संवत्सर_कालात्मा_विषुवान्
संवत्सर_कालात्मा_विषुवान्
१- द्वादशमास बाँटने का मूल, "विषुव बिन्दु"...
बुद्धिमान लोगों में यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि इस ऋषि दीर्घतमा द्वारा दृष्ट सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथ्वी द्वारा निर्मित इस दीर्घ वृत्ताकार कालचक्र के ३६०° अंशों के ३०°-३०° अंश के बारह मासात्मक बारह विभाग इस चक्र के किस बिन्दु से करेंगे। श्रुति स्वयं इस तथ्य को स्पष्ट करती है।
" तदाहुर्य्यद् द्वादशमासाः संवत्सरस्य । अथैतदहरत्येति यत् वैषुवतम् । अवरेषामेता ३ त् परेषा ३ मिति । अवरेषाञ्चैव परेषाञ्चेति ह ब्रूयात्। आत्मा वै संवत्सरस्य विषुवान् अङ्गानि मासाः । यत्र वा आत्मा तदङ्गानि । यत्रो अङ्गानि तदात्मा । न व आत्मा अङ्गानि अतिरिच्यते। न आत्मानम् अङ्गानि अतिरिच्यन्ते । एवमुहैतद् अवरेषाञ्चैव परेषाञ्च भवति ।"(शतपथ १२/२/३/६)
हिंदी शब्दार्थ तद्- उस संवत्सर कालचक्र को आहुः- कहते हैं। यद्- जो संवत्सरस्य- संवत्सर के द्वादश्समासा:- बारह महीने हैं। अथ उनके विभाजन में मंगलमय एतद्- यह विषुवान् अहः- रात और दिन के समान विभाग वाला विषुव दिवस, सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपनी इस समान मानता के कारण अति एति अन्य सबका अतिक्रमण कर जाता है। अर्थात् अत्यंत श्रेष्ठ है।
"अवरेषाम् न वर: अवरः तेषाम्"
समय की दृष्टि से पृथ्वी के एक गोलार्ध में रात्रि की अपेक्षा छोटा दिन काल, दूसरे गोलार्ध में इसका ठीक उलट दिन की अपेक्षा छोटा रात्रि काल,परेषाम् एक गोलार्ध में छोटे दिन के पर आने वाला बड़ा रात्रि काल, तो उसके पर गोलार्ध में रात्रि के बाद आने वाला बड़ा दिन काल ।
" एता ३त् - एति गच्छति मिलति च यः स एतः, तस्मात् इति"- जो एक से जाए और दूसरे में मिले वह एत है। अपनी धुरी पर २३° अंश २८' कला झुकी हुई, नाचती हुई और साथ ही अपने परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ती हुई पृथ्वी की उभय गति में गतिमान यह काल उत्तरी गोलार्ध में बड़ी रात्रियों से छोटे दिनों में जाता हुआ, दिनों को बढ़ाता हुआ, इसके उलट दक्षिणी गोलार्ध में बड़े दिनों से छोटी रात्रियों में जाता हुआ, रात्रियों को बढ़ाता हुआ, यहाँ एत है। पृथ्वी की इस दैनिक एवं वार्षिक गति में एक तरफ रात्रि से दिन में तो दूसरी तरफ दिन से रात्रि में प्रत्येक अहोरात्र में एक दूसरे में समान मान में गतिमान काल की निरन्तरता को दर्शाने के लिए श्रुति ने यहाँ "एता३त्" ऐसा प्लुत पाठ किया है। अर्थात् इस प्रकार यह काल एक तरफ उत्तरी गोलार्ध में बड़ी रात्रियों से छोटे दिनों में और दूसरी तरफ दक्षिणी गोलार्ध में उसी के साथ उतना ही बड़े दिनों से छोटी रात्रियों में जाता हुआ इस रात्रि दिन की कालात्मक समानता वाले इस विशिष्ट अहोरात्र विषुव दिवस को प्राप्त करता है। इस प्रकार इस विशिष्ट अहोरात्र वाला यह विषुव दिवस अन्य सभी दिनों का श्रेष्ठता में अतिक्रमण कर जाता है।
श्रुति कह रही है कि दिन-रात्रि की समता वाले इस विशिष्ट अहोरात्र विषुवान् के साथ प्रकृति में एक और क्रान्ति घटित होती है। सन्धि खोलकर श्रुति वाक्य "अवरेषाम् च एव परेषाम् च इति ह ब्रूयात्" पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में इस दिवस के पूर्व दिवस तक जो दिनकाल रात्रिकाल की अपेक्षा कुछ छोटा था, और उसके उलट दक्षिणी गोलार्ध में जो रात्रिकाल दिनकाल की अपेक्षा कुछ छोटा था, क्रमशः बढ़ता हुआ इस विशिष्ट सम अहोरात्र विषुव दिवस को प्राप्त कर इसके बाद के दिवसों में अपने सहचर रात्रि या दिन की अपेक्षा क्रमशः बड़ा ही होने लगता है। निश्चय ही ऐसा ही बोलना चाहिए।
इस प्रकार आत्मा वै संवत्सरस्य विषुवान् अङ्गानि मासाः निश्चय ही विषुवान् अर्थात् विषुव दिवस संवत्सर रूप शरीर की आत्मा है। इसी विषुव से ३०°-३०° अंश की दूरी तक की पृथ्वी की गति से नापे जाने वाले महीने इस संवत्सर रूप शरीर के अंग हैं। संवत्सर रूप शरीर की आत्मा विषुव दिवस अर्थात् विषुवान् और उसके अंग महीने हैं।
" यत्र वा आत्मा तदङ्गानि यत्रो अङ्गानि तदात्मा ।"
जहाँ आत्मा रहता है, वहीं उसके अंग रहते हैं। जहाँ अंग रहते हैं, वहीं आत्मा रहता है।
" न वा आत्मा अङ्गानि अतिरिच्यते न आत्मानम् अङ्गानि अतिरिच्यन्ते ।"
न तो आत्मा अंगों को छोड़ सकता है, और न ही अंग आत्मा को छोड़कर रह सकते हैं।
" एवमुहैतद् - एवम् उ ह एतद् ।"
श्रुति उद्घोष कर रही है कि इस प्रकार यह ऐसा ही प्रसिद्ध है। दुनिया जानती है कि आत्मा से रहित अंग मर जाता है, मुर्दा हो जाता है। अर्थात् जो भी वर्ष संवत्सर, सम अहोरात्र कालात्मक इस विशिष्ट विषुव दिवस से प्रारम्भ नहीं होते, परिगणित नहीं होते, वे मृत हैं, वे मुर्दा हैं। उनका धरती की इस जीवंत आर्तव ऋतुगामी प्रकृति से कुछ लेना-देना नहीं ।
"अवरेषाञ्चैव परेषाञ्च भवति ।"
यहीं से धरती के एक गोलार्ध में वसंत ऋतु का आगमन होता है, तो विपरीत गोलार्ध में शरद ऋतु का। इसलिए एक गोलार्ध में जब यह वासंतिक विषुव के रूप में आता है तो विपरीत गोलार्ध में ठीक यही दिन शारदीय विषुव के रूप में।
उपर्युक्त शतपथ श्रुति थोड़े ही शब्दान्तरों से गोपथ में भी है। वह इस प्रकार...
" तदाहुर्यद् द्वादशमासाः संवत्सरः । अथ हैतदहरवाप्नुयामेति यद्वैषुवतम् । अपरेषां स्विदितमह्नां परेषामिति । अपरेषाञ्चैव परेषाञ्चेति ब्रूयात्। आत्मा वै संवत्सरस्य विषुवानङ्गानि मासाः । यत्र वा आत्मा तदङ्गानि यत्राङ्गानि तदात्मा । न वा आत्माङ्गान्यतिरिच्यते नोङ्गान्यात्मानमतिरिच्यन्त इति । एवमुहैव तदपरेषां स्विदितमह्नां परेषामित्यपरेषाञ्चैव परेषाञ्चेति ब्रूयात्स वा एष संवत्सरः ।"
(गोपथ पूर्वार्ध ४/१९/)
यह श्रुति कुछ सरल शब्दों से तथ्यों को समझाने का प्रयास कर रही है।
हिन्दी शब्दार्थ - तद्- उस संवत्सर कालचक्र को आहुः- कहते हैं। जो द्वादशामासाः संवत्सर: - बारह महीने वाला संवत्सर है। अथ यद् उनके विभाजन में मंगलमय एति पृथ्वी की उभय गति के साथ चलते हुए ह एतद्- निश्चय ही यह यद् वैषुवतम् अहः - जो रात और दिन के समान विभाग वाला विषुव दिवस है उसको अवाप्नुयाम -हम प्राप्त करें।
"अपरेषाम् स्विदितम् अह्नाम् परेषाम् इति।"
पृथ्वी की उभय गति से रात्रि और दिन के क्रमिक घटने और बढ़ने को स्पष्ट करती हुई श्रुति कह रही है, कि रात्रि या दिन में से जो काल एक में से स्विदित होता है— अर्थात् चू जाता है वही काल ठीक उसके बाद आने वाले, उससे लगे हुए दिन या रात्रिकाल में जुड़ जाता है। स्वेद पसीने को कहते हैं, जैसे पसीने की बूंदे चू जाती हैं, वैसे ही यहाँ जो काल किसी रात्रि या दिन से च्युत होता है, वह अपने ठीक बाद में आने वाले दिन या रात्रि में जुड़ जाता है।
"अपरेषाञ् च एव परेषाञ् च इति ह ब्रूयात् ।"
अपनी धुरी पर २३° अंश २८'कला झुकी हुई, और साथ ही अपने परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ती हुई पृथ्वी की उभय गति में गतिमान यह काल उत्तरी गोलार्ध में दिनों के बढ़ने के क्रम में, रात्रि से स्विदित काल च्युतकाल दिन में जुड़ता हुआ, दिनों को क्रमशः बढ़ाता है। इसके उलट दक्षिणी गोलार्ध में दिन से स्विदित काल-च्युत काल रात्रि में जुड़ता हुआ रात्रियों को क्रमशः बढ़ाता है। पृथ्वी की इस दैनिक एवं वार्षिक गति में एक तरफ बड़ी रात्रि से छोटे दिन में, तो दूसरी तरफ बड़े दिन से छोटी रात्रि में, प्रत्येक अहोरात्र में एक से दूसरे में समान मान में गतिमान काल सम्पूर्ण पृथ्वी पर समान मानात्मक विषुव दिवस को प्राप्त होता है।
पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में इस दिवस के पूर्व दिवस तक, जो दिन काल रात्रि की अपेक्षा कुछ छोटा था, और उसके उलट दक्षिणी गोलार्ध में जो रात्रिकाल दिनकाल की अपेक्षा कुछ छोटा था, क्रमशः बढ़ता हुआ, इस विशिष्ट सम अहोरात्र विषुव दिवस को प्राप्त कर, इसके बाद के दिवसों में अपने सहचर रात्रि या दिन की अपेक्षा क्रमशः बड़ा ही होने लगता है। निश्चय ही ऐसा ही बोलना चाहिए।
इस प्रकार सम अहोरात्र कालात्मक "आत्मा वै संवत्सरस्य विषुवान्, अङ्गानि मासाः " विषुवान्, निश्चय ही संवत्सर शरीर का आत्मा है। यहीं से ३०°-३०° अंश की दूरी तक पृथ्वी की गति से नापे जाने वाले महीने इस संवत्सर रूप शरीर के अंग हैं। संवत्सर रूप शरीर का आत्मा 'विषुव दिवस विषुवान्' और उसके अंग महीने हैं।
"यत्र वा आत्मा तदङ्गानि यत्राङ्गानि तदात्मा।"
जहाँ आत्मा रहता है, वहीं उसके अंग रहते हैं। जहाँ अंग रहते हैं, वहीं आत्मा रहता है।
"न वा आत्मा अङ्गानि अतिरिच्यते। न आत्मानम् अङ्गानि अतिरिच्यन्ते । "
न तो आत्मा अंगों को छोड़ कर रह सकता है, न ही अंग आत्मा को छोड़कर रह सकते हैं।
"एवमुहैव - एवम् उ ह एव"
श्रुति उद्घोष कर रही है कि "इस प्रकार यह ऐसा ही प्रसिद्ध है। " दुनिया जानती है कि आत्मा से रहित अंग मर जाता है, मुर्दा होता है। अर्थात् जो भी वर्ष संवत्सर, सम अहोरात्र कालात्मक इस विशिष्ट विषुव दिवस से प्रारम्भ नहीं होते, परिगणित नहीं होते, वे मृत हैं, वे मुर्दा हैं। उनका धरती की जीवंत आर्तव ऋतुगामी प्रकृति से कुछ लेना-देना नहीं।
" तदपरेषां स्विदितमह्नां परेषामित्यपरेषाञ्चैव परेषाञ्चेति ब्रूयात्स वा एष संवत्सरः ।" (पूर्व मन्त्र के अनुसार)
२- सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथ्वी का महासुपर्ण के रूपक...
पृथ्वी की गति में गतिमान इस संवत्सर कालचक्र को श्रुति एक अति में वैदिक रूपक सुन्दर साहित्यिक रूपक से भी समझाती है।
"अथ ह वा महासुपर्ण एव यत् संवत्सरः । तस्य यान् पुरस्ताद्विषुवतः षण्मासानुपयन्ति सोऽन्यतरः पक्षः । अथ यान्यडुपरिष्टात्सोऽन्यतरः । आत्मा विषुवान् ।यत्र वा आत्मा तत्पक्षौ यत्र वा पक्षौ तदात्मा। न वा आत्मा पक्षावतिरिच्यते नात्मानम्पक्षावतिरिच्येते । एवमु हैतदवरेषाञ्चैव परेषाञ्च भवति ।"
(शतपथ ब्राह्मण१२/२/३/७ ।)
हिन्दी व्याख्या- २३° अंश २८' कला के निश्चित झुकाव पर नाचती हुई, सूर्य की परिक्रमा करती पृथ्वी की गति में, महाकाश में इस संवत्सर कालचक्र को उड़ता हुआ देखते हुए, "अथ" इस मंगल वाचक शब्द से श्रुति अद्भुत रूपक द्वारा इसे हृदयङ्गम कराते हुए कहती है कि, यह संवत्सर काल चक्र सुंदर पंखों वाला महाकाश में उड़ता हुआ महान पक्षी, महागरुण है। इस संवत्सर कालचक्र रूपी महासुपर्ण के आदि विषुव की प्राप्ति के पूर्व से अर्थात् मध्य विषुव से आदि विषुवपर्यन्त जो छः महीने पड़ते हैं, एक पक्ष हैं, अर्थात् दक्षिणावर्त ही है इस महासुपर्ण पक्षी का दाहिना पंख । अब जो छः महीने ऊपर की ओर से होते हैं, उत्तरावर्त के हैं, वे द्वितीय पक्ष हैं, अर्थात् उत्तरावर्त ही है, इस महासुपर्ण पक्षी का बायाँ पंख । इस प्रकार विषुव से विषुव पर्यन्त, इस चक्र की व्यासात्मिका ऋजुरेखा जो दोनों विषुवों को १८०° अंश के कोण पर जोड़ती है, इस महासुपर्ण पक्षी की रीढ़ रज्जु है, आदिविषुव मुख और मध्यविषुव पुच्छ है। इसी तथ्य को समझाने के लिए श्रुति कह रही है कि विषुवान्, इस महाकाश में उड़ रहे महासुपर्ण पक्षी का आत्मा है, शरीर है। दक्षिणावर्त और उत्तरावर्त इस पक्षी के दो पंख हैं। जहाँ आत्मा रहता है, शरीर रहता है, वहीं पक्षी के दोनों पंख भी रहते हैं। जहाँ दोनों पंख रहते हैं, वहीं पक्षी का शरीर भी रहता है। न तो शरीर पंखों को छोड़ता है, और न ही दोनों पंख शरीर को छोड़ कर रह सकते हैं। निश्चय ही विषुवान्, और पक्षों का यह सम्बंध ऐसा ही है। यही तथ्य गोपथ श्रुति ४/१७ में भी वर्णित है।
श्रुति उद्घोष कर रही है, इस प्रकार यह ऐसा ही प्रसिद्ध है, दुनिया जानती है, कि आत्मा से रहित अंग मर जाता है, मुर्दा होता है। अर्थात् जो भी वर्ष संवत्सर सम अहोरात्र कालात्मक इस विशिष्ट विषुव दिवस से प्रारंभ नहीं होते, परिगणित नहीं होते, वे मृत हैं, वे मुर्दा हैं। उनका धरती की इस जीवंत आर्तव ऋतुगामी प्रकृति से कुछ लेना-देना नहीं।
"अवरेषाञ्चैव परेषाञ्च भवति ।" यहीं से धरती के एक गोलार्ध में वसंत ऋतु का आगाज होता है, तो विपरीत गोलार्ध में शरद ऋतु का। इसलिए एक गोलार्ध में जब यह वासंतिक विषुव के रूप में आता है, तो विपरीत गोलार्ध में ठीक यही दिन शारदीय विषुव के रूप में। दुनिया के लोगों देखो, यह है धरती का विशिष्ट सम अहोरात्र कालात्मक विषुव दिवस। इस दिन होगा धरती पर दिन-रात का मान समान, १२ घंटे का दिन, १२ घंटे की रात । उत्तरी गोलार्ध का शारदीय विषुव और दक्षिणी गोलार्ध का वासंतिक विषुव ।
वर्ष के आदि विषुव से छ: माह बाद पड़ने वाला दूसरा विषुव वर्ष का मध्य विषुव है। वर्ष के आदि विषुव से आरंभ हुआ उत्तरावर्त इस मध्य विषुव के आने के साथ ही पूर्ण हुआ, और साथ ही दक्षिणावर्त का आरंभ हो गया। इस विषुव से १८०° अंश के पृथ्वी के शेष परिक्रमा पथ पर चलने से क्रमश: ३०°-३०° अंश की दूरी के दक्षिणावर्त के छः माह पूर्ण होने के साथ यह वर्ष पूर्ण होता है। यहीं से आदि विषुव के साथ नववर्ष का आरंभ होता है।
विषुव दिवस से ही संवत्सर का आरम्भ होता है, इस तथ्य को ऐतरेय श्रुति में बहुत ही बल देकर कहा गया है, वे निम्नलिखित हैं...
"यथा वै पुरुष एवं विषुवान्।
तस्य यथादक्षिणोऽर्ध एवं पूर्वोऽर्ध विषुवतो यथोत्तरोऽर्ध एवमुतत्तरोऽर्थो विषुवतस्तस्मादुत्तर इत्याचक्षते ।
प्रबाहुक्सतः शिर एव विषुवान्।
बिदलसंहित इव वै पुरुषस्तद्धाति स्यूमेव मध्ये शीष्ण विज्ञायते ।"
( ऐतरेय ब्राह्मण १८।८।)
जैसे लोक में पुरुष है, वैसे ही विषुवान् (विषुव दिवस) है। विषुवान् का पूर्वार्ध पुरुष के दक्षिण अंग के समान है। विषुवान् का उत्तरार्ध पुरुष के वाम अंग के समान है। इसीलिए उस विषुव के बाद को उत्तर कहते हैं। विषुव, वाम अंग एवं दक्षिण अंग के सम अवस्था में स्थित पुरुष के सिर के समान है। पुरुष दक्षिण अंग एवं वाम अंग रूप दो भागों से बीज के दो दलों के समान संयोजित है। इसलिए दो दलों के संधान के कारण, मध्य से यह पुरुष शिला हुआ सा प्रतीत होता है।
मीमांसा - यहाँ संवत्सर काल की तुलना पुरुष के शरीर से की गयी। है। जैसे व्यक्ति का शरीर दक्षिणांग और वामांग दो भागों में जुड़ा हुआ है इसी प्रकार संवत्सर काल का शरीर भी दोनों विषुओं से, दक्षिणावर्त और उत्तरावर्त रूप छः-छः महीनों के साथ जुड़ा हुआ है। इसमें आदि विषुव, जिससे पहले दक्षिणावर्त आता है, और जिसके बाद उत्तरावर्त आता है, यह विषुव इस संवत्सर काल का सिर है, और मध्य विषुव उसका अधोभाग है। इस प्रकार यह संवत्सर इन दोनों विषुओं के द्वारा छः-छः महीनों के साथ जुड़ा हुआ है।
"तदाहुर्विषुवस्यैवैतदहः शंसेद्विषुवान् वा एतदुक्थानामुक्थं विषुवान् विषुवानिति ह विषुवन्तो भवन्ति श्रेष्ठतामश्नुवत इति । तत्तन्नादृत्यं संवत्सर एव शंसेद्रेतो वा एतत्संवत्सरं दधतो यन्ति ।"
( ऐतरेय ब्राह्मण १८१८ ।)
वही कहा गया है कि विषुव के इस दिन से ही संवत्सर का अनुशासन करना चाहिए। यह विषुव उक्थों के मध्य उक्थ है, अर्थात् वेदादि शास्त्रों में बार-बार स्पष्ट किया गया है, अतः विषुव नाभि पर आने वाला सम रात्रि - दिन काल वाला दिन ही विषुव दिन है। वह अहोरात्र दिवस, जिसमें दिन और रात्रि का मान समान हो जाता है, विषुव दिवस कहलाता है। कालचक्र की विषुव नाभि पर सूर्य के दिखने से अर्थात् पृथ्वी की विषुवत् रेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ने पर यह विषुव दिवस होता है। यहाँ श्रुति ने यह स्पष्ट किया है कि जो इस विषुव को जानते हैं, इस विषुव से संवत्सर सत्र का आरंभ होना जानते हैं वे संवत्सर ज्ञान की श्रेष्ठता को प्राप्त करते हैं।
"संवत्सरो ह्येतदहराप्नोति संवत्सरं ह्येतदहराप्नुवन्त्येष ह वै संवत्सरेण पाप्मानमपहतः एष विषुवताङ्गेभ्यो हैव मासैः पाप्मानमपहते शीष्ण विषुवता । अप संवत्सरेण पाप्मानं हतेऽप विषुवता य एवं वेद ।"
(ऐतरेय ब्राह्मण १८१८ ।)
क्योंकि संवत्सर से ही इस विषुव दिवस को प्राप्त करते हैं, और क्योंकि इस विषुव दिवस से ही संवत्सर को प्राप्त करते हैं, अर्थात् संवत्सर की समाप्ति पर विषुव दिवस को प्राप्त कर वहीं से नवसंवत्सर का आरंभ करते हैं। यह संवत्सर का ज्ञानवान्, इस संवत्सर ज्ञान के द्वारा संवत्सर के अज्ञान रूप पापों को नष्ट करता है, और यह मध्य विषुव दिवस के ज्ञान से, मासों के ज्ञान के द्वारा, जो ऋतुओं के अंगरूप हैं, उनके ज्ञान से कृषि के अंगभूत कृषि विषयक अज्ञानरूप पापों को नष्ट करता है। और शीर्ष विषुव दिवस अर्थात् आदि विषुव दिवस के ज्ञान के द्वारा अपने सिर से अज्ञानात्मक पापों को नष्ट करता है।
जो इस प्रकार जानता है, वह संवत्सर ज्ञान के द्वारा और विषुव ज्ञान के द्वारा अपने सम्पूर्ण पापों को नष्ट करता है।
ऋग्वेद में ही कालज्ञापक मंत्र के अतिरिक्त मंत्रों में भी संवत्सर और मास विज्ञान को स्पष्ट किया गया है, देखें यह मंत्र ...
"वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् । वेदनावः समुद्रियः ।।"
(ऋगवेद १/१२५/७)
जिन्होंने समुद्र के ऊपर अंतरिक्ष में उड़ते हुए पक्षियों को और उनके पाँवों को देखा और समझा। उसी प्रकार समुद्र में वेग से चलती हुई नौका को भली भाँति जाना।
मीमांसा - समुद्र के ऊपर उड़ते हुए पक्षियों को समुद्र के भीतर की जाते दूर हुए स्पष्ट प्रतीत होता है कि उस पक्षी के पाँव और उसका ओर अधो भाग स्पष्ट दिख रहा है। उसका मुख की ओर का आगे का भाग नीचे की ओर झुका हुआ दिखता है। ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि मानों पक्षी किञ्चित् वृत्ताकार झुकाव में उड़ रहा है। इससे स्पष्ट ज्ञान होता है कि पृथ्वी गोल है।
इसी प्रकार सागर में वेग से चलती हुई नौका में बैठे हुए व्यक्ति को सागर के टापू अपनी ओर आते हुए दिखते हैं। और समीप के टापू अपने से दूर जाते हुए दिखते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी पर स्थित व्यक्ति को, पृथ्वी से बहुत दूर स्थित, दिन में सूर्य और रात्रि में चाँद तारे पूरब से पश्चिम को जाते हुए दिखते हैं। इससे यह तथ्य स्पष्ट होता है कि जैसे समुद्र में चल रही नौका में स्थित व्यक्ति को, नौका स्थिर और टापू चलते हुए दिखाई देते हैं। किन्तु मूलतः नौका चल रही होती है, टापू नहीं, ठीक उसी प्रकार इस पृथ्वी पर विद्यमान प्राणियों को अपनी धुरी पर पश्चिम से पूरब को घूम रही पृथ्वी के साथ पश्चिम से पूरब जाने के कारण बहुत दूर आकाश में स्थित सूरज चाँद तारे पूरब से पश्चिम को जाते हुए दिखते हैं। इस ज्ञान से अपनी धुरी पर पृथ्वी के घूमने के ज्ञान को स्पष्ट किया गया है।
" वेदमासो धृतव्रतः द्वादश प्रजावतः ।
वेदा य उपजायते ।।"
( ऋग्वेद १/१२५/८/)
जो नियम से ऋतु-क्रम से आने वाले द्वादश मासों को जानता है, जिनसे सम्पूर्ण प्रजा का पालन होता है, और जो उस विशिष्ट दिन को जानता है, जिनसे इन सबका परिगणन होता है।
मीमांसा - यहाँ इन दो मंत्रों में उक्त गम्भीर विज्ञान को जनसामान्य के लिए सरलता से समझाने का प्रयास किया गया है।
३ - वर्ष का आरम्भ विषुव दिवस से...
धरती के बुद्धिजीवियो, देखो संवत्सर या वर्ष का आरम्भ धरती के इस विशिष्ट सम अहोरात्र कालात्मक आदि विषुव दिवस से होता है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर १२ घंटे का दिन १२ घंटे की रात उत्तरी गोलार्ध का वासंतिक विषुव और दक्षिणी गोलार्ध का शारदीय विषुव । इन विषुवों पर सम्पूर्ण धरती की प्रकृति उल्लसित हो उठती है।
इस विषुव दिवस की प्रकृति को देखो! यह खिले कुसमों, गुनगुनाते भौरों, वृक्षों में निकले लाल-लाल किसलयों, बौराई फलवन्ती मदमाती आम्रमञ्जरियों, अपनी मंद-मंद, मधु-मधु बहती हवाओं से, धरती के सारे प्राणियों को सहलाती, उल्लसित करती गुदगुदाती, खिलखिलाती व्यक्तियों के जन्म दिनों से मनाये जाने वाले फर्जी, कहीं ठंड से सिकुड़े, कहीं गर्मी से जलते, कभी २० दिन आगे, कभी २० दिन पीछे, निष्प्राण, निर्जीव, लोगों द्वारा कल्पित तथाकथित नववर्षो की खिल्ली उड़ा रही है।
हे दुनिया के बुद्धिजीवियो! भूवैज्ञानिको ! अंतरिक्ष वैज्ञानिको ! आँख खोल के देखो! कान लगा के सुनो! इस विषुव दिवस पर प्रकृति के साथ भौरे भी ऋग्वेद का यह गीत गुनगुना रहे हैं।
मेरा अनुरोध है कि मधुमास के आरम्भिक प्रथम प्रभात में थोड़ा घर से बाहर निकलें और इस वेद गान का अनुभव करें...
" मधुवाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः ।
माध्वीर्न सन्त्वोषधीः ।
मधुनक्तमुतोषसो, मधुमत्पार्थिवं रजः ।
मधु द्यौरस्तु नः पिता ।
मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमारस्तु सूर्यः ।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः ।।"
(ऋग्वेद १/१०/६/९। यजुर्वेद .१३/२७-२९।)
मधुमास की यह मधुर-मधुर बहती कोमल शीतल सुखद स्पर्शी हवायें परम चैतन्य के आनन्द के उल्लास जैसी हैं। सागर मधु वर्षा रहे हैं। हे परमात्मन्! मेरी कृषि वनस्पतियाँ भी मधुमय फलवती हों।
रात्रि मधुमयी हो गयी है। यह ऊषा मधुमय है। धरती की यह धूल भी मधुमय हो रही है। हे हमारे द्युतिमान पालक परमात्मन् ! आप हमारे लिए मधुमय हों।
वनस्पतियाँ हमारे लिए मधुमय हों। सूर्य हमारे लिए मधुमय हों। मेरी गायें, दूध, दही, आमिक्षा, घृतादि मधु देने वाली मधुमती हों।
यहीं से धरती के एक गोलार्ध में वसंत ऋतु का आगाज होता है, तो विपरीत गोलार्ध में शरद ऋतु का। इसलिए एक गोलार्ध में जब यह वासंतिक विषुव के रूप में आता है, तो विपरीत गोलार्ध में ठीक यही दिन शारदीय विषुव के रूप में। यही यह संवत्सर है।
४ - विषुव से मास विभाजन...
पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में स्थलीय आबादी अधिक होने से इस गोलार्ध में वसंत ऋतु के आरम्भक विषुव से नवसंवत्सर का आरंभ माना गया है। इसलिए इसे संवत्सर का "आदि विषुव या महाविषुव" और दूसरे को मध्य विषुव कहते हैं। इसी के साथ वैदिक नवसंवत्सर का आरम्भ होता है। इस महाविषुव को धरती के उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु का आरम्भक होने से वासंतिक विषुव एवं दक्षिणी गोलार्ध में शरद ऋतु का आरंभक होने से शारदीय विषुव कहा जाता है। यहाँ से पृथ्वी दीर्घ चक्राकार सूर्य-परिक्रमा पथ पर प्रत्येक ३०° अंश चलने में जितना समय लगाती है, वही एक माह का समय होता है। तदनुसार सभी छ: ऋतुओं के २-२ महीनों कुल १२ महीनों के नाम, और प्रत्येक मास की ३०° अंश के परिक्रमा पथ पर गतिमान पृथ्वी को लगने वाला समय जो उस माह का समय होता है, दिन-घंटा-मिनट-सेकंड में नीचे दिया जा रहा है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि सारी पृथ्वी पर १२ घंटे का दिन और १२ घंटे की रात के समान मान वाले इस विषुव दिवस से यदि उत्तरी गोलार्ध में वसंत तो दक्षिणी गोलार्ध में शरद् ऋतु का आरंभ होता है।
तदनुसार ही महीनों के आर्तव नाम भी होते हैं। किन्तु पृथ्वी की परिक्रमण गति से सम्बद्ध होने के कारण, महीनों का समय अपरिवर्तित रहता है। यह तथ्य भी यहाँ नीचे स्पष्ट किया जा रहा है।
५- उत्तरावर्त और दक्षिणावर्त...
वसंत ऋतु मधुमास माधवमास ग्रीष्म ऋतु शुचिमास वर्षा ऋतु उत्तरावर्त- दोनों ही विषुवों पर सम्पूर्ण पृथ्वी पर दिन-रात समान होते हैं। १२ घंटे का दिन, १२ घंटे की रात । जैसा कि कालचक्र के मंत्रों में स्पष्ट किया गया है कि, पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा दीर्घ वृत्ताकार पथ में करती है, इसलिए जिस विषुव से पृथ्वी सूर्य से दूर जाती हुई दीर्घ परिधि पर परिक्रमण करती है, तब महीनों की ३०°-३०° अंशों की दूरी क्रमशः ९०° अंशों अर्थात् तीन महीनों तक बढ़ती ही जाती है। पुनः तीन महीनों ९० अंशों तक क्रमशः उसी प्रकार मध्य विषुव तक आती है। स्वभाविक रूप से अधिक दूरी चलने में समय भी अधिक लगता है। दूर जाने के क्रम से पृथ्वी के झुकाव का उत्तरी गोलार्ध और ध्रुव, सूर्य के सामने से घूमता है। इसलिए इसे उत्तरावर्त कहते हैं।
दक्षिणावर्त - इसके ठीक उलट जिस विषुव से पृथ्वी सूर्य के समीप जाती हुई लघु परिधि पर परिक्रमण करती है, महीनों की ३०°-३०° अंशों की दूरी क्रमशः ९०° अंशों तक अर्थात् ३ महीनों तक घटती ही जाती और ९०° अंश पर ठीक दक्षिण नाभि पर पहुँचती है। पुन: इस दक्षिण नाभि से उसी प्रकार थोड़ा-थोड़ा बढ़ती हुई ९०° अंश अर्थात् तीन माह चलकर आदि विषुव तक आती है। स्वाभाविक रूप से परिक्रमा मार्ग रूप परिधि के घटने से इस दूरी को चलने में समय भी कम लगता है। मध्य विषुव से परिक्रमा पथ सूर्य के समीप से घूमने के साथ ही पृथ्वी के झुकाव का दक्षिणी गोलार्ध और दक्षिणी ध्रुव सूर्य के प्रकाश की ओर हुआ घूमता है। इसलिए इसे दक्षिणावर्त कहते हैं। इस प्रकार दक्षिणावर्त में पृथ्वी क्रमशः सूर्य के समीप से परिक्रमा मार्ग पर चलती है। तदनुसार वें छ: महीने भी छोटे होते हैं। यह तथ्य मूल वैदिक कालचक्र पर और महीनों के इस चार्ट में भी स्पष्ट है।
पृथ्वी के इसी परिक्रमण आधार पर बनाये गये चार्ट को देखने से स्पष्ट है कि, उत्तरावर्त के सभी छ: महीने ३० दिन से अधिक हैं, और ४ महीने तो साढ़े ३० दिन से भी अधिक है। इन्हें ३१-३१ दिनों का मानना उचित है। इसी प्रकार दक्षिणावर्त के सभी ६ महीने एक को छोड़कर ३० से कम और २९ से अधिक हैं। इसलिए इन सभी को ३० का मानना उपयुक्त है। घंटे ४८ मिनट ४६ सेकंड का अंतर विषुव वर्ष होने से ५ आदि विषुव के साथ ही प्रथम माह में जुड़ता है।
६ - नाड़ीवृत्त, विषुववृत्त और कालवृत्त...
पृथ्वी के अपने अक्ष पर परिभ्रमण के कारण अन्तरिक्ष में- खगोल में रात्रि में नक्षत्र प्रतिदिन पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए दिखते हैं, उनका वह मार्ग 'वृत्ताकार दिखता है। ध्रुव तारे के समीप के नक्षत्र मंद गति से चलते हुए दिखते हैं, जबकि मध्याकाश में स्थित नक्षत्र तीव्र गति से चलते हुए दिखाई देते हैं। नक्षत्रों के भ्रमण की दृष्टि से नभमंडल में, जिसे खगोल भी कहते हैं, कल्पित पूर्वापर वृत्त को जिसके द्वारा खगोल का मध्य से उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध के रूप में दो भाग होता है, उसे ही ज्योतिषी लोग नाड़ीवृत्त, विषुववृत्त या कालवृत्त कहते हैं।
७ - क्रान्तिवृत्त अपने अक्ष पर २३° अंश २८' कला झुकी हुई पृथ्वी, अपने अक्ष पर घूमती हुई दिन और रात करती हुई, साथ ही सूर्य की परिक्रमा करती हुई, संवत्सर आर्तव वर्ष का निर्माण करती है। पृथ्वी की इस वार्षिक परिक्रमण गति के कारण विषुव वृत्त के समीपवर्ती नक्षत्रों के क्रमिक दर्शनपूर्वक सूर्य की ऋतु परिवर्तन के साथ प्रतीत होने वाली वार्षिक गति भी दिखाई पड़ती है। इस खगोल में पृथ्वी की इस वार्षिक गति के द्वारा नक्षत्रों का और सूर्य का भी मार्गात्मक वृत्त कल्पित होता है। यह वृत्त नाड़ीवृत्त या विषुव वृत्त से २३° अंश २८' कलात्मक झुकाव से युक्त होता है। पृथ्वी में झुकाव के कारण उसकी गति से कल्पित यह वृत्त ही क्रान्तिवृत्त कहा जाता है।
८- आदि विषुव - अपनी धूरी पर २३° अंश २८' कला झुकी हुई, अपने झुकाव को बिना बदले हुए सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथ्वी से अपनी उदय की दिशा में पूर्व से उत्तर की ओर खिसकता हुआ सूर्य उत्तर को जाता हुआ, जहाँ इस विषुववृत्त का अतिक्रमण करता है, वहाँ यह सूर्य के द्वारा विषुव वृत्त का संक्रमण विन्दु ही आदि विषुव सम्पात कहा जाता है। इस स्थिति में सूर्य की परिक्रमा करती हुई, और अपने अक्ष पर घूमती हुई, पृथ्वी के मध्य भाग में सूर्य की रश्मियाँ सीधी पड़ती हैं। अत एव सारी पृथ्वी पर इस दिन, रात्रि और दिन का काल मान समान होता है। १२ घंटे का दिन और १२ घंटे की रात्रि । वेदों में यह दिन आदिविषुव के रूप में प्रसिद्ध है; क्योंकि इसी दिन से नववर्ष का आरम्भ होता है। उत्तरी गोलार्ध में इसी दिन से वसंत ऋतु का आरम्भ होता है, और पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ही स्थलीय भाग अधिक होने से मानवीय आबादी अधिक है। वर्तमान में सम्पूर्ण भारत उत्तरी गोलार्ध में पड़ता है, इसलिए भारतीय पञ्चांगों में इसे ही वासंतिक विषुव कहा जाता है।
९- मध्य विषुव- इसी प्रकार पृथ्वी की द्विविध गति के कारण, उत्तर नाभि को प्राप्त होकर अर्थात् उत्तर दिशा में जाने की सीमा पर पहुँच कर सूर्य पुनः उत्तर से दक्षिण को गति करता हुआ-सा दिखता है। इस प्रकार १८०° अंशात्मक क्रान्ति वृत्तीय मार्ग को पूर्ण करके जब वह पुनः उत्तर से दक्षिण जाते हुए विषुव वृत्त का अतिक्रमण करता है, तब यह सूर्य के द्वारा विषुव वृत्त का संक्रमण बिन्दु ही मध्य विषुव कहा जाता है। ६ मास के अन्तर से पुनः इस संक्रमण बिन्दु पर सूर्य के होने से पृथ्वी के मध्य भाग में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, और इस कारण पुन: इस दिन सम्पूर्ण पृथ्वी पर रात और दिन का काल मान समान होता है । १२ घंटे की रात्रि और १२ घंटे का दिन। वेद में यह दिवस मध्यविषुव दिवस के रूप में माना गया है। इस प्रकार ये दोनों विषुव ६-६ महीने के अंतराल से बराबर आते रहते हैं, पहला वर्ष का आरंभिक आदिविषुव, दूसरा वर्ष का मध्य, मध्यविषुव ।
१०- विषुवनाभि- पृथ्वी से सूर्य के जिस बिन्दु पर दिखने से ६-६ महीने के अंतराल पर यह विषुव दिवस होते हैं उस विन्दु को विषुवनाभि कहते हैं।
११ - उत्तरनाभि- पृथ्वी की द्विविध गति के कारण सूर्य प्रतिदिन उत्तर की ओर खिसकते हुए जब सर्वाधिक उत्तर की ओर उदित होते हुए दिखते हैं और उससे अधिक उत्तर न जाकर जिस बिन्दु के बाद वे वहाँ से थोड़ा थोड़ा प्रतिदिन दक्षिण हटकर उदित होने लगते हैं उस अंतिम उत्तर किनारे पर सूर्य के उदित होते सूर्य के बिन्दु को उत्तर नाभि कहते हैं।
१२- दक्षिणनाभि- उत्तर नाभि पर पहुँचने के बाद जब सूर्य थोड़ा थोड़ा दक्षिण की तरफ उदित काल में खिसककर उदित होते दिखते हैं और छः महीने के अंतराल के बाद सर्वाधिक पूरब दिशा में उदित होने के दक्षिण किनारे पर उदित होते हैं, जिससे और दक्षिण न जाकर उत्तर की ओर खिसकना आरम्भ हो जाता है, उस बिन्दु को दक्षिणनाभि कहते हैं।
१३- उत्तरायण व दक्षिणायण- उक्त दक्षिणनाभि से उत्तरनाभि तक पहुँचने के छः महीने के समय को उत्तरायण कहते हैं और इसी प्रकार उत्तरनाभि से दक्षिणनाभि तक के छः महीने के समय को दक्षिणायण कहते हैं।
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