पुत्र प्राप्ति ज्योतिष अनुसार गर्भाधान का तरीका
पुत्र प्रप्ति हेतु सर्पदोष निवारण
जन्मपत्रिका में यदि पंचम भाव में राहू बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति कौ सर्पदोष होता है। इस दोष के प्रभाव से पुत्र उत्पत्ति में बाधा आती है। यदि समय से इस दोष का निवारण
कर लिया जाये तो पुत्र यौग बन जाता है। इस दोष की समाप्ति के लिये आप निम्न उपाय कर सकते हैं:
(!) दोष की विंधि-विधान से शान्ति करवायें | (0) भगवान शंकर के मन्दिर का निर्माण करवाना चाहिये। (3) ग्रहण काले में विधि-विधान से पंचमुखी नाग की मूर्ति अर्पित करनी चाहिये।
|) शान्ति के बाद पाँच प्रकार की धातु से नाग-नागिन के जोड़े को पवित्र जल प्रवाहित करने चाहिये।
5) नाग पंचमी को सपेरे से नाग को मुक्त करवाना चाहिये परन्तु मुक्त करवाने से पहले नाग की पूजन अवश्य करना चाहिये।
&) यदि आप पूरा मन्दिर बनवाने की स्थिति में नहीं हैं तो किसी मन्दिर में भगवान शिव की मूर्ति को अवश्य स्थान दिलवाना चाहिये।
यदि आप उपरोक्त उपाय करते हैं तो लाभ प्राप्त होगा। गुरु, माता-पिता, ब्राह्मण ब गाय आदि की सेवा भी पुत्र प्रप्ति का योग निर्मित करते हैं।
संतान प्राप्ति हेतु उपाय
$ अब मैं आपको एक ऐसा उपाय बता रहा हूँ जो कभी निष्फल नहीं होता है। इससे पहले मैं आपको एक सत्य घटना बता रहा हूँ। हमारे एक मिलने वाले है जो मुझ घर पूर्ण विश्वास करते हैं। उनके पड़ोस में एक दम्पती रहते हैं। उनके विवाह को लगभग 1६ वर्ष हो चुके हैं लेकिन संतान नहीं हुई है। इस कारण वे अपना वंश चलाने के लिये दूसरा विवाह करना चाहते थे। मेरे मिलने वालों ने उन्हें सलाह दी कि आप एक बार हमारे गुरुजी से मिल लें। यदि आपको कुछ विश्वास आये तो उपाय करें अन्यथा न करें। उनकी माताजी जिनकी आयु करीब 70 वर्ष हैं उन्होंने कहा कि हम कई उपाय कर चुके हैं और धन भी बहुत खर्च कर लिया है परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। मजबूरी में दूसरा विवाह कर रहे हैं। मेरे परिचित ने कहा कि आपके पुत्र की पत्रिका में यदि संतान योग है ही नहीं तो फिर आप दो क्या पचास विवाह भी कर लें, कोई लाभ नहीं होगा। माताजी ने कहा कि हमारी बहू में ही दोष है। वह व्यक्ति अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता बह विवाह का इच्छुक भी नहीं था, परन्तु उसकी माताजी का ही दबाव था। वह अपनी माताजी से छिप कर अपनी पत्नी के साथ मेरे पास आया। मैंने जब दोनों की पत्रिका देखी तो समस्या समझ में आ गई | मैंने कहा कि उपाय बहुत सामान्य है परन्तु वर्तमान में ग्रह गोचर के प्रभाव से अभी संभव सहीं है परन्तु इतना विश्वास रखें कि आपके संलान अवश्य ही होगी। इसमें लगभग 10 माह लगेंगे। वे तैयार हो गये, परन्तु उनकी माताजी ने दबाव डाल कर उनका विवाह करवा दिया | विवाह के बाद जैसे कि माताजी को उम्मीद थी कि एक-दो माह में ही दूसरी बड्डू गर्भवती हो जायेगी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। एक वर्ष के बाद ज्जों समय मैंने उन्हें बताया था, वह अपनी प्रथम पत्नी के साथ मेरे पास आये। मैंने उन्हें उपाय बताया। उपाय आरम्भ करने के मात्र सात माह में ही उनकी प्रथम पत्नी गर्भवती हो गई | समय पर एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया इससे माताजी बहुत ही खुश हो गई | जब उन्होंने कहा कि हमने तो इतने उपाय कर लिये. कोई लाभ नहीं हुआ तो अब कैसे यह हो गया ? उन्हें जब वास्तविकता बताई गई तो बहुत दुःख हुआ कि मेरी मूर्खता और जल्दबाजी से एक जीवन बर्बाद हो गया। इसके बाद प्रथम पत्नी के ही दो संतान और हुई | जो दूसरा विवाह किया था, उसके कोई संतान नहीं हुई | आप इस बात को ऐसे भी देखें कि येदि उनके पुत्र की पत्रिका मेँ ही संतान योग नहीं होता तो वह दो क्या दस विवाह भी कर लेते तब भी संतान नहीं होती ॥ सेरा कहना है कि कोई भी अपने धन के मद में ऐसा कार्य न करे जिससे किसी का जीवन बर्बाद हो जाये | कोई भी कार्य करने से पहले हर प्रकार से पूर्ण जानकारी ले लेनी चाहिये। किसी कार्य के लिये कोई मना करता है तो उसका कारण अवश्य जानना चाहिये। तभी कोई कदम उठाना चाहिये | ॥
- आप यदि संतान न होने से पीड़ित हैं तो निम्न उपाय अवश्य करें | यदि आपकी पत्रिका में संतान सुख एक प्रतिशत भी हुआ तो प्रभु की कृपा से अवश्य ही संतान होगी ॥ यदि किसी को संतान प्राप्ति में बाधा आती है तो वह अपने निवास के मुख्यद्वार पर “संतान गणपति” की अभिमंत्रित प्रतिमा लगाये तथा पति-पत्नी दोनों ही गणपति के 1058 नवार्मो का उच्चारण करें | गणपति की मूर्ति पर यदि “संतान गणपतये नम: गर्भदोष हो नमः पुत्र चौत्राय नमः” अंकित हो अथवा मूर्ति इस मंत्र से सवा लाख मंत्रों से अभिमंत्रित हो तथा दम्पती इस मंत्र का जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है। मैंने स्वयं कर्ड बार ड्स उपाय से एक वर्ष के अन्दर ही संतान प्राप्त होते देखा है । यह एक ऐसा उपाय है जो कभी निष्फल नहीं जाता है।
इन सबके अतिरिक्त कुछ ऐसे निम्न उपाय हैं जिनके साध्यम से आप पुत्र प्राप्ति अवश्य कर सकले हैं:-ह (1) भोग सदैव शुकलपक्ष में ही करें लथा दिन में कभी भी भोग न करें। ड्ससे अक्षम संतान का योग निर्मित होता है। (2) भोग का समय रात्रि 11 व 4 के मध्य ही होना चाहिये तथा अमावस्या, षष्ठी, अष्टमी व रिक्ता तिथि, अर्थात् चतुर्थ, नवमी व चतुर्दशी तिथि, रविवार, मंगलवार व शनिवार, माता-पिता की मृत्यु तिथि व ग्रहण काल में भोग वर्जित है।
3) इसके अतिरिक्त यदि आप और अधिक गहराई में भोग निषेध का समय जानना चाहते हैं तो अपने नक्षत्र से सातवां नक्षत्र में भी भोंग निषेध है। अपनी राशि से यदि आठवां चन्द्र हो तो वह भी अशुम होता है। यदि आप भरणी, कृतिका, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, तीनों पूर्वा, विशाखा, ज्येष्ठा व रेवती नक्षत्रों को भी मोग न करें तो आपके संतान अवश्य ही भाग्यशाली होने के साथ अधिक आयु की होगी क्योंकि ये नक्षत्र भोग के अनुकूल नहीं हैं। हाँ, भोग के लिये श्रवण, हस्त, अनुराधा, स्वाति, शतभिषा, धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, मूल व रोहिणी नक्षत्र उत्तम तथा चित्रा, पुष्य, अशिवनी नक्षत्र मध्यम माने गये हैं।
(६) रेवती नक्षत्र में यदि पीपल का बांदा शनिवार को स्त्री की कमर में बांघा
- जाये तो पुत्र योग बनता है। (6) प्रातः: एक बेदाग नींबू लेकर उसका रस निकाल कर उसमें नमक मिला कर : भगवान श्री कृष्ण की तस्वीर के समक्ष रखें तथा रात्रि में भोग से पहले स्त्री को सेवन करायें। यह उपाय भी पुत्रकारक है परन्तु यह उपाय सिर्फ एक बार करें। के किसी शुक्लपक्ष में अभिमंत्रित “संतानगोपाल यंत्र” के समक्ष निम्न मंत्र जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है:35 देवकी सुत गोविन्दं वासुदेव जयत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:”॥|। $ विवाह के बाद अधिक समय निकल जाने पर भी यदि संतान न हो तो यंत्र के समक्ष नियमित रूप से “संतानगोपाल स्तोत्र” का पाठ करने. से संतान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं। इस यंत्र के साथ पत्रिका में जिस ग्रह के प्रभाव से संतान बाधा आ रही हो, उस ग्रह के यंत्र की भी सेवा करनी चाहिये।
वास्तु दोष निवारण के द्वारा संतान उपाय
मैंने कई बार देखा है कि कई लोग सिर्फ इस कारण से संतान सुख से वंचित रहे
हैं कि उनके शयन कक्ष में वास्तुदोष था। जब उस वास्तुदोष का निवारण हो गया तो संतान भी हो गई। आप देखें कि कही आपके शयनकक्ष में कोई दोष तो नहीं है। सर्वप्रथम आप यह जान लें कि किसी भी नवदम्पती को ईशान कोण में अपना शयन कक्ष नहीं
रखना चाहिये क्योंकि इस कोण में शयन कक्ष होने से संतान के विकलांग होने का योग निर्मित होता है। आपके कक्ष में यदि आधुनिक डबलबैड है तो यह आपके सम्बन्धों के लिये बहुत अशुभ है। इसके प्रभाव से आपके विचारों में मतभेद रहेंगे। इसलिये आप डबलबैड का गद्दा ऐसा रखें जिसमें कोई जोड़ न हो अर्थात् वह एक ही हो। आपके शयन कक्ष के आग्नेय कोण में आपका पलंग न हो। यह बहुत अशुभ वास्तु है। शयनकक्ष में आप अपनी राशि के अनुसार ही रंगों का चयन करें। ईशान कोण यदि खाली रहे तथा आपका पलंग आपकी राशि के अनुसार दिशा में हो तो संतान सुख जल्दी प्राप्त होता है। आपके निवास व शयन कक्ष में यदि ईशान कोण में असंतुलन है तो आप इसको अवश्य दूर करवायें। यदि आपका शरीर अधिक जल तत्व से परिपूर्ण है तो आप अपने शयनकक्ष में आग्नेय कोण को अधिक शक्ति दें अर्थात् इस कोण में सदैव लाल रंग का वल्ब जलता रहे। इससे आपको दो लाभ मिलेंगे। प्रथम, आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और द्वितीय, आप अपने कर्मक्षेत्र में अधिक सफल रहेंगे।
जो स्त्री गर्भ धारण करने के योग्य हो, परंतु गर्भ नहीं ठहरता हो,सब प्रकार का इलाज करा लेने पर भी लाभ न होता हो तो कृपया येटोटके काम में लें, ईश्वर ने चाहा तो जरूर लाभ होगा।
रविवार को ‘सुगंधरा की जड़' एकवर्णा गौ के दूध के साथ पीस‘ऋतुकाल' (मासिक धर्म के समय) में पीने से ‘बंध्या दोष'विनष्ट हो जाता है।
रजोधर्म शुद्धि के पश्चात ‘काली अपराजिता की जड़' को बछड़ावाली नवीन गौ के दूध में पीसकर तीन दिन पीने से, तत्पश्चात पतिके साथ सहवास करने से ‘बंध्या स्त्री' अवश्य गर्भवती होती है।
जिस गाय ने पहली बार ही बछड़े को जन्म दिया हो, उस गाय केदूध के साथ नागकेशर का चूर्ण, रजोधर्म के बाद, सात दिन पीनेके पश्चात पति सहवास करने से बंध्या स्त्री पुत्र को जन्म देती है।
नीबू के पुराने पेड़ की जड़ को दूध में पीसकर घी मिलाकर पीनेसे ‘पति प्रसंग द्वारा' स्त्री को ‘दीर्घजीवी संतान’ की प्राप्ति होती है।जन्म लेने के पश्चात जिस स्त्री का पुत्र मर जाता है, उसे‘मृतवत्सा’ कहते हैं। जिस रविवार को ‘कृतिका नक्षत्र' हो, उसदिन ‘पीत पुष्पा' नाम की जड़ी की जड़ ले आएं उसे पानी मेंपीसकर सात दिन पिएं तो पुनः पुत्र न मरे।
नागर मोथा, कंगुन, बेर, लाखरस और शहद बराबर-बराबर लेकरपुराने चावल के धोवन (पुराने चावल का धोया हुआ पानी) 10ग्राम की मात्रा में सात दिनों तक खाएं तो बंध्या स्त्री भी अवश्यगर्भ धारण कर लेती है और संतान प्राप्त करती है।
कदम्ब का पत्ता, श्वेत श्रीखंड, चंदन, कटेरी की जड़ यह सबसमान भाग लेकर बकरी के दूध में पीसें। इस महापधि को तीन रात्रिया पांच रात्रि ऋतुकाल के समय पीने से स्त्री अवश्य गर्भ धारणकरती है और सुंदर संतान प्राप्त करती है।
‘पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र' में बरगद के पेड़ की जड़ लाकर लालधागे में स्त्री बाएं बाजू में धारण करे तो पुत्र प्राप्त होता है।
‘सिद्ध बाल गोपाल यंत्र' धारण करने से अवश्य पुत्र प्राप्त होता है।गाय के दूध में पद्माख, लाल चंदन, खस इन तीनों को बराबर मात्रामें मिलाकर पीस लें। एक-एक तोला 5 दिन खाने से गर्भपात नहींहोता।
सिद्ध महामृत्युंजय यंत्र धारण करने से गर्भ गिर ही नहीं सकता।पीपल की छाल, काला तिल, सतावर, तीनों बराबर-बराबर मात्रामें लेकर गौ के दूध में पीसकर सात दिन पीने से प्रथम मास व दूसरेमास की गर्भ पीड़ा दूर होती है।
चंदन, तगर, कूट, कमल की जड़, केशर, काकोली, असगंध बराबरमात्रा में लेकर, ठंडे पानी के साथ पीसकर पीने से तीसरे मास कीगर्भ की पीड़ा जाती रहती है।
गदहपूर्णा, काकोली, तगर, नील कमल, गौखरू ये सभी सम मात्रामें दूध के साथ पीसकर पीने से पांचवें मास की गर्भपीड़ा शांत होतीहै।
कैथ का गूदा ठंडे पानी में पीसकर, दूध मिलाकर पीने से छठे मासकी गर्भ पीड़़ा नष्ट होती है।
कसेरू, पुष्कर, सिंघोड़ा व नील कमल की पंखुड़ियां पानी मेंपीसकर पीने से सातवें मास की गर्भ पीड़ा अच्छी होती है।
इंद्रायण के बीज, कंकोल (अकोल), मधु (शहद) के साथपीसकर खाने से आठवें व नवें मास की गर्भ पीड़ा शांत होती है।
पुरानी खांड, मुनक्का, छुहारा, शहद व नील कमल की पंखुडियांबराबर-बराबर मात्रा में दूध में पीसकर पीने से दसवें मास के गर्भकी व्यथा दूर होती है।
आंवला व मुलहठी सम मात्रा में दूध के साथ पीसकर पीने से गर्भस्तम्भन पूर्ण रूपेण हो जाता है, फिर गिरता नहीं।
‘सिद्ध विजय यंत्र’ धारण करने से किसी प्रकार की गर्भ पीड़ा नहींहोती।
संतान प्राप्ति हेतु सर्पदोष निवारण
जन्मकुंडली में यदि पंचम भाव में राहु बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति कोसर्पदोष होता है। इस दोष के प्रभाव से पुत्र उत्पत्ति में बाधा आती है। यदिसमय से इस दोष का निवारण कर लिया जाए तो पुत्र योग बन जाता है।इस दोष की समाप्ति के लिए आप निम्न उपाय कर सकते हैं-दोष की विधि-विधान से शांति करवाएं।
भगवान शंकर के मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए।ग्रहण काल में विधि-विधान से पंचमुखी नाग की मूर्ति अर्पित करनीचाहिए।
शांति के बाद पांच प्रकार की धातु से नाग-नागिन के जोड़े कोपवित्र जल प्रवाहित करने चाहिए।
नाग पंचमी को सपेरे से नाग को मुक्त करवाना चाहिए परंतु मुक्तकरवाने से पहले नाग का पूजन अवश्य करना चाहिए।
यदि आप पूरा मंदिर बनवाने की स्थिति में नहीं हैं तो किसी मंदिरमें भगवान शिव की मूर्ति को अवश्य स्थान दिलवाना चाहिए।
संतान प्राप्ति के कुछ महत्त्वपूर्ण उपाययदि आप संतान न होने से पीड़ित हैं तो निम्नलिखित उपाय अवश्यकरें। यदि आपकी जन्मकुंडली में संतान सुख एक प्रतिशत भी हुआतो प्रभु की कृपा से अवश्य ही संतान होगी। यदि किसी को संतानप्राप्ति में बाधा आती है तो वह अपने निवास के मुख्य द्वार पर ‘संतान गणपति' की अभिमंत्रित प्रतिमा लगाएं तथा पति-पत्नी दोनों ही गणपतिके 108 नामों का उच्चारण करें। गणपति की मूर्ति पर यदि ‘संतानगणपतये नमः गर्भदोष हो नमः पुत्र पौत्राय नमः' अंकित हो अथवामूर्ति इस मंत्र से सवा लाख मंत्रों से अभिमंत्रित हो तथा दम्पती इस मंत्रका जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है। मैंने स्वयं कई बार इसउपाय से एक वर्ष के अंदर ही संतान प्राप्त होते देखा है। यह एक ऐसा
उपाय है जो कभी निष्फल नहीं जाता है।इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे उपयोगी उपाय दिए जा रहे हैं जिनकेप्रयोग से आप सुयोग्य संतान प्राप्त कर सकते हैं-भोग सदैव शुक्लपक्ष में ही करें तथा दिन में कभी भी भोग न करें।इससे अक्षम संतान का योग निर्मित होता है।भोग का समय रात्रि 11 व 4 के मध्य ही होना चाहिए तथाअमावस्या, षष्ठी, अष्टमी व रिक्ता तिथि अर्थात चतुर्थी, नवमी वचतुर्दशी तिथि, रविवार, मंगलवार व शनिवार, माता-पिता की मृत्युतिथि व ग्रहणकाल में भोग वर्जित है।इसके अतिरिक्त यदि आप और अधिक गहराई में भोग निषेध कासमय जानना चाहते हैं तो अपने नक्षत्र से सातवें नक्षत्र में भी भोगनिषेध है। अपनी राशि से यदि आठवां चंद्र हो तो वह भी अशुभहोता है। यदि आप विशाखा, ज्येष्ठा व रेवती नक्षत्रों में भी भोग नकरें तो आपकी संतान अवश्य ही भाग्यशाली होने के साथअधिक आयु की होगी क्योंकि ये नक्षत्र भोग के अनुकूल नहीं हैं।हां, भोग के लिए श्रवण, हस्त, अनुराधा, स्वाति, शतभिषा, धनिष्ठा,तीनों उत्तरा, मूल व रोहिणी नक्षत्र उत्तम तथा चित्रा, पुष्य, अश्विनीनक्षत्र मध्यम माने गए हैं।
रेवती नक्षत्र में यदि पीपल का बंदा शनिवार को स्त्री की कमर मेंबांधा जाए तो पुत्र योग बनता है।
प्रातः एक बेदाग नीबू लेकर उसका रस निकालकर उसमें नमकमिलाकर भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर के समक्ष रखें तथा रात्रि में भोग से पहले स्त्री को सेवन कराएं। यह उपाय भी पुत्रकारक हैपरंतु यह उपाय सिर्फ एक बार करें।
किसी भी शुक्लपक्ष में अभिमंत्रित 'संतानगोपाल यंत्र' के समक्षनिम्न मंत्र जाप करें तो अवश्य ही संतान होती है ॐ देवकी सुतगोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणंगतः '।
वास्तु दोष निवारण के द्वारा संतान उपाय
कई बार देखा जाता है कि कई लोग सिर्फ इस कारण से संतानसुख से वोचित रहे हैं कि उनके शयन कक्ष में वास्तुदोष था। जब उसवास्तुदोष का निवारण हो गया तो संतान भी हो गई। आप देखें किकहीं आपके शयनकक्ष में कोई दोष तो नहीं है। सर्वप्रथम आप यहजान लें कि किसी भी नवदम्पती को ईशान कोण में अपना शयन कक्षनहीं रखना चाहिए क्योंकि इस कोण में शयन कक्ष होने से संतान मेंविकलांग होने का योग निर्मित होता है। आपके कक्ष में यदि आधुनिकडबलबैड है तो यह आपके सम्बंधों के लिए बहुत अशुभ है। इसकेप्रभाव से आपके विचारों में मतभेद रहेंगे। इसलिए आप डबलबैड कागद्दा ऐसा रखें जिसमें कोई जोड़ न हो अर्थात वह एक ही हो। आपकेशयन कक्ष के आग्नेय कोण में आपका पलंग न हो। यह बहुत अशुभवास्तु है।
शयनकक्ष में आप अपनी राशि के अनुसार ही रंगों का चयन करें।ईशान कोण यदि खाली रहे तथा आपका पलंग आपकी राशि केअनुकूल दिशा में हो तो संतान सुख जल्दी प्राप्त होता है। आपके निवासव शयन कक्ष में यदि ईशान कोण में असंतुलन है तो आप इसकोअवश्य दूर करवाएं। यदि आपका शरीर अधिक जल तत्त्व से परिपूर्णहै तो आप अपने शयनकक्ष में आग्नेय कोण को अधिक शक्ति देंअर्थात इस कोण में सदैव लाल रंग का वल्ब जलता रहे। इससे आपकोदो लाभ मिलेंगे। प्रथम, आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और द्वितीय, आपअपने कर्मक्षेत्र में अधिक सफल रहेंगे।
पुत्र प्राप्ति के लिए
निम्नलिखित मंत्रों से अभिमंत्रित जल नित्य बंध्या को पिलावें, तोगर्भ दोषों की निवृत्ति होती है और स्त्री गर्भधारण करने की क्षमताप्राप्त करती है-
येन वेहद् लभूविध नाशयामसि तत् त्वत्।
इदं तदन्यन्न त्वदह दूरे नि दक्ष्मसि॥
आ ते यानि गर्भ एतु पुमान् बाणइवेषुधिम्।
आ दीरोउत्र जायतो पुत्रस्ते दशमाक्यः॥
पुमांसं पुत्र जनय तं पुमाननु जायतम्।
भवासि पुत्राणां माता जानानां जनयश्च यान्॥
यानि भद्राणि बीजन्यृषभा जनयन्ति च।
तैस्त्वं पुत्रविन्दस्व सा प्रसूर्धेनुका भव॥
कृणोमि ते प्राजापत्यमा योनि गर्भ एतु ते।विदस्व त्वं पुत्र नारि यस्तुभ्यं शशसच्चसु तश्मे त्वं भव॥यासां दयौष्पिता पृथथिवी नाता समुद्रो सूलं वीरधां वभूव।तास्त्वापुत्रविद्यायदैवी:प्रावन्त्वौषधयः॥अथर्ववेद-अध्याय 3/42
शमीमश्वत्था पुंसवनंकृतम्।
आरुढस्तत्रतद् वै पुत्रस्य वेदन तद् स्त्रीष्वा भरामसि॥
पुंसि वै रेतो, भवति तत् स्व्रियामनुषिच्यते।तद् वै पुत्रस्य वेदन तत् प्रजापतिरब्रबरीत्॥
प्रजापतिरसुमतिः स्त्रैयूषमन्यत्र
सिनीवाल्यदधत्चीक्लू
पुमांससु दधदिह॥
अथर्ववेद-अध्याय 6/11
वन्तासि यच्चसे हस्तावप
पन्।रक्षांसिमेधसि।
प्रजा धनं च गुहणानः परिहस्तो अभूययम्॥
परिहस्त वि धारय योर्नि गर्भाय घातवे।मर्यादेपुत्रमाधेहित्वमा गमयागमे॥
यपरिहस्तमनिरभरदिति:त्वष्टा तमस्या आ वध्नाद् तथा पुत्रं जनादिति॥
पुत्रकाम्या।
अथर्ववेद-अध्याय 6/81
संतान प्रदाता व्रत : श्रावण शुक्ला एकादशी
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन संतान की कामनासे नियमपूर्वक व्रत करने से दीर्घजीवी और सुंदर संतान की प्राप्ति होतीहै। व्रत करने के साथ ही निम्न कथा का पाठ करना चाहिए--धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा-हे केशव, आपकृपा करके श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के माहात्म्य कीकथा सुनाइए।
श्रीकृष्ण ने कहा-हे राजन! श्रावण शुक्ला एकादशी का व्रतकरने से पापों का नाश होकर पुत्र की प्राप्ति होती है। द्वापर युग केआदि में महिष्मती नगरी में महाजित नाम का राजा राज्य करता था।एक दिन उसने अपने समस्त मंत्रियों को एकत्रित कर उनसे अपने इसदुख की बात कही। मंत्री राजा के दुख को दूर करने के लिए वन मेंलोमश ऋषि के पास गए। मुनि को प्रणाम कर राजा के दुख की बातकह सुनाई। इस पर लोमश मुनि ने कहा-आपका राजा पहले जन्म
में कंगाल और कुकर्मी था। एक बार यह दो दिन का भूखा-प्यासाएक वन में पहुंचा। वहां उसने उस सरोवर में एक हॉल की ब्यायी गायको हटाकर पानी पिया।
हे मंत्रियो! उस दिन श्रावण के शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिनथा। उसी के कारण यह राजा पुत्रहीन हुआ और एकादशी के दिन व्रतरहने के कारण राजा हुआ। अब आप यदि अपने राजा को संतान-लाभकराना चाहते हैं, तो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशीका व्रत विधिपूर्वक आप सब करें और, रात्रि जागरण करें। उस व्रत केपुण्य का फल अपने राजा को संकल्प कर दें। इसके प्रभाव से राजाको पुत्र उत्पन्न होगा।
सब मंत्री राजा को सुखी बनाने के लिए ऋषि को प्रणाम कर वापसआए और पुत्रदा एकादशी का व्रत करके उसका फल राजा कोसंकल्प करके दे दिया।
परिणाम यह हुआ कि नौ मास के पश्चात रानी ने एक सुंदर पुत्रको जन्म दिया। राजा के समस्त दुख दूर हो गए।
श्री दुर्गा सप्तशती के प्रयोग द्वारा संतान प्राप्ति
सप्तशती के प्रत्येक श्लोक के आदि और अंत में काम-बीज क्लींको लगाकर 41 दिन तक पूरी सप्तशती का नित्य तीन बार पाठ करें।ऐसा करने से निश्चित रूप से संतान की प्राप्ति होती है।
निम्नांकित मंत्र दुर्गासप्तशती का है। इस मंत्र को पूरी आस्था केसाथ जप करने से विध्यवासिनी देवी का ध्यान करने से संतान की प्राप्तिअवश्य होती है-
नन्दगोप गृहे जाता यशोदा गर्भ सम्भवा।
ततस्तौ नाशयिस्यामि विन्ध्याचल निवासिनी॥
विध्यवासिनी माता का सविधि षोडशोपचार पूजन करके संकल्पके साथ इस मंत्र का जप करना चाहिए। बार-बार मंत्र जप करने सेवांछित संतान की प्राप्ति होती है।
संतान प्रदाता मंगलवार का व्रत प्रयोग
मंगल व्रत और प्रयोग : संतान गोपाल स्तोत्र की भांति मंगल व्रत
प्रयोग शीघ्र पुत्र प्रदान करता है। जब पति और पत्नी के जन्मांगों मेंमंगली दोष का साम्य अथवा संतुलन न हो, तो कई प्रकार की वेदना
सहन करनी पड़ती है। इनमें संततिहीनता अथवा पुत्र प्राप्ति का अभावभी एक है। ऐसी स्थिति में यह प्रयोग अमोघ सिद्ध हुआ है।अनेक ऐसे दम्पतियों को हमने मंगल व्रत प्रयोग और अनुष्ठान कापरामर्श दिया। इन दम्पतियों ने मंगल व्रत के पूर्व अनेक प्रयोग किएपरंतु सफलता प्राप्त न हुआ। मंगल ग्रह की बाधा विद्यमान थी। जबमंगल व्रत सम्बंधी व्रत और अनुष्ठान किया, तो 17, 20, 22 वर्ष सेसंतानहीनता के अभिशाप से कराह रहे दम्पतियों के घर में नन्हे शिशुकी किलकारियां गूंज उठीं।
उपरोक्त संदर्भित मंगल अनुष्ठान पूर्ण विधि से जो न कर पाए याइतना संस्कृत और पूजा-पद्धति का ज्ञान जिन्हें न हो, वह पूरा प्रयोगसंक्षिप्त रूप में करें। इसकी विधि यहां दी जा रही है।
मंगल व्रत की विधि : पुत्र-प्राप्ति की इच्छा वाली स्त्री को मंगलके दिन व्रत करना चाहिए। मार्गशीर्ष (अगहन) या वैशाख में इस व्रतको आरम्भ करें। मंगल के दिन सूर्योदय के समय उठकर हाथ-मुंहधो मौन होकर अपामार्ग की दातून से दांत साफ करें। स्नान करके लालवस्त्र पहनें। फिर लाल रंग के गंध, पुष्प एवं नैवेद्य लेकर पंचोपचारोंसे मंगलदेव का पूजन करें। तब निम्न स्तुति का पाठ करें-
धरणी-गर्भ-सम्भूतं, विद्युत-तेज-सम-प्रभम्।कुमार शक्ति-हस्तं च, मंगल प्रणामाम्यहम्॥ऋण-हर्तेनमस्तुभ्यं,दुःख-दारिद्रय-नाशिने।नभसिद्योत-मानाय,सर्व-कल्याण-कारिणे॥
दे व-दानव-गन्धर्व -यक्ष-राक्षस-पन्नगाः।
सुखं यान्ति यतस्तस्मै, नमो धरणि-सूनवे॥
यो वक्र-गतिमापन्नो, नृणां दुःखं प्रयच्दतिपूजितः सुख-सौभाग्यं, तस्मै क्ष्मा-सूनवे नमः॥प्रसादं कुरु मे नाथ, मंगल-प्रद मंगल।मेष-वाहन, रुद्रात्मन्, पुत्नान् देहि धर्न यशः॥इस प्रकार एक वर्ष तक मंगलदेव की स्तुति करे और समय-समयपर लाल वस्त्रादि वस्तुएं सुपात्र को दान देती रहें, तो वह स्त्री चिरंजीवीपुत्रों की माता होती है और धन तथा यश से भी सम्पन्न होती है।
बीजात्मक संतान गोपाल-मंत्र
संतान गोपाल मंत्र एवं स्तोत्र सविधि अनेक स्थलों पर वर्णित है परंतुजो व्यक्ति स्तोत्र का पाठ कर सकने में असमर्थ हों, वे किसी आचा्यद्वारा संतान-गोपाल मंत्र के एक लाख मंत्र जप का पुरश्चरण कराएं।इसके साथ स्वयं बीजात्मक संतान-गोपाल मंत्र का जप एक से ग्यारहमाला या इससे अधिक प्रतिदिन करें।
यह चौवन अक्षर युत मंत्र बहुत प्रभावी है। इसका चार लाख जपकरना अपेक्षित है। विधिवत् भगवान कृष्ण का पूजन करके निश्चितसंख्या में प्रतिदिन शुद्धतापूर्वक जप करें। जप सम्पन्न होने पर दशांशविधि से तर्पण, मार्जन, होम एवं विप्र भोजन कराएं। मंत्र इस प्रकारहै-
ॐ क्लीं श्रीं हीं जीं ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ देवकीसुत गोविन्दवासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरण गतः, ॐस्वः भुवः भूः ॐ जीं हीं श्रीं क्लीं ॐ।
अभिलाषाष्टक, द्वादशाक्षर, पार्थिवलिंगार्चन व रुद्राभिषेक,नवग्रहों के मंत्र, चिरंजीवी पुत्र प्राप्ति यंत्र, पुत्रदा एकादशी व्रतविधान, बालगोपाल अष्टाक्षर मंत्र एवं अनेक अन्य प्रयोग अत्यंतप्रभावी और बारम्बार सिद्ध प्रयोगों का विस्तार हमने अपनी इस विषयपर विस्तृत एवं प्रामाणिक रचना संतान सुख : सर्वांग चिंतन में कियाहै।
एकांती देवी का अनुष्ठान
ॐ हीं फे एकान्ती वेवतायै नमः।
इसकी जप संख्या दस हजार है। प्रसन्नबदना देवी की पूजा केपश्चात इसका जप करें। आसन लाल, पीला अथवा एवंत होना चाहिएइसमें गंध अर्पित करने का विशेष महत्त्व है। कोई स्त्री संतान के संदर्भमें औषधि सेवन कर रही हो, तब इस मंत्र का प्रभाव औषधि केपरिणाम को द्विगुणित कर देता है।
वसुपुत्राद श्रीकृष्ण मंत्र
विनियोग
अरुप श्रीवसुपुत्रदश्रीकृष्णमंत्रस्यनारदऋषिः, गायत्री छन्दः,श्रीकृष्णो देवता, वसुपुत्रप्राप्त्यर्थ जये विनियोगः।करन्यास
क्लां अंगुष्ठाभ्यां नमः, क्लीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, क्लूंमध्यमाभ्यां वषट्, क्लैं अनामिकाभ्यां हुं, क्लौं कनिष्ठिकाभ्यांवौषट्,क्ल: करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्।
अंगन्यास-
क्लां हृदयाय नमः, क्ली शिरसे स्वाहा, क्लूं शिखायै वषट् क्लैंकवचाय हुं, क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट्, क्लः अस्त्राय फट्।
ध्यान
बालंनीलमुदारकान्तिविभवं हस्ताम्बुजे दक्षिणे।विभ्राणं परिपक्वदौग्धकवलं नन्दात्मजं सुन्दरम्।वामे तददिदनजातमुद्धतरसंदध्युत्थपिण्डं शुभवैयाघ्रेण नखेन राजितगलं त्यक्तांशुक भावयेत्॥इस प्रकार ध्यान कर मानसोपचार से पूजन करें। तद्नंतर एकाग्रहोकर निम्न मंत्र का जप करें। इस मंत्र का पुरश्चरण एक लाख जपसे होता है। मंत्र इस प्रकार है-
ॐ क्लीं गोपाल वेषधराय वासुदेवाय हुं फट् स्वाहा।करें।पुरश्चरण के पूर्ण होने पर शर्करा-घृत के हवि से दशांश हवन
फिर सरोज (कमल) के मध्य में स्थित भगवान कृष्ण का पूजनकर उनके मुख में उक्त मंत्र से गोदुग्ध, शुद्ध पके हुए केलों, दहीं औरमक्खन से दशांश तर्पण करें।
इस प्रकार करने से एक वर्ष में ही संतान लाभ होता है।एक अन्य मंत्र-
ॐ नमो भगवते जगतप्रसूतये नमः।
इस मंत्र का तीन लाख जप अपेक्षित है।
गर्भपात से रक्षा हेतु मंत्र प्रयोग
अनेक बार गर्भगत विकारों के कारण संतानोपलब्धि में बाधा आतीहै। गर्भस्थापन नहीं होता अथवा गर्भपात हो जाता है। ऐसी स्थिति मेंअधोलिखित मंत्र का प्रयोग परम लाभप्रद है-
यद्येकवृषोअसि सृजारसोअसियदि द्विवृषोअसि सृजारसोअसियदि त्रिवृषोअसि सृजारसोअसियदि चतुर्वेषोअसि सृजारसोअसियदि पंचवृषोअसि सृजारसोअसियदि षड्वृषोअसि सृजारसोअसियदिसप्तवृषोअसि सृजारसोअसियद्यष्टवृषोअसि सृजारसोअसि
यदि नववृषोअसि सृजारसोअसि
यद्येकादशोअसि सोऽपोदकोअसि।
अपने इष्टदेव के चित्र के सम्मुख शुद्ध पात्र में जल भरकर रख ले।इष्टदेव की विधिवत पूजा करें। तत्पश्चात दूर्वा से जल के छींटे स्त्रीके शरीर पर दें। मंत्रों का उच्चारण करते रहें।
बालगोपाल मंत्र
इस मंत्र की जप संख्या एक लाख है। तत्पश्चात दशांश पद्धति सेहवनादि करना चाहिए। हवन देशी घी एवं मिश्री युक्त खीर से करनाउचित है। जप के समय नंद के आंगन में क्रीड़ा करते बालगोपाल काधयकररहतइसरह
बालवपुषे क्लीं कृष्णाय स्वाहा।
रामचरित मानस मंत्र
इसकी साधना रात्रि में दस बजे के पश्चात उचित है। सपरिवारभगवान श्रीराम का षोडशोपचार पूजन करें। अष्टांग हबन सामग्री से108 बार रक्षा रेखा मंत्र की आहुति दें-मामभिरक्षय
रघुकुलनायका
दें-
घृत बर चाप रुचिर कर सायक॥इसके पश्चात अंत में स्वाहा लगाकर इस दोहे. से 108 आहुतियां
प्रेम मगन कौसल्या निसदिन जात न जान।सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥
तदंतर सुविधानुसार कुशासन पर बैठकर इस दोहे का एक माला सेग्यारह माला तक जप करें। भगवान श्रीराम की कृपा से संतान प्राप्तिअवश्य होती है।
ऐहि विधि गर्भसहित सब नारी। भई हृदय हरषित सुख भारीजा दिन तें हरि गर्भहिं आय। सकल लोक सुख संपति छाय॥काकबन्धया नारी के लिए संतान प्राप्ति मंत्रॐनमो शक्ति रूपाय मम गृहेपुत्रं कुरु कुरु स्वाहा।
इस मंत्र का कम-से-कम 21 दिन तक अथवा पुनः धारण करनेकी अवधि तक 108 बार जप करें।
पुत्र प्रदाता चरण ब्यूह स्तोत्र
यदि पुत्रियों का जन्म ही बार-बार होता हो और इस दिशा मेंअनेक प्रयास विफल हो चुके हों, कि पुतरत्ल की प्राप्ति हो, तो चरणब्यूह, जो पुराणों में वर्णित है, निश्चित रूप से पुत्र संतति प्रदान करताहै। अनेक ऐसे दम्पती जो पुत्र की कामना से अत्यंत चिंतित और दुखीथे, उन्हें चरण ब्यूह स्तोत्र का पाठ करने के पश्चात पुत्र रत्त प्राप्तहुआ।
चरण ब्यूह स्तोत्र का पाठ पूजन स्थल या किसी पवित्र स्थान परपूर्व या उत्तर की ओर मुख करके प्रसन्न मन से आसन पर बैठकरकरना चाहिए। चरण ब्यूह स्तोत्र के पाठ से पूर्व विष्णु और लक्ष्मी कीप्रतिछाया चित्र का विधिवत् षोडशोपचार से पूजन करें। तत्पश्चात पुत्रप्राप्ति के लिए संकल्प लेकर चरण ब्यूह स्तोत्र का पाठ संतान गर्भस्थहोने से पूर्व करें। पति और पत्नी दोनों ही इस स्तोत्र का पाठ करें, तोसफलता शीघ्र प्राप्त होती है। इस प्रयोग को विधिवत् करने से विद्वान,योग्य, स्वस्थ, दीर्घजीवी, आदर्श, आज्ञाकारी, उत्साही, निर्भीक,आकर्षक, श्रेष्ठ गुण सम्पन्न, तेजस्वी, पराक्रमी, धर्म ध्वज, जातिकुलरक्षक, पौरुषवान और वंश वृद्धि करने वाला सुपुत्र अवश्य प्राप्त होताहै।
श्री चरण ब्यूह स्तोत्र
॥ श्री गणेशाय नमः॥
हरि ॐ॥ अथातश्चरण-ब्यूहं व्याख्यास्यामः।तत्र यदुक्तं चातुर्वेद्यं चत्वारो वेदा विज्ञाता भवन्ति॥तत्र ऋग्वेदो यजुर्वेदः समावेदोऽथर्वदश्चेति।ऋग्वेद खंड :
तत्र ऋग्वेदस्पाष्टो स्थानानि भवन्ति(तस्मात् ब्रह्मयज्ञार्थे पारायणार्थे च ऋग्वेदस्याध्ययनंकर्तव्यम्)
1 चर्चा, 2 श्रावकः, 3 चर्च्चकः, 4 श्रवणीयपारः, 5क्रमपारः, 6 क्रमपदः, 7 क्रमजटः, 8 क्रमदण्डश्चेतिचतुष्पारायणम् 6 एतेषां शाखाः पंचविद्याः पंचविद्याः भवन्ति 7आश्वलायनी,शांखायनी,शाकला,| बाष्कला,माण्डुकायनोश्चेति 8 तेषामध्ययनं १ अध्यायाश्च चतुः
षष्ठिर्मंडलानी दशेवतु 10 (अथ पारायणेवर्ग संख्योच्यते)एकर्च एक वर्गश्च एकर्च नवकस्तथा।
द्वौ वर्गोक्तो त्रध्वौ ज्ञेयो, ऋकतयश्च शतं स्मृतं॥वर्गाणांपरिसंख्यांत द्वि सहस्त्रे षडुस्तरे।सहस्त्रमेक सूक्तानां निर्विशंक विकल्पितम्॥दशसप्त सपठ्यंते संख्यांत वे पदक्रमम्॥ऋचांदश सहस्त्रणि, ऋचां पंच शतानि च।ऋचामशीति पादश्चेतत्पारायणमुच्यते॥
नारियल द्वारा पुत्र प्राप्ति का मंत्र
ऐं नमः ॐ नमो भगवती पद्मे हीं क्लीं ब्लू त्रिट-त्रिट(अमुक) स्त्री अपत्य हिनाय अपत्य गुण क्षय, सर्वावयव संयुतशोभन सुंदर दीर्घायु पुत्रं देही-देही, मा विलम्बय-विलम्बय, रांहीं श्री पद्मावतीं मम कार्य कुरु-कुरु स्वाहा ठः ठः ठः स्वाहा।इस मंत्र को एक सौ आठ बार नारियल पर जपें। तत्पश्चातअभिमंत्रित नारियल ऋतु धर्म के पश्चात शुद्ध होने पर स्त्री कोखिलाएं, पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा। यह अनुभूत सत्य है।
संतान प्राप्ति के विशिष्ट तंत्र प्रयोग
जो स्त्री गर्भ धारण करने के योग्य हो परंतु गर्भ नहीं ठहरताहो, सब प्रकार की चिकित्सा करवा लेने पर भी लाभ न हो, तोकृपया ये उपाय काम में लें, ईश्वर ने चाहा, तो अवश्य लाभहोगा-
७ रविवार को सुगंधरा की जड़ या एकवर्णा गौ के दूध के साथ पीसकर ऋतुकाल में पीने से तथा साठी का भात एवं मूंग की दाल पथ्य खाने से वंध्या दोष विनष्ट होता है।
७ ओषधि सेवन के समय स्त्री को किसी प्रकार की चिंता या शोक अथवा भय, अधिक परिश्रम, दिन में सोना, गर्म वस्तुओं का भोजन, अधिक धूप या अधिक ठंड इन सबसे बचना चाहिए। ऐसे पशथ्य से हो हुए पति के साथ सहवास करने से वंध्या अवश्य गर्भवती होती l
७ रजोधर्म शुद्धि के पश्चात काली अपराजिता की जड़ को बछड़ा वाली नवीन गो के दूध में तीन दिन पीने से वंध्या गर्भवती होती है।
७ पूर्व ब्यायी हुई गाय, जिसके साथ बछड़ा हो ऐसे गो के दूध के साथ नागकेसर का चूर्ण सात दिन तक पीने से तथा घी-दूध के साथ भोजन करने से वंध्या स्त्री पुत्रवती होती है।
७ नीबू के पुराने वृक्ष की जड़ को दूध में पीसकर घी मिलाकर पीने से पति प्रसंग द्वारा स्त्री को दीर्घजीबी पुत्र प्राप्त होता है।
मृतबत्सा तंत्र ' जन्म लेने के पश्चात जिस स्त्री का पुत्र मर जाता है, उसे मृतवत्सा
कहते हैं। जिस रविवार को कृतिका नक्षत्र हो, उस दिन पीत पुष्पा नाम कौ जड़ी को जड़ सहित लाएं, उसे पानी में सात दिन पर्यत पीसकर पिवें, तो पुत्र न मरे।
त्राटक प्रयोग
हमारे अनुभव में त्राटक प्रयोग संतान प्राप्ति के अन्य उपाय करने के पश्चात जिस दिन गर्भ धारण करना हो, गर्भाधान संस्कार करने से पूर्व करना चाहिए। श्रीकृष्ण भगवान के बालरूप का एक चित्र रखकर उसके सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें। रात्रि में समागम से पूर्व स्नान करके पत्नी को कृष्ण भगवान के इसी बालस्वरूप के सामने आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाना चाहिए।
तत्पश्चात श्रीकृष्ण का विधिवत् षोडशोपचापर पूजन करें, जिसमें नैवेद्य के स्थान पर अपने हाथ से निकाला हुआ शुद्ध मक्खन तथा मिश्री प्रयोग करें। पुत्र की कामना से दीपक को एकटक अपलक नेत्रों से पर्याप्त समय तक निहारते रहें। तत्पश्चात नेत्र बंद करने के पश्चात भी दीपक की लो नेत्रों में प्रज्बलित प्रतीत होगी। जब लौ की छवि नेत्रों में धूमिल पड़ने लगे, तो नेत्र खोलकर पुनः श्री कृष्ण भगवान के चित्र पर एकटक अपलक ननेत्रों से देखें। कुछ समय तक देखने के पश्चात पुनः नेत्र बंद कर लें। नेत्र बंद करने के पश्चात भी श्रीकृष्ण की छवि नेत्रों में निर्मित रहेगी। जब चित्र धूमिल होने लगे तो पुन; नेत्र :खोलकर दीपक की ओर उसी प्रकार से देखें। यह क्रम 7 बार या 11 बार दोहराएं। इसके पश्चात् गर्भाधान संस्कार, जैसा कि ऊपर वर्णित है, करने के पश्चात् संतान की कामना से पति-पत्नी का मिलन होना चाहिए। त्राटक प्रयोग की यह संक्षिप्त विधि है। संतान प्राप्ति के लिए इतना ही पर्याप्त है। यह प्रयोग अनेक दुर्लभ फल प्रदान करने वाला होता है और अनेक अभिलाषाओं की पूर्ति होती है।
पार्थिव लिगार्चन तथा रुद्राभिषेक
चावल के 1100 शिवलिंग बनाकर यह प्रयोग किया जाता है। यह ग्रयोग किसी अनुभवी, विद्वान आचार्य द्वारा ही सम्पन्न कराना चाहिए, जिसे रुद्राभिषेक का सम्यक् ज्ञान हो। हमने कई अवसरों पर जहां पुत्रियों का जार-बार जन्म हो रहा था, वहां यह प्रयोग कराया तथा पुत्र जन्म डुआ। |
उपरोक्त प्रयोगों के अतिरिक्त जन्न्मांग में भलीभांति यह निरीक्षण करना चाडिए कि किस शाप के कारण संतानहीनता की खेदना सहन करनी पड रही है। प्रत्येक शाप से मुक्ति के लिए सम्बंधित ग्रहों तथा 'उस शाप से मुक्ति के मंत्र का प्रयोग विधिवत् किया जाना चाहिए ।
विवाह एवं संतान प्राप्लि हेतु माता-पिता, पुत्री-पुत्र के विखाह के कारण चिंतित हो जाते हैं। योग्य संतान होने पर भी विवाह में अवरोध उत्पन्न होते हैं। माता पिता में किसी एक को उपाय करना चाहिए। यदि विवाह को कई वर्ष हो गए ओर संतान उत्पन्न करने की क्षमता भी है, फिर भी संतान नहीं हो रही है, वे व्यक्ति भी यह जाप कर सकते हैं-
स देवी नित्यं परितप्यमान: , व्यामेव सीतेत्यभिभाषमाण:।
दृढ़व्रतो राजसुतो महात्मा, तवैव लाभाय कृतप्रयल:॥
प्रात: स्नान करके 108 बार निरंतर 45 दिन तक इस मंत्र का जाप करने से लाभ मिल सकता है। किसी देवी का चित्र लगा लें। चित्र पर पुष्प चढ़ाएं तथा दीप या अगरबत्ती भी मंत्र जाप की अवधि में जलती रहनी चाहिए।
मनचाही व गुणवान संतान की प्राप्ति
प्रत्येक दंपति चाहता है कि उसकी कम-से-कम एक संतान अवश्य हो।परंतु अनेक इलाज और चिकित्सकीय सुविध के बावजूद निराशा ही हाथलगती है। ऐसे निराश दंपतियों के लिए टोने-टोटकों के साथ ही दर्जनोंऔषधियां भी यहां दी जा रही हैं। इनमें से अधिकांश औषधियों का चयनप्राचीन ग्रंथों से किया गया है और वैद्य एवं प्रयोग्कर्ता इन्हें पूर्ण सफल औरअनुभव सिद्ध भी मानते हैं।
संतान प्राप्ति हेतु दस सुगम यंत्र
इन दस मंत्रों में से किसी भी एक मंत्र का चयत्न करके सुबह, दोपहरऔर शाम एक-एक माला जप करें। गर्भ धारण होने के बाद भी प्रसव होनेतक उसी मंत्र का जप करती रहें, ऐसा करने से स्वस्थ एवं सुंदर संतानउत्पन्न होगी।
ॐँं गोदाय नमो नमःॐँ संतानाय नमःॐ० संतानाय नमो नमः
ॐं० हरये नमः
ॐं स्वाश्य नमः
ॐ० विचाराय नमो नमः
ॐ शिशुया नमः
ॐ कांति नमः नमः
ॐ० सुखाय नमो नमः
ॐ शुभम् नमः नमः
संतान-प्राप्ति हेतु तांत्रिक मंत्रॐ हीं श्री क्लीं हीं आसिआउसा चुलु हुलु हुलु मुलु मुलु इच्छिय मे कुर कुरूस्वाहा।
जब भी यह मंत्र जपने बैठें तो धूप-दीप-अगरबत्ती जला लें और यह मंत्र 24 हजार फूलों पर एक मंत्र एक फूल पर जपें। इस प्रकार जप करनेपर निःसंदेह साधक को संतान की प्राप्ति होती है।
संतान-प्राप्ति हेतु तांत्रिक यंत्र
जो स्त्री डॉक्टर तथा वैद्य, हकीमों व ओझा-गुनियों से संतान प्राप्ति हेतुचिकित्सा कराकर निराश हो चुकी हो, उस स्त्री को निम्न त्रिपुर सुंदरी यंत्रका निश्चय ही एक बार अनुभव प्राप्त करना चाहिए।
मंगलवार या शुक्रवार के दिन की चतुर्थी तिथि में इसे ताम्रपत्र परखुदवाकर प्रातः स्नान कर इस यंत्र को भी पंचामृत में स्नान कराना चाहिए।फिर सोलह बार श्री सूक्त का पाठ करना तथा खीर का भोग लगानाचाहिए। इसके बाद पूर्ण श्रद्धा के साथ ऋतुकाल को छोड़कर प्रतिदिननियम से ‘श्री’ का एक हजार बार जप करना चाहिए। इससे निश्चय हीबांझ स्त्री को संतान प्राप्ति होकर मनोकामना पूर्ण होती है। यदि कन्या के बाद पुत्र की कामना हो, तो ये प्रयोग करें-उत्पन्न हुईकल्या का विधिवत् पूजन करें। उसे नमस्कार करें और बंधु-बांधवों कोखीर एवं जलेबी का भोजन कराएं। ऐसा करने से भविष्य मैं पुत्र अवश्यहोता है।
जिस स्त्री के पहली संतान लड़़का हो, उस लड़के की नाल जो निःसंतानस्त्री खोलती है, वह अवश्य ही पुत्र-रत्न से विभूषित होगी।
पीपल का वृक्ष जिस श्मी के वृक्ष के ऊपर उग रहा हो, उस वृक्ष के नीचेजाकर पति-पत्नी दोनों अपनी मनोकामना प्रकट करते हुए वृक्ष कास्पर्श व प्रणाम कर यह संकल्प करें कि ‘गर्भाधान होने तथा पुंसवन के पश्चात् जब पुत्र-र्न की प्राप्ति होगी, तब ‘मुंडन-संस्कार' यहीं परआक की छाया में बैठकर कराएंगे। इस टोटके को करने से वंध्या स्त्रीभी पुत्र-रत्न को प्राप्त कर लेती है।
पुष्य नक्षत्र में असगंध की जड़ को उखाड़कर गाय के दूध के साथ सिलपर पीसकर पीने से दूध का आहार, ऋतुकाल के उपरांत शुद्ध होने परपीते रहने से, स्त्री की पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा अवश्य पूर्ण हो जातीहै।
पलास (ढाक) के पांच कोमल पत्ते किसी स्त्री के दूध में पीसेंऔर जो वंध्या (बांझ) स्त्री मासिक धर्म के चौथे दिन स्नान करके उसेखा लेगी, वह निश्चय ही पुत्र की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त करतीहै।
संतानहीन स्त्री ऋतुधर्म से पूर्व, अपने उदर की शुद्धि कर लेने केपश्चात् गूलर के बांदा को बकरी के दूध के साथ सिल पर पीसे औरमासिक धर्म की शुद्धि के पश्चात् पान करे, तो उसे पुत्र की अवश्यप्राप्ति होगी।
कबूतर की विष्ठा एवं सुहागा दोनों को पीस लें। इस चूर्ण को यदिगुप्तांग पर लेप करके रति-क्रिया की जाए तो निश्चय ही पुत्र उत्पन्नहोगा।
संतान प्राप्ति हेतु विशिष्ट जल
उपरोक्त मंत्र जप के साथ ही यह प्रयोग करने पर निश्चित रूप सेसंतान की प्राप्ति होती है। यह प्रयोग लगातार चालीस दिन तक कियाजाता है, परंतु ऋतुकाल के पांच दिन न किए जाने के कारण पैंतालिस दिनोंमें पूर्ण होता है। सामान्य सफेद कागज पर पानी में केसर अथवा हल्दी घोलकर लकड़ीकी कलम से सायंकाल यह यंत्र लिखें। धूप-दीप से यंत्र की पूजा करने केबाद रात भर पूजा के आले में रखा रहने दें। सुबह स्नान-ध्यान के बादयंत्र को एक कटौरी में रखकर पर्याप्त पानी डाल दें और जब यह धुल जाएतब कागज से सम्पूर्ण घोल हटाकर उस पानी को पी लें और कागज को
फैंक दें। यदि इस बीच गर्भधारण हो जाए, तब भी चालीस दिन तकअनुष्ठान पूरा करें।
पुत्र प्राप्ति हेतु चमत्कारी उपाय
ॐ नमो भगवते देवाय।
देवकी सुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गता।।
जिस स्त्री को कोई संतान न हो। उसे रविवार के दिन सर्पाक्षि केफूल-पत्तों से युक्त डाली लाकर एक वर्ण की गाय के दूध में कुमारी कन्याके हाथ से पिसवाकर एकसार कर लें। फिर ऋतुमति होने पर चौथे से छठेदिन तक प्रतिदिन एक-एक तोला की मात्रा में इसका सेवन करें। इसकेसेवन से पूर्व स्त्री को उपरोक्त मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
संतान शुख प्राप्त करने के टोटके
शास्त्ों में विवाह के तीन मुख्य उदूदेश्य बताए गए हैंपहला वंशबुद्धि, दूसरा पितु ऋण से मुक्ति और तीसरा स्वर्गादि लोकों की प्राप्तिएवमोक्ष।
इन तीन उदुदेश्यों में प्रमुख वंश बृद्धि है अर्धात संतान की प्राप्ति। इसीकारण विवाह के पश्चात प्रत्येक दंपति संतान प्राप्ति के लिए लालायितरहते हैं, लेकिन स्ती या पुरुष की शारीरिक त्रुटि, पूर्व जन्मों के पाप तथाअन्य कारणवश कुछ लोगों को संतान सुख नहीं मिलता। कई बार यदिसंतान हो भी जाती है तो वह असमय मर जाती है। इन सभी समस्याओंका निराकरण कभी-कभी डाक्टर या वैद्य भी नहीं कर पाते। ऐसे में आपनिम्नवत टोने-टोटके अपनाकर संतान सुख प्राप्त करने में सफल होसकते हैं। इस अध्याय में प्रस्तुत टोने-टोटके अत्यंत प्रभावी और अद्भुतहैं। इनसे किसी भी प्रकार की कोई हानि नहीं होती। ये टोने-टोटकेनिम्नवत हैं-
संतान सुख प्राप्त करने के लिए कामिया सिंदूर का तिलक लगाएंतथा हनुमानजी के मंदिर में तांबे का दान करें।संतान सुख पाने के लिए गेहूं के आटे की गोलियां बनाकरउसमें चने की दाल और थोड़ी हल्दी मिलाकर गाय कोखिलाएं।
यदि संतान पक्ष से सदैव चिंताएं बनी रहती हों तो बागवानी करेंतथा नए पौधे रोपकर उनकी देखभाल करें।
पीली कौड़ी को कमर में बांधने से नि:संतान स्त्री की गोद भरजाती है।
बरगद के पत्ते पर कुंकुम द्वारा स्वास्तिक का निर्माण करके उस परचावल एवं सुपारी रखकर किसी मंदिर में चढ़ा दें। संतान सुख प्रप्तहोगा।
कागजी नीबू के वृक्ष की जड़ पीसकर चावल के पानी के साथ स्त्रीको पिलाने से पुत्र के स्थान पर पुत्री होती है।
यदि आप संतान चाहते हैं तो बांस के अंकुर से शिवलिंग बनाकरउसकी पूजा करें। कुछ ही समय में आपको संतान अवश्य प्राप्तहोगी।
घर से बाहर निकलकर काली गाय के सिर पर हाथ फेरें। आपकोसंतान का सुख अवश्य प्राप्त होगा।
स्त्रियों द्वारा प्रतिदिन नियमित रूप से पीपल के वृक्ष की परिक्रमाकरने और दीपक जलाने से उन्हें संतान अवश्य प्राप्त होती है।
स्त्री द्वारा सदैव अपने पास चांदी का एक चौकोर टुकड़ा रखने तथानागपंचमी के दिन उसे जंगल में गाड़ने से संतान का सुख अवश्यमिलता है।
पति-पत्नी एक माह तक भोजन के पश्चात पीली वस्तु का भक्षणकरें। दूसरे माह में एकाध बार पीला वस्त्र अवश्य पहनें। तीसरे माहमें श्रद्धानुसार पीली वस्तु और कुछ धन का दान करें। संतान कीप्राप्ति अवश्य होगी।
पुराना गुड़ रसायनरहित भूमि में दबाने से संतान सुख प्राप्त होता है।यदि संतान को कष्ट हो रहा हो तो भी उपरोक्त टोटका करने सेअनुकूलता मिलती है।
संतान सुख प्राप्त करने के लिए भिखारियों को गुड़ का दान करें।अगर संतान होते ही मर जाती हो तो गर्भवती होने के दिन से स्त्रीअपने बाजू पर चमकीला लाल धागा बांधें। बच्चे के जन्म केपश्चात यह धागा बच्चे के बाजू पर बांधकर बच्चे की माता कीबांह पर चमकीला पीला धागा बांध दें।
यदि किसी परिवार में पंचकों में कन्या का जन्म हो तो उस घर में एक के बाद एक लगातार 5 कन्याएं पैदा होती हैं। इस दोष केनिवारण के लिए कन्याओं की 5 पुतलियां बनाकर उन्हें उत्पन्न हुईकन्या के साथ झूला झुलाएं। साथ ही साथ कन्या की तरह उनपुतलियों का भी कोई न कोई नाम अवश्य रखें। कुछ दिनों बाद उनपुतलियों को पीपल की जड़ में गाड़ दें। ऐसा करने से पंचकों कादोष समाप्त होकर पुत्र उत्पन्न होता है।
पूर्वा फाल्ुनी नक्षत्र में आम की जड़ लाकर उसे दूध मेंघिसकर पिलाने से बांझ स्त्री को भी संतान की प्राप्ति हो जातीहै।
उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीम की जड़ लाकर सदैव अपने पास रखनेसे मनुष्य को संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है।
नीबू की जड़ को दूध में पीसकर उसमें शुद्ध देशी घी मिला लें।इसके सेवन से निश्चय ही पुत्र की प्राप्ति होती है।
पहली बार ब्याही गाय के दूध के साथ नागकेसर का चूर्णनिरंतर 7 दिनों तक खाने से गर्भ ठहरकर पुत्र उत्पन्न होताहै।
रविवार को पुष्य नक्षत्र में आक की जड़ड़ लाकर बंध्या स्त्री कीकमर में बांधने से उसे संतान सुख अवश्य मिलता है।
जिस स्त्री को संतान न होती हो, वह किसी स्त्री की प्रथम संतान(पुत्र) की नाल सुखा पीसकर गुड़ के साथ सेवन करे अथवाताबीज में भरवाकर बाई भुजा में बांध ले। इस टोटके से वह निश्चयही संतानवती हो जाएगी।
रविवार को विधिपूर्वक सुगंधरा की जड़ लाकर गाय के दूध केसाथ पीसकर खाने से स्त्री को संतान अवश्य होती है।
सवि का भात एवं मूंग की दाल खाने से स्त्री के बंध्या दोष नष्ट होजाते हैं तथा श्रेष्ठ संतान का सुख प्राप्त होता है।
रोहिणी नक्षत्र में सफेद घुंघची का पौधा लाकर कोई स्त्री उसकारोपण करे। जब पौधा बड़ा हो जाए तब वह स्त्री मासिक धर्म से
शुद्ध होकर उस पौधे की 3 माशा जड़ को ताजा जल में घिसकरपी जाए तथा पति के साथ सहवास करे। इस टोटके से उसे अवश्यही पुत्र संतान का सुख प्राप्त होता है।
संतान सुख प्राप्त करने के टोटके
यदि संतान में बाधा उत्पन्न करने वाला ग्रह सूर्य है तो जातक नेपहले (अर्थात पूर्व जन्म एवं इस जन्म में भी) भगवान शिव काअनादर किया है अथवा पितरों के श्राप के कारण जातक को संतानसुख नहीं है। अतः संतान प्राप्ति हेतु सूर्य के मंत्रों का कम-से-कमएक लाख बार जप करें। तांबा, गेंहूं का दान करें। घर का मुख्य द्वारपूर्व दिशा में रखें। तांबे या सोने की अंगूठी में माणिक (कम-से-कमसात रत्ती) प्राण-प्रतिष्ठा करके पहनें। तांबे के दो टुकड़े करके एकटुकड़ा बहते पानी में बहा दें और दूसरा टुकड़ा आजीवन संभालकररख लें। यदि टुकड़ा चोरी हो जाए या खो जाए तो पुनः तांबे काटुकड़ा पास में रखें। दूसरी बार पानी में न बहाएं। नदी, नाले(जिसका पानी बहता हो) में गुड़, तांबा या तांबे के सिक्के बहाएंऔर प्रत्येक कार्य गुड़ (मीठा) खाकर एवं जल पीकर किया करें।सूर्य को मीठे पानी का अर्ध्य दें। प्रतिदिन पिता एवं दादा के चरणछूकर आशीर्वाद लें।
यदि संतान में रुकावट करने वाला ग्रह चंद्रमा हो तो माता, मौसी,सास (पत्नी की माता) गुरु पत्नी या अन्य किसी सधवा स्त्री के चित्तको दुःख पहुंचाने के कारण जातक को संतान सुख नहीं है। अतःचंद्रमा के वेदोक्त मंत्रों का (एक लाख इक्कीस हजार) जप करें।चंद्रमा सम्बंधी वस्तुओं चावल, दूध, चांदी का दान करें। दूसरों केचरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें। दूध या पानी से भरा बर्तन शामको अपने सिरहाने रखकर सोएं और अगले दिन बबूल (कीकर) कीजड़ में सारा पानी डाल दें। शिव उपासना, रुद्राभिषेक करें। सोमवारका व्रत करें। माता, सास, नानी, मौसी, दादी का आशीर्वाद लें। पलंगके पायों में चांदी की कील ठोकें। पूर्णिमा को गंगा स्नान करने के बादउंगली में चांदी की अंगूठी में सबसे बड़ा मोती (कम-से-कम सातरत्ती को) पहनें। चावल, दूध एवं पानी या दो मोती या चांदी केचौकोर दो टुकड़े लेकर एक मोती या चांदी का टुकड़ा बहते पानी में बहा दें तथा दूसरा टुकड़ा अपने पास आजीवन संभालकर रखें।यदि संतान प्रतिबंधक ग्रह मंगल हो तो भगवान कार्तिकेय, भाई-बंधुअथवा शत्रु के श्राप के कारण जातक को संतान सुख नहीं मिलाहै। ऐसे में मंगल के मंत्रों का अड़तालीस हजार बार जप केसाथ-साथ हनुमान के पंचमुखी कवच का ग्यारह हजार बार जपकरें। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण एवं गायत्री मंत्र का जप करें।नेत्रों में सफेद सुरमा लगाएं, तांबे में मूंगा (नौ रत्ती का लेकर) अंगूठीबनाकर धारण करें। तंदूर में लगी मीठी रोटी बांटें। बहते पानी मेंरेवड़ियां, बताशे, शहद एवं सिंदूर डालें। मसूर, मिठाई अथवा मीटेभोजन का दान करें। मंगलवार का व्रत रखें और हनुमानजी को सिंदूरका चोला चढाएं।
यदि संतान अवरोधक ग्रह बुध है तो समझिए कि कम उम्र कीबालक-बालिकाओं के श्राप से, बिल्ली को मारने के कारण, मछलियोंतथा अन्य प्राणियों के अंडों को नष्ट करने के कारण, भगवान विष्णुएवं दुर्गा माता के अनादर के कारण संतान नहीं हो रही है। ऐसे मेंबुध के मंत्रों का अड़सठ हजार बार जप करें। बुध से सम्बंधितवस्तुओं का दान करें, महाविष्णु का यज्ञ करें तथा कांस्य पात्र कोदूध से भरकर दान करें। बुधवार का व्रत करें। सात रत्ती का पन्ना,हरा ऑनेक्स (तुरमुली) को कनिष्ठिका उंगली में धारण करें। अपनेभोजन में से एक टुकड़ा गाय को, एक कुत्ते को तथा एक कौए कोखाने को दें।
यदि संतान अवरोधक ग्रह गुरु हो तो ऐसे व्यक्ति ने इस जन्म में यापूर्व जन्म में फलदार वृक्षों को कटवाया है तथा गुरु, कुल देवता,आदरणीय व्यक्ति, अपने परिवार के बुजुगों एवं माता-पिता का भीअनादर किया है, जिसके कारण जातक को संतान सुख प्राप्त नहींहोता। इसके निवारण हेतु बृहस्पति के मंत्रों का कम-से-कम एकलाख बार जप कर लें। गुरु सम्बंधित वस्तुओं का दान करते हुए वृद्धलोगों, ब्राह्मणों, पीपल के पेड़ की सेवा करें और गुरुवार को वृत्त करें।
पुखराज सात रत्ती का सोने या चांदी की अंगूठी में पहनें। पीले फूलोंवाले पौधे एवं वृक्ष लगाएं।
यदि शुक्र के कारण संतान न हो रही हो तो ऐसे जातक ने सुगंधितपुष्पों के पेड़-पौधे, लताओं एवं फल-पुष्पों से युक्त वृक्षों को कटवायाहै। गौ माता के प्रति पाप किया है। साधवी स्त्री, पत्नी, प्रेमिका काश्राप, गर्भपात, बलात्कार का दोष या यक्षिणी का श्रापः है। शुक्रसम्बंधित वस्तुओं का दान करते हुए शुक्रवार का व्रत रखें तथा गायकी सेवा करें। भोजन के कुछ टुकड़़े गाय को खिला दें, कुछ टुकड़ेकौए को तथा दो टुकड़े कुत्ते को खिला दें। सफेद जिरकन, हीरा,स्फटिक, सफेद पुखराज को मध्यमा उंगली में धारण करें। गौदानकरें। ज्चार एवं हरा चारा गायों को खिलाएं। लक्ष्मी उपासना करें।सफेद एवं स्वच्छ कपड़े धारण करें। सुगंधित पदार्थों, इत्रों का प्रयोगकरें।
यदि संतान अवरोधक ग्रह शनि हो तो समझिए कि जातक ने पीपलके वृक्ष कटवाए हैं। मरते समय किसी की आत्मा को दुःख दिया,निर्धन गरीब की हाय लगी, पिशाच, प्रेत एवं मृतात्मा के दोष सेजातक को संतान का सुख नहीं है। पीपल के वृक्ष की सेवा, ब्राह्मणोंकी सेवा, शिव-पार्वती की पूजा (पीपल के पेड़ के नीचे हो तो अतिउत्तम है) करें एवं केले के पेड़ को पानी दें। शनि सम्बंधी वस्तुओं कादान करें और शनिवार का व्रत रखें। महामृत्युंजय मंत्र का जप एवंरुद्राभिषेक कर हवन करें, बबूल की दातून करें। हनुमान उपासनाएवं बजरंग बाण का पाठ करें। तैंतालिस दिन तक कौओं को रोटीडालें तथा अपने भोजन से गाय, कुता, एवं कौए को एक-एक टुकड़ाडालें। शनिवार को तेल में अपनी छाया देखकर तेल का दान करें।बड़े-बुजुगों का मान-सम्मान करें। लोहा या काले उड़द का दान करें।यदि राहु के कारण संतान बाधा हो रही हो, तो सर्प के श्राप से ऐसाहुआ है। इसके निवारण हेतु राहु के मंत्रों का बहत्तर हजार बार जपकरें तथा दो लाख बार गायत्री (सरस्वती) मंत्रों का जप करें। सर्दी में गरीबों को कंबल दान करें, बुधवार का ब्रत रखें, पराई कन्या कीशादी या कन्यादान करें।
संयुक्त परिवार में रहें। ससुराल से सम्बंध न बिगाड़़े तथा सिर परचोटी रखें। जौ या अनाज को बड़े स्थान पर बोझ के नीचे दबाएं याजौ दूध से धोकर बहते पानी में बहाएं। सरसों, मूली एवं नील कादान करें। गोमेद (आठ रत्ती) की अंगूठी बनाकर पहनें। मसूर कीदाल एवं पैसे सफाई कर्मचारी को दें।
यदि केतु के कारण संतान बाधा हो तो ऐसे में ब्राह्मणों के श्राप एवंअपमान के कारण ऐसा योग बना है। केतु का तैंतीस हजार बार जापकरते हुए गणेश जी के मंत्रों का दो लाख बार जप करें। ब्राह्मणों कोसम्मान देकर प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर संतुष्ट करें। कपिला गायका दान करें, गणेश चतुर्थी का व्रत करें।
कुत्ता पालें और कान छिदवाएं। कुत्ते को रोटी खिलाएं, नौ वर्ष से कमके बच्चों को खट्टी वस्तुएं खाने को दें तथा काले एवं सफेद तिलबहते पानी में बहाएं। तिल, नीबू एवं केले का दान करें। चरित्र ठीकरखें तथा पाप कर्मों से बचें।
संतान प्राप्ति
अशोक एवं करवीर के पत्रों द्वारा हवन से संतान सुख मिलता है।
स्वस्थ संतान के लिए
जाना।संतान का बिल्कुल न होना और होकर मर जाना या फिर गर्भपात हो
अगर यह सब स्थितियां न हों और संतान हो भी जाए औरवह विकलांग यानी अपंग हो तो मां-बाप के सिर पर दुखों का पहाड़ टूटपड़ता है। यहां मैं सुंदर और स्वस्थ संतान उत्पन्न करने का अनुभूत टोटकालिख रहा हूं। यह मैंने कई स्थानों पर प्रयोग किया है और यह काफी सफलरहा है।
पत्नी शुक्रवार के दिन चने की दो रोटी बनाए, उन पर भली-भांति धी लगाएऔर उस पर कोई भी सूखी सब्जी इस प्रकार रखे कि वह दो फुलकों केमध्य रहे। इसके बाद पति-पत्नी दोनों बाजार में जाकर इसे किसी भी भूखेको अपने सामने खिला दें। उसे यथायोग्य दक्षिणा भी दें और वापस चलेआएं।
सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री कपूर का एक टुकड़ा ले, उसमें से आथाअपने सामने रखकर जला दे और बाकी आधा शिव के मंदिर में चढ़ा दे।ऐसा करने से संतान सुंदर और स्वस्थ उत्पन्न होती है।
शीघ्र संतान प्राप्ति हेतु
अगर विवाह को काफी समय हो गया है और पति-पत्नी शारीरिक दृष्टिसे बिल्कुल स्वस्थ हैं तो यह प्रयोग करें। शीघ्र संतान प्राप्त होगी।
रविवार के दिन गुंजा की टहनी काट लें। मंगलवार तक निम्न मंत्र कानियमित जप करें। मंगलवार को इस टहनी को किसी तांबे के यंत्र में भर लें।गंगा जल से स्नान कराएं और हनुमानजी के चरणों का स्पर्श कराएं।इसके बाद इस यंत्र को गले या हाथ पर बांध लें। शीघ्र ही उद्देश्य की प्राप्तिहोगी।
मंत्र इस प्रकार है-‘हिमवत्युत्तरे पार्श्वे शर्वरीनाम यक्षिणी।
यस्य नुपुरशब्देन विशाल्य गर्भिणी भवेत् ।।
इसी प्रकार मदार (आक) को बृहस्पतिवार को लाकर कमर में बांधने सेसुंदर और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है। मदार कल्प को बाजार में कई नामोंसे जाना जाता है। इसे अर्क, मदार, आक या मंदार भी कहते हैं।
संतान सुख हेतु टोटके
मुलहठी, आंवला और सतावर को काटकर इन तीनों को अच्छीतरह से पीसकर कपड़छान कर लें। इसके बाद इस औषधि कोरविवार से आरंभ करें। इस औषधि का गाय के दूध से सेवनगुणकारी माना गया है। इस औषधि की मात्रा लगभग 6 ग्राम होनीचाहिए।
मंगल के दिन गहरा लाल कपड़ा लें। इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक बांधलें। इसके बाद हनुमान मंदिर जाकर इस पोटली को हनुमान जी केपैरों से स्पर्श कराएं। वापस आकर गर्भिणी के पेट से बांध दें। गर्भपाततुरंत बंद हो जाएगा।
संतान का बिल्कुल न होना, होकर मर जाना, गर्भपात हो जाना,अगर ये सब स्थितियां हों तो-
पत्नी शुक्रवार के दिन दो चने की रोटियां बनाए। उन पर भली-भांतिघी लगाए और उस पर कोई भी सूखी सब्जी इस प्रकार रखे किवह दोनों रोटियों के मध्य ही रहे। इसके बाद पति-पत्नी दोनों हीबाजार जाकर किसी भूखे को अपने सामने खिला दें और उसेयथासम्भव दक्षिणा भी दें और वापस घर आ जाएं। अवश्य लाभहोगा।
सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री देशी कर्पूर का एक टुकड़ा ले। उसमेंआधा अपने सामने रखकर जला दे और बाकी का आधा दुर्गा मंदिरमें चढ़ा दें। ऐसा करने से संतान सुंदर और स्वस्थ उत्पन्न होगी।जिन स्त्रियों के बच्चे गर्भ में ही ऐठकर मर जाते हैं, उन्हें चाहिएकि झड़ेबेरी बेरी के पत्ते, आक के पत्ते, बबूल के पत्ते, नीम के पत्ते,पीपल के पत्ते, अरंड के पत्ते, सात कुओं का जल, सात चौराहों कीमिट्टी लेकर किसी भी रविवार को एक कोरे बर्तन में डालकर किसीबेरी के पेड़ के नीचे जाकर स्नान करें। यह अधिक अच्छा होगाअगर यह क्रिया शुक्ल पक्ष के रविवार को की जाए। रोग दूर होजाएगा और बच्चा भी स्वस्थ होगा।
जब गर्भ धारण हो गया हो तो एक चांदी की बांसुरी बनाकरकृष्ण-राधा के मंदिर में पति-पत्नी दोनों गुरुवार के दिन चढ़ाएंगेतो गर्भपात नहीं होगा।
शुभ नक्षत्र योग में गुंजा मूल को चांदी के खोल में भरकर कमर मेंधारण करने वाली स्त्री अंगर स्वस्थ है तो से पति सम्पर्क करने परपुत्र लाभ प्राप्त करेगी।
यदि प्रसव वेदना में अधिक कष्ट हो रहा हो तो नीम की जड़लाकर स्त्री की कमर में बांधने से प्रसव आसानी से हो जाताहै।
कलिहारी की जड़ लाकर रेशमी धागे से स्त्री के बाएं हाथ में बांधनेसे प्रसव आसानी से हो जाता है।
ऊंटकटीरे की जड़ लाकर प्रसव वेदना सह रही स्त्री के सिर केबालों में बांध देने से भी प्रसव आसानी से हो जाता है।
गर्भपात से बचने के लिए प्रथम मास में शुक्रवार को चावल बनाकर
गाय को खिलाने चाहिए। द्वितीय मास में चने की दाल भिगोकर
तोते को खिलाएं, तृतीय मास में बैल को गुड़ दें। चतुर्थ मास में गर्भवती
स्त्री कच्ची मिट्टी पर पानी डालकर उसकी गंध सूंघे एवं तुलसीके दर्शन करें, पांचवें माह में थोड़ी उड़द की दाल खिलाएं तथाछठे माह में लोहे एवं तेल का दान करें। गर्भवती तिल के तेल कीमालिश करवाएं। सातवें, आठवें, नौवें माह में अच्छे पकवान बनाकरविद्वान ब्राह्मण को खिलाएं।
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ को लाकर दूध में घिसकरपिलाने से बांझ स्त्री को संतान की प्राप्ति होती है।
कन्या जन्म के पश्चात पुत्र सुख की कामना करने वाले दम्पती कन्या के नामकरण वाले दिन उस कन्या के चरण स्पर्श करतेहुए पुत्र जन्म की प्रार्थना करें तथा पूरा परिवार उस दिन जलेबीव खौर का प्रसाद ग्रहण करे तो अगली संतान लड़का हीहोगा।
रविवार को जड़़ सहित तुलसी का पेड़़ उखाड़़ लें। इसे कपिला गायके दूध में पिसवाकर ऋतुकाल में 5 दिन नित्य 4-4 तोला पिएं।इससे बाझ स्त्री को भी संतान प्राप्ति होगी।
बरगद के पेड़ की जड़ को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के दिन प्राप्त करें।कोई ऐसी महिला जो नि:संतान हो, वह किसी धागे में बांधकरअपनी भुजा पर धारण करती है तो उसे संतान लाभ हो सकता है।
गर्भ को जब तीसरा माह चल रहा हो तो गर्भिणी को थोड़ा-साजायफल और गुड़ शनिवार को खिला दें। शर्तिया लड़काहोगा।
मदार (आक) को बृहस्पतिवार को लाकर कमर में बांधने से सुंदरऔर स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है। मदार (कल्प) को बाजारमें कई नामों से जाना जाता है। (इसे अर्क, आक या मदार भीकहते हैं)
एक बेदाग हरा नीबू ले लें। उसे हाथ से निचोड़कर भरपूर रसनिकाल लें। इसके बाद उसमें थोड़ा नमक स्वाद के अनुसार मिलालें। अब इस द्रव्य के लड्डू गोपाल के आगे थोड़ी देर रख दें। रात्रिसोने से पूर्व स्त्री इस द्रव्य का सेवन करें और पति अपने पति धर्मका पालन करें। इस क्रिया को एक बार से अधिक न करें, अन्यथालाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है।
प्रतिदिन पति-पत्नी दोनों में से एक पूजा के लिए मंदिर जाए।सोमवार के दिन जो भी मंदिर जाए तो वहां शिवजी पर चढे हुएथोड़े चावल ले आए। इसके बाद उन्हें पीस लें और नियम से आनेवाले सोमवार तक दूध के साथ सेवन करें।
पत्नी शुक्रवार के दिन दो चने की रोटी बनाएं। उन पर भली-भांतिघी लगाएं और उन पर कोई भी सूखी सब्जी इस प्रकार रखें कि वह दोनों रोटियों के मध्य रहें। इसके बाद पति-पत्नी दोनों बाजार में जाकरकिसी भूखे को उन रोटियों को अपने सामने खिला दें। उसे यथायोग्यदक्षिणा दें और वापिस चले आए।
सोमवार के दिन गर्भवती स्त्री देसी कपूर का एक टुकड़ा लें।उसमें आधा अपने सामने रखकर जला दें और बाकी आधा शिव केमंदिर में चढ़ा दें। ऐसा करने से भी संतान सुंदर और स्वस्थ उत्पन्नहोती है।
एक देसी कपूर का साबुत टुकड़़ा ले लें। उसमें से थोड़़ा-सातोड़कर बच्चे को चटा दें और शेष हनुमान मंदिर में चढ़ा दें। यहध्यान रहे कि यह टोटका केवल एक ही बार करना है।
सकोरे में कच्चा दूध ले लें। उसे बच्चे के सिर पर से 21 बारउतारकर काले कुत्ते को अपने सामने पिला दें। इस टोटके केपश्चात बच्चा स्वयं ही शनै:-श्नै: दूध पीने लगेगा।किसी ऐसी स्त्री जिसकी संतान न होती हो यानी पूरी तरह से बांझहो, उसे शनिवार के दिन घर पर बुलाएं और बच्चे के सिर पर हाथफेरने को कहें। यह ध्यान रहे वह बच्चे को गोद में बिल्कुल नाले। उस स्त्री के जाने के बाद उस जगह पर झाडू लगा दें।