारक बृहस्पति है।
जातक के जीवन में संतान तथा भाग्य से इस भाव का गहरा संबंध है। बृहस्पति इसका कारक इसलिए है क्योंकि उसकी यहाँ उपस्थिति अपनी स्थिति व दृष्टि से त्रिकोण पर पूर्ण प्रभाव रखती है।
फलित-ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘भावात्‌ भावम्‌’। अर्थात भाव से भाव तक।
जिस भाव पर विचार करना है, उसे लग्नवत मानकर विभिन्न भावों पर विचार। पंचम भाव से पंचम अर्थात नवम भाव भी संतान विचार में महत्वपूर्ण है।
यों तो संतान योग जातक की जन्मकुंडली में जैसा भी विद्यमान हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है फ़िर भी कुछ प्रयासों से मनचाही संतान प्राप्त की जा सकती है. यानि प्रयत्न पूर्वक कर्म करने से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है. विवाहोपरांत दंपति को संतान प्राप्ति की प्रबल उत्कंठा होती है. आज जब लडकियां भी पढ लिखकर काफ़ी उन्नति कर रही हैं तो भी अधिकांश दंपतियों की दबे छुपे मन में पुत्र संतान ही प्राप्त करने की इछ्छा रखते हैं.
भारतीय धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बिना पुत्र सन्तान के मुक्ति असम्भव है। जीवन का महत्त्वपूर्ण सुख सन्तान सुख है। पितृ ऋण चुकाने हेतु भी सन्तान उत्पत्ति आवश्यक है।

किसी जातक को सन्तान सुख प्राप्त होगा या नहीं, इसके लिए ज्योतिष एक आधार प्रस्तुत करता है।
स्त्रियों के मासिक धर्म प्रारम्भ से 16 रात्रि तक ऋतुकाल कहा गया है। इसकी प्रारंभिक चार रात्रि गर्भाधान के लिए त्याज्य मानी गई हैं। इसके बाद की 12रात्रियां गर्भधारण करने के लिए उपयुक्त मानी गई हैं।

यदि स्त्री एवं पुरुष का संगम सम रात्रियों 6, 8, 10, 12, 14, 16 में हो तो ये पुत्र सुख देने वाली हैं तो विषम रात्रियां 5, 7, 9, 11, 13, 15 में स्त्री एवं पुरुष का संगम हो तो कन्या सन्तान की उत्पत्ति होती है।

गर्भाधान के लिए क्या आवश्यक?

गर्भाधान के लिए पंचम भाव एवं पंचमेश की शक्ति की परख या परीक्षण आवश्यक है। इसी शक्ति के आधार पर प्रजनन क्षमता का पता लगाया जाता है।
पुरुष की कुण्डली के पंचम भाव से बीज एवं स्त्री की कुण्डली के पंचम भाव से क्षेत्र की क्षमता बताई जाती है।
जब बीज और क्षेत्र दोनों का कमजोर सम्बन्ध बने तो सन्तान सुख की प्राप्ति कमजोर ही रहती है।
इस स्थिति में अनुकूल ग्रह स्थितियां ही गर्भाधान कराती हैं।
मंगल एवं चन्द्र के कारण स्त्रियों को रजोधर्म रहता है। यदि स्त्री की जन्म राशि से चन्द्रमा अनुपचय स्थानों से गोचर करे एवं उस चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो तो स्त्री गर्भ धारण करने में सक्षम होती है। इसी प्रकार पुरुष की जन्म राशि से चन्द्र उपचय स्थानों से गोचर करे एवं उस पर बृहस्पति एवं शुक्र की दृष्टि हो तो गर्भधारण हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुष एवं स्त्री की जन्म कुण्डली से उपरोक्त ग्रह स्थितियां गोचरवश बन रही हों। पंचमेश एवं पंचम भाव शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो संभावना अधिक हो जाती है।
ग्रहों में चन्द्र को जल एवं मंगल को रक्त व अग्नि का कारक माना जाता है। चन्द्र रक्त में श्वेत रुधिर कणिकाओं एवं मंगल लाल रुधिर कणिकाओं का नेतृत्व करता है। जब चन्द्र एवं मंगल की परस्पर दृष्टि बने या सम्बन्ध बने तब रजोधर्म होता है। रजोधर्म काल में यदि उपरोक्त स्थितियां बन रही हों तो लेकिन पुरुष से संगम न हो, स्त्री अधिक आयु या कम आयु की हो, किसी रोग से ग्रस्त हो या बांझ हो तो उसे गर्भधारण नहीं होता है।
यह जान लें कि सन्तान के लिए स्त्रियों में XX गुणसूत्र व पुरुषों में XY गुणसूत्र रहते हैं। सम राशियां स्त्री कारक एवं विषम राशियां पुरुष कारक होती हैं।
अतः स्त्रियों में रजोधर्म कारक चन्द्र मंगल एवं पुत्रकारक गुरु का सम राशि में बली होकर स्थित होना XX गुणसूत्र को बलवान बनाता है। पुरुषों की कुण्डली में इसी प्रकार से चन्द्र, शुक्र एवं प्रजनन कारक सूर्य का विषम राशि में बलवान होकर स्थित होना XY गुणसूत्र को बली बनाता है। यदि बीज एवं क्षेत्राकारक बली हो एवं किसी प्रकार का दोष न हो व गर्भाधान के लिए उपयुक्त ग्रह स्थितियां गोचरवश बन रही हों तो गर्भाधान हो जाता है।
——————————————————————————————गर्भाधान के समय व्यय भाव का स्वामी शुभ ग्रहों की संगति तथा प्रभाव में हो तथा चंद्रमा केन्द्र या त्रिकोण भाव में हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है। लग्न पर सूर्य का प्रभाव हो तो बच्चे व माता दोनों सुरक्षित रहते हैं। गर्भाधान के समय रवि लग्न, तृतीय, पंचम या नवम भाव में हो तथा इनके स्वामी से एक भी संबंध हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है तथा भाग्यशाली व दीर्घायु मानव जन्म होता है।
—— पंचम लग्न या एकादश भाव पर प्रसव के समय मंगल व शनि का प्रभाव हो, या इन भावों के स्वामी इन ग्रहों के प्रभाव में हों तब शल्य क्रिया से संतान का जन्म होता है।
——–भारतीय ज्योतिष ने संतान संख्या, संतान का लिंग, संतानोत्पत्ति के समय स्त्री के आसपास का वातावरण, पिता की स्थिति, गर्भाधान के समय माता-पिता की मनःस्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इसके लिए जन्म कुंडली के साथ सप्तमांश व नवांश कुंडली के विभिन्न योगों का फलित ग्रंथों में विस्तार से वर्णन है।
——- ‘गर्भपात’ संतान चाहने वाले दंपतियों के लिए एक दुःखद स्थिति है। इसके अतिरिक्त समय से पूर्व अविकसित प्रसव भी कष्टदायक है। फलित ज्योतिष ने इस विषय पर भी प्रकाश डाला है।
——- लग्न या सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर राहु एवं मंगल का संयुक्त प्रभाव बार-बार गर्भपात करवाता है।
—–गर्भपात के समय पंचम भाव पाप-कर्तरी योग में हो या पंचम भाव या उसका स्वामी राहु-मंगल के संयुक्त प्रभाव में हो तब भी गर्भपात की स्थिति बन सकती है। गर्भाधान के समय लग्नव चंद्र लग्न के स्वामी ग्रहों का गोचरीय षडाष्टक योग हो तथा चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो भी गर्भपात होता है। 6 एवं 8 वें भाव के स्थायी ग्रह की अंतरदशा या प्रत्यंतर दशा में गर्भाधान न ही करें तो सुखद होगा।
——–गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण मे शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है. इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता. इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है.

——-यदि पति पत्नि संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास कर सकते हैं, इस काल में गर्भादान की संभावना नही के बराबर होती है.
——-तीन चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नही करना चाहिये. अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है. इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधन और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये. इसका गर्भस्थ शिशि पर अत्यंत प्रभावकारी असर पदता है,
——-यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं.
———-आधानकाल में जिस द्वादशांश में चन्द्रमा हो उससे उतनी ही संख्या की अगली राशि में चन्द्रमा के जाने पर बालक का जन्म होता है। आधान काल में शुक्र, रवि, चन्द्रमा और मंगल अपने-अपने नवमांश में हों गुरू, लग्न अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हों तो वीर्यवान पुरुष को निश्चय ही सन्तान प्राप्त होती है।
———यदि मंगल और शनि सूर्य से सप्तम भाव में हांे तो वे पुरुष के लिये तथा चन्द्रमा से सप्तम में हों तो स्त्री के लिये रोगप्रद होते हैं। सूर्य से 12, 2 में शनि और मंगल हों तो पुरुष के लिये और चन्द्रमा से 12-2 में ये दोनों हों तो स्त्री के लिये घातक योग होता है अथवा इन शनि, मंगल में से एक युत और अन्य से दृष्ट रवि हो तो वह पुरुष के लिये और चन्द्रमा यदि एक से युत तथा अन्य से दृष्ट हो तो स्त्री के लिये घातक होता है।
———दिन में गर्भाधान हो तो शुक्र, मातृग्रह और सूर्य पितृग्रह होते हैं। रात्रि में गर्भाधान हो तो चन्द्रमा मातृग्रह और शनि पितृग्रह होते हैं। पितृग्रह यदि विषम राशियों में हो तो पिता के लिये और मातृग्रह सम राशि में हो तो माता के लिये शुभ कारक होता है।
———यदि पापग्रह बारहवें भाव में स्थित होकर पापग्रहों से देखा जाता हो और शुभ ग्रहों से न देखा जाता हो, अथवा लग्न में शनि हो तथा उस पर क्षीण चन्द्रमा और मंगल की दृष्टि हो, तो उस समय गर्भाधान होने से स्त्री का मरण होता है। लग्न और चन्द्रमा दोनों या उनमें से एक भी दो पापग्रहों के बीच में हो तो गर्भाधान होने पर स्त्री गर्भ के सहित मृत्यु को प्राप्त होती है।
——–लग्न अथवा चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान में पापग्रह हो, मंगल अष्टम भाव में हो अथवा लग्न से 4-12वें स्थान में मंगल और शनि हों तथा चन्द्रमा क्षीण हो तो गर्भवती स्त्री का मरण होता है। गर्भाधान काल में मास का स्वामी अस्त हो, तो गर्भ का स्त्राव होता है, इसलिये इस प्रकार के लग्न को गर्भाधान हेतु त्याग देना चाहिये।
————यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। है। उक्त सभी ग्रह यदि सम राशि और सम नवमांश में हों अथवा मंगल चन्द्रमा और शुक्र ये समराशि में हों तो विद्वजनों को कन्या का जन्म समझना चाहिये। ये सब द्विस्वभाव राशि में हों और बुध से देखे जाते हों तो अपने-अपने पक्ष के यमल (जुड़वी सन्तान) केे जन्म कारक होते हैं अर्थात् पुरुष ग्रह दो पुत्रों के और स्त्री ग्रह दो कन्याओं के जन्मदायक होते हैं।
———यदि दोनों प्रकार के ग्रह हों तो एक पुत्र और एक कन्या का जन्म समझना चाहिये। लग्न में विषम (3-5 आदि) स्थानों में स्थित शनि भी पुत्र जन्म का कारक होता है। क्रमशः विषम एवं समराशि में स्थित रवि और चन्द्रमा अथवा बुध और शनि एक दूसरे को देखते हों, अथवा सम राशिस्थ सूर्य को विषम राशिस्थ लग्न एवं चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो, अथवा चन्द्रमा समराशि और लग्न विषम राशि में स्थित हो तथा उन पर मंगल की दृष्टि हो अथवा लग्न चन्द्रमा और शुक्र ये तीनों पुरुष राशियों के नवमांश में हों तो इन सब योगों में नपुंसक का जन्म होता है। शुक्र और चन्द्रमा सम राशि में हो तथा बुध मंगल लग्न और बृहस्पति विषम राशि में स्थित होकर पुरुष ग्रह से देखे जाते हों अथवा लग्न एवं चन्द्रमा समराशि में हो या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।
———–यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनांे तुल्य नवमांश में हों तो तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये। या पूर्वोक्त बुध, मंगल लग्न एवं गुरू सम राशियों में हों तो यमल (जुड़वी) सन्तान को जन्म देने वाले होते हैं।
———यदि बुध अपने (मिथुन या कन्या के) नवमांश में स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह और लग्न को देखता हो तो गर्भ में तीन सन्तान की स्थिति समझनी चाहिये। उनमें से दो तो बुध नवमांश के सदृश होंगे और एक लग्नांश के सदृश्य। यदि बुध और लग्न दोनांे तुल्य नवमांश में हों तो तीनों सन्तानों को एक-सा ही समझना चाहिये। यदि धनु राशि का अंतिम नवांश लग्न हो, उसी अंश में बली ग्रह स्थित हों और बलवान बुध या शनि से देखे जाते हों तो गर्भ में बहुत (तीन से अधिक) सन्तानों की स्थिति समझनी चाहिये।
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गर्भ मासों के अधिपति:——-
शुक्र, मंगल, बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-लग्नेश, सूर्य, और चन्द्रमा ये गर्भाधान काल से लेकर प्रसव पर्यन्त दस मासों के क्रमशः स्वामी हैं। आधान समय में जो ग्रह बलवान या निर्बल होता है, उसके मास में उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल होता है। बुध त्रिकोण (5-6) में हो और अन्य ग्रह निर्बल हो तो गर्भस्थ शिशु के दो मुख, चार पैर, और चार हाथ होते हैं। चन्द्रमा वृष में और अन्य सब पाप ग्रह राशि संधि में हों तो बालक गंूगा होता है। यदि उक्त ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और हाथ से रहित रहता है तो वह बालक अधिक दिनों में बोलता है।
———–मंगल और शनि यदि बुध की राशि नवमांश में हों तो शिशु गर्भ में ही दांतांे से युक्त होता है। चन्द्रमा कर्क राशि में होकर लग्न में हो तथा उस पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि लग्न में हो और उस पर शनि, चन्द्रमा, तथा मंगल की दृष्टि हो तो गर्भ का बालक पंगु होता है।
——–पापग्रह और चन्द्रमा राशि संधि में हों और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो गर्भस्थ शिशु जड़-बुद्धि (मूर्ख) होता है। मकर का अन्तिम अंश लग्न मे हो और उस पर शनि चन्द्रमा तथा सूर्य की दृष्टि हो तो गर्भ का बच्चा वामन (बौना) होता है। पंचम तथा नवम लग्न के द्रेष्काण में पापग्रह हो तो जातक क्रमशः पैर, मस्तक और हाथ से रहित रहता है।
——–गर्भाधान के समय यदि सिंह लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हों तथ उन पर शनि और मंगल की दृष्टि हो तो शिशु नेत्रहीन अथवा नेत्रविकार से युक्त होता है। यदि शुभ और पापग्रह दोनों की दृष्टि हो तो आंख में फूला होती है। यदि लग्न से बाहरवें भाव में चन्द्रमा हो तो बालक के वाम नेत्र, सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में कष्ट होता है। अशुभ योगों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो उन योगों के फल परिवर्तित होकर सम हो जाते हैं।

जन्म कुंडली में त्रिकोण भावों को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। लग्न व्यक्तित्व व व्यक्ति के स्वास्थ्य का भाव है। पंचम भाव बुद्धि, संतान तथा निर्णय क्षमता से संबंध रखता है। नवम भाव भाग्य का है। यह धर्म व चिंतन का भाव भी है। इन्हीं तीनों भावों को 'त्रिकोण' कहा जाता है। तंत्र-साहित्य में 'त्रिकोण' निर्माण तथा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है।

पंचम भाव संतान का है तथा इसका कारक बृहस्पति है। जातक के जीवन में संतान तथा भाग्य से इस भाव का गहरा संबंध है। बृहस्पति इसका कारक इसलिए है क्योंकि उसकी यहाँ उपस्थिति अपनी स्थिति व दृष्टि से त्रिकोण पर पूर्ण प्रभाव रखती है।

फलित-ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है 'भावात्‌ भावम्‌'। अर्थात भाव से भाव तक। जिस भाव पर विचार करना है, उसे लग्नवत मानकर विभिन्न भावों पर विचार। पंचम भाव से पंचम अर्थात नवम भाव भी संतान विचार में महत्वपूर्ण है। नवम से नवम अर्थात पंचम भाव का भी भाग्य से गहरा संबंध है। पंचम को लग्नवत माना जाए तो लग्न भाग्यस्थान तथा भाग्यभाव से लग्न संतान का भाव है। स्वास्थ, संतान तथा भाग्य एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं।

संतान भाग्य से ही प्राप्त होती है। स्वस्थ संतान के लिए माता-पिता का स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण है। चंद्र, मंगल, रवि एवं बृहस्पति 'गर्भाधान' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बशर्ते कुंडली में संतान प्राप्ति के योग हों। चंद्रमा तिथि, रवि माह तथा बृहस्पति गर्भाधान का वर्ष बताता है। शनि एवं बृहस्पति की दशा गर्भ को पुष्ट करती है।

स्त्री के मासिक धर्म का संबंध चंद्रमा के भ्रमण तथा मंगल के प्रभाव से है। जन्म कालीन चंद्रमा से 3, 6, 10 या 11वें भाव में चंद्रमा हो तथा मंगल से संबंध हो तब का मासिक धर्म 'गर्भ धारण' का कारण बन सकता है। स्त्री व पुरुष की चंद्र राशि से प्रथम, पंचम, सप्तम या एकादश भाव में गोचरस्थ शनि व बृहस्पति गर्भ की स्थिति निर्मित करते हैं। लग्न से पंचम या नवम भाव से शनि तथा पंचम भाव से बृहस्पति का गोचर गर्भधारण करवा सकता है। मंगल-शुक्र की परस्पर युति या पूर्ण दृष्टि संबंध तथा उसका लग्न, पंचम या एकादश भाव से संबंध गर्भधारण की स्थिति निर्मित करता है।

फलित ज्योतिष में गर्भाधान के अनेक योगों का उल्लेख आया है। इसी तरह गर्भ के सुरक्षित या पुष्ट होने के योग भी प्राप्त होते हैं। गर्भाधान के समय व्यय भाव का स्वामी शुभ ग्रहों की संगति तथा प्रभाव में हो तथा चंद्रमा केन्द्र या त्रिकोण भाव में हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है। लग्न पर सूर्य का प्रभाव हो तो बच्चे व माता दोनों सुरक्षित रहते हैं। गर्भाधान के समय रवि लग्न, तृतीय, पंचम या नवम भाव में हो तथा इनके स्वामी से एक भी संबंध हो तो गर्भ सुरक्षित रहता है तथा भाग्यशाली व दीर्घायु मानव जन्म होता है।

पंचम लग्न या एकादश भाव पर प्रसव के समय मंगल व शनि का प्रभाव हो, या इन भावों के स्वामी इन ग्रहों के प्रभाव में हों तब शल्य क्रिया से संतान का जन्म होता है। भारतीय ज्योतिष ने संतान संख्या, संतान का लिंग, संतानोत्पत्ति के समय स्त्री के आसपास का वातावरण, पिता की स्थिति, गर्भाधान के समय माता-पिता की मनःस्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इसके लिए जन्म कुंडली के साथ सप्तमांश व नवांश कुंडली के विभिन्न योगों का फलित ग्रंथों में विस्तार से वर्णन है। 'गर्भपात' संतान चाहने वाले दंपतियों के लिए एक दुःखद स्थिति है। इसके अतिरिक्त समय से पूर्व अविकसित प्रसव भी कष्टदायक है। फलित ज्योतिष ने इस विषय पर भी प्रकाश डाला है।

लग्न या सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर राहु एवं मंगल का संयुक्त प्रभाव बार-बार गर्भपात करवाता है। गर्भपात के समय पंचम भाव पाप-कर्तरी योग में हो या पंचम भाव या उसका स्वामी राहु-मंगल के संयुक्त प्रभाव में हो तब भी गर्भपात की स्थिति बन सकती है। गर्भाधान के समय लग्नव चंद्र लग्न के स्वामी ग्रहों का गोचरीय षडाष्टक योग हो तथा चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो तो भी गर्भपात होता है। 6 एवं 8 वें भाव के स्थायी ग्रह की अंतरदशा या प्रत्यंतर दशा में गर्भाधान न ही करें तो सुखद होगा।

प्रथम भाव का कमजोर होना तथा पंचम भाव पर राहु तथा व्यय पर शनि का प्रभाव 'गर्भ' को कमजोर करता है। पंचम व सप्तम भाव में पापग्रह तथा अष्टम भाव पर मंगल का प्रभाव गर्भपात करवा सकता है।

ज्योतिष की अपनी सीमाएँ हैं। वह केवल मार्गदर्शन कर सकता है। ग्रहजनित पीड़ा के उपाय बता सकता है लेकिन भाग्य तो भाग्य है। मार्गदर्शन व भावी संभावना का आभास देकर ज्योतिष गर्भपात को रोकने में मदद कर सकता है। यही कारण है कि भारत में संतानोत्पत्ति एक प्रमुख संस्कार है तथा इसके लिए विधिवत मुहूर्त की व्यवस्था भी है।

गर्भपात अगर ग्रहों के गोचर व दशाओं के कारण संभावित है तो उसे रोका जा सकता है। सर्वप्रथम डॉॅक्टर की सलाह मानें। पंचम भाव के स्वामी तथा बृहस्पति का रत्न धारण करें। संतानोत्पत्ति कार्य को धर्म व उद्देश्य मानें तथा संयोग के समय मन में किसी तरह के कुविचार वअशांति न लाएँ। बहुधा लड़ाई-झगड़ों का अंत शैया पर होता है तथा इससे जो संतान भविष्य में आएगी, उस पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। बार-बार गर्भपात की स्थिति में चांदी के सर्प का पूजन करें। संतान गोपाल महामंत्र का निरंतर जप करें। श्रीकृष्ण का पूजन मन को शांति देता है। आगे भगवदिच्छा गरीयसी।

ज्योतिष में गर्भाधान काल 
(उत्तम संतान प्राप्त योग)- पूर्णलेख पढे।नए वैवाहिक जोड़ो के लिए उत्तम।

पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज से मन सहित जीव (जीवात्मा) का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं। 

वीर्य, रज, जीव और मन का संयोग ही गर्भ है:-

गर्भ उत्पत्ति की संभावना का योग
जब स्त्री की जन्म राशि से अनुपचय (1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12) स्थान में गोचरीय चंद्रमा मंगल द्वारा दृष्ट हो, उस समय स्त्री की रज प्रवृत्ति हो तो ऐसा रजो दर्शन गर्भाधान का कारण बन सकता है अर्थात गर्भाधान संभव होता है।  

किसी अच्छे ज्योतिषी से गर्भाधान का मुहूर्त निकलवाना चाहिए। यही हमारी संस्कृति का प्राचीन नियम है।शुभ मुहूर्त में गर्भाधान संस्कार करने से सुंदर, स्वस्थ, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और दीर्घायु संतान का जन्म होता है। इसलिए इस प्रथम संस्कार का महत्व सर्वाधिक है।

उत्तम संतान प्राप्ति योग

शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि तक चंद्रमा को शास्त्रकारों ने पूर्णबली माना है। शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कलाऐं जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे स्त्री-पुरुषों के मन में प्रसन्नता और काम-वासना बढ़ती है।

 जिस समय आपकी राशि से गोचर का चंद्रमा चैथा, आठवां बारहवां न हो तब गोचरीय चंद्रमा रश्मियुक्त  शुक्र अथवा गुरु  या (सूर्य से (दृष्ट) )से दृष्टि या युति संबंध होता है,  यह मुहूर्त अनुभव सिद्ध है।  

 यह आधार अगर राशि से न मिले तो गर्भाधान की लग्न व विषम श्रेष्ठ रात्रि संतान प्राप्ति 
यज्ञ के साथ सम्मलित ही श्रेष्ठ संतान रत्न की प्राप्ति कराती है

ज्योतिष में जीव (गुरु) को गर्भोत्पत्ति का प्रमुख कारक माना है।

पुरुष की जन्म राशि से उपचय (3, 6,10,11) स्थानों में चंद्र गोचर हो और उसे संतान कारक गुरु देखे तो पुरुष को गर्भाधान में प्रवृत्त होना चाहिए।
पुरुष की जन्म राशि से 2, 5, 9वें स्थान में जब गुरु गोचर करता है तब वह गर्भाधान करने में सफल होता है। क्योंकि 2 स्थान का गुरु 6,10चन्द्र को और  तथा पंचम स्थान स्थित गुरु 11वें चंद्रमा को और नवम भाव का गुरु तृतीय भाव स्थित चंद्रमा को  देखेगा।  द्वितीय पंचम नवम गुरु से गर्भाधान की संभावना का स्थूल आकलन किया जाता है। 

पुरुष की जन्म राशि से 3, 5, 9, 11वें स्थान में सूर्य का गोचर हो तो गर्भाधान की संभावना रहती है।

गर्भाधान के समय लग्न, सूर्य, चंद्र व गुरु बलवान होकर विषम राशि व विषम नवांश में हो तो पुत्र जन्म होता है। यदि ये सब या इनमें से अधिकांश ग्रह सम राशि व सम नवांश में हो तो पुत्री का जन्म होता है।

गर्भाधान संस्कार हेतु अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, तीन उत्तरा, धनिष्ठा, रेवती नक्षत्र प्रशस्त है।
 वैधृति, व्यतिपात, मृत्यु योग, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा व सूर्य संक्रांति काल गर्भाधान हेतु वर्जित है।

गर्भाधान संस्कार हेतु स्त्री (पत्नी) की जन्म राशि से चंद्र बल शुद्धि आवश्यक है। जन्म राशि से 4, 8, 12 वां गोचरीय चंद्रमा त्याज्य है।  नीच या शत्रु राशि (पूर्ण फल के लिए) का चंद्रमा भी त्याज्य है। जन्म लग्न से अष्टम राशि का लग्न त्याज्य है।

 प्रत्येक पशु पक्षी भी किसी विशेष ऋतु काल में ही समागम करते हैं। किंतु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहने वाला मनुष्य आज भूल गया है कि उसे गर्भाधान कब करना चाहिए और कब नहीं।

श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न संतान प्राप्ति का भारतीय मनीषियों के पास एक पूरा जन्म विज्ञान था। उनके पास ऐसे अनेक प्रयोग थे फलतः उन्हें मनोवांछित संतान की प्राप्ति हो जाती थी। 

1. जिस दिन स्त्री को रजस्राव (रजोदर्शन) शुरू होता है वह उसके मासिक धर्म का प्रथम दिन/रात कही जाती है। स्त्री के मासिक धर्म के प्रथम दिन से लेकर सोलहवें दिन तक का स्वाभाविक ऋतुकाल माना गया है। ऋतुकाल में ही गर्भाधान करें।

कड़वी, खट्टी, तीखी, उष्ण वस्तुओं का सेवन न करके पांच दिन तक मधुर सेवन करें। 

2. ऋतुकाल की प्रथम चार रात्रियां रोगकारक होने के कारण निषिद्ध हैं। इसी तरह ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निंदित है। अतः इन छः रात्रियों को छोड़कर शेष दस रात्रियों में ही गर्भाधान करें। इन दस रात्रियों में भी यदि कोई पर्व-व्रतादि हो तो भी समागम न करें।
3. उपरोक्त विधि से चयन की गई रात्रियों के अलावा शेष समय पति-पत्नी संयम से रहें। क्योंकि ब्रह्मचारी का वीर्य ही श्रेष्ठ होता है, कामी पुरूषों का नहीं और श्रेष्ठ बीजों से ही श्रेष्ठ फलों की उत्पत्ति होती है।

4. गर्भाधान हेतु ऋषियों ने रात्रि ही महत्वपूर्ण मानी है। अतः रात्रि के द्वितीय प्रहर (10 से 1 बजे) में ही समागम करें। दिन में यौन संपर्क स्थापित से प्राण क्षीण होते हैं’। इसी उपनिषद में प्रदोष काल अर्थात् गोधूली बेला भी यौन संपर्क हेतु निषिद्ध कही गई है

5. शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ तथा निरोगी, बुद्धिमान और श्रेष्ठ संतान चाहने वाली दंपत्ति को चाहिए कि वह गर्भकाल/गर्भावस्था में यौन संपर्क कदापि न करें। अन्यथा होने वाली संतान जीवन भर काम वासना से त्रस्त रहेगी तथा उसे किसी भी प्रकार का शारीरिक मानसिक रोग/विकृति हो सकती है।

6. संस्कारवान और सच्चरित्र संतान की कामना वाली गर्भवती स्त्री को चाहिए वह गर्भावस्था के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष आदि विकारों का परित्याग कर दे। शुभ आचरण करें और प्रसन्नचित रहें।

किस रात्रि के गर्भ से कैसी संतान होगी 

चोथी रात्रि में गर्भधारण करने से जो पुत्र पैदा होता है, वह अल्पायु, गुणों से रहित, दुःखी और दरिद्री होता है।

पांचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़कियां ही पैदा करेगी।

छठवीं रात्रि के गर्भ से उत्पन्न पुत्र मध्यम आयु  का होगा।

सातवीं रात्रि के गर्भ से उत्पन्न कन्या अल्पायु और बांझ होगी।

आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र सौभाग्यशाली और ऐश्वर्यवान होगा।

नौवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती और ऐश्वर्यशालिनी कन्या उत्पन्न होती है।
दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर (प्रवीण) पुत्र का जन्म होता है।

ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से अधर्माचरण करने वाली चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।

बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरूषोत्तम/सर्वोत्तम पुत्र का जन्म होता है।

तेरहवीं रात्रि के गर्भ से मूर्ख, पापाचरण करने वाली, दुःख चिंता और भय देने वाली सर्वदुष्टा पुत्री का जन्म होता है। ऐसी पुत्री वर्णशंकर कोख वाली होती है जो विजातीय विवाह करती है जिससे परंपरागत जाति, कुल, धर्म नष्ट हो जाते हैं।

चोदहवीं रात्रि के गर्भ से जो पुत्र पैदा होता है तो वह पिता के समान धर्मात्मा, कृतज्ञ, स्वयं पर नियंत्रण रखने वाला, तपस्वी और अपनी विद्या बुद्धि से संसार पर शासन करने वाला होता है।

पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से राजकुमारी के समान सुंदर, परम सौभाग्यवती और सुखों को भोगने वाली तथा पतिव्रता कन्या उत्पन्न होती है।

सोलहवीं रात्रि के गर्भ से विद्वान, सत्यभाषी, जितेंद्रिय एवं सबका पालन करने वाला सर्वगुण संपन्न पुत्र जन्म लेता है।

ज्योतिषीय ग्रंथों एवं आयुर्वेद के मतानुसार पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।

👉 चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है। 

👉 पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी। 

👉 छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।

👉 सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।

👉 आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।

👉 नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।

👉 दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।

👉 ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है। 

👉 बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।

👉 तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।

👉 चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।

👉 पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है। 

👉 सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।

व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।

 दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।

 प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।

*चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।

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पुत्र प्रप्ति हेतु सर्पदोष निवारण 


जन्मपत्रिका में यदि पंचम भाव में राहू बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति कौ सर्पदोष होता है। इस दोष के प्रभाव से पुत्र उत्पत्ति में बाधा आती है। यदि समय से इस दोष का निवारण 


कर लिया जाये तो पुत्र यौग बन जाता है। इस दोष की समाप्ति के लिये आप निम्न उपाय कर सकते हैं:


(!) दोष की विंधि-विधान से शान्ति करवायें | (0) भगवान शंकर के मन्दिर का निर्माण करवाना चाहिये। (3) ग्रहण काले में विधि-विधान से पंचमुखी नाग की मूर्ति अर्पित करनी चाहिये। 


|) शान्ति के बाद पाँच प्रकार की धातु से नाग-नागिन के जोड़े को पवित्र जल प्रवाहित करने चाहिये। 


5) नाग पंचमी को सपेरे से नाग को मुक्त करवाना चाहिये परन्तु मुक्त करवाने से पहले नाग की पूजन अवश्य करना चाहिये। 


&) यदि आप पूरा मन्दिर बनवाने की स्थिति में नहीं हैं तो किसी मन्दिर में भगवान शिव की मूर्ति को अवश्य स्थान दिलवाना चाहिये। 


यदि आप उपरोक्त उपाय करते हैं तो लाभ प्राप्त होगा। गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण ब गाय आदि की सेवा भी पुत्र प्रप्ति का योग निर्मित करते हैं। 


संतान प्राप्ति हेतु उपाय 


$ अब मैं आपको एक ऐसा उपाय बता रहा हूँ जो कभी निष्फल नहीं होता है। इससे पहले मैं आपको एक सत्य घटना बता रहा हूँ। हमारे एक मिलने वाले है जो मुझ घर पूर्ण विश्वास करते हैं। उनके पड़ोस में एक दम्पती रहते हैं। उनके विवाह को लगभग 1६ वर्ष हो चुके हैं लेकिन संतान नहीं हुई है। इस कारण वे अपना वंश चलाने के लिये दूसरा विवाह करना चाहते थे। मेरे मिलने वालों ने उन्हें सलाह दी कि आप एक बार हमारे गुरुजी से मिल लें। यदि आपको कुछ विश्वास आये तो उपाय करें अन्यथा न करें। उनकी माताजी जिनकी आयु करीब 70 वर्ष हैं उन्होंने कहा कि हम कई उपाय कर चुके हैं और धन भी बहुत खर्च कर लिया है परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। मजबूरी में दूसरा विवाह कर रहे हैं। मेरे परिचित ने कहा कि आपके पुत्र की पत्रिका में यदि संतान योग है ही नहीं तो फिर आप दो क्या पचास विवाह भी कर लें, कोई लाभ नहीं होगा। माताजी ने कहा कि हमारी बहू में ही दोष है। वह व्यक्ति अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता  बह विवाह का इच्छुक भी नहीं था, परन्तु उसकी माताजी का ही दबाव था। वह अपनी माताजी से छिप कर अपनी पत्नी के साथ मेरे पास आया। मैंने जब दोनों की पत्रिका देखी तो समस्या समझ में आ गई | मैंने कहा कि उपाय बहुत सामान्य है परन्तु वर्तमान में ग्रह गोचर के प्रभाव से अभी संभव सहीं है परन्तु इतना विश्वास रखें कि आपके संलान अवश्य ही होगी। इसमें लगभग 10 माह लगेंगे। वे तैयार हो गये, परन्तु उनकी माताजी ने दबाव डाल कर उनका विवाह करवा दिया | विवाह के बाद जैसे कि माताजी को उम्मीद थी कि एक-दो माह में ही दूसरी बड्डू गर्भवती हो जायेगी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। एक वर्ष के बाद ज्जों समय मैंने उन्हें बताया था, वह अपनी प्रथम पत्नी के साथ मेरे पास आये। मैंने उन्हें उपाय बताया। उपाय आरम्भ करने के मात्र सात माह में ही उनकी प्रथम पत्नी गर्भवती हो गई | समय पर एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया इससे माताजी बहुत ही खुश हो गई | जब उन्‍होंने कहा कि हमने तो इतने उपाय कर लिये. कोई लाभ नहीं हुआ तो अब कैसे यह हो गया ? उन्हें जब वास्तविकता बताई गई तो बहुत दुःख हुआ कि मेरी मूर्खता और जल्दबाजी से एक जीवन बर्बाद हो गया। इसके बाद प्रथम पत्नी के ही दो संतान और हुई | जो दूसरा विवाह किया था, उसके कोई संतान नहीं हुई | आप इस बात को ऐसे भी देखें कि येदि उनके पुत्र की पत्रिका मेँ ही संतान योग नहीं होता तो वह दो क्या दस विवाह भी कर लेते तब भी संतान नहीं होती ॥ सेरा कहना है कि कोई भी अपने धन के मद में ऐसा कार्य न करे जिससे किसी का जीवन बर्बाद हो जाये | कोई भी कार्य करने से पहले हर प्रकार से पूर्ण जानकारी ले लेनी चाहिये। किसी कार्य के लिये कोई मना करता है तो उसका कारण अवश्य जानना चाहिये। तभी कोई कदम उठाना चाहिये | ॥ 


- आप यदि संतान न होने से पीड़ित हैं तो निम्न उपाय अवश्य करें | यदि आपकी पत्रिका में संतान सुख एक प्रतिशत भी हुआ तो प्रभु की कृपा से अवश्य ही संतान होगी ॥ यदि किसी को संतान प्राप्ति में बाधा आती है तो वह अपने निवास के मुख्यद्वार पर “संतान गणपति” की अभिमंत्रित प्रतिमा लगाये तथा पति-पत्नी दोनों ही गणपति के 1058 नवार्मो का उच्चारण करें | गणपति की मूर्ति पर यदि “संतान गणपतये नम: गर्भदोष हो नमः पुत्र चौत्राय नमः” अंकित हो अथवा मूर्ति इस मंत्र से सवा लाख मंत्रों से अभिमंत्रित हो तथा दम्पती इस मंत्र का जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है। मैंने स्वयं कर्ड बार ड्स उपाय से एक वर्ष के अन्दर ही संतान प्राप्त होते देखा है । यह एक ऐसा उपाय है जो कभी निष्फल नहीं जाता है। 

 इन सबके अतिरिक्त कुछ ऐसे निम्न उपाय हैं जिनके साध्यम से आप पुत्र प्राप्ति अवश्य कर सकले हैं:-ह (1) भोग सदैव शुकलपक्ष में ही करें लथा दिन में कभी भी भोग न करें। ड्ससे अक्षम संतान का योग निर्मित होता है। (2) भोग का समय रात्रि 11 व 4 के मध्य ही होना चाहिये तथा अमावस्या, षष्ठी, अष्टमी व रिक्ता तिथि, अर्थात्‌ चतुर्थ, नवमी व चतुर्दशी तिथि, रविवार, मंगलवार व शनिवार, माता-पिता की मृत्यु तिथि व ग्रहण काल में भोग वर्जित है। 


3) इसके अतिरिक्त यदि आप और अधिक गहराई में भोग निषेध का समय जानना चाहते हैं तो अपने नक्षत्र से सातवां नक्षत्र में भी भोंग निषेध है। अपनी राशि से यदि आठवां चन्द्र हो तो वह भी अशुम होता है। यदि आप भरणी, कृतिका, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, तीनों पूर्वा, विशाखा, ज्येष्ठा व रेवती नक्षत्रों को भी मोग न करें तो आपके संतान अवश्य ही भाग्यशाली होने के साथ अधिक आयु की होगी क्योंकि ये नक्षत्र भोग के अनुकूल नहीं हैं। हाँ, भोग के लिये श्रवण, हस्त, अनुराधा, स्वाति, शतभिषा, धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, मूल व रोहिणी नक्षत्र उत्तम तथा चित्रा, पुष्य, अशिवनी नक्षत्र मध्यम माने गये हैं। 


(६) रेवती नक्षत्र में यदि पीपल का बांदा शनिवार को स्त्री की कमर में बांघा 


- जाये तो पुत्र योग बनता है। (6) प्रातः: एक बेदाग नींबू लेकर उसका रस निकाल कर उसमें नमक मिला कर : भगवान श्री कृष्ण की तस्वीर के समक्ष रखें तथा रात्रि में भोग से पहले स्त्री को सेवन करायें। यह उपाय भी पुत्रकारक है परन्तु यह उपाय सिर्फ एक बार करें। के किसी शुक्लपक्ष में अभिमंत्रित “संतानगोपाल यंत्र” के समक्ष निम्न मंत्र जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है:35 देवकी सुत गोविन्दं वासुदेव जयत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:”॥|। $ विवाह के बाद अधिक समय निकल जाने पर भी यदि संतान न हो तो यंत्र के समक्ष नियमित रूप से “संतानगोपाल स्तोत्र” का पाठ करने. से संतान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं। इस यंत्र के साथ पत्रिका में जिस ग्रह के प्रभाव से संतान बाधा आ रही हो, उस ग्रह के यंत्र की भी सेवा करनी चाहिये। 


वास्तु दोष निवारण के द्वारा संतान उपाय 


मैंने कई बार देखा है कि कई लोग सिर्फ इस कारण से संतान सुख से वंचित रहे 

हैं कि उनके शयन कक्ष में वास्तुदोष था। जब उस वास्तुदोष का निवारण हो गया तो संतान भी हो गई। आप देखें कि कही आपके शयनकक्ष में कोई दोष तो नहीं है। सर्वप्रथम आप यह जान लें कि किसी भी नवदम्पती को ईशान कोण में अपना शयन कक्ष नहीं 

रखना चाहिये क्योंकि इस कोण में शयन कक्ष होने से संतान के विकलांग होने का योग निर्मित होता है। आपके कक्ष में यदि आधुनिक डबलबैड है तो यह आपके सम्बन्धों के लिये बहुत अशुभ है। इसके प्रभाव से आपके विचारों में मतभेद रहेंगे। इसलिये आप डबलबैड का गद्दा ऐसा रखें जिसमें कोई जोड़ न हो अर्थात् वह एक ही हो। आपके शयन कक्ष के आग्नेय कोण में आपका पलंग न हो। यह बहुत अशुभ वास्तु है। शयनकक्ष में आप अपनी राशि के अनुसार ही रंगों का चयन करें। ईशान कोण यदि खाली रहे तथा आपका पलंग आपकी राशि के अनुसार दिशा में हो तो संतान सुख जल्दी प्राप्त होता है। आपके निवास व शयन कक्ष में यदि ईशान कोण में असंतुलन है तो आप इसको अवश्य दूर करवायें। यदि आपका शरीर अधिक जल तत्व से परिपूर्ण है तो आप अपने शयनकक्ष में आग्नेय कोण को अधिक शक्ति दें अर्थात् इस कोण में सदैव लाल रंग का वल्ब जलता रहे। इससे आपको दो लाभ मिलेंगे। प्रथम, आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और द्वितीय, आप अपने कर्मक्षेत्र में अधिक सफल रहेंगे।

    जो स्त्री गर्भ धारण करने के योग्य हो, परंतु गर्भ नहीं ठहरता हो,सब प्रकार का इलाज करा लेने पर भी लाभ न होता हो तो कृपया येटोटके काम में लें, ईश्वर ने चाहा तो जरूर लाभ होगा।


    रविवार को ‘सुगंधरा की जड़' एकवर्णा गौ के दूध के साथ पीस‘ऋतुकाल' (मासिक धर्म के समय) में पीने से ‘बंध्या दोष'विनष्ट हो जाता है।


    रजोधर्म शुद्धि के पश्चात ‘काली अपराजिता की जड़' को बछड़ावाली नवीन गौ के दूध में पीसकर तीन दिन पीने से, तत्पश्चात पतिके साथ सहवास करने से ‘बंध्या स्त्री' अवश्य गर्भवती होती है।


    जिस गाय ने पहली बार ही बछड़े को जन्म दिया हो, उस गाय केदूध के साथ नागकेशर का चूर्ण, रजोधर्म के बाद, सात दिन पीनेके पश्चात पति सहवास करने से बंध्या स्त्री पुत्र को जन्म देती है।


    नीबू के पुराने पेड़ की जड़ को दूध में पीसकर घी मिलाकर पीनेसे ‘पति प्रसंग द्वारा' स्त्री को ‘दीर्घजीवी संतान’ की प्राप्ति होती है।जन्म लेने के पश्चात जिस स्त्री का पुत्र मर जाता है, उसे‘मृतवत्सा’ कहते हैं। जिस रविवार को ‘कृतिका नक्षत्र' हो, उसदिन ‘पीत पुष्पा' नाम की जड़ी की जड़ ले आएं उसे पानी मेंपीसकर सात दिन पिएं तो पुनः पुत्र न मरे।

    नागर मोथा, कंगुन, बेर, लाखरस और शहद बराबर-बराबर लेकरपुराने चावल के धोवन (पुराने चावल का धोया हुआ पानी) 10ग्राम की मात्रा में सात दिनों तक खाएं तो बंध्या स्त्री भी अवश्यगर्भ धारण कर लेती है और संतान प्राप्त करती है।


    कदम्ब का पत्ता, श्वेत श्रीखंड, चंदन, कटेरी की जड़ यह सबसमान भाग लेकर बकरी के दूध में पीसें। इस महापधि को तीन रात्रिया पांच रात्रि ऋतुकाल के समय पीने से स्त्री अवश्य गर्भ धारणकरती है और सुंदर संतान प्राप्त करती है।


    ‘पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र' में बरगद के पेड़ की जड़ लाकर लालधागे में स्त्री बाएं बाजू में धारण करे तो पुत्र प्राप्त होता है।


    ‘सिद्ध बाल गोपाल यंत्र' धारण करने से अवश्य पुत्र प्राप्त होता है।गाय के दूध में पद्माख, लाल चंदन, खस इन तीनों को बराबर मात्रामें मिलाकर पीस लें। एक-एक तोला 5 दिन खाने से गर्भपात नहींहोता।

    सिद्ध महामृत्युंजय यंत्र धारण करने से गर्भ गिर ही नहीं सकता।पीपल की छाल, काला तिल, सतावर, तीनों बराबर-बराबर मात्रामें लेकर गौ के दूध में पीसकर सात दिन पीने से प्रथम मास व दूसरेमास की गर्भ पीड़ा दूर होती है।

    चंदन, तगर, कूट, कमल की जड़, केशर, काकोली, असगंध बराबरमात्रा में लेकर, ठंडे पानी के साथ पीसकर पीने से तीसरे मास कीगर्भ की पीड़ा जाती रहती है।

    गदहपूर्णा, काकोली, तगर, नील कमल, गौखरू ये सभी सम मात्रामें दूध के साथ पीसकर पीने से पांचवें मास की गर्भपीड़ा शांत होतीहै।

    कैथ का गूदा ठंडे पानी में पीसकर, दूध मिलाकर पीने से छठे मासकी गर्भ पीड़़ा नष्ट होती है।

    कसेरू, पुष्कर, सिंघोड़ा व नील कमल की पंखुड़ियां पानी मेंपीसकर पीने से सातवें मास की गर्भ पीड़ा अच्छी होती है।

    इंद्रायण के बीज, कंकोल (अकोल), मधु (शहद) के साथपीसकर खाने से आठवें व नवें मास की गर्भ पीड़ा शांत होती है।

    पुरानी खांड, मुनक्का, छुहारा, शहद व नील कमल की पंखुडियांबराबर-बराबर मात्रा में दूध में पीसकर पीने से दसवें मास के गर्भकी व्यथा दूर होती है।

    आंवला व मुलहठी सम मात्रा में दूध के साथ पीसकर पीने से गर्भस्तम्भन पूर्ण रूपेण हो जाता है, फिर गिरता नहीं।

    ‘सिद्ध विजय यंत्र’ धारण करने से किसी प्रकार की गर्भ पीड़ा नहींहोती।

    संतान प्राप्ति हेतु सर्पदोष निवारण


    जन्मकुंडली में यदि पंचम भाव में राहु बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति कोसर्पदोष होता है। इस दोष के प्रभाव से पुत्र उत्पत्ति में बाधा आती है। यदिसमय से इस दोष का निवारण कर लिया जाए तो पुत्र योग बन जाता है।इस दोष की समाप्ति के लिए आप निम्न उपाय कर सकते हैं-दोष की विधि-विधान से शांति करवाएं।


    भगवान शंकर के मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए।ग्रहण काल में विधि-विधान से पंचमुखी नाग की मूर्ति अर्पित करनीचाहिए।

    शांति के बाद पांच प्रकार की धातु से नाग-नागिन के जोड़े कोपवित्र जल प्रवाहित करने चाहिए।

    नाग पंचमी को सपेरे से नाग को मुक्त करवाना चाहिए परंतु मुक्तकरवाने से पहले नाग का पूजन अवश्य करना चाहिए।

    यदि आप पूरा मंदिर बनवाने की स्थिति में नहीं हैं तो किसी मंदिरमें भगवान शिव की मूर्ति को अवश्य स्थान दिलवाना चाहिए।

    संतान प्राप्ति के कुछ महत्त्वपूर्ण उपाययदि आप संतान न होने से पीड़ित हैं तो निम्नलिखित उपाय अवश्यकरें। यदि आपकी जन्मकुंडली में संतान सुख एक प्रतिशत भी हुआतो प्रभु की कृपा से अवश्य ही संतान होगी। यदि किसी को संतानप्राप्ति में बाधा आती है तो वह अपने निवास के मुख्य द्वार पर ‘संतान     गणपति' की अभिमंत्रित प्रतिमा लगाएं तथा पति-पत्नी दोनों ही गणपतिके 108 नामों का उच्चारण करें। गणपति की मूर्ति पर यदि ‘संतानगणपतये नमः गर्भदोष हो नमः पुत्र पौत्राय नमः' अंकित हो अथवामूर्ति इस मंत्र से सवा लाख मंत्रों से अभिमंत्रित हो तथा दम्पती इस मंत्रका जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है। मैंने स्वयं कई बार इसउपाय से एक वर्ष के अंदर ही संतान प्राप्त होते देखा है। यह एक ऐसा


    उपाय है जो कभी निष्फल नहीं जाता है।इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे उपयोगी उपाय दिए जा रहे हैं जिनकेप्रयोग से आप सुयोग्य संतान प्राप्त कर सकते हैं-भोग सदैव शुक्लपक्ष में ही करें तथा दिन में कभी भी भोग न करें।इससे अक्षम संतान का योग निर्मित होता है।भोग का समय रात्रि 11 व 4 के मध्य ही होना चाहिए तथाअमावस्या, षष्ठी, अष्टमी व रिक्ता तिथि अर्थात चतुर्थी, नवमी वचतुर्दशी तिथि, रविवार, मंगलवार व शनिवार, माता-पिता की मृत्युतिथि व ग्रहणकाल में भोग वर्जित है।इसके अतिरिक्त यदि आप और अधिक गहराई में भोग निषेध कासमय जानना चाहते हैं तो अपने नक्षत्र से सातवें नक्षत्र में भी भोगनिषेध है। अपनी राशि से यदि आठवां चंद्र हो तो वह भी अशुभहोता है। यदि आप विशाखा, ज्येष्ठा व रेवती नक्षत्रों में भी भोग नकरें तो आपकी संतान अवश्य ही भाग्यशाली होने के साथअधिक आयु की होगी क्योंकि ये नक्षत्र भोग के अनुकूल नहीं हैं।हां, भोग के लिए श्रवण, हस्त, अनुराधा, स्वाति, शतभिषा, धनिष्ठा,तीनों उत्तरा, मूल व रोहिणी नक्षत्र उत्तम तथा चित्रा, पुष्य, अश्विनीनक्षत्र मध्यम माने गए हैं।


    रेवती नक्षत्र में यदि पीपल का बंदा शनिवार को स्त्री की कमर मेंबांधा जाए तो पुत्र योग बनता है।


    प्रातः एक बेदाग नीबू लेकर उसका रस निकालकर उसमें नमकमिलाकर भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर के समक्ष रखें तथा रात्रि में     भोग से पहले स्त्री को सेवन कराएं। यह उपाय भी पुत्रकारक हैपरंतु यह उपाय सिर्फ एक बार करें।


    किसी भी शुक्लपक्ष में अभिमंत्रित 'संतानगोपाल यंत्र' के समक्षनिम्न मंत्र जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है ॐ देवकी सुतगोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणंगतः '।


    वास्तु दोष निवारण के द्वारा संतान उपाय


    कई बार देखा जाता है कि कई लोग सिर्फ इस कारण से संतानसुख से वोचित रहे हैं कि उनके शयन कक्ष में वास्तुदोष था। जब उसवास्तुदोष का निवारण हो गया तो संतान भी हो गई। आप देखें किकहीं आपके शयनकक्ष में कोई दोष तो नहीं है। सर्वप्रथम आप यहजान लें कि किसी भी नवदम्पती को ईशान कोण में अपना शयन कक्षनहीं रखना चाहिए क्योंकि इस कोण में शयन कक्ष होने से संतान मेंविकलांग होने का योग निर्मित होता है। आपके कक्ष में यदि आधुनिकडबलबैड है तो यह आपके सम्बंधों के लिए बहुत अशुभ है। इसकेप्रभाव से आपके विचारों में मतभेद रहेंगे। इसलिए आप डबलबैड कागद्दा ऐसा रखें जिसमें कोई जोड़ न हो अर्थात वह एक ही हो। आपकेशयन कक्ष के आग्नेय कोण में आपका पलंग न हो। यह बहुत अशुभवास्तु है।

    शयनकक्ष में आप अपनी राशि के अनुसार ही रंगों का चयन करें।ईशान कोण यदि खाली रहे तथा आपका पलंग आपकी राशि केअनुकूल दिशा में हो तो संतान सुख जल्दी प्राप्त होता है। आपके निवासव शयन कक्ष में यदि ईशान कोण में असंतुलन है तो आप इसकोअवश्य दूर करवाएं। यदि आपका शरीर अधिक जल तत्त्व से परिपूर्णहै तो आप अपने शयनकक्ष में आग्नेय कोण को अधिक शक्ति देंअर्थात इस कोण में सदैव लाल रंग का वल्ब जलता रहे। इससे आपकोदो लाभ मिलेंगे। प्रथम, आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और द्वितीय, आपअपने कर्मक्षेत्र में अधिक सफल रहेंगे।

        पुत्र प्राप्ति के लिए

    निम्नलिखित मंत्रों से अभिमंत्रित जल नित्य बंध्या को पिलावें, तोगर्भ दोषों की निवृत्ति होती है और स्त्री गर्भधारण करने की क्षमताप्राप्त करती है-

    येन वेहद् लभूविध नाशयामसि तत् त्वत्।

    इदं तदन्यन्न त्वदह दूरे नि दक्ष्मसि॥

    आ ते यानि गर्भ एतु पुमान् बाणइवेषुधिम्।

    आ दीरोउत्र जायतो पुत्रस्ते दशमाक्यः॥

    पुमांसं पुत्र जनय तं पुमाननु जायतम्।

    भवासि पुत्राणां माता जानानां जनयश्च यान्॥

    यानि भद्राणि बीजन्यृषभा जनयन्ति च।

    तैस्त्वं पुत्रविन्दस्व सा प्रसूर्धेनुका भव॥

    कृणोमि ते प्राजापत्यमा योनि गर्भ एतु ते।विदस्व त्वं पुत्र नारि यस्तुभ्यं शशसच्चसु तश्मे त्वं भव॥यासां दयौष्पिता पृथथिवी नाता समुद्रो सूलं वीरधां वभूव।तास्त्वापुत्रविद्यायदैवी:प्रावन्त्वौषधयः॥अथर्ववेद-अध्याय 3/42

    शमीमश्वत्था पुंसवनंकृतम्।

    आरुढस्तत्रतद् वै पुत्रस्य वेदन तद् स्त्रीष्वा भरामसि॥

    पुंसि वै रेतो, भवति तत् स्व्रियामनुषिच्यते।तद् वै पुत्रस्य वेदन तत् प्रजापतिरब्रबरीत्॥

    प्रजापतिरसुमतिः  स्त्रैयूषमन्यत्र

    सिनीवाल्यदधत्चीक्लू

    पुमांससु दधदिह॥

    अथर्ववेद-अध्याय 6/11

    वन्तासि यच्चसे हस्तावप

    पन्।रक्षांसिमेधसि।

    प्रजा धनं च गुहणानः परिहस्तो अभूययम्॥

    परिहस्त वि धारय योर्नि गर्भाय घातवे।मर्यादेपुत्रमाधेहित्वमा गमयागमे॥

    यपरिहस्तमनिरभरदिति:त्वष्टा तमस्या आ वध्नाद् तथा पुत्रं जनादिति॥

    पुत्रकाम्या।

    अथर्ववेद-अध्याय 6/81

    संतान प्रदाता व्रत : श्रावण शुक्ला एकादशी


    श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन संतान की कामनासे नियमपूर्वक व्रत करने से दीर्घजीवी और सुंदर संतान की प्राप्ति होतीहै। व्रत करने के साथ ही निम्न कथा का पाठ करना चाहिए--धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा-हे केशव, आपकृपा करके श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के माहात्म्य कीकथा सुनाइए।


    श्रीकृष्ण ने कहा-हे राजन! श्रावण शुक्ला एकादशी का व्रतकरने से पापों का नाश होकर पुत्र की प्राप्ति होती है। द्वापर युग केआदि में महिष्मती नगरी में महाजित नाम का राजा राज्य करता था।एक दिन उसने अपने समस्त मंत्रियों को एकत्रित कर उनसे अपने इसदुख की बात कही। मंत्री राजा के दुख को दूर करने के लिए वन मेंलोमश ऋषि के पास गए। मुनि को प्रणाम कर राजा के दुख की बातकह सुनाई। इस पर लोमश मुनि ने कहा-आपका राजा पहले जन्म

    में कंगाल और कुकर्मी था। एक बार यह दो दिन का भूखा-प्यासाएक वन में पहुंचा। वहां उसने उस सरोवर में एक हॉल की ब्यायी गायको हटाकर पानी पिया।


    हे मंत्रियो! उस दिन श्रावण के शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिनथा। उसी के कारण यह राजा पुत्रहीन हुआ और एकादशी के दिन व्रतरहने के कारण राजा हुआ। अब आप यदि अपने राजा को संतान-लाभकराना चाहते हैं, तो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशीका व्रत विधिपूर्वक आप सब करें और, रात्रि जागरण करें। उस व्रत केपुण्य का फल अपने राजा को संकल्प कर दें। इसके प्रभाव से राजाको पुत्र उत्पन्न होगा।


    सब मंत्री राजा को सुखी बनाने के लिए ऋषि को प्रणाम कर वापसआए और पुत्रदा एकादशी का व्रत करके उसका फल राजा कोसंकल्प करके दे दिया।


    परिणाम यह हुआ कि नौ मास के पश्चात रानी ने एक सुंदर पुत्रको जन्म दिया। राजा के समस्त दुख दूर हो गए।


    श्री दुर्गा सप्तशती के प्रयोग द्वारा संतान प्राप्ति

    सप्तशती के प्रत्येक श्लोक के आदि और अंत में काम-बीज क्लींको लगाकर 41 दिन तक पूरी सप्तशती का नित्य तीन बार पाठ करें।ऐसा करने से निश्चित रूप से संतान की प्राप्ति होती है।

    निम्नांकित मंत्र दुर्गासप्तशती का है। इस मंत्र को पूरी आस्था केसाथ जप करने से विध्यवासिनी देवी का ध्यान करने से संतान की प्राप्तिअवश्य होती है-

    नन्दगोप गृहे जाता यशोदा गर्भ सम्भवा।

    ततस्तौ नाशयिस्यामि विन्ध्याचल निवासिनी॥

    विध्यवासिनी माता का सविधि षोडशोपचार पूजन करके संकल्पके साथ इस मंत्र का जप करना चाहिए। बार-बार मंत्र जप करने सेवांछित संतान की प्राप्ति होती है।

    संतान प्रदाता मंगलवार का व्रत प्रयोग


    मंगल व्रत और प्रयोग : संतान गोपाल स्तोत्र की भांति मंगल व्रत


    प्रयोग शीघ्र पुत्र प्रदान करता है। जब पति और पत्नी के जन्मांगों मेंमंगली दोष का साम्य अथवा संतुलन न हो, तो कई प्रकार की वेदना


    सहन करनी पड़ती है। इनमें संततिहीनता अथवा पुत्र प्राप्ति का अभावभी एक है। ऐसी स्थिति में यह प्रयोग अमोघ सिद्ध हुआ है।अनेक ऐसे दम्पतियों को हमने मंगल व्रत प्रयोग और अनुष्ठान कापरामर्श दिया। इन दम्पतियों ने मंगल व्रत के पूर्व अनेक प्रयोग किएपरंतु सफलता प्राप्त न हुआ। मंगल ग्रह की बाधा विद्यमान थी। जबमंगल व्रत सम्बंधी व्रत और अनुष्ठान किया, तो 17, 20, 22 वर्ष सेसंतानहीनता के अभिशाप से कराह रहे दम्पतियों के घर में नन्हे शिशुकी किलकारियां गूंज उठीं।


    उपरोक्त संदर्भित मंगल अनुष्ठान पूर्ण विधि से जो न कर पाए याइतना संस्कृत और पूजा-पद्धति का ज्ञान जिन्हें न हो, वह पूरा प्रयोगसंक्षिप्त रूप में करें। इसकी विधि यहां दी जा रही है।


    मंगल व्रत की विधि : पुत्र-प्राप्ति की इच्छा वाली स्त्री को मंगलके दिन व्रत करना चाहिए। मार्गशीर्ष (अगहन) या वैशाख में इस व्रतको आरम्भ करें। मंगल के दिन सूर्योदय के समय उठकर हाथ-मुंहधो मौन होकर अपामार्ग की दातून से दांत साफ करें। स्नान करके लालवस्त्र पहनें। फिर लाल रंग के गंध, पुष्प एवं नैवेद्य लेकर पंचोपचारोंसे मंगलदेव का पूजन करें। तब निम्न स्तुति का पाठ करें-


    धरणी-गर्भ-सम्भूतं, विद्युत-तेज-सम-प्रभम्।कुमार शक्ति-हस्तं च, मंगल प्रणामाम्यहम्॥ऋण-हर्तेनमस्तुभ्यं,दुःख-दारिद्रय-नाशिने।नभसिद्योत-मानाय,सर्व-कल्याण-कारिणे॥

    दे व-दानव-गन्धर्व -यक्ष-राक्षस-पन्नगाः।

    सुखं यान्ति यतस्तस्मै, नमो धरणि-सूनवे॥

    यो वक्र-गतिमापन्नो, नृणां दुःखं प्रयच्दतिपूजितः सुख-सौभाग्यं, तस्मै क्ष्मा-सूनवे नमः॥प्रसादं कुरु मे नाथ, मंगल-प्रद मंगल।मेष-वाहन, रुद्रात्मन्, पुत्नान् देहि धर्न यशः॥इस प्रकार एक वर्ष तक मंगलदेव की स्तुति करे और समय-समयपर लाल वस्त्रादि वस्तुएं सुपात्र को दान देती रहें, तो वह स्त्री चिरंजीवीपुत्रों की माता होती है और धन तथा यश से भी सम्पन्न होती है।


    बीजात्मक संतान गोपाल-मंत्र


    संतान गोपाल मंत्र एवं स्तोत्र सविधि अनेक स्थलों पर वर्णित है परंतुजो व्यक्ति स्तोत्र का पाठ कर सकने में असमर्थ हों, वे किसी आचा्यद्वारा संतान-गोपाल मंत्र के एक लाख मंत्र जप का पुरश्चरण कराएं।इसके साथ स्वयं बीजात्मक संतान-गोपाल मंत्र का जप एक से ग्यारहमाला या इससे अधिक प्रतिदिन करें।


    यह चौवन अक्षर युत मंत्र बहुत प्रभावी है। इसका चार लाख जपकरना अपेक्षित है। विधिवत् भगवान कृष्ण का पूजन करके निश्चितसंख्या में प्रतिदिन शुद्धतापूर्वक जप करें। जप सम्पन्न होने पर दशांशविधि से तर्पण, मार्जन, होम एवं विप्र भोजन कराएं। मंत्र इस प्रकारहै-


    ॐ क्लीं श्रीं हीं जीं ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ देवकीसुत गोविन्दवासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरण गतः, ॐस्वः भुवः भूः ॐ जीं हीं श्रीं क्लीं ॐ।


    अभिलाषाष्टक, द्वादशाक्षर, पार्थिवलिंगार्चन व रुद्राभिषेक,नवग्रहों के मंत्र, चिरंजीवी पुत्र प्राप्ति यंत्र, पुत्रदा एकादशी व्रतविधान, बालगोपाल अष्टाक्षर मंत्र एवं अनेक अन्य प्रयोग अत्यंतप्रभावी और बारम्बार सिद्ध प्रयोगों का विस्तार हमने अपनी इस विषयपर विस्तृत एवं प्रामाणिक रचना संतान सुख : सर्वांग चिंतन में कियाहै।

    एकांती देवी का अनुष्ठान


    ॐ हीं फे एकान्ती वेवतायै नमः।


    इसकी जप संख्या दस हजार है। प्रसन्नबदना देवी की पूजा केपश्चात इसका जप करें। आसन लाल, पीला अथवा एवंत होना चाहिएइसमें गंध अर्पित करने का विशेष महत्त्व है। कोई स्त्री संतान के संदर्भमें औषधि सेवन कर रही हो, तब इस मंत्र का प्रभाव औषधि केपरिणाम को द्विगुणित कर देता है।


    वसुपुत्राद श्रीकृष्ण मंत्र


    विनियोग


    अरुप श्रीवसुपुत्रदश्रीकृष्णमंत्रस्यनारदऋषिः, गायत्री छन्दः,श्रीकृष्णो देवता, वसुपुत्रप्राप्त्यर्थ जये विनियोगः।करन्यास


    क्लां अंगुष्ठाभ्यां नमः, क्लीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, क्लूंमध्यमाभ्यां वषट्, क्लैं अनामिकाभ्यां हुं, क्लौं कनिष्ठिकाभ्यांवौषट्,क्ल: करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्।


    अंगन्यास-


    क्लां हृदयाय नमः, क्ली शिरसे स्वाहा, क्लूं शिखायै वषट् क्लैंकवचाय हुं, क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट्, क्लः अस्त्राय फट्।


    ध्यान


    बालंनीलमुदारकान्तिविभवं हस्ताम्बुजे दक्षिणे।विभ्राणं परिपक्वदौग्धकवलं नन्दात्मजं सुन्दरम्।वामे तददिदनजातमुद्धतरसंदध्युत्थपिण्डं शुभवैयाघ्रेण नखेन राजितगलं त्यक्तांशुक भावयेत्॥इस प्रकार ध्यान कर मानसोपचार से पूजन करें। तद्नंतर एकाग्रहोकर निम्न मंत्र का जप करें। इस मंत्र का पुरश्चरण एक लाख जपसे होता है। मंत्र इस प्रकार है-

    ॐ क्लीं गोपाल वेषधराय वासुदेवाय हुं फट् स्वाहा।करें।पुरश्चरण के पूर्ण होने पर शर्करा-घृत के हवि से दशांश हवन


    फिर सरोज (कमल) के मध्य में स्थित भगवान कृष्ण का पूजनकर उनके मुख में उक्त मंत्र से गोदुग्ध, शुद्ध पके हुए केलों, दहीं औरमक्खन से दशांश तर्पण करें।


    इस प्रकार करने से एक वर्ष में ही संतान लाभ होता है।एक अन्य मंत्र-


    ॐ नमो भगवते जगतप्रसूतये नमः।


    इस मंत्र का तीन लाख जप अपेक्षित है।


    गर्भपात से रक्षा हेतु मंत्र प्रयोग


    अनेक बार गर्भगत विकारों के कारण संतानोपलब्धि में बाधा आतीहै। गर्भस्थापन नहीं होता अथवा गर्भपात हो जाता है। ऐसी स्थिति मेंअधोलिखित मंत्र का प्रयोग परम लाभप्रद है-


    यद्येकवृषोअसि सृजारसोअसियदि द्विवृषोअसि सृजारसोअसियदि त्रिवृषोअसि सृजारसोअसियदि चतुर्वेषोअसि सृजारसोअसियदि पंचवृषोअसि सृजारसोअसियदि षड्वृषोअसि सृजारसोअसियदिसप्तवृषोअसि सृजारसोअसियद्यष्टवृषोअसि सृजारसोअसि

    यदि नववृषोअसि सृजारसोअसि

    यद्येकादशोअसि सोऽपोदकोअसि।

    अपने इष्टदेव के चित्र के सम्मुख शुद्ध पात्र में जल भरकर रख ले।इष्टदेव की विधिवत पूजा करें। तत्पश्चात दूर्वा से जल के छींटे स्त्रीके शरीर पर दें। मंत्रों का उच्चारण करते रहें।

    बालगोपाल मंत्र


    इस मंत्र की जप संख्या एक लाख है। तत्पश्चात दशांश पद्धति सेहवनादि करना चाहिए। हवन देशी घी एवं मिश्री युक्त खीर से करनाउचित है। जप के समय नंद के आंगन में क्रीड़ा करते बालगोपाल काधयकररहतइसरह


    बालवपुषे क्लीं कृष्णाय स्वाहा।


    रामचरित मानस मंत्र


    इसकी साधना रात्रि में दस बजे के पश्चात उचित है। सपरिवारभगवान श्रीराम का षोडशोपचार पूजन करें। अष्टांग हबन सामग्री से108 बार रक्षा रेखा मंत्र की आहुति दें-मामभिरक्षय


    रघुकुलनायका


    दें-


    घृत बर चाप रुचिर कर सायक॥इसके पश्चात अंत में स्वाहा लगाकर इस दोहे. से 108 आहुतियां


    प्रेम मगन कौसल्या निसदिन जात न जान।सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥

    तदंतर सुविधानुसार कुशासन पर बैठकर इस दोहे का एक माला सेग्यारह माला तक जप करें। भगवान श्रीराम की कृपा से संतान प्राप्तिअवश्य होती है।

    ऐहि विधि गर्भसहित सब नारी। भई हृदय हरषित सुख भारीजा दिन तें हरि गर्भहिं आय। सकल लोक सुख संपति छाय॥काकबन्धया नारी के लिए संतान प्राप्ति मंत्रॐनमो शक्ति रूपाय मम गृहेपुत्रं कुरु कुरु स्वाहा।

    इस मंत्र का कम-से-कम 21 दिन तक अथवा पुनः धारण करनेकी अवधि तक 108 बार जप करें।

    पुत्र प्रदाता चरण ब्यूह स्तोत्र


    यदि पुत्रियों का जन्म ही बार-बार होता हो और इस दिशा मेंअनेक प्रयास विफल हो चुके हों, कि पुतरत्ल की प्राप्ति हो, तो चरणब्यूह, जो पुराणों में वर्णित है, निश्चित रूप से पुत्र संतति प्रदान करताहै। अनेक ऐसे दम्पती जो पुत्र की कामना से अत्यंत चिंतित और दुखीथे, उन्हें चरण ब्यूह स्तोत्र का पाठ करने के पश्चात पुत्र रत्त प्राप्तहुआ।


    चरण ब्यूह स्तोत्र का पाठ पूजन स्थल या किसी पवित्र स्थान परपूर्व या उत्तर की ओर मुख करके प्रसन्न मन से आसन पर बैठकरकरना चाहिए। चरण ब्यूह स्तोत्र के पाठ से पूर्व विष्णु और लक्ष्मी कीप्रतिछाया चित्र का विधिवत् षोडशोपचार से पूजन करें। तत्पश्चात पुत्रप्राप्ति के लिए संकल्प लेकर चरण ब्यूह स्तोत्र का पाठ संतान गर्भस्थहोने से पूर्व करें। पति और पत्नी दोनों ही इस स्तोत्र का पाठ करें, तोसफलता शीघ्र प्राप्त होती है। इस प्रयोग को विधिवत् करने से विद्वान,योग्य, स्वस्थ, दीर्घजीवी, आदर्श, आज्ञाकारी, उत्साही, निर्भीक,आकर्षक, श्रेष्ठ गुण सम्पन्न, तेजस्वी, पराक्रमी, धर्म ध्वज, जातिकुलरक्षक, पौरुषवान और वंश वृद्धि करने वाला सुपुत्र अवश्य प्राप्त होताहै।

    श्री चरण ब्यूह स्तोत्र

    ॥ श्री गणेशाय नमः॥

    हरि ॐ॥ अथातश्चरण-ब्यूहं व्याख्यास्यामः।तत्र यदुक्तं चातुर्वेद्यं चत्वारो वेदा विज्ञाता भवन्ति॥तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदः समावेदोऽथर्वदश्चेति।ऋग्वेद खंड :

    तत्र ऋग्वेदस्पाष्टो स्थानानि भवन्ति(तस्मात् ब्रह्मयज्ञार्थे पारायणार्थे च ऋग्वेदस्याध्ययनंकर्तव्यम्)

    1 चर्चा, 2 श्रावकः, 3 चर्च्चकः, 4 श्रवणीयपारः, 5क्रमपारः, 6 क्रमपदः, 7 क्रमजटः, 8 क्रमदण्डश्चेतिचतुष्पारायणम् 6 एतेषां शाखाः पंचविद्याः पंचविद्याः भवन्ति 7आश्वलायनी,शांखायनी,शाकला,| बाष्कला,माण्डुकायनोश्चेति 8 तेषामध्ययनं १ अध्यायाश्च चतुः

    षष्ठिर्मंडलानी दशेवतु 10 (अथ पारायणेवर्ग संख्योच्यते)एकर्च एक वर्गश्च एकर्च नवकस्तथा।

    द्वौ वर्गोक्तो त्रध्वौ ज्ञेयो, ऋकतयश्च शतं स्मृतं॥वर्गाणांपरिसंख्यांत द्वि सहस्त्रे षडुस्तरे।सहस्त्रमेक सूक्तानां निर्विशंक विकल्पितम्॥दशसप्त सपठ्यंते संख्यांत वे पदक्रमम्॥ऋचांदश सहस्त्रणि, ऋचां पंच शतानि च।ऋचामशीति पादश्चेतत्पारायणमुच्यते॥

    नारियल द्वारा पुत्र प्राप्ति का मंत्र

    ऐं नमः ॐ नमो भगवती पद्मे हीं क्लीं ब्लू त्रिट-त्रिट(अमुक) स्त्री अपत्य हिनाय अपत्य गुण क्षय, सर्वावयव संयुतशोभन सुंदर दीर्घायु पुत्रं देही-देही, मा विलम्बय-विलम्बय, रांहीं श्री पद्मावतीं मम कार्य कुरु-कुरु स्वाहा ठः ठः ठः स्वाहा।इस मंत्र को एक सौ आठ बार नारियल पर जपें। तत्पश्चातअभिमंत्रित नारियल ऋतु धर्म के पश्चात शुद्ध होने पर स्त्री कोखिलाएं, पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा। यह अनुभूत सत्य है।

    संतान प्राप्ति के विशिष्ट तंत्र प्रयोग

    जो स्त्री गर्भ धारण करने के योग्य हो परंतु गर्भ नहीं ठहरताहो, सब प्रकार की चिकित्सा करवा लेने पर भी लाभ न हो, तोकृपया ये उपाय काम में लें, ईश्वर ने चाहा, तो अवश्य लाभहोगा-

७ रविवार को सुगंधरा की जड़ या एकवर्णा गौ के दूध के साथ पीसकर ऋतुकाल में पीने से तथा साठी का भात एवं मूंग की दाल पथ्य खाने से वंध्या दोष विनष्ट होता है। 

७ ओषधि सेवन के समय स्त्री को किसी प्रकार की चिंता या शोक अथवा भय, अधिक परिश्रम, दिन में सोना, गर्म वस्तुओं का भोजन, अधिक धूप या अधिक ठंड इन सबसे बचना चाहिए। ऐसे पशथ्य से हो हुए पति के साथ सहवास करने से वंध्या अवश्य गर्भवती होती l

७ रजोधर्म शुद्धि के पश्चात काली अपराजिता की जड़ को बछड़ा वाली नवीन गो के दूध में तीन दिन पीने से वंध्या गर्भवती होती है। 

७ पूर्व ब्यायी हुई गाय, जिसके साथ बछड़ा हो ऐसे गो के दूध के साथ नागकेसर का चूर्ण सात दिन तक पीने से तथा घी-दूध के साथ भोजन करने से वंध्या स्त्री पुत्रवती होती है। 

७ नीबू के पुराने वृक्ष की जड़ को दूध में पीसकर घी मिलाकर पीने से पति प्रसंग द्वारा स्त्री को दीर्घजीबी पुत्र प्राप्त होता है। 

मृतबत्सा तंत्र ' जन्म लेने के पश्चात जिस स्त्री का पुत्र मर जाता है, उसे मृतवत्सा 

कहते हैं। जिस रविवार को कृतिका नक्षत्र हो, उस दिन पीत पुष्पा नाम कौ जड़ी को जड़ सहित लाएं, उसे पानी में सात दिन पर्यत पीसकर पिवें, तो पुत्र न मरे। 

त्राटक प्रयोग 

हमारे अनुभव में त्राटक प्रयोग संतान प्राप्ति के अन्य उपाय करने के पश्चात जिस दिन गर्भ धारण करना हो, गर्भाधान संस्कार करने से पूर्व करना चाहिए। श्रीकृष्ण भगवान के बालरूप का एक चित्र रखकर उसके सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें। रात्रि में समागम से पूर्व स्‍नान करके पत्नी को कृष्ण भगवान के इसी बालस्वरूप के सामने आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाना चाहिए। 

तत्पश्चात श्रीकृष्ण का विधिवत्‌ षोडशोपचापर पूजन करें, जिसमें नैवेद्य के स्थान पर अपने हाथ से निकाला हुआ शुद्ध मक्खन तथा मिश्री प्रयोग करें। पुत्र की कामना से दीपक को एकटक अपलक नेत्रों से पर्याप्त समय तक निहारते रहें। तत्पश्चात नेत्र बंद करने के पश्चात भी दीपक की लो नेत्रों में प्रज्बलित प्रतीत होगी। जब लौ की छवि नेत्रों में धूमिल पड़ने लगे, तो नेत्र खोलकर पुनः श्री कृष्ण भगवान के चित्र पर एकटक अपलक ननेत्रों से देखें। कुछ समय तक देखने के पश्चात पुनः नेत्र बंद कर लें। नेत्र बंद करने के पश्चात भी श्रीकृष्ण की छवि नेत्रों में निर्मित रहेगी। जब चित्र धूमिल होने लगे तो पुन; नेत्र :खोलकर दीपक की ओर उसी प्रकार से देखें। यह क्रम 7 बार या 11 बार दोहराएं। इसके पश्चात्‌ गर्भाधान संस्कार, जैसा कि ऊपर वर्णित है, करने के पश्चात्‌ संतान की कामना से पति-पत्नी का मिलन होना चाहिए। त्राटक प्रयोग की यह संक्षिप्त विधि है। संतान प्राप्ति के लिए इतना ही पर्याप्त है। यह प्रयोग अनेक दुर्लभ फल प्रदान करने वाला होता है और अनेक अभिलाषाओं की पूर्ति होती है। 


पार्थिव लिगार्चन तथा रुद्राभिषेक 


चावल के 1100 शिवलिंग बनाकर यह प्रयोग किया जाता है। यह ग्रयोग किसी अनुभवी, विद्वान आचार्य द्वारा ही सम्पन्न कराना चाहिए, जिसे रुद्राभिषेक का सम्यक्‌ ज्ञान हो। हमने कई अवसरों पर जहां पुत्रियों का जार-बार जन्म हो रहा था, वहां यह प्रयोग कराया तथा पुत्र जन्म डुआ। | 


उपरोक्त प्रयोगों के अतिरिक्त जन्‍न्मांग में भलीभांति यह निरीक्षण करना चाडिए कि किस शाप के कारण संतानहीनता की खेदना सहन करनी पड रही है। प्रत्येक शाप से मुक्ति के लिए सम्बंधित ग्रहों तथा 'उस शाप से मुक्ति के मंत्र का प्रयोग विधिवत्‌ किया जाना चाहिए । 

विवाह एवं संतान प्राप्लि हेतु माता-पिता, पुत्री-पुत्र के विखाह के कारण चिंतित हो जाते हैं। योग्य संतान होने पर भी विवाह में अवरोध उत्पन्न होते हैं। माता पिता में किसी एक को उपाय करना चाहिए। यदि विवाह को कई वर्ष हो गए ओर संतान उत्पन्न करने की क्षमता भी है, फिर भी संतान नहीं हो रही है, वे व्यक्ति भी यह जाप कर सकते हैं-


स देवी नित्यं परितप्यमान: , व्यामेव सीतेत्यभिभाषमाण:। 


दृढ़व्रतो राजसुतो महात्मा, तवैव लाभाय कृतप्रयल:॥ 


प्रात: स्नान करके 108 बार निरंतर 45 दिन तक इस मंत्र का जाप करने से लाभ मिल सकता है। किसी देवी का चित्र लगा लें। चित्र पर पुष्प चढ़ाएं तथा दीप या अगरबत्ती भी मंत्र जाप की अवधि में जलती रहनी चाहिए। 

    मनचाही व गुणवान संतान की प्राप्ति


    प्रत्येक दंपति चाहता है कि उसकी कम-से-कम एक संतान अवश्य हो।परंतु अनेक इलाज और चिकित्सकीय सुविध के बावजूद निराशा ही हाथलगती है। ऐसे निराश दंपतियों के लिए टोने-टोटकों के साथ ही दर्जनोंऔषधियां भी यहां दी जा रही हैं। इनमें से अधिकांश औषधियों का चयनप्राचीन ग्रंथों से किया गया है और वैद्य एवं प्रयोग्कर्ता इन्हें पूर्ण सफल औरअनुभव सिद्ध भी मानते हैं।


    संतान प्राप्ति हेतु दस सुगम यंत्र


    इन दस मंत्रों में से किसी भी एक मंत्र का चयत्न करके सुबह, दोपहरऔर शाम एक-एक माला जप करें। गर्भ धारण होने के बाद भी प्रसव होनेतक उसी मंत्र का जप करती रहें, ऐसा करने से स्वस्थ एवं सुंदर संतानउत्पन्न होगी।

    ॐँं गोदाय नमो नमःॐँ संतानाय नमःॐ० संतानाय नमो नमः

    ॐं० हरये नमः

    ॐं स्वाश्य नमः

    ॐ० विचाराय नमो नमः

    ॐ शिशुया नमः

    ॐ  कांति नमः नमः

    ॐ० सुखाय नमो नमः

    ॐ शुभम् नमः नमः

    संतान-प्राप्ति हेतु तांत्रिक मंत्रॐ हीं श्री क्लीं हीं आसिआउसा चुलु हुलु हुलु मुलु मुलु इच्छिय मे कुर कुरूस्वाहा।

    जब भी यह मंत्र जपने बैठें तो धूप-दीप-अगरबत्ती जला लें और यह     मंत्र 24 हजार फूलों पर एक मंत्र एक फूल पर जपें। इस प्रकार जप करनेपर निःसंदेह साधक को संतान की प्राप्ति होती है।


    संतान-प्राप्ति हेतु तांत्रिक यंत्र


    जो स्त्री डॉक्टर तथा वैद्य, हकीमों व ओझा-गुनियों से संतान प्राप्ति हेतुचिकित्सा कराकर निराश हो चुकी हो, उस स्त्री को निम्न त्रिपुर सुंदरी यंत्रका निश्चय ही एक बार अनुभव प्राप्त करना चाहिए।


    मंगलवार या शुक्रवार के दिन की चतुर्थी तिथि में इसे ताम्रपत्र परखुदवाकर प्रातः स्नान कर इस यंत्र को भी पंचामृत में स्नान कराना चाहिए।फिर सोलह बार श्री सूक्त का पाठ करना तथा खीर का भोग लगानाचाहिए। इसके बाद पूर्ण श्रद्धा के साथ ऋतुकाल को छोड़कर प्रतिदिननियम से ‘श्री’ का एक हजार बार जप करना चाहिए। इससे निश्चय हीबांझ स्त्री को संतान प्राप्ति होकर मनोकामना पूर्ण होती है।     यदि कन्या के बाद पुत्र की कामना हो, तो ये प्रयोग करें-उत्पन्न हुईकल्या का विधिवत् पूजन करें। उसे नमस्कार करें और बंधु-बांधवों कोखीर एवं जलेबी का भोजन कराएं। ऐसा करने से भविष्य मैं पुत्र अवश्यहोता है।


    जिस स्त्री के पहली संतान लड़़का हो, उस लड़के की नाल जो निःसंतानस्त्री खोलती है, वह अवश्य ही पुत्र-रत्न से विभूषित होगी।


    पीपल का वृक्ष जिस श्मी के वृक्ष के ऊपर उग रहा हो, उस वृक्ष के नीचेजाकर पति-पत्नी दोनों अपनी मनोकामना प्रकट करते हुए वृक्ष कास्पर्श व प्रणाम कर यह संकल्प करें कि ‘गर्भाधान होने तथा पुंसवन     के पश्चात् जब पुत्र-र्न की प्राप्ति होगी, तब ‘मुंडन-संस्कार' यहीं परआक की छाया में बैठकर कराएंगे। इस टोटके को करने से वंध्या स्त्रीभी पुत्र-रत्न को प्राप्त कर लेती है।


    पुष्य नक्षत्र में असगंध की जड़ को उखाड़कर गाय के दूध के साथ सिलपर पीसकर पीने से दूध का आहार, ऋतुकाल के उपरांत शुद्ध होने परपीते रहने से, स्त्री की पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा अवश्य पूर्ण हो जातीहै।


    पलास (ढाक) के पांच कोमल पत्ते किसी स्त्री के दूध में पीसेंऔर जो वंध्या (बांझ) स्त्री मासिक धर्म के चौथे दिन स्नान करके उसेखा लेगी, वह निश्चय ही पुत्र की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त करतीहै।


    संतानहीन स्त्री ऋतुधर्म से पूर्व, अपने उदर की शुद्धि कर लेने केपश्चात् गूलर के बांदा को बकरी के दूध के साथ सिल पर पीसे औरमासिक धर्म की शुद्धि के पश्चात् पान करे, तो उसे पुत्र की अवश्यप्राप्ति होगी।


    कबूतर की विष्ठा एवं सुहागा दोनों को पीस लें। इस चूर्ण को यदिगुप्तांग पर लेप करके रति-क्रिया की जाए तो निश्चय ही पुत्र उत्पन्नहोगा।


    संतान प्राप्ति हेतु विशिष्ट जल


    उपरोक्त मंत्र जप के साथ ही यह प्रयोग करने पर निश्चित रूप सेसंतान की प्राप्ति होती है। यह प्रयोग लगातार चालीस दिन तक कियाजाता है, परंतु ऋतुकाल के पांच दिन न किए जाने के कारण पैंतालिस दिनोंमें पूर्ण होता है। सामान्य सफेद कागज पर पानी में केसर अथवा हल्दी घोलकर लकड़ीकी कलम से सायंकाल यह यंत्र लिखें। धूप-दीप से यंत्र की पूजा करने केबाद रात भर पूजा के आले में रखा रहने दें। सुबह स्नान-ध्यान के बादयंत्र को एक कटौरी में रखकर पर्याप्त पानी डाल दें और जब यह धुल जाएतब कागज से सम्पूर्ण घोल हटाकर उस पानी को पी लें और कागज को     


फैंक दें। यदि इस बीच गर्भधारण हो जाए, तब भी चालीस दिन तकअनुष्ठान पूरा करें।

    पुत्र प्राप्ति हेतु चमत्कारी उपाय

   ॐ नमो  भगवते देवाय।

    देवकी सुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।

    देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गता।।

    जिस स्त्री को कोई संतान न हो। उसे रविवार के दिन सर्पाक्षि केफूल-पत्तों से युक्त डाली लाकर एक वर्ण की गाय के दूध में कुमारी कन्याके हाथ से पिसवाकर एकसार कर लें। फिर ऋतुमति होने पर चौथे से छठेदिन तक प्रतिदिन एक-एक तोला की मात्रा में इसका सेवन करें। इसकेसेवन से पूर्व स्त्री को उपरोक्त मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।

    संतान शुख प्राप्त करने के टोटके


    शास्त्ों में विवाह के तीन मुख्य उदूदेश्य बताए गए हैंपहला वंशबुद्धि, दूसरा पितु ऋण से मुक्ति और तीसरा स्वर्गादि लोकों की प्राप्तिएवमोक्ष।


    इन तीन उदुदेश्यों में प्रमुख वंश बृद्धि है अर्धात संतान की प्राप्ति। इसीकारण विवाह के पश्चात प्रत्येक दंपति संतान प्राप्ति के लिए लालायितरहते हैं, लेकिन स्ती या पुरुष की शारीरिक त्रुटि, पूर्व जन्मों के पाप तथाअन्य कारणवश कुछ लोगों को संतान सुख नहीं मिलता। कई बार यदिसंतान हो भी जाती है तो वह असमय मर जाती है। इन सभी समस्याओंका निराकरण कभी-कभी डाक्टर या वैद्य भी नहीं कर पाते। ऐसे में आपनिम्नवत टोने-टोटके अपनाकर संतान सुख प्राप्त करने में सफल होसकते हैं। इस अध्याय में प्रस्तुत टोने-टोटके अत्यंत प्रभावी और अद्भुतहैं। इनसे किसी भी प्रकार की कोई हानि नहीं होती। ये टोने-टोटकेनिम्नवत हैं-


    संतान सुख प्राप्त करने के लिए कामिया सिंदूर का तिलक लगाएंतथा हनुमानजी के मंदिर में तांबे का दान करें।संतान सुख पाने के लिए गेहूं के आटे की गोलियां बनाकरउसमें चने की दाल और थोड़ी हल्दी मिलाकर गाय कोखिलाएं।

    यदि संतान पक्ष से सदैव चिंताएं बनी रहती हों तो बागवानी करेंतथा नए पौधे रोपकर उनकी देखभाल करें।

    पीली कौड़ी को कमर में बांधने से नि:संतान स्त्री की गोद भरजाती है।

    बरगद के पत्ते पर कुंकुम द्वारा स्वास्तिक का निर्माण करके उस परचावल एवं सुपारी रखकर किसी मंदिर में चढ़ा दें। संतान सुख प्रप्तहोगा।

    कागजी नीबू के वृक्ष की जड़ पीसकर चावल के पानी के साथ स्त्रीको पिलाने से पुत्र के स्थान पर पुत्री होती है।


    यदि आप संतान चाहते हैं तो बांस के अंकुर से शिवलिंग बनाकरउसकी पूजा करें। कुछ ही समय में आपको संतान अवश्य प्राप्तहोगी।


    घर से बाहर निकलकर काली गाय के सिर पर हाथ फेरें। आपकोसंतान का सुख अवश्य प्राप्त होगा।

    स्त्रियों द्वारा प्रतिदिन नियमित रूप से पीपल के वृक्ष की परिक्रमाकरने और दीपक जलाने से उन्हें संतान अवश्य प्राप्त होती है।

    स्त्री द्वारा सदैव अपने पास चांदी का एक चौकोर टुकड़ा रखने तथानागपंचमी के दिन उसे जंगल में गाड़ने से संतान का सुख अवश्यमिलता है।

    पति-पत्नी एक माह तक भोजन के पश्चात पीली वस्तु का भक्षणकरें। दूसरे माह में एकाध बार पीला वस्त्र अवश्य पहनें। तीसरे माहमें श्रद्धानुसार पीली वस्तु और कुछ धन का दान करें। संतान कीप्राप्ति अवश्य होगी।

    पुराना गुड़ रसायनरहित भूमि में दबाने से संतान सुख प्राप्त होता है।यदि संतान को कष्ट हो रहा हो तो भी उपरोक्त टोटका करने सेअनुकूलता मिलती है।

    संतान सुख प्राप्त करने के लिए भिखारियों को गुड़ का दान करें।अगर संतान होते ही मर जाती हो तो गर्भवती होने के दिन से स्त्रीअपने बाजू पर चमकीला लाल धागा बांधें। बच्चे के जन्म केपश्चात यह धागा बच्चे के बाजू पर बांधकर बच्चे की माता कीबांह पर चमकीला पीला धागा बांध दें।

    यदि किसी परिवार में पंचकों में कन्या का जन्म हो तो उस घर में     एक के बाद एक लगातार 5 कन्याएं पैदा होती हैं। इस दोष केनिवारण के लिए कन्याओं की 5 पुतलियां बनाकर उन्हें उत्पन्न हुईकन्या के साथ झूला झुलाएं। साथ ही साथ कन्या की तरह उनपुतलियों का भी कोई न कोई नाम अवश्य रखें। कुछ दिनों बाद उनपुतलियों को पीपल की जड़ में गाड़ दें। ऐसा करने से पंचकों कादोष समाप्त होकर पुत्र उत्पन्न होता है।

    पूर्वा फाल्ुनी नक्षत्र में आम की जड़ लाकर उसे दूध मेंघिसकर पिलाने से बांझ स्त्री को भी संतान की प्राप्ति हो जातीहै।

    उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीम की जड़ लाकर सदैव अपने पास रखनेसे मनुष्य को संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है।

    नीबू की जड़ को दूध में पीसकर उसमें शुद्ध देशी घी मिला लें।इसके सेवन से निश्चय ही पुत्र की प्राप्ति होती है।

    पहली बार ब्याही गाय के दूध के साथ नागकेसर का चूर्णनिरंतर 7 दिनों तक खाने से गर्भ ठहरकर पुत्र उत्पन्न होताहै।

    रविवार को पुष्य नक्षत्र में आक की जड़ड़ लाकर बंध्या स्त्री कीकमर में बांधने से उसे संतान सुख अवश्य मिलता है।

    जिस स्त्री को संतान न होती हो, वह किसी स्त्री की प्रथम संतान(पुत्र) की नाल सुखा पीसकर गुड़ के साथ सेवन करे अथवाताबीज में भरवाकर बाई भुजा में बांध ले। इस टोटके से वह निश्चयही संतानवती हो जाएगी।

    रविवार को विधिपूर्वक सुगंधरा की जड़ लाकर गाय के दूध केसाथ पीसकर खाने से स्त्री को संतान अवश्य होती है।

    सवि का भात एवं मूंग की दाल खाने से स्त्री के बंध्या दोष नष्ट होजाते हैं तथा श्रेष्ठ संतान का सुख प्राप्त होता है।

    रोहिणी नक्षत्र में सफेद घुंघची का पौधा लाकर कोई स्त्री उसकारोपण करे। जब पौधा बड़ा हो जाए तब वह स्त्री मासिक धर्म से

    शुद्ध होकर उस पौधे की 3 माशा जड़ को ताजा जल में घिसकरपी जाए तथा पति के साथ सहवास करे। इस टोटके से उसे अवश्यही पुत्र संतान का सुख प्राप्त होता है।

    संतान सुख प्राप्त करने के टोटके


    यदि संतान में बाधा उत्पन्न करने वाला ग्रह सूर्य है तो जातक नेपहले (अर्थात पूर्व जन्म एवं इस जन्म में भी) भगवान शिव काअनादर किया है अथवा पितरों के श्राप के कारण जातक को संतानसुख नहीं है। अतः संतान प्राप्ति हेतु सूर्य के मंत्रों का कम-से-कमएक लाख बार जप करें। तांबा, गेंहूं का दान करें। घर का मुख्य द्वारपूर्व दिशा में रखें। तांबे या सोने की अंगूठी में माणिक (कम-से-कमसात रत्ती) प्राण-प्रतिष्ठा करके पहनें। तांबे के दो टुकड़े करके एकटुकड़ा बहते पानी में बहा दें और दूसरा टुकड़ा आजीवन संभालकररख लें। यदि टुकड़ा चोरी हो जाए या खो जाए तो पुनः तांबे काटुकड़ा पास में रखें। दूसरी बार पानी में न बहाएं। नदी, नाले(जिसका पानी बहता हो) में गुड़, तांबा या तांबे के सिक्के बहाएंऔर प्रत्येक कार्य गुड़ (मीठा) खाकर एवं जल पीकर किया करें।सूर्य को मीठे पानी का अर्ध्य दें। प्रतिदिन पिता एवं दादा के चरणछूकर आशीर्वाद लें।


    यदि संतान में रुकावट करने वाला ग्रह चंद्रमा हो तो माता, मौसी,सास (पत्नी की माता) गुरु पत्नी या अन्य किसी सधवा स्त्री के चित्तको दुःख पहुंचाने के कारण जातक को संतान सुख नहीं है। अतःचंद्रमा के वेदोक्त मंत्रों का (एक लाख इक्कीस हजार) जप करें।चंद्रमा सम्बंधी वस्तुओं चावल, दूध, चांदी का दान करें। दूसरों केचरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें। दूध या पानी से भरा बर्तन शामको अपने सिरहाने रखकर सोएं और अगले दिन बबूल (कीकर) कीजड़ में सारा पानी डाल दें। शिव उपासना, रुद्राभिषेक करें। सोमवारका व्रत करें। माता, सास, नानी, मौसी, दादी का आशीर्वाद लें। पलंगके पायों में चांदी की कील ठोकें। पूर्णिमा को गंगा स्नान करने के बादउंगली में चांदी की अंगूठी में सबसे बड़ा मोती (कम-से-कम सातरत्ती को) पहनें। चावल, दूध एवं पानी या दो मोती या चांदी केचौकोर दो टुकड़े लेकर एक मोती या चांदी का टुकड़ा बहते पानी     में बहा दें तथा दूसरा टुकड़ा अपने पास आजीवन संभालकर रखें।यदि संतान प्रतिबंधक ग्रह मंगल हो तो भगवान कार्तिकेय, भाई-बंधुअथवा शत्रु के श्राप के कारण जातक को संतान सुख नहीं मिलाहै। ऐसे में मंगल के मंत्रों का अड़तालीस हजार बार जप केसाथ-साथ हनुमान के पंचमुखी कवच का ग्यारह हजार बार जपकरें। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण एवं गायत्री मंत्र का जप करें।नेत्रों में सफेद सुरमा लगाएं, तांबे में मूंगा (नौ रत्ती का लेकर) अंगूठीबनाकर धारण करें। तंदूर में लगी मीठी रोटी बांटें। बहते पानी मेंरेवड़ियां, बताशे, शहद एवं सिंदूर डालें। मसूर, मिठाई अथवा मीटेभोजन का दान करें। मंगलवार का व्रत रखें और हनुमानजी को सिंदूरका चोला चढाएं।


    यदि संतान अवरोधक ग्रह बुध है तो समझिए कि कम उम्र कीबालक-बालिकाओं के श्राप से, बिल्ली को मारने के कारण, मछलियोंतथा अन्य प्राणियों के अंडों को नष्ट करने के कारण, भगवान विष्णुएवं दुर्गा माता के अनादर के कारण संतान नहीं हो रही है। ऐसे मेंबुध के मंत्रों का अड़सठ हजार बार जप करें। बुध से सम्बंधितवस्तुओं का दान करें, महाविष्णु का यज्ञ करें तथा कांस्य पात्र कोदूध से भरकर दान करें। बुधवार का व्रत करें। सात रत्ती का पन्ना,हरा ऑनेक्स (तुरमुली) को कनिष्ठिका उंगली में धारण करें। अपनेभोजन में से एक टुकड़ा गाय को, एक कुत्ते को तथा एक कौए कोखाने को दें।


    यदि संतान अवरोधक ग्रह गुरु हो तो ऐसे व्यक्ति ने इस जन्म में यापूर्व जन्म में फलदार वृक्षों को कटवाया है तथा गुरु, कुल देवता,आदरणीय व्यक्ति, अपने परिवार के बुजुगों एवं माता-पिता का भीअनादर किया है, जिसके कारण जातक को संतान सुख प्राप्त नहींहोता। इसके निवारण हेतु बृहस्पति के मंत्रों का कम-से-कम एकलाख बार जप कर लें। गुरु सम्बंधित वस्तुओं का दान करते हुए वृद्धलोगों, ब्राह्मणों, पीपल के पेड़ की सेवा करें और गुरुवार को वृत्त करें।

    पुखराज सात रत्ती का सोने या चांदी की अंगूठी में पहनें। पीले फूलोंवाले पौधे एवं वृक्ष लगाएं।


    यदि शुक्र के कारण संतान न हो रही हो तो ऐसे जातक ने सुगंधितपुष्पों के पेड़-पौधे, लताओं एवं फल-पुष्पों से युक्त वृक्षों को कटवायाहै। गौ माता के प्रति पाप किया है। साधवी स्त्री, पत्नी, प्रेमिका काश्राप, गर्भपात, बलात्कार का दोष या यक्षिणी का श्रापः है। शुक्रसम्बंधित वस्तुओं का दान करते हुए शुक्रवार का व्रत रखें तथा गायकी सेवा करें। भोजन के कुछ टुकड़़े गाय को खिला दें, कुछ टुकड़ेकौए को तथा दो टुकड़े कुत्ते को खिला दें। सफेद जिरकन, हीरा,स्फटिक, सफेद पुखराज को मध्यमा उंगली में धारण करें। गौदानकरें। ज्चार एवं हरा चारा गायों को खिलाएं। लक्ष्मी उपासना करें।सफेद एवं स्वच्छ कपड़े धारण करें। सुगंधित पदार्थों, इत्रों का प्रयोगकरें।


    यदि संतान अवरोधक ग्रह शनि हो तो समझिए कि जातक ने पीपलके वृक्ष कटवाए हैं। मरते समय किसी की आत्मा को दुःख दिया,निर्धन गरीब की हाय लगी, पिशाच, प्रेत एवं मृतात्मा के दोष सेजातक को संतान का सुख नहीं है। पीपल के वृक्ष की सेवा, ब्राह्मणोंकी सेवा, शिव-पार्वती की पूजा (पीपल के पेड़ के नीचे हो तो अतिउत्तम है) करें एवं केले के पेड़ को पानी दें। शनि सम्बंधी वस्तुओं कादान करें और शनिवार का व्रत रखें। महामृत्युंजय मंत्र का जप एवंरुद्राभिषेक कर हवन करें, बबूल की दातून करें। हनुमान उपासनाएवं बजरंग बाण का पाठ करें। तैंतालिस दिन तक कौओं को रोटीडालें तथा अपने भोजन से गाय, कुता, एवं कौए को एक-एक टुकड़ाडालें। शनिवार को तेल में अपनी छाया देखकर तेल का दान करें।बड़े-बुजुगों का मान-सम्मान करें। लोहा या काले उड़द का दान करें।यदि राहु के कारण संतान बाधा हो रही हो, तो सर्प के श्राप से ऐसाहुआ है। इसके निवारण हेतु राहु के मंत्रों का बहत्तर हजार बार जपकरें तथा दो लाख बार गायत्री (सरस्वती) मंत्रों का जप करें। सर्दी     में गरीबों को कंबल दान करें, बुधवार का ब्रत रखें, पराई कन्या कीशादी या कन्यादान करें।


    संयुक्त परिवार में रहें। ससुराल से सम्बंध न बिगाड़़े तथा सिर परचोटी रखें। जौ या अनाज को बड़े स्थान पर बोझ के नीचे दबाएं याजौ दूध से धोकर बहते पानी में बहाएं। सरसों, मूली एवं नील कादान करें। गोमेद (आठ रत्ती) की अंगूठी बनाकर पहनें। मसूर कीदाल एवं पैसे सफाई कर्मचारी को दें।


    यदि केतु के कारण संतान बाधा हो तो ऐसे में ब्राह्मणों के श्राप एवंअपमान के कारण ऐसा योग बना है। केतु का तैंतीस हजार बार जापकरते हुए गणेश जी के मंत्रों का दो लाख बार जप करें। ब्राह्मणों कोसम्मान देकर प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर संतुष्ट करें। कपिला गायका दान करें, गणेश चतुर्थी का व्रत करें।


    कुत्ता पालें और कान छिदवाएं। कुत्ते को रोटी खिलाएं, नौ वर्ष से कमके बच्चों को खट्टी वस्तुएं खाने को दें तथा काले एवं सफेद तिलबहते पानी में बहाएं। तिल, नीबू एवं केले का दान करें। चरित्र ठीकरखें तथा पाप कर्मों से बचें।


    संतान प्राप्ति


    अशोक एवं करवीर के पत्रों द्वारा हवन से संतान सुख मिलता है।


    स्वस्थ संतान के लिए


    जाना।संतान का बिल्कुल न होना और होकर मर जाना या फिर गर्भपात हो


    अगर यह सब स्थितियां न हों और संतान हो भी जाए औरवह विकलांग यानी अपंग हो तो मां-बाप के सिर पर दुखों का पहाड़ टूटपड़ता है। यहां मैं सुंदर और स्वस्थ संतान उत्पन्न करने का अनुभूत टोटकालिख रहा हूं। यह मैंने कई स्थानों पर प्रयोग किया है और यह काफी सफलरहा है।

    पत्नी शुक्रवार के दिन चने की दो रोटी बनाए, उन पर भली-भांति धी लगाएऔर उस पर कोई भी सूखी सब्जी इस प्रकार रखे कि वह दो फुलकों केमध्य रहे। इसके बाद पति-पत्नी दोनों बाजार में जाकर इसे किसी भी भूखेको अपने सामने खिला दें। उसे यथायोग्य दक्षिणा भी दें और वापस चलेआएं।


    सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री कपूर का एक टुकड़ा ले, उसमें से आथाअपने सामने रखकर जला दे और बाकी आधा शिव के मंदिर में चढ़ा दे।ऐसा करने से संतान सुंदर और स्वस्थ उत्पन्न होती है।


    शीघ्र संतान प्राप्ति हेतु


    अगर विवाह को काफी समय हो गया है और पति-पत्नी शारीरिक दृष्टिसे बिल्कुल स्वस्थ हैं तो यह प्रयोग करें। शीघ्र संतान प्राप्त होगी।


    रविवार के दिन गुंजा की टहनी काट लें। मंगलवार तक निम्न मंत्र कानियमित जप करें। मंगलवार को इस टहनी को किसी तांबे के यंत्र में भर लें।गंगा जल से स्नान कराएं और हनुमानजी के चरणों का स्पर्श कराएं।इसके बाद इस यंत्र को गले या हाथ पर बांध लें। शीघ्र ही उद्देश्य की प्राप्तिहोगी।


    मंत्र इस प्रकार है-‘हिमवत्युत्तरे पार्श्वे शर्वरीनाम यक्षिणी।

    यस्य नुपुरशब्देन विशाल्य गर्भिणी भवेत् ।।

    इसी प्रकार मदार (आक) को बृहस्पतिवार को लाकर कमर में बांधने सेसुंदर और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है। मदार कल्प को बाजार में कई नामोंसे जाना जाता है। इसे अर्क, मदार, आक या मंदार भी कहते हैं।

    संतान सुख हेतु टोटके


    मुलहठी, आंवला और सतावर को काटकर इन तीनों को अच्छीतरह से पीसकर कपड़छान कर लें। इसके बाद इस औषधि कोरविवार से आरंभ करें। इस औषधि का गाय के दूध से सेवनगुणकारी माना गया है। इस औषधि की मात्रा लगभग 6 ग्राम होनीचाहिए।


    मंगल के दिन गहरा लाल कपड़ा लें। इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक बांधलें। इसके बाद हनुमान मंदिर जाकर इस पोटली को हनुमान जी केपैरों से स्पर्श कराएं। वापस आकर गर्भिणी के पेट से बांध दें। गर्भपाततुरंत बंद हो जाएगा।


    संतान का बिल्कुल न होना, होकर मर जाना, गर्भपात हो जाना,अगर ये सब स्थितियां हों तो-


    पत्नी शुक्रवार के दिन दो चने की रोटियां बनाए। उन पर भली-भांतिघी लगाए और उस पर कोई भी सूखी सब्जी इस प्रकार रखे किवह दोनों रोटियों के मध्य ही रहे। इसके बाद पति-पत्नी दोनों हीबाजार जाकर किसी भूखे को अपने सामने खिला दें और उसेयथासम्भव दक्षिणा भी दें और वापस घर आ जाएं। अवश्य लाभहोगा।


    सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री देशी कर्पूर का एक टुकड़ा ले। उसमेंआधा अपने सामने रखकर जला दे और बाकी का आधा दुर्गा मंदिरमें चढ़ा दें। ऐसा करने से संतान सुंदर और स्वस्थ उत्पन्न होगी।जिन स्त्रियों के बच्चे गर्भ में ही ऐठकर मर जाते हैं, उन्हें चाहिएकि झड़ेबेरी बेरी के पत्ते, आक के पत्ते, बबूल के पत्ते, नीम के पत्ते,पीपल के पत्ते, अरंड के पत्ते, सात कुओं का जल, सात चौराहों कीमिट्टी लेकर किसी भी रविवार को एक कोरे बर्तन में डालकर किसीबेरी के पेड़ के नीचे जाकर स्नान करें। यह अधिक अच्छा होगाअगर यह क्रिया शुक्ल पक्ष के रविवार को की जाए। रोग दूर होजाएगा और बच्चा भी स्वस्थ होगा।

    जब गर्भ धारण हो गया हो तो एक चांदी की बांसुरी बनाकरकृष्ण-राधा के मंदिर में पति-पत्नी दोनों गुरुवार के दिन चढ़ाएंगेतो गर्भपात नहीं होगा।

    शुभ नक्षत्र योग में गुंजा मूल को चांदी के खोल में भरकर कमर मेंधारण करने वाली स्त्री अंगर स्वस्थ है तो से पति सम्पर्क करने परपुत्र लाभ प्राप्त करेगी।

    यदि प्रसव वेदना में अधिक कष्ट हो रहा हो तो नीम की जड़लाकर स्त्री की कमर में बांधने से प्रसव आसानी से हो जाताहै।

    कलिहारी की जड़ लाकर रेशमी धागे से स्त्री के बाएं हाथ में बांधनेसे प्रसव आसानी से हो जाता है।

    ऊंटकटीरे की जड़ लाकर प्रसव वेदना सह रही स्त्री के सिर केबालों में बांध देने से भी प्रसव आसानी से हो जाता है।

    गर्भपात से बचने के लिए प्रथम मास में शुक्रवार को चावल बनाकर

    गाय को खिलाने चाहिए। द्वितीय मास में चने की दाल भिगोकर

    तोते को खिलाएं, तृतीय मास में बैल को गुड़ दें। चतुर्थ मास में गर्भवती

    स्त्री कच्ची मिट्टी पर पानी डालकर उसकी गंध सूंघे एवं तुलसीके दर्शन करें, पांचवें माह में थोड़ी उड़द की दाल खिलाएं तथाछठे माह में लोहे एवं तेल का दान करें। गर्भवती तिल के तेल कीमालिश करवाएं। सातवें, आठवें, नौवें माह में अच्छे पकवान बनाकरविद्वान ब्राह्मण को खिलाएं।

    पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ को लाकर दूध में घिसकरपिलाने से बांझ स्त्री को संतान की प्राप्ति होती है।

    कन्या जन्म के पश्चात पुत्र सुख की कामना करने वाले दम्पती कन्या के नामकरण वाले दिन उस कन्या के चरण स्पर्श करतेहुए पुत्र जन्म की प्रार्थना करें तथा पूरा परिवार उस दिन जलेबीव खौर का प्रसाद ग्रहण करे तो अगली संतान लड़का हीहोगा।

    रविवार को जड़़ सहित तुलसी का पेड़़ उखाड़़ लें। इसे कपिला गायके दूध में पिसवाकर ऋतुकाल में 5 दिन नित्य 4-4 तोला पिएं।इससे बाझ स्त्री को भी संतान प्राप्ति होगी।

    बरगद के पेड़ की जड़ को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के दिन प्राप्त करें।कोई ऐसी महिला जो नि:संतान हो, वह किसी धागे में बांधकरअपनी भुजा पर धारण करती है तो उसे संतान लाभ हो सकता है।

गर्भ को जब तीसरा माह चल रहा हो तो गर्भिणी को थोड़ा-साजायफल और गुड़ शनिवार को खिला दें। शर्तिया लड़काहोगा।

मदार (आक) को बृहस्पतिवार को लाकर कमर में बांधने से सुंदरऔर स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है। मदार (कल्प) को बाजारमें कई नामों से जाना जाता है। (इसे अर्क, आक या मदार भीकहते हैं)


    एक बेदाग हरा नीबू ले लें। उसे हाथ से निचोड़कर भरपूर रसनिकाल लें। इसके बाद उसमें थोड़ा नमक स्वाद के अनुसार मिलालें। अब इस द्रव्य के लड्डू गोपाल के आगे थोड़ी देर रख दें। रात्रिसोने से पूर्व स्त्री इस द्रव्य का सेवन करें और पति अपने पति धर्मका पालन करें। इस क्रिया को एक बार से अधिक न करें, अन्यथालाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है।


    प्रतिदिन पति-पत्नी दोनों में से एक पूजा के लिए मंदिर जाए।सोमवार के दिन जो भी मंदिर जाए तो वहां शिवजी पर चढे हुएथोड़े चावल ले आए। इसके बाद उन्हें पीस लें और नियम से आनेवाले सोमवार तक दूध के साथ सेवन करें।

    पत्नी शुक्रवार के दिन दो चने की रोटी बनाएं। उन पर भली-भांतिघी लगाएं और उन पर कोई भी सूखी सब्जी इस प्रकार रखें कि वह    दोनों रोटियों के मध्य रहें। इसके बाद पति-पत्नी दोनों बाजार में जाकरकिसी भूखे को उन रोटियों को अपने सामने खिला दें। उसे यथायोग्यदक्षिणा दें और वापिस चले आए।


    सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री देसी कपूर का एक टुकड़ा लें।उसमें आधा अपने सामने रखकर जला दें और बाकी आधा शिव केमंदिर में चढ़ा दें। ऐसा करने से भी संतान सुंदर और स्वस्थ उत्पन्नहोती है।


    एक देसी कपूर का साबुत टुकड़़ा ले लें। उसमें से थोड़़ा-सातोड़कर बच्चे को चटा दें और शेष हनुमान मंदिर में चढ़ा दें। यहध्यान रहे कि यह टोटका केवल एक ही बार करना है।


    सकोरे में कच्चा दूध ले लें। उसे बच्चे के सिर पर से 21 बारउतारकर काले कुत्ते को अपने सामने पिला दें। इस टोटके केपश्चात बच्चा स्वयं ही शनै:-श्नै: दूध पीने लगेगा।किसी ऐसी स्त्री जिसकी संतान न होती हो यानी पूरी तरह से बांझहो, उसे शनिवार के दिन घर पर बुलाएं और बच्चे के सिर पर हाथफेरने को कहें। यह ध्यान रहे वह बच्चे को गोद में बिल्कुल नाले। उस स्त्री के जाने के बाद उस जगह पर झाडू लगा दें।

मंत्रसिद्ध चैतन्य पीली कौड़ी को शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक बंध्या स्त्री की
कमरे में बांधने से उस निःसंतान स्त्री की गोद शीघ्र ही भर जाती है।
बरगद के पत्ते पर कुंकुम द्वारा स्वास्तिक का निर्माण करके उस पर चावल
एवं एक सुपारी रखकर किसी देवी मंदिर में चढ़ा दें। इससे भी संतान सुख
की प्राप्ति यथाशीघ्र होती है।
घर से बाहर निकलते समय यदि काली गाय आपके सामने आ जाए तो
उसके सिर पर हाथ अवश्य फेरें। इससे संतान सुख का लाभ प्राप्त होता है।
भिखारियों को गुड़ दान करने से भी संतान सुख प्राप्त होता है।
विवाहित स्त्रियों द्वारा नियमित रूप से पीपल की परिक्रमा करने और दीपक
जलाने से उन्हें संतान अवश्य प्राप्त होती है।
श्रवण नक्षत्र में प्राप्त किए गए काले एरंड की जड़ को विधिपूर्वक कमर में
धारण करने से स्त्री को संतान सुख अवश्य मिलता है।
रविवार के दिन यदि विधिपूर्वक सुगंधरा की जड़ लाकर गाय के दूध कें
साथ पीसकर कोई स्त्री खावें तो उसे संतान सुख अवश्य मिलता है।
संतान सुख प्राप्ति का एक उपाय यह भी है कि गेहूँ के आटे की गोलियाँ
बनाकर उसमें चने की दाल एवं थोड़ी सी हल्दी मिलाकर गाय को गुरूवार
के दिन खिलाएँ।
चावलों की धोबन में नींबू की जड़ को बारीक पीसकर स्त्री को पिला देने
के उपरांत, यदि एक घन्टे के भीतर स्त्री के साथ उसके पति द्वारा सहवास
-क्रिया की जाए तो वो स्त्री निश्चित रूप से कन्या को ही जन्म देती है। यह
प्रयोग तब किया जाना चाहिए जब कन्या की चाहना बहुत अधिक हो।
यदि सन्तानहीन स्त्री ऋतुधर्म से पूर्व ही रेचक औषधियों (दस्तावर दवाओं)
के द्वारा अपने उदर की शुद्धि कर लेने के पश्चात् गूलर के बंदाक को
श्रद्धापूर्वक लाकर बकरी के दूध के साथ पीए और मासिक-धर्म की-शुद्धि
के उपरान्त सेवन करे तो उसे पुत्र रत्न की ही प्राप्ति होगी।
पुष्य नक्षत्र में असगन्ध की जड़ को उखाड़कर गाय के दूध के साथ पीसकर
पीने और दूध का ही आहार ऋतुकाल के उपरान्त शुद्ध होने पर पीते रहने
से उस स्त्री की पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा अवश्य ही पूरी हो जाती है।
पुत्र की अभिलाषा रखने वाली स्त्री को चाहिए कि वह ऋतु-स्नान से एक
दिन पूर्व शिवलिंगी की बेल की जड़ में तांबे का एक सिक्का और एक
साबुत सुपारी रखकर निमंत्रण दे आए और दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व ही
वहाँ जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे - हे विश्ववैद्य! इस पुत्रहीन की
चिकित्सा आप स्वयं ही करें। पुत्र छवि-विहिन इसकी कुटिया की
संतान के मुखमण्डल की आभा से आप ही दीप्त करें। ऐसा कहकर
शिवलिंगी की बेल की जड़ में अपने आंचल सहित दोनों हाथों को फैलाकर
घुटनों के बल बैठ जाएं और सिर को बेल की जड़ से स्पर्श कराकर प्रणाम
करें। तत्पश्चात् शिवलिंगी के पांच पके हुए लाल फल तोडकर अपने
आंचल में लपेट कर घर आ जाएं। उसके बाद काली गाय के थोड़े से दूध
में शिवलिंगी के सभी दाने पीस-घोलकर इसी के दूध के साथ पी जावें तो
पुत्र प्राप्ति होगी।
रविवार को पुष्य नक्षत्र में आक (मदार) की जड़ बंध्या स्त्री की कमर में
बांध दें इससे गर्भधारण करके वह संतान को जन्म अवश्य ही देगी।
पति-पत्नी दोनों अथवा दोनों में से कोई भी आस्था और श्रद्धाभाव से
भगवान श्रीकृष्ण का एक बालरूपी चित्र अपने कक्ष में लगाकर प्रतिदिन
108 बार निम्न मंत्र का जप पूरे एक वर्ष तक करें। उसकी मनोकामना
अवश्य ही पूर्ण हो जाएगी। मंत्र यह है .
देवकी सुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणंगता।।
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नोट - शिशु के जन्म के उपरांत 21 बच्चों को भोजन कराकर यथाशक्ति
दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए।
गुरुवार या रविवार को पुष्य नक्षत्र में श्वेत पुष्प वाली कटेरी की जड़ उखाड़
लाएं। मासिक-धर्म से निवृत्त होकर, ऋतु-स्नान कर लेने पर चौथे या पांचवें
दिन कटेरी की इस जड़ को लगभग दस ग्राम गाय के दूध में
(दूध बछड़े
वाली गाय का हो) पीसकर पुत्र की अभिलाषिणी उस स्त्री को पिला दें
जिसके पहले से कोई संतान न हो (अर्थात् विवाहोपरांत संतान का मुंह भी
जिसने न देखा हो)। जड़ी-सेवन के ठीक छठवें दिन (इससे पहले नहीं)
स्त्री पति-समागम करे तो प्रथम संतान के रूप में पुत्र को ही जन्म देगी।
नोट - (कटेरी एक कांटेदार झाड़ी जाति का पौधा होता है, जिस पर श्वेत
व पीत वर्णीय पुष्प लगते हैं। उक्त प्रयोग के लिए श्वेत पुष्प की कटेरी की
जड़ ही प्रयुक्त होती है। उसे ही शुभ दिन, मुहूर्त अथवा शुभ पर्व या पुष्य
नक्षत्र में आमंत्रित करके लानी चाहिए।)

यदि किसी रजस्वला स्त्री को स्वप्न में नागदेवता के दर्शन हो जाएं तो स्वयं
को कृतार्थ समझना चाहिए। यह इस बात का संकेत है कि उसके द्वारा की
गई क्रिया सफल हुई है। उसे अवश्य तथा शीघ्र ही सुंदर, यशस्वी और
दीर्घायु संतान प्राप्त होगी।
यदि किसी स्त्री के संतान नहीं हो रही हो तो उसके लिए बताया गया है कि
जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई हो और अर्थी पर बांधकर उसे शमशान
घाट ले जा रहा हो और वो अर्थी जब किसी चौराहे पर पहुँचे तो उस समय
जिस स्त्री के बच्चा नहीं हो रहा है वो स्नान कर नये पीले वस्त्र पहनकर
पहले से ही उस चौराहे पर खड़ी रहे और जब अर्थी चौराहे पर पहुँचे तो वह
स्त्री तुरन्त पश्चिम से पूरब की ओर उस अर्थी के नीचे से निकल जाए। यह
ध्यान करते हुए कहे कि तुझे मेरे पुत्र के रूप में जन्म लेना है।
जब पुष्य नक्षत्र एवं रविवार का योग हो, अर्थात् रवि पुष्य वाले दिन विधि
पूर्वक अश्वगंधा की जड़ लाकर उसे छाया में सुखाकर, पीस और छानकर
चूर्ण कर लें। नित्य सवा तोला चूर्ण भैंस के दूध के साथ सेवन करें। इसके
साथ ही निम्न मंत्र का एक माला जप भी अवश्य करें।
ॐ नमः शक्ति रूपाय मम गृहे पुत्रं कुरु कुरु स्वाहा ।
पुरुष (पति) अश्विनी नक्षत्र से एक दिन पहले बेल के वृक्ष को आमंत्रित
कर आए और दूसरे दिन उस वृक्ष का पत्ता लाकर एक रंगबाली गाय के दूध
में पीसकर स्त्री (पत्नी) को पिलाऐं और उसके साथ सहवास-क्रिया करे तो
एक बार में ही स्त्री के गर्भ ठहर जाता है।
श्रवण नक्षत्र में काले अरण्ड की जड़ को प्राप्त करके कमर में धारण करने
वाली स्त्री को संतान-सुख की प्राप्ति अवश्य होती है।
स्वस्थ व निरोगी होने पर भी संतान-सुख से वंचित स्त्री (जिसके पति में
कोई कमी न हो) श्वेत लक्ष्मणा-बूटी की इक्कीस की संख्या में गोली
बनाकर रखे और एकेक गोली प्रतिदिन गाय के दूध के साथ सेवन करें तो
उसे संतान का लाभ अवश्य होगा।
यदि कोई संतानहीन स्त्री, दूसरी किसी स्त्री की प्रथम संतान (लड़का) की
नाल को प्राप्त करके और सुखाकर बारीक पीस लें और पुराने गुड़ के साथ
सेवन करे अथवा शुद्ध सोने के ताबीज में भरवाकर बायीं भुजा में धारण कर
लें। इस क्रिया से संतानवती अवश्य होगी।


    

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