मेषलग्न का स्वरूप

मेषलग्न की चारित्रिक विशेषताएं
मेषलग्न का स्वरूप
रक्तवर्णो
बृहद्गात्रश्चतुष्पाद्रदत्रिविक्रमी ॥४॥
पूर्ववासी नृपज्ञाति: शैलचारी रजोगुणी।
पृष्ठोदयी पावकी च, मेषराशि कुजाधिषः 108
-बृहत्पाराशरहोराशास्त्रे/ 4/श्लो. 16
रक्तवर्ण, लम्बाकद, चतुष्पद, रात्रिवली, पूर्ववासी, क्षत्रिय, पर्वतचारी, रजोगुणी, पृष्ठोदय
• अग्नितत्त्व, इस प्रकार मेष है, इसका स्वामी मंगल है।
वृत्ताताप्रदृगुष्णशाक
कामी
लघुभुक्
दुर्बलजानुरस्थिरधनः
क्षिप्रप्रसादोऽटनः,
शूरोऽगनावल्लभः।
सेवाज्ञः कुनखी व्रणांकिताशिरा मानी सहोत्याग्रजः,
शक्त्या पाणितलेऽङिकतोऽतिचपलस्तोये च भीरुः क्रिये॥ ॥
बृहज्जातकम् अ. 16/श्लो. 1
यदि जन्म समय में मेषलग्न हो तो जातक कुछ गोलाई लिए हुए तथा कुछ लालिमा या
विशेष चमक लिए नेत्रों वाला, गर्म खाने वाला, शाक-भाजी तथा कम खाने वाला, जल्दी ही
प्रसन्न हो जाने वाला, भ्रमणशील, कामुक, कमजोर घुटनों वाला, चंचल धन वाला, शूरवीर,
स्त्रियों का प्रिय, सेवाकार्य को जानने वाला, नाखूनों में विकास युक्त, सिर में घाव का निशान
पाने वाला, स्वाभिमानी, अपने भाइयों में सबसे बड़ा या अपने गुणों से अग्रणी, हथेली में भाले
के आकार की रेखा से युक्त, अति चपल तथा जल से डरने वाला होता है।
मेषे विलग्नेतु भवेत्प्रसूतश्चण्डो धनी सर्वकलासु दक्षः।
स्वपक्षहन्ता बहुमन्युयुक्तो मन्दमतिस्तीक्ष्णकरः सदैव ॥ ॥
वृद्धयवनजातक अ. 24/श्लो. 1/पृ. 286
यदि मेषलग्न में जन्म हो तो मनुष्य प्रचण्ड स्वभाव वाला, धनवान, सभी कलाओं व शिल्प
व्यवहार में चतुरता पाने वाला, अपने पक्ष का नाश करने वाला, अत्यधिक क्रोधी स्वभाव वाला,
मन्द बुद्धि वाला एवं तीक्ष्णता युक्त कार्य करने वाला होता है।
बन्धुद्वेषकरोऽटनः कृशतनुः क्रोधी विवादप्रियो ।
मानी दुर्बलजानुरस्थिरधनः
शूरश्च मेषोदये।
-जातक पारिजात श्लो. 1/पृ. 678-
मेष बन्धुओं से द्वेष करने वाला, दुर्बल शरीर, क्रोधी, विवाद प्रिय, मानी (गर्व सहित),
कमजोर घुटने, धन स्थिर न रहे, शूरवीर होता है।
दाता हर्ता दीप्तः क्षयोदयी सङरप्रचण्डः स्यात् ।
प्रियविग्रहसिभागे मेषाग्रे बन्धुषूग्रदण्डश्र ॥1॥
-सारावली पृ. 465/श्लो. 1
यदि जन्म लग्न में मेष राशि हो तथा मेष राशि का प्रथम द्रेष्काण हो तो जातक दानी.
गिरकर उठने वाला, हरण करने वाला, तेजस्वी, युद्ध में शूर, कलह प्रेमी व बन्धुओं को कठोर
दण्ड देने वाला होता है।
मेषलग्ने
सुधीः
समुत्पन्नश्चण्डो
मानी सकोपकः।
स्वजनहन्ता च, विक्रमी पर वत्सलः ॥
मानसागरी अ.1/श्लो. 1
मेषलग्न वाले जीव स्पष्टवादी, अभिमानी, कुपित परन्तु गुणवान, निज पराक्रम में यशस्वी
परिवार वालों से पृथक तथा अन्य जीवों का प्रेमी, धन सम्पदा युक्त तथा गुणग्राही रहता है।
भोज संहिता
कालपुरुष की कुण्डली में प्रथम भाव में मेष राशि ही रहेगी, यह स्थाई ज्ञान है।
कालगणना व फलादेश के वक्त प्रथम भाव को मेष राशि का मानकर ही चलना पड़ेगा। उस
प्रथम भाव में जो राशि स्थित हो वह लग्न कहलाएगी।
जातक की लग्न राशि क्या है, और चंद्र राशि कौन-सी है? इन दोनों के सम्मिश्रण से
जातक के स्वभाव का सटीक पता चलेगा।
जातक के स्वभाव में विशेषता प्रकट करने में नक्षत्रों का बड़ा महत्त्व है। नक्षत्रों में भी
चरण फल श्रेष्ठ होंगे। उससे भी सूक्ष्म उपनक्षत्र स्वामी रहेंगे। अतः आपका जन्म लग्न कौन-सी
राशि का, किस नक्षत्र में कितने अंशों पर स्थित है यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसी तरह आपका
चंद्र भी किस नक्षत्र में कितने अंशों पर गया है यह भी दृष्टव्य है। फिर चंद्र नक्षत्र स्वामी और
लग्न नक्षत्र स्वामी में मित्रता, समता या शत्रुता है इस पर विचार आवश्यक होगा। तब कहीं
जाकर आप जातक के वास्तविक स्वभाव का निर्णय ले सकेंगे।

मेष राशि का स्वभाव 

फलित का एक निश्चित आधार जातक की जन्मराशि भी है। यहां पाठकों\को स्मरण दिला दें कि नामराशि की नहीं, जन्मराशि की बात हो रही है। जातक का नाम जिस अक्षर से शुरू होता है, वह उसकी नामराशि का आधार होता है। किन्त । जन्मकण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में होता है वह जातक की जन्मराशि होती है। उसी के आधार पर जन्म का नाम निकाला जाता है। परन्तु यदि नाम जन्म की राशि के आधार पर नहीं रखा जाए तो बाद में नामराशि भिन्न हो सकती है।

चन्द्रमा मनसो जातः सूत्र के अनुसार चन्द्रमा ही जातक का मन है। अतः।चन्द्रमा को जन्मकुंडली का बीज माना जाता है। इसलिए जन्मराशि का महत्त्व सहज ही समझा जा सकता है। यहां हम जन्मराशियों का संक्षिप्त फल कहेंगे और फिर नक्षत्रों के आधार पर फलित के सिद्धांतों की चर्चा भी करेंगे। मेष राशि भचक्र का प्रथम खण्ड है (360 के भचक्र को 12 राशियों में बांटा गया है, अतः 30 की एक राशि होती है। यह पाठकों को याद ही होगा। अतः जातक की मेष जन्मराशि होने का अर्थ हुआ कि जातक के जन्म के समय चन्द्रमा भचक्र (आकाश में ग्रहों का परिक्रमा पथ) के प्रथम खण्ड यानी 0-30 के हिस्से में था)।

     यद्यपि पाश्चात्य ज्योतिष में यदि जातकों का जन्म 21 मार्च से 20 अप्रैल के मध्य हुआ हो तो उनकी राशि मेष होती है। दरअसल वहां राशि का आधार सूर्य है (मेष राशि का अर्थ सूर्य का भचक्र के प्रथम खण्ड/0-30 के बीच होता है) और क्योंकि सूर्य एक मास (30 दिन) तक एक ही राशि में रहता हैं, अतः उस एक मास में जन्मे सभी जातक तत्सम्बन्धी राशि के ही होते हैं। मगर भारतीय ज्योतिष में जन्मराशि का आधार चन्द्रमा है जो सवा दो दिन में राशि परिवर्तन कर लेता है। अतरू उन सवा दो दिनों में जन्मे जातकों की राशि एक ही होती है। अतः भारतीय पद्धति पाश्चात्य ज्योतिष की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म व सटीक है। शेष कसर लग्न द्वारा पूर्ण हो जाती है। क्योंकि सवा दो दिन तक जन्मे जातकों की राशि भले ही एक हो, उनका लग्न जन्म समय के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। जो फलकथन की दृष्टि से और भी सटीक होता है। बहरहाल-हम यहां भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्मराशि के आधार पर फलकथन कहेंगे।

     मेष राशि के जातक आक्रामक स्वभाव के, उत्साही, कर्मठ तथा संघर्षशील होते हैं। कठिनाइयों से जूझकर सफलता प्राप्त करते हैं। ये लोग अपने शौकों को लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते। इनका सिर/माथा बड़ा व मजबूत होता है। इनके चेहरे/माथे सिर पर प्रायः मस्से या चोट का निशान भी होता है। ये जीवट वाले लोग होते हैं। इनको इनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ये लोग कपट से दूर रहते हैं व कपटियों से नफरत भी करते हैं। स्पष्टवादी व साहसी भी होते हैं और कूटनीति से दूर रहते हैं। ये इतने स्पष्टवादी होते हैं कि प्रायः अपने मित्रों/रिश्तेदारों तक को रुष्ट कर लेते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय तथा हुक्म चलाने वाली प्रवृत्ति के होते हैं। अपने जीवनसाथी से भी ये यही आशा करते हैं कि वो उनकी मर्जी/आदेशानुसार चले, ऐसा न हो पाए तो वे जीवनसाथी के प्रति उदासीन हो जाते हैं (चन्द्रमा या सप्तम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो ये जीवनसाथी से तलाक भी ले लेते हैं)।

     मेष राशि वाले खर्चीले, महत्वाकांक्षी तथा अति स्वाभिमानी, निडर होते हैं। सामान्यतः छोटे-मोटे रोगों से दूर ये लोग स्वस्थ रहते हैं। मेष राशि की स्त्रियां प्रेम सम्बन्धों में स्वयं पहल करने वाली होती हैं। मेष राशि के जातकों को अपने जीवन में कोई न कोई लक्ष्य सदैव सम्मुख रखना चाहिए इससे उनमें सकारात्मकता, उत्साह व प्रसन्नता बनी रहती है। दूसरों के लिए ये जितना निरूस्वार्थ कार्य करेंगे व सोचेंगे, उतना ही स्वयं इनका सौभाग्य व सुख बढ़ता है। इनका राशीश मंगल होता है।

मेष (1) यह बारह राशियों में पहलो राशि है। इसका अंक । है। जन्मकुंडली में राशियों के नाम लिखकर उनके निर्देशांक लिखने को ही परिपाटी है। अश्विनी नक्षत्र के चार, भरणी नक्षत्र के चार तथा कृतिका नक्षत्र का पहला चरण मिलकर मेष राशि बनती है।मेष राशि भचक्र का प्रथम खण्ड है (360° के भचक्र की 12 राशियों में बांटागया है, अत: 30° की एक राशि होती है। यह पाठकों को याद ही होगा। अतः जातक की मेष जन्मराशि होने का अर्थ हुआ कि जातक के जन्म के समय चन्द्रमा भचक्र (आकाश में ग्रहों का परिक्रमा पथ) के प्रथम खण्ड यानी 0-30° के हिस्से में था)। यद्यपि पाश्चात्य(वेस्टर्न)ज्योतिष में यदि जातकों का जन्म 21 मार्च से 20 अप्रैल के मध्य हुआ हो तो उनकी राशि मेष होती है। दरअसल वहां राशि का आधार सूर्य है (मेष राशि का अर्थ सूर्य का भचक्र के प्रथम खण्ड/0°-30° के बीच होता है) और क्योंकि सूर्य एक मास (30 दिन) तक एक ही राशि में रहता है, अत: उस एक मास में जन्मे सभी जातक तत्सम्बन्धी राशि के ही होते हैं। मगर भारतीय ज्योतिष में जन्मराशि का आधार चन्द्रमा है जो सवा दो दिन में राशि परिवर्तन कर लेता है। अत: उन सवा दो दिनों में जन्मे जातकों की राशि एक ही होती है। अत: भारतीय पद्धति पाश्चात्य ज्योतिष की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म व सटीक है। शेष कसर लग्न द्वारा पूर्ण हो जाती है। क्योंकि सवा दो दिन तक जन्मे जातकों की राशि भले ही एक हो, उनका लग्न जन्म समय के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। जो फलकथन कीदृष्टि से और भी सटीक होता है। बहरहाल-हम यहां भारतीय ज्योतिष के अनुसार जन्मराशि के आधार पर फलकथन कहेंगे।

विशेषताएं

इसे अंग्रेजी में Aries (एरिज) कहते हैं। प्रवासी, धातु संज्ञक यह राशि जहां घातु या रत्न उत्पन्न होते हैं, उस जगह पूर्व दिशा में निवास करती है। यह क्रूर एवं चंचल स्वभावी, चर, युवा, रक्तवर्णी, अग्नितत्त्व युक्त, रात्रिबली, क्षत्रिय जाति की, पृष्ठोदयी, विषम राशि है। यह चतुष्पाद, पर्वताचारी, रजोगुणी, पित्त प्रकृति की है। राशिका निवास पाटल देश है। राशिस्वामी मंगल एवं अंक 1 है। शरीर की हड्डियां, चेहरा, मस्तिष्क एवं स्नायु पर इस राशि का प्रभाव रहता है। मुख्य रूप से वस्त्र एवं अनाज मेष राशि की चीजें हैं। इसके अलावा मेढ़ी, मेढ़ी के ऊन से बने कपड़े या अन्य वस्तु, लाल रंग के धान्यराई, मसूर दाल, रक्तचंदन, लाल गेहूं एवं भूनिर्मित औषधियां, तांबा, सोना, लोहा एवं मशीनरी ये भी मेष राशि की वस्तुएं हैं। वन, पर्वत, जंगल, बांध आदि से जुड़ी योजनाओं का आधिपत्य इस राशि के अधीन है।मेदिनीय ज्योतिषशास्त्र में इंग्लैंड, डेनमार्क, जर्मनी, स्विटजरलैंड, सीरिया, फ्रांस, पेरु आदि देशों की यह प्रतिनिधि राशि है।

मेष राशि के जातक आक्रामक स्वभाव के, उत्साही, कर्मठ तथा संघर्षशील होते हैं। कठिनाइयों से जूझकर सफलता प्राप्त करते हैं। ये लोग अपने शौकों को लम्बे समय तक कायम नहीं रख सकते। इनका सिर/माथा बड़ा व मजबूत होता है। इनके चेहरे/माथे/सिर पर प्रायः मस्से या चोट का निशान भी होता है। ये स्वेछचारी लोग होते हैं। इनको इनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ये लोग कपट से दूर रहते हैं व कपटियों से नफरत भी करते हैं। स्पष्टवादी व साहसी भी होते हैं और कूटनीति से दूर रहते हैं। ये इतने स्पष्टवादी होते हैं कि प्रायः अपने मित्रों/रिश्तेदारों तक को रुष्ट कर लेते हैं। ये स्वतंत्रताप्रिय तथा हुक्म चलाने वाली प्रवृत्ति के होते हैं। अपने जीवनसाथी से भी ये यही आशा करते हैं कि वो उनकी मर्जी/आदेशानुसार चले, ऐसा न हो पाए तो वे जीवनसाथी के प्रति उदासीन हो जाते हैं (चन्द्रमा या सप्तम भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो ये जीवनसाथी से तलाक भी ले लेते हैं)। मेष राशि वाले खर्चीले, महत्वाकांक्षी तथा अति स्वाभिमानी, निडर होते हैं। सामान्यतः छोटे-मोटे रोगों से दूर ये लोग स्वस्थ रहते हैं। मेष राशि की स्त्रियां प्रेम सम्बन्धों में स्वयं पहल करने वाली होती हैं । मेष राशि के जातकों को अपने जीवन में कोई न कोई लक्ष्य सदैव सम्मुख रखना चाहिए इससे उनमें सकारात्मकता, उत्साह व प्रसन्नता बनी रहती है। दूसरों के लिए ये जितना नि:स्वार्थ कार्य करेंगे १ साचग, उतना ही स्वयं इनका सौभाग्य व सुख बढ़ता है। इनका राशीश मंगल होता है। मेष चर एवं अग्नि तत्त्व राशि है। यह पिछले भाग से उदित होने वाली राशि है। दिशा पूर्व, रंग लाल, स्वभाव उग्र तथा प्रभाव गर्म शुष्क है। यह विषम व पुरुष तथा जाति क्षत्रिय है। यह दिन वली और इसका वास पर्वत, वन है। मंगल इसका स्वामी, सूर्य इसमें उच्च का तथा शनि नीच होता है। कद मंझला, शरीर पतला किन्तु सुगठित, रंग गेहुंआ व साफ परन्तु रंगरूप अधिक चिकना चुपड़ा नहीं होता । गला एवं मुंह कुछ लम्बा, भवों पर घने बाल, सिर के बाल कुछ रूखे-रूखे होते हैं। अच्छे दबदबे वाले और दृष्टि तेज़ एवं तीक्ष्ण होती है। यह तेज़ मिजाज, फुर्तीले व क्रोधी होते हैं । यह बहुत महत्त्वकांक्षी होते हैं। इनमें साहस कूट-कूट कर भरा होता है। हिम्मत तथा शक्ति कमाल की होती है। इनका मन अग्रणी होकर काम करने पर प्रसन्न रहता है। यह बड़े निर्माता होते हैं तथा किसी के अधीन रहकर काम करना पसन्द नहीं करते। यह निडर एवं निर्भय भी होते हैं तथा जोखिम के काम बड़ी कुशलता से करते हैं। इन्हें झगड़े, लड़ाई आदि सम्बन्धी पूरा ज्ञान होता है। इनका हृदय विशाल व चित्त उदार होता है। उदारता, निष्काम सेवा इनका आभूषण होता है। क्योंकि चर राशि है, यह परिवर्तनशील होते हैं। यह अपनी बात मनवा कर छोड़ते हैं। यह समझते हैं कि बुद्धि एवं ज्ञान में यह सबसे आगे हैं। यदि मेष राशि वाला क्रोध में आ जाए तो धीरे-धीरे और मुश्किल से ही शांत होता है । इच्छाशक्ति बड़ी प्रबल होती है। जिस कार्य के पीछे पड़ जाएं, पूरा करके ही छोड़ते हैं। स्वतंत्र रूप से कार्य करना ही ठीक समझते हैं। खुशामद इन्हें खूब भाती है तथा आलोचना का बहुत बुरा मानते हैं। हर काम में जल्दबाजी करते हैं और इसीलिए कई बार काम में सफलता भी नहीं होती। कार्य आरम्भ करने में पूरी दिलचस्पी होती है परन्तु अन्त तक पहले जैसी दिलचस्पी नहीं रहती कुल मिलाकर इनमें चतुराई, कुशलता, न्यायिक कुशलता, दृढ़ता एवं दूसरों की -सामना करने का पूर्ण साहस होता है। हिम्मत, उदारता व स्वाभिमान भी कमाल का होता है। धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ कलाकृतियों, सौन्दर्य की परख, राग-रंग, चित्रकारी, सिनेमा आदि से भी प्रेम होता है मेष राशि वाले की खुशामद करके काम निकलवा लेना सरल ही होता है। प्रेम, मित्रता जल्दी करते हैं पर यह स्थाई नहीं होती। मित्र की सहायता तो ये करते हैं किन्तु मित्र इनसे इर्ष्या ही करते रहते है। यही कारण हैं कि वे शत्रु बन जाते हैं परन्तु इनको हानि नहीं होती। विवाह 28 वर्ष से पहले हो जाता है। यदि मंगल व शुक्र की स्थिति ठीक न हो तो 29 वर्ष में विवाह होता है। पारिवारिक एवं सन्तान का दुख कम ही होता है। सन्तान भी कम होती है। पर एक लड़का तो अवश्य होता है। मेष चर राशि है। सैर सपाटा करना पसंद करते है । यात्राएं करनी पड़ती है। दूर- दराज एवं अच्छे-अच्छे स्थानों पर घूमने-फिरने के शौकीन होते है। साहस के कामों में, जैसे सैनिक, पुलिस, हकूमत करना, शासन करना, सर्जन, डाक्टर, मशीन, भट्ठी, लोहा व अन्य धातुएं जलना तथा इंजीनियरिंग में सफलता प्राप्त करते है। ये साधारणतया डाक्टर, पुलिस, व सेना में अधिक ख्याति अर्जित करते हैं। 22-28 वर्ष की आयु तक यह व्यवसाय में लग जाते है। आर्थिक स्थिति परिवर्तनशील होती है। जमीन-जायदाद भी होती है और स्वयं मकान भी बनाते हैं। व्यापार एवं भागीदारी लाभप्रद होती है। खर्चीले भी होते हैं तथा कई बार फिजूल खर्च भी करते हैं। यदि मंगल के साथ बुध हो तो बुद्धि तीक्ष्ण होती है। और कई बार-झूठ भी बोलने लगते हैं। बचपन में प्रगति के कार्यों में रुकावटें तथा कठिनाइयां आती हैं, जिससे बचपन में सुख कुछ कम ही होता है। पढ़ाई में तेज़ होते हैं और खेलों में पूरा भाग लेते हैं । साईंस-तकनीकी-शिक्षा, डाक्टरी एवं फाइन आटर्स में रुचि अधिक होती है। भाई-बहनों का सुख कम ही होता है परन्तु ये इन्हें पूरा सुख देते हैं । मेष अग्रिम, नंबर एक राशि है तथा इसका स्वामी मंगल भाईयों का कारक भी है। इस प्रकार यदि मंगल लग्न में या इसके आस-पास अथवा घर 12 या 2 में होता है तो ये भाईयों में बड़े होते हैं। साधारणतया शरीर-पतला व मजबूत होता है। अतएव इनमें रोग प्रतिरोध सार्थ्य स्वाभाविक होती है। सिर दर्द, बुखार, धस्सल, सिर में चोट, गले के ऊपरी भाग में घाव का निशान, मिरगी, नक्सीर-फूटना, पेट दोष, पैर में सूजन व गैस, ब्लड प्रैशर, शास्त्र तथा अग्नि से भय रहता है। पहले सोचना और फिर काम में हाथ डालने से कई संकट चल जाते हैं। आयु से तीसरे, छठे, नवें, बारहवें, पन्द्रहवें, सोलहवें, अठारहवें, उन्नीसवें, इक्कीसवें, बाइसवें, चौबीसवें, सत्ताइसवें, अट्ठाइसवें, तीसवें, तैंतीसवें, पैंतीसवें, छत्तीसवें, बयालीसवें, पैंतालीसवें आदि वर्ष महत्त्वपूर्ण होते हैं। पढ़ाई, नौकरी, विवाह, सन्तान, उन्नति आदि सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटती रहती हैं। मंगलवार का दिन, लाल रंग तथा 9 की संख्या विशेष शुभ होती है। संख्या 3- 6 ही अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। यदि जन्म तिथि में 3-6-9 अधिक हों तो फिर विवाह में गड़बड़ और गृहस्थ जीवन असुखद भी कई बार हो जाता है।

मेष राशि एवं लग्न का परिचय 

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मेष विलग्ने जातः प्रचण्ड रोषो विदेश गमनरतः।

लुब्ध: कृशोल्प सौख्य: स्खलिताभिधायी च।।

शीघ्रगति अल्पसुतो विविधार्थयुत: सुशीलश्च।।


मेष राशि चक्र की प्रथम राशि है।मेष राशि का प्रतीक मेढ़ा (भेड) है।

भेड़ जितनी सीढ़ी और अनुशासन प्रिय होती है,उसका नर उतना ही उग्र एवं स्वछंदता प्रिय होता है।भचक्र में इस राशि का विस्तार ० से ३० अंश तक है।वासंत सम्पात,सायन मेषारम्भ (२१ मार्च) यहीं से माना जाता है।


मेष राशि के अन्य पर्यायवाची नाम भी है,जैसे👉 अज, मेढ़, विश्व, आद्य, वृष्णि, तुम्बुर, छाग आदि।


मेष राशि का स्वामी मंगल है।इस राशि के अंतर्गत अश्विनी, भरणी, एवं कृतिका के प्रथम चरण का समावेश रहता है।काल पुरुष के शरीर में इसका स्थान सिर, मस्तक एवं मुख है।


यह राशि अग्नितत्त्व,चर संज्ञक,पुरुष जाती,क्षत्रिय एवं लाल वर्ण,हृस्व पृष्ठोदयि, युवा रजोगुणी, रात्रिबलि, उग्र प्रकृति,पित्तकारक, एवं पूर्व दिशा की स्वामिनी है।सूर्य इस राशि के १० अंश तक उच्चस्थ होता है।तथा शनि इस राशि के २० अंश पर नीच होता है।


मेष राशि या लग्न की मूलभूत विशेषताए

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इस राशि या लग्न का जातक अत्यंत साहसी,उत्साही, निडर, अग्नि तत्त्व राशि होने के कारण शीघ्र उत्तेजित होने वाला,स्पष्टवादी, उच्चाभिलाषी, नेतृत्व करने में कुशल, स्वतंत्र विचार वाला, अस्थिर एवं परिवर्तनशील प्रकृति, जल्दबाजी में कई बार हानि उठाने वाला,जोखिम भरे कार्य करने वाला होता है।इसके अतिरिक्त इसका सम्बन्ध लाल वर्ण की धान्य, गेंहू, वस्त्र, सोना, मसूर, एवं भूजन्य औषधियों से भी होता है। यदि जातक की जन्म राशि एवं लग्न समान हों तो उपरोक्त गुण विशेषताए अधिक मात्रा में होती है।


मेष राशि एवं लग्न में शुभाशुभ एवं योग कारक ग्रह

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🐐मेष लग्न में गुरु, सूर्य एवं मंगल शुभ फल देने वाले होते है।


बुध और शुक्र इस लग्न में प्रायः अशुभ फल प्रदान करते है।


इस लग्न में गुरु और शनि के योग होने मात्र से भी शुभ फल नहीं मिलता है।


शुक्र मारक स्थानो का अधिपति होने पर भी अकेला घातक नहीं होता


चंद्र, राहु, केतु व् शनि अन्य ग्रहो के योग से शुभाशुभ फल प्रदान करते है।


शुभाशुभ योग

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सूर्य - मंगल योग👉  १, ३, ५, ७, १० और १२ वें भाव में यह योग शुभ फल प्रदान करता है अन्य में अशुभ फल देता है।


सूर्य - चंद्र योग👉  २, ४, ५, ९, एवं १० वें भाव में शुभ फल एवं अन्य भावो में अशुभ फल देते है।


सूर्य - शुक्र तथा सूर्य - शनि के योग सदैव निष्फलि होते है।


चंद्र - गुरु योग👉  मेष लग्न के पंचम एवं नवम स्थानों में यह योग विशेष शुभ होता है।


मंगल - गुरु योग👉  लग्नेश तथा भाग्येश का योग होने से १, ५, ९, एवं १० वें भाव में होने से विशेष प्रशस्त माना गया है।


गुरु - शनि योग👉  ३, और १० वें भाव में  शुभ फल देता है एवं अन्य भावो में अल्प फली होता है।


गुरु - शुक्र योग👉  मेष लग्न में गुरु भाग्येश एवं व्ययेश भी है,तथा शुक्र दोनों मारक(२-७) स्थानों का स्वामी है।यह योग ७ वें तथा ९ वें भाव में शुभ एवं अन्य भावो में अशुभ होता है।


मंगल - शुक्र योग👉  केवल भाग्य स्थान में शुभ फली माना जाता है। अन्य स्थानों में निष्फलि माना जाता है।


इसके अतिरिक्त बुध-मंगल का योग,बुध-गुरु का योग, चंद्र-मंगल, शुक-शनि, मंगल-शनि, तथा बुध-शनि के योग अशुभ फल प्रदायक माने जाते है।


मेष राशि एवं लग्न की प्रमुख विशेषताएं

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मेष राशि या लग्न के जातक का सामान्यतः माध्यम कद,इकहरा परंतु सुगठित शरीर होता है।इनका चेहरा चतुष्कोण,गर्दन कुछ लंबाई लिए हुए,लालिमा लिए हुए रक्तिम गौर वर्ण,या कभी गेंहुआ रंग भी होता है,सर एवं मस्तक ऊपर से चौड़ा,आँखे गोल-रक्त वर्ण परंतु इनकी दृष्टि तेज होती है।

इस राशि या लग्न की स्त्रियों के दांत सुन्दर,बाल घने, काले एवं प्रायः लंबे होते है।


मेष (राशि-लग्न) की सामान्य विशेषताएं

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मेष लग्न में उत्पन्न जातक स्वतंत्र विचारो वाला,साहसी, स्वाभिमानी, उद्यमी, चंचल किन्तु प्रखर बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति वाला,उच्चाभिलाषी,मिलनसार तथा नए-नए मैत्री सम्बन्ध बनाने में कुशल होता है। मेष लग्न अग्नि तत्व प्रधान एवं चर राशि होने के कारण जातक दृढ निश्चयी,स्फूर्तिवान,व्यवहार कुशल, आत्मविश्वासी तथा स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम होता है। इनमे नेतृत्व की भावना शक्ति प्रबल होती है।मेष जातक वैज्ञानिक चिंतन पसंद करते है।ऐसे लोग किसी दुसरे की आधीनता या मार्गदर्शन पसंद नहीं करते है। नविन एवं मौलिक विचार उत्पन्न करने में इनकी बुद्धि विशेष कुशल होती है।ये जीवन में नई-नई योजना बनाते रहते है।इनके भीतर एवं बाहरी भाव प्रायः एक जैसे रहते है।इनमे दूसरे व्यक्ति के मनोभावों को समझलेने की अपूर्व शक्ति जन्मजात होती है।एवं संघर्ष की भावना प्रबल होती है।ये जीवन में निजी पुरुषार्थ एवं उद्धम के द्वारा लाभ एवं उन्नति प्राप्त कर लेते है।


यदि इन जातको की कुंडली में चंद्र/मंगल/सूर्य अशुभ हों तो अस्थिर प्रकृति, परिवर्तनशील स्वाभाव, तथा शीघ्र ही उत्तेजित होकर प्रचंड रूप धारण कर लेने का स्वाभाव हो जाता है।


चंद्र/मंगल यदि नीच राशिस्थ अथवा शत्रु क्षेत्री या शत्रु ग्रहो से युत हों तो अत्यधिक क्रोधावेश में कई बार अपनी बहुत भारी हानि भी करवा बैठते है।


कुंडली में बुध/मंगल यदि अशुभ हो तो भाई बहनो का सुख बहुत कम मिलता है।


मेष राशि एवं लग्न के जातको की शिक्षा व्यवसाय-कैरियर,आर्थिक स्तिथि एवं

स्वास्थ्य - रोग।

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मेष राशि अथवा लग्न के जातक क्रियात्मक (प्रैक्टिकल) अधिक होते है।अतः ये ऐसे व्यवसाय में अधिक सफल हो पाते है जिसमे उद्यम एवं शारीरिक श्रम की विशेष आवश्यकता हो। ये जातक खेल-कूद, दन्त चिकित्सा, कैमिस्ट, फ़ौज, सेनाध्यक्ष, पुलिस, बिजली एवं इलेक्ट्रॉनिक कार्य,ज्यूलर्स, बैकरी, मिठाई, आदि। यदि मंगल/गुरु आदि ग्रहो का शुभ सम्बन्ध हो तो वैद्य, चिकित्सा क्षेत्र, सिनेमा, संगीत, कम्प्यूटर, मशीनरी (इंजीनिरिंग), भूमि-जायदाद, क्रय-विक्रय, विदेशी सम्बन्ध, कम्पनी प्रतिनिधित्त्व, सरकारी क्षेत्रो से सम्बंधित कार्यो में सफलता मिलती है। सूर्य, चंद्र, गुरु, एवं शनि शुभ होने की स्तिथि में राजनीति, प्रशासनिक आर्थिक कार्यो में भी विशेष सफलता मिलती है।


आर्थिक स्तिथि👇

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उच्चाकांक्षी एवं दृढ ऊर्जा-शक्ति होने की कारण मेष लग्न के जातको के पास व्यापक स्तर पर धन कमाने की क्षमता होती है। यदि जन्म पत्री में शनि/शुक्र/मंगल एवं चंद्र आदि ग्रहो की शुभ स्तिथि हो अथवा उनपर शुभ ग्रहो की द्रष्टि हो तो निजी व्यवसाय द्वारा इनमें विपुल धन सम्पदा अर्जित करने की संभावनाएं होती है।

नौकरी की अपेक्षा निजी व्यापार में लाभ एवं उन्नति के विशेष योग रहते है।

सामान्यतः इन्हें जीवन के आरंभिक वर्षो में (आर्थिक क्षेत्र)में विशेष उतार चढाव एवं संघर्ष का सामना कारण पड़ता है।

परंतु जीवन के उत्तरार्ध में अपने परिश्रम एवं कार्य निष्ठां द्वारा आर्थिक क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त कर लेते है।


स्वास्थ्य एवं रोग

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राशि स्वामी मंगल के कारण मेष लग्न के जातको का स्वास्थ्य प्रायः अच्छा ही रहता है।यदि किसी कारणवश कोई रोग हो जाए तो जल्दी ठीक हो जाते है।लग्नेश मंगल नीच राशिस्थ हो या अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो छोटी-मोटी दुर्घटनाये होती रहती है। विशेषकर सिर पर चोट, सिर दर्द,तीव्र ज्वर,मुँहासे मस्तिष्क विकृति, चेचक एवं त्वचा आदि और नेत्र सम्बन्धी एवं पेट विकार आदि रोगों की सम्भावना अधिक रहती है।


सावधानी👉 उच्चाभिलाषी प्रकृति होने के कारण मेष लग्न के जातक कभी-कभी अपने सामर्थ से अधिक कार्य कर जाते है।जिस कारण मानसिक तनाव,पाचन विकृति,उत्तेजना, अनिद्रा आदि मनोविकारों से ग्रस्त होते है। इन्हें हरी सब्जियों फल एवं पौस्टिक भोजन का सेवन अधिक करना चाहिए।तम्बाकू आदि मादक द्रव्य एवं मासाहार आदि तामसी भोजन से परहेज करना चाहिए एव पर्याप्त आराम और नींद भी लेनी चाहिए।


मेष राशि या लग्न के जातको को बिजली कार्य,वर्कशॉप,आदि में कार्य करते समय कार, ट्रक, स्कूटर, आदि वाहन चलाते समय भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।


मेष राशि एवं लग्न की स्त्रियां

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मेष राशि या लग्न की स्त्री की शरीर आकृति एवं संरचना प्रायः मध्यम कद संतुलित एवं आकर्षक होती है।

इनकी कुंडली में यदि मंगल-राहु एवं चंद्र शुभ हों तो ऐसी जातिका के दांत सुन्दर,घने एवं लंबे काले बाल होते है।यदि पंचमेश सूर्य भी शुभस्थ या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो जातिका बुद्धिमान,चतुर,एवं स्वतंत्र विचारो वाली,स्वाभिमानी परन्तु सत्यप्रिया, उत्साहशील, फुर्तीली, मिलनसार, उच्चाकांक्षी, एवं आदर्शवादी प्रकृति की होती है।

पुरुष जातको की भाँती ही इनमे भी उत्साह, गर्मजोशी, स्फूर्ति, व्यवहार कुशलता, स्पष्टवादी एवं नेतृत्व की भावना अधिक होती है।

इनमे दूसरे के मनोभाव को समझने की विशेष शक्ति होती है।ये जिस व्यक्ति को पसंद करे उसे पूरी निष्ठा एवं मनोयोग से चाहती है।

इनकी कुंडली में मंगल-शुक्र यदि अशुभ हो तो निरंकुश एवं स्वछंद खर्चीला स्वाभाव होता है।आवेश, क्रोध एवं भावुकता में कई बार अपना ही नुक्सान कर बैठती है।

मेष राशि/लग्न की जातिका की इच्छा शक्ति अत्यंत तीव्र होती है।फिर भी ये अपने मनोभाव एवं क्रोध को संयम करके व्यवहार करें तो गृहस्थ जीवन में अत्यंत सफल होती है।ये वैवाहिक जीवन में अपने परिवार एवं पति के प्रति पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी रखती है।


पार्टनर का कठोर एवं आक्रमक व्यवहार इनके लिए असहनीय हो जाता है।ये अपनी प्रतिष्ठा का विशेष ध्यान रखती है।इनकी आय चाहे सीमित हो फिर भी अपना,अपने परिवार एवं गृह के रहन-सहन के स्तर का भी विशेष ध्यान रखती है। मेष राशि /लग्न की जातिकाये प्रायः अपने भाई-बंधुओ एवं स्वजनों से प्रेम रखने वाली संवेदनशील और आशावादी दृष्टिकोण रखने वाली होती है।


अनूकूल साथी का चुनाव

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मेष राशि/लग्न के जातक-जातिका को उपयुक्त जीवन साथी या पार्टनर के लिए सिंह/तुला व् धनु राशि के जातक अधिक उपयुक्त हो सकते है। मेष, मिथुन, वृश्चिक एवं कुम्भ राशि/लग्न वाले जातक के साथ मध्यम फल मिलता है।

 

मेष राशि एवं लग्न जातको का प्रेम एवं वैवाहिक सुख एवं दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभा-शुभ फल विचार

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मेष राशि एवं लग्न के जातको का प्रेम एवं वैवाहिक सुख

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मेष राशि अथवा लग्न के जातकों का प्रेम एवं विवाहेत्तर स्त्री सुख जन्म कुंडली में शुक्र एवं चंद्र की स्तिथि पर निर्भर करता है।यदि कुंडली में चंद्र-शुक्र के साथ मंगल भी शुभस्त हो तो जातक में विशेष सौन्द्रयाभूति होती है।वह स्त्री या विपरीत सेक्स को शीघ्र प्रभावित कर लेते है।इन्हें विवाह के बाद विशेष धन का लाभ एवं सुख के साधन प्राप्त होते है।जातक की स्त्री सुन्दर एवं गुण संपन्न होती है।


कुंडली में यदि चंद्र/शुक्र एवं भौम पाप युक्त या पाप दृष्ट हों,तो स्त्री के सम्बन्ध से तनाव और कष्ट मिलता है तथा पारिवारिक उलझनों का सामना करना पड़ता है।इसी तरह का योग यदि लड़की की कुंडली में हो तो पति के साथ तनाव एवं कलह क्लेश रहता है।


दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभा-शुभ फल विचार

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मेष राशि/लग्न के जातक-जातिका को सूर्य,मंगल एवं चंद्र ग्रहों की दशा-अंतर्दशा प्रायः अच्छा फल देने वाली होती है।

यदि सूर्य-चंद्र शुभ भावस्थ या शुभ दृष्ट हों तो उत्तम फल के कारक होंगे।जैसे विद्या एवं प्रतिस्पर्धा में सफलता एवं भूमि ,भवन सवारी आदि सुखों की प्राप्ति होती है।बुध की दशा-अंतर्दशा अशुभ फल देगी।इनको गुरु,शुक्र,एवं शनि की दशा-अंतर्दशा मिश्रित फल देती है।


गुरु की दशा-अंतर्दशा का पहला भाग शुभ एवं शेष भाग व्ययशील रहता है।शनि की प्रारंभिक दशा में कार्य विलम्ब से एवं शेष दशा में सफलता प्राप्त होगी।

राहु-केतु अपने भाव/राशि एवं ग्रह के साहचर्य अनुसार ही अपनी दशा में शुभाशुभ फल प्रदान करते है।


शुभ रत्न👉 मेष राशि/लग्न के जातक को सवा आठ रत्ती का मूँगा या सवा पांच रत्ती का माणिक्य सोने की अंगूठी में तर्जनी उंगली में धारण करना शुभ एवं लाभदायक रहता है।


शुभ रंग👉 लाल,पीला,श्वेत,संतरी, हल्का नीला एवं भूरा आदि।


शुभ दिन👉 सोमवार,मंगलवार,गुरुवार,शुक्रवार,एवं रविवार के दिन सामान्यतः शुभ एवं अनूकूल रहते है।


भाग्यांक👉 मेष राशि/लग्न का भाग्यांक ९ है।यह मूलांक विशेष उथल-पुथल एवं संघर्ष का प्रतीक है।इस अंक वाला व्यक्ति अत्यंत कठिनाइयों के बाद अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।इसके अतिरिक्त १ एवं ५ अंक भी इन जातकों के लिए शुभ रहते है।


उपासना👉 इन जातकों को गायत्री मंत्र का जप एवं श्री हनुमान उपासना करना शुभ एवं कल्याणप्रद रहती है।


भाग्योदयकारक वर्ष👉 २८, ३०, ३२, ३६,३७ एवं ४१ वां वर्ष भाग्योदय कारक सिद्ध होता है।

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जातकों का भविष्य

मेष राशि के जातकों के जीवन में धन का अभाव बना रहता है। ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों से इन्हें सहयोग प्राप्त नहीं होता। पुत्रसुख एवं स्त्री समाज के ऊपर रहे इनके प्रभाव के कारण इनकी प्रसिद्धि बढ़ती है। मेष व्यक्ति की आंखें गोल एवं घुटने कमजोर रहते हैं। पानी से हमेशा डर बना रहता है। स्वभाव चंचल एवं प्रवास का शौक रहता है। शरीर के किसी-न-किसी अंग पर, विशेष रूप से आंख पर व्रण पाया जाता है। अल्पाहारी होने पर भी कामपिपासु होते हैं। सच-झूठ बोलने के बारे में बेफिक्री रहती है। कुशल वक्ता एवं अपना काम निकालने में माहिर होते हैं। लाभ-हानि का विचार न करते हुए शीघ्र दूसरों का अनुकरण करने की प्रवृत्ति इनमें रहती है। जातकाभरण के अनुसार मेष राशि का चंद्र जन्मकुंडली में होने पर जातक धनवान, पुत्रवान, कठोर एवं परोपकारी रहते हैं। हर बात कुशलता से संपन्न करने की वृत्ति रहती है। सुशील स्वभावी, श्रेष्ठीजन एवं शासनाधिकारियों से स्नेह भाव रखनेवाले, सद्गुणी, देवी-देवताओं में श्रद्धा रखनेवाले एवं ब्राह्मणों के भक्त रहते हैं। ताम्रवर्णी एवं आंखें बड़ी रहती हैं। कामवासना तीव्र रहती है। घुटने एवं उसके नीचे का हिस्सा दुर्बल रहता है। सिर पर व्रण पाया जाता है। दान-पुण्य में रुचि रहती है। नौकर-चाकर एवं इन पर अवलंबित व्यक्तियों के प्रति सुहृदय रहता है। दो स्त्रियों का सुख या दो विवाह करनेवाले होते हैं। वाद-विवाद, लड़ाई-झगड़ा, मुकदमेबाजी से डरनेवाले होते हैं। जन्म से आयु के 1,7, 13वें वर्षों में ज्वरादि का कष्ट रहता है। आयु के 16वें या 17वें वर्ष में प्लीहा या हैजे की बीमारी होती है, आयु के तीसरे या 12वें वर्ष में पानी से डर रहता है। 25वें वर्ष में संतान का जन्म होता है किंतु नेत्रविकार या रतौंधी का भय रहता है। आयु के 32वें वर्ष में शस्त्र-अस्त्र या किसी दुर्घटना के कारण जख्म होने का भय रहता है। अपने कामों की स्वयं प्रशंसा करने की आदत रहती है। देश-विदेश में घूमने की इच्छा होती है। तेजी से चलने की आदत होती है। मेष राशि के चंद्र पर बुध, शुक्र या बृहस्पति की दृष्टि होने पर 90 वर्ष तक की आयु इन्हें प्राप्त होती है।लोककल्याण की भावना मेष राशि के व्यक्तियों में निहित रहती है। निम्न श्रेणी के मकानों में निवास होता है। उष्ण प्रकृति, ज्वर एवं रक्तपित्त विकारों से पीड़ित, तामसी आहार लेनेवाले, दुर्बल काया, मध्यम ऊंचाई, सिर पर अल्प बाल, उग्र दृष्टि, विद्याध्ययन में श्रेष्ठ, एकांतप्रिय, कामकला प्रवीण, सेवासुश्रुषा करने में चतुर, संतान का अल्प सुख, हर काम को गोपनीय रखने की आदत, कमजोर घुटने, सिर या चेहरे पर व्रण, देव, धर्म उपासना में सामान्य रुचि, अल्पाहारी एवं शाकाहारप्रिय, पिता एवं बंधुओं से पृथक तथा जन्मभूमि से दूर रहनेवाले इस तरह के फलित मेष राशि के व्यक्तियों के बारे मिलते हैं। विशेष परिश्रम करके सुखद जीवन जीने की अभिलाषा मेष राशि के व्यक्तियों में पाई जाती है। मेष राशि के व्यक्तियों के विषय में एक खास बात है कि भविष्य संकेत इन्हें अपने आप मिल जाते हैं। जिससे वे शुभ-अशुभ घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करके सावधान रहते हैं। मेष राशि के व्यक्तियों को यह परमात्मा से मिली भेंट है। दूरदर्शिता, ढाढस एवं समर्थता राशि स्वामी मंगल के कारण इन्हें प्राप्त रहती है। मंगल में गजब की ताकत एवं अद्भुत जादू है। इसके संकेत मात्र से मेष राशि के व्यक्ति मरणावस्था में भी जीने की तमन्ना रखते हैं। पारिवारिक सुख में न्यूनता, व्यर्थ अभिमान, बुलंद आवाज में भाषण देने की कला में प्रवीण, जीवन में कई बार आर्थिक चढ़ाव-उतार एवं धनहानि देखनी पड़ती है। व्यापार-व्यवसाय में असफल होने पर बार-बार व्यवसाय बदलने की प्रवृत्ति भी मेष राशि के व्यक्तियों में पाई जाती है। इन्हें वाहनसुख अच्छा प्राप्त होता है। मेष राशि के व्यक्तियों की कल्पनाशक्ति गजब की रहती है। किंतु किसी-न-किसी चिंता के कारण उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। मेष व्यक्ति के चेहरे, पैरों या बगल में बड़ा तिल या जख्म का चिह्न रहता है। जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएं जीवन के 1,7, 13,21,30,38, 46,52,55,59, 63, 67, 69 वर्षों में कोई-न-कोई विचित्र घटना घटती है। जन्म से 5 वर्षों तक का समय पूरे परिवार के लिए कष्टकारक, 14 से 21 या 23 से 29 वर्ष में विवाह संपन्न होता है। 6 से 13, 17 से 40, 56 से 61 वर्ष प्रगतिकारक रहते हैं। इस कालावधि में व्यवसाय में उन्नति, अच्छा धनलाभ, नौकरी में पदोन्नति, पारस्परिक सद्भावना, पत्नी के साथ सुखी वैवाहिक जीवन, हर प्रकार का वैभवसुख, संपत्ति, स्ववास्तु, वाहन, विदेश प्रवास आदि का सुख प्राप्त होता है। 14 से 22, 42 से 55 एवं 62 से 66 वर्ष अत्यंत दुखदायी एवं कष्टकारक रहते हैं। इस समयावधि में परिवार के महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु, कोर्ट-कचहरी के झगड़े, झूठे लांछन, व्यर्थ खर्च, संपत्तिनाश एवं सिर, पेट, पैर, कान से संबंधित बीमारियां तथा ऑपरेशन जैसी कष्टकारक घटनाओं का क्रम रहता है। 23 से 26 एवं 67 से 69 वर्ष का समय भाग्यवर्धक तथा मन की मुरादें पूरी करनेवाला होता है। परिवार में आनंद, विवाह, भाइयों से मेलमिलाप, मकान की खरीद या मकान बनवाना, व्यापार नौकरी में धनलाभ, स्त्री-पुत्र सुख मिलता है। अनेक स्त्रियों से संबंध, दान पुण्य भी होता है। स्त्री की मृत्यु पति से पहले हो जाती

प्रतिकूलता हर महीने का शुक्रवार। हर महीने की 1,6,11,21 तारीखें। हर साल का अक्तूबर मास। कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशि के स्त्री-पुरुष। काले, नीले रंग के वस्त्र एवं अन्य वस्तुएं।

विशेष उपासना

संकट एवं कष्ट के निवारण के लिए मंगल स्वरूप श्री हनुमानजी एवं मंगला गौरी की उपासना श्रेयस्कर रहेगी। अनुष्ठान विधि से 'मंगलागौरी मूलाधार कवच' तैयार करके धारण करें। मूंगा व अन्य लाल रंग के रत्न धारण करना ठीक होता है। अपने पास रत्ता-रंग जैसा लाल रुमाल रखना, मूंगा धारण करने जितना ही फल देता है। मूंगा जो कि 6 रत्ती भर से कम न हो, सोने की अंगूठी में जड़वाकर अनामिका उंगली में (दाएं अथवा बाएं हाथ की) मंगलवार को धारण करना चाहिए। इन मंगलरत्न को मध्यमा उंगली में धारण करें। प्रतिदिन निम्न मंत्र का कम-से- -कम 108 बार जाप करें:

ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।

सर्वस्याति हरे देवि नारायणी नमोस्तुते ॐ॥

मेष राशि या मेष लग्न के व्यक्तियों को पितृदोष के कारण विषमज्वर, अन्य ज्वर, सिरदर्द जैसी शारीरिक पीड़ाएं हों एवं साथ ही भौतिक कष्ट भी हों तो इस करुणाजनक स्थिति से मुक्ति पाने के लिए पितृजनों का श्राद्ध या त्रिपिंडी गया (बिहार) या पुष्कर (अजमेर, राजस्थान) में करें। तीर्थादिक एवं काले तिलों से तर्पण करें। अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष को प्रदक्षिणा दें। घृतचूर्ण-घट का दान करें। ब्राह्मण पूजन करके उन्हें भोजन कराएं। भगवान श्रीनृसिंह की आराधना करें। गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करें।


  मेषलग्न का स्वामी मंगल अग्नितत्त्व प्रधान होता है सो ऐसा जातक दबंग व क्रोधयुक्त

होता है। यह पुरुष सूचक राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव साहसी, अभिमानी व पौरुषशाली
पुरुषों का प्रजनन है। ऐसे जातक को क्रोध शीघ्र आता है। कोई जरा सी भी विपरीत बात कह
दे तो इनको सहन नहीं होता। इनका सिर मजबूत एवं इनमें मेढ़े तुल्य शीघ्रता से भिड़ने की शक्ति
होती है। इनकी आंखें बकरे के समान पीत व रक्तवर्णीय होती हैं।
मेषलग्न वाले प्रायः मध्यम कद के होते हैं। सामान्यतया मेषलग्न में उत्पन्न जातक साहसी
पराक्रमी, तेजस्वी तथा परिश्रमी होते हैं तथा अपने इन्हीं गुणों से वे जीवन में वांछित मान सम्मान
एवं प्रतिष्ठा अर्जित करने में समर्थ रहते हैं। ये अत्यधिक सक्रिय एवं क्रियाशील होते हैं तथा
अपने इन्हीं गुणों से जीवन में इच्छित उन्नति प्राप्त करते हैं ।
मेषलग्न के प्रभाव से जातक साहसी, परिश्रमी तथा पराक्रमी होगा तथा अपने शुभ एवं
महत्वपूर्ण कार्यों को परिश्रम एवं निर्भयता से सम्पन्न करेगा। ऐसे जातक में स्वाभिमान का भाव
भी विद्यमान रहेगा तथा स्वपरिश्रम तथा योग्यता से जीवन में मान सम्मान एवं प्रतिष्ठा अर्जित
करने में समर्थ होंगे।
इनके स्वभाव में प्रारंभ से ही तेजस्विता का भाव विद्यमान रहेगा फलतः यदा-कदा आप
अनावश्यक क्रोध एवं चंचलता का प्रदर्शन करेंगे। जीवन में इनको जन्मभूमि के अतिरिक्त अन्य
स्थान में सफलता एवं उन्नति प्राप्त होगी तथा वहीं इनका जीवन सुख पूर्वक व्यतीत होगा। साथ
ही सांसारिक सुखोपभोग के साधनों को भी आप परिश्रम पूर्वक अर्जित करके सुखपूर्वक इनका
उपभोग करने में समर्थ होंगे।
इस लग्न में जन्मे जातक को जीवन में काफी समस्याओं एवं परेशानियों का सामना करना
पड़ेगा परन्तु अपने परिश्रम एवं दृढ़ संकल्प शक्ति के द्वारा आप इनका सामना तथा समाधान
करने में समर्थ होंगे। इनकी प्रवृत्ति तथा उदारता तथा सहिष्णुता का भाव भी विद्यमान रहेगा
तथा अवसरानुकूल अन्य जनों को आप अपना सहयोग प्रदान करेंगे। जिससे आपके प्रति लोगों
के मन में आदर का भाव उत्पन्न होगा।
मेषलग्न मे जन्मे जातकों के सांसारिक कार्य यद्यपि विलम्ब से सिद्ध होंगे परन्तु गौरव
एवं सम्मान मृत्युपर्यन्त बना रहेगा। कार्य क्षेत्र में आपको परिश्रम से उन्नति प्राप्त होगी तथा
सामाजिक जनों के मध्य भी समय पर मान सम्मान मिलता रहेगा। आपको अपनी प्रवृत्ति का
अन्य जनों के समक्ष सादगी पूर्ण प्रदर्शन करना चाहिए तथा इसमें अनावश्यक दिखावे का
समावेश नहीं होना चाहिए। इस प्रकार से जीवन में आपको इच्छित सुख, ऐश्वर्य एवं वैभव की
प्राप्ति होगी। इस प्रकार आप एक परिश्रमी, तेजस्वी, कार्य निकालने में चतुर परन्तु मन्द गति से
कार्य करने वाले व्यक्ति होंगे तथा जीवन में आवश्यक सुखों का उपभोग करने में समर्थ होंगे।
मेषलग्न के जातक बहुत ही परिश्रमी व साहसिक कार्यों में रुचि लेने वाले होते हैं। ऐसे
व्यक्ति प्राय: खेल-कूद, शिकार, सैनिक व पुलिस विभाग, मशीन, भट्टी व ज्वलनशील पदार्थों
तथा धातु रंजन इत्यादि वस्तुओं में रुचि लेते देखे गए हैं।
धार्मिक विचारों में मेषलग्न वालों की दृष्टिकोण अन्य लोगों से भिन्न होता है। आप
शक्ति के उपासक हैं। ऐसे लोग अपने बात के धनी होते हैं तथा लग्न अग्नितत्त्व प्रधान होते
हुए भी ऐसे जातक बात के धनी एवं शर्त के कट्टर होते हैं। किसी से किसी हद तक प्राय:
झगड़ा करना पसन्द नहीं करते परन्तु यदि कोई जब सीमा उल्लंघन करने की चेष्टा करता है
तो उसे जबरदस्त सबक सिखाए बिना नहीं रहते। युद्ध कला में प्रायः ऐसे व्यक्ति निपुण होते
हैं। भूमि व कोर्ट-कचहरी संबंधी कार्यों में ये प्रायः विजय प्राप्त करते हैं।
यदि आपका जन्म 21 मार्च व 20 अप्रैल के मध्य हुआ है तो आपका भाग्योदय निश्चित
रूप से 28 वर्ष के पश्चात संभव है। आप पूर्णतः स्वनिर्मित व्यक्ति हैं। आप अपना भाग्य स्वयं
बनाने वाले व्यक्तियों में से हैं। परन्तु याद रखें बिना परिश्रम से आपको विशेष लाभ होने की
संभावना नहीं है।
मेषलग्न के बारे में विशेष ज्ञातव्य तथ्य
→ मेषलग्न में बैठा मंगल स्वगृही होगा। अत: मांगलिक दोष कम देगा।
मंगल अश्विनी नक्षत्र में होगा तो किसी से बिल्कुल नहीं बनेगी।
मेष में मंगल, मंगल दोष नहीं बनाता है।
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लग्न में चंद्र हो, मंगल भी हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा।
लग्न में गुरु+बुध हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा। मंगल+गुरु चंद्र बुध युति हो तो दोष
नहीं होगा।
सूर्य लग्न में होगा तो उच्च का होकर भी पंचमेश है। वैधव्य दोष पूर्वश्लोकानुसार नहीं
देगा। पर अंग में कुछ दोष करेगा।
लग्न में शनि नीच का होकर बहुत दुःख व संघर्ष देगा। शनि अग्नितत्त्व राशि में होने
से स्वभाव कुछ मिलनसार पर ईर्ष्यालु होगा। ऐसी महिला जातक सरल व वचन की
पक्की प्रमाणिकता वाली होगी। परन्तु साहस के काम क्रोध, झगड़ा और वाद-विवाद
में रुचि वाली होगी। काम में कुशल होगी पर हमेशा असंतुष्ट रहेगी। स्वयं कमाएगी या
नौकरी वाली होगी।
लग्न में केवल मंगल+शनि की युति हो तो जातक स्वयं आत्महत्या कर सकता है। या
आकस्मिक मृत्यु, कारागारवास हो सकता है।
शनि+चंद्र का योग लग्न में हो तो दुष्ट स्वभाव की महिला होगी व चरित्र भ्रष्ट भी हो
सकती है।
लग्न में कोई ग्रह न हो तो ऐसा जातक धर्म परायण, समाज में प्रगति वाला जाति में आदर
की दृष्टि से देखा जाने वाला होगा।
मेषलग्न की महिला जातक
इस लग्न में जन्मी महिला के शरीर का रंग चंद्रमा के नवांश के अनुसार होता है। चंद्रमा
जिस नवांश में हो उसके अधिपति के अनुसार रंग का विचार प्राय: करना चाहिए। परन्तु
जन्माक्षर बनाते वक्त ज्योतिषी प्रायः जन्म व राशि कुण्डली ही लिखते हैं। अतः जन्म की राशि
और लग्न के मिश्रण से स्वभाव व रंग निरूपण करना प्रभावी रहता है। जन्म लग्न को देखने
वाले ग्रहों की दृष्टि का समन्वय भी चरित्र-चित्रण सहायक होगा।
मेषलग्न में उत्पन्न नारी हमेशा शुद्ध स्वभाव की होगी। परन्तु वह दूसरों पर दोषारोपण
करने वाली होगी। हर काम में उतावली होगी। उसे क्रोध भी शीघ्र आएगा, ठंडा भी जल्दी होगी
पर गर्मी की चपलता दिल में उठी हुई रहती है। इसकी प्रकृति पितृ प्रधान होती है। वह बातचीत
करते करते कड़वे वाक्यों का प्रयोग करने में नहीं हिचकती। अपने भाई-बहनों से विशेष लगाव
नहीं रहता है। प्राय: अपने परिवार में बड़ी (ज्येष्ठ) होती है।
→ लग्न व चंद्र विषम राशि में हो तो स्त्री पुरुष की तरह कठोर स्वभाव वाली व पुरुष
समान साहसिक प्रकृति की होगी। मेष में मेष का चंद्र यह फल करेगा। शुभ दृष्टि व
पाप दृष्टि से चरित्र व स्वभाव में अंतर पड़ेगा। शुभ दृष्ट हो तो सुशीला अन्यथा दुष्ट
स्वभाव की होगी।
लग्नस्थ मंगल आठवें भाव पर दृष्टि करके एक्सीडेंट योग बनाएगा, यदि अनियंत्रित है।
अर्थात् मंगल किसी भी ग्रह की दृष्टि से रहित हो।
मेष राशि का मंगल लग्न में सिर दर्द व रक्त पीड़ा का अनुभव कराएगा।
मेष राशि का मंगल निर्भय व शेर की तरह पराक्रम कराएगा। क्रोधी व व्यसनी बनाएगा।
तीखे पदार्थ खाने में रुचि होगी। आग का भय रहेगा। पित्त रोग होंगे। स्वधर्म में रुचि
नहीं होगी, सुधारक मतों का पक्षपात करना यह अनुभव में आएगा।
मंगल सूर्य या चंद्र ये तीनों ही साथ हो तो व्यक्ति बहुत क्रूर व अल्पायु होगा। परन्तु
किम्बहुना योग के कारण राजा तुल्य ऐश्वर्य भोगेगा।
शरीर हट्टा-कट्टा रहेगा, बहुत खून का होना मेष का मंगल करेगा। बचपन में पेट के
रोग व दांतों का रोग भी देगा।
लग्न में मंगल वाली स्त्री स्वाभिमानी, पराक्रमी व सुंदर होगी तथा चुनरी मंगल वाली
महिला होगी।
लग्न में पाप ग्रह - सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु ये कुण्डली को मांगलिक तुल्य बनाते हैं।
सप्तम पर पूर्ण दृष्टि करके वैवाहिक सुख में भी कमी करते हैं।
मूर्तो करोति विधवादिनकृत कुजश्च । या फिर लग्नस्थित दिनकर कुरूते अंग पीड़ाम्
भूमि सुतो वितनुते रुधिर प्रकोपम्। से लग्न में मंगल व सूर्य की स्थिति को कष्टकारक
सर्वत्र माना गया है।
अर्थात्
"कुजाष्टमे कुटीला मृगांक्षी अनंगरंगा परपुरुषसंगा, मृतावयेषु कुलधर्म भंगा: "
जिस स्त्री का मंगल आठवें में हो वह मृगनयनी होती है, कुटिल होगी। नित नए
वस्त्राभूषण व शृंगार करने वाली होती है तथा परपुरुष के बहकावे में शीघ्र आती है।
कई बार अंतर्जातीय विवाह या परपुरुषप्रेम के कारण बदनाम होने से कुल का गौरव नष्ट
कर देती है।
लग्न में राहु स्थित हो तो 5वें दृष्टि करके संतान को बाधा करेगी। सातवें दृष्टि से पति
में पृथकता देगी। नवमी दृष्टि से भाग्य हीन भी करेगी।
लग्न में केतु हो तो व्यक्ति के शरीर का कोई अंग टूटता है या रोग बढ़ता है या अपघात
होता है। लग्नगत केतु के फल प्राय: सभी ज्योतिषियों ने अशुभ बताए हैं। इससे बांधवों
में कष्ट होता है दुर्जनों से व्यक्ति को भय रहता है। मानसिक चिंता व उद्वेग बढ़ते हैं।
वात पीड़ा होती है।
वैसे मेष राशि तीन नक्षत्रों के समूह से पल्लवित होती है। अतः संपूर्ण राशि में
केतु+शुक्र+मंगल+सूर्य का खास तौर पर प्रभाव सिमटा रहता है। अतः स्त्री के स्वभाव
में कुछ क्रोध लड़ने-झगड़ने, हर बात को अन्यथा ले लेने का स्वभाव होता है। ऐसी
महिला बहुत उतावली व तुरंत परिणाम चाहने वाली होती है। रंग सुंदर पर कुछ गेहुंआ 3
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वस्तु
ही होगा, ललाई उसमें रहेगी। यह बालावस्था में ही अपने माता-पिता के पास कम रहने
वाली होगी। वात-पित्त रोग से पीड़ित भी रहेगी। स्वभाव से कंजूस भी होगी। अपनी
को किसी को कम ही देना पसंद करेगी। खर्च भी कम करेगी। संग्रह का शौक होगा।
इसके जीवन में परदेश या विदेश यात्रा के अवसर प्राप्त होते रहेंगे। पति राजकीय
• अधिकारी, नेता, पुलिस अफसर, मिलट्री में अधिकारी, इंजीनियर, फौजदारी वकील,
समाज का प्रभावशाली व्यक्ति होगा। व्यापारी हो तो लाल रंग की वस्तुओं का फैन्सी
• स्टोर हो सकता है। संतान कई हो सकती हैं। गर्भपात भी संभव है। जीवन में मृत्युभय
(अपघात) तीन बार आता है। तीसरे वर्ष अग्नि से, 7वें वर्ष में कुत्ते या जानवर के काटने
का और 30वें वर्ष में चोट का। अत: खतरों से बचने के बाद 68 वर्ष तक अन्य कोई
मारक योग नहीं। मृत्यु पित्त दोष या गिरने से या विष खाने से संभावित होती है। विद्रोह
की भावना प्रबल होती है। चोरी-छिपे बातें सुनने की आदत होती है।
मेष लग्न (लग्नेश मंगल)
जब हम लग्न का विचार करें तो लग्न की राशि की प्रतीकात्मक आकृति को
अवश्य ध्यान में रखना चाहिए और उस राशि के स्वामी के स्वभाव/प्रकृति को भी।
इसी के आधार पर जातक के चरित्र आदि का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। मेष लग्न
प्रथम लग्न/प्रथम राशि है। इसका स्वामी उग्र एवं ऊर्जावान (मंगल) है जो
देवताओं का सेनापति भी है। मेष का अर्थ मेढ़ा है। मेढ़ा अग्निदेव का वाहन है।
अग्नि स्वयं में उग्र व ऊर्जावान है। मेढ़े का स्वभाव भी उग्र, लड़ाकू त्र आक्रामक
होता है। इसीलिए अग्नि का वाहन मेढ़ा माना गया है। मेष स्वयं भी अग्नि तत्त्व
राशि है। अतः यह सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि मेष लग्न का जातक उग्र,
ऊर्जावान, उत्साही, सक्रिय, शरीरवादी तथा आक्रामक व क्रोधी होगा। युद्ध की
प्रवृत्ति के साथ-साथ उन्नति व आगे रहने की प्रवृत्ति उसमें सहज ही होगी
(क्योंकि अग्नि का स्वभाव ही ऊपर उठना है। वह भले ही अल्प हो, भले ही
बुझने वाली हो, किन्तु अन्तिम समय तक ऊपर ही उठने की चेष्टा करती है) । यही
कारण है कि 'अ'/'A' अक्षर से प्रारम्भ होने वाले नाम के जातक ('अ' अक्षर मेष
राशि के अंतर्गत आता है। जो वर्णमाला का प्रथम अक्षर है और प्रथम नक्षत्र
अश्वनी से सम्बन्धित है) प्रायः तरक्की के शिखर पर पहुंचने वाले तथा अन्यों से
आगे रहने वाले होते हैं। यथा-सम्राट अशोक, सम्राट अकबर, सम्राट अलग्ज़ेंडर,
सम्राट अजातशत्रु, सम्राट अज इत्यादि ।
यहां लगे हाथ एक और बात की ओर पाठकों का ध्यान दिला दें कि 'र'
अक्षर अग्नि का बीजमंत्र (मंत्र विज्ञान के अनुसार) है। अतः ऊर्जा के लिए
महत्त्वपूर्ण है। देखने में आया है कि उन्नति के शिखर पर पहुंचने वाले यशस्वी व
प्रतापी/प्रतिभावान व्यक्तियों के नाम में 'र' अक्षर किसी न किसी प्रकार शामिल
रहता है। यथा-राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, जवाहर लाल नेहरू, राधाकृष्णन,
इन्दिरा गांधी, मोहनदास कर्मचंद गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव, चन्द्रशेखर,
बी.बी. गिरी, फखरूदीन अली अहमद, हरदनहल्ली देवगौड़ा, विश्वनाथ प्रताप
सिंह, लालकृष्ण अडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी, किरण बेदी, मुरली मनोहर
जोशी, बाल ठाकरे, अलाहिम लिंकन, सुषमा स्वराज, जॉर्ज बुश, जिमी कार्टर,
रोगन, एलीजाबेथ टेलर, विक्टोरिया मार्गेट मैचर, मैडम क्यूरी, सरोजनी नायडू,
जॉर्ज फर्नांडीज, वेंकटरमन, जगदीश चंद्र बरा, प्रेमचन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महादेवी
वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी, 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, उपेन्द्रनाथ
'अश्क', जैनेन्द्र कुमार, श्याम नारायण पांडे आदि ।
अब हम मेष लग्न के जातक की बात करेंगे। ऐसे जातकों की गर्दन कुछ
लम्बी, चेहरा कनपटियों के पास से चौड़ा, आकर्षक, किन्तु प्रायः त्रिकोणाकार,
कद मध्यम, माथे या चेहरे पर प्रायः चोट का निशान होता है। जातक मिष्ठान्नप्रेमी,
इच्छा पूर्ति के लिए कुछ भी कर डालने वाले तथा परिश्रमी होते हैं। ऐसे जातक
कार्य को बहुत उत्साह से आरम्भ करते हैं, किन्तु थोड़ा समय बीतने के साथ इनका
उत्साह मंद पड़ जाता है। फिर भी ये ध्येयपूर्ति होने तक शांत नहीं बैठते। ये लोग
यद्यपि बहुत ऊर्जावान होते हैं किन्तु इनके पास होश कम और जोश अधिक होता
है। जीवन में सफलता के लिए इनको किसी सुयोग्य व्यक्ति का परामर्श बहुत
जरूरी होता है।
ऐसे जातक दिल के साफ होते हैं। सामाजिक षड़यंत्र तथा सम्पर्क में आने
•वालों की धूर्तता/चाल इन्हें बहुत देर में समझ आती है। ये क्योंकि स्पष्टभाषी होते
हैं। अतः प्रायः दूसरे लोग इनसे रुष्ट हो जाते हैं। इनके दिल में जो होता है, वही
इनकी जबान पर रहता है। यदि इनके जीवन में कोई उद्देश्य सामने न हो तो इनकी
अतिरिक्त ऊर्जा को व्यय का मार्ग नहीं मिलता, परिणामतः ये चिड़चिड़े व क्रोधी
हो जाते हैं। वैसे ये साहसी, प्रभावशाली, महत्त्वाकांक्षी, हावी होने के स्वभाव
वाले, चंचल व निडर होते हैं
इनका रंग लालिमायुक्त गोरा व तांबई होता है। ये एकांत स्वभाव वाले,
आक्रामक प्रवृत्ति वाले तथा अच्छी शिक्षा वाले किन्तु अधीर होते हैं। प्रायः देखा
जाता है कि एक कार्य को समाप्त करने से पहले ही ये दूसरा काम शुरू कर देते हैं
ये स्वभाव से अस्थिर, हठी व कठोर होते हैं। दबंग व तेजस्वी स्वभाव के ये लोग
कभी-कभी अपराधी व हिंसक मानसिकता वाले या आतंकवादी होते हैं (यदि
लग्न अशुभ प्रभाव में हो तो)। ये लोग वहमी और शंकालु होते हैं और एक नम्बर
के अड़ियल भी। शरीर पतला किन्तु व्यक्तित्व व प्रवृत्ति 'डॉमिनेट' करने वाली
होती है। यदि मंगल शुभ प्रभाव में हो तो ये लोग पुलिस, सेना, सर्जरी, साहसिक
या प्रशासनिक कार्य करने वाले होते हैं। सिंह, तुला व धनु लग्न वालों से मित्रता इनको शुभ रहती है। लग्न दूषित हो तो इन्हें बुखार, मस्तिष्क ज्वर या मस्तिष्क
सम्बन्धी रोग हो सकते हैं।
यदि मेष लग्न में लग्नेश मंगल लग्न में ही बैठा हो तो जातकों का रंग लाल
होता है। मिष्ठान्नप्रियता तो रहती है, परन्तु पित्त प्रकृति विशेष होने से उसके दमन
स्वरूप जातक ठण्डी वस्तुएं या पेय अधिक सेवन करते हैं। अल्पभोगी तथा शीघ्र
रूठने व शीघ्र मान जाने वाले होते हैं। लाल वस्त्र पहनने में रुचि रहती है। जातक
पराक्रमी, वीर तथा रजोगुणी होते हैं। ऐसे जातक बहुत अधिक न्यायप्रिय होते हैं।
किसी पर होता अन्याय इन्हें बर्दाश्त नहीं होता और ये सक्रिय रूप से शारीरिक
विरोध करते हैं (यदि सूर्य भी प्रथमस्थ हो तो शिक्षा में सहयोगी रहता है किन्तु
क्रोध बढ़ा देता है)। यदि मंगल व गुरु दोनों शुभ स्थानों में स्थित हों तो जातक
I.A.S. ऑफीसर, I.P.S या अति उच्च पद पर या अपने विषय में एथॉरिटी बनते हैं।
यदि सर्जन ही बनें तो बहुत नामी, निपुण व उच्च कोटी के होंगे। सूर्य की
POSTING भी अच्छी हो तो उच्च सरकारी पद निश्चित ही प्राप्त करते हैं।
मेष लग्न में लग्नस्थ मंगल बत्तीस दांतों वाला, सत्यभाषी तथा शाप या
दुर्वचन को फलित कर देने के असर से सम्पन्न होता है। ऐसे जातक उदररोगी होते
हैं। पत्नी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। जातक मानसिक तौर पर दुखी रहते हैं।
किन्तु शरीर से हट्टे-कट्टे होते हैं (मंगल के साथ बुध भी हो तो जातक ब्लडप्रेशर
के रोगी या रक्तविकार वाले हो सकते हैं तथा वह झूठ बोलने वाले व चोरी करने
वाले भी हो सकते हैं)। ऐसे जातक अपने भाइयों की विशेष सहायता करने वाले
या उनके पालक होते हैं। इन्हें भूख बहुत लगती है। यह अधिक खाते हैं परन्तु
जल्दी ही पचा भी लेते हैं। आयु के 8वें वर्ष में इनको संकट रहता है। ऐसे जातकों
के प्राय: भाई जरूर होते हैं (अकेली संतान नहीं होते) । यदि लग्न में मंगल के
साथ शनि या गुरु हो तो जातक के जोश में होश का समावेश हो जाता है। किन्तु
मंगल के साथ राहू हो तो गृहस्थ सुख व पत्नी के लिए संतान व भाग्य के लिए
अवरोध हो जाता है। मंगल के साथ केतु लग्न में हो तो जातक को बार-बार चोट
लगती है। जीवन झंझटों में घिरा रहता है। मानसिक अन्तर्द्वन्द्व बना रहता है।
सन्तानोत्पत्ति कठिन हो जाती है। विधुर होना सम्भव होता है। गृहस्थ असफल
रहता है। इस लग्न वाले जातकों को सूर्य व गुरु विशेष शुभ फल देने वाले होते हैं।
मेष लग्न वालों में कोई ग्रह केन्द्राधिपति दोष में नहीं होता, किन्तु कोई ग्रह
योगकारक भी नहीं होता।
के
 मेष लग्न में यदि सूर्य पंचमस्थ हो
तो योगकारक माना जाता है। अथवा सूर्य की युति केन्द्र (1,4,7,10 भाव) के
स्वामियों में से किसी से हो जाए तो भी योगकारक माना जाएगा, क्योंकि यह
‘राजयोग' बनाएगा (मेष लग्न में सूर्य की सर्वोत्तम युति शनि के साथ होती है)।
मेष लग्न में चन्द्रमा क्योंकि चतुर्थेश होता है। अतः वह केन्द्र से बाहर बैठे और
कृष्ण पक्ष का (क्रूर) हो तो शुभ हो जाता है। शुक्र मेष लग्न में एक प्रकार से
केन्द्राधिपति दोष में जाना जाएगा क्योंकि इसकी दूसरी राशि न्यूट्रल भाव (मारकेश)
में चली जाती है।
मेष लग्न के जातक वैज्ञानिक/तार्किक सोच वाले होते हैं। वे हर बात का
प्रूफ/तर्क (LOGIC) मांगते हैं। महत्वाकांक्षी बहुत होते हैं। आदेश मानने/शासित
होने की बजाय वे आदेश देना/शासन करना पसंद करते हैं। गुस्सा जल्दी आता है।
ऐसे जातक तो किसी काम को करते नहीं, करते हैं तो EXTREEM तक जाते
हैं। यद्यपि भावुक होते हैं। सौंदर्य व कलाप्रेमी भी होते हैं, परन्तु सोच PRACTI-
CAL और विचारधारा स्वतंत्र होती है। ऐसे जातक पैनी-दृष्टि, लम्बे किन्तु तिकोने
चेहरे, लम्बी गर्दन, चौड़ा माथा, ठोड़ी संकीर्ण, रंग ललाई लिए हुए, बाल घुंघराले
व भूरे, दांत अच्छे, आंखें गोल आदि शारीरिक विशेषताओं वाले औसत कद-काठी
के परन्तु गठे हुए शरीर वाले होते हैं। यदि लग्न पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो या लग्नेश
पाप पीड़ित हो तो इनको मानसिक असंतुलन से ग्रस्त होने की तीव्र सम्भावना
रहती है।
मेष लग्न में यदि लग्नेश छठे घर में हो तो ऐसे जातकों के प्राय: सेना, पुलिस
या MEDICAL (सर्जरी विशेषकर) में जाने की तीव्र सम्भावना होती है। यदि ये
सर्जन न होकर फिजीशियन होंगे तो किसी न किसी अंग के विशेषज्ञ होंगे यद्यपि
ऐसे जातक ऋणी भी होते हैं। परन्तु लग्नेश की दशा या मध्यायु में सब कर्ज उतार
देते हैं।
रोग ज्योतिष के अनुसार मेष लग्न वालों को मांस या मांसपेशियों से सम्बन्धित
रोग पीड़ित कर सकते हैं। दिमाग तथा अंडकोषों के रोग और रक्तपित्त के रोग
सम्भावित होते हैं। यदि मंगल नीच का हो तो छाती के रोग भी देता है।
विशेष (रोग) - मेष लग्न में षष्ठेश यदि लग्नस्थ हो और पाप ग्रहों से दृष्ट
हो तो ऐसे जातक आंखों से जलस्राव के रोग के शिकार होकर दृष्टिमंदता से पीड़ित
होते हैं या अंधे हो जाते हैं।
मेष लग्न में पापग्रह हों और लग्नेश निर्बल हो तो ऐसे जातक सदैव रोगों
से पीड़ित ही रहते हैं।
मेष लग्न में लग्नेश यदि शनि और बुध के साथ चौथे या बारहवें भाव में
युति करे तो कुष्ठ रोग संभव होता है।
मेष लग्न हो, शनि, मंगल व चन्द्र लग्नस्थ हों, गुरु षष्ठस्थ हो तो भी कुष्ठ
रोग सम्भावित होता है।
मेष लग्न में चन्द्र, शनि व लग्नेश तीनों की युति दुःस्थानों में हो तो ऐसे
जातकों की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।
मेष लग्न में शनि लग्नस्थ, चन्द्रमा चतुर्थस्थ, सूर्य एवं शुक्र द्वादशस्थ हो
तो जातक, 24वें वर्ष में पोलियो या रक्तपित्त के दोषों से रुग्ण होते हैं।
मेष लग्न में वृश्चिक का सूर्य, पाप मध्य तथा पापदृष्ट हो तो जातकों को
हार्टअटैक होता है।
मेष लग्न में राहू चौथे भाव में बैठकर अन्य पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो भी
हार्टअटैक होता है।
मेष लग्न में जन्मकुंडली कालपुरुष की कुंडली के समान होती है (प्रथम
भाव में प्रथम तथा क्रमश: द्वादश भाव में बारहवीं राशि ही होती है)। यह मेष लग्न
की विशेषता है। शुक्र 2 व 7 भावों का स्वामी रहता है। ये धन व पत्नी के स्थान
हैं किन्तु मारकेश भी हैं। अतः शुक्र इन्हें शुभ नहीं रहता। बुध 3 व 6 भावों का
स्वामी मेष लग्न में होता है। तीन साहस का भाव है और छठा रोगों का। अतः यह
शुभाशुभ (अशुभ अधिक) रहता है। चन्द्रमा चतुर्थ भाव का स्वामी होता है और
सूर्य पंचम का। चौथा भाव सुख व पांचवां संतान व विद्या का है। अतः चन्द्र इन्हें
सम व सूर्य शुभ रहता है। इनका लग्नेश मंगल (1,8) ही अष्टमेश होने से इन्हें
शुभाशुभ रहता है। गुरु भाग्येश के साथ व्ययेश (9,12) होने से शुभाशुभ (शुभ
अधिक) होता है और यही स्थिति शनि (10,11) की भी होती है। अतः कोई ग्रह
इन्हें निर्विवाद रूप से पूर्ण शुभ एवं योगकारक नहीं होता। केन्द्राधिपति दोष में भीनहीं होता।

मेषलग्न में रत्न धारण का वैज्ञानिक विवेचन
1. माणिक्य-मेषलग्न में सूर्य पंचम त्रिकोण का स्वामी
11 है और लग्नेश मंगल का मित्र है। अतः मेषलग्न के जातक
को बुद्धि-
द-बल प्राप्त करने, आत्मोन्नति के लिए संतान सुख,
प्रसिद्धि,
६, राज्य-कृपा प्राप्ति के लिए सदा माणिक्य धारण
करना चाहिए। सूर्य की महादशा में उसको धारण करना,
अत्यंत लाभदायक होगा।
10
8
6
2. मोती-मेषलग्न की कुण्डली में चन्द्र चतुर्थ भाव का स्वामी है। चतुर्थ चन्द्र लग्नेश
मंगल का मित्र है। अत: मोती धारण करने से मेषलग्न के जातक मानसिक शान्ति, मातृ सुख,
विद्या-लाभ, गृह-भूमि लाभ आदि प्राप्त कर सकते हैं। मोती चन्द्र की महादशा में विशेष रूप
से फलप्रद होगा। यदि मोती लग्नेश मंगल के रत्न मूंगे के साथ पहना जाए तो और भी अधिक
लाभकर होगा।
3. मूंगा-मंगल लग्न का स्वामी है। अतः मेषलग्न के जातक को मूंगा आजीवन धारण
करना चाहिए। उसके धारण करने से आयु, बुद्धि, स्वास्थ्य में उन्नति, यश मान प्राप्त होगा तथा
जातक सभी प्रकार सुखी होगा। यह इस जातक का 'जीवन रत्न' है।
4. पन्ना-मेषलग्न के लिए बुध दो अनिष्ट भावों-तृतीय और षष्ठ का स्वामी है। अतः
इस लग्न के जातक को कभी नहीं पहनना चाहिए।
5. पुखराज-मेषलग्न के लिए गुरु नवम (त्रिकोण) और द्वादश भाव का स्वामी है। नवम
का स्वामी होने के कारण गुरु इस लग्न के लिए शुभ ग्रह माना गया है। अतः पुखराज धारण
करने से जातक की बुद्धि, बल, ज्ञान, विद्या में उन्नति, धन, मान-प्रतिष्ठा और भाग्य में उन्नति
होती है। गुरु महादशा में पुखराज धारण करना ज्यादा लाभदायक सिद्ध होगा। यदि इसे मूंगे
के साथ धारण किया जाए तो बहुत लाभप्रद होगा।

मेष लग्न 
मूल देवता सूर्य 
बीजसमूह मन्त्र
ॐगंह्रांह्रींह्रौंरंघृणिद्रांक्ष्रौंह्लींश्रींदंक्रींभ्रं  ऐंह्रींश्रींस्त्रींहुंफट्।शिवाये नीलसरस्वत्यैनमः"

सूर्य : अंक 1 पंचमेश होने से शुभ ग्रह हो जाता है। इसकी दशा में नवीन कार्यों का आरंभ होता है यह जितना बलीहोगा, उसी अनुपात में फल देगा। भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है।सूर्य भगवान् को अर्ग देवे, माणक 1 मुखी रुद्राक्ष, सांड को आटा खिलाये या खिलावेमंदिर में चाँदी का नंदी भेट करे l बेल की जड़ी पहने आदित्य ऋदय स्तोत्र, सूर्य कवच का पाठ करे सप्तमी, रविवार का व्रत रखे  ॐ घृणिः सूर्याय नमः बेल का वृक्ष लगावे बेल का फल शिव पर चढ़ावे l

चंद्र : अंक 2 चतुर्थेश होकर निर्बल हो जाता है। यदि पक्ष बली हो, तो दशा भी श्रेष्ठ होगी अन्यथा दशा में भवन की हानि और राजभय की संभावना रहती है। निर्बल चंद्रमा होने पर जनता से विरोध प्राप्त होता है
मोती धारण करे 2 मुखी रुद्राक्ष धन कुटुंब और वैभव वाणी शुभ मोती धारण करे, चावल खावे दूध पिए मोती मूनस्टोन पहने चाँदी की स में पानी पिए, रोहिणी,चतुर्थी, पूर्णिमा का व्रत रखे खिकी जड़, और 2 मुखीरुद्राक्ष पहने दूज के चाँद देखे शिवाभिषेक करे l

मंगल : अंक 9 लग्नेश होने से शुभ और अष्टमेश होने से अशुभ होता है। लग्नेश होने के बावजूद मंगल की स्थिति शुभ नहीं कही जा सकती है। यदि मंगल दशम भाव में हो, तो शुभ होता है। राउंड मुंगा पहने 3 मुखी रुद्राक्ष अत्यधिक शुभ लाल मूंगा धारण करे, अनंत मूल की जड़ी, 3 मुखी रुद्राक्ष पहने, ताम्बे का कड़ा ताम्बे में जल पिए, हनुमानजी को पूजे, हनुमानजी, नरसिंह जी, रक्तांग भैरवजी पूजे, नीम का पेड़ लगावे, ताम्बे में मंगल यन्त्र धारण करेl मंगलवार का व्रत स्कन्द षषटी मुरुगन कार्तिकेय की आराधना

बृहस्पति : अंक 3 मेष लग्न में बृहस्पति की स्थिति कमोवेश मंगल सदृश्य है। नवम जैसे अत्यंत शुभ भाव के स्वामी होने से बृहस्पति की स्वयं के अंतर के अलावा शेष दशा शुभ होती है। सफ़ेद पुखराज पहने 5 मुखी रुद्राक्ष शुभ अमृत कारक आयुष्य के लिए सर्वश्रेस्ठ बृहस्पति लग्नेश होने से सबसे श्रेष्ठ, पुखराज , सुनहला, सिट्रीन रत्न धारण करे 5 मुखी रुद्राक्ष और भारंगी की जड़ी पहने, पीतल में खाना खावे, पीपल का पेड़ लगाए सीचे और शनिवार को  के तेल का दिया करे, बृहस्पति यंत्र इंडेक्स फिंगर में सोने में पहने, पुष्करतीर्थ में स्नान और पूजन करावे, दक्षिणमुखीशिव, दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे उनको गुरु  बनावे

शनि : अंक 8 राज और लाभ का स्वामी होने से शनि की दशा शुभ फल देगी। शनि यदिअस्त, नीचगत, शत्रुक्षेत्री या अष्टमस्थ न हो, तो शुभ फल मिलते हैं। स्थायी और अचल संपत्तियों की प्राप्ति होती है। व्यवसाय में लाभ होता है। सर्वदा शुभ नीलम धारण करे काल भैरव शिव कृष्ण काली जी को पूजे बिच्छू की जड़ पहने 7 मुखी रुद्राक्ष पहने काली उपासना करे फिरोज़ी रंग  साडी दान करे फिरोज़ी पंखे दान करे फ़िरोज़ा रत्न दान करे

बुध : इस समय रचनात्मक कार्यों में गतिविधियां बढ़ती हैं। बुध की दशा का उत्तरार्ध रोगग्रस्त और ऋणी बनाता है। हरी घास दान करे

शुक्र : द्वितीयेश और सप्तमेश होने से प्रबल मारकेश है। इस दशा में क्लेश, मृत्युभय, स्त्री को कष्ट और रोगों में वृद्धि होती है। सफ़ेद मूँगा पहने  6 मुखी रुद्राक्ष

राहु अंक 4 अगर 3-6-11  में हो तो शुभ अन्यथा ख़राब
केतु :  अंक 7 शुभ कारी टाइगर ऑय धारण करे
दान
जौ, बाजरी, प्याज लहसुन ,जूता टोपी  छाता चप्पल कम्बल  काले सफ़ेद तिल कील कोयला काली उड़द मूली गोमेद लहसुन चाकू

कॉम्बो उपाय (सिंगल शॉट)
बुध : मूंग
शुक्र :  ज्वार
राहु : जौ
केतु : बाजरा
गुरु :  मक्का
मंगल :  मसूर
9,18,27,54,81,108 kg
हरीघास की रोज 5, 5,14,23,32,41,50
मुफ़ली का तेल गुड़ की पेटि गौशाला में दान  करे
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1.मेष लग्न के इष्ट - मंत्र-

मेष राशि लग्न : इस राशि के जातक रक्त हरिद्रा गणेश सूर्य हनुमान भैरव नारायण भगवती तारा, नील-सरस्वती या माता शैलपुत्री की साधना करें।
मेष राशि लग्न के जातक इस मंत्र का जप 108 बार रोज करें ।
ॐ लं लम्बोदराय नमः
ॐघृणि सूर्य आदित्य श्रीं
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ॐऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै
ॐ हौं जूं सः
मेष लग्न राशि बीज मंत्र
ॐ ग्लौंलंरंहंदंह्लींहौंक्रींभ्रंऎंक्लींसौः |
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:
इसके अलावा ये गृह आपके अनुकूल रहेंगे तो इनका जाप करते रहे दान न करे इनकी दशा में जप करावे
भौम मंत्र- 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'।
भौम एकाक्षरी मंत्र- ॐ ॐ अंगारकाय नम:।
सूर्य तांत्रिक मंत्र- ॐ ह्रां ह्रीं हौं स: सूर्याय नम:।
एकाक्षरी बीज मंत्र- ॐ घृणि: सूर्याय नम:
गुरु मंत्र- 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:'।
गुरु का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ ब्रं बृहस्पतये नम:'।
शनि मंत्र- 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:'।
शनि का एकाक्षरी मंत्र- 'ॐ शं शनैश्चराय नम:'
मेष- लग्न के लिए सूर्य, चन्द्र मंगल, गुरु,रूद्र, अरुण, वरुण  शनि  योग कारक ग्रह हैं। अतः इनके लिए माणिक्य, मोती, मूंगा, पुखराज, सफ़ेद पुखराज, नीलम,ओपल, फ़िरोज़ा, टाइगर,  धारण कर सकते हैं और  1,2,3,5,6,7,8मुखी रुद्राक्ष स्वास्थवर्धक हो सकता है।
Astromechanics-7073520724
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दान के गृह
बुद्ध अंक 5
बुध के लिए,हरा रंग हरा पन्ना, हरी घास, किन्नर को दान, हरी साडीया, मटकी, कुल्लड़, कटोरी, भरनी, हांंड़ी, हरे कपडे ,इलैची,पान, हरी पत्तेदार सब्ज़िया,धनिया,पालक, मेथी, खड्डे वाली वस्तुवे, मुंग दाल ढोकली, पास्ता, पाइप, गले कक चैन, नाक की नथ, अंगूठी, हरा बल्ब, निरोध, हाथ पांव के दस्ताने, बच्चियों के कपडे, चमड़े के सामान, वाद्ययन्त्र, माइक, स्पीकर, रेडियो,  ढोलक, तबला, हारमोनियम, मजीरा, सितार, गिटार, बांसुरी, ताम्बे के खड्डेवाले सिक्के, सांभर वडा, 5₹सिक्का,  फिटकरी  मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे के बर्तन, हाथी दाँत और कपूर का दान किया जाता है। ध्वनि यन्त्र माइक, स्पीकर, हैडफ़ोन,

शुक्र ग्रह अंक 6,
6 मुखी रुद्राक्ष, सरपौंखा की जड़, हीरा प्लैटिनम चांदी  स्टील वाइट metal,का 6ग्राम सिक्का, श्रीयंत्र, छोला,सफ़ेद काबुली चने, मैदा,  कमलगट्टा , सफ़ेदक्रीम, पनीर , मक्खन, दही,  चावल, ज्वार, सफ़ेद उड़द दाल, मिश्री, दूध, दही लस्सी, श्रीखंड, इत्र, सफेद चंदन, चांदी, प्लैटिनम, हीरा, अमेरिकन डायमंड, सफ़ेद पुखराज, ओपल, मोज़ोनैट, बंगाली छैने की सफ़ेद मिठाई, मलाई, कपूर, इत्र, कमल ककड़ी, धूपबत्ती, खुशबु की वस्तुवे,टेलकम पाउडर, श्रृंगार सामग्री, मोगरा चमेली सफ़ेद खुशबूदार पुष्प, इत्र परफ्यूम डीओ, फ्रग्रेंस, कद्दू,आलू,शक्करकंद, आगरे का पेठा, मखाने, सफ़ेद क्रिस्टल, led लाइट, गन्ना, सफ़ेद मावा मिश्री, काजू कतली, दूधबर्फी, बताशा, आभूषण, सिल्क रेशम, मखमल, सफ़ेद मूंगा, sunscreen लोशन, क्रीम, टूथपेस्ट, स्त्री सौंदर्य सामग्री, सैनेटरीपेड, स्त्री प्रसाधन, ब्रा-पेंटी,   मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, आराम की सामग्री, मनोरंजन सामग्री, सिंघाड़ा, साबूदाना , आलू के बने व्यंजन, निरोध, वियाग्रा,

राहु-केतु के दान अंक 4-7

नीलेफूल, मैग्गी, चौमीन, सोया सॉस ,फ़ास्ट फ़ूड, अंडा नॉनवेज, चाय, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, आईटी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, ईरफ़ोन, mic, स्पीकर, मुखौटा,  नशे, डबल रोटी ब्रेड, बासी भोजन, स्टील, अस्ट धातु या पांच धातु या मिश्रण धातु के आइटम, लेड शीशा, पीतल, कांसा, स्टील के बर्तन  जौ-बाजरा,प्याज-लहसुन,काले-सफ़ेद तिल, मशरूम, ऊनि- टोपी, जूता, छाता, चप्पल कम्बल, एलोपैथिक होम्योपैथिक दवाइयाँ, चाकू छुरी, तलवार कटार, ढाल, कपडे, शराब, मादक पदार्थ, खट्टे आइटम, डेटोल, स्पिरिट, पोछा, वाशिंग मशीन, साबुन डिटर्जेंट, केमिकल, तेज़ाब, एसिड, पोइसन, केमिकल स्प्रे, radio, मोबाइल, ट्रांजिस्टर, इंडक्शन चूल्हा, शमशान की लकड़ी, पलंग, पूरानी लकड़ी के आइटम हेंडीक्राफ्ट   काले-दुरंगे कुत्ते, राहु के लिए काला-नीला कपड़ा, कंबल, सरसों का दाना, राई, ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का ‍दान किया जाता है।
केतु के लिए सात अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान किया जाता है।
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गणेश मंदिर :  बुद्धवार, लाल या हरे पत्थर के गणेश जी की मूर्ति
लड्डू, पान, दूर्वा चढ़ावे और गणेश अष्टक का पाठ करे मॉस की दोनों  चतुर्थी का व्रत करे मंत्र स्तोत्र कवच का पाठ करे गणेश यंत्र केतु यन्त्र NE
में लगावे
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विष्णु लक्ष्मी मंदिर:  मंदिर में जावे बेसन चक्की और दूध की बर्फी केले भोग नैवेद्य ॐ श्रीं दं नमः पूर्णिमा, एकादशी, द्वादशी का व्रत रखे सूर्य यन्त्र विष्णु यन्त्र बुद्ध यन्त्र उत्तर में
ग्रह            अवतार
सुर्य           राम अवतार
चंद्रमा        कृष्ण अवतार
मंगल         नरसिंह अवतार
बुध           बुद्ध अवतार
बृहस्पति    वामन अवतार
शुक्र          परशुराम अवतार
शनि ग्रह     कूर्म. (कछुआ) अवतार       राहु     वराह  (सुअर/सूअर) अवतार
केतु          मत्स्य अवतार

राम:  अयोध्या राम दरबार जावे  रामायण का पाठ करे राम दरबार का पूजन करे रामचरित मानस का पाठ करे ॐ रां रामाय नमः
नवमी का व्रत रखे राम मंदिर जावे राम नाम का जप करे

कृष्ण:  मासिक जन्मास्टमी का व्रत रखे, काले रंग की कृष्ण मूर्ति श्रीनाथ जी, वृन्दावन मथुरा गिरिराज जी द्वारिका, नाथद्वारा में दुग्धाभिषेक करावे ॐ क्लीं कृष्णाय नमः का जाप करे, माखन मिश्री
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देवी दुर्गा मंदिर
/लक्ष्मी/सरस्वती/काली दुर्गा की उपासना, सोम, बुध, शुक्रवार की शाम को करे वैभव लक्ष्मी, कीलक,अर्गला, कवच
सिद्धकुंजिका का पाठ करे, बीसा, नवदुर्गा, दशविद्या, श्री  यन्त्र स्थापित करे पूजा में, तीज, शुक्लस्ट्मी, शुक्ल नवमी को व्रत रखे  

सूर्य मंदिर : रविवार, सप्तमी का व्रत
रोली चावल जल से नित्य अर्घ दे
आस्तोत्र, अष्टक, कवच का पाठ सूर्य यन्त्र स्थापित करे पूर्व दिशा में 
गायत्रीमन्त्र स्तोत्र कवच का पाठ
राम उपासना रामायण का पाठ

काली मंदिर : शनिवार  चढ़ावे : माँ काली को प्रथम भेट में पांव की पायल भेट करे और सरसो के तेल का दिया मोगरा माला मोगरा धुप , मोगरा इत्र कटार,त्रिशूल, कटार, मालपुआ, इमरती, मूंग दाल कचौड़ी, दही बडा,मोगरे इत्र,धुप, बेसन की चकी,मीश्री गूंजा ,सेव, अनार, पान, सरसो के तेल का दिया लगावे  108 बार मंत्र बोले ॐ क्रीं क्रीं क्रीं कालिकायै नमः कवच स्तोत्र का पाठ काली यंत्र शनि यंत्र पश्चिम में लगाए  

भैरव मंदिर : शनिवार, रविवार, कृष्ण पक्षअस्टमी कालाष्टमी का व्रत, कट्टार, त्रिशूल, शनि या रवि वार को मालपुआ  इमरती कचौी बड़े, दाल के बड़े, पापड,  उड़द की दाल,चूरमा, शसिगरेट पान चढ़ावे और मंत्र है ॐ भ्रं भैरवाय नमः, भैरव यंत्र sw में लगावे राहु यन्त्र लगावे

हनुमान मंदिर : मंगल शनि
गदा की भेट, चमेली आवला का दिया 5 इमरती 5 गुलाब पुष्प,सिन्दूर चमेली तेल गुड़ चना पान चढ़ावे
llॐ हं फ़्रौं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट ll दक्षिण में मंगल यन्त्र पांच मुखी हनुमान यन्त्र स्थापित करे
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शिव मंदिर : कच्चादूध जल और शक्कर का घोल शिवलिंग पर चढ़ावे
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, पुष्य नक्षत्र,  व्रत , रुद्रास्टाध्यायी, अभिषेक लोटा जल, कच्चा दूध, शक्कर, बिल्वपत्र(बुधवार),  पान, गन्ने का रास दीप, पान
मंत्र ॐ ह्रीं नमः शिवायै च
ह्रौं नमः शिवाय 
पूर्व उत्तर में केतु गुरु यन्त्र उत्तर में
बारह ज्योतिर्लिंग और उनका राशियों से संबंध
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कमला लक्ष्मी मंदिर
मिश्री दही दूध बताशा गन्ना श्रीफल केला पान सुपारी मखाना साबूदाना चावल की खीर मोगरे का इत्र माला धुप ,मिश्री मावा अनार सेब
श्रीयंत्र स्थापित करे कनकधारायंत्र कुबेर यंत्र स्थापित करे श्रीसूक्त, कनकधारा, लक्ष्मीसूक्त, पद्मावती, श्रीविद्या,लक्ष्मीअष्टक,त्रयोदशी,  अमावस्या पूर्णिमा, अष्टमी तृतीया त्रयोदशी लक्ष्मी कमला त्रिपुर सुंदरी कवच मन्त्र पत्नी से करावे
षोडशी श्री विद्या मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:।'
या
ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:
ॐ ह्रींश्रींक्लीं महालक्ष्म्यै नमः
ॐश्रीं श्रियै नमः
ॐकमलवासिन्यै स्वाहा
ॐ कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हं सौः जगतप्रसूत्यै नमः

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पितृदोष : दत्तात्रेय भगवान की पूजा करे , त्रिपिंडी, नारायणबलि, करावे
अमावस्या बुद्धवार को व्रत उपवास रखे विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करे
रामायण, भागवत का पाठ करावे
गौशाला ब्राह्मण को दान करे
पीपल सींचे : दत्तात्रेय यन्त्र राहु यन्त्र SW लगावे  में मंगलवार और रविवार को न सींचे सुबह 10:00  से 12:00. के बीच पीतल, चाँदी, स्टील के जग या बड़े लोटे में कच्चादूध, गंगाजल, चावल, सीके  हुवु चनो का सत्तु, किशमिशदाख, शक्कर/बताशा मिलाकर घोल बना कर पीपल की जड़ो में अर्पित करे 
llॐ पित्राय स्वधाll तरपत्यांx3
    2. त्रिपिंडी
    3. दत्तात्रेय भगवन की मूर्ति या तस्वीर पूजा रखे पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष पूजा करे स्तोत्र मंत्र कवच
ॐ द्रां दत्तात्रेय नमः
पितृदोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
प्रेत दोष निवारक यन्त्र स्थापित करे
दत्तात्रेय यन्त्र स्थापित करे


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